'हैप्पी बर्थडे चित्रा त्रिपाठी, यही खूबियां बनाती हैं आपको दूसरों से खास'

चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
MALVIKA HARIOM

मालविका हरिओम, कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता।।

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर गोरखपुर से निकलने वाली एक बड़ी शख्सियत के रूप में चित्रा त्रिपाठी ने न सिर्फ अपने शहर और अपने प्रदेश का ही नाम रोशन किया, बल्कि उन सभी लोगों को गर्व की अनुभूति भी करवाई, जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहे। उनकी मम्मी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद तमाम दूसरी भारतीय महिलाओं की तरह घर पर ही रहीं। सिर्फ परिवार को देखा और अपने सपनों को तिलांजलि दे दी, लेकिन वे अपनी बेटी चित्रा में लगातार कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक को भरती रहीं। यही कारण है कि कुछ अच्छा करने का जज्बा जन्म के साथ ही मां के आशीर्वाद के रूप में चित्रा को मिल गया और फिर उस सफर को देखें तो जिन छोटी जगहों के बच्चे ठीक से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर पाते, वहां से एक लड़की अपने दम पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और एक दिन उस ऊंचाई पर पहुंच जाती है, जहां से दुनिया उसे आसानी से देख सके।

सुंदर चेहरा, विनम्र स्वभाव, संवेदनशील हृदय और कुछ कर गुजरने का जज्बा, इन सबको मिलाकर चित्रा की एक ऐसी तस्वीर तैयार होती है जो श्रोताओं और दर्शकों को एक अपनत्व और जुड़ाव का अहसास कराती है। चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं। सोशल मीडिया पर उनके भावनात्मक लाइव प्रसारण उनकी सकारात्मक छवि को स्थापित और पुख्ता करते हैं।

आज चित्रा एक सेलिब्रिटी हैं। लेकिन मुझे याद आती है वो प्यारी चित्रा, जिसे मैंने गोरखपुर में उसके संघर्ष के दिनों में देखा था। वहां कई नए लड़के-लड़कियां जो बतौर रिपोर्टर अखबारों में काम करते थे, घर आया करते थे। पतिदेव डॉ. हरिओम उन दिनों जिलाधिकारी गोरखपुर के पद पर तैनात थे और हम दोनों ही चूंकि सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि लेते थे, इसलिए कोई न कोई घर पर इंटरव्यू लेने या बातचीत करने जरूर आ जाता था। इसी सिलसिले में एक दिन चित्रा का भी आना हुआ। लॉन में दो कुर्सियाँ लगाई गईं। उन दिनों वहां एक लोकल चैनल 'सत्या' हुआ करता था। चित्रा उसी में खबरें पढ़ती थीं। सुंदर चेहरा, चमकती आंखें, गर्दन तक कटे हुए छोटे-छोटे बाल, नई उम्र का उत्साह, गज़ब का आत्मविश्वास और कुछ कर गुजरने का जज्बा, ये सबकुछ एकसाथ मुझे उस लड़की में नज़र आया। ज़िलाधिकारी का इंटरव्यू लेने के नाते चित्रा पूरी तैयारी के साथ आई थी। हाथ में ढेर सारे पन्ने, उन पर लिखे हुए सवाल और चेहरे पर हमेशा की तरह एक प्यारी-सी मुस्कुराहट। इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। चित्रा ने साबित कर दिया कि ख़ूबसूरत चेहरे के साथ-साथ उसमें क़ाबिलियत भी भरपूर है।

फिर एक दिन किसी काम से जब ‘सत्या’ चैनल पर जाना हुआ तो गर्मी के दिनों में दूसरे फ्लोर पर, एक कमरे के छोटे-से स्टूडियो में चित्रा खबरें पढ़ने के लिए तैयार खड़ी थी। गर्मी की वजह से चेहरे पर काफ़ी पसीना आ रहा था। मैंने देखा कि वो खबरों की तैयारी के साथ-साथ, अपने मेकअप का काम भी ख़ुद ही देख रही थी। हम दोनों मिले, थोड़ी-सी बात हुई और उसके बाद वो अपने समाचार प्रसारण की तैयारी में लग गई। मैं देखती ही रह गई कि इतनी छोटी-सी लड़की में कितना आत्मविश्वास है और काम के प्रति कितनी लगन और ईमानदारी है। समाचार पढ़ने में अभी वक़्त था लेकिन चित्रा को खाली बैठना गंवारा नहीं था। वह कुर्सी पर बैठ गयी और समाचार पढ़ने की रिहर्सल करने लगी। जब मैंने उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुराई। वो मुस्कुराहट मुझे आज तक याद है।

आज चित्रा मेरी छोटी बहन की तरह है। हम लोग फोन पर बात करते हैं, मिल भी लेते हैं। जब भी उसको देखती हूं तो यही लगता है कि लड़कियां अब किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अच्छी सोच हो, काम के प्रति निष्ठा हो और कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो छोटे शहरों से आई लड़कियां भी देश-दुनिया की तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। चित्रा ने यह कर दिखाया। आज 'चित्रा त्रिपाठी' सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि एक 'प्रेरणा' है, उन तमाम लड़कियों के लिए जो न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं बल्कि समाज-दुनिया की बेहतरी के लिए कुछ अच्छा और सकारात्मक भी करना चाहती हैं।

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाओं के साथ प्रिय चित्रा के लिए मेरी ये पंक्तियां-

ऊंची लहरों पे चढ़ के आई हूं
मैं जमाने से लड़ के आई हूं
मुफ्त का ज्ञान ना थोपो मुझपर
अपने हिस्से का पढ़ के आई हूं

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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने बताया, अपनी उपयोगिता क्यों खो रहा है संयुक्त राष्ट्र

संसार की सर्वोच्च पंचायत संयुक्त राष्ट्र पर सवालिया निशान और विकराल होते जा रहे हैं। इसकी हर बैठक अपने पीछे ऐसे सवालों का एक गुच्छा छोड़ जाती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 September, 2022
Last Modified:
Tuesday, 27 September, 2022
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

संसार की सर्वोच्च पंचायत संयुक्त राष्ट्र पर सवालिया निशान और विकराल होते जा रहे हैं। इसकी हर बैठक अपने पीछे ऐसे सवालों का एक गुच्छा छोड़ जाती है। यह गुच्छा सुलझने के बजाय और उलझता जाता है। फिलहाल, इसके सुलझने की कोई सूरत नजर नहीं आती, क्योंकि अब इस शिखर संस्था पर हावी देशों की नीयत और इरादे ठीक नहीं हैं।

किसी जमाने में वे वैश्विक कल्याण के नजरिये से काम करते रहे होंगे, लेकिन आज वे संयुक्त राष्ट्र को अपना-अपना हित साधने का मंच बना चुके हैं। जिस पंचायत में पंच और सरपंच अपने गांव या कुनबे के खिलाफ काम करने लगें तो उनके प्रति अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटाने की जुर्रत कौन कर सकता है? कई पंचों की आपस में नहीं बनती तो कुछ पंच मिलकर सरपंच के खिलाफ हैं। जो पंच अल्पमत में हैं, वे सीधे-सीधे अपने मतदाताओं से मिलकर गुट बना रहे हैं।

ऐसे में सार्वजनिक कल्याण हाशिये पर चला जाता है और सारा जोर निजी स्वार्थ सिद्ध करने पर हो जाता है। संस्था की साख पर कोई ध्यान नहीं देता। संयुक्त राष्ट्र कुछ ऐसी ही बदरंग तस्वीर बनकर रह गया है।

संयुक्त राष्ट्र की हालिया बैठक साफ-साफ संकेत देती है कि अब इसके मंच पर समूचा विश्व दो धड़ों में बंटता जा रहा है। पश्चिम और यूरोप के गोरे देश एशिया और तीसरी दुनिया के देशों को बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहते। विडंबना यह है कि एशियाई देश भी इसे समझते हैं, मगर एकजुट होकर प्रतिकार भी नहीं करना चाहते। प्रतिकार तो छोड़िए, वे सैद्धांतिक आधार पर एक-दूसरे का साथ नहीं देते।

रिश्तों में आपसी कड़वाहट और विवाद से वे उबर नहीं पाते। जिस चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलाने में भारत ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, वही अब सुरक्षा परिषद की स्थायी समिति के लिए भारत की राह में रोड़े अटकाता है। अतीत गवाह है कि भारत ने एक तरह से सुरक्षा परिषद में अपनी सीट चीन को सौंपी थी, उसी चीन का व्यवहार लगातार शत्रुवत है। वह न केवल भारत के खिलाफ अभियान छेड़ने में लगा हुआ है, बल्कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को भी संरक्षण दे रहा है।

इस मसले पर उसने अपने वीटो का दुरुपयोग करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 1267 को उसने एक तरह से अप्रासंगिक बना दिया है। पंद्रह अक्तूबर 1999 को यह प्रस्ताव अस्तित्व में आया है। इसके मुताबिक कोई भी सदस्य देश किसी आतंकवादी को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव रख सकता है। लेकिन उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मंजूरी लेनी होगी। यहां चीन हर बार अपनी टांग अड़ा देता है। ऐसे में यह प्रस्ताव कोई मायने नहीं रखते।

भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन और पाकिस्तान का नाम लिए बिना उनको आक्रामक अंदाज में घेरा तो सही, लेकिन उससे चीन के रुख में अंतर नहीं आया। भारत के इस रवैये पर अब यूरोपीय और पश्चिमी देश भी ज्यादा ध्यान नहीं देते। जब उनके अपने मुल्क में आतंकवादी वारदात होती है तो कुछ समय वे चिल्ल-पों मचाते हैं, मगर भारत की तरह वे हमेशा यही राग नहीं अलापते। भारत की स्थिति इसलिए भी अलग है कि पाकिस्तान ने कश्मीर में बारहों महीने चलने वाला उग्रवादी अप्रत्यक्ष आक्रमण छेड़ा हुआ है इसलिए यूरोपीय और पश्चिमी राष्ट्रों की प्राथमिकता सूची में यह मसला कभी नहीं आता।

दिलचस्प है कि उसी चीन को हद में रखने के लिए अब यूरोपीय देश और अमेरिका तक सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी भारत की सदस्यता के पक्ष में बयान तो देते हैं लेकिन ठोस कुछ नहीं करते। वे भारत की कारोबारी और रणनीतिक प्राथमिकता को ध्यान में नहीं रखना चाहते। अब वे संयुक्त राष्ट्र के बहाने हिंदुस्तान को चीन और रूस से अलग करने पर जोर दे रहे हैं।

भारत एक बार चीन के बारे में सोच सकता है, लेकिन रूस से वह कुट्टी नहीं कर सकता। उसकी अपनी क्षेत्रीय परिस्थितियां हैं, जिन पर गोरे देश ध्यान नहीं देना चाहते। कमोबेश रूस के हाल भी ऐसे ही हैं। वह इसीलिए भारत के विरोध में नहीं जा सकता। हिदुस्तान के साथ ऐतिहासिक संबंधों का रूस ने हमेशा गरिमामय ध्यान रखा है।

यही कारण है कि यूक्रेन के साथ रूस की जंग में भारत खुलकर रूस विरोधी खेमे में शामिल नहीं हुआ है। जिस तरह भारत पीओके में चीन की सेनाओं की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह रूस भी यूक्रेन के बहाने अपनी सीमा पर नाटो फौजों की तैनाती कैसे पसंद कर सकता है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र महाशक्तियों के अपने-अपने हितों का अखाड़ा बन गया है। सदस्य देश इन बड़ी ताकतों के मोहरे बनकर रह गए हैं।

तो संयुक्त राष्ट्र अब क्या कर सकता है? अमीर और रौबदार देशों के हाथ की कठपुतली बनने के सिवा उसके पास विकल्प ही क्या है? गोरे देश एशियाई मुल्कों के आपसी झगड़ों का लाभ उठाते हुए दादागीरी कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के धन पर पल रहा है। अमेरिका के इशारे पर ही संयुक्त राष्ट्र की दिशा निर्धारित होती है।

मौजूदा परिस्थितियों में इस शीर्ष संस्था की विश्वसनीयता निश्चित रूप से दांव पर लग गई है। भारत लंबे समय से इस शिखर संस्था की कार्यप्रणाली और ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करता आ रहा है। उसकी मांग को अभी तक विश्व बिरादरी का व्यापक समर्थन नहीं मिला है। मगर देर-सबेर यह सवाल अंतरराष्ट्रीय मंच पर अवश्य उभरेगा कि यदि कोई शिखर संस्था अपनी उपयोगिता खो दे तो फिर उसका विसर्जन ही उचित है।

(साभार: लोकमत हिन्दी)

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न्यूज चैनलों की हालत जैसी है, वैसी रही तो खोखला हो सकता है लोकतंत्र: डॉ. वैदिक

हमारे टीवी चैनलों की दशा कैसी है, इसका पता सर्वोच्च न्यायालय में आजकल चल रही बहस से चल रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 23 September, 2022
Last Modified:
Friday, 23 September, 2022
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे टीवी चैनलों की दशा कैसी है, इसका पता सर्वोच्च न्यायालय में आजकल चल रही बहस से चल रहा है। अदालत ने सरकार से मांग की है कि टीवी चैनलों पर घृणा फैलाने वाले बयानों को रोकने के लिए उसे सख्त कानून बनाने चाहिए। पढ़े हुए शब्दों से ज्यादा असर, सुने हुए शब्दों का होता है। टीवी चैनलों पर उंडेली जानेवाली नफरत, बेइज्जती और अश्लीलता करोड़ों लोगों को तत्काल प्रभावित करती है।

अदालत ने यह भी कहा है कि टीवी एंकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए उटपटांग बातें करते हैं, वक्ताओं का अपमान करते हैं, ऐसे लोगों को बोलने के लिए बुलाते हैं, जो उनकी पनपसंद बातों को दोहराते हैं। अदालत ने एंकरों की खिंचाई करते हुए यह भी कहा है कि वे लोग वक्ताओं को कम मौका देते हैं और अपनी दाल ही दलते रहते हैं। असलियत तो यह है कि आजकल भारत के लगभग सारी टीवी चैनल अखाड़ेबाजी में उलझे हुए हैं। एक-दो चैनल अपवाद हैं लेकिन ज्यादातर चैनल चाहते हैं कि उनके वक्ता एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाएं और दर्शक लोग उन चैनलों से चिपके रहें।

हमारे चैनलों पर आजकल न तो विशेषज्ञों को बुलाया जाता है और न ही निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को! पार्टी-प्रवक्ताओं को बुलाकर चैनलों के मालिक अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे रहते हैं। इसीलिए हमारे टीवी चैनलों को, जैसे अमेरिका में पहले कहा जाता था, ‘इडियट बॉक्स’ याने ‘मूरख बक्सा’ कहा जाने लगा है। भारत के विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा जोड़कर ऐसे लोगों को दंडित किया जाना चाहिए, जो टीवी चैनलों से घृणा, अश्लीलता, अपराध, फूहड़पन और सांप्रदायिकता फैलाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय और विधि आयोग की यह चिंता और सलाह ध्यान देने योग्य है लेकिन उस पर ठीक ढंग से अमल होना लगभग असंभव है। टीवी पर बोला गया कौन सा शब्द उचित है या अनुचित, यह तय करना अदालत के लिए आसान नहीं है और अत्यंत समयसाध्य है। कोई कानून बने तो अच्छा ही है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि टीवी चैनल खुद ही आत्म-संयम का परिचय दें। पढ़े-लिखे और गंभीर लोगों को ही एंकर बनाया जाए। उन्हीं लोगों को बहस के लिए बुलाएं, जो विषय के जानकार और निष्पक्ष हों। पार्टी-प्रवक्ताओं के दंगलों से बाज आएं। यदि उन्हें बुलाया जाए तो उनके बयानों को पहले रेकॉर्ड और संपादित किया जाए। एंकरों को सवाल पूछने का अधिकार हो लेकिन अपनी राय थोपने का नहीं।

हमारे टीवी चैनल भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ हैं। यदि इनकी हालत जैसी है, वैसी ही रही तो हमारा लोकतंत्र खोखला भी हो सकता है।

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मिस्टर मीडिया: खबरदार! सजा के कोड़े के लिए हो जाइए तैयार

सुप्रीम कोर्ट की टीवी चैनलों को फटकार लोकतंत्र की सबसे शीर्ष न्यायिक संस्था के आक्रोश की चरम अभिव्यक्ति है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 23 September, 2022
Last Modified:
Friday, 23 September, 2022
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुप्रीम कोर्ट की टीवी चैनलों को फटकार लोकतंत्र की सबसे शीर्ष न्यायिक संस्था के आक्रोश की चरम अभिव्यक्ति है। इसके बाद कहने-सुनने के लिए कुछ नहीं रह जाता। वैसे तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने गुस्से का निशाना केवल एंकरों को बनाया है, पर हम मीडिया के लोग असलियत से वाकिफ हैं।

सर्वाधिक मांग वाले समय में जो एंकर चैनल का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनमें से अधिकतर चैनल के संपादक या करीब-करीब संपादकीय मुखिया होते हैं। वे चैनल प्रबंधन की संपादकीय नीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्थात एंकर या संपादक जिस वजह से आला अदालत की नाराजगी के घेरे में आया है, उसे दरअसल प्रबंधन की हरी झंडी होती है। वह चैनल के मैनेजमेंट की गाइडलाइंस के खिलाफ नहीं जा सकता। इसके बाद भी यदि यह हिंसक सिलसिला छोटे परदे पर जारी रहता है तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि अब सर्वोच्च न्यायालय के पास आखिरी हथियार चलाने के सिवा कोई रास्ता शेष नहीं रह जाता। जिम्मेदारी के साथ कहना चाहूंगा कि न्यायालय की अवमानना की चाबुक अब चैनलों की पीठ पर पड़ने वाली है।

सवाल यह है कि हिंदुस्तान में पत्रकारिता के शिखर पुरुषों और प्रबंधकों को क्या अब लोकतंत्र की इस बेहद शक्तिशाली संस्था का भय नहीं रहा है? यदि वे बेखौफ होकर पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की धज्जियां उड़ा रहे हैं तो किस आधार पर इतने गैर जिम्मेदार आचरण कर रहे हैं। क्या वे सत्ता प्रतिष्ठान से इतने उपकृत हैं कि उन्हें संवैधानिक ढांचे का सम्मान भी फिजूल की बात लगती है। या फिर उन पर पक्ष का इतना दबाव है कि वे सिर्फ नफरत का बाजार गरम कर रहे हैं।

हकीकत जो भी हो, यह तय है कि भारतीय समाज में पत्रकारिता की साख अब धूमिल हो चुकी है। पत्रकारों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपमानित करने या उनकी पिटाई करने के दृष्टांत अब पुराने पड़ चुके हैं। स्थानीय स्तर पर इन एंकरों ने अपनी इज्जत खो दी है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अब उनके सामने खोई प्रतिष्ठा को वापस पाने का कोई मार्ग नहीं बचा है।

यह भी विडंबना है कि मुल्क में अभिव्यक्ति की दुहाई देने वाले संगठन और संस्थाएं इन दिनों चुप्पी साधे बैठे हैं। कहां हैं वे पत्रकार संघ, प्रेस एसोसिएशन, प्रेस कौंसिल, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब और ब्रॉडकास्टर्स संगठन? क्यों सबको सांप सूंघ गया है। मिस्टर मीडिया के इस स्तंभ में मैंने अनेक बार शनै शनै गुस्से में आती न्यायपालिका से चेताया है। लेकिन हमने भी जैसे नहीं सुधरने की कसम खा ली है।

आज ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मतिथि है, जिन्होंने लिखा था-जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा, उनके भी अपराध। यह तटस्थता पत्रकारिता के लिए घातक इसलिए भी है कि सरकार जब पत्रकारिता के प्रति हमलावर होती है तो आप सड़कों पर उतर सकते हैं, लेकिन न्यायपालिका के खिलाफ आप चूं भी नहीं कर सकते। एक बार उसका कोड़ा चला तो मार सह नहीं सकेंगे मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इन ‘अवतारों’ का दर्शक भी अब ठगा जा रहा है, इसे समझना होगा मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: सच्चे पत्रकारों का क्या वाकई इतना अकाल है?

राजेश बादल ने उठाया सवाल, यह हमारी टीवी पत्रकारिता का कौन सा चेहरा है मिस्टर मीडिया!

यदि ऐसा हुआ तो चैनलों के लिए प्रत्येक देश में जाकर बचाव करना कठिन हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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हिजाब पहनने पर डॉ. वैदिक का सवाल, औरतें ही अपना मुंह क्यों छिपाएं, मर्द क्यों नहीं

मुस्लिम औरतें हिजाब पहने या नहीं, इस मुद्दे को लेकर ईरान में जबर्दस्त कोहराम मचा हुआ है। जगह-जगह हिजाब के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं। कई लोग हताहत हो चुके हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 September, 2022
Last Modified:
Thursday, 22 September, 2022
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मुस्लिम औरतें हिजाब पहने या नहीं, इस मुद्दे को लेकर ईरान में जबर्दस्त कोहराम मचा हुआ है। जगह-जगह हिजाब के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं। कई लोग हताहत हो चुके हैं। तेहरान विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने हड़ताल कर दी है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खोमनई के खिलाफ खुले-आम नारे लग रहे हैं। विभिन्न शहरों और गांवों में हजारों पुलिसवाले तैनात कर दिए गए हैं। ऐसा लग रहा है कि ईरान में शहंशाह के खिलाफ जो माहौल सन 1975-78 में देखने में आया था, उसकी पुनरावृत्ति हो रही है।

कई बड़े शिया नेता भी हिजाब का विरोध करने लगे हैं। यह कोहराम इसलिए शुरू हुआ है कि महसा आमीनी (22 साल) नामक युवती को तेहरान में गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि उसने हिजाब नहीं पहना हुआ था। गिरफ्तारी के तीन दिन बाद 16 सितंबर को जेल में ही उसकी मौत हो गई। उसके सिर तथा अन्य अंगों पर भयंकर चोट के निशान थे। इस दुर्घटना ने ईरान की महिलाओं में रोष फैला दिया है। हजारों छात्राओं ने अपना हिजाब उतारकर फेंक दिया।

आयतुल्लाह खुमैनी के शासन (1979) के पहले और बाद में मुझे ईरान में रहने और पढ़ाने के कई मौके मिले। शहंशाह-ईरान के राज में औरतों की वेश-भूषा में इतनी छूट थी कि तेहरान कभी-कभी लंदन और न्यूयॉर्क की तरह दिखाई पड़ता था। मेरे इस्लामी मित्रों में कई नेता, प्रोफेसर, पत्रकार और आयतुल्लाह भी थे। वे कहा करते थे कि हम शिया मुसलमान हैं। हम आर्य हैं। हम अरबों की नकल क्यों करें? अब तो ईरान में कट्टर इस्लामी राज है लेकिन लोग खुले-आम कह रहे हैं कि हिजाब, बुर्का, नक़ाब या अबाया को कुरान-शरीफ में कहीं भी जरूरी नहीं बताया गया है। इसके अलावा डेढ़ हजार साल पहले अरब देशों में जो वेशभूषा, भोजन और जीवन-पद्धति थी, उसकी आज भी हू-ब-हू नकल करना कहां तक ठीक है?

यूरोप के तो कई देशों में हिजाब और बुर्के पर कड़ी पाबंदी है। जो इस पाबंदी को नहीं माने, उसको दंडित भी किया जाता है। बुर्के और हिजाब में चेहरा छिपाकर बहुत-से आतंकवादी, तस्कर और अपराधी लोग अपना काम-धंधा जारी रखते हैं। वास्तव में बुर्का और हिजाब तो स्त्री-जाति के अपमान का प्रतीक है। असली सवाल यह है कि सिर्फ औरतें ही अपना मुंह क्यों छिपाएं? यह नियम मर्दों पर भी लागू क्यों नहीं किया जाता? यदि यह इस्लामी नियम है तो मैं पूछता हूं कि क्या बेनजीर भुट्टो, मरियम नवाज और इंडोनेशिया की सुकर्ण-पुत्री मेघावती मुसलमान नहीं मानी जाएंगी?

यदि यही नियम सख्ती से लागू किया जाए तो सारे सिनेमा घर बंद करने होंगे। इस्लामी देश तो कला के कब्रिस्तान बन जाएंगे। इसीलिए लगभग दर्जन भर इस्लामी देशों में हिजाब और बुर्का वगैरह को हतोत्साहित किया जाता है।

भारत के स्कूल की छात्राओं के लिए भी हिजाब की मांग करना सर्वथा अनुचित है। ईरान की इस्लामी सरकार अपने आप को देश और काल के अनुरूप बनाए, यह बेहद जरीरी है। वरना वे लोगों को इस्लाम के प्रति उदासीन कर देंगे।

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हिंदी पर गर्व कीजिए, यह भारत की अविरल, कलकल भागीरथी है: राणा यशवंत

राष्ट्रीय हिंदी दिवस' प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि हिंदी संघ सरकार की आधिकारिक भाषा होगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
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राष्ट्रीय हिंदी दिवस' प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि हिंदी संघ सरकार की आधिकारिक भाषा होगी। भारत मे अधिकतर क्षेत्रों में ज्यादातर हिन्दी भाषा बोली जाती थी इसलिए हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया और इसलिए 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

विश्व में करीब 420 मिलियन लोग हिंदी को मातृ भाषा के रूप में और करीब 120 मिलियन लोग दूसरी भाषा के रूप में बोलते हैं। इसी क्रम में 14 सितंबर से 21 सितंबर तक हिंदी सप्ताह या राजभाषा सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। 

हिंदी के महान साहित्यकार व्यौहार राजेंद्र सिंह ने हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काफी संघर्ष किया था और वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे थे। 

हिंदी दिवस के इस मौके पर 'इंडिया न्यूज़ नेटवर्क' के मैनेजिंग एडिटर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और कवि राणा यशवंत ने एक ट्वीट कर अपने मन की बात कही है। 

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, 'हिंदी की बिंदी, भाषा का हमारा संस्कार है। हम उनको अपने जीवन में कितना बरतते हैं और उसके स्वास्थ्य का कितना ध्यान रखते हैं। हिंदी पर गर्व कीजिए। यह भारत की अविरल, कलकल भागीरथी है।' आपको बता दे कि राणा यशवंत एक कवि भी है और उनका काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है।

राणा यशवंत के द्वारा किए गए इस ट्वीट को आप यहां देख सकते है-

 

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केंद्रीय मंत्री की इस गलती पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने साधा निशाना, कही ये बात

भारत सरकार में पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस मंत्री और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्वीट द्वारा भारतवासियों को बधाई दी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
HardeepSingh53585

राष्ट्रीय हिंदी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि हिंदी संघ सरकार की आधिकारिक भाषा होगी। भारत मे अधिकतर क्षेत्रों में ज्यादातर हिंदी भाषा बोली जाती थी, इसलिए हिंदी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया और इसलिए 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय हिंदी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत सरकार में पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस मंत्री और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्वीट द्वारा भारतवासियों को बधाई दी।

बुधवार को एक हिंदी ट्वीट के माध्यम से हरदीप सिंह पुरी ने लिखा,'हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। अनेक प्रांतों, राज्यों, परम्पराओं एवं भाषाओं के समागम भारत के बारे में कहा जाता है कि यहां “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी” परंतु राष्ट्रभाषा हिंदी सदियों से सभी देशवासियों को एकता के अटूट सूत्र में पिरोने का काम कर रही है।’

इस पर रीट्वीट करते हुए हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए लिखा कि 'आदरणीय हरदीप जी, हिंदी दिवस की शुभकामनाओं के लिए साधुवाद लेकिन एक केंद्रीय मंत्री के हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने-लिखने से अनावश्यक भ्रम और विवाद होता है। आप जानते हैं कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा है। विनम्र अनुरोध, कृपया दुरुस्त कर लें। '

राहुल देव द्वारा किए गए इस ट्वीट को आप यहां देख सकते हैं-

 

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हिंदी दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने कहा- करें ये संकल्प

विश्व में करीब 420 मिलियन लोग हिंदी को मातृ भाषा के रूप में और करीब 120 मिलियन लोग दूसरी भाषा के रूप में बोलते हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
HindiDiwas21987

विश्व में करीब 420 मिलियन लोग हिंदी को मातृ भाषा के रूप में और करीब 120 मिलियन लोग दूसरी भाषा के रूप में बोलते हैं। इसी क्रम में 14 सितंबर से 21 सितंबर तक हिंदी सप्ताह या राजभाषा सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। 

हिंदी के महान साहित्यकार व्यौहार राजेंद्र सिंह ने हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काफी संघर्ष किया था और वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे थे। 

इस मौके पर 'एनडीटीवी इंडिया' के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने बुधवार को ट्वीट कर सभी देशवासियों को बधाई दी और लिखा 'सभी हिंदी प्रेमियों को हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई। आपके सहयोग, समर्पण एवं लगाव से ही हिंदी का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है। आज के पावन अवसर पर हम अच्छी हिंदी पढ़ने, लिखने और बोलने का अधिकतम प्रयास करने का संकल्प करें। नई पीढ़ी को भी हिंदी से जोड़े रखे। '

अखिलेश शर्मा के द्वारा किए गए इस ट्वीट को आप यहां देख सकते है-

 

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हिंदी दिवस को जनता यदि इस तरह मनाने लगे तो देश को मिल सकेगी ‘सांस्कृतिक आजादी’

हर 14 सितंबर को भारत सरकार हिंदी दिवस मनाती है। नेता लोग हिंदी को लेकर अच्छे-खासे भाषण भी झाड़ देते हैं। लेकिन हिंदी का ढर्रा जहां था, वहीं आकर टिक जाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
Dr Ved Pratap Vaidik

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हर 14 सितंबर को भारत सरकार हिंदी दिवस मनाती है। नेता लोग हिंदी को लेकर अच्छे-खासे भाषण भी झाड़ देते हैं। लेकिन हिंदी का ढर्रा जहां था, वहीं आकर टिक जाता है। भारत की अदालतों, संसद और विधानसभाओं, सरकारी काम-काज में, पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों में सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला बढ़ता चला जा रहा है। अब तो आजादी के 75 साल में अंग्रेजी की गुलामी हमारे घर-द्वार बाजार में भी छाती चली जा रही है।

हम लोग इस गुलामी के लिए सरकारों को दोषी ठहराकर संतुष्ट हो जाते हैं लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस मामले में हमारी भूमिका क्या रही है? जनता की भूमिका क्या रही है? यदि भारत की जनता जागृत रही होती तो यह भाषाई गुलामी कभी की दूर हो जाती। फिलहाल, हम सरकार को छोड़ें और यह सोचें कि हिंदी के लिए भारत की जनता क्या-क्या कर सकती है? इस संबंध में मेरे कुछ सुझाव निम्नानुसार हैं-

1. सारे भारतवासी संकल्प करें कि वे आज से ही अपने हस्ताक्षर हिंदी या अपनी मातृभाषा में ही करेंगे। सारे कानूनी दस्तावेजों और बैंक के खातों में अब आगे से स्वभाषा में ही हस्ताक्षर होंगे।

2. अपने-अपने शहर और गांव में दुकानों और घरों पर लगे सभी नामपट स्वभाषा में होंगे। यदि किसी अन्य भाषा में लिखना हो तो लिखते रहें लेकिन स्वभाषा ऊपर और बड़ी होनी चाहिए। अंग्रेजी नामपट लोग स्वतः न हटाएं तो उन्हें पोतने का अभियान चलाएं।

3. लोग शादी तथा अन्य कार्यक्रमों के अपने निमंत्रण स्वभाषा में छपवाएं।

4. दुकानदार और कारखानेदार अपनी निर्मित चीजों पर विक्रय चिह्न और अन्य विवरण ग्राहक-भाषा में अंकित करें।

5. सारे नेताओं से अनुरोध किया जाए कि वे संसद और विधानसभा में अपने भाषण स्वभाषा में दें। लोक-प्रतिनिधि लोकभाषा का ही प्रयोग करें। सारे कानून हिंदी में बनें।

6. बैंकों और दुकानदारों को चाहिए कि वे अपनी पावती, रसीद और चेक वगैरह स्वभाषा में छपवाएं।

7. सरकारों से आग्रह किया जाए कि वे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों पर पाबंदी लगाएं। अकेली अंग्रेजी नहीं, कई विदेशी भाषाएं हमारे छात्रों को पढ़ने की सुविधा दी जाए। पढ़ाई के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म की जाए।

यदि हिंदी दिवस को भारत की जनता इस तरह से मनाने लगे तो भारत को तो सांस्कृतिक आजादी मिलेगी ही, हमारे पड़ोसी देश, जो हमारी तरह अंग्रेज के गुलाम रहे हैं, उन्हें भी भारत से प्रेरणा मिलेगी और वे सांस्कृतिक, बौद्धिक और मानसिक आजादी का आनंद उठा सकेंगे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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इस तरह न तो हिंदी का भला हुआ है और न होने वाला है: आशुतोष चतुर्वेदी

हम एक बार फिर हिंदी दिवस मनाने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में फिर हिंदी पखवाड़े के बैनर छाड़-पोंछकर निकाले और लटकाये जाएंगे। इसके बाद उनको सहेजकर अगले साल के लिए रख दिया जाएगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
Ashutosh Chaturvedi

आशुतोष चतुर्वेदी, प्रधान संपादक, प्रभात खबर।।

हम एक बार फिर हिंदी दिवस मनाने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में फिर हिंदी पखवाड़े के बैनर छाड़-पोंछकर निकाले और लटकाये जाएंगे। इसके बाद उनको सहेजकर अगले साल के लिए रख दिया जाएगा। जाहिर है, इससे न तो हिंदी का भला हुआ है और न होने वाला है। इस पखवाड़े पूरे देश में हिंदी पर कार्यक्रम होंगे, लेकिन कैसे हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना है, उस पर कोई सार्थक विमर्श नहीं होगा।

मैं कहता रहा हूं कि कम-से-कम हम हिंदी पट्टी के लोगों को तो हिंदी भाषा को लेकर जागृत हो जाना ही चाहिए। सरकारी प्रयासों से तो मुझे हिंदी का भला होता नजर नहीं आता है। मेरा मानना है कि हमारे कथित हिंदी प्रेमियों और सरकारी हिंदी ने हिंदी को भारी नुकसान पहुंचाया है। आम बोलचाल की हिंदी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी का दुराग्रह आप करेंगे, तो आप हिंदी को ही नुकसान पहुंचाएंगे।

अंग्रेजी भाषा में ऑक्सफर्ड डिक्शनरी हर साल यह घोषित करती है कि वह अंग्रेजी में विभिन्न भाषाओं से कौन-कौन से शब्द शामिल कर रही है। हिंदी के लूट से लेकर गुरु शब्द तक आज अंग्रेजी भाषा का हिस्सा हैं। इससे भाषा समृद्ध होती है, कमजोर नहीं, लेकिन एक तो हिंदी में ऐसा कोई प्रयास नजर नहीं आता है और अगर हो तो कथित हिंदी प्रेमी सोटा लेकर उसके पीछे पड़ जाएंगे।

इससे इतर, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि अगर हिंदी का ऐसा शब्द उपलब्ध है, जिससे बात स्पष्ट हो जाती है, तो बेवजह अंग्रेजी का शब्द इस्तेमाल करना उचित नहीं है। हिंदी में अद्भुत माधुर्य है। मुहावरे और लोकोक्तियां उसे और समृद्ध करते हैं। फिर भी हम अंग्रेजी का दुराग्रह पाले हुए हैं। स्थिति यह है कि हम घर-दफ्तर में हिंदी बोलते हैं, लिखते-पढ़ते हैं, मगर अपने बच्चों से हिंदी के साहित्यकारों का नाम पूछ कर देख लीजिए।

मेरा दावा है कि 90 फीसदी बच्चे नहीं बता पाएंगे और जो बाकी 10 फीसदी होंगे, उनमें से अधिकांश प्रेमचंद से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। कुछेक ही हैं, जो इस परीक्षा में खरे उतरेंगे। युवाओं से कहें कि वे अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल किए बिना दो पैरा शुद्ध हिंदी में लिखकर दिखा दें।

अधिकांश इस परीक्षा में भी असफल हो जाएंगे। इसमें इनका दोष नहीं है। हमने इन्हें अपनी भाषा पर गर्व करना नहीं सिखाया है, इनका सही मार्गदर्शन नहीं किया है। मैं इसमें कुछ हद तक गुरुजनों का भी दोष मानता हूं। अभी पितृपर्व चल रहा है।

हम पितरों को यादकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महावीर प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल, काशीनाथ सिंह जैसे हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ पितरों ने हिंदी की विकास-यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पितृपर्व पर हम उन्हें याद कर सकते हैं और युवाओं को यह बता सकते हैं कि जिस हिंदी भाषा में आप लिख-पढ़ रहे हैं, उसे इन पितरों ने आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

तमिलनाडु को तो छोड़ दीजिए, वे तो हिंदी को कोसने का कोई अवसर नहीं गंवाते हैं, मगर हम हिंदीवाले भी कब अपनी भाषा पर गर्व करते हैं? हिंदी पट्टी में भी हम कहां हिंदी पर ध्यान दे रहे हैं। ज्यादा साल पुरानी बात नहीं है, जब उत्तर प्रदेश बोर्ड की हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए थे। यूपी के आंकड़े तो हमें उपलब्ध हैं, इसलिए हम उस पर विमर्श कर पा रहे हैं।

मेरा मानना है कि यदि बिहार और झारखंड के आंकड़ों का भी सही तरीके से विश्लेषण कर दिया जाए तो कोई बेहतर स्थिति सामने नहीं आएगी। हिंदीभाषी राज्यों में जिनमें बोलचाल व लिखने-पढ़ने की भाषा केवल हिंदी हो, यह खबर चिंताजनक है। इसकी विपरीत बांग्ला या दक्षिण की किसी भी भाषा को बोलने वालों को लें, वे जब भी मिलेंगे अपनी मातृभाषा में ही बात करेंगे। उनमें अपनी भाषाओं के प्रति मोह है। यही वजह है कि ये भाषाएं प्रगति कर रही हैं। उनमें स्तरीय साहित्य रचा जा रहा है।

अगर आप बाजार अथवा मनोरंजन उद्योग को देखें, तो उन्हें हिंदी की ताकत का एहसास है। यही वजह है कि अमेजॉन हो या फिर फ्लिपकार्ट, दोनों की साइट हिंदी में उपलब्ध है। हॉलीवुड की लगभग सभी बड़ी फिल्में हिंदी में डब होती हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं के साहित्य अथवा फिल्मों को देखें, तो गिनी-चुनी कृतियां ही हिंदी में उपलब्ध हैं।

यह सच्चाई है कि प्रभुत्व वर्ग की भाषा आज भी अंग्रेजी है और जो हिंदी भाषी हैं भी, वे अंग्रेजीदां दिखने की पुरजोर कोशिश करते नजर आते हैं। गुलामी के दौर की यह ग्रंथि आज भी देश में बरकरार है। हमें अंग्रेजी बोलने, पढ़ने-लिखने और अंग्रेजियत दिखाने में बड़प्पन नजर आता है, जबकि हिंदी भारत के लगभग 40 फीसदी लोगों की मातृभाषा है।

अंग्रेजी, मंदारिन और स्पेनिश के बाद हिंदी दुनियाभर में बोली जाने वाली चौथी सबसे बड़ी भाषा है। इसे राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। राजभाषा वह भाषा होती है, जिसमें सरकारी कामकाज किया जाता है, लेकिन आज भी नौकरशाही की भाषा अंग्रेजी है। कोरोना काल में आपने देखा होगा कि हिंदी भाषी राज्यों में भी लॉकडाउन के सारे दिशा-निर्देश अंग्रेजी में निकलते हैं।

अखबार हिंदी में न छापें, तो जनता की समझ में ही न आए कि निर्देश क्या है। कुछ साल पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक आदेश तो खासा चर्चा में रहा था, जिसमें ऐसी अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जो किसी को समझ में नहीं आई थी।

उसको समझाने के लिए मंत्रालय को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। बॉलीवुड को ही लें, जिसमें अधिकांश हीरो-हीरोइन रोजी-रोटी हिंदी की खाते हैं, लेकिन बातचीत में मजाल है कि कोई हिंदी में बात कर ले। एक हिंदी भाषी सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड में सफल हुआ था, उसे भी भाई लोगों ने घेराबंदी कर हमसे छीन लिया।

मैं अपने अनुभव की बात साझा करता हूं। मैंने दिल्ली में हिंदी इंडिया टुडे के संपादकीय विभाग में नौकरी ज्वाइन की थी। सीमित वेतन था और मैं दक्षिण दिल्ली के साकेत इलाके में एक कमरा देख रहा था, क्योंकि कई भाई-बंधु इस इलाके में रहते थे। हर शनिवार और रविवार को क्लासीफाइड विज्ञापन की मदद से कमरा देखने निकलता था, जिसे दिल्ली की भाषा में बरसाती भी कहते हैं।

मैंने पाया कि मुझे सबसे बड़ी समस्या भाषा को लेकर आ रही थी। दक्षिण दिल्ली का यह इलाका अभिजात्य वर्ग का है और हर मकान मालिक केवल अंग्रेजी में बात करता था। हम ठहरे ठेठ हिंदी भाषी और छोटे जिले से आया व्यक्ति, जिसका अंग्रेजी में हाथ तंग था। मैंने पाया कि केवल हिंदी भाषी होने के कारण मुझे कमरा किराये पर नहीं मिल पा रहा था।

बाद में यूपी के एक मित्तल साहब की कृपा हुई, जिन्होंने हमें पनाह दी। यह सही है कि भारत विविधता भरा देश है और इसमें अनेक भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं और हरेक का अपना महत्व है, लेकिन पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली एक भाषा का होना बेहद जरूरी है। यह बात दीगर है कि राजनीतिक कारणों से तमाम नेताओं को यह पसंद नहीं है।

(‘प्रभात खबर’ से साभार)

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हिंदी को लेकर विलाप निरर्थक, अशुद्धि और मिलावट पर चिंता कीजिए: राजेश बादल

सरकारी मदद पर होने वाले कागजी सम्मेलनों में छाती पीटने से कुछ नहीं होगा। अपना घर ठीक कीजिए-हिंदी आपको दुआएं देगी।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 14 September, 2022
Last Modified:
Wednesday, 14 September, 2022
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं। अगर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है कि हिंदी  आखिरी सांसें गिन रही है। अगर अब ध्यान न दिया गया तो करोड़ों दिलों में धड़कने वाली ये भाषा जैसे विलुप्त हो जाएगी। करीब चालीस बरस से हिंदी के अस्तित्व पर आशंका जताने वालों को मैं खुद देख रहा हूं।

पुरानी पीढ़ी के लोगों से भी हिंदी की चिंता सुनता आया हूं। ताज्जुब है कि दशकों से इस प्रलाप के बाद भी हिंदी किसी अमरबेल की तरह फैलती नजर आ रही है। आज जिस इलाके में हिंदी बोली, समझी और पढ़ी जा रही है, क्या सौ साल पहले भी यही स्थिति थी? उत्तर है-बिलकुल नहीं। तब के हिंदुस्तान में हिंदी के पंडित थे ही कितने? राज काज की भाषा उर्दू थी और उस पर फारसी का असर था। हिंदी  का परिष्कार और प्रयोग तो पिछली सदी में ही पनपा और विकसित हुआ है।

गुलाम भारत में भी हिंदी कभी जन-जन की भाषा नहीं रही। अलबत्ता यह अवश्य महसूस किया जाने लगा था कि अगर किसी भाषा में हिंदुस्तान की संपर्क भाषा बनने की संभावना है तो वो हिंदी ही है। भोजपुरी, अवधी, बृज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थान की अनेक बोलियों की छोटी-छोटी नदियों ने आपस में मिलकर हिंदी की गंगा बहाई। संस्कृत का मूल आधार तो था ही। इसके बाद उर्दू और अंग्रेजी ने भी हिंदी के अनुष्ठान में अपनी-अपनी आहुतियां समर्पित कीं।

अगर आप डेढ़-दो सौ साल की हिंदी यात्रा देखें तो पाते हैं कि शुरुआती दौर की हिंदी आभिजात्य वर्ग के लिए थी। कठिन और संस्कृतनिष्ठ। आज के बच्चे अगर पढ़ें तो शायद उसे हिंदी ही न मानें । जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, हिंदी  बोलचाल की या यूं कहें कि आम अवाम की भाषा बनती गई। पूरब से रविन्द्रनाथ टैगोर हों या पश्चिम से महात्मा गांधी, उत्तर से भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हजारीप्रसाद द्विवेदी हों या फिर दक्षिण से-चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले क्रांतिकारी भी हिंदी को संपर्क की भाषा बना चुके थे। यकीन न हो तो सरदार भगतसिंह के विचार पढ़ लीजिए। सभी ने हिंदी को देश की प्रतिनिधि भाषा स्वीकार कर लिया था।

जरा याद कीजिए उस दौर के हिंदुस्तान में अभिव्यक्ति के माध्यम कितने थे? सिर्फ एक माध्यम था और वो था मुद्रित माध्यम। किताबों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये उस काल में हिंदी लोगों तक पहुंचती थी। साक्षरता का प्रतिशत कम था। इसलिए लिखा गया साहित्य आम आदमी तक आसानी से पहुंचाना मुश्किल काम था। मगर आजादी के आंदोलन में हिंदी अभिव्यक्ति का एक बड़ा जरिया बन चुकी थी। कहा जा सकता है कि पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट करने में हिंदी की बड़ी भूमिका थी। जो भाषा हजारों में लिखी जाती थी और लाखों में बोली जाती थी, वो करोड़ों की भाषा बन गई थी।

आजादी के बाद प्रिंट माध्यम के साथ आकाशवाणी ने भी कंधे से कंधा मिलाकर काम शुरू कर दिया। रेडियो ने तो हिंदी को प्रसारित करने में क्रांतिकारी काम किया। रेडियो सुनने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था। लिहाजा, आकाशवाणी सुन-सुनकर लोगों ने हिंदी को जन-जन की भाषा और बोली बना दिया। तीसरा माध्यम आया भारतीय सिनेमा। हिंदी चलचित्रों ने तो वो काम किया, जो हिंदी के लिए करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करके भी सरकारें नहीं कर सकतीं थीं। दुनिया का अव्वल कारोबार बन चुके भारतीय सिनेमा ने दक्षिण भारत के उन इलाको में भी लोगों को हिंदी सिखा दी, जो राजनीति का शिकार होकर हिंदी का उग्र विरोध करते आए थे। आज सारे विश्व में बोली और लिखी जाने वाली भाषाओं के जानकारों की संख्या देख लीजिए। हमारी हिंदी अलग से सितारों की तरह चमकती दिखाई देती है। भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं।

मैं इस लेख को आंकड़ों से भरकर उबाऊ और बोझिल नहीं बनाना चाहता। पाठक तमाम स्रोतों से इन्हें हासिल कर सकते हैं। आशय सिर्फ यह है कि हम हिंदी के विस्तार और प्रसार के नजरिये से आगे ही गए हैं। पीछे नहीं लौटे। मिसाल के तौर पर पत्र-पत्रिकाओं को देख लीजिए। आजादी मिलने के समय हिंदी की मैगजीन और अखबार कितने थे? आप सौ तक की गिनती में समेट सकते थे। आज यह संख्या हजारों में है। समाचार पत्रों का हिसाब-किताब देखने के लिए एक भारी-भरकम विभाग तैनात है।

जिन अखबारों की प्रसार संख्या तीस-चालीस बरस पहले कुछ लाख होती थी, आज वो करोड़ों में जा पहुंची है। जाहिर है इन्हें पढ़ने वाले पेड़-पौधे अथवा मवेशी नहीं हैं? फिर कौन हैं जो हिंदी के मुद्रित प्रकाशनों की तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। सिर्फ प्रकाशनों की नफरी ही नहीं बढ़ रही, उनके कारोबार के ग्राफ में भी जबरदस्त उछाल आया है। दुनिया का कौन सा देश छूटा है, जहां हिंदी की किताबें नहीं मिलतीं। भारत के आधा दर्जन से ज्यादा प्रकाशकों के विदेशों में अपनी किताबों के शोरूम हैं। हिंदुस्तान में आज भी पचास फीसदी विश्वविद्यालय हिंदी नहीं पढ़ाते और दुनिया भर में पचास से ज्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए।

यहां याद दिलाना जरूरी है कि जिस पाकिस्तान में उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से देवनागरी और हिंदी पर बंदिश है, उसी देश में पिछले साल छह भागों में अठारह सौ पन्नों की एक उपन्यास श्रृंखला हिंदी में छपी है। दरवाजा खुलता है नाम से यह उपन्यास लाहौर के संगेमील प्रकाशन ने छापा है। पाकिस्तान में इसकी भारी मांग है और लोगों को भले ही समझ न आए, ड्राइंग रूम में सजाकर रखने के लिए वे इसे खरीद रहे हैं। अच्छी बात ये है कि उर्दू से हिंदी में इसका अनुवाद जाने-माने भारतीय लेखक डॉक्टर केवल धीर ने किया है। हिंदी प्रेमियों के लिए क्या ये उदाहरण गर्व के कुछ पल उपलब्ध नहीं कराता?

हिंदी के लिए करिश्मा तो उस माध्यम ने किया, जिसे किसी जमाने में बुद्धू बक्सा कहा गया था और जिसके भारत में प्रवेश का भरपूर विरोध हुआ था। यह माध्यम है टेलीविजन। करीब-करीब तीस साल से टेलीविजन भारत में घर-परिवार का सदस्य बन गया है। बेशक आज के भारत में सभी भारतीय भाषाओं में छोटे परदे ने अपनी घुसपैठ की है, लेकिन सबसे आगे तो हिंदी ही है। खबरिया हों या मनोरंजन चैनल-हिंदी के दर्शक सबसे आगे की कतार में बैठे हैं। यही नहीं, अहिंदी  भाषी प्रदेशों में भी हिंदी के चैनल, हिंदी के गाने और धारावाहिक उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हैं, जितने उन प्रदेशों की अपनी भाषा के चैनल। एक अनुमान के मुताबिक़ छोटे परदे ने पैंतीस बरस में करीब पंद्रह करोड़ लोगों को हिंदी का जानकार बना दिया है। जब अहिंदी भाषी राज्यों के लोगों को राष्ट्रीय महत्त्व की कोई भी सूचना लेनी होती है और उन्हें अपनी भाषा के चैनल पर नहीं मिलती तो वे तुरंत हिंदी के चैनलों की शरण लेते हैं। बरसों से यह क्रम चल रहा है। इस वजह से वो हिंदी समझने और बोलने भी लगे हैं।  

टेलीविजन से आगे जाएं तो इन दिनों नई नस्ल की जीवन शैली सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है। इंटरनेट, वेबसाइट, ट्विटर, वॉट्सऐप, ब्लॉग, यूट्यूब और अन्य नए माध्यम अवतारों ने जिंदगी का रंग बदलकर रख दिया है । कारोबारी हितों ने हिंदी का बाजार देखा है, इसलिए सोशल मीडिया के सभी रूप हिंदी में उपलब्ध हैं। गांव-कस्बे और शहरों की नौजवान पीढ़ी इन सारे रूपों से एक दिन में अनेक घंटे रूबरू होती है। क्या आपको यकीन है कि हमारे लड़के-लडकियां अंग्रेजी में इतना महारथ हासिल कर चुके हैं कि उन्हें हिंदी की जरूरत ही नहीं है? कम से कम मैं तो नहीं सोचता। हिंदी में मोबाइल पर संदेश जाते हैं, मेल जाते हैं, गूगल बाबा हर भाषा से हिंदी में अनुवाद की सुविधा मुहैया कराते हैं तो जो लोग इस सुविधा का लाभ उठाते हैं वो कोई दक्षिण अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं हैं। यह सब हिंदी की श्रीवृद्धि नहीं तो और क्या है।

फिर आज के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियों की बात क्यों की जाती है? क्यों भाषाविद् और पंडित छाती कूटते नजर आते हैं। अगर देश-विदेश में हिंदी जानने वाले लोग बढ़ रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, पैसा भी कमाया जा रहा है तो फिर चिंता करने वाले कौन हैं? इसका उत्तर वास्तव में हमारे घरों में मौजूद है। चिंता का कारण हिंदी का सिकुड़ना नहीं,ल्कि उसके स्वाद में हो रही मिलावट है। हम लोग रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनकर झूमने लगते हैं लेकिन जब बेटा या बेटी आकर उसे बंद कर अंग्रेजी के गाने सुनने लगता है तो हमें लगता है ये लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते या इन्हें हिंदी क्यों अच्छी नहीं लगती। जब आप बाजार जाते हैं, पुस्तक मेलों में जाते हैं तो आप प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा और धर्मवीर भारती की किताबें देखने रुक जाते हैं और आपके बच्चे अंग्रेजी की किताबें खरीदकर उसका बिल ले रहे होते हैं। आप हैरानी से और कुछ बेगानेपन से बच्चों को घूरते हैं। आप टेलीविजन पर कोई हिंदी का सीरियल या गाना देखना चाहते हैं तो आपका बच्चा रिमोट आपके हाथ से लेकर चैनल बदल देता है। आप देखते रह जाते हैं। आप बच्चों के साथ हिंदी फिल्म देखना चाहते हैं और बच्चे आपके सामने अंग्रेजी फिल्म का प्रस्ताव रख देते हैं। आप जैसे-तैसे सिनेमा जाते भी हैं तो फिल्म की भाषा आपके ऊपर से निकल जाती है। बच्चे फिल्म के डायलॉग पर झूमते हैं,गानों पर खुद भी गाते हैं और आप बच्चों को विदेशियों की तरह देखते हैं।

जरा याद कीजिए। उन बच्चों की स्कूलिंग के दौरान आपने कभी उनके हिंदी में कम अंक आने पर चिंता की? मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री या अंग्रेजी में अनुतीर्ण होने पर निश्चित ही आपने टोका होगा, लेकिन हिंदी कमजोर होने पर शायद ही ध्यान दिया हो। जिन लोगों ने ध्यान दिया भी होगा तो उनका प्रतिशत बहुत कम है। बचपन में उस बच्चे के गलत सलत अंग्रेजी बोलने पर भी आप पड़ोसियों के सामने गर्व से मुस्कराया करते थे। आप उसमें आधुनिक भारत के भविष्य की तस्वीर देखते थे। 

दरअसल, ये उदाहरण आपको अटपटे लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी मानसिकता में ये नमूने घुलमिल गए हैं। दिन में दस बार हम राष्ट्रभाषा का तिरस्कार होते अपनों के बीच देखते हैं और चूं तक नहीं करते। इस दुर्दशा पर अब तो आह या ठंडी सांस भी नहीं निकलती। हमारे तमाम स्कूलों में शुद्ध हिंदी के जानकार शिक्षक नहीं मिलते। तमाम की व्याकरण कमजोर है। तमाम कॉलेजों में हिंदी के प्राध्यापक स्तरीय नहीं हैं। आधे से ज्यादा यूनिवर्सिटीज में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। शिक्षक ठेके पर रखे जाते हैं। उन्हें एक-एक पीरियड के हिसाब से पैसे मिलते हैं। ऐसे में ज्ञानवान लोग आपको कहां से मिलेंगे? क्या आप अपने बच्चे को हिंदी शिक्षक बनाना चाहेंगे? मैं जानता हूं। आपका उत्तर न में होगा।

अशुद्ध और मिलावटी भाषा का खतरा गंभीर है।मोबाइल और इंटरनेट पर विकृत हिंदी हमें नजर आती है। हम देखते रहते हैं। न केवल देखते रहते हैं बल्कि चंद रोज बाद उसी विकृत भाषा का हम भी इस्तेमाल करने लगते हैं। शास्त्रीय जानकारों की फ़सल हम नहीं उगा रहे हैं। हिंदी की अमरबेल तो फैलती रहेगी। उसे किसी सरकार या समाज के संरक्षण की ज़रुरत नहीं है। उसे आपकी मेहरबानी भी नहीं चाहिए। इतने माध्यमों का आविष्कार होने के बाद उसका विस्तार कोई नहीं रोक सकता। साल दर साल हिंदी के जानने-समझने वाले बढ़ते ही जाएंगे। उसके लिए किसी तरह के विलाप की आवश्यकता नहीं है। बचाना है तो उसकी शुद्धता को बचाइये। उसकी आत्मा और उसकी मिठास को बचाइए। आने वाली पीढ़ियों को बताइए कि असल हिंदी कौन सी है? सरकारी मदद पर होने वाले कागजी सम्मेलनों में छाती पीटने से कुछ नहीं होगा। अपना घर ठीक कीजिए-हिंदी आपको दुआएं देगी।                

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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