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न्यूज की रेटिंग्स को लेकर आखिर इतनी चिंतित और हड़बड़ी में क्यों है सरकार?
BARC ने कहा कि वह अभी तैयार नहीं है, लेकिन सरकार ने कहा कि BARC तैयार है। आखिर पिछले तीन महीनों में डाटा को सुरक्षित और पारदर्शी बनाए रखने के लिए ऐसा क्या किया गया है?
समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago
चिंतामणि राव।।
टीवी ऑडियंस मीजरमेंट यानी देश में टीवी दर्शकों की संख्या निर्धारित करने के मामले में भारत सरकार दखल क्यों देती है? इसका सरकार के राजनीतिक मामले से किसी तरह का लेना-देना नहीं है। मैं इसे कम से कम वर्ष 2008 या शायद उससे पहले से भी देख रहा हूं। रेटिंग में चल रही गड़बड़ी की शिकायतों के मद्देनजर न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स पिछले एक साल से अधिक समय से निलंबित (suspend) चल रही है।
नवंबर 2020 में सरकार ने टीवी रेटिंग एजेंसियों के दिशानिर्देशों की समीक्षा के लिए ‘प्रसार भारती’ (Prasar Bharati) के सीईओ शशि शेखर वेम्पती की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी ने जनवरी 2021 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इस पहले गुप्त रखा गया, लेकिन एक नवंबर 2021 तक जब इस दिशा में कुछ भी नहीं हुआ तो इसे जमा करने के दस महीने बाद देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) और ब्रॉडकास्टर्स के साथ साझा किया गया।
दिलचस्प बात यह है कि इस कमेटी का नेतृत्व सिर्फ एक बॉडकास्टर ही नहीं, बल्कि प्रसार भारती के सीईओ ने किया था। ‘टैम’ (TAM) के साथ सरकार को यह शिकायत थी कि दूरदर्शन को लेकर इसका डाटा वैसा नहीं दिखा, जैसा सोचा गया था। जब BARC ने TAM की जगह ली तो उसमें कोई बदलाव नहीं आया। और अब प्रसार भारती के सीईओ रेटिंग प्रणाली को सुधारने के लिए एक समिति का नेतृत्व कर रहे थे। क्या यह स्थित ऐसी नहीं है, जिसमें सरकारी अधिकारी का निर्णय उसकी व्यक्तिगत रूचि से प्रभावित हो (Conflict of interest)?
यह भी दिलचस्प है कि इस कमेटी के तीन सदस्यों में से (नि: सन्देह वे सभी काफी योग्य विशेषज्ञ हैं), किसी का भी ब्रॉडकास्टिंग या ऑडियंस मीजरमेंट यानी दर्शकों की माप के साथ दूर-दूर का संबंध नहीं है और इसलिए उन्हें इस बिजनेस की जमीनी हकीकत (ground reality) का बिल्कुल पता नहीं है।
अनुमानतः इस कमेटी की सिफारिशें सैद्धांतिक रूप से सही हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से पूरी तरह सही नहीं हैं। इसकी मुख्य सिफारिश है कि ‘रिटर्न पाथ डाटा‘ (RPD) टेक्नोलॉजी का उपयोग करके दर्शकों की जानकारी यानी व्युअरशिप इंफॉर्मेशन का अनिवार्य संग्रह किया जाए। ऑडियंस मीजरमेंट से जुड़ा कोई भी व्यक्ति जानता है कि आरपीडी जरूरी है, क्योंकि यह काफी कम लागत पर बड़ी मात्रा में डाटा एकत्र करने में सक्षम बनाती है। लेकिन वे संबंधित मुद्दों और उसकी सीमाओं को भी जानते हैं, जो एक अलग चर्चा का विषय है। वर्तमान में यह कहना पर्याप्त है कि सिवाय बहुत सीमित, प्लेटफ़ॉर्म-विशिष्ट अनुप्रयोगों के आरपीडी वर्तमान में दुनिया में कहीं भी उपयोग में नहीं है और व्यापक-आधारित आरपीडी अभी भी यूरोप में प्रगति पर है।
भारत के मामले में आरपीडी में एक और मोड़ है। इसके लिए आवश्यक रूप से डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेर्टस (DPOs) की भागीदारी की आवश्यकता होती है और यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिससे कोई भी सरकार निपटने (डील करने) में सक्षम नहीं है।
यह कितना गलत है कि ‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण’ (TRAI) ने अप्रैल 2020 की अपनी सिफारिशों में अनिवार्य आरपीडी की वकालत की, लेकिन विशेष रूप से कहा कि डीपीओ उन शर्तों पर बातचीत कर सकते हैं, जिन पर वे रेटिंग एजेंसी के साथ डाटा साझा करेंगे। ऐसे में रेटिंग एजेंसी के लिए डाटा खरीदना अनिवार्य होगा, लेकिन डीपीओ के लिए इसकी आपूर्ति करना अनिवार्य नहीं होगा। बहुत अच्छा!
इस कमेटी के चेयरमैन एक ऐसे संगठन का नेतृत्व करते हैं, जिसके पास एक डीटीएच प्लेटफॉर्म ‘डीडी फ्रीडिश’ (DD Freedish) है, जो देश के 25 प्रतिशत से अधिक टीवी वाले घरों में है। यह जानना भी दिलचस्प होगा कि क्या उनके पास फ्रीडिश को आरपीडी के अनुरूप बनाने की योजना की रूपरेखा है।
16 दिसंबर को वेम्पती कमेटी की रिपोर्ट को ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री के साथ साझा किए जाने के लगभग छह सप्ताह बाद (जो इसे प्रस्तुत किए जाने के दस महीने बाद थी), BARC ने सूचना प्रसारण मंत्रालय से मुलाकात की और कहा कि उन्हें आवश्यक बदलावों को लागू करने के लिए दस सप्ताह के समय की आवश्यकता है। फिर भी केवल तीन सप्ताह बाद ही 13 जनवरी को मंत्रालय ने BARC को न्यूज जॉनर की रेटिंग्स को तुरंत फिर से शुरू करने का आदेश दे दिया।
आखिर ऐसी चिंता और हड़बड़ी क्यों? BARC ने कहा कि वह अभी तैयार नहीं है, लेकिन सरकार ने कहा कि BARC तैयार है। आखिर पिछले तीन महीनों में ऐसा क्या किया गया है, जो डाटा को सुरक्षित बनाता है?
वर्षों से सरकार का हस्तक्षेप एक जॉनर (न्यूज) पर केंद्रित रहा है। इसलिए यह आदेश ऑडियंस मीजरमेंट के विज्ञान और डाटा की अखंडता के बारे में नहीं, बल्कि न्यूज रेटिंग्स के बारे में अपनी चिंता से प्रेरित है।हालांकि यह ऐतिहासिक रूप से कुल टीवी दर्शकों की संख्या का केवल सात प्रतिशत हिस्सा है, जो बड़ी घटनाओं के दिनों में 10 प्रतिशत तक बढ़ जाता है औऱ चुनावों से बड़ी कोई न्यूज नहीं है।
इसे इस तरह देखें कि न्यूज की बड़ी घटनाओं का समय न्यूज चैनल्स के लिए विज्ञापन बेचने का होता है और चुनावों से बड़ा कोई न्यूज टाइम नहीं है, यानी इस दौरान बड़ी न्यूज की भरमार रहती है। विज्ञापन दरों में कमी आई है लेकिन जैसे-जैसे आगामी चुनावों के कारण दर्शकों की संख्या बढ़ती है, न्यूज चैनल्स अपनी विज्ञापन दरें बढ़ा सकते हैं, लेकिन इस वृद्धि को सही ठहराने के लिए उन्हें डाटा की जरूरत होती है, जो एक साल से निलंबित है।
और अब जब BARC को तुरंत डाटा जारी करने का आदेश दिया गया है तो मंत्रालय ने उन्हें पिछले तीन महीनों के डाटा को भी जारी करने के लिए कहा है। मददगार के रूप में यह वह आधार प्रदान करेगा, जिस पर विकास दिखाया जा सके, ताकि उसके अनुसार विज्ञापन दरों में वृद्धि की जा सके।
सरकार ने आईटी मंत्रालय, BARC, BIS, केबल फेडरेशन और डीटीएच एसोसिएशन के सदस्यों के साथ आरपीडी सहित डाटा जुटाने के तरीकों का अध्ययन करने के लिए शशि शेखर वेम्पती की अध्यक्षता में एक नई कमेटी की भी घोषणा की है। यह सावधानी से भारत में उस एकमात्र संगठन को बाहर करता है, जो न केवल 20 वर्षों से ऑडियंस मीजरमेंट कर रहा है बल्कि वास्तव में आरपीडी पर कुछ वर्षों से काम कर रहा है। जी हां, टैम।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। चिंतामणि राव एक स्वतंत्र मीडिया सलाहकार हैं। वह मीडिया एजेंसी हेड, न्यूज ब्रॉडकास्टर, IBF डायरेक्टर, NBA (अब NBDA) के फाउंडर और डायरेक्टर, BARC चेयरमैन और TAM Transparency Panel के सदस्य समेत विभिन्न भूमिकाओं में 20 से अधिक वर्षों से ऑडियंस मीजरमेंट के काम से जुड़े हुए हैं।)
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