इन्दिरा गांधी ने सावरकार पर डाक टिकट जारी किया था, तो कांग्रेस क्यों करती है विरोध

वीर सावरकर के साथ उनके भाई भी बंद थे अंडमान की जेल में

Last Modified:
Wednesday, 29 May, 2019
Manish-Savarkar

कांग्रेस और वामपंथी सहित सभी सेकुलरिस्ट पार्टियां विनायक दामोदर सावरकर का मूल्यांकन काफी संकुचित दायरे में करती है। वो सिर्फ वीर ही नहीं थे, बल्कि वो एक महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, लेखक और कवि भी थे। कांग्रेस जब अंग्रेजों का सेफ्टी वाल्व बनकर ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा की शपथ लिया करती थी। जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गांधी और नेहरू का नामोनिशान नहीं था। जब कम्युनिस्ट पार्टी, हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कहीं पैदा नहीं हई थी। उस वक्त, सावरकर भारत के सैकड़ों क्रांतिकारियों के फ्रेंड, गाइड और फिलॉसफर थे।

सावरकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांति की आग फैला रहे थे, अभिनव भारत नामक गुप्त क्रांतिकारी दल की पहुंच और सक्रियता को बढ़ा रहे थे। युवकों को क्रांति के लिए तैयार कर रहे थे। दूसरों की तरह वो भी पढ़ाई करने इंग्लैंड तो पहुंचे लेकिन वो बैरिस्टर बनकार ऐशोआराम की जिंदगी बसर करना नहीं चाहते थे। सावरकर ब्रिटिश सरकार के विरोध में पूरे यूरोप में भारतीय युवाओं को संगठित कर क्रांति की लपटों को ब्रिटिश शासकों के दरवाजे तक पहुंचा चुके थे। उनकी प्रेरणा से मदनलाल ढ़ींगरा नामक युवक हंसते-हंसते फांसी के तख्ते पर झूल गया। इसमें कोई शक नहीं है कि सावरकर आजादी की लड़ाई के प्रथम पंक्ति के कांतिकारी थे। स्वतंत्रता संग्राम में शामिल कोई भी वामपंथी नेता ऐसा नहीं हुआ, जो इनकी बराबरी कर सके। लेकिन, इतिहास से खिलवाड़ करने वाला एक गैंग आज इस क्रांतिकारी को गद्दार साबित करने की कायरतापूर्ण कोशिश कर रहा है।

वामपंथ की दिक्कत ये है कि वो हिंदुस्तान में एक भी ऐसा चिंतक पैदा नहीं कर सका, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बन सके। आजादी के बाद वामपंथी इतिहासकारों ने जिन क्रांतिकारियों को वामपंथी घोषित करने की कोशिश की, उन सभी ने सावरकर से न सिर्फ प्रेरणा ली, बल्कि वो सीधे संपर्क में थे। दरअसल इंग्लैण्ड में रहकर सावरकर ने ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857’ नामक एक एतिहासिक किताब लिखी। यह किताब हिंदुस्तान के क्रांतिकारियों के लिए गीता से कम नहीं थी। सावरकर की किताब आने से पहले लोग सन 1857 की क्रांति को महज एक सैनिक विद्रोह ही मानते थे। कांग्रेस से जुड़े लोगों ने भी देशवासियों को यही समझा रखा था। लेकिन, इस किताब के जरिए सावरकर ने दो प्रमुख बातें बताई। पहला ये कि 1857 में जो कुछ हुआ वो दरअसल आजादी की पहली लड़ाई थी। दूसरी बात ये कि अंग्रेजों को हिंदुस्तान से भगाया जा सकता है।

उन्होंने इस किताब में 1857 में हुई गलतियों को चिन्हित किया और ये बताया कि अगर ये गलतियां नहीं होती तो अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ जाता। हमें आजादी मिल जाती। हमें गुलामी से मुक्ति मिल जाती। नोट करने वाली बात ये है कि इस किताब में उन्होंने साफ साफ कहा था कि जब तक हिंदू और मुस्लिम एकजुट नहीं होंगे, तब तक आजादी नहीं मिल सकती है। वो कभी विभाजन के पक्ष में नहीं थे। वो अखंड भारत चाहते थे। इस बात को बाबा भीमराव अंबेडकर भी लिख चुके हैं। लेकिन विडंबना ये है वामपंथी इतिहासकारों के झांसे में आकर कुछ थके हुए लेखक बड़ी बेशर्मी से ये लिख देते हैं कि सावरकर ने टू-नेशन थ्योरी दी थी।

1904 में सावरकर ने अभिनव भारत नामक एक क्रान्तिकारी संगठन बनाया। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होंने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। 10 मई 1907 में लंदन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। 1909 में सावरकर की किताब तैयार हो गई लेकिन ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की किताब को छपने से पहले ही बैन कर दिया। किसी प्रकार गुप्त रूप से हॉलैंड से प्रकाशित हुई और इसकी कॉपी फ्रांस पहुँचायी गयीं। यूरोप से भारत आने वाले युवकों द्वारा इस किताब को लाना ही एक क्रांतिकारी कार्य बन गया था। इसका दूसरा संस्करण जर्मनी में भीकाजी कामा ने प्रकाशित किया। इनके साथ ही मिलकर सावरकर ने देश का पहला राष्ट्रीय ध्वज तैयार किया था।

भगत सिंह ने वीर सावरकर की किताब का तीसरा एडिशन छपवाया और संगठन के लिए धन इकट्ठा करने के लिए उसकी कीमत भी ज्यादा रखी। इसके लिए उन्होंने बाकायदा रत्नागिरी में जाकर वीर सावरकर से मुलाकात की और उनसे इस पुस्तक को छापने की अनुमति ली। इस पुस्तक को देशभक्त लोग ढूंढ-ढूंढकर गीता की तरह पढ़ते थे। न जाने कितने युवाओ में इस किताब ने क्रांति की अग्नि सुलगायी।

सावरकर ने 'फ्री इण्डिया सोसायटी' का निर्माण किया, जिससे वो अपने साथी भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता के लिए लड़ने को प्रेरित करते थे। यही वजह है कि सावरकर से ब्रिटिश सरकार घबरा गयी। उन्हें एक हत्याकांड में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया। हथकड़ियों और बेड़ियों में बांधकर जब समुद्री जहाज से उन्हें भारत लाया जा रहा था तब फ्रांस के बन्दरगाह मर्साई के निकट वे जहाज में से समुद्र में कूद पड़े। बाद में वो पकड़े गए और ब्रिटिश सरकार ने सावरकर को दो-दो आजीवन कारावास की सजा देकर कालापानी यानी अंडमान की सेलुलर जेल में भेज दिया। वामपंथी इतिहासकार क्या ये बता सकते हैं कि वो कौन से दूसरे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास यानी 50 साल कैद मिली हो?

सेलुलर जेल में वहां एक काल कोठरी में बंद कर दिया। नोट करने वाली बात ये है कि इस जेल में उनके भाई भी बंद थे, लेकिन दोनों को कभी एक-दूसरे के बारे में पता ही नहीं चला। जेल के दस्तावेज बताते हैं कि सावरकर को सबसे खतरनाक कैदी माना गया। उन्हें घोर यातनाएं दी गयीं। सावरकर को समझ में आ गया था कि अगर वो बाहर नहीं आए तो उनका जीवन जेल की कालकोठऱी में ही नष्ट हो जाएगा। वो जेल से बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगे।

प्रथम विश्व युद्ध की स्थिति का लाभ उठाकर जेल से बाहर आने के लिए ब्रिटिश सरकार के नाम जिस पत्र को छोटे दिमागों के मूर्ख लोग माफीनामा बता रहे हैं, उन्हें उस पत्र पर ब्रिटिश सरकार की गोपनीय टिप्पणियों को पढ़ना चाहिए और अपने से ही सवाल पूछना चाहिए कि सावरकर की ओर से ऐसे कई पत्र आने के बाद भी ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रिहा क्यों नहीं किया? उनका लक्ष्य जेल में सड़कर मरना नहीं बल्कि ऐन-केन प्रकारेण बाहर निकलकर क्रांतिकारी आन्दोलन को आगे बढ़ाना था।

जो लोग क्षमा याचना को साक्ष्य बता कर उनके योगदान पर कालिख पोतने की नीचता करते हैं वो इतिहासकार ये नहीं बताते कि स्वयं महात्मा गांधी ने 8 मई, 2021 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा-‘अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा, तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र (सावरकर के बड़े भाई भी कैद में थे) सदा के लिए हाथ से चले जाएंगे। एक सावरकर भाई (विनायक दामोदर सावरकर) को मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला है। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रांतिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं हैं। मौजूदा शासन-प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझसे भी काफी पहले देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को दिलोजान से प्यार करने के अपराध में वे कालापानी भोग रहे हैं।’

समझने वाली बात ये है कि उस वक्त देश में असहयोग आंदोलन चल रहा था। गांधी जी की एक एक बात को ब्रिटिश सरकार गंभीरता से ले रही थी। गांधी जी विद्रोह और क्रांतिकारी आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार से सावरकर की रिहाई की अपील तो नहीं की लेकिन वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर सावरकर की रिहाई की मांग कर रहे थे। इसी दबाव की वजह से ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की सजा खत्म कर दी। उन्हें रिहा तो कर दिया गया लेकिन उन्हें रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।

अब संकुचित मानसिकता वाले वामपंथी इतिहासकार और लेफ्ट लिबरल गैंग ये साबित करना चाहती है कि सावरकर डरपोक थे। गद्दार थे। उन्होंने अंग्रेजो से माफी मांग ली। सावरकर ने कैदियों को मिलने वाली प्रावधानों को उपयोग किया। ये ठीक उसी तरह था जिस तरह दूसरे स्वंतत्रता सेनानी, कोर्ट के जरिए खुद पर लगे आरोपों से मुक्त होते थे। तो क्या कोर्ट में जिन लोगों ने खुद को बेगुनाह बताया वो भी डरपोक और कायर थे। इन कांग्रेसियों और वामपंथी इतिहासकारों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि स्वतंत्रता संग्राम में जितने भी नेता जेल गए क्या उन्होंने पूरी सजा काटी थी? इसका जवाब है नहीं। तो फिर ये लोग पूरी सजा काटे बिना जेल से बाहर कैसे आ जाते थे? कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल करके। तो फिर क्या इसे कायरता या गद्दारी बताया जा सकता है। वैचारिक दरिद्रता का इससे बड़ा उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि सावरकर ने माफी मांग ली और घर आकर बैठ गए या अंग्रेजों के गुणगान में किताबें लिखने लगे। जैसा कि बहुत लोगों ने किया। हकीकत ये है कि स्थानबद्धता का काल समाप्त होने पर कांग्रेस और समाजवादी नेताओं ने इन्हें अपनी ओर खीचना चाहा। लेकिन, सावरकर ने हिन्दू महासभा को चुना। याद रहे हिंदू महासभा उस स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस का हिस्सा था। हिंदू महासभा के चार नेता कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। सावरकर फिर से स्वतंत्रता संग्राम में एक्टिव हो गए। उन्होने ही सुभाषचन्द्र बोस को भारत के बाहर जाकर ब्रिटेन के शत्रु राष्ट्रों से सैनिक सहयोग लेने की सलाह दी।

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले जब अंग्रेज हिंदुस्तानियों को सेना में भर्ती कर रहे थे तब सावरकर ने सुभाष चंद्र बोस से कहा था कि अपने समर्थकों को सेना में ज्यादा से ज्यादा संख्या में भर्ती करानी चाहिए ताकि वक्त आने पर वो काफी मददगार साबित हों। और आगे ऐसा ही हुआ। जब बोस की आजाद हिंद फौज तैयार हुई तो वो सारे ब्रिटिश आर्मी छोड़ इनके साथ आ गए थे। ये बातें पत्राचारों और दस्तावेजों में दर्शित हैं लेकिन अब कोई आंख ही बंद करके अंधा बन जाए तो इसमें किसी और का क्या कसूर है। सावरकर के योगदान को एक पोस्ट में समेटना असंभव है। वैसे ही ये पोस्ट ज्यादा लंबा हो गया है। मूल बात ये है कि हर स्वतंत्रता सेनानी के प्रति पूरे राष्ट्र को श्रद्धा और कृतज्ञता प्रगट करना चाहिए चाहे वो किसी भी विचारधारा या पार्टी से हों। लेकिन, कांग्रेसियों और वामपंथियों की वजह से भारतीय राजनीति पतन के ऐसे बिन्दु पर पहुंच गयी है कि ये स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्दांजली देने में भी राजनीति करते हैं।

वैचारिक खोखलापन की वजह से ये इक़बाल और सर सैय्ययद के कशीदे तो पढ़ते हैं लेकिन सावरकर खिलाफ जहर उगलते हैं। इनकी पतन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2003 संसद में वीर सावरकर की तस्वीर लगाई जा रही थी तब सोनिया गांधी ने कुछ वामपंथी इतिहासकारों के बहकावे में आकर विरोध किया था। हकीकत ये है कि ये वामपंथी झूठ को बार-बार दोहरा कर सच साबित करते आए हैं। लेकिन ये कांग्रेस पार्टी का सावरकर विरोध तो सरासर मूर्खता है क्योंकि इन्दिरा गांधी ने मई, 1970 में सावरकर पर डाक टिकट जारी किया था। और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान की सराहना की थी। शायद यही फर्क है इंदिरा गांधी और आज के बौने नेतृत्व में।

(ओपिनियन पोस्ट में चीफ एडिटर मनीष कुमार की फेसबुक वॉल से)

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एंटी सोशल मीडिया पर लगाम का पहला कदम है ये: आलोक मेहता

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 01 March, 2021
Last Modified:
Monday, 01 March, 2021
Social Media

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

मीडिया के नाम पर नंगे नाच और अराजकता के ढोल बजाने पर अंकुश के नए नियम सामने आने के कुछ घंटे बाद से हाहाकार मच गया। मानो पहाड़ टूट गया, जमीन फट गई, मीडिया को बेड़ियों से जकड़ दिया, लोकतंत्र खत्म और तानाशाही आ गई।  टीवी समाचार चैनलों पर कुछ गंभीर मुद्दे भी उठे, लेकिन मनमानी और स्वछंदता के कुछ समर्थक गुस्से और नकली रोने में सही बात न तो कहने देते हैं और सुनने का तो सवाल ही नहीं। जैसे मीडिया की आजादी को केवल वह समझते हैं और उसके उपयोग का एकाधिकार उनका ही है। चैनल पर समय सीमा है, इसलिए ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक, वेबसाइट, यूट्यूब इत्यादि हैं और नए नियम तीन महीने बाद लागू हो सकते हैं। इस बीच इनमें से कुछ चतुर सुजान विदेशों से वैध या अवैध फंड जुटा लेंगे, ताकि नियम कानून के खिलाफ अभियान चला सकें। जो असहमत हों और नियमों को सही ढंग से लागू करने की हिमायत और आवश्यक सुधार के सकारात्मक सुझाव दें, उन्हें सत्ता के दलाल, चाटुकार आदि गालियां देकर अपने प्लेटफार्म पर रोएं-चिल्लाएं।

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में मीडिया के लिए मार्गदर्शी नियम कानून हैं और उनका पालन बहुत हद तक होता है। नियम तोड़ने पर विश्व मीडिया सम्राट मर्डोक को लंदन में अपना एक अखबार तक बंद करना पड़ा, अमेरिका में गलत और मानहानि के मामलों पर करोड़ों डॉलर का जुर्माना देना पड़ता है। हमसे काबिल कथित मीडिया संपादक, प्रकाशक और विशेषज्ञ क्या पिछले सत्तर वर्षों में किसी मीडिया संस्थान द्वारा करोड़ों न सही लाखों का जुर्माना भरे जाने और तीन साल न सही, दस महीने जेल में रखे जाने का विवरण दे सकते हैं? प्राथमिकी, नोटिस, मुकदमे आदि में वर्षों लगने और न्याय पालिका की उदारता अथवा आपसी समझौते से मामला निपट जाता है। मानहानि के एक बेहद गंभीर मामले में भी सर्वोच्च अदालत ने प्रतीकात्मक एक रूपये का जुर्माना लगा दिया। शक्ति संपन्न आरोपी तो उस एक रुपये की सजा स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। जब कानून के जानकार ही कानून और अदालत का सम्मान करने को तैयार नहीं होंगे, तो दूरदराज बंदूक लिए बैठा नक्सली कुछ भी लिखने बोलने और धमकी-हत्या करने से क्यों चूकेगा?

देश के सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर प्रारंभिक काल में पत्रकार रहे है और भले राजनेता हैं, लेकिन लगता है कि इमरजेंसी, सेंसरशिप आदि के काल खंड से विचलित रहने के कारण उन्हें यह गलत धारणा और मंत्री के नाते गलत सूचना है कि वर्तमान प्रेस परिषद् के नियम और मार्गदर्शी आचार संहिता का पालन भारत का संपूर्ण प्रिंट मीडिया कर रहा है। तीन-चार दशक पहले कम से कम अखबार या पत्रिका प्रेस परिषद् द्वारा दोषी ठहराए गए निर्णय किसी पृष्ठ पर छाप देते थे। अब तो वह भी नहीं होता। प्रेस परिषद् के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश होते हैं, विभिन वर्गों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। दफ्तर, खर्चें, बैठकें व निर्णय होते भी हैं, लेकिन तमाम प्रभावशाली मीडिया कंपनियां कोई परवाह नहीं करतीं और जरूरत हो तो किसी जूनियर मैनेजर और वकील को औपचारिकता पूरी करने का दायित्व सौंप देती हैं।

एडिटर्स गिल्ड में वरिष्ठ संपादकों की सलाह से बनी आचार संहिता का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ, एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। इसका ध्यान अब भी कई संपादक और प्रकाशन रखते हैं, लेकिन सूचना मंत्रालय कृपया एक सही सर्वेक्षण करवा ले तो पता चल जाएगा कि देश के हजारों प्रकाशनों में से कितनों को प्रेस परिषद् के नियमों और आचार संहिता की जानकारी तक है? आजादी की लड़ाई 73 साल पहले खत्म हो गई, लेकिन आजादी के नाम पर आज भी एक साधारण कागजी खानापूर्ति करके कोई भी संपादक प्रकाशक बन जाता है और छापने के लिए स्वच्छंदता का इस्तेमाल कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने महीनों तक विभिन्न देशी-विदेशी संस्थानों, विशेषज्ञों, विधिवेत्ताओं से विचार विमर्श के बाद आधुनिक डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता और आवश्यक मार्गदर्शी नियमावली की घोषणा की है। इसलिए यह आलोचना अजीब लगती है कि महीने भर पहले लाल किले पर हुए अपराध और किसान आंदोलन के नाम पर सोशल मीडिया में हुए कुप्रचार अथवा उत्तेजक असत्य सूचनाओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार के कारण यह नियम लादे जा रहे हैं। भारत ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे देशों में भी डिजिटल युग में नए नियम कानूनों पर विचार विमर्श ही नहीं हो रहा, पहले से तय नियम सही ढंग से लागू करने के प्रयास हो रहे हैं।

मोदी सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संरक्षण के संकल्प के साथ उसमें कोई संवैधानिक संशोधन नहीं किया है, लेकिन उस अधिकार के साथ भारत की सम्प्रभुता, जवाबदेही और समाज से उठने वाली शिकायतों के निवारण, सुधार के लिए स्वायत्तशासी नियामक बनाने का प्रावधान किया गया है। जिस तरह अन्य अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है, डिजिटल मीडिया-देशी-विदेशी कंपनी में उत्तरदायी व्यक्ति का नाम तय होने पर सजा दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है।

विदेशी कंपनियों को तो फिर भी कड़ाई से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन महानगर से लेकर सुदूर जंगल में बैठकर वेबसाइट या वीडियो बनाकर सच-झूठ मिलाकर प्रसारित करने वालों की जानकारी भी किसी राज्य, केंद्र सरकार के पास नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में नए संचार साधनों और  सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से उपयोग करने वाले लोगों से समाज में जागरूकता लाने, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की सुविधाएं हुई हैं| यही नहीं, इसके सकारात्मक और आर्थिक लाभ के रास्ते भी खुले हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी क्रांति से हाल के वर्षों में पचास हजार नए स्टार्टअप शुरू हुए हैं। हर साल लगभग 11 से 14 अरब डॉलर का पूंजी निवेश हो रहा है। करीब सत्तर करोड़ लोगों तक इंटरनेट सुविधा पहुंचने लगी है और डिजिटल मीडिया कंपनियों के दावों के अनुसार करीब पचास करोड़ लोग सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आर्थिक पैमाने पर जरूर अमेरिका और चीन भारत से आगे हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक उपयोग की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। वहीँ इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारत में अब भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम होना है। अधिकार के साथ नैतिक और राष्ट्रीय सामरिक हितों को सुरक्षित रखना है। अमेरिका या चीन में सांप्रदायिक, जातीय, भाषाई, सीमावर्ती गंभीर समस्याएं नहीं हैं। जर्मनी या ब्रिटेन में उग्रवादी संगठन और सीमा से घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के खतरे भारत की तरह नहीं हैं। कुछ घटनाएं होती हैं तो उनके लड़ाकू विमान सीमा पार कर हमले तक कर देते हैं। वे मानव अधिकार की दुहाई भले ही देते हों, सामान्य केमिकल फॉर्मूले या डिजिटल टेक्नोलॉजी के आरोप में एक-दो साल तक नजरबंद और पांच दस साल तक की सजा हो जाती हैं। रक्षा सौदों में घोटालों पर भारत में मीडिया, राजनीतिक दल और कई संगठन निरंतर आवाज उठाते हैं, लेकिन छोटे प्रकाशन या वेबसाइट अथवा सोशल मीडिया की आड़ में हथियारों की खरीदी या दलाली के बारे में सरकार के पास भी आधिकारिक जानकारी का तंत्र नहीं है। नए नियम से क्या ऐसे लोगों का रिकार्ड सार्वजनिक हो सकेगा?

डिजिटल मीडिया की नई आचार संहिता में अश्लीलता और हिंसा की सारी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले सीरियल, फिल्म, गाने आदि का प्रदर्शन करने वाले प्लेटफार्म पर अंकुश की व्यवस्था की गई है। दुनिया भर में बच्चों को इस तरह के डिजिटल दुष्प्रभाव से बचाने के अभियान चल रहे हैं। यह कहना कि आप स्वयं उसे रिमोट से बंद कर न देखें, लेकिन अपने देश में तो सरकारें ही गांवों तक मुफ्त आईपेड, मोबाइल, लैपटॉप बच्चों को बांट रही हैं। वहां मां-बाप चौबीस घंटे कैसे पहरेदारी कर सकेंगे? हाल के वर्षों में बलात्कार, आत्महत्या और अन्य अपराधों की घटनाओं में वृद्धि का एक कारण स्वछंद सोशल डिजिटल मीडिया भी है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार की आलोचना और विरोध की पूरी छूट के साथ समाज को पतन के गर्त से बचाने और भविष्य को अधिक स्वस्थ्य, सुखी व सुरक्षित रखने के लिए उचित समय और सही ढंग से आचार संहिता लागू होनी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विषय अदालतों के सामने जाने पर न्यायाधीश आवश्यक सलाह दें व इसे और प्रभावी ढंग से लागू किए जाने का पथ प्रशस्त करें।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है मिस्टर मीडिया!

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 24 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 24 February, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

22 बरस की दिशा रवि को दिल्ली की एक अदालत से जमानत सुखद खबर है। यह असहमति के सुरों की रक्षा के लिए सही समय पर आया सही फैसला है। इससे एक तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण मिलता है तो दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित होता है कि हिंदुस्तान की जम्हूरियत का मजबूत खंभा न्यायपालिका अभी भी किसी किस्म के दबाव से मुक्त है।

कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इस लोकतांत्रिक अंग के बारे में कुछ समय से तनिक तकलीफदेह अहसास हो रहा था। यह धारणा घर करने लगी थी कि वाकई न्यायपालिका दबाव में तो काम नहीं कर रही? असल में कई बार इनसान कुछ दबाव तो अपने हित या स्वार्थों के चलते भी ओढ़ता दिखाई देता है। अगर वह ठान ले कि किसी प्रकार के दबाव में नहीं आएगा तो फिर वाकई वह मुक्त होकर काम करता है। हो सकता है कि फौरी तौर पर उसका कुछ नुकसान भी हो जाए, लेकिन अंततः वह विजेता की शक्ल में सामने आता है। भारतीय पत्रकारिता को यह तथ्य समझने की आवश्यकता है। असहमत होना किसी भी  जिम्मेदार और सभ्य लोकतंत्र की पहली शर्त है और इसको संरक्षण मिलना ही चाहिए।

माननीय न्यायालय ने दिशा रवि के मामले में साहसिक और संवैधानिक टिप्पणियां की हैं। भारतीय संस्कृति में वेदों को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है और ऋग्वेद की ऋचाओं का संदर्भ इस देश के चरित्र को स्थापित करता है। कोर्ट का यह कथन पूरी तरह सटीक है कि हुकूमत के जख्मी गुरूर पर मरहम लगाने के लिए किसी को राजद्रोह के आरोप में कारागार नहीं पहुंचाया जा सकता। इस व्यवस्था से हिंदुस्तान की पत्रकारिता पर इन दिनों मंडरा रहे अवसाद और निराशा के वे बादल भी छंट सकते हैं, जो आम अवाम को यह धारणा बनाने का अवसर देते हैं कि इन दिनों मुल्क का मीडिया अपनी साख खो रहा है। सत्ता पक्ष की चिरौरी करते रहना अथवा चौबीसों घंटे उसकी निंदा करना यकीनन स्वस्थ्य पत्रकारिता की निशानी नहीं है। ऐसी करतूतों से संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता को झटके लगते हैं। संसार में कोई सभ्य समाज पत्रकारिता का अपनी राह से विचलित होना पसंद नहीं करेगा।

बीते दिनों भारत के संपादकों की प्रतिष्ठित संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राष्ट्र के अशांत क्षेत्रों में पत्रकारिता पर एक ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया था। जाहिर सी बात थी कि उसमें सरकार के गीत तो नहीं ही गाए जाने वाले थे। लेकिन असहमति और निंदा को स्थान नहीं देने वालों ने इसमें इस कदर तकनीकी बाधा डाली कि अंततः कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा। इसकी व्यापक भर्त्सना की गई थी।

असल में आज ऐसे तत्वों का चारों तरफ बोलबाला दिख रहा है, जो अपनी आलोचना पसंद नहीं करते। इस प्रवृति से वे खुद को और लोकतंत्र दोनों को क्षति पहुंचाते हैं। उन्हें तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाए, मगर वे अपने ही देशवासियों से असुरक्षित महसूस करते हैं। भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए जरूरी है कि वह इनको बेनकाब करे-ताला लगाके आप हमारी जबान को/ कैदी न रख सकेंगे जेहन की उड़ान को/असहमति के सुरों की रक्षा करना ही असली राष्ट्रीय कर्तव्य है। इस हकीकत को जान लीजिए मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

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यूपी सरकार के बजट का पूरन डावर ने कुछ यूं किया विश्लेषण

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है।

पूरन डावर by
Published - Tuesday, 23 February, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 February, 2021
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह बजट कुल मिलाकर गरीबों, किसानों और इंफ्रॉस्ट्रक्चर को समर्पित है। धार्मिक एवं अध्यात्मिकता को पर्यटन का केंद्र मानकर वाराणसी, अयोध्या और गोरखपुर को संवारने के लिए बजट में पर्याप्त धनराशि का प्रावधान किया गया है। निश्चित रूप से इनका विकास वैटिकन सिटी और मक्का मदीना से कमतर नहीं होना चाहिए। सरकार बधाई की पात्र है। विकास को गति देने के लिए बजट अच्छा है। स्टार्टअप के लिए 100 करोड़ का प्रावधान है, जो काफी तो नहीं, लेकिन कोविड-19 के कारण सरकार की आय भी सीमित है।

अर्थव्यस्था की रीढ़ उद्योगों के लिए कोई विशेष बजट आवंटित नहीं है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रॉडक्ट (ODOP) योजना के लिए पूरे प्रदेश के 75 जिलों के लिए 250 करोड़ नाकाफी हैं। इस अद्भुत योजना को साकार करने में कठिनाई आ सकती है। सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर विकास की बड़ी संभावनाएं हैं। सरकार को पर्यटन के विकास के लिए विकल्प तलाशने होंगे। इंफ्रॉस्ट्रक्चर पर गरीब घर पर बजट आवंटन से विकास को गति मिलेगी।

जेवर व अयोध्या एयरपोर्ट निश्चित रूप से विकास को गति देंगे, लेकिन आगरा जैसे विश्वप्रसिद्ध पर्यटन को नकारना महंगा पड़ सकता है। आवश्यकता थी बजट में ब्रज एवं आगरा के पर्यटन पर एक बड़ी लकीर की। यमुना पर वाटर पार्क, यमुना के उस पार वल्लभ भाई पटेल की तथा शिवाजी या गुरु गोबिंद सिंह जी की प्रतिमा, थीम पार्क की भूमि पर कृष्णा थीम पार्क की। सरकार के पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन व्यवस्थाएं पीपीपी पर हो सकती हैं। अभी भी समय रहते समग्र भौगोलिक विकास पर ध्यान देना आवश्यक है। कुल मिलाकर गरीब किसान के लिए राहत भरा बजट है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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ऐसे तो हम जैसों को तलवार-बंदूक के बल पर लिखने-बोलने को कहा जा सकता है: आलोक मेहता

अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार को लेकर कांग्रेस नेता नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले के ऐलान पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने रखी अपनी बात

आलोक मेहता by
Published - Monday, 22 February, 2021
Last Modified:
Monday, 22 February, 2021
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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

सचमुच क्या मुंबई जाने से पहले दस बार सोचना होगा? क्या अपनी जान बचाने का इंतजाम करके प्रवेश करना होगा? लेकिन आजकल बाल ठाकरे या उनसे बिछुड़े सत्ताधारी भाई उद्धव ठाकरे और उनके हथियारबंद साथी तो उत्तर भारतीयों को सार्वजनिक रूप से धमकियां नहीं दे रहे हैं। फिर क्यों डरना? जी नहीं, डरना होगा। उनसे अधिक शक्तिशाली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना भाऊ फाल्गुन राव पटोले ने खुलेआम ऐलान कर दिया है कि फिल्मी दुनिया के विश्वविख्यात बादशाह कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन और हाल के दशकों में सफल अभिनेता अक्षय कुमार यदि उनके आदेशानुसार नहीं लिखे-पढ़े और बोलेंगे तो महाराष्ट्र में न उनकी फिल्म चलने दी जाएगी और न ही उनकी किसी फिल्म की शूटिंग होने दी जाएगी।

अब मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए यह धमकी क्या चिंताजनक नहीं होगी? यदि इतने बड़े लोकप्रिय अभिनेताओं की ऐसी फजीहत हो सकती है तो हम जैसों को तो दादा पटोले, उनकी कांग्रेस पार्टी और साथी शिवसेना के सैनिक तलवार या बंदूक के निशाने पर बोलने-लिखने को कह सकते हैं। खासकर जब वह पहले दल-बदल और फिर पद बदलने के बाद प्रदेश पार्टी अध्यक्ष से मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में लगे हैं।

गनीमत है कांग्रेस ने उनकी अद्भुत क्षमताओं को ध्यान में रखकर पार्टी सौंप दी है, वरना विधान सभा अध्यक्ष के पास अवमानना के विशेषाधिकार के नाते आदेश की अवहेलना पर अमिताभ तो क्या, भारत रत्न आदरणीय लता मंगेशकरजी को सदन में हाजिर करवाकर दो-चार दिन जेल भेजने का आदेश जारी कर देते। वैसे मेरे जैसे अज्ञानी लोगों को उनके इस बयान से उनकी पृष्ठ्भूमि का ज्ञान भी प्राप्त हुआ। अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में मुझे तमाम बड़ी राजनीतिक हस्तियों से मिलने, बात करने, उनकी राजनीति के बारे में कभी मीठा-कभी कड़वा लिखने-बोलने के अवसर मिले हैं। लेकिन श्रीमान पटोले जब भारतीय जनता पार्टी के सम्मानित सांसद थे, तब भी उनका नाम सुनने या उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला।

हां, दल बदलुओं की बारात में शामिल होने पर नाम सुनने को मिला। नानाभाऊ पटोले ने अमिताभ बच्चन को मनमोहन सिंह के सत्ता काल में पेट्रोल-डीजल के मूल्य बढ़ने पर ट्वीट करने की याद दिलाई है। लेकिन मिस्टर पटोले को शायद याद नहीं या देर से अपने साथी शिवसेना के सामना में (जुलाई 2012) आदरणीय बाल ठाकरे का संपादकीय ध्यान में लाया जाए, जिसमें बाला साहेब ने मनमोहन सिंह, कांग्रेस पार्टी, सरकार और सोनिया गांधी पर कितने गंभीरतम आरोप लगाए थे। अब क्या वह शिवसेना से उसी शैली में कांग्रेस पर वार करने को कहना चाहेंगे। वैसे कह भी सकते हैं। भाजपा से कांग्रेस में आए थे, अब बड़ा पद पाने को देर-सबेर शिवसेना में शामिल हो जाएं, लेकिन तब एक समस्या होगी-अमिताभ के संबंध बाला साहेब से बहुत अच्छे थे।  यों राजीव गांधी के बाल सखा होने के कारण कांग्रेस से भी उनके संबंध रहे थे और जब पटोले 23 साल के नादान युवक थे, तब अमिताभ उसी पार्टी से लोकभा का चुनाव भी जीते थे। इसलिए उनकी राजनीतिक सोच समझ के लिए पटोले पाठ या राहुल क्लास की आवश्यकता नहीं होगी।

लोकतंत्र में पटोले मंडली को भी आलोचना का अधिकार है। अमिताभ-अक्षय कुमार या किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति की गलती या अपराध पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी तरह उनके किसी वक्तव्य या टिपण्णी पर पटोले महाशय मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकते हैं, लेकिन न बोलने और उनके आदेश पर काम न करने पर पटोले कैसे जबरदस्ती कर सकते हैं। नेता गण और सामान्य पाठक बंधु भी कृपया सोचिये-संभव है कि कुछ महीने बाद यही दादा पटोले की मंडली टाटा, अंबानी, गोदरेज, मित्तल जैसे उद्यमियों को आदेशानुसार बोलने, चंदा देने की धमकी देने लगे। हां, उनके सहयोगी दल के पचासों पट्ठे मुंबई में हफ्ता वसूली के लिए बदनाम रहे हैं।

आश्चर्य और दुखद बात यह है कि पटोले की जहरीली धमकी पर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और अनुभवी वरिष्ठ नेता शरद पवार ने तत्काल सार्वजनिक रूप से फटकार नहीं लगाई। आप कह सकते हैं कि इस तरह की धमकी की परवाह न की जाए। लेकिन यह तो सोचें कि जब पार्टी अध्यक्ष ऐसा करेगा तो जिला, ग्रामीण स्तर के नेता कार्यकर्ता समाज के अन्य लोगों को इसी तरह बोलने, काम करने के लिए धमकाने लगेंगे। उनको कौन बचाएगा? पार्टी या किसी भी संगठन का नाम लेकर विभिन्न राज्यों में होने वाली किसी भी गतिविधि का कड़ाई और कानूनी ढंग से प्रतिकार होना चाहिए। अन्यथा नक्सली अदालत की तरह समाज में कोई भी गिरोह गैरकानूनी आदेश और सजा देने लगेगा। अभी सड़कों, रेल मार्गों पर जबरन कब्जा करके व्यवस्था और सामान्य जनों को निरंतर संकट में डाला जा रहा है। देर सबेर किसी दफ्तर या घरों पर कब्जा जमाने की हिमाकत होने लगेगी। सत्ता और विपक्ष की लड़ाई अराजकता की ओर ले जाना सबके लिए घातक होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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आने वाले समय में रेडियो रियल गेम चेंजर साबित होगाः  प्रो. के.जी. सुरेश

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 18 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 18 February, 2021
Radio5454

लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका सबसे अहम है और आने वाले समय में यह रियल गेमचेंजर साबित हो सकता है। रेडियो की लोकप्रियता बढ़ाने में प्रधानमंत्री जी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का भी बहुत बड़ा योगदान है। एफएम चैनलों ने भी रेडियो की प्रासंगिकता को बनाए रखने और लोगों के दिलों स्थापित करने में महती भूमिका निभाई है। यह बात बुधवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश ने पीआईबी भोपाल सभागार में विश्व रेडियो दिवस के संदर्भ में, ‘मन का रेडियो’ विषय पर आयोजित सेमिनार में कही।

आयुक्त एवं सचिव जनसंपर्क सुदाम खाड़े ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रेडियो हमें खुद को सुनने का मौका देता है। यह खुद से कनेक्ट करने का बेहतर माध्यम है। उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान भोपाल में फेक न्यूज पर लगाम लगाने में रेडियो द्वारा निभाई गई भूमिका को भी याद किया।

पीआईबी, भोपाल के अपर महानिदेशक प्रशांत पाठराबे ने कहा कि रेडियो का देश के दूराज इलाकों में रहने वाले लोगों के साथ एक मजबूत रिश्ता है। यह बेहद ही आसान तरीके और जनता की भाषा में लोगों तक बातों को पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में राजस्व के मामले में रेडियो को नुकसान तो हुआ पर कोरोना के बाद रेडियो ने काफी बेहतर तरीके से वापसी की है और इसका राजस्व 5 गुना बढ़ा है।

शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक मनोज कुमार ने कहा कि रेडियो प्रामाणिक एवं विश्वसनीय माध्यम है। बदलते समय में दूर दराज में रहने वाले समुदाय के लिये सामुदायिक रेडियो सबसे प्रभावशाली माध्यम के रूप में उभरा है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने सामुदायिक रेडियो के क्षेत्र में किए गए अपने कार्यों को याद किया और कहा कि कम्युनिटी रेडियो भविष्य का रेडियो है। उन्होंने कम्युनिटी रेडियो खोलने की पूरी प्रकिया के बारे में भी बताया और इस बारे में सरकारी गाइडलाइन की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कम्युनिटी रेडियो शिक्षा की रोशनी फैलाने में अहम योगदान देता है।

आकाशवाणी, भोपाल के कार्यक्रम प्रमुख विश्वास केलकर ने लोक प्रसारक के रूप में रेडियो की भूमिका पर प्रकाश डाला। आकाशवाणी समाचार भोपाल के पूर्व संवाददाता और आरओबी, भोपाल के सहायक निदेशक शारिक नूर ने खबरों की दुनिया में रेडियो की विश्वसनीयता के बारे में बात की।

‘माय एफएम’ के कार्यक्रम प्रमुख विकास अवस्थी ने कहा कि रेडियो आपका दोस्त बनकर आपके साथ चलता है और आपकी सकारात्मकता को बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

वहीं, ‘बिग एफएम’ की रेडियो जॉकी अनादि ने कहा कि रेडियो साधारण और बहुत ही आसान माध्यम है। रेडियो की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हमें कानों से देखना सिखाता है। हम काम करते हुए भी रेडियो से जुड़ सकते हैं।

इस अवसर पर शोध पत्रिका समागम का सामुदायिक रेडियो पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

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यह एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक मुल्क को चुभती रहेगी: राजेश बादल

डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 17 February, 2021
Last Modified:
Wednesday, 17 February, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

महाभियोग के बाद अमेरिकी लोकतंत्र की साख

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर महाभियोग से साफ बच निकले। इसलिए नहीं कि कैपिटल हिल की हिंसा में उनका कोई हाथ नहीं था बल्कि इसलिए कि सीनेट में हुए मतदान में उनके खिलाफ दो तिहाई मत नहीं पड़े। यह अलग बात है कि उनकी अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसद खुलकर पूर्व राष्ट्रपति के विरोध में और महाभियोग के समर्थन में सामने आए और उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को सार्वजनिक रूप से हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के चंद और सांसद यदि उनके विरोध में वोट डालते तो विश्व इतिहास में लोकतंत्र का एक नया अध्याय लिखा जाता। ऐसा हो सकता था, क्योंकि प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले रिपब्लिकन पार्टी के अनेक सदस्य इसके समर्थन में थे। लेकिन अगर वे ऐसा करते तो उनकी अपनी पार्टी के माथे राजनीतिक कलंक का स्थाई टीका लग जाता। आने वाले चुनाव में पार्टी की अपनी साख दांव पर लग जाती। इसलिए दल की खातिर उन्हें उस झूठ का समर्थन करना पड़ा, जिसे अमेरिका का एक-एक मतदाता जानता था।

कह सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का इस बेहद गंभीर आरोप से बरी होना अमेरिकी लोकतंत्र की एक ऐसी फांस है, जो लंबे समय तक पूरे मुल्क को चुभती रहेगी। अब इस विशाल देश को अपने दो सौ बरस पुराने संविधान के अनेक प्रावधानों पर पुनर्विचार करना होगा। अगर महाभियोग को बहुमत का समर्थन था तो स्पष्ट था कि ट्रंप लोकतंत्र के एक बड़े उपकरण के पैमाने पर खरे साबित नहीं हुए हैं। प्रसंग के तौर पर भारतीय लोकतंत्र की एक घटना का सन्दर्भ आवश्यक है, जब केवल एक मत से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी। 

दरअसल किसी भी जागरूक जम्हूरियत का तकाजा यही है कि वह जिन राजनेताओं को हुकूमत करने का अवसर दे, उन पर कड़ी निगरानी भी रखे ताकि देश की देह में तानाशाही का घुन नहीं लगे। यह एक आदर्श स्थिति मानी जा सकती है। विडंबना है कि इन दिनों समूचे विश्व पर अधिनायक वादी घुड़सवार चढ़ाई करते दिखाई दे रहे हैं। इसलिए भले ही ट्रंप की करतूत पर उनके ही दल के सांसदों ने खिलाफ होते हुए भी बचा लिया हो, पर वे जाने-अनजाने लोकतंत्र और अपने राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुंचा चुके हैं। इसका अफसोस उन्हें हमेशा रहना चाहिए। यह इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा कि लोकतंत्र पर संकट की घड़ी में वे दल के साथ खड़े हुए, देश के साथ नहीं। आने वाले दिनों में अमेरिका को इसका खामियाजा भुगतना ही होगा। डोनाल्ड ट्रंप तो इससे क्या सबक लेंगे। अलबत्ता उनकी पार्टी यदि इस अवसर पर नैतिक साहस दिखाती और महाभियोग को समर्थन देती तो विश्व इतिहास में यह प्रसंग स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा सकता था।

लेकिन इसी आधार पर अमेरिकी लोकतंत्र की परिपक्वता को खारिज नहीं किया जा सकता। असहमति के अधिकार का वहां सम्मान होता है और किसी तरह की व्हिप जारी करके व्यक्तिगत मान्यताओं को क्षति पहुंचाने का काम नहीं किया जाता। अंतरात्मा की आवाज का आदर भी इस व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। डोनाल्ड ट्रंप से असहमत उनके दल के सदस्य खिलाफ वोट करने के बाद पिछले दरवाजे से चुपचाप नहीं निकल गए। उन्होंने बाकायदा सार्वजनिक तौर पर ट्रंप के बच निकलने पर दुःख प्रकट किया। वरिष्ठ सीनेटर मिच मैककोनेल ने इस प्रक्रिया पर अपनी टिप्पणी में कहा, ‘मेरा अडिग मानना है कि ट्रंप ने अपना संवैधानिक दायित्व निभाने के बजाए संसद में हथियारों के साथ हिंसा के लिए अपने समर्थकों को उकसाया था। वे इसके अपराधी हैं। लेकिन हमारे हाथ बंधे हुए थे। हमारे पास इतनी ताकत नहीं थी कि राष्ट्रपति के पद पर बैठकर ट्रंप की करतूतों के लिए अयोग्य ठहरा सकते।’

तनिक सोचिए। क्या भारत में यह संभव है? भारतीय लोकतंत्र के हितैषियों के बीच यकीनन यह चर्चा का विषय होना चाहिए कि किसी दागदार नेता का दल के समर्थन से बेदाग बरी होना कितना जायज है। यही नहीं, व्हिप की आड़ में उसके खिलाफ मतदान करने वालों पर कार्रवाई की तलवार भी चल सकती है। किसी भी सूरत में यह उचित नहीं माना जा सकता। एक तरह से लोकतंत्र की डाल को अपने हाथों तोड़ने जैसा है और सियासी पार्टी को अधिनायक की तरह व्यवहार करने का अवसर देता है। क्या भारतीय मतदाता और नियंता अमेरिका की इस घटना से कोई सबक लेंगे?

दूसरी ओर इसे स्वीकार करने में भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि जनतांत्रिक प्रणाली में जिसके साथ बहुमत है, उसे दण्डित नहीं किया जाए। यदि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा सके तो सन्देश है कि पूर्व राष्ट्रपति के व्यवहार को राजनेताओं का एक वर्ग सही तथा उचित मानता है। उचित और अनुचित के बीच की सीमा रेखा कई बार धुंधली हो जाती है। इस स्थिति में कभी निर्दोष भी दंड का भागी बन सकता है और दोषी भी आरोप से मुक्त हो सकता है। ऐसे में न्याय का यह सिद्धांत संतुलित माना जा सकता है कि सौ दोषी भले ही छूट जाएं मगर एक निर्दोष को प्रताड़ना नहीं मिलनी चाहिए। यही लोकतान्त्रिक मर्यादा है। इस मर्यादा की आड़ लेकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे शातिर कारोबारी बच न सकें, यह व्यवस्था भी अमेरिका के सभी जम्हूरियत पसंद लोगों को बनानी होगी।

(साभार: लोकमत समाचार)

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विश्व रेडियो दिवस: कम्युनिटी रेडियो को लेकर आज भी भ्रमजाल में है समाज

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 12 February, 2021
Last Modified:
Friday, 12 February, 2021
CommunityRadio5

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में कम्युनिटी रेडियो की गूंज सुनाई दे रही है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों के आठ जिलों में कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की गई है। इन रेडियो स्टेशनों के माध्यम से ग्रामीण एवं आदिवासी समुदाय में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन के बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो में निहित उद्देश्यों अनुरूप ‘रेडियो वन्या’ समुदाय के द्वारा समुदाय के लिए, समुदाय से कार्यक्रम निर्माण कराने एवं प्रसारण करने की जवाबदारी भी समुदाय को सौंप रखा है। इसके अलावा मध्यप्रदेश शासन का संस्कृति विभाग का ‘रेडियो आजाद हिन्द’ आजादी के तराने सुना रहा है। राजधानी भोपाल में स्थित रेडियो आजाद हिन्द देश के स्वाधीनता संग्राम से जुड़े प्रसंगों को सुनाता है। हालांकि मध्यप्रदेश का पहला कम्युनिटी रेडियो चंदेरी में स्थापित हुआ था। वर्तमान में कम्युनिटी रेडियो एवं कैम्पस रेडियो की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में संतोषजनक है। इसके अलावा विदिशा, सीहोर, उज्जैन के साथ ही राज्य के प्रमुख जिलों में सामुदायिक रेडियो का संचालन किया जा रहा है।

कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से शासन की कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ उनके दैनंदिनी जीवन में काम आने वाली सूचना का लाभ भी समुदाय को मिल रहा है। इसके साथ ही इन रेडियो स्टेशनों पर समुदाय की जीवनशैली, संस्कृति, परम्परा, साहित्य एवं विभिन्न संस्कारों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। स्थानीय बोली में कार्यक्रम के प्रसारण होने के कारण समुदाय को समझने और सुनने में आसानी होती है। 

रेडियो साक्षी रहा है पराधीन भारत से स्वाधीन भारत की यात्रा का। रेडियो गवाह बना हुआ है वर्तमान और युवा भारत का। रेडियो की यात्रा समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन को आगे बढ़ाती है। भारतीय समाज की धडक़न है रेडियो। रेडियो संचार का ऐसा प्रभावी माध्यम है जिसे साथ रखने में ना तो टेक्रालॉजी आड़े आती है और ना ही शिक्षित होने की शर्त। जैसे किसी समय हर घर की मेज पर टेलीफोन हुआ करता था, वैसे ही हर भारतीय के घर में रेडियो सेट मिल जाता था। रेडियो के साथ ट्रांजिस्टर भी हुआ करता था। कोई ग्रामीण, कोई मजदूर कांधे में डाले गीत गुनगुनाता आगे बढ़ जाता था। समय बदला, टेक्रालॉजी बदली और रेडियो-ट्रांजिस्ट्रर के विकल्प के तौर पर मोबाइल आ गए। अब हर हाथ में रेडियो था। वैसे ही जैसे टेलीफोन सेट की जगह मोबाइल फोन ने ले ली। संचार के दूसरे माध्यम भी विकसित और परामार्जित हुए। टेलीविजन के आगमन के बाद कहा जाने लगा कि अखबार का समय अब खत्म होने वाला है और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद टेलीविजन को लेकर भी यही बात कही जाने लगी। लेकिन रेडियो का ना तो कोई विकल्प आया और ना उसके असामायिक हो जाने की कोई चर्चा हुई। 

संचार के विभिन्न माध्यम पर जब विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हुए तो रेडियो निरपेक्ष भाव से सबको सुन रहा था, गुन रहा था। उसकी प्रामाणिकता उसकी पहचान थी। ऐसा भी नहीं है कि रेडियो के दिन बीते नहीं लेकिन हर बार वह चेहरा बदलकर आ जाता था। आकाशवाणी पूर्णत: शासकीय  नियंत्रण का प्रसारण सेवा है तो मनोरंजन का खजाना लेकर एफएम रेडियो आ धमका। एफएम शहरी लोगों के बीच में अपनी पैठ बना चुका है तो ग्रामीण समुदाय के लिए कम्युनिटी रेडियो का आगमन हुआ। भारत जैसे विशाल जनसंख्या और भौगोलिक ताना-बाना वाले इस महादेश के लिए कम्युनिटी रेडियो एक आवश्यकता है। सूचना का विस्फोट हो रहा है लेकिन गांव और आदिवासी अंचलों में रहने वाले अधिसंख्य लोगों सूचनाविहिन थे। ऐसे में कम्युनिटी रेडियो ने उन्हें जोड़ा। ना केवल जोड़ा बल्कि उनकी जीवनशैली, साहित्य-संस्कृति, परम्परा का दस्तावेजीकरण करने में सहायता की। कम्युनिटी रेडियो के भारत में आगमन के समय शैक्षिक परिसरों तक सीमित था लेकिन भारत सरकार ने इसे व्यापक बनाया और गांव तथा ग्रामीणों की आवाज बनने में सहायता की। हालांकि अभी कम्युनिटी रेडियो विस्तार के दौर में है लेकिन जल्द ही वह हर गांव, हर ग्रामीण की आवाज बन चुका होगा।

कम्युनिटी रेडियो को लेकर समाज आज भी भ्रमजाल में है। इसका एक बड़ा कारण है कि इससे संबंधित साहित्य एवं जानकारी का अभाव होना। हालांकि सामुदायिक रेडियो के विस्तार के लिए भारत सरकार अनेक स्तरों पर प्रयास कर रही है कि लोगों को अधिकाधिक जानकारी मिल सके ताकि वे कम्युनिटी रेडियो की स्थापना एवं संचालन सहजता से कर सकें। कम्युनिटी रेडियो एक ऐसा जीवंत माध्यम है। 

कम्युनिटी रेडियो की स्थापना की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार की पहल अनोखा है। संभवत: देश का एकमात्र राज्य है जहां सुदूर आदिवासी अंचलों में आठ रेडियो संचालित हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की संकल्पना को साकार करते हुए 9 सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई। इनमें से 8 कम्युनिटी रेडियो रेडियो आदिमजाति कल्याण विभाग मध्यप्रदेश शासन की नवाचारी संस्था ‘वन्या’ द्वारा संचालित किया जाता है। एक अन्य  कम्युनिटी रेडियो रेडियो स्वाधीनता संग्राम पर केन्द्रित प्रथम कम्युनिटी रेडियो रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ भी मध्यप्रदेश शासन द्वारा संचालित किया जाता है। राज्य के सुदूर आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने की दृष्टि और सोच के साथ स्थानीय बोली में सामुदायिक रेडियो का प्रसारण आरंभ किया गया। वर्तमान में राज्य के आदिवासी बहुल जिला झाबुआ, चंद्रशेखर आजाद नगर, जिला अलीराजपुर, खालवा जिला खंडवा, चिचोली जिला बैतूल, पातालकोट जिला छिंदवाड़ा, सेसइपुरा जिला श्योपुर, चाड़ा जिला डिंडोरी एवं नालछा जिला धार में संचालित है। सामुदायिक रेडियो के संचालन के लिए निहित उद्देश्यों को पूर्ण करते हुए स्थानीय युवाओं को रेडियो संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। इन केन्द्रों से स्थानीय बोलियों में सूचनाओं का आदान-प्रदान, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का दस्तावेजीकरण किया जाता है। 

सामुदायिक रेडियो सुदूर ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन की बुनियादी जरूरतों को पूर्ण करने का माध्यम है। राज्य के बड़े शहरों में स्थित विभिन्न शैक्षिक परिसरों में भी कैम्पस रेडियो संचालित है। एफएम रेडियो में आरजे शिक्षित एवं प्रशिक्षित होते हैं और वे शहरी समुदाय से आते हैं जबकि सामुदायिक रेडियो के आरजे ठेठ समुदाय के बीच से आते हैं। इनके पास प्रशिक्षण तो होता है लेकिन व्यवहारिक होता है। शैक्षिक योग्यता बहुत कम होती है लेकिन ये लोग अपने समुदाय को, समुदाय की जरूरतों को और उनकी भाषा-बोली को बेहतर ढंग से समझते हैं और उसका प्रतिनिधित्व ठीक से कर पाते हैं। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल देश में समुदाय का यह रेडियो सूचना और शिक्षा के मान से बेहद जरूरी बन गया है। मध्यप्रदेश में जिस तरह राज्य की कल्याणकारी योजनओं को सुदूर अंचल तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक रेडियो की स्थापना की गई है, वह अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण की तरह है। आने वाले समय में समुदाय का यह रेडियो जन-जन की आवाज बनेगा। सामुदायिक रेडियो फैशन का नहीं बल्कि पैशन बन चुका है। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं और वे शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं) 

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'माधवराव सप्रे के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं ये बात'

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 11 February, 2021
Last Modified:
Thursday, 11 February, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार माधवराव सप्रे की कर्मस्थली छत्तीसगढ़ के पेंड्रा में उनकी स्मृति में आयोजित सप्रे संवाद में मुख्य वक्ता के तौर पर हिस्सा लेने का अवसर मिला। हममें से कितने लोग यह जानते हैं कि महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से 1915 में आने के कई साल पहले सप्रे जी स्वराज और स्वदेशी को स्वीकार और विदेशी का बहिष्कार आंदोलन छेड़ चुके थे। गांधी जी जिन लोगों से प्रेरित थे, उनमें से एक सप्रे जी भी थे।

दादा माखनलाल चतुर्वेदी, सेठ गोविंददास और द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे महानुभावों को उन्होंने संस्कारित करने का काम किया। उनके हिंदी केसरी पत्र से गोरी हुकूमत इतना खौफ खाती थी कि धोखे से पत्र के छह हजार पाठकों के पते लिए गए और उन पर दबाव डाला गया कि हिंदी केसरी खरीदना बंद करें। बाकायदा एक आदेश निकला कि हिंद केसरी पढ़ने वाले लोगों के रिश्तेदारों को नौकरी से निकाल दिया जाएगा, उनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।

उनकी हिंदी ग्रंथमाला तो गजब की थी। जून 1908 में उन्होंने एक लेख छापा-अंगरेजी राज से हिंदुस्तान का सत्यानाश। एक अन्य लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था-स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट। इसमें लिखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत को कितना नुकसान हुआ। इस अंक को जब्त कर लिया गया। याद रखिए कि तब तक महात्मा गांधी भारत नहीं आए थे।

वे एक ऐसे अनोखे संपादक थे, जिन्होंने भारत में आर्थिक पत्रकारिता की नींव डाली। उन्होंने अर्थशास्त्र की प्रामाणिक शब्दावली हम लोगों को सौंपी। आर्थिक विषयों पर उनके बीस से अधिक आलेख ऐसे हैं, जो आज एक सौ पंद्रह बरस बाद भी उपयोगी हैं।

सप्रे जी के सरोकार और आज पत्रकारिता की चुनौतियों पर यह एक सार्थक संवाद रहा। रायपुर से जाने-माने पत्रकार भाई गिरीश पंकज और सुधीर शर्मा को भी गहराई से सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। बिलासपुर के पुराने मित्र राजेश दुआ और साथी पत्रकार राजेश अग्रवाल इस यात्रा के सबब बने। पेंड्रा के जिला शिक्षा अधिकारी मनोज राय से भी शानदार मुलाकात हुई।

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मिस्टर मीडिया: आजादी के बाद पहली बार बनी है पत्रकारिता के लिए ऐसी स्थिति

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 29 January, 2021
Last Modified:
Friday, 29 January, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अब भारत का सुप्रीम कोर्ट समझा रहा है। आजादी के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है, जब पत्रकारिता पर नियंत्रण के लिए मुल्क का सर्वोच्च न्यायालय इतना संवेदनशील दिखाई दे रहा है। कुछ दिनों से लगभग रोजाना ही किसी न किसी प्रसंग में वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर तीखी टिप्पणियां कर रहा है। गुरुवार को उसने 26 जनवरी की घटना के संदर्भ में सरकार से पूछा कि अगर वह इंटरनेट पर पाबंदी लगा सकती थी तो टीवी चैनलों के भड़काऊ प्रसारण को क्यों नहीं रोका गया? विचार प्रकट करने का अधिकार समाज में नफरत फैलाने की छूट नहीं देता।

इससे पहले बुधवार को उसने टीवी पत्रकारिता में कंटेंट के गिरते स्तर पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। इस पर चार हफ्ते में हुकूमत को उत्तर देना है। कोर्ट ने पूछा है कि अगर सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है तो मीडिया के लिए अलग से स्वतंत्र ट्रिब्यूनल क्यों नहीं बना देती। न्याय की इस शिखर संस्था ने इन दिनों एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। इसमें कहा गया कि टेलिविजन चैनलों पर पेड न्यूज, हेट न्यूज, प्रचार समाचार और मीडिया ट्रायल का जो रूप देखने को मिल रहा है, वह खतरनाक है। इस पर नियम कानून होते हुए भी सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इससे टीवी पत्रकारिता निरंकुश हो रही है।

इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने एक वेब सीरीज में भारतीय धार्मिक आस्था और प्रतीकों पर अभद्र टिप्पणियों पर भी गुस्सा दिखाया है। दो दिन पहले ही उसने यहां तक कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि कोई कुछ भी बोलने के लिए आजाद है। कुछ इसी तरह की भावना इंदौर हाई कोर्ट ने भी प्रकट की है। उसने कहा कि संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को दी है, लेकिन समाज में सद्भाव बिगाड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

इन टिप्पणियों का क्या अर्थ निकलता है? यही कि पत्रकारिता में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ असीमित नहीं हो सकता। इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि तमाम भारतीय खबरिया टीवी चैनल हालिया दिनों में ग़ैर जिम्मेदार हुए हैं। उनकी संपादकीय सामग्री इकतरफा और दर्शकों की प्रतिनिधि राय के खिलाफ है। वे अपनी विचारधारा की भौंडी नुमाइश करते नजर आते हैं। इससे हिन्दुस्तान के बहुरंगी ढांचे को चोट पहुंचती है। बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे प्रसारण सरकार और न्यायपालिका को पाबंदी लगाने पर बाध्य कर रहे हैं।

पत्रकारिता अगर सरकारी धुनों पर नाचती रहे तो किसी भी हुकूमत को क्या एतराज हो सकता है। मगर न्यायपालिका की ओर से विभिन्न स्तरों पर यदि राय, व्यवस्था, निर्देश, आदेश, सुझाव और टिप्पणी की जाती है तो वह एक दस्तावेज बन जाती है और आने वाले दिनों में उस दस्तावेज का हवाला अनेक मामलों में दिया जा सकता है। उन मामलों में भी, जहां इन निर्देशों का उल्लेख आवश्यक नहीं होता। यह एक बेहद गंभीर प्रवृति की ओर इशारा है। राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर आज चैनलों के प्रबंधकों-संपादकों को संकल्प लेना होगा कि वे इस पर तत्काल सतर्कता से कार्रवाई करें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इन प्रपंचों ने भी पत्रकारों की साख को बहुत धक्का पहुंचाया है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: कुछ इस तरह की चाहिए एक मीडिया काउंसिल!

यह कैसी पत्रकारिता का नमूना हम प्रस्तुत कर रहे हैं मिस्टर मीडिया!

किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

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मीडिया की आजादी और अंकुश की सीमा पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने यूं रखी ‘मन की बात’

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आजादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 25 January, 2021
Last Modified:
Monday, 25 January, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

एक बार फिर गंभीर विवाद। प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म, सोशल मीडिया को कितनी आज़ादी और कितना नियंत्रण? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता, कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-

माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव सम्पूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है। इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।

मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर लगभग ढाई सौ पृष्ठों का ऐतिहासिक फैसला  दिया है, जिस पर स्वयं मीडिया ने प्रमुखता से नहीं बोला, दिखाया और प्रकाशित किया। सिने कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत की घटना के संबंध में आशंकाओं एवं दो टीवी न्यूज चैनल्स की कवरेज पर दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जी.एस कुलकर्णी ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। सबसे अच्छी बात यह है कि मीडिया की कवरेज पर कई आपत्तियों को रेखांकित करने के बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता पर प्रहार कर कोई सजा नहीं दी। उन्होंने मीडिया की स्वतंत्रता और सीमाओं की विस्तार से व्याख्या कर कुछ मार्गदर्शी नियम भी सुझाए हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि सुशांत सिंह प्रकरण में मीडिया की व्यापक कवरेज से प्रामाणिक तथ्यों के लिए सीबीआई की जांच संभव हुई। पुलिस के कामकाज और राजनेताओं की विश्वसनीयता कम होने से परिवार और समाज ऐसे मामलों में विस्तार से जांच चाहता है। पिछले दशकों में जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी हत्याकांड में मीडिया कवरेज से अपराधियों को दण्डित करवाने में सहायता मिली। आरुषि तलवार हत्याकांड को भी मीडिया ने बहुत जोर से उठाया, लेकिन मीडिया के एक वर्ग ने जांच एजेंसी और अदालत से पहले निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी भी कर दी। यही बात भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में लगातार हो रही है। समुचित प्रमाणों के बिना सीधे किसी नेता, अधिकारी अथवा व्यक्ति और संस्था को दोषी बताना अदालत कैसे उचित मानेगी?

हाल के वर्षों में सत्ताधारियों द्वारा कुछ खास लोगों, पूंजीपतियों और कंपनियों को लाभ पहुंचाने के कई गंभीर आरोप सामने आए। संभव है कुछ सही भी हों। पर्याप्त प्रमाण अदालत तक पहुंचने पर दोषियों को दण्डित भी किया गया है। अन्यथा लालू यादव, ओमप्रकाश चौटाला जैसे नेता जेल में नहीं बैठे होते। इन्हें सजा मिलने में देरी अवश्य हुई और वे आज भी अपने अपराध स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं, हम जैसे पत्रकारों ने उनके कारनामों को प्रमाण सहित उजागर किया था  तो हमें ही पूर्वाग्रही बताकर उनके समर्थकों ने हमले किये थे। नीरव मोदी देश से भाग जरूर गया, लेकिन ब्रिटेन की जेल में बंद है। इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राफेल विमान खरीदी से लेकर किसानों के लिए संसद से पारित कानूनों के आधार पर केवल चार-पांच पूंजीपतियों को सारा मुनाफा, किसानों की सारी जमीन देने, हर निर्माण में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप निरंतर कुप्रचारित करने का माध्यम बनने से न केवल सामान्य जनता के बीच, वरन पूरी दुनिया में भारतीय व्यवस्था को बदनाम किया जा रहा है।

केवल प्रतिपक्ष के बयान कहकर क्या मीडिया अपनी मर्यादा और आचार संहिता के पालन से बच सकता है? यह वैसा ही है, जैसे कोई डॉक्टर किसी नेता के बयान या सलाह के आधार पर क्लिनिक में आए व्यक्ति का ऑपरेशन और इलाज करने लगे अथवा अदालतें प्रमाण के बिना सजा सुनाने लगे। हां, जिन आरोपों के प्रमाण उपलब्ध हों, उन्हें रिपोर्ट की तरह पेश कर कानूनी कार्रवाई और सजा का काम अदालत पर ही छोड़ा जाना चाहिए।

मीडिया की समस्या बढ़ने का एक कारण यह भी है कि तथ्य, खबर को आरोपात्मक टिप्पणियों के घालमेल के साथ पाठक और दर्शकों के सामने रख दिया जाता है। दूसरे गंभीर मुद्दे को अधिक प्रसार के लोभ में सनसनीखेज ढंग से उछाला जाता है। अमेरिका अथवा यूरोप में खोजी खबर के लिए महीनों तक दस्तावेजों को जुटाकर क़ानूनी राय लेकर प्रस्तुत किया जाता है। अपने देश में अधिकांश सूचनाएं किसी पक्ष या व्यक्ति विशेष के अपने निहित उद्देश्य से मिली होती हैं अथवा जांच पड़ताल के लिए समय और धन खर्च नहीं किया जाता है। यही कारण है कि सुशांत सिंह मामले में न्यायाधीशों ने मृत व्यक्ति के चरित्र हनन जैसे आरोपों के प्रसारण को अनुचित बताया। उनका यह निर्देश सही है कि ऐसे मामलों में तथ्य सार्वजनिक किए जा सकते हैं, लेकिन उन पर कुछ लोगों को बिठाकर टीवी बहस आरोपबाजी अनुचित है।  उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है। भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।

संभवतः माननीय अदालत को यह जानकारी नहीं होगी कि फिलहाल प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष

सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित कतई नहीं हों, लेकिन संसद, न्यायपालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम-कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग, मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा। गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं सहित।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) 

(लेखक एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व सदस्य हैं। नवभारत टाइम्स,  हिंदुस्तान, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, आउटलुक हिंदी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में संपादक रहे हैं। पद्मश्री और गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं|)

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