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वर्तमान परिस्थितियों में साल 2023 बेहद हलचल भरा रहा है: सतीश के. सिंह

वर्तमान परिस्थितियों में वर्ष 2023 बेहद हलचल भरा रहा है। वैसे तो मेनस्ट्रीम मीडिया और वैकल्पिक न्यू मीडिया के बीच भेद और विभेद पहले से ही रहा, लेकिन 2023 में एक घटना बेहद महत्वपूर्ण रही।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

सतीश के.सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।

वर्तमान परिस्थितियों में वर्ष 2023 बेहद हलचल भरा रहा है। वैसे तो मेनस्ट्रीम मीडिया और वैकल्पिक न्यू मीडिया के बीच भेद और विभेद पहले से ही था, लेकिन वर्ष 2023 में एक घटना बेहद महत्वपूर्ण रही। कई विपक्षी पार्टियों ने जिनमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रमुख रूप से शामिल रहे, जिन्होंने  मेनस्ट्रीम मीडिया को कई बार खुली चुनौती देते हुए पक्षपात का आरोप लगाया।

यहां तक कि मेनस्ट्रीम मीडिया को पूरी तरह से खारिज भी करने की कोशिश की। इसका असर भी हुआ कि मेनस्ट्रीम मीडिया में थोड़ा बहुत विपक्षी पार्टियों को भी जगह मिलने लगी। इसका मतलब ये नहीं है कि आमूल चूल परिवर्तन हो गया। डिवाइड जारी है। कह सकते हैं कि थोड़ा बहुत साख की दृष्टि से कोर्स करेक्शन किया गया।

मीडिया जगत में एक अभूतपूर्व  ऐतिहासिक घटना हुई, जब कई पार्टियों ने कुछ खास एंकर्स के बॉयकॉट का ऐलान किया। हालांकि इस पर पूरी तरह से अमल नहीं कर पाए। वर्तमान राजनैतिक डिवाइड का असर दरअसल हर क्षेत्र में बिल्कुल साफ है,जो कि स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया के लिए टाइम बम है।

इस साल विदेशी और देसी मीडिया के बीच का भी एक संघर्ष देखने को मिला, नेशनलिस्ट मीडिया उनका प्रतिवाद करती आई जबकि देश की सत्ता के खिलाफ कई चीजें वेस्टर्न मीडिया में छपीं और राष्ट्रीय मीडिया ने भी उनके खिलाफ तलवारें तानीं।

आरोप-प्रत्यारोप का दौर अनवरत  चलता रहा। कई विदेशी मीडिया प्रतिष्ठानों पर तो भारत के खिलाफ षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाया गया। मीडिया आभामंडल इस कदर ध्रुवीकृत हुआ कि एक समय तो ऐसा हुआ कि कुछ नेताओं ने विदेशी जमीन और विदेशी मीडिया का भी सहारा लिया, जिससे काफी ज्यादा कॉन्ट्रोवर्सी हुई।

अडानी प्रकरण, हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने तो देसी मीडिया, विदेशी मीडिया  के बीच लकीर खींच दी वहीं मेनस्ट्रीम मीडिया ने मुद्दे को गौण कर दिया तो वैकल्पिक मीडिया ने इसे खूब उछाला। मीडिया वर्ल्ड में एनडीटीवी का अडानी द्वारा अधिग्रहण एक बड़ी घटना रही।

प्रणय रॉय के एनडीटीवी के कई नामचीन चेहरों ने इस्तीफा दिया तो साख के लिए नई एनडीटीवी जदोजहद्द करती नजर आई। इस वर्ष में सर्वोच्च अदालत की मीडिया को खासतौर से कुछ  एंकर्स को लेकर की गई टिप्पणी से भी माहौल गर्म हुआ। परिवर्तन क्या हुआ ये अभी भी अध्ययन का विषय है।

एक और सुर्खी बनी, कुछ एंकर्स पर गिरफ्तारी की तलवार के रूप में। उन्हें गिरफ्तार करने एक-दो राज्यों की पुलिस पहुंच गई। खैर, मामला रफा-दफा हुआ मगर कई सवाल खड़े कर गया। संक्षेप में साफ है कि मीडिया का अंदरूनी बंटवारा स्पष्ट है, कुछ व्यक्तिगत ,कुछ सांस्थानिक। तथ्य पर नैरेटिव और प्रोपेगंडा भारी पड़ रहा है। आगे का भी ट्रेंड यही है। दरअसल ,आलोचना, फैक्ट्स, टॉलरेंस सब पर मार पड़ रही है। फिलहाल, उम्मीद भी कम ही नजर आ रही है। 


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