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रवीश कुमार की यही ‘लीला’ उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है
रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा, बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
मुझे बिहार के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितना कि मैंने टीवी में देखा-सुना और अखबारों में पढ़ा था। प्रकाश झा की गंगाजल, अपहरण जैसी फिल्में देखकर भी बिहार को जाना था। इसके अलावा बिहार को समझने का एक स्रोत और था, जो हमारे साथ काम करने वाले थे। दिल्ली में बिहार से भागकर आये ऊंची जाति के जातक बताया करते थे कि सोने की लंका कहे जाने वाले बिहार का सारा वैभव पिछले 25 वर्षों के मंडल राज ने जंगल राज में बदल डाला है। बिहार में न रोटी है और न बेटी सुरक्षित है। पर अभी हाल की विधानसभा चुनाव में एनडीटीवी के रवीश कुमार ने बिहार की जो तस्वीर लाइव दिखायी, उससे यह जड़ता धड़ाम से गिरी। लगा कि बिहार भी उतना ही समृद्ध है, जितना कि हिन्दुस्तान के दूसरे प्रांत। बिहार में मानसिकता कैसे बदल रही है। औसत बिहारी किस तरह सोचता है और करता है, इसका पूरा मजमून रवीश कुमार ने ब्योरेवार दिखाया। मुसलसल करीब डेढ़ महीने तक यह चला।
कह सकते हैं कि रवीश कुमार की यह जादुई शैली थी कि लोकमान्यता में पिछड़े और दरिद्र बिहार का वह खाका उन्होंने खींचा, जो तब तक अज्ञात था। नीतीश कुमार ने साइकिलें देकर बिहार की बेटियों को 21 वीं सदी में ला दिया है। आज बिहार की बेटियां अपनी पुरानी पीढ़ी से कई साल आगे चली गयी हैं। गांव-गांव में सड़कें हैं। किसान को अपनी उपज का सही दाम मिलने के लिए बाजार भी हैं। एक बिजली कैसे एक गांव में क्रांति कर देती है, इसका एक नायाब दृश्य रवीश कुमार ने दिखाया और स्वदेश फिल्म की याद दिला दी, जिसमें नायक शाहरुख खान अकेले बिजली लाकर उस गांव की जड़ता को तोड़ता है। वाकई यह सब देखकर लगा कि चाहे मंडल हो या कमंडल, विकास की अनदेखी करने वाला सत्ता में नहीं लौट सकता। जनता भावनाओं में बहकर वोट नहीं देती, बल्कि खूब ठोक-बजाकर और परख कर ही वोट देती है।
रवीश कुमार की यही लीला उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है। इससे लगता है कि टीवी की झिलमिलाती दुनिया में भी रवीश जैसे पत्रकार जब तक रहेंगे, तब तक पत्रकारिता के सरोकार जिंदा रहेंगे। रवीश की यह लगन इसलिए नहीं है कि वे लीक से हटकर चलने वाले पत्रकार हैं, इसीलिए वे कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे वे अलग दिखें या चलन के विरुद्ध चलकर कुछ लोग अपने को कुछ अलग साबित करने का प्रयास करते रहते हैं, बल्कि रवीश इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि रवीश के प्रोफेशनलिज्म में सिर्फ कौशल ही नहीं, एकेडेमिक्स का भी योगदान है। दिल्ली यूनीवर्सिटी से मॉर्डर्न हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएट रवीश की नजर तीक्ष्ण है और उनका टारगेट रहा है कि आजादी के बाद शहरीकरण ने किस तरह कुछ लोगों को सदा-सदा के लिए पीछे छोड़ दिया है, उनकी व्यथा को दिखाना।
आप कह सकते हैं कि यह भी संयोग रहा कि रवीश कुमार का जो चैनल रहा, वह भी लीक से हटकर प्रो-पीपुल्स है। कॉरपोरेट की एक सीमा होती है, वह उससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अब यह तो वहां काम कर रहे प्रोफेशनल का ही कमाल होता है कि वह उस कॉरपोरेट को कनविंस कर कितनी छूट हासिल करता है। रवीश कुमार अपने इस मिशन में सौ फीसद कामयाब रहे हैं। मैं रवीश को नहीं जानता था। पांच साल पहले की बात है, अचानक मैंने देखा कि एनडीटीवी पर कापसहेड़ा की एक लाइव रिपोर्ट चल रही थी। कापसहेड़ा पश्चिमी दिल्ली का एक गांव हुआ करता था, अब वह लालडोरा में आ गया है। वहां पर किस तरह से मकान मालिक अपने किरायेदारों को अपना बंधुआ बनाकर रखते हैं। जो युवक इस रिपोर्ट को पेश कर रहा था, वे थे रवीश कुमार।
अकेले उस रिपोर्ट ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि आज तक शायद ही रवीश की कोई रिपोर्ट या बाद में शुरू हुआ उनका प्राइम टाइम न देखा हो। रवीश की रिपोर्ट ने ही इस एंकर के अपने रुझान और अपनी रुचियां साफ कर दी थीं। लगा कि इस नवयुवक में टीवी की झिलमिलाती स्क्रीन में भी कुछ धुंधले पक्ष दिखाने की मंशा है। रवीश कुमार की यह प्रतिबद्धता उन्हें कहीं न कहीं आज के चालू पत्रकारिता के मानकों से अलग करती है। जब पत्रकारिता के मायने सिर्फ चटख-मटक दुनिया को दिखाना और उसके लिए चिंता व्यक्त करना हो गया हो तब रवीश उस दुनिया के स्याह रंग की फिक्र करते हैं।
मीडिया में आया हर पत्रकार रवीश जैसी चकाचौंध और ग्लैमर चाहता है, पर रवीश बनना आसान नहीं है। उन जैसे सरोकार तलाशने होंगे। उन सरोकारों के लिए एकेडिमक्स यानी अनवरत पढ़ाई जरूरी है। रवीश बताते हैं कि वे साहित्य या फिक्शन की बजाय इकोनामिक्स, सोशियोलाजी और साइंस पढ़ते हैं। इन्हीं विषयों की किताबें खरीदते हैं। उनके किताब खरीद का बजट कोई दस हजार रुपये महीना है। रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा, बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई। इसी तरह कचरा और अरबनाइजेशन पर वे निरंतर पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। यह जरूरी भी है।
सरोकार का टारगेट समझना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उस सरोकार से होने वाले विकास को समझना। विकास द्विअर्थी शब्द है, जिसका प्रतिक्रियावादी और प्रगतिकामी कई अलग अर्थ बताते हैं। एक विकास नरेंद्र मोदी का है तो दूसरा नीतीश कुमार का, अखिलेश यादव का और मायावती का। पर प्रश्न वही है कि आप किस तरह के सरोकारों के साथ खड़े हैं।
(वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की फेसबुक वॉल से)
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