होम / विचार मंच / रवीश कुमार की यही ‘लीला’ उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है

रवीश कुमार की यही ‘लीला’ उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है

रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा, बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

जिन राजनेताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों को पीड़ा है कि हाय Ravish Kumar को रैमन मैगसायसाय पुरस्कार क्यों और कैसे मिल गया, वे इस लेख को पढ़ें जो मैंने पांच साल पहले ‘शुक्रवार’ में लिखा था। इसे उन नए पत्रकारों को भी पढ़ना चाहिए, जो टीवी की चकाचौंध में डूबे हैं। वे जानें कि कोई रवीश कैसे बनता है। शुक्रवार के संपादक Ambrish Kumar ने इसे ताजा अंक में पुनर्प्रकाशित किया है। यह अंक (https://notnul।com ) पर उपलब्ध है।

मुझे बिहार के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितना कि मैंने टीवी में देखा-सुना और अखबारों में पढ़ा था। प्रकाश झा की गंगाजल, अपहरण जैसी फिल्में देखकर भी बिहार को जाना था। इसके अलावा बिहार को समझने का एक स्रोत और था, जो हमारे साथ काम करने वाले थे। दिल्ली में बिहार से भागकर आये ऊंची जाति के जातक बताया करते थे कि सोने की लंका कहे जाने वाले बिहार का सारा वैभव पिछले 25 वर्षों के मंडल राज ने जंगल राज में बदल डाला है। बिहार में न रोटी है और न बेटी सुरक्षित है। पर अभी हाल की विधानसभा चुनाव में एनडीटीवी के रवीश कुमार ने बिहार की जो तस्वीर लाइव दिखायी, उससे यह जड़ता धड़ाम से गिरी। लगा कि बिहार भी उतना ही समृद्ध है, जितना कि हिन्दुस्तान के दूसरे प्रांत। बिहार में मानसिकता कैसे बदल रही है। औसत बिहारी किस तरह सोचता है और करता है, इसका पूरा मजमून रवीश कुमार ने ब्योरेवार दिखाया। मुसलसल करीब डेढ़ महीने तक यह चला।

कह सकते हैं कि रवीश कुमार की यह जादुई शैली थी कि लोकमान्यता में पिछड़े और दरिद्र बिहार का वह खाका उन्होंने खींचा, जो तब तक अज्ञात था। नीतीश कुमार ने साइकिलें देकर बिहार की बेटियों को 21 वीं सदी में ला दिया है। आज बिहार की बेटियां अपनी पुरानी पीढ़ी से कई साल आगे चली गयी हैं। गांव-गांव में सड़कें हैं। किसान को अपनी उपज का सही दाम मिलने के लिए बाजार भी हैं। एक बिजली कैसे एक गांव में क्रांति कर देती है, इसका एक नायाब दृश्य रवीश कुमार ने दिखाया और स्वदेश फिल्म की याद दिला दी, जिसमें नायक शाहरुख खान अकेले बिजली लाकर उस गांव की जड़ता को तोड़ता है। वाकई यह सब देखकर लगा कि चाहे मंडल हो या कमंडल, विकास की अनदेखी करने वाला सत्ता में नहीं लौट सकता। जनता भावनाओं में बहकर वोट नहीं देती, बल्कि खूब ठोक-बजाकर और परख कर ही वोट देती है।

रवीश कुमार की यही लीला उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है। इससे लगता है कि टीवी की झिलमिलाती दुनिया में भी रवीश जैसे पत्रकार जब तक रहेंगे, तब तक पत्रकारिता के सरोकार जिंदा रहेंगे। रवीश की यह लगन इसलिए नहीं है कि वे लीक से हटकर चलने वाले पत्रकार हैं, इसीलिए वे कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे वे अलग दिखें या चलन के विरुद्ध चलकर कुछ लोग अपने को कुछ अलग साबित करने का प्रयास करते रहते हैं, बल्कि रवीश इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि रवीश के प्रोफेशनलिज्म में सिर्फ कौशल ही नहीं, एकेडेमिक्स का भी योगदान है। दिल्ली यूनीवर्सिटी से मॉर्डर्न हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएट रवीश की नजर तीक्ष्ण है और उनका टारगेट रहा है कि आजादी के बाद शहरीकरण ने किस तरह कुछ लोगों को सदा-सदा के लिए पीछे छोड़ दिया है, उनकी व्यथा को दिखाना।

आप कह सकते हैं कि यह भी संयोग रहा कि रवीश कुमार का जो चैनल रहा, वह भी लीक से हटकर प्रो-पीपुल्स है। कॉरपोरेट की एक सीमा होती है, वह उससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अब यह तो वहां काम कर रहे प्रोफेशनल का ही कमाल होता है कि वह उस कॉरपोरेट को कनविंस कर कितनी छूट हासिल करता है। रवीश कुमार अपने इस मिशन में सौ फीसद कामयाब रहे हैं। मैं रवीश को नहीं जानता था। पांच साल पहले की बात है, अचानक मैंने देखा कि एनडीटीवी पर कापसहेड़ा की एक लाइव रिपोर्ट चल रही थी। कापसहेड़ा पश्चिमी दिल्ली का एक गांव हुआ करता था, अब वह लालडोरा में आ गया है। वहां पर किस तरह से मकान मालिक अपने किरायेदारों को अपना बंधुआ बनाकर रखते हैं। जो युवक इस रिपोर्ट को पेश कर रहा था, वे थे रवीश कुमार।

अकेले उस रिपोर्ट ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि आज तक शायद ही रवीश की कोई रिपोर्ट या बाद में शुरू हुआ उनका प्राइम टाइम न देखा हो। रवीश की रिपोर्ट ने ही इस एंकर के अपने रुझान और अपनी रुचियां साफ कर दी थीं। लगा कि इस नवयुवक में टीवी की झिलमिलाती स्क्रीन में भी कुछ धुंधले पक्ष दिखाने की मंशा है। रवीश कुमार की यह प्रतिबद्धता उन्हें कहीं न कहीं आज के चालू पत्रकारिता के मानकों से अलग करती है। जब पत्रकारिता के मायने सिर्फ चटख-मटक दुनिया को दिखाना और उसके लिए चिंता व्यक्त करना हो गया हो तब रवीश उस दुनिया के स्याह रंग की फिक्र करते हैं।

मीडिया में आया हर पत्रकार रवीश जैसी चकाचौंध और ग्लैमर चाहता है, पर रवीश बनना आसान नहीं है। उन जैसे सरोकार तलाशने होंगे। उन सरोकारों के लिए एकेडिमक्स यानी अनवरत पढ़ाई जरूरी है। रवीश बताते हैं कि वे साहित्य या फिक्शन की बजाय इकोनामिक्स, सोशियोलाजी और साइंस पढ़ते हैं। इन्हीं विषयों की किताबें खरीदते हैं। उनके किताब खरीद का बजट कोई दस हजार रुपये महीना है। रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा, बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई। इसी तरह कचरा और अरबनाइजेशन पर वे निरंतर पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। यह जरूरी भी है।

सरोकार का टारगेट समझना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उस सरोकार से होने वाले विकास को समझना। विकास द्विअर्थी शब्द है, जिसका प्रतिक्रियावादी और प्रगतिकामी कई अलग अर्थ बताते हैं। एक विकास नरेंद्र मोदी का है तो दूसरा नीतीश कुमार का, अखिलेश यादव का और मायावती का। पर प्रश्न वही है कि आप किस तरह के सरोकारों के साथ खड़े हैं।

 (वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की फेसबुक वॉल से)


टैग्स रवीश कुमार रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड शंभूनाथ शुक्ल
सम्बंधित खबरें

साहित्य से छंटती व्यक्तिगत विवादों की धुंध: अनंत विजय

क्या लेखक सत्ता की कांता होती है या गांव की सीमा पर भूँकता हुआ कुकुर ? प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने महिलाओं और साहित्यकारों पर घटिया टिप्पणी क्यों की थी?

13 hours ago

टैरिफ पर टैरिफ नहीं चलेगा! पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी ट्रंप के पास टैरिफ़ लगाने के रास्ते हैं। पहले उन्होंने उसी कानून के तहत 10% टैरिफ़ लगा दिया, फिर 24 घंटे के भीतर बढ़ाकर 15% कर दिया। यह टैरिफ़ अस्थायी है।

13 hours ago

भारत मंडपम में कांग्रेस विरोध, लेकिन भूल गए अपने फर्जीवाड़े: आलोक मेहता

हाल में एआई सम्मेलन के दौरान “चीनी मॉडल” को अपना बताने के आरोपों पर विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि संबंधित रोबोट शैक्षणिक प्रयोग के लिए खरीदा गया था और प्रस्तुति में चूक हुई।

13 hours ago

AI पर नियंत्रण करना भी बेहद आवश्यक: रजत शर्मा

प्रधानमंत्री मोदी ने कम शब्दों में कई बड़ी बातें कहीं। भारत एआई में विश्व का अग्रणी बनना चाहता है, हमारे देश के पास दिमाग़ भी है, युवा शक्ति भी है और सरकार का समर्थन भी है।

2 days ago

रामबहादुर राय-पत्रकारिता क्षेत्र में शुचिता और पवित्रता के जीवंत व्यक्तित्व

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वे शीर्ष नेताओं में थे। जब पत्रकारिता में आए तो शीर्ष पत्रकार बने। आज की भारतीय पत्रकारिता में उन सरीखे सम्मानित और सर्वस्वीकार्य नाम बहुत कम हैं।

2 days ago


बड़ी खबरें

कर्नाटक में बच्चों के मोबाइल उपयोग पर लग सकती है रोक, सरकार कर रही मंथन

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार 16 साल से कम उम्र के छात्रों के लिए मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर मंथन कर रही है।

10 hours ago

विज्ञापन जगत के भविष्य की झलक देगी पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट, कल होगा अनावरण

मुंबई में 24 फरवरी को विज्ञापन जगत की बड़ी रिपोर्ट पिच मेडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026 जारी होने जा रही है।

12 hours ago

पद्मश्री आलोक मेहता की कॉफी-टेबल बुक 'Revolutionary Raj' का भव्य लोकार्पण

शुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित यह कॉफी-टेबल बुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों पर केंद्रित है। इसका भूमिका लेख (Foreword) केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लिखा है।

1 day ago

'सारेगामा इंडिया' ने दुबई में खोली अपनी ये कंपनी, म्यूजिक फेस्टिवल व इवेंट बिजनेस पर फोकस

म्यूजिक और एंटरटेनमेंट कंपनी 'सारेगामा इंडिया' (Saregama India Limited) ने दुबई में अपनी 100% हिस्सेदारी वाली नई सहायक कंपनी शुरू कर दी है।

10 hours ago

CCI के आदेश पर झुका वॉट्सऐप, यूजर की सहमति से ही होगा डेटा शेयर

वॉट्सऐप ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के आदेशों को लागू करेगा और यूज़र्स की सहमति के आधार पर ही अन्य मेटा कंपनियों के साथ डेटा शेयर करेगा।

1 hour ago