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इन हालातों में कोई कैसे कहे कि वह पत्रकार है

मीडिया की विश्वसनीयता,नैतिकता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से होती रही है बहस

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

मीडिया की विश्वसनीयता,नैतिकता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर बहस बहुत पुरानी है। इसी बहस के बीच मीडिया लोकतंत्र को ताकत भी देता रहा है और उसकी विश्वसनीयता भी बनी रही। मगर मौजूदा हालात ऐसे नहीं हैं। मीडिया का रिश्ता अब लोकतंत्र से नहीं बल्कि पूंजी और राजनीति से है। पहले के मुकाबले अखबार प्रसार और पहुंच में आज काफी आगे निकल चुके हैं, टीवी अधिक प्रभावी हुआ है और वेब जर्नलिज्म नए आयाम छू रहा है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद मीडिया की आजादी पर ग्रहण, और विश्वसनीयता पर सवाल है। मीडिया ने आम लोगों को पोस्ट-ट्रुथ, गलत सूचनाओं और झूठी खबरों के एक नये युग में धकेल दिया है।

रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स’ के मुताबिक मीडिया फ्रीडम इंडेक्स में भारत काफी नीचे स्थान पर है। मगर इससे भी ज्यादा गंभीर ‘एडलमैन’ की वह रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है भारतीय मीडिया पूरी तरह भ्रष्ट होकर आमजन में अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। सही मायने में देखा जाए तो यह सवाल मीडिया का ही नहीं, नैतिक मूल्यों की पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों की साख और उनके पेशागत भविष्य का भी है। मगर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पत्रकारिता के मूल्यों और पत्रकार के भविष्य को बचाने की बात कहीं नहीं होती। यह अब छिपी नहीं है कि भारतीय मीडिया पूरी तरह राजनीतिक तंत्र का हथियार बन चुका है। पत्रकारिता की धार ही बदल चुकी है, सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों के प्रति मुख्य धारा का मीडिया बहुत संवेदनशील भी नहीं रह गया है। आम आदमी से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर जमीनी रिपोर्टें अब टीवी और अखबारी सुर्खियों में नहीं होतीं।

आम चुनाव जैसे अहम मौके पर भी आमजन के मुद्दे हाशिए पर होते हैं। अफसोसजनक यह है कि जिस वक्त देश के लोकतंत्र को ज्यादा प्रासंगिकता और विश्वसनीयता की दरकार थी, तब भी मीडिया महज बयानों और प्रतिक्रियाओं का मंच बना रहा। विडंबना देखिए, सैद्धांतिक तौर पर जिस मीडिया को तटस्थ रहना चाहिए, वह साफ-साफ लेफ्ट-राइट में बंटा है।अखबारों के फ्रंट पेज, संपादकीय पन्ने, टीवी चैनलों की हेडलाइन्स और बहस से साफ पता लगने लगा है कि कौन किसके पक्ष में और किसके विरोध में खड़ा है।

इस पूरे क्रम में दुखद यह है कि पत्रकार भी पत्रकारिता के मूलसिद्धांत और उद्देश्यों को छोड़ते जा रहे हैं। कोई खुलकर मोदी का भोंपू बजा रहा है तो कोई सीमा से बाहर निकलकर मोदी के विरोध में झंडा उठाए हुए है। पूरी पत्रकारिता मोदी के समर्थन और विरोध में सिमटकर रह गयी है। गाहे-बगाहे कोई मुद्दा उठता भी है तो उसे भी इसी बीच में झुलाया जाता है। अब तो गली-मुहल्लों से लेकर बड़े शहरों तक में पत्रकारों की ऐसी फौज खड़ी होती जा रही है, जो पेशेवर न होकर प्रोपेगैंडा पत्रकारिता कर रही है। इसके दुष्परिणाम भी सामने हैं। दिल्ली से लेकर बड़े शहरों और गांव कस्बों तक से आए दिन मीडिया के नाम पर दलाली और ब्लैकमेलिंग की खबरें भी सुनायी देने लगी हैं। ऐसे में संकट सिर्फ मीडिया पर ही नहीं है, पत्रकार पर भी है। एक पत्रकार की सामान्य छवि भी आमजन के बीच बहुत अच्छी नहीं रह गयी है।

कहने का मतलब यह है कि रोना तो मीडिया की आजादी का रोया जा रहा है, जबकि बड़ा मुद्दा पत्रकार नाम की संस्था के पतन का है। जहां तक मीडिया की आजादी का सवाल है तो अकेले भारत में ही नहीं दुनिया के करीब दो-तिहाई देशों में मीडिया की स्थिति खराब हुई है। खासकर उन देशों में जहां कि ताकतवर नेताओं का उदय हुआ है। रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स के महासचिव क्रिस्टोफ डेलॉयर के मुताबिक लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की आजादी सीमित होती जा रही है । यह उन सभी के लिए चिंताजनक है जो समझते हैं कि मीडिया की स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रखा गया, तो अन्य स्वतंत्रताओं के बचे रहना भी मुश्किल है।

भारतीय मीडिया के लिए मीडिया फ्रीडम इंडेक्स से ज्यादा चिंताजनक एडलमैन ट्रस्ट औररॉयटर्स की रिपोर्टें हैं। मीडिया बिजनेस में तकरीबन 38 देशों में काम करने वाले एडलमैन ट्रस्ट के सर्वे के मुताबिक मीडिया की विश्‍वसनीयता सभी जगह प्रभावित हुई है, लेकिन भारतीय मीडिया पूरी तरह विश्वसनीयता खो चुका है। यहां मीडिया संस्थानो का उद्देश्य और विश्‍वसनीयता सवालों के घेरे में है। एडलमैन के अनुसार खुद को पत्रकार कहने वाले यहां निजी स्वार्थ के लिए राजनैतिक दलों के पीआर एजेंट बनकर रह गए हैं। रॉयटर्स जर्नलिज्म इंस्टीट्यूट की ‘इंडिया डिजिटल न्यूज़ 2019’ सर्वे रिपोर्ट तो पत्रकार और पत्रकारिता के लिए और भी चिंताजनक है । इसके मुताबिक सोशल मीडिया के दौर में न्यूज चैनल्स और अखबारों की विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है।

रॉयटर्स ने यह सर्वे ‘द हिंदू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द क्विंट’ और ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया’ के साथ मिलकर किया। इसमें अधिकांश लोग फर्जी न्यूज और पत्रकारिता के घटते स्तर को लेकर चिंतित नजर आए। सर्वे के मुताबिक 39 फीसदी लोग जिस न्यूज का इस्तेमाल करते हैं, उस पर भी उन्हें ज्यादा विश्वास नहीं होता। घटती विश्वसनीयता का यह आंकड़ा कई अन्य देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है। निश्चित तौर पर भारतीय मीडिया की साख गिर रही है, वह सरोकारों से कटा और अपरिपक्व भी नजर आता है । फिर भी हम यह नहीं भूल सकते कि उसकी तमाम उपलब्धियां भी रही हैं। सामाजिक जागरूकता के साथ ही उसने देश में व्याप्त गरीबी, भुखमरी व भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहतरीन भूमिका निभायी है।

एक पहलू यह भी है कि आज भी आम आदमी जब विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से हताश होता है तो मीडिया में ही जाता है। यह अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि मीडिया विश्वसनीय भले ही न हो, मगर पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर है। देश में इस वक्त तकरीबन 70 हजार अखबार और 800 से अधिक चैनल हैं न्यूजपोर्टल,वेबसाइट और वेब चैनलों की तो कोई गिनती ही नहीं है। ऐसे-ऐसे समाचार पत्र भी हैं, जिनके पचास से अधिक संस्करण निकल रहे हैं। मीडिया की इस बढ़ती ताकत के बीच जब हम आधुनिक पत्रकारिता पर गौर करते हैं तो इस पर उठते सवाल जायज भी नजर आते हैं ।

आखिर ऐसा क्यों है? सच यह है कि ज्यादातर मीडिया मालिकान चाहते ही नहीं कि प्रेस आजाद और पत्रकार नैतिक रहे। आज अधिकांश अखबार और टीवी चैनल किसी पूंजीपति या कंपनी के स्वामित्व में हैं। हर कोई उसका इस्तेमाल सिर्फ अपने व्यवसायिक हितों के लिए करना चाहता है। कई राजनेता और उनके पारिवारिक सदस्य भी मीडिया संस्थानों के मालिक हैं , वो खुलेआम इनका इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए करते हैं। थोड़ा और गहराई में जाएं तो पता चलता है कि जिस मीडिया से हम सुचिता और मूल्यों की अपेक्षा कर रहे हैं, वह परोक्ष या अपरोक्ष रियल एस्टेट से लेकर ठेकेदारी, शराब, खनन और शिक्षा के कारोबार में भी लगा है।

अब बताइये, ऐसे में सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों और विश्वसनीयता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है? यही कारण है कि आज रिपोर्टिंग की अहमियत खत्म होती जा रही है, मुद्दों की पत्रकारिता हाशिये पर है। पत्रकार भी निडर रिपोर्टिंग नहीं कर पा रहे हैं। बेबाक सवालों और सार्थक बहस की जगह तो मीडिया में रह ही नहीं गयी है। इन हालात में श्रमजीवी पत्रकार होना और किसी भी मीडिया संस्थान में काम करना निसंदेह पत्रकारों के लिएबेहद जोखिम पूर्ण बना हुआ है ।

चलिए वापस मुद्दे पर लौटते हैं। मुद्दा है तस्वीर बदलने और मीडिया के प्रति विश्वास की बहाली का, जो तब तक संभव नहीं हो सकती जब तक कि पत्रकार की छवि साफ नहीं होती। देश में ईमानदार पत्रकारों की कमी नहीं है, आज भी ईमानदार पत्रकारों की संख्या ज्यादा है मगर मौजूदा हालात में कोई कैसे कहे कि वह पत्रकार है। आज देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ अपराधी, पूंजीपति व शासक वर्ग किस तरह खेल रहे हैं, यह सब जानते हैं। न बने कोई कानून मीडिया की आजादी के लिए, लेकिन नैतिक मूल्यों के लिए पत्रकारिता करने वालों की पहचान तो स्पष्ट होनी ही चाहिए। मीडिया में बेहतर माहौल के लिए एक आदर्श आचार संहिता तो बननी ही चाहिए। मीडिया और पूँजी का जो रिश्ता पत्रकारिता और पत्रकार को खोखला करने में लगा है उस पर लगाम तो लगनी ही चाहिए। यह सिर्फ पत्रकार या पत्रकारिता को बचाने के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने के लिए भी जरूरी है।

सनद रहे, मीडिया आज संदेह के घेरे में है तो इसके लिए सरकारें या मीडिया संस्थान नहीं, बल्कि पत्रकार और पत्रकारों के संगठन भी जिम्मेदार हैं। पेशागत सुचिता बनाए रखने की पहल भी पत्रकारों को ही करनी होगी। आज सोशल मीडिया के रूप न्यू-मीडिया से पत्रकारों की उम्मीदें जरूर बंधी है लेकिन सोशल मीडिया के लिए तो अभी खुद यह इम्तेहान का वक्त है। यहां पत्रकारिता एक अनुभव से गुजर रही है, भविष्य कैसा रहेगा यह कहना मुश्किल है। बहरहाल मीडिया कोई भी हो पत्रकारिता तभी बचेगी जब पत्रकार नाम की संस्था बची रहेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट की फेसबुक वॉल से)


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