प्रो. गोविंद सिंह ने बताया, पत्रकारिता की शिक्षा के लिए युवाओं की पहली पसंद क्यों है IIMC

यह एक सुखद संयोग ही है कि आज जब भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) अपने 58 वर्ष पूरे करने की जयंती मना रहा है

Last Modified:
Monday, 16 August, 2021
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प्रो. गोविंद सिंह ।।

यह एक सुखद संयोग ही है कि आज जब भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) अपने 58 वर्ष पूरे करने की जयंती मना रहा है, देश की तीन प्रमुख समाचार पत्रिकाओं (इंडिया टुडे, आउटलुक और द वीक) ने अपने वार्षिक सर्वेक्षण में इसे देश का सर्वश्रेष्ठ मीडिया शिक्षण संस्थान घोषित किया है। निश्चय ही संस्थान से जुड़े हर शिक्षक और हर छात्र के लिए यह एक हर्ष और गर्व का मौका है।

पिछले 58 वर्षों में भारतीय जन संचार संस्थान ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1965 में जब श्रीमती इंदिरा गांधी देश की सूचना प्रसारण मंत्री थीं, तब सरकार के सूचना तंत्र से जुड़े अफसरों को प्रशिक्षित करने के मकसद से इस प्रशिक्षण संस्थान को शुरू किया गया था। लेकिन आज यह संस्थान अपने शुरुआती एजेंडे से कहीं आगे बढ़ कर छः भाषाओं में पत्रकारिता के साथ ही विज्ञापन एवं जनसंपर्क, रेडियो एवं टीवी तथा विकास पत्रकारिता के पाठ्यक्रम चला रहा है, जिनमें देश भर के होनहार बच्चे शिक्षा ग्रहण कर पत्रकारिता और जनसंचार की विभिन्न दिशाओं में नाम कमा रहे हैं। यही नहीं, तमाम तीसरी दुनिया के देशों के पत्रकारों और सूचना अधिकारियों के प्रशिक्षण का दायित्व भी संस्थान बखूबी निभा रहा है। केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालयों, सेनाओं, पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के जनसंपर्क अधिकारियों या इस काम के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के संक्षिप्त प्रशिक्षण भी संस्थान करवाता है। देश की राजधानी दिल्ली के अलावा, महाराष्ट्र के अमरावती, ओडिशा के ढेंकनाल, केरल के कोट्टायम, जम्मू-कश्मीर के जम्मू और मिजोरम के आइजोल में भी इसके केंद्र हैं, ताकि दूर-दराज के बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षण-प्रशिक्षण का लाभ उठा सकें।

आखिर क्या वजह है कि आईआईएमसी पिछले अनेक वर्षों से पत्रकारिता शिक्षा ग्रहण करने के आकांक्षी युवाओं की पहली पसंद बना हुआ है? हालांकि इसके कई कारण हैं, लेकिन मुझे लगता है कि आईआईएमसी ने शुरू से अपनी भूमिका को बखूबी समझा है। उसने अपने 11 महीने के पाठ्यक्रम में सिद्धांत और व्यावहारिक प्रशिक्षण का बेहतरीन घोल तैयार किया है। उसने अपने शिक्षण का स्पष्ट लक्ष्य मीडिया उद्योग की जरूरतों को रखा है। इसलिए यहां के शिक्षकों में पारंपरिक तरीके से दीक्षित भी हैं, तो बड़ी संख्या में उद्योग से आये हुए लोग भी हैं। ज्यादातर व्यावहारिक ज्ञान मीडिया उद्योग में काम कर रहे नामी लोगों द्वारा दिया जाता है। दिल्ली में होने का एक बड़ा फायदा भी संस्थान को मिलता है, जहां हर विषय के व्यावहारिक विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। आम तौर पर मीडिया जगत की जो शिकायत मीडिया शिक्षण देने वाले विश्वविद्यालयों और संस्थानों से रहती है कि वे सिद्धांत की घुट्टी पिला कर विद्यार्थियों को नौकरी के लिए भेज तो देते हैं, लेकिन उन्हें आता कुछ नहीं। सौभाग्य से उन्हें यह शिकायत आईआईएमसी से नहीं रहती। इसीलिए साल खत्म होते-होते प्लेसमेंट के लिए मीडिया कंपनियों की पहली पसंद भी आईआईएमसी बनता है। हालांकि आईआईएमसी हर विद्यार्थी को प्लेसमेंट की गारंटी नहीं देता, लेकिन नौकरी तलाशने में वह छात्रों की मदद जरूर करता है। कोविड महामारी के इस दौर में भी पाठ्यक्रम समाप्त होते-होते लगभग 40 प्रतिशत छात्र नौकरी प्राप्त कर चुके हैं।  

आईआईएमसी की छवि बनाने में संस्थान के पूर्व छात्रों यानी अलुमनाई के मजबूत नेटवर्क की भी कम भूमिका नहीं है। न सिर्फ सरकारके सूचना तंत्र में वे देश भर में फैले हुए हैं, बल्कि तमाम अखबारों, टीवी चैनलों, विज्ञापन एजेंसियों, पीआर कंपनियों और फिल्म जगत में भी वे छाये हुए हैं। मीडिया जगत में आईआईएमसी की यह उपस्थिति छात्रों में एक अतिरिक्त आत्मविश्वास भरती है।

पिछले एक वर्ष के कोविड काल में जब शिक्षा व्यवस्था को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, आईआईएमसी हर मौके पर छात्रों के साथ खड़ा रहा है। संस्थान ने अधिक से अधिक मीडिया उद्योग के विशेषज्ञों को वर्चुअल माध्यम से जोड़ कर विद्यार्थियों को भरपूर एक्सपोजर देने की कोशिश की है। सबसे अच्छी बात यह रही कि चाहे अमरावती के बच्चे हों या कोट्टायम के, आइजोल के हों या जम्मू के, सबको एक ही आभासी लेक्चर सुनने को मिला। व्यावहारिक अभ्यास भी आभासी तरीके से करवाया गया। बच्चों ने ऑनलाइन अखबार निकाले, पत्रिकाओं के विशेषांक निकाले, विज्ञापन के कैंपेन तैयार किये और रेडियो और टीवी के कार्यक्रम बनाए। पिछले एक साल में हर शुक्रवार को किसी न किसी प्रख्यात व्यक्ति का ऑनलाइन व्याख्यान करवाया गया और मीडिया और मीडिया शिक्षा से जुड़े प्रश्नों पर बड़ी संगोष्ठियां भी आयोजित हुईं।

संस्थान के पास हर विभाग की जरूरतों को देखते हुए प्रयोगशालाएं हैं, स्टूडियो है, ‘अपना रेडियो’  नाम का कम्युनिटी रेडियो स्टेशन है, जहां विद्यार्थी लाइव प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। खुद कार्यक्रम बनाते हैं और प्रसारित करते हैं। इसी तरह से मीडिया की तमाम विधाओं को समर्पित समृद्ध पुस्तकालय है, जहां विद्यार्थी ज्ञानार्जन करते हैं। यद्यपि अभी संस्थान सिर्फ एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा ही देता है, फिर भी यहां उम्दा कोटि का शोध होता है। सरकार के तमाम विभाग अपनी जरूरतों से संबंधित शोध भी संस्थान से करवाते हैं।

मुझे लगता है कि आईआईएमसी में आने वाले छात्रों का उल्लेख किये बिना यह विवरण अधूरा समझा जाएगा। चूंकि संस्थान में प्रवेश एक अखिल भारतीय परीक्षा के जरिये होता है, जो बेहद पारदर्शी और उच्च स्तरीय होता है। इसलिए परीक्षा में भाग लेने वाले सौ बच्चों में से मुश्किल से पांच का चयन हो पाता है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि यहां आने वाले युवा सामाजिक सरोकारों के प्रति बेहद जागरूक रहे हैं। इसलिए जब उन्हें सकारात्मक वातावरण मिलता है तो वे अपनी प्रतिभा को और भी बेहतरी के साथ निखारते हैं। यही वजह है कि आईआईएमसी पिछले अनेक वर्षों से मीडिया छात्रों की पहली पसंद बना हुआ है। आईआईएमसी अपने स्थापना दिवस पर अपने तमाम पुरा-छात्रों, अध्यापकों और नए छात्रों के प्रति आभार व्यक्त करता है।

लेखक भारतीय जन संचार संस्थान के डीन (अकादमिक) हैं।

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हिंदी को व्यावसायिक बनाती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 December, 2021
Last Modified:
Friday, 03 December, 2021
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आलोक राजा

एक धारणा के मुताबिक अंग्रेजी को ही व्यवसाय की भाषा कहा जाता है। वैश्वीकरण के दौर में जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने व्यवसाय को विस्तार दिया है, वहीं अंग्रेजी की महत्वता को और अधिक बल मिला है। परन्तु हमारे देश की अर्थव्यवस्था में एंटरटेनमेंट और मीडिया ने हिंदी को नई दिशा देकर व्यापारिक बनाने में खासी भूमिका अदा की है। हिंदी को किताबी साहित्य से बाहर निकालकर उसे बाजार की भाषा बनाने में अगर सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है।

यह सवाल हिंदी साहित्यकारों एवं लेखकों के बीच में काफी चर्चित रहता है कि क्यों हिंदी के पाठकों में बढ़ोत्तरी अंग्रेजी के पाठकों की तरह नहीं होती है? लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जहां एक तरफ हिंदी भाषा को सरल, सहज एवं आम-जन की भाषा बनाकर परोसा है, वहीँ दूसरी तरफ लोगों को हिंदी पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में हिंदी की दुनिया को दुनिया के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में भी मदद मिली है। हिंदी धारावाहिक, हिंदी फिल्मों और हिंदी की किताबों को चर्चित करने के लिए भी आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मार्केटिंग इफैक्ट को हम इस तरह समझ सकते हैं कि बॉलीवुड की फिल्में भी बड़े पर्दे पर उतरने से पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्रमोशन करती हैं।

विदित है कि कोई भाषा केवल उसी स्थिति में विस्तार प्राप्त कर पाती है जब उसे व्यावसायिक बनाया जा सके और जब उस भाषा में रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें। अगर किसी भाषा में आर्थिक गतिविधि कर पाना संभव न हो तो ऐसी भाषा सिर्फ एक संकुल तक सिमट कर ही रह जाती है और सिर्फ भावनाओं के सम्प्रेषण तक ही उसे सीमित रह जाना पड़ता है। आज जब हम संस्कृत भाषा की बात करते हैं तो भले ही संस्कृत को संस्कृति की भाषा कहा जाता हो लेकिन व्यवसायीकरण के दौर में संस्कृत आमजन की भाषा नहीं बन पायी है जिसका बहुत बड़ा कारण इसका व्यावसायिक न हो पाना है।

वहीँ अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओँ को विश्व में खासी अहमियत मिली है क्योंकि ये भाषाएं आर्थिक रूप से संपन्न देशों की भाषाएं हैं। लेकिन हिंदी को व्यवसाय की भाषा बना पाना संभव है। जिस तरह आज मीडिया में हिंदी का प्रयोग किया जाता है और उसे चमक दमक वाली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है उससे वह बाजार की भाषा बनने में काफी हद तक सफल हुई है। हिंदी के साहित्यकार ऐसा मानते हों कि आधुनिक हिंदी को बाजार ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस तथ्य में भले ही सच्चाई हो, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि बहु-भाषीय देश भारत में किसी भी क्लिष्ट भाषा को बाजार की भाषा नहीं बनाया जा सकता है। बाजार की भाषा बनाने के लिए भाषा का सहज, सरल और आम होना बेहद जरूरी होता है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी को आम व सरल रूप में प्रस्तुत किया है।

इसी का ही परिणाम है की आज बड़े अंग्रेजी के चैनल भी अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए हिंदी में उतर रहे हैं। यहां तक कि हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी में डब किया जाने लगा है। हमारे देश में हिंदी को विस्तार इस कदर मिल चुका है कि राजनीति की भाषा के रूप में हिंदी अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के पत्रकारों को रेमैन मेग्सेसे अवॉर्ड भी मिलने लगे हैं। यानि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस योगदान को सराहा जाना चाहिए की इसने हिंदी के व्यावसायिक रूप को गढ़ने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई है।

(लेखक, ‘भारत समाचार’ न्यूज चैनल में सीनियर एंकर के तौर पर कार्यरत हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

 

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यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

संसद में पत्रकारों के एक बड़े वर्ग को अपना कर्तव्य निभाने से रोक दिया गया है। प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और पत्रकारों के संगठन इससे खफा हैं।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 02 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 02 December, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

संसद में पत्रकारों के एक बड़े वर्ग को अपना कर्तव्य निभाने से रोक दिया गया है। प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और पत्रकारों के संगठन इससे खफा हैं। ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया‘ ने दो दिसंबर को दिन में एक बजे संसद भवन तक जाकर विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है। इसमें ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया‘,‘प्रेस एसोसिएशन‘,‘दिल्ली पत्रकार संघ‘,‘इंडियन वीमेन प्रेस कोर‘ और ‘वर्किंग न्यूज कैमरामैन एसोसिएशन‘ जैसे अनेक संगठन पहली बार एकजुट होकर संयुक्त विरोध के लिए मजबूर हुए हैं। संसद के इतिहास में यह पहली बार है, जब पत्रकारों पर इस तरह पाबंदी लगाई गई है।

‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया‘ के अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा का स्पष्ट आरोप है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों और पत्रकारों के बीच संपर्क-संवाद तोड़ने की साजिश की जा रही है। यह एक किस्म से अघोषित सेंसरशिप है। पिछले सात साल से सरकार का रवैया पत्रकार विरोधी है। कमोबेश ऐसी ही राय राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता खड़गे ने सभापति एम वेंकैया नायडू को लिखे अपने पत्र में प्रकट की है। उन्होंने कहा है कि स्थायी पास वाले पत्रकारों तक को दीर्घा में जाने से रोक दिया गया है। सेट्रल हॉल तथा पुस्तकालय जाकर सांसदों से मिलने और उनसे बात करने पर रोक लगा दी गई है। ऐसा तो कभी नहीं हुआ। कोविड प्रोटोकॉल के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी रोकने की साजिश है।   

यह ठीक है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में पत्रकारों को अलग से विशेषाधिकार नहीं है, लेकिन हमारा संवैधानिक लोकतंत्र  सर्वोच्च पदों को भी यह अधिकार नहीं देता कि वह संसद जैसी सर्वोच्च पंचाट की रिपोर्टिंग से बेवजह संवाददाताओं को रोक दे। चाहे वह लोक सभा अध्यक्ष हो या राज्य सभा का सभापति। दोनों पद नियमों और संसदीय प्रक्रियाओं से बंधे हैं। वे मनमर्जी से निर्णय नहीं ले सकते। इसलिए पत्रकारों को अपने कर्तव्य से रोकने के आदेश पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

संसद के पचास बरस पूरे होने पर एक दुर्लभ शोधपरक दस्तावेज तैयार किया गया था। इस दस्तावेज के पृष्ठ 625 से 631 के बीच स्वयं वेंकैया नायडू ने पत्रकारिता और संसद के बेहतर रिश्तों की वकालत की है। यहां उनके कुछ कथन प्रस्तुत हैं-प्रेस के माध्यम से जनता को संसद के घटनाक्रम के बारे में जानकारी मिलती है, इसलिए इसे कभी-कभी संसद का विस्तार भी कहा जाता है। यदि मीडिया संसद अथवा सरकार के साथ निकट के संबंध स्थापित कर लेता है तो वह प्रत्येक घटना की सच्ची और यथार्थ सूचना देने के अपने दायित्व का निर्वहन नहीं कर सकता। प्रेस और मीडिया पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के समान है। इसके अतिरिक्त प्रेस के क्रियाकलापों को किसी भी तरह के संहिताबद्ध नियम-विनयमों में बांधने के दुष्परिणाम होंगे। प्रेस पर किसी भी प्रकार का अंकुश लगाने से कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिलने वाला है। भारत का राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया अपने उत्तरदायित्वों को पूरी जिम्मेदारी और सावधानी से निभा रहा है।

यह अजीब विरोधाभास है कि सभापति के रूप में वेंकैया नायडू मीडिया के मामले में कठोरता का परिचय देते हैं और उसी संसद के दस्तावेज में उलट विचार प्रकट करते हैं। इसी तरह लोकसभा अध्यक्ष भी बहुत सकारात्मक नहीं दिखाई देते। यह स्थिति पत्रकारों के लिए खतरे की घंटी है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

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यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 23 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 23 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अजीब सा नजारा था। अरसे बाद या शायद पहली बार मीडिया के अनेक अवतार पिछले दिनों इस तरह विलाप करते दिखाई दिए। जब केंद्र सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया तो भारतीय पत्रकारिता का यह नया रूप सामने आया। वैसे तो सारे मुल्क ने और कई देशों में बसे हिंदुस्तानियों ने हुकूमत के इस फैसले पर राहत की सांस ली थी। इसका कारण भी था। साल भर से आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार का संवाद टूटा हुआ था। सैकड़ों किसानों की जान जा चुकी थी और कृषि आधारित उद्योगों की कमर टूट गई थी। किसी की दृष्टि में इसकी वजह सरकार की हठधर्मिता थी तो एक वर्ग ऐसा भी था, जो अन्नदाताओं  को कोस रहा था। लोकतंत्र में किसी को अपनी बात रखने से रोका नहीं जा सकता। आप आंदोलनकारियों से असहमत हो सकते हैं, मगर उन्हें अलगाववादी, उग्रवादी, राष्ट्रद्रोही और हिंसक प्रवृत्ति का ठहराकर उनकी देशभक्ति को चुनौती नहीं दे सकते। खासतौर पर उस हाल में, जब किसानों के तमाम मान्यता प्राप्त संगठन गांधीवादी तरीके से अपना संघर्ष छेड़े हुए थे। उनके आंदोलन को कई बार हिंसक रूप देने की कोशिशें की गईं, लेकिन उन्होंने अपना धीरज और संयम नहीं खोया।

ऐसे में घटनाक्रम की निरपेक्ष रिपोर्टिंग करने के बजाय पत्रकारिता का एक बड़ा धड़ा सरकार को ही कोसने लगा, मानों उसने कोई जघन्य पाप कर दिया हो। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री अचानक इस धड़े के लिए खलनायक बन गए। उसे कृषि कानूनों की चिंता नहीं थी, बल्कि लंबे समय से वे जो प्रशंसा गीत गा रहे थे, अचानक उनकी धुन बेसुरी हो जाने से ज्यादा दुखी थे। वे अपनी अवधारणा गलत साबित होने से भी परेशान थे, जिसके चलते वे सरकार के इस कदम का स्तुतिगान कर रहे थे। करीब साल भर से पत्रकारों के इस वर्ग ने किसानों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। यह वर्ग नाना प्रकार से खेती-किसानी के बारे में अजीबोगरीब कुतर्क गढ़ रहा था और कृषि कानूनों को जायज ठहराने का प्रयास करता रहा था। संसदीय पराक्रम से इन कानूनों को पारित किया गया था। वह प्रक्रिया यकीनन लोकतांत्रिक नहीं थी, पर माध्यमों के इन पैरोकारों को उसमें भी कोई दोष नजर नहीं आया । पत्रकारिता में संतुलन की भावना का विलोप होना इस कालखंड पर एक काला धब्बा है।

सरकार एक सियासी संस्था है, जो देश के लिए काम करती है, मगर अपना राजनीतिक चरित्र नहीं भूलती। जब उसने देखा कि उत्तरप्रदेश में उसकी राज्य सत्ता की चूलें हिलने लगी हैं और आने वाले विधानसभा चुनाव में उसे पराजय का सामना करना पड़ सकता है तो उसने यू टर्न लेने से कोई गुरेज नही किया। सरकार ने तो गिरगिट की तरह रंग बदल लिया, पर जो शब्द बिरादरी सरकारी रंग में रंगी हुई थी, इस विकट हाल में वह क्या करती? जाहिर है उसके लिए मुंह छिपाना भी मुश्किल हो गया। नहीं कहा जा सकता कि उसने किसान आंदोलन का जंग की हद तक जाकर विरोध क्यों किया। वह सरकार के दबाव में थी अथवा मैनेजमेंट के, वह सरकारी प्रतिष्ठानों से उपकृत थी या फिर किसी के इशारे पर काम कर रही थी।

हो सकता है उसके अपने निजी हित भी इस भूमिका के पीछे छिपे हुए हों। कई बार देखा गया है कि तमाम पत्रकार सम्मानों, राजनीतिक पदों के लालच या अन्य आर्थिक प्रलोभन में भी ऐसी भूमिका निभाते हैं। यानी कुछ न कुछ तो था, जिसके कारण उसने पत्रकारिता की निष्पक्षता और संतुलन की सीमा रेखा पार करने का काम किया। इससे समूची पत्रकारिता की किरकिरी हुई। बेजोड़ संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ती इस प्रवृति के खिलाफ थे। उनका कहना था कि संपादक के अपने या किसी अन्य के हित निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रभावित करते हैं। स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता के इन पूर्वजों ने यदि संतुलन बिंदु पर टिके रहने के सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं, तो उनके पीछे यही मंशा रही होगी कि आखिर इस पाक पेशे को नापाक होने से बचाए रखा जाए, लेकिन उनका पालन नहीं हुआ। जब उल्लंघन हुआ तो सारी बिरादरी बदनाम हो गई। साख दांव पर लग गई। नहीं भूलना चाहिए कि इस आंदोलन में एक दौर ऐसा भी आया था, जब कुछ संवाददाताओं और एंकरों को हड़ताली कृषकों ने कवरेज करने में सहयोग से इनकार कर दिया था । यदि आंदोलन की कवरेज कर रहे ऐसे पत्रकारों की नीयत साफ होती तो वैसे अप्रिय दृश्य देखने को नहीं मिलते।

वैसे भी बाजार तथा अन्य दबावों के चलते इन दिनों भारतीय पत्रकारिता अपनी साख के संक्रमण काल से गुजर रही है। दशकों तक बेहतरीन पत्रकारिता के नमूने प्रस्तुत करके उसने वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा कमाई थी। लेकिन हालिया दौर ने उसे चोट पहुंचाई है। टेलिविजन पत्रकारिता खासतौर पर इस बिगड़ती स्थिति के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है। उसे समझना होगा कि आज का दर्शक पच्चीस-तीस बरस पहले का दर्शक नहीं है। वह जागरूक है और जब पत्रकार परदे पर संतुलन की मर्यादा लांघता है तो वह छिपता नहीं है। समाचार पत्र के बारे में राय बनाने के लिए तो उसका पढ़ा-लिखा होना जरूरी है, मगर टेलिविजन समाचार देखकर तो कम पढ़ा-लिखा या एकदम अनपढ़ दर्शक भी अपनी राय बना लेता है। उसे चैनल बदलने में एक सेकंड भी नहीं लगता। यह गंभीर सच परदे पर पत्रकारिता करने वालों को समझना पड़ेगा। क्या यह खतरे की घंटी नहीं है कि नौजवान पीढ़ी टेलिविजन पर खबरें देखने से करीब करीब किनारा कर चुकी है मिस्टर मीडिया!   

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

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कंटेंट के मामले में चैनलों व अखबारों को सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है मिस्टर मीडिया

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 16 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 16 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हमारे देश की एक सम्मानित महिला ने एक टीवी चैनल पर कहा कि देश को आजादी भीख में मिली है। असली स्वतंत्रता तो 2014 के बाद मिली है। जब इसकी तीखी और व्यापक आलोचना हुई तो उन्होंने खेद प्रकट करना तो दूर, उल्टा यह कहा कि उस साल तो कोई युद्ध ही नहीं हुआ था तो आजादी कैसे मिली? इस मानसिक दिवालिएपन पर कोई टिप्पणी ही व्यर्थ है। मेरा सरोकार तो उस चैनल और उसकी विद्वान एंकर के विवेक तथा सामजिक-राष्ट्रीय जिम्मेदारी पर उनकी असंवेदनशीलता को लेकर है। आम तौर पर पत्रकारिता के काम में बुनियादी शिक्षा यह होती है कि आप पहले राष्ट्र की चिंता करिए, उसके बाद अपने कारोबार या व्यवसाय की। जब पद्म सम्मान से अलंकृत कोई व्यक्तित्व खुलेआम देश के लिए नुकसानदेह कथन बार-बार दोहराता हो तो चैनल के एंकर, उसके संपादक और प्रबंधक को तत्काल उस शो को ऑफ एयर करने का विवेक क्यों नहीं जागा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हम समर्थन करते हैं लेकिन उसके नाम पर स्वच्छंदता, उच्श्रृंखलता और अराजकता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

विडंबना तो यह है कि इस झूठ को दबंगी के साथ फैलाने के बाद लोकतंत्र के कमोबेश सारे प्रतीकों की खामोशी रहस्यमय है। एक अपात्र से पद्म सम्मान वापस लेने का साहस भी नहीं दिखाया गया। एक अभिनेता के बेटे के ड्रग मामले पर दिन रात भौंपू की तरह शोर करने वाले चैनलों को एक अभिनेत्री के एक ऐतिहासिक तथ्य के बारे में अपराध की हद को छूने वाला कुकृत्य नहीं दिखाई दिया और न ही कोई संगठन या पत्रकारिता के हितैषी महापुरुष सामने आए। शास्त्रीय बहस छेड़नी हो तो अनेक तर्क दिए जा सकते हैं। यदि आजादी भीख में मिली थी तो यह देश सरकारी स्तर पर 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव क्यों मना रहा है? बीजेपी के पितृपुरुष जैसा स्थान प्राप्त श्यामाप्रसाद मुखर्जी भारत की पहली राष्ट्रीय सरकार में क्यों शामिल हुए? यदि यह आजादी भीख में मिली तो भीख पच्चीस या पचास बरस पहले क्यों नहीं मांग ली गई?

सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे अवतार पुरुषों की कुर्बानियां बच जातीं। जलियांवाला बाग नरसंहार नहीं होता। भीख मांग लेते तो कामागाटामारू जहाज जैसा हादसा नहीं होता और कनाडा जैसा देश हिन्दुस्तान से सौ साल बाद माफी नहीं मांगता। और तो और भीख के प्रताप से मुल्क का बंटवारा भी टल जाता।

दरअसल कुछ गलती भारतीय समाज की भी है, जो मीडिया के ऐसे ब्लंडर्स पर चुप्पी साधे रहता है। टीवी चैनल और अखबार उपभोक्ता उत्पाद हैं। यदि भारत का उपभोक्ता फफूंद लगी ब्रेड बेचने के खिलाफ कोर्ट जा सकता है तो चैनलों, पोर्टलों और समाचार पत्रों के खिलाफ दूषित सामग्री परोसने पर न्यायालय की शरण लेने में देरी क्यों होनी चाहिए? इसके लिए एक जबरदस्त राष्ट्रीय उपभोक्ता आंदोलन की जरूरत है, जिस पर महान संपादक राजेंद्र माथुर जोर दिया करते थे। आज यह आंदोलन वक्त की मांग है। यदि चैनल और समाचारपत्र इस आंदोलन का सामना नहीं करना चाहते तो उन्हें कंटेंट के बारे में बेहद सतर्क और संवेदनशील होने की आवश्यकता है। मुद्रित और दृश्य माध्यमों के प्रतिनिधि संगठनों को भी इसकी जवाबदेही लेनी पड़ेगी।

चंद रोज पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों का चुनाव हुआ है। सीमा मुस्तफा और उनकी टीम ने दूसरी पारी शुरू कर दी है। इस सर्वोच्च शिखर संस्था को समाचारपत्रों और टीवी चैनलों पर इस संबंध में कारगर कदम उठाने का दबाव डालना चाहिए। अनेक समाचार पत्रों और चैनलों के संपादक इस शीर्ष संस्था के सदस्य हैं और वे किसी आभूषण की तरह सजावट की वस्तु नहीं हैं। उन्हें एक्शन लेना ही होगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो फिर दो चार पीढ़ियों के बाद इस नेक व्यवसाय की बची खुची छवि भी मिट्टी में मिल जाएगी मिस्टर मीडिया!  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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सियासत में गलत फैसलों की भरपाई नहीं होती: राजेश बादल

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 09 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 09 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सियासत की भी अपनी मनोवैज्ञानिक समझ होती है। यह कला प्रत्येक राजनेता को यूं ही हासिल नहीं होती। वर्षो की कठिन साधना के बाद ही यह हुनर प्राप्त होता है। लाखों में कोई एकाध बिरला ही होता है, जो वक्त की चाल समझ पाता है। चोटी पर बैठे लीडरों के लिए तो यह और भी कठिन है। ऐसे शिखर पुरुष अपने निर्णयों को हमेशा सही मानते रहते हैं। 

सियासत के सफर में उन्हें कई फैसले लेने पड़ते हैं। लेकिन उनमें से कोई एक कब हानिकारक हो जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। इनमें कुछ तो उसके अपने हित साधने के लिए भी होते हैं। कभी-कभी उसका अहसास राजनेता को हो जाता है, पर उसके दंभ या अहं के कारण वे बने रहते हैं। कुछ निर्णयों से हो रही क्षति की भरपाई के लिए वह कुछ कदम उठाता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 

इस मामले में उसकी अपनी गलती तो होती ही है, सरकार में बैठे उसके सहयोगी और नौकरशाह भी सच से उसका संवाद नहीं कराते। वे सोचते हैं कि किसी फैसले में दोष निकालने से उनकी कुर्सी या करियर ही कहीं दांव पर न लग जाए। मौजूदा कालखंड इस मायने में रीढ़विहीन कहा जा सकता है।

हाल ही में पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती का निर्णय कुछ ऐसा ही है। यह फैसला लेने में सरकार से विलंब हुआ लेकिन जिस तरह से लगातार कीमतें बढ़ाई गईं, उनके पीछे कोई ठोस आधार नहीं था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल के मूल्य गिर रहे थे, तब भी भारत में डीजल-पेट्रोल के मूल्य आसमान छू रहे थे। 

एक तरफ केंद्र सरकार दावा कर रही थी कि आर्थिक रफ्तार कुलांचे भर रही है, तो दूसरी ओर डायन महंगाई ने अवाम का जीना मुहाल कर दिया था। यदि देश संकट में होता, जंग हो रही होती, कोई दैवीय आपदा आई होती तो लगातार कीमतें बढ़ाने का वाजिब कारण समझ में आता। कोरोना के असाधारण आक्रमण काल को छोड़ दें तो लगातार मूल्यों में इजाफे की वजह समझ से परे है। 

विडंबना यह है कि डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ने से रोजमर्रा की जिंदगी में उपभोक्ता वस्तुओं के दाम भी लोगों को रुलाते हैं। दूध, सब्जी, किराना, यातायात किराया, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाएं, आवास और औद्योगिक उत्पादन सब महंगा हो जाता है। इस हिसाब से व्यवस्था-नियंताओं से बड़ी चूक हुई। 

एक जमाने में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अन्न संकट के मद्देनजर हिन्दुस्तान से प्रार्थना की थी कि वह एक समय ही भोजन करें तो करोड़ों लोगों ने एक जून का खाना छोड़ दिया था। विकट हालात में जनता भी सरकार को सहयोग करती है।

कमोबेश ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन के बारे में है। अफसोस यह है कि लीडरान अपनी राजनीतिक पारी में ढेरों अनुचित और अनैतिक निर्णय लेते हैं मगर किसी अहं या छिपे हित के चलते सही फैसले को ताक में रख देते हैं। किसानों का आंदोलन इसी जिद का शिकार हुआ है। 

सरकार समझने को तैयार नहीं है कि वह जिस डाल पर बैठी है, उसी को काटने पर उतारू है। वक्त गुजरने के बाद गलती दुरुस्त करने का लाभ नहीं मिलता। जनता सब समझती है पर बोलती नहीं। उसके बोलने का वक्त मुकर्रर है, उसी समय वह न्यायाधीश की भूमिका निभाती है।

आजादी के बाद इतिहास में ऐसे अनेक साक्ष्य मौजूद हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया। उस दरम्यान महंगाई काबू में आ गई थी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगी थी। सरकारी कार्यालयों में बिना घूस काम होने लगे थे। हम लोगों ने पत्रकारिता दायित्व निभाते हुए यह दौर देखा है। विनोबा भावे जैसे संत ने यदि उसे अनुशासन पर्व कहा तो उसके पीछे यही कारण थे। 

इसके बाद भी आपातकाल के निर्णय का नुकसान इंदिरा गांधी को उठाना पड़ा। उस समय उनके सलाहकार तथा नौकरशाह रिपोर्ट देते रहे कि वे चुनाव जीत रही हैं। हालांकि खुद इंदिरा गांधी को अंदेशा था कि उनसे बड़ी भूल हुई है इसलिए उन्होंने भरपाई के लिए आम जनता से माफी भी मांगी थी और कुछ निर्णयों को ठीक करने का प्रयास किया था लेकिन तब तक काफी समय निकल चुका था। 

उन्होंने 18 जनवरी 1977 को राष्ट्र के नाम संदेश में इशारा भी किया था। वे उस दिन सफाई देने की मुद्रा में थीं पर अवाम ने 1977 के चुनाव में उन्हें सत्ता छोड़ने का आदेश दिया और इंदिरा गांधी के सारे अच्छे काम भुला दिए। इस पराक्रमी नेत्री को पटखनी देते समय मुल्क को याद नहीं रहा कि उस महिला ने देश को अनाज संकट से उबार कर हरित क्रांति की थी। देश में श्वेत क्रांति की थी और दूध उत्पादन में रिकॉर्ड कायम किया था, हिन्दुस्तान को परमाणु शक्ति बनाया था और अंतरिक्ष में किसी भारतीय ने अपने कदम उनके कार्यकाल में ही रखे थे। 

यही नहीं, बांग्लादेश को आजाद कराकर भारत को एक सीमा से स्थायी खतरे से मुक्ति दिलाई थी और सिक्किम नामक देश को भारत में शामिल करके अपना राज्य बनाया था, जो चीन के लिए करारा तमाचा था।

पंजाब में आतंकवाद का करीब-करीब खात्मा उनके जमाने में ही हो गया था। वास्तव में भारत महाशक्ति के रूप में विश्व मंच पर अवतरित हुआ तो इंदिरा गांधी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। मगर भारतीय मतदाता ने उन्हें उस अपराध के लिए दंडित किया, जिससे उसका अपना जीवन आसान बना था। 

एक खराब फैसला बहुत से अच्छे कार्यो पर पानी फेर देता है, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी से बेहतर कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। जिस तरह इंसान अपनी जिंदगी में कोई अवसर खोकर दोबारा नहीं पाता, उसी तरह सियासत में भी अवसर निकल जाने के बाद हितकारी और कल्याणकारी निर्णय कोई काम नहीं आते।

(साभार: लोकमत)

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मिस्टर मीडिया: यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस पेशे में दाखिल हो गया है

आर्यन प्रसंग बीते दिनों मीडिया में छाया रहा। बॉलीवुड के एक सुपरस्टार का बेटा होने के कारण अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों के तमाम रूपों में खबर तो बननी थी।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 03 November, 2021
Last Modified:
Wednesday, 03 November, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

आर्यन प्रसंग बीते दिनों मीडिया में छाया रहा। बॉलीवुड के एक सुपरस्टार का बेटा होने के कारण अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल माध्यमों के तमाम रूपों में खबर तो बननी थी। लेकिन जिस अंदाज में टेलिविजन के खबरिया चैनलों ने इसे तूल दिया, वह टीवी पत्रकारिता के इतिहास में कालिख भरा एक अध्याय और जोड़ गया। दर्शक अघा गए। करीब करीब डेढ़ सौ करोड़ की आबादी पर पहुंच रहे मुल्क के अपने सारे सरोकार इस एक घटना की बलि चढ़ गए। यह कैसा मानसिक दिवालियापन हमारे इस जिम्मेदार पेशे में दाखिल हो गया है? हम सारी दुनिया के लिए निजता और मानव अधिकारों की वकालत करते हैं मगर इस मामले में सारी हदें पार कर करके कौन सा तीर मार लिया?

कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारिता की गिरती विश्वसनीयता और अधकचरे पेशेवर व्यवहार पर मैंने इस स्तंभ में कई बार चिंता प्रकट की है। हमने वह दौर भी देखा है, जब किसी अखबार और उसका संपादक इस बात से अवसाद में चले जाते थे कि प्रेस कौंसिल ने उनके समाचारपत्र की निंदा की है। वे भरसक यह प्रयास करते थे कि उनके पत्र में कोई गलत या पूर्वाग्रही खबर न छप जाए, जिससे इस सर्वोच्च संस्था को आलोचना करने का कोई अवसर मिले। आज स्थिति उलट है-भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय वाले अंदाज में पत्रकार बिरादरी काम कर रही है। कोई कितनी भी निंदा करे, हम नहीं सुधरेंगे।

जब कोई संस्थान अपने कामकाज पर सवाल उठाया जाना पसंद नहीं करता या आत्ममुग्ध शैली में व्यवहार करता है तो वह संस्थागत तानाशाही की श्रेणी में आता है। क्या भारतीय पत्रकारिता अब अपने ही समाज पर तानाशाही के घुड़सवारों को लेकर चढ़ाई करने पर उतारू है? यह स्थिति आने वाले दिनों के लिए खतरे की घंटी है। पत्रकारिता के लिए ही नहीं, देश और समाज के लिए भी। महान संपादक राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि आदमी के यश का मर जाना उसके अपने मर जाने से कहीं अधिक दुखदायी है। कोई भी अपना मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का मर जाना पसंद नहीं करेगा। इस दृष्टिकोण से भारतीय मीडिया अपने यश को धीरे धीरे मरता देख रहा है।

इन हालातों में सर्वाधिक गंभीर चुनौती मीडिया के प्रशिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के सामने है। वे कैसे प्रोफेशनल तैयार कर रहे हैं। उनके पाठ्यक्रमों और उनमे पढ़ाए जाने वाले मूल्यों तथा सरोकारों पर सवाल खड़ा हो रहा है। वे भारी भरकम फ़ीस लेकर पत्रकारों की फसल तैयार कर रहे हैं, लेकिन वह अधकचरी है। मीडिया अध्यापन और शिक्षण के साथ अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इस क्षेत्र में काम कर रहे संस्थान डिग्री तो बांट रहे हैं, मगर उन्हें दक्ष पेशेवरों की जमात को जन्म देने की ललक नहीं है। यदि ऐसा हो गया है तो फिर मीडिया शिक्षण संस्थान उस दौर में अपनी मृत्यु को निमंत्रण दे रहे हैं, जब उनकी वास्तव में जरूरत है। इसके अलावा ख़बरिया चैनलों के संचालकों को अपने कंटेंट के बारे में बेहद गंभीर होना पड़ेगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो किस दिन उनके दर्शक ग़ायब हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा। नौजवान दर्शक पीढ़ी तो वैसे भी इन दिनों टीवी पत्रकारिता से तौबा कर चुकी है। वह अब मोबाइल पर जानकारियों की अपनी भूख सूचना के अन्य माध्यमों पर मिटा रही है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

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इंदिरा गांधी की हत्या से एक सप्ताह पहले वह आखिरी मुलाकात: राजेश बादल

उन दिनों मैं इंदौर की नई दुनिया में सह संपादक था। उन्नीस सौ चौरासी का साल था। एक दिन संपादक जी ने बुलाया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 01 November, 2021
Last Modified:
Monday, 01 November, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

उन दिनों मैं इंदौर की नई दुनिया में सह संपादक था। उन्नीस सौ चौरासी का साल था। एक दिन संपादक जी ने बुलाया। बोले, तेईस अक्टूबर को इंदिरा गांधी की सभा भीकनगांव में है। आपको कवर करना है। पहले प्रधानमंत्री की कोई सभा कवरेज की है क्या? मैंने बताया कि बतौर प्रधानमंत्री 1977 में छतरपुर जिले में प्रधानमंत्री रहते हुए और 1979-80 में विपक्ष में रहते हुए कुल तीन बार उनकी रैली कवर की है और उनसे छोटे छोटे साक्षात्कार भी लिए हैं। मुझे वे पहचानती भी हैं। बताने की जरूरत नहीं कि मुझे भीकन गांव एक दिन पहले पहुंचने का निर्देश दे दिया गया। खरगोन जिले में ‘नईदुनिया’ के फोटोग्राफर को ही चित्र कवरेज के लिए कहा गया था। मुझे उसी दिन खबर और कैमरे की रील लेकर वापस पहुंचने का निर्देश था।

मैंने संपादक जी को बताया था कि 1977 में खजुराहो के विश्रामगृह में चार पांच मिनट का एक छोटा सा साक्षात्कार लिया था। उस दिन वे किसी पत्रकार को समय नहीं दे रही थीं। मैंने भी दो बार पर्ची भेजी थी। तीसरी बार मैंने अपने नाना जी के नाम का उल्लेख करते हुए पर्ची भेजी। नानाजी स्वतंत्रता सेनानी थे और बचपन में उन्होंने बताया था कि इंदिरा जी को अपनी गोद में खिलाया था। मैंने उन्हीं का नाम अपने नाम के नीचे लिख कर पर्ची को चाय ले जा रहे वेटर की ट्रे में रख दिया था। उन दिनों प्रधानमंत्री  की सुरक्षा आज की तरह नहीं होती थी। इंदिरा जी ने पर्ची पढ़ी और तुरंत अंदर बुला लिया। उस साक्षात्कार की बात फिर कभी। अभी तो उनकी हत्या के ठीक एक सप्ताह पहले किए मेरे कवरेज की बात।

इंदिरा जी सही वक्त पर पहुंची। हम लोग मंच के एकदम सामने बैठे थे। लकड़ी के लट्ठों का एक घेरा था। उससे सटा प्रेस बॉक्स था। याने वक्ता सामने बैठे लोगों के चेहरे देख सकता था। कांग्रेस नेता सुभाष यादव स्वागत भाषण दे रहे थे कि अचानक इंदिरा जी आयीं और उनसे माइक से एक तरफ जाने को कहा। सुभाष यादव अचकचा कर हट गए। हम  हैरत में थे। यह क्या हुआ। इंदिरा जी ने कहा, भाईयों और बहनों। मैं अभी दस मिनट में वापस आकर आपसे बात करूंगी और तब तक आप सुभाष जी की बात सुनिए और इंदिरा गांधी मंच से नीचे उतरने लगीं। मैंने तुरंत फोटोग्राफर को इशारा किया कि उनके उतरते हुए फोटो ले। मैं खुद भी चार छह कदम भागकर बल्लियों की रेलिंग के किनारे खड़ा हो गया। वे उतर कर आयीं। तिरछी नजर से मुझे देखा। ठिठकी और बोलीं अरे तुम यहां? मैंने कहा जी आपकी सभा कवर करने आया हूं। अब छतरपुर में नहीं हूं। इंदौर ‘नईदुनिया’ में हूं। उन्होंने कहा, आइए। मेरे साथ आइए और आगे बढ़ गईं। मैंने फोटोग्राफर को इशारा किया और हम बेरीकेट्स लांघ कर भागे। तब तक वे कार का दरवाजा खोलकर बैठ चुकी थीं। किसी को कुछ अंदाजा नही था। हम दौड़कर फोटोग्राफर की मोटरसाइकल तक पहुंचे और प्रधानमंत्री की सुरक्षा गाड़ी के पीछे चल पड़े। गाड़ी जिला अस्पताल जाकर रुक गई। मैंने सोचा, अस्पताल क्यों? क्या उनकी तबियत ठीक नही है। डॉक्टर तो सभास्थल पर ही था। इसी उधेड़बुन में हमने भी मोटरसाइकल पार्क की और भागे। तब तक वे उतर कर अस्पताल के पोर्च में जा पहुंची थीं और उनकी नजर हम पर पड़ गई थी। हमें वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों ने रोक दिया। इंदिरा जी ने कहा, उन्हें आने दो। फिर तो हमें रोकने वाला कौन था। हम अंदर थे। उनके एक्सक्लूसिव फोटो मिल रहे थे। इंदिरा जी एक वार्ड में गयीं और वहां पलंग पर भर्ती आदिवासियों के सिर पर हाथ फेरते हुए उनकी तबियत का हाल पूछने लगीं।

तब तक हमें घटना की जानकारी मिल गई थी। असल में उनकी सभा के लिए कुछ आदिवासी ट्रैक्टर ट्राली में आ रहे थे। रास्ते में ट्राली पलट गई और कुछ आदिवासी घायल हो गए थे। शायद एक दो की मौत भी हो गई थी। इसकी सूचना मंच पर ही इंदिरा जी को दी गई थी और वे ताबड़तोड़ सभा छोड़कर अस्पताल के लिए निकल गई थीं। उन्होंने एक एक घायल से उनकी सेहत का हाल पूछा। डॉक्टरों से बात की और वापस सभा स्थल के लिए रवाना हो गई। हम भी पीछे पीछे आ गए। इस सभा में भी उन्होंने कहा था, ‘मेरे खून की एक एक बूंद देश के लिए है।’

जैसे ही वे सभा समाप्ति के बाद मंच से सीढ़ियां उतर कर बेरिकेट्स के गलियारे से जाने लगीं तो मैं भी लपककर बल्लियों के किनारे जा पहुंचा। मैंने तनिक चिल्लाकर कहा मैडम! एक मिनट। उन्होंने देखा। मुस्कराई और निकट आते हुए बोली- कुछ पूछना है? मैंने कहा- जी बस दो तीन सवाल हैं। उन दिनों देश में राष्ट्रपति प्रणाली पर बहस चल रही थी। एक सवाल उस पर था। दूसरा प्रश्न आतंकवाद पर और तीसरा विपक्ष के आन्दोलन पर था। उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिए। फिर बोलीं, ‘नईदुनिया’ अच्छा अखबार है। उसकी छपाई भी अच्छी है। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। यह उनके साथ मेरी अंतिम मुलाकात थी। इसके बाद मैं जीप से सीधे इंदौर भागा। भोपाल संस्करण में खबर लगवाई। इसकी प्रति आप यहां देख सकते हैं।

इसके बाद नगर संस्करण में मय फोटो के विस्तार से समाचार छपा। उन दिनों लगभग हर अखबार में अपना डार्क रूम होता था। हमारी फिल्म इंदौर के छायाकार शरद पंडित ने धोई और प्रिंट तैयार किए। नईदुनिया ने प्रकाशित समाचार के सभी संस्करणों की प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय भेजी थी। उत्तर में इंदिरा जी का मेरे नाम धन्यवाद पत्र भी आया था। उन्हें कवरेज अच्छा लगा था।

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बिखराव बिंदु के करीब पहुंच रहा है पाकिस्तान, चीन से भी खो रहा है भरोसा: राजेश बादल

इमरान खान की छवि एक गैर जिम्मेदार, बार-बार यूटर्न लेने वाले और रंगीनमिजाज राजनेता की है। वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। अपने से अधिक काबिल लोगों को आगे नहीं आने देते।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 26 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 26 October, 2021
Imrankhan78781

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

इमरान खान के नारों से ऊब चुका है पाकिस्तान 

मौजूदा दौर में अवाम खोखले नारों पर भरोसा नहीं करती। वह सपनों के सौदागरों को सत्ता की चाबी सौंपने से बचना चाहती है। समूचा भारतीय उपमहाद्वीप कमोबेश इसी मानसिकता से गुजर रहा है। इस नजरिये से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान साख के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।

एक तरफ आंतरिक मोर्चे पर उनकी नाकामी ने नागरिकों को निराश किया है तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुल्क की प्रतिष्ठा लगातार दरक रही है। उन्हें कुरसी पर बिठाने वाले फौजी हुक्मरान भी अब महसूस करने लगे हैं कि एक खिलंदड़ क्रिकेटर को प्रधानमंत्री बनाने का प्रयोग विफल रहा है। 

बीते दिनों आईएसआई प्रमुख को बदलने के बाद से सैनिक नेतृत्व के साथ इमरान खान की पटरी नहीं बैठ रही है। उनके लिए यह नाजुक वक्त है और ऐसे अवसर पर ही संयुक्त विपक्ष ने एक बार फिर उनके खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया है। अब इमरान खान के सामने दो विकल्प ही बचते हैं- वे आईएसआई और सेना के हाथों की कठपुतली बने रहें या फिर पद छोड़कर नया जनादेश हासिल करने की तैयारी करें। 

दोनों विकल्प जोखिम भरे हैं। सेना का रबर स्टांप बने रहने से वे किसी तरह कार्यकाल तो पूरा कर लेंगे लेकिन उनका समूचा सियासी सफर एक अंधे कुएं में समा जाएगा। दूसरी ओर नए चुनाव कराने का रास्ता भी कांटों भरा है। उनके खाते में उपलब्धि के नाम पर एक विराट शून्य है, जिसके सहारे वे अपने दल को राजनीतिक वैतरणी पार नहीं करा सकते। यानी एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई की विकट स्थिति उनके सामने है।

दरअसल, पाकिस्तान जैसे फौज केंद्रित देश में कोई भी सरकार अपना लोकतांत्रिक धर्म नहीं निभा सकती। इस देश में सेना से रार ठानने का खामियाजा नवाज शरीफ और जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे कद्दावर राजनेता भुगत चुके हैं। वे तभी तक अपनी गद्दी को सुरक्षित रख पाए, जब तक सेना के इशारों पर नाचते रहे। जैसे ही वे सेना के सामने चुनौती बनने लगे, सेना ने उनके नीचे से जाजम खींच ली। लेकिन भुट्टो और नवाज शरीफ तथा इमरान खान के बीच एक बुनियादी फर्क है। 

जुल्फिकार अली भुट्टो और नवाज शरीफ अपनी सीमाओं में रहते हुए भी आम आदमी के लिए भला करते थे और पाकिस्तान की कंगाली पर भी रोक लगा कर रखते थे। वे अवाम को सपने दिखाते थे तो उन्हें साकार करने के प्रयास भी जमीन पर साकार होते दिखाई देते थे। उनके कार्यकाल में पाकिस्तान ने अनेक उपलब्धियां भी हासिल की हैं। लेकिन इमरान खान की स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। 

इमरान खान की छवि एक गैर जिम्मेदार, बार-बार यूटर्न लेने वाले और रंगीनमिजाज राजनेता की है। वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। अपने से अधिक काबिल लोगों को आगे नहीं आने देते। पाकिस्तान की तरक्की के वास्ते न उनके पास कोई आधुनिक पेशेवर कार्यक्रम है और न सोच। वे आत्ममुग्ध और किसी भी तरह सत्ता से चिपके रहने वाले शख्स हैं। 

इस कारण प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद वे चुनाव से पहले जनता से किया गया एक भी वादा पूरा नहीं कर सके। मुल्क में महंगाई चरम पर है। गरीबी और बेरोजगारी विकराल रूप में सामने है। सरकार का खजाना खाली है और इमरान खान भिक्षापात्र लिए कभी विश्व बैंक तो कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तो कभी चीन से गिड़गिड़ाते नजर आते हैं।

आंकड़ों में न भी जाएं तो सार यह है कि भारत के इस पड़ोसी का रोम-रोम कर्ज से बिंधा हुआ है और इमरान के सत्ता संभालने के बाद से स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। औसतन पाकिस्तान के प्रत्येक नागरिक पर लगभग दो लाख रुपए का कर्ज है। चीन ने अपना निवेश कम कर दिया है। उसे आशंका है कि पाकिस्तान अमेरिकी शरण में जा रहा है। काफी हद तक इसमें सच्चाई है। 

अमेरिका की निकटता पाने के लिए पाकिस्तान छटपटा रहा है। इस चक्कर में वह चीन का भरोसा खो रहा है। रूस भी बहुत सहायता करने के मूड में नहीं है। सऊदी अरब नाराज है और तालिबान के मामले में आतंकवाद को शह देने की इमरान खान की घोषित नीति ने उन्हें विश्व में अलग-थलग कर दिया है। 

फैज हमीद की आईएसआई प्रमुख के पद पर नियुक्ति के बाद सेना से इमरान खान के मतभेद का कारण भी यही नीति रही है। अब तक तो परंपरा यही है कि सेना के साथ टकराव मोल लेने वाला अपनी कुर्सी की रक्षा नहीं कर सका है। इमरान खान जनरल बाजवा के सामने तीन बार समर्पण की मुद्रा में आ चुके हैं। देखना होगा कि फौज उन्हें कब तक अभयदान देती है।

अंत में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इमरान खान और सेनाध्यक्ष अपनी-अपनी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते भी पाकिस्तान में आम अवाम के बीच बहुत भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं करते। सेनाध्यक्ष बाजवा अहमदिया समुदाय के हैं। वे बहुसंख्यक आबादी में हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आते हैं।

इसी तरह इमरान खान का खानदान नियाजी है और ढाका में पाकिस्तानी सेना ने जनरल नियाजी के नेतृत्व में ही भारत के सामने हथियार डाले थे। इस समर्पण के बाद नियाजियों को वहां हेय दृष्टि से देखा जाने लगा था। लाखों नियाजियों ने अपनी जाति लिखनी ही छोड़ दी थी। इस तरह दोनों शिखर पुरुष अपने-अपने हीनताबोध के साथ मुल्क में शासन कर रहे हैं। वे दोनों ही बहुमत का प्रतिनिधित्व
नहीं करते।

पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के बाद पहली बार बिखराव बिंदु के करीब पहुंच रहा है। इमरान खान के रहते आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती। कोई चमत्कार ही पाक का उद्धार कर सकता है।

(साभार: लोकमत समाचार)

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'भारत की सकारात्मक छवि और उपलब्धियों को भी दिखाएं CNN, BBC जैसे विदेशी मीडिया संस्थान'

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं

Last Modified:
Sunday, 24 October, 2021
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डॉ. अनुराग बत्रा।।

न्यूज मीडिया में सनसनीखेज समाचार ही सबसे ज्यादा देखे व पढ़े जाते हैं, खासकर आजकल के डिजिटल युग में, जहां पर ज्यादातर नकारात्मक टिप्पणियां यानी निगेटिव बातें ही हेडलाइंस बनती हैं और उन्हीं से पेज व्यूज बढ़ने के साथ ही रेवेन्यू में इजाफा होता है। न्यूज संस्थानों और संपादकों की बात करें तो चाहे वो डिजिटल हो या टेलिविजन, तमाम विषयों पर स्टोरी कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में पूरे देश में और यहां के लोगों में नकारात्मकता पर ज्यादा रोशनी डाली जाती है। ऐसे में फिर इसका उपयोग केवल बदनाम करने के लिए किया जाता है और यहां तक कि आतंकित करने के लिए भी किया जाता है, हर कोई एक लाइन में खड़ा नजर आता है। एक ऐसी रेखा जिसे मीडिया ने खींचने का फैसला किया है। 

लेकिन इससे पहले की मैं अपने द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे तर्कों की गहराई में उतरूं, मैं बता देना चाहता हूं कि मैं एक वैश्विक यात्री और नागरिक हूं। मैं बिना किसी झिझक के कह सकता हूं कि मैं अमेरिका से प्रभावित हूं। मुझे हॉलीवुड से उतना ही प्यार है, जितना कि मुझे भारतीय सिनेमा से। मैं अमेरिका में आइवी लीग विश्वविद्यालयों में अपने दोनों बच्चों के स्टूडियो को देखना चाहता हूं और इसकी संस्कृति, व्यापार और शेयर बाजारों से प्रभावित हूं। इस देश में इनोवेशन की संस्कृति है जो समस्याओं को हल करती है और बड़ी कंपनियों का निर्माण करती है और एंटरप्रिन्योरशिप को चलाती है, जैसा और कहीं नहीं है। मेरा जन्मदिन भी उसी दिन (27 अगस्त) होता है, जिस दिन दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके लिंडन बेन्स जॉनसन (Lyndon B Johnson) का होता है। मैं अमेरिका और हर अमेरिकी के लिए अपने प्यार के बारे में बता सकता हूं। लेकिन मुझे अमेरिका की एक चीज सबसे ज्यादा अच्छी लगती है और वह है मीडिया... वह भी मेरे बिजनेस की वजह से।

मैं खासतौर पर सबसे ज्यादा ‘सीएनएन’ (CNN) को पसंद करता हूं और जिस तरीके का वह कंटेंट देता है, चाहे वह न्यूज हो या ब्रैंड वह काफी विकसित और बेहतर पैकेज में होता है, जिसे मैं काफी पसंद करता हूं। ‘सीएनएन इंटरनेशनल‘ मेरा पसंदीदा चैनल है और मैं उसे रोजाना दो से चार घंटे देखता हूं और रविवार को यह समय छह घंटे से भी ज्यादा हो सकता है। इसके दो ऐसे शो हैं-फरीद जकारिया का ‘GPS’ और ब्रायन स्टेल्टर का ‘Reliable Sources’, जिन्हें मैं कभी मिस नहीं करता। यहां कि यदि मैं व्यस्त भी होता हूं तो मैं ये सुनिश्चित करता हूं कि ये रिकॉर्ड हो जाएं और दिन में देर भी हो जाए तो मैं इन्हें देख लूं। मैं जिससे मिलता हूं चाहे निजी अथवा बिजनेस के सिलसिले में, उन तमाम लोगों से भी मैं इन शो को देखने के लिए कहता हूं और ऐसे लोगों की गिनती शायद हजारों में है। वैश्विक राजनीति और वैश्विक मीडिया में रुचि रखने वाले तमाम भारतीयों की तरह मैं खाड़ी युद्ध के बाद से सीएनएन से जुड़ा हुआ हूं।

रिज खान जैसे दिग्गज का मैं कई वर्षों से प्रशंसक हूं और करीब 12 साल पहले मैंने रिज खान को एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्ट कॉन्फ्रेंस ‘न्यूजनेक्स्ट’ (NewsNxt) में आमंत्रित किया था। इसके अलावा न्यूज को लेकर मैं एक और संस्थान ‘बीबीसी’ (BBC) को काफी पसंद करता हूं और उसका सम्मान करता हूं। मैं टिम सेबस्टियन के शो ‘Hard Talk’ को देखते हुए बड़ा हुआ हूं और इसके नए होस्ट को देखना अभी तक जारी है। मुझे ‘एक्सचेंज4मीडिया’ में मैथ्यू अमरोलीवाला की मेजबानी करने का सौभाग्य मिला है और वह मुलाकात काफी शानदार थी। निजी तौर पर मैं ‘बीबीसी इंडिया’ की तत्कालीन बिजनेस हेड सुनीता राजन की शादी में भी शामिल हुआ था। हालांकि, टिम सेबस्टियन के साथ एक घंटे की बातचीत काफी बेहतरीन थी। ‘सीएनएन’ के बाद मुझे ‘बीबीसी’ काफी पसंद है। मैं सीएनएन और बीबीसी को लेकर अपनी पसंद, उनके प्रति मेरे सम्मान और मुझ पर उनके प्रभाव के बारे में बहुत सारी बात कर सकता हूं। दोनों टॉप न्यूज और लाइव इवेंट्स के अलावा घरेलू बाजार को लेकर भी अपना नजरिया रखते हैं। मुझे यह भी लगता है कि इन दो प्रमुख प्लेटफार्म्स के बीच कई बार कंटेंट की समरूपता (convergence) होती है, हालांकि, शैली और इसे प्रस्तुत करने का तरीका अलग रहता है।

लेकिन मैं यह सब आपके साथ क्यों शेयर कर रहा हूं? मैं आपको यह बताने के लिए यह सब शेयर कर रहा हूं कि जब मैं अपने विचार प्रस्तुत करता हूं तो उसका बैकग्राउंड होता है कि मैं सीएनएन और बीबीसी के साथ जुड़ता हूं- टीवी पर और अब डिजिटल रूप से- और जो कुछ वे कहते हैं, उससे मैं भलीभांति परिचित हूं। हालांकि उनका अपना एजेंडा, विश्वास और शायद कभी-कभी पूर्वाग्रह भी होता है, इसके बावजूद मैं उनका सम्मान करता हूं। मुझे उनके एंकर्स की उच्च क्वालिटी को लेकर भी काफी विश्वास है। मीडिया इंडस्ट्री में होने के नाते और इसके साथ ही उनके साथ निजी तौर पर मिलकर बातचीत करने के नाते मैं ये सब जानता हूं। इनमें से बहुत से मीडिया प्रोफेशनल्स भी भारतीय हैं अथवा भारतीय मूल के हैं। मेरे तर्क के बारे में यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है।

इस साल की शुरुआत में भारत में कोविड-19 महामारी के दूसरे चरण के दौरान, सीएनएन, बीबीसी समेत तमाम वैश्विक मीडिया संस्थानों ने भारत पर अपना ध्यान केंद्रित किया और कई खबरें कीं। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की और दिल दहला देने वाली स्टोरीज दिखाईं। इनमें जलती चिताएं, अंतिम संस्कार के लिए रखीं लाशें और शोक संतप्त रिश्तेदारों को दिखाया गया। वे भारत सरकार, यहां के समाज और लोगों की लगातार आलोचना कर रहे थे। उन्हें ऐसी पार्टियों का साथ मिल गया, जो सरकार की आलोचक हैं या मैं कहूं कि भारत को विभाजित करने वाली हैं, विपक्ष में हैं अथवा देश के सामने आने वाली प्रतिकूलताओं अथवा परेशानियों को और बढ़ाने वाली हैं। किसी भी तरह से देश में सब कुछ इतना डरावना नहीं था। केंद्र और राज्य सरकारें और भी बहुत कुछ कर सकती थीं, एक समाज के रूप में हम और बेहतर हो सकते थे और एक नागरिक के रूप में हम और मदद कर सकते थे।

पिछले दिनों कैबिनेट में हुए फेरबदल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को महामारी से खराब तरीके से निपटने और उनके मंत्रालय की इस मामले में ढिलाई के लिए उन्हें बाहर कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने इस पर संज्ञान लिया और कार्रवाई की। नए मंत्री की नियुक्ति और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की निगरानी से वैक्सीनेशन की गति तेज हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय और नए स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया, वैक्सीन और कोविड-19 के लिए गठित टास्क फोर्स के प्रमुख आरएस शर्मा, विभिन्न राज्य सरकारें, सिविल सोसायटीज, डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, गैर सरकारी संगठन, कॉर्पोरेट और सबसे महत्वपूर्ण कि देश के लोगों ने केंद्र सरकार के माध्यम से स्थिति को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद की और टीकाकरण की एक अरब खुराक को लोगों तक पहुंचाने का अविश्वसनीय सा मुकाम हासिल कर लिया। भारत के नागरिकों ने अपनी सरकार पर भरोसा किया और मेरे हिसाब से पीएम मोदी की विश्वसनीयता के आलोक में बाहर जाकर टीका लगावाया। 700 मिलियन से अधिक भारतीयों को टीके की एक खुराक मिली है और 300 मिलियन से अधिक लोगों का पूरी तरह से टीकाकरण हो गया है। हम अभी भी हार नहीं मान रहे हैं। हम एक नया और ऊंचा मील का पत्थर चुनेंगे और इसे हासिल करेंगे। यहां तक कि अप्रैल से प्रशासन बूस्टर खुराक शुरू करने पर भी विचार कर रहा है। कोविन की सफलता प्रशासन के कार्यक्रम की प्रगति में एक अविश्वसनीय उत्प्रेरक रही है। वैश्विक स्तर पर यह एक बड़ी उपलब्धि है।

हम अमेरिका और यूरोप समेत अन्य देशों में वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट और अपेक्षाकृत कम आंकड़ों को देखें, तो पता चलेगा कि  ये वही देश हैं जो भारत को उपदेश दे रहे हैं। सीएनएन और बीबीसी के नेतृत्व वाले मीडिया प्लेटफॉर्म्स जिन्होंने भारत को नीचा दिखाया है, उन्हें अब निश्चित रूप से यह महसूस करना चाहिए कि वे भारत की इतनी खराब इमेज बनाने के लिए काफी कठोर थे, क्योंकि उन्होंने जानबूझकर देश की वैश्विक विश्वसनीयता को कम किया है। हम अपने टीकाकरण कार्यक्रम के कारण आर्थिक सुधार की राह पर हैं। 

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र किया है। उन्होंने जो कुछ हो रहा है, उसकी व्यापक रूपरेखा को सामने रखा और अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर और गति से वापस लाने की योजना भी बनाई है।

निष्पक्ष न्यूज प्लेटफॉर्म्स के रूप में ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ को संभवतः अब भारत में स्टेकहोल्डर्स और आम नागरिकों से बात करनी चाहिए कि वे कैसा महसूस करते हैं। मुझे पता है कि भारत कोविड की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए खुद को तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है, फिर चाहे वह अस्पताल के बेड हों, स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा हो, ऑक्सीजन की उपलब्धता या अन्य व्यवस्थाएं हों। मुझे उम्मीद है कि ‘सीएनएन’ और ‘बीबीसी’ अब अपने कार्यक्रमों में टीकाकरण को तैयारी और सफलता के लिए भारत के प्रयासों को प्रमुखता से सामने लाएंगे। मुझे उम्मीद है कि ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ भारत में बड़े पैमाने पर हुए वैक्सीनेशन और इसकी बड़ी सफलता की तस्वीरें वैश्विक पटल पर सामने रखेंगे। मुझे उम्मीद है कि विदेशी मीडिया वैक्सीनेशन समेत तमाम क्षेत्रों में भारत सरकार की सफलता को दिखाएगा। देश की सामाजिक संस्थाओं (civil society), गैर सरकारी संगठनों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और यहां तक कि मीडिया संस्थानों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैं वैक्सीन की दोनों डोज ले चुका हूं और यह उतना ही आसान था, जितना कि पास की कॉफी शॉप में कॉफी लेना।

मैं पिछले 20 वर्षों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि विदेशी मीडिया भारत की नकारात्मक छवि को उभारता है और विशेष रूप से यहां की उपलब्धियों को कम दिखाता है। एनडीए सरकार के पिछले करीब साढ़े साल के कार्यकाल में इसमें और इजाफा हुआ है। देश विरोधी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई भारतीय पत्रकारों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ प्रचार को और बढ़ाने का काम किया है। विदेशी मीडिया को इन विचारों को संतुलित तरीके से पेश करना चाहिए और भारत के विकास में सभी हितधारकों से बात करना चाहिए, चाहे वे राजनेता हों, नीति निर्माता हों, सरकारी अधिकारी, मीडिया और स्वतंत्र विश्लेषक हों। मेरा मानना है कि आलोचना के साथ-साथ भारत की सकारात्मकता को दिखाना भी उनका कर्तव्य है, जो यहां हो रही है। 
भारत आगे बढ़ रहा है और अगले तीन वर्षों में यह काफी तेज गति से आगे बढ़ेगा- और मैं वादा कर सकता हूं कि कोई भी पश्चिमी पत्रकार न तो समझ रहा है, न ही विश्लेषण कर रहा है और न ही उसमें इतना साहस है कि आंखें खोलकर देखे कि इस सरकार और पीएम के नेतृत्व में भारत ने कितनी प्रगति की है। यह भारत, यहां के नागरिकों, सरकार और पीएम को श्रेय देने का समय है। कृपया निष्पक्ष होने में संकोच न करें।

भारत में समावेशी मानवतावाद है। हम भारतीय हमेशा ही रचनात्मक, मेहनती, ईमानदारी व निस्वार्थ सेवा देने वाले रहे हैं। महामारी के दौरान पिछले 18 महीनों में हमने देशवासियों को अपने लोगों के समर्थन में दिल खोलकर पैसा खर्च करते व हर तरह से मदद करते देखा है। मैं विदेशी मीडिया में देखना चाहता हूं कि वह हमारी कमियों के साथ-साथ हमारे वैक्सीनेशन प्रोगाम की पूरी सफलता की कहानी को भी दिखाएं, संख्या दिखाएं, आंकड़े दिखाए और हमारी प्रगति को भी दिखाएं। ऐसा कुछ जो हर देश ने महामारी के दौरान अनुभव किया है और वह भी जिस पर अभी तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, जो हमारे हासिल किया है।

प्रधानमंत्री को आत्मनिर्भर अभियान के लिए धन्यवाद। दुनियाभर की परेशानियों को हल करने में अपना सहयोग देने के लिए हम भारतीय हमेशा ही मजबूती के साथ खड़े रहते हैं। एक भारतीय के तौर पर हम जानते हैं कि दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ता है। देश में इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान को लेकर भारत में दुनिया के लिए एक रोल मॉडल बनने की क्षमता है। साथ ही हमारे कई नेताओं, सरकारों और सामाजिक संस्थाओं में भी टीकाकरण अभियान में तेजी लाकर और दुनिया की मदद कर प्रेरणास्रोत बनने की क्षमता है।

इसलिए मैं वैश्विक मीडिया से कहना चाहता हूं कि भगवान के लिए जागिए और आगे बढ़कर यहां की सकारात्मकता को दिखाइए (smell the coffee)। टीकाकरण में भारत की सफलता को दुनिया के सामने लाने का समय आ गया है। दुनिया को बचाने में भारत अग्रणी भूमिका निभा सकता है। भारत को आगे करना मतलब दुनिया को आगे बढ़ाना है। बेहतर उपलब्धि के लिए हम भारतीयों के साथ-साथ यहां की सरकार को भी कुछ श्रेय दीजिए।

आखिर में मैं यह कहना चाहता हूं कि जब मैंने यह सब लिखा तो मुझे यह देखकर निराशा हुई कि ‘सीएनएन’ ने अपनी एक स्टोरी में शीर्षक दिया है, जिसमें कहा गया है, ‘भारत ने एक बिलियन लोगों को कोविड वैक्सीनेशन दिया है, लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें पहली डोज लगनी बाकी है।’ यहां कहना चाहूंगा कि यदि अनिच्छा से किसी की तारीफ करना हो तो ही ऐसे किया जा सकता है।

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

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ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं: प्रो. संजय द्विवेदी

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए।

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
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-प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए हम सही निर्णय लें, सही दिशा में प्रयास करें, तभी हम विजय हासिल कर सकते हैं। इसी मंत्र को सामने रखकर भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना वैक्सीन के 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पूरा कर इतिहास रच दिया है। 100 साल में आई सबसे बड़ी महामारी का मुकाबला करने के लिए अब पूरे देश के पास 100 करोड़ वैक्सीन डोज का मजबूत सुरक्षा कवच है। ये उपलब्धि भारत की है, भारत के प्रत्येक नागरिक की है।

पिछले वर्ष जब देश में कोरोना के कुछ ही मरीज सामने आए थे, उसी समय भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी वैक्‍सीन्‍स के लिए काम शुरू कर दिया गया था। हमारे वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके बहुत कम समय में देशवासियों के लिए वैक्‍सीन्‍स विकसित की हैं। आज दुनिया की सबसे सस्ती वैक्सीन भारत में है। भारत की कोल्ड चेन व्यवस्था के अनुकूल वैक्सीन हमारे पास है। इस प्रयास में हमारे प्राइवेट सेक्‍टर ने नवाचार और उद्यमिता की भावना का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। वैक्सीन्स की मंजूरी और नियामक प्रक्रिया को फास्ट ट्रैक पर रखने के साथ ही, वैज्ञानिक मदद को भी बढ़ाया गया है। यह एक टीम वर्क था, जिसके कारण भारत, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन्स के साथ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीकाकरण के पहले चरण में ही गति के साथ इस बात पर जोर दिया कि ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों तक, जरूरतमंद लोगों तक वैक्सीन पहुंचे।

देश में 16 जनवरी से वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत हुई थी। शुरुआती 20 करोड़ वैक्सीन डोज देने में 131 दिन का समय लगा। अगले 20 करोड़ डोज 52 दिन में दिए गए। 40 से 60 करोड़ डोज देने में 39 दिन लगे। 60 करोड़ से 80 करोड़ डोज देने में सबसे कम, सिर्फ 24 दिन का समय लगा। इसके बाद 80 करोड़ से 100 करोड़ डोज देने में 31 दिन का वक्त लगा। अगर इसी रफ्तार से वैक्सीनेशन होता रहा, तो देश में 216 करोड़ वैक्सीन डोज लगने में करीब 175 दिन और लगेंगे। इसका मतलब है कि 5 अप्रैल, 2022 के आसपास ये आंकड़ा हम पार कर सकते हैं। हम भले ही 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पार कर चुके हैं, लेकिन देश की 20 प्रतिशत आबादी ही अभी पूरी तरह वैक्सीनेट हुई है। 29 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन की एक डोज दी जा चुकी है। ऐसे में मास्क फ्री होने के लिए हमें अभी इंतजार करना होगा। जब तक 85 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेट नहीं हो जाती, तब तक ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। जिन देशों में मास्क से छूट दी गई है, वहां जनसंख्या घनत्व भारत की तुलना में काफी कम है। ऐसे में हमें अपनी जरुरतों के हिसाब से ही फैसला लेना चाहिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी तक देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेटेड हो जाएगी। इस वक्त तक भारत ‘हर्ड इम्यूनिटी’ को अचीव कर लेगा। इसके बाद लोगों को मास्क नहीं लगाने की पूरी तरह छूट मिल सकती है। यानी मास्क से पूरी तरह से आजादी के लिए हमें अभी कम से कम 6 से 8 महीने और इंतजार करना होगा।

सेवा परमो धर्म: के मंत्र पर चलते हुए हमारे डॉक्टर्स, हमारी नर्सेस, हमारे हैल्थ वर्कर्स, इतनी बड़ी आबादी की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। इन सभी प्रयासों के बीच, ये समय लापरवाह होने का नहीं है। ये समय ये मान लेने का नहीं है कि कोरोना चला गया या फिर अब कोरोना से कोई खतरा नहीं है। हाल के दिनों में हम सबने बहुत सी तस्वीरें, वीडियो देखे हैं, जिनमें साफ दिखता है कि कई लोगों ने अब सावधानी बरतना या तो बंद कर दिया है, या बहुत ढिलाई ले आए हैं। ये बिल्‍कुल ठीक नहीं है। अगर आप लापरवाही बरत रहे हैं, बिना मास्क के बाहर निकल रहे हैं, तो आप अपने आप को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को, बुजुर्गों को उतने ही बड़े संकट में डाल रहे हैं। संत कबीरदास जी ने कहा है, ‘पकी खेती देखिके, गरब किया किसान। अजहूं झोला बहुत है, घर आवै तब जान’। अर्थात, कई बार हम पकी हुई फसल देखकर ही अति आत्मविश्वास से भर जाते हैं कि अब तो काम हो गया, लेकिन जब तक फसल घर न आ जाए तब तक काम पूरा नहीं मानना चाहिए। यानि जब तक सफलता पूरी न मिल जाए, लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

कोविड-19 महामारी से सबसे बड़ा यह सबक मिलता है कि हमें मानवता और मानव हित के लिए पूरे विश्व के साथ मिलकर काम करना है और साथ-साथ ही आगे बढ़ना है। हमें एक-दूसरे से सीखना होगा और अपनी सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में एक-दूसरे का मार्गदर्शन भी करना होगा। इस महामारी की शुरुआत से ही भारत इस लड़ाई में अपने सभी अनुभवों, विशेषज्ञता और संसाधनों को वैश्विक समुदाय के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है और हमने तमाम बाधाओं के बावजूद इन अनुभवों को दुनिया के साथ ज्यादा से ज्यादा साझा करने की कोशिश भी की है। हम वैश्विक प्रथाओं से सीखने के लिए भी उत्सुक रहते हैं। भारत ने ‘कोविन प्लेटफॉर्म’ का निर्माण करके पूरी दुनिया को राह दिखाई है कि इतने बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन कैसे किया जाता है। पहाड़ हो या रेगिस्तान, जंगल हो या समंदर, 10 लोग हों या 10 लाख, हर क्षेत्र तक आज हम पूरी सुरक्षा के साथ वैक्सीन पहुंचा रहे हैं। इसके लिए देशभर में 1 लाख 30 हजार से ज्यादा टीकाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।

इस महामारी ने दुनिया के हर देश, हर संस्था, हर समाज, हर परिवार, हर इंसान के सामर्थ्य को, उनकी सीमाओं को बार-बार परखा है। वहीं, इस महामारी ने विज्ञान, सरकार, समाज, संस्था और व्यक्ति के रूप में भी हमें अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए सतर्क किया है। पीपीई किट्स और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर कोविड केयर और ट्रीटमेंट से जुड़े मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का जो बड़ा नेटवर्क आज भारत में बना है, वो काम अब भी चल रहा है। देश के दूर-सुदूर इलाकों में अस्पतालों तक वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स पहुंचाने का भी तेज गति से प्रयास किया गया है। बीते डेढ़ साल में देश ने इतनी बड़ी महामारी से मुकाबला आपसी सहयोग और एकजुट प्रयासों से ही किया है। सभी राज्य सरकारों ने एक दूसरे से सीखने का प्रयास किया है, एक दूसरे के प्रयोगों को समझने का प्रयास किया है, एक दूसरे को सहयोग करने की कोशिश की है। ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं।

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