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क्या आप जानते हैं कि हिंदी का नामकरण किसने किया था?

यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि जब-जब उसे आगे बढ़ाने के ईमानदार प्रयास होने लगते हैं, वह राजनीति की शिकार हो जाती है

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

प्रो. गोविंद सिंह।।

गृह मंत्री अमित शाह ने ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ की बात क्या कह दी कि लगा जैसे उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो। दक्षिण में स्टालिन और कुमारस्वामी से लेकर पूर्व में ममता बनर्जी और इस्लाम के नाम पर राजनीति करने वाले नेता असदुद्दीन ओवेसी तक सभी केंद्र सरकार को कोसने लगे। उन्हें लगा कि सस्ते में अपनी राजनीति की रोटियां सेकने का वक्त आ गया है। यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि जब-जब उसे आगे बढ़ाने के ईमानदार प्रयास होने लगते हैं, वह राजनीति की शिकार हो जाती है।

विरोध के स्वरों में से इस बार दो बातें प्रमुखता से उभरकर आ रही हैं। पहली यह कि हिंदी जैसे हिंदुओं की भाषा है। ओवेसी ने कहा कि देश हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व से ऊपर है। शायद वे भारतीय जनसंघ के उस पुराने नारे को याद करना चाह रहे थे, जिसमें हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान यानी हिंदू राष्ट्र का सपना देखा गया था। हालांकि गृहमंत्री के हिंदी दिवस के भाषण से ऐसी कोई भी ध्वनि नहीं निकल रही है, लेकिन फिर भी ओवेसी जैसे नेताओं को टीवी चैनलों की फुटेज तो मिल ही गई।

यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि ओवेसी जिस हिंदी को सिर्फ हिंदुओं की भाषा बता रहे हैं, उसका नामकरण ही अमीर खुसरो ने किया था, जिन्होंने ब्रजभाषा-हिंदी में मुकरियां और शेर लिखे थे। रसखान, रहीम, जायसी जैसे महान कवियों की हिंदी सेवा को वे कैसे भुला सकते हैं?  हिंदी मजहब की बजाय भूगोल की प्रतीक ज्यादा रही है। उसे हिंदुस्तानियों की भाषा कहना ज्यादा प्रासंगिक है।

दुर्भाग्य से ओवेसी उन अंग्रेजों की बोली बोल रहे हैं, जिन्होंने हिंदी और उर्दू को मजहबी आधार पर बांटकर फूट डालने का काम किया था। 1842 से पहले उत्तर प्रदेश की राजभाषा फारसी हुआ करती थी। सत्ता में आते ही सबसे पहले उन्होने हिंदी और उर्दू दोनों को राजभाषा का दर्जा दिया। कुछ ही वर्षों बाद दोनों के बीच फूट डालने के मकसद से सिर्फ उर्दू को ही राजभाषा बना दिया। इससे दोनों के बीच झगड़ा बढ़ गया। धीरे-धीरे उन्होंने यह स्थापित कर दिया कि हिंदी और उर्दू का रिश्ता हिंदू और मुस्लिम समुदायों से है।

राष्ट्रभाषा को लेकर 1928 में कांग्रेस पार्टी की तरफ से मोतीलाल नेहरू समिति ने जो रिपोर्ट दी, उसमें भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की पैरवी की थी, जिसका मुस्लिम लीग ने कड़ा विरोध किया। बाद के वर्षों में मुस्लिम लीग ने इसका और तीखा विरोध शुरू कर दिया। पाकिस्तान इसका ज्वलंत उदाहरण है। पंजाबी, सिंधी, पश्तो, बलोची और सेराइकी के ऊपर उर्दू थोप दी गई। यही हाल शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में किया। डोगरी, कश्मीरी, लद्दाखी और बलती के ऊपर उर्दू को थोप दिया, क्योंकि वे इसे इस्लामी देश बनाना चाहते थे। लेकिन इस तरह के फर्जी फैसले बहुत दूर तक नहीं चलते।

सच बात यह है कि हिंदी और उर्दू के बीच कोई झगड़ा है ही नहीं। झगड़ा तो देवनागरी और नशतालिक (अरबी) लिपियों के बीच है। ओवेसी जैसे लोगों को कौन समझाये कि लिपियां भाषा नहीं होतीं, वे भाषा को रिकॉर्ड करने का जरिया भर होती हैं। इसलिए तमाम पश्चिमी देशों में हिंदी और उर्दू को ‘दो लिपियों में लिखी जाने वाली एक भाषा’ कहा जाता है। अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में इस संबंध में एक प्रोजेक्ट भी चल रहा है-हिंदी-उर्दू फ्लैगशिप प्रोजेक्ट। वाकई आज हिंदी और उर्दू एक हो जाएं तो वे दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन जाएंगी। आंकड़े इसके गवाह हैं। दुर्भाग्य से हमारे पास ऐसे नेता हैं, जो एकता की हर डाल को काट डालना चाहते हैं।

विरोध के स्वरों के बीच से जो चिंताएं उठ रही हैं, उनमें एक चिंता यह भी है कि हिंदी अन्य भाषाओं को खा जाएगी। दक्षिण भारत के नेता हों या पूरब के, उन्हें यही चिंता सताती रहती है। 1965 में भी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री हिंदी को लागू करवाना चाहते थे, तब भी इन्हीं तर्कों के सहारे हिंदी के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल देना पड़ा था। उस प्रसंग को यहां याद करना प्रासंगिक होगा।

हुआ यह कि 1949 में जब संविधान में हिंदी को राजभाषा बना दिया गया, तब यह दुमछल्ला भी साथ में जोड़ दिया गया कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी जारी रहेगी। क्योंकि इस बीच हिंदी को राजभाषा बनाने की तैयारी कर ली जाएगी। 26 जनवरी 1965 को 15 वर्ष पूरे हो गए। लाल बहादुर शास्त्री इसे लागू करना चाहते थे। जैसे ही दक्षिण के नेताओं को यह सूचना मिली, उन्हें लगा कि राजनीति चमकाने का सही वक़्त आ गया है।

द्रविड़ आंदोलन के सबसे बड़े नेता अन्ना दुरई ने इसे हवा दी और आंदोलन भड़क गया। दक्षिण और पूरब के जिन कांग्रेसी नेताओं ने 1949 में हिंदी को राजभाषा बनाने की वकालत की थी, वे भी इसके विरोध में आ गए। तब मोरारजी देसाई ने उन्हें जवाब दिया था, ‘हिंदी सीखकर तमिल भाषी पूरे हिंदुस्तान में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं।‘ उन्होनें कहा था कि हिंदी ही भारत में संपर्क भाष का काम कर सकती है, क्योंकि अंग्रेजी हमारी अपनी भाषा नहीं है। देसाई ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाले इस कदम के रास्ते में कोई भी क्षेत्रीय भावना नहीं आनी चाहिए।“

दरअसल, राष्ट्रीय एकता के विरोधी राजनेता और अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी लगातार यह भ्रम फैलाते रहे हैं कि हिंदी आ जाएगी तो अन्य क्षेत्रीय भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी, मर जाएंगी। जबकि हिंदी का झगड़ा इन भाषाओं से है ही नहीं। उसका झगड़ा तो अंग्रेजी की सत्ता से है, जो वह सात दशकों से अवैध तरीके से कब्जाए हुए है। आश्चर्य की बात यह है कि किसान-मजदूर की बात करने वाले वामपंथी भी इस संदर्भ में हिंदी विरोधी हवा बनाने में पीछे नहीं हैं जबकि हिंदी की बात तो राष्ट्रीय स्तर पर होती है।

प्रादेशिक स्तर पर आप अपनी भाषा को बढ़ाते रहिए, किसने रोका है? मातृभाषा तो वैसे भी सबसे अहम है। उसे कैसे नकारा जा सकता है। हाल ही में अमेरिका में रह रहे विद्वान संक्रांत सानु ने एक पुस्तक में लिखा है कि ज्ञान-विज्ञान और आर्थिक तरक्की में वे ही देश आगे हैं, जिनकी शिक्षा अपनी मातृभाषा में है। क्या वजह है कि अंग्रेजी के पीछे इतना भागते हुए भी हमारा एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के टॉप 300 विश्वविद्यालयों में जगह नहीं बना पाया है। इसलिए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी बढ़े और प्रांतीय स्तर पर क्षेत्रीय भाषाएं बढ़ें। इसके बिना गुजारा नहीं है।
(लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)


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