होम / विचार मंच / यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो क्या जवाब देंगें ये टीवी पत्रकार
यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो क्या जवाब देंगें ये टीवी पत्रकार
19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
निर्मलेंदु
वरिष्ठ पत्रकार
19 तारीख की शाम 4 बजे से एग्जिट पोल का खेल शुरू हो गया है। बीजेपी के खेमे में एग्जिट पोल के नतीजों पर ढोल बजना शुरू हो गया है। उसके बाद न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया में, बल्कि सोशल मीडिया में भी इसकी खूब आलोचना हो रही है।
एग्जिट पोल पर मजे ले रहा है सोशल मीडिया। सुगम शर्मा नाम के ट्विटर यूजर लिख रहे हैं, चाणक्य ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को इतनी सीटें दे दी हैं कि उससे पीएम की कुर्सी के अलावा सेंटर टेबल, डाइनिंग टेबल, बुक शेल्फ, टीवी कैबिनेट और मंझले साइज के 2 स्टूल भी बन सकते हैं...। वहीं दूसरी ओर एक ट्विटर यूजर कैलाश चैधरी ने लिखा, ये जो एग्जिट पोल आ रहे हैं, वे बिल्कुल अखबार में आई राशिफल के समान है, जो कुंवारों को भी संतान प्राप्ति करा देते हैं। यदि एग्जिट पोल को बोतल में से निकला जिन्न है, जो चुनावी नतीजे उलट जाते ही वापस बोतल में चला जाता है, तो शायद गलत नहीं होगा। कोई इसे मोदी सरकार की मीडिया बता रहा है, तो वहीं ज्यादातर चैनलों में यही दिखाया जा रहा है कि इस पोल के मायने क्या हैं। कुछ लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि क्या ये एग्जिट पोल विश्वसनीय हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठ रहे हैं कि यदि सारे एग्जिट पोल गलत निकल गये तो...
मेरा भी यही सवाल चैनल्स और अखबारों से है कि जो आंकड़े एग्जिट पोल्स में दिखाये गये हैं, वे यदि 23 मई को बदल गये और उल्टा हो गया, तो क्या होगा, तो क्या उन पत्रकारों को उल्टा टांग दिया जाएगा, जिन्होंने ऐसी खबरें परोसी हैं। जिन अखबार वालों, चैनल्स और पत्रकारों ने दिन रात मेहनत करके एग्जिट पोल को 19 तारीख तक लोगों तक पहुंचाया, वाहवाही लूटी, एक दूसरे का पीठ थपथपायी, एक दूसरे को बधाइयां दी, जनता को यह अहसास दिलाने की कोशिश भी की कि वे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हैं, उनके आंकड़े गलत नहीं हो सकते, तो जब उनके बारे में सोचता हूं, तो पीड़ा होती है कि उनकी मेहनत बेकार चली जाएगी, यदि ये सब गलत साबित हो गये तो।
अब सवाल यह है कि यदि एग्जिट पोल के आंकड़े उलट जाते हैं, तो क्या ये सभी पत्रकार जनता से अपनी गलती के लिए माफी मांगंगे या फिर चुनाव आयोग इन पत्रकारों के खिलाफ कोई ऐक्शन लेगा। इन्हें इस बात का अहसास हो कि इनकी जनता और देश के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी है, जो ये नहीं निभा पा रहे हैं।
मेरे हिसाब से एग्जिट पोल्स की यह परंपरा ही हटा देना चाहिए। चुनाव आयोग इस बात पर गौर करे। वैसे पूर्व राष्टपति ने भी चुनाव आयोग पर उंगली उठाई है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर जनता का विश्वास नहीं टूटना चाहिए। ऐक्शन लेना होगा। चुनाव आयोग से प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ईवीएम की सुरक्षा जरूरी है। ऐसा करने से लोगों में भ्रम पैदा नहीं होगा और चैनल्स एवं अखबारवाले भी आराम की नींद सोएंगे। दरअसल, अखबार और चैनल्स वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता, परिवार को घुमाने के लिए वक्त नहीं मिलता, दोस्तों के साथ चाय पकौड़े खाने का वक्त नहीं मिलता, मां और बाबूजी से बतियाने का वक्त नहीं मिलता और न ही अपने बच्चों को एक दिन स्कूल छोड़ने का वक्त मिलता है, तो उन पत्रकारों को भरपूर वक्त मिलेगा। इस दौरान वे न वे किसी का कुछ खाएंगे, न किसी को खाने देंगे।
खबर यही है कि एग्जिट पोल में मिली खुशी के कारण बीजेपी खेमें में लड्डू बंट रहे हैं। बिहार से यह खबर आई है कि 301 किलो लड्डू का ऑर्डर दे दिया गया है। हालांकि एग्जिट पोल की आंधी में बीजेपी के लिए एक बुरी खबर आई है। खबर यह है कि बीजेपी ने एग्जिट पोल में बड़े घपले किये हैं और इस घपले के निशान बीजेपी छुपा नहीं पाई। दो ट्रक ईवीएम सहित हरियाणा में पकड़े गये हैं। हम सब जानते हैं कि पाप का घड़ा जब भर जाता है, तो वह अपने आप ही फूट जाता है। अब यदि यह कहें कि बीजेपी के हर्ता, कर्ता, विधाता के पाप का घड़ा भर गया है, तो शायद गलत नहीं होगा। खबर तो इन दिनों यही आ रही है कि बीजेपी का सूपड़ा लोकसभा के इस चुनाव में साफ हो जाएगा। जीत की खुशी के बावजूद बीजेपी में खलबली मची हुई है। इन दिनों यह भी कहा जा रहा है कि मोदी के सिपहसालारों ने सर्वे एजेंसियों से कहा था कि बीजेपी के पक्ष में सर्वे दिखाया जाए और साथ ही सूत्रों से यह खबर भी आ रही है कि इसके बदले में न्यूज एजेंसियों को मोटी रकम मिली है।
कांग्रेस के दिग्गज नेता राशीद अल्वी ने भी कई सवाल खड़े किये हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सर्वे में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत इसलिए दिखाया गया, ताकि लोग यह कहें कि ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं है। राशीद अल्वी ने इसे साजिश करार दिया है। बता दें कि बीजेपी को 300 सीट दिलाने वाला यह वही मीडिया है, जिसने बालाकोट में मरने वालों की संख्या 300 बताई थी। दरअसल, इन तथाकथित पत्रकारों के कारण देश दो ध्रुवों में बंट गया है। एक तरफ मोदी के प्रशंसक हैं, तो दूसरी ओर उनके आलोचक। देश को बांटने का काम ये तथाकथित पत्रकार ही कर रहे हैं।
लोकतंत्र में पत्रकार, पत्रकारिता, सरकार और कॉरपोरेट घरानों का बहुत बड़ा महत्व होता है। लोकतंत्र में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाज में आई गिरावट का पत्रकारिता पर भी प्रभाव पड़ता है, हालांकि अभी भी हमारे कुछ पत्रकार साथी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता को गौरवान्वित कर सार्थकता प्रदान कर रहे हैं। कुछ पत्रकार तो ऐसे भी हैं, जिन पर केंद्र सरकार ने बहुत दबाव डाला कि केंद्र पर हमला न करें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुकाबला करना बेहतर समझा, झुके नहीं, हारे नहीं। इस श्रेणी में रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, करण थापर, विनोद दुआ, अजीत अंजुम, आशुतोष, अभिसार शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। हमें यह याद रखना होगा कि व्यक्ति अपने गुणों से उपर उठता है, उंचे स्थान पर बैठने से नहीं।
लेकिन एक सच यह भी है। आजकल पत्रकारिता सरकार के विवेक पर नहीं, बल्कि संपादक की इच्छा पर तथा संपादक की इच्छा सरकार की इच्छा पर आधारित होती जा रही है। सरकार चाहे, तो वे पत्रकार बना रहे, सरकार नहीं चाहेगी, तो उसे संस्थान छोड़ना होगा। सरकार के विरुद्ध लिखना और चैनलों में दिखाना अपराध जैसा हो गया है। इस अपराध का दंड भी मिलता है। अब पत्रकारों पर कड़ी नजर रखी जाती है कि वह कहां जा रहा है और किससे मिल रहा है। विरोधियों को अखबार और चैनल्स में कितना स्पेस मिलता है, इसकी भी स्क्रूटिनी लगातार सरकार करती रहती है। अगर सरकार के खिलाफ किसी चैनल ने ज्यादा कुछ दिखा दिया, तो उसे कटघरे में लाकर खड़ कर दिया जाता है। उस चैनल पर तरह तरह से दबाव पड़ने लगता है। दरअसल, आज के तथाकथित चैनल मालिक चैनल के कन्टेंट पर अपनी पकड़ बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि उनके ऐसे कदम पर मीडियाकर्मियों या उनके संगठनों की तरफ से प्रतिरोध नाममात्र का ही होता है। विडंबना तो यही है कि न तो काॅरपोरेट घरानों और न ही उनके नुमांइदे बने संपादकों को अब काॅन्टेंट से ज्यादा कुछ लेना देना रह गया है और न ही सच्चाई से। इसी वजह से पत्रकारिता अब एक नौकरी का रूप धारण कर चुकी है। या तो संपादक गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें संपादकीय शक्ति का क्षरण हुआ है। आश्चर्य की बात तो यही है कि दूसरों के लिए आवाज उठानेवाले पत्रकार आज अपने ही संस्थानों में शोषित और दमित हैं। उनकी आवाज दबा दी जाती है। सरकार के रहमो करम पर नौकरी कर रहे हैं कुछ तथाकथित पत्रकार। जरूरत से ज्यादा सैलरी देकर कुछ पत्रकारों को खरीद लिया जाता है। वे वही दिखाते हैं, जो सरकार चाहती है। पत्रकारों पर दबाव डाल कर सरकार जिस तरह से इस बिरादरी को नुकसान पहुंचा रही है, वह देखकर ऐसा महसूस होता है कि आने वाले समय में सरकार को आईना दिखाने वाला कोई नहीं होगा। हालांकि इससे सरकार को ही नुकसान होगा, क्योंकि सरकार को भले काम में और बुरे काम में कोई फर्क महसूस नहीं होगा।
दरअसल, पत्रकारिता पर व्यवसाय के हावी होने के कारण ही बाजार में बिकनेवाली आम सामग्री की तरह समाचार भी अब एक सामग्री बनकर रह गया है। हैरानी तो इस बात की है कि न केवल अखबार, बल्कि न्यूज चैनल्स भी अब दूसरों को प्रचार देने के बजाय खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में लगे हुए हैं। ऐसे में यदि यह कहें कि बाजारवाद की दुहाई ज्यादातर पत्रकार जी हुजूरी में लग गये हैं, तो शायद गलत नहीं होगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
टैग्स निर्मलेंदु चुनाव 2019 एग्जिट पोल