'कांग्रेस चाहे तो सबक लेकर 52 से 352 तक का सफर तय कर सकती है'

लोकसभा चुनाव 2019 में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिली है शानदार जीत

Last Modified:
Wednesday, 29 May, 2019
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कुरुक्षेत्र : शानदार जीत चुनौती है तो शर्मनाक पराजय अवसर

विनोद अग्निहोत्री, कंसल्टिंग एडिटर, अमर उजाला।।

लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों की अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। पहली तस्वीर दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय की रौनक, जश्न और दोबारा सरकार बनाने की गहमागहमी। दूसरी तस्वीर 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पसरा सन्नाटा। मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं में निराशा और हताशा। नतीजों के अगले दिन सुबह कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश और सभी सदस्यों द्वारा एक स्वर से उसे नामंजूर करने की खबरें आईं। वहीं दूसरी तरफ उसी दिन शाम को संसद के केंद्रीय कक्ष में भाजपा और एनडीए के सभी सांसदों की बैठक में नरेंद्र मोदी को पहले भाजपा संसदीय दल और फिर एनडीए संसदीय दल का नेता चुने जाने का सीधा प्रसारण किया।

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद सहज और जन मन को छू लेने वाला भाषण, जिसमें नव निर्वाचित सांसदों को सत्ता की जगह सेवा भाव रखने और अहंकार से दूर रहकर देशहित के लिए काम करने की नसीहत देते हुए प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यकों में व्याप्त डर को दूर करने और उनका विश्वास जीतने का संकल्प व्यक्त किया। लेकिन प्रधानमंत्री के इस भाषण का उन लोगों पर जो इस देश के सामाजिक तानेबाने को ध्वस्त करने पर उतारू हैं, उन पर कितना असर पड़ा, इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के सिवनी में कथित गौरक्षकों द्वारा कुछ लोगो की निर्मम पिटाई का विडियो और गुरुग्राम में नमाजी टोपी पहने एक युवक की पिटाई की घटनाओं से समझा जा सकता है। ऐसे तत्वों पर सख्ती से लगाम लगाए बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने का अपना संकल्प कैसे पूरा कर पाएंगे।

इसलिए देश में कहीं भी एसी कोई भी घटना होने पर सरकारी तंत्र के तत्काल सक्रिय होने की जरूरत होगी। देश ने 2019 जो का जनादेश दे दिया, उसमें पहले की अपेक्षा ज्यादा बहुमत और ताकत के साथ यह जिम्मेदारी मोदी और उनकी टीम को मिली है कि पिछले कार्यकाल के दौरान उनकी जन कल्याणकारी योजनाओं के लाभ का विस्तार देशव्यापी हो और जो आशा और अपेक्षा देश को उनसे है, उसे पूरा करने में कोई बाधा न हो। जीत के बाद दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कभी सिर्फ दो सांसदों तक सिमटने वाली भाजपा को दोबारा सरकार बनाने का जनादेश मिला है। उन्होंने कहा कि दो से दोबारा के इस लंबे सफर में पार्टी ने बड़ा संघर्ष किया और कई उतार चढ़ाव देखे।

नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की दो से दोबारा तक की इस जबर्दस्त उपलब्धि के अनेक विश्लेषण हो रहे हैं और इसे मोदीत्व की सुनामी जैसे विशेषणों से नवाजा जा रहा है। निश्चित रूप से यह लंबे समय बाद किसी बहुमत की सरकार को दोबारा पहले से ज्यादा बहुमत मिलने की यह घटना एतिहासिक भी है और सभी राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा संदेश भी है कि अब भारत की राजनीति बीसवीं सदी के मानदंडो, सियासी फार्मूलों और राजनीतिक व सामाजिक गठजोंडों के जरिए नहीं की जा सकती है। अब राजनीतिक दलों को जनता का विश्वास जीतने के लिए ऐसा लोकलुभावन विमर्श गढ़ना होगा जो सामने वाले पर भारी पड़े।

सूचना तकनीक और प्रचार माध्यमों का चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल, नेता नेतृत्व और नीतियों के प्रति लोगों में उम्मीद पैदा करने की कला, जनता से सीधे संवाद और अंशकालीन शौकिया राजनीति की जगह 24 घंटे की अथक राजनीतिक मेहनत वह कुंजी है जिससे सत्ता और चुनावी जीत के दरवाजे का ताला खोला जा सकता है। अब लौटते हैं कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने अब अगले पांच साल की चुनौतियां क्या हैं। जनता ने जिस विश्वास से नरेंद्र मोदी को दोबारा मौका दिया है, उस पर खुद उन्हें भी विश्वास नहीं हो रहा है, जिन्हें भाजपा और मोदी सरकार की सत्ता वापसी पर कोई शक नहीं था। लेकिन मोदी है तो मुमकिन है कि नारे ने ऐसा असर दिखाया कि जाति संप्रदाय क्षेत्र वर्ग वर्ण की दीवारें ढहाकर नतीजे आए।

सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ जबकि विपक्ष ने नोटबंदी,जीएसटी, राफेल, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्याएं, तबाही, अर्थव्यस्था के पटरी पर उतरने, महिला असुरक्षा, सामाजिक तनाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से देश का सामाजिक तानाबाना बिखरने, दलितों, वंचितों और आदिवासियों पर बढ़ते अत्याचारों के मुद्दों पर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसा नहीं है कि विपक्ष के इन आरोपों में कोई सत्यता नहीं थी, लेकिन बहुमत मतदाताओं ने इन्हें स्वीकार नहीं किया और एक बार फिर उन नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया, जिन्होंने 2014 में काला धन वापस लाकर सबके खातों में 15 लाख रुपये भेजने, हर साल दो करोड़ रोजगार देने, किसानों की आमदनी दुगनी करने और उनकी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 फीसदी तक वृद्धि करने, भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने और न्यूनतम सरकार अधिकतम सुशासन जैसे वादे और नारे दिए थे।

इनमें से मोदी और उनकी टीम ने चुनाव प्रचार के दौरान एक भी वादा पूरा होने का दावा या उसका जिक्र तक नहीं किया। बल्कि उसकी जगह नरेंद्र मोदी, अमित शाह की जोड़ी के चुनावी भाषणों में पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों को घर में घुसकर मारने, हिंदुओं को आतंकवादी कहकर बदनाम करने की कांग्रेस की साजिश, राजीव गांधी के भ्रष्टाचार से लेकर आईएनएस विराट का इस्तेमाल पिकनिक मनाने के लिए करने और 1984 की सिख विरोधी हिंसा के लिए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने जैसे मुद्दे थे। राहुल गांधी के चौकीदार चोर है के नारे का जवाब मैं भी चौकीदार अभियान चला कर दिया गया।

अपनी सरकार की उपलब्धियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार की उज्जवला योजना, स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों के निर्माण, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों को घर देने, जिन घरों में बिजली नहीं उजाला योजना के तहत उन्हें बिजली कनेक्शन देने, आयुष्मान भारत के तहत दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा, किसानों के खाते में प्रति वर्ष छह हजार रुपये की सम्मान राशि का जिक्र भी अपने चुनावी भाषणों और प्रचार अभियान में किया। जनता ने विपक्ष और उसके नेता राहुल गांधी की बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया। लोगों को लगा कि मोदी की नीयत में खोट नहीं है, हो सकता है शुरु में कुछ गल्तियां हुई हों लेकिन इनकी ईमानदारी, मेहनत और देश के प्रति कुछ करने की लगन असंदिग्ध है। इसलिए इस व्यक्ति को एक मौका और देना चाहिए।

कमोबेश स्थिति वैसी ही थी जैसी 2009 में लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ बेहद आक्रामक प्रचार अभियान चलाया था, लेकिन जनता ने आडवाणी जैसे मजबूत नेता की जगह साफ सुथरी और नरम छवि वाले लेकिन देश के लिए कुछ करने की इच्छा रखने वाले मनमोहन सिंह को दूसरा मौका दिया। तब कांग्रेस भी 142 से 206 पर पहुंच गई थी और पहले कार्यकाल में वाम दलों के बाहरी समर्थन पर निर्भर यूपीए को दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिल गया था। लोगों ने मनमोहन सिंह को ज्यादा ताकत इसलिए दी थी कि अब वो ज्यादा स्वतंत्रता से अपना काम करते हुए देश को आगे ले जाएंगे लेकिन मनमोहन की सहयोगी दलों पर निर्भरता थी और उसके बाद जो हुआ वो सबके सामने है।

जनता ने नरेंद्र मोदी पर फिर भरोसा किया है। अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा भी था कि आपका एक एक वोट मोदी के खाते में जाएगा। इसलिए लोगों ने न पार्टी देखी, न चुनाव चिन्ह न उम्मीदवार अपना वोट मोदी के लिए दिया। इसलिए अब जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी की ही है कि वह अपने वादों और इरादों को अमली जामा पहनाएं। पुरानी जन कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार करें और नई नीतियां लागू करें। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएं। बेरोजगारी से निबटें। विदेशी बैंको से काले धन की वापसी हालाकि इन चुनावों में कोई मुद्दा ही नहीं था, लेकिन अगर वापस ला सकें तो लाएं। आतंकवाद पर सफल नियंत्रण लगाते हुए कश्मीर में अमन चैन बहाल करें। सीमाओं की सुरक्षा चाक चौबंद करते हुए एसा वातावरण तैयार करें कि सुरक्षा बलों और सेना के जवानों की जान भी सलामत रहे।

किसानों की आत्महत्याएं रोकने वाली आर्थिक नीतियां लागू करें। कृषि उपज का लागत के मुताबिक मूल्य मिले। किसानों की आमदनी दुगनी हो और सबका साथ सबका विकास के साथ साथ सबका विश्वास के नारे को अमल में लाते हुए सामाजिक सद्भवा और सौहार्द बहाल हो। गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाने वालों पर लगाम लगे। अंतर्राष्टीय स्तर पर भारत की भूमिका और ज्यादा प्रभावशाली हो। सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की ओर भारत के कदम बढ़ें और परमाणु आपूर्ति संगठन (एनएसजी) में भारत को प्रवेश मिले।

लोगों की इन अपेक्षाओं और उम्मीदों को पूरा करने अगर नरेंद्र मोदी सफल रहते हैं तो 2024 के आम चुनावों में भी जनता का विश्वास उन्हें फिर मिल सकेगा और अगर उनकी सरकार इन तमाम मोर्चों पर नाकाम रहती है तो 2024 में देश में कुछ वैसा ही बदलाव देखने को मिल सकता है जैसा कि 2014 में देश ने देखा। सही है कि विपक्ष लथपथ है। उसके किले ध्वस्त हो चुके हैं। कांग्रेस जो 2014 में 44 सीटों पर सिमट गई थी, तमाम मेहनत और चुनावी अभियान के बावजूद महज 52 सीटों तक ही पहुंच पाई है। 17 राज्यों में उसका खाता भी नहीं खुल सका है जिनमें राजस्थान जैसा राज्य भी शामिल है जहां पिछले साल दिसंबर में ही उसने विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई है। इसी तरह दिसंबर में जीते गए दो और राज्यों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस महज एक और दो सीटें ही जीत सकी है।

उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन और बिहार में राजद कांग्रेस उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी, मुकेस साहनी के जातीय गठबंधनों को लोगों ने नकार दिया। महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी कांग्रेस के गठबंधन असफल रहे। ऐसे में अगर विपक्ष की यह दुदर्शा सत्ता पक्ष को निरंकुश और अहंकारी बना देती है तो यह न देश के लिए ठीक होगा न खुद सत्तापक्ष के लिए। शायद इसे ही भांप कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता पक्ष के सांसदों को सत्ता की जगह सेवा भाव रखने और अहंकार से दूर रहने की नसीहत दी है। लेकिन यह नसीहत सांसदों के साथ साथ सरकार और उसके मंत्रियों पर भी लागू होती है। इसलिए जितनी ज्यादा ताकत जनता ने दी है उतनी ही बड़ी परीक्षा भी जनता लेगी, इसे सत्ता पक्ष को याद रखना होगा।

अब बात विपक्ष की। चुनाव नतीजों से सन्नाटे में आई कांग्रेस में राहुल गांधी की अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश और कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा एक स्वर से नामंजूर किए जाने के बावजूद राहुल का उस पर अड़ना बताता है कि राहुल ने यह कदम सिर्फ औपचारिकता वश नहीं उठाया। वह दिल से इस पर फैसला लेना चाहते हैं। लेकिन यक्ष प्रश्न है कि अगर राहुल नहीं तो फिर कौन। नेहरू गांधी परिवार को लेकर कांग्रेस पर वंशवाद के कितने ही आरोप लगें लेकिन यह सच्चाई है कि यह परिवार कांग्रेस की ताकत और कमजोरी दोनों है। ताकत इसलिए कि यह परिवार पार्टी को एकजुट रखने की धुरी है क्योंकि इसकी स्वीकार्यता न सिर्फ पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में है बल्कि कांग्रेस के समर्थक वर्ग को भी इसी परिवार पर भरोसा है।

कमजोरी इसलिए कि परिवार पर निर्भरता पार्टी को परिवार से बाहर सोचने ही नहीं देती और पार्टी में परिवार से इतर कोई नेतृत्व विकसित ही नहीं हो पाता। वैसे ये भी सच है कि आजादी के बाद कांग्रेस के कुल 18 अध्यक्षों में गांधी परिवार के सिर्फ पांच ही हैं। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी, गांधी परिवार के पांचवे व्यक्ति हैं जो अध्यक्ष बने हैं। यह भी सही है कि कांग्रेस को ताकत और स्वीकार्यता भी तभी मिली जब गांधी परिवार के हाथ में पार्टी की कमान रही है। वरना राजीव गांधी के बाद नरसिंह राव और सीताराम केसरी के कार्यकाल में कांग्रेस जहां पहुंच गई थी, वहां से उसे उबारने का काम भी उन सोनिया गांधी ने किया था जो अध्यक्ष बनने से पहले तक राजनीति के क ख ग से अपरिचित थीं।

इसलिए समाधान राहुल के अध्यक्ष पद से इस्तीफे में नहीं बल्कि पार्टी के संगठनतात्मक ढांचे में आमूल चूल बदलाव करके कील कांटे दुरुस्त करने में है। पराजय मनोबल तो तोड़ती है लेकिन बदलने सुधरने और आगे बढ़ने का अवसर भी देती है। राहुल को अपने इस्तीफे पर अड़ने की बजाय अपने फैसलों पर अड़ना होगा। कार्यसमिति की बैठक में अगर उन्होंने अशोक गहलौत, चिदंबरम और कमलनाथ जैसे नेताओं को इसलिए आड़े हाथों लिया कि उनकी पूरी ताकत और मेहनत सिर्फ अपने बेटों को जिताने में लगी रही तो अब राहुल को यह भी समझना होगा कि पार्टी के हर नेता का परिवार नेहरू गांधी परिवार नहीं है। वरिष्ठ नेताओं की अगर अपने क्षेत्रों में स्वीकार्यता है तो उनका विरोध भी है।

समाज और जनता के साथ साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में भी तमाम बड़े नेताओं की स्वीकार्यता नहीं है, तो उनके बेटों बेटियों की स्वीकार्यता कैसे होगी। किसी नेता के बेटे को सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जाना चाहिए कि वह किसी बड़े नेता की संतान है साथ ही उसे इसलिए भी तरजीह नहीं मिलनी चाहिए कि वह किसी बड़े नेता की संतान है। कांग्रेस में सबसे बड़ी चुनौती नई और पुरानी पीढ़ी के बीच संतुलन बनाने की है। सही है कि कई पुराने नेता थक चुके हैं लेकिन कई एसे भी हैं जिनके पास अभी भी न सिर्फ अनुभव है बल्कि उनकी सामाजिक स्वीकार्यता भी है। जबकि तमाम युवा पीढ़ी के नेताओं में ज्यादातर बड़े पिताओं की संतान हैं और उन्हें धूल में पार्टी के लिए खटने की न आदत है न प्राथमिकता। जबकि तमाम जमीनी कार्यकर्ता और आंचलिक नेता अपनी उपेक्षा और अनदेखी की वजह से घरों में बैठ गए हैं।

पार्टी के ढांचे में ऊपर से नीचे तक यह सफाई बहुत जरूरी है। प्रदेश इकाइयों से लेकर जिला स्तर तक संगठन के पुनर्गठन के काम को तत्काल शुरु किए जाने की जरूरत है। पार्टी में फैसले न लेने या बहुत देर से लेने की वजह से लगातार संगठन का क्षरण होता गया है जिसके नतीजे इन चुनावों में साफ दिख रहे हैं। एक अच्छा घोषणा पत्र जिसकी सर्वत्र सराहना हुई, न्याय योजना जिसे लोगों ने गेम चेंजर बताया, लेकिन जनता पर असर क्यों नहीं दिखा सका इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी का जर्जर सांगठनिक ढांचा है। राहुल गांधी को पलायन की जगह पार्टी में डटकर खड़े होने, कड़े और त्वरित फैसले लेने होंगे। इस्तीफा देकर दूर हट जाना समाधान नहीं है।

चुनौती को स्वीकार करना और परिस्थितियों से लड़कर खुद को साबित करने का इससे बेहतर मौका उन्हें दूसरा नहीं मिल सकता। एक पंजाब और केरल को छोडकर पार्टी के सारे दिग्गज नेता खुद भी खेत रहे और कोई कमाल भी नहीं कर पाए। अब राहुल तमाम नए पुराने परजीवी नेताओं से पार्टी संगठन को मुक्त करें। विचारधारा और पार्टी के प्रति वफादार नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहचान करके उन्हें आगे लाया जाए और अगले दो साल तक सिर्फ संगठन निर्माण और उसके विस्तार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। केंद्र की मोदी सरकार को काम करने का पूरा मौका देकर कम से कम दो साल तक सारा ध्यान देश भर में संगठन निर्माण पर ही देना होगा। अभी इसी साल अक्टूबर में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और संभवत जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं, इन राज्यों में तत्काल आमूल चूल बदलाव करके जमीनी और जनाधार वाले नेताओं को कमान दिए जाने की जरूरत है।

गठबंधन सिर्फ वहीं किया जाए जहां बेहद जरूरी हो। सिर्फ कुछ नेताओं की लोकसभा और राज्यसभा की राह आसान करने के लिए गठबंधन नहीं किया जाना चाहिए। सबसे ज्यादा ध्यान उत्तर प्रदेश और बिहार पर देने की जरूरत है। इन दोनों राज्यों में पार्टी संगठन लुप्त प्राय है। इसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रियंका गांधी को खुद सक्रिय होना पडेगा। सिर्फ रोड शो और उत्सव धर्मिता की राजनीति से काम नहीं चलेगा। इन दोनों राज्यों में जिले जिले और गांव गांव घूमने की जरूरत है। लोग अभी भी भाजपा के विकल्प के रूप में कांग्रेस को ही देखते हैं। इसलिए उन तक सीधे पहुंचने की जरूरत है। जिन राज्यों में कांग्रेस सरकारे हैं, वहां भी संगठन बेहद कमजोर है। उन राज्यों में भी नए और जमीनी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देनी होगी।

2022 में उत्तर प्रदेश में चुनाव होंगे। सपा बसपा की चमक उतर चुकी है। उनके जातीय गठजोड़ को भी लोगों ने नकार दिया है। ऐसे में कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस पा सकती है, बशर्ते कड़ी और निरंतर मेहनत वाली प्रदेश इकाई बनाई जाए। दिल्ली या मुंबई से लखनऊ आकर अंशकालीन अध्यक्षों से काम नहीं चलेगा। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, राजस्थान में सचिन पायलट और कभी आंध्र प्रदेश में वाई.एस.राजशेखर रेड्डी ने जिस तरह मेहनत करके पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, वैसी ही मेहनत और लगन वाले नेता ही पार्टी को उबार सकते हैं। भाजपा, मोदी और सरकार के खिलाफ विरोध की नकारात्मक राजनीति की जगह विरोध की सकारात्मक राजनीति और मुद्दे उठाए जाने चाहिए।

विरोध व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था और नीतियों का होना चाहिए। कुल मिलाकर इतिहास ने राहुल गांधी को इस पराजय के जरिए फिर से खड़े होने का वैसा ही मौका दिया है जैसा कभी 1984 में भाजपा को दो लोकसभा सीटों पर समेट कर दिय़ा था और भाजपा ने निरंतर मेहनत करके दो से दोबारा मौका मिलने तक का लंबा सफर तय किया है। कांग्रेस चाहे तो उससे सबक लेकर 52 से 352 तक का सफर तय कर सकती है या फिर पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए इससे भी नीचे जा सकती है। तय उसे करना है, नियति तो सिर्फ अवसर देती है।

(साभार: अमर उजाला)

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सलिल सरोज का बड़ा सवाल, क्या वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है

Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Salil Saroj

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है। जिस शासक को शासन करने के लिए चुना जाता है, वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके तानाशह न बन जाए,इसलिए उसको चुनने और उसको हटाने की सारी संभावनाओं को जनता के हाथ में सौंपा गया है। अब्राहम लिंकन ने यह कथन अमेरिका के सन्दर्भ में जरूर कहा था, लेकिन दुनिया के तमाम देशों ने कतिपय इसी रूप में इसे अपनाया है । भारत और अमेरिका के बीच भाषा,संस्कृति,समाज समेत और भी कई तरह की असमानताएं हैं, लेकिन अमेरिका और भारत दोनों ही गणतंत्र की मजबूत नींव को पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं और दूसरे राष्ट्रों को भी गणतंत्र होने के लिए सम्बल प्रदान कर रहे हैं।

भारतीय गणतंत्र को अभी आठ दशक से भी कम समय हुआ है, लेकिन इस समय अवधि में भारत के कई पड़ोसी मुल्क जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार धार्मिक हिंसा, तानाशाही, जातीय नरसंहार या वंशवाद से अभिशप्त हो गए, लेकिन भारत एक जिम्मेदार गणतंत्र के रूप में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही चला गया। आखिर भारत ने भी इंग्लैंड से ही प्रेरित गणतंत्र को अपनाया, लेकिन किस तरह अपनाया कि यह विश्व के सबसे विशाल और सुदृढ़ गणतंत्र के रूप में परिणत हुआ, यह अवश्य जानकारी का विषय है। इसे बनाने में हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने किन बातों का ध्यान रखा, इसका अध्ययन परम आवश्यक है।

सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित इकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी 1930 तक जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितियां थीं, जिनमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपुर्द किया। इसलिए 26 नवम्बर को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।

भारत अपार संभावनाओं से परिपूर्ण राष्ट्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति है इसकी विभिन्नता। यहां हर तरह के लोगों ने इस देश को विश्व में एक मुकम्मल गणतंत्र बनने में मदद की है। यह जमीन गौतम बुद्ध,महावीर,गुरु नानक,भीकाजी कामा,हेनरी लुइस विवियन दरोज़ीयो, महात्मा गांधी, वीर कुंवर सिंह, भगत सिंह, मौलाना अबुल कलाम, खां अब्दुल गफ्फार खां के द्वारा पाली और पोसी गई है। इसकी हवाओं में अनेकता में एकता का राग घुला है और हर विषम परिस्थिति में यह चीज रामबाण की तरह साबित हुई है। चाहे वह 1971 का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध हो,चाहे भूख से निजात पाने की कोशिश हो,चाहे उत्तर पूर्व में अपनी अस्मिता को बचाने की चाह हो, चाहे बारिश से डूबते हुए चेन्नई और मुंबई की जनता की जान बचाने की गुहार हो या फिर निर्भया को इन्साफ दिलाने की अदम्य इच्छाशक्ति हो,हर बार हर जाति,धर्म,लिंग,प्रान्त,समुदाय के लोगों ने मिलकर यह जिम्मा उठाया है।

‘यूनान,मिश्र,रोमां सब मिट गए जहां से
बाकी मगर है फिर भी नामों-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा।।

आजादी के 73 सालों में हम खाद्य सम्पन्न राष्ट्र बने और दूसरे देशों को आज भुखमरी से निजात दिलाने में मदद कर रहे हैं। आज हम विश्व में इसरो जैसे संस्था के पुरोधा है दूसरे देशों के कृत्रिम उपग्रह छोड़ने में मदद पहुंचा रहे हैं। पूरे विश्व के लिए हम सबसे युवा और सस्ता वर्क फोर्स दे रहे हैं और पूरी दुनिया भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर टेक्निशियंस का लोहा मानती है। पूरे विश्व में एम्स, आईआईएम, आईआईटी ने भारत को एक ब्रैंड के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपनी कार्यशैली में बेहतरीन हैं। हमारी साक्षरता दर लगभग आजादी के समय की तिगुनी हो गई है। लोगों के जीवन स्तर में आमूल परिवर्तन हुआ है। हम प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण राष्ट्र बन कर उभरे है। हम सबसे कम ऊष्मा उत्सर्जन और सबसे अधिक वन संरक्षण करने वालों देशों में शामिल होते हैं। दक्षिण अमेरिका,अफ्रीका,एशिया सहित हम विश्व के तमाम फोरम पर आज अगुवाई कर रहे हैं। जिस राष्ट्र की कल्पना महान देशप्रेमियों ने की थी, उसकी तरफ इंच दर इंच बढ़ते जा रहे हैं। परन्तु क्या यह सब आत्ममुग्धता के सिवाय कुछ भी नहीं है!

‘कहां तो तय था चिरागां हर घर के लिए,
पर आज रोशनी मयस्सर नहीं पूरे शहर के लिए।’

इतनी तरक्कियों के वाबजूद एक बहुत बड़ा भाग हर रात खाली पेट फुटपाथों पर सोने को बाध्य है। जवान पढ़े-लिखे बच्चे अपनी काबिलियत के अनुसार काम पाने को भटक रहे हैं। देश के कुछ समुदाय डर के साये में जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। सरकारी नियमों के नाम पर जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। वोट के नाम पर हर तरह के दुराचार फैलाए जा रहे है। 70 साल बाद भी चुनाव का मुद्दा रोटी,कपड़ा और मकान ही दिखता है। औरतों के प्रति बढ़ती हिंसा के कारण देश की राजधानी दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ की संज्ञा तक दे दी गई है। हमारे जल,जंगल,जमीन,हवा सब प्रदूषित हो चुके हैं। हम आज भी बाह्य आडम्बर से ज्यादा दूर नहीं निकल पाए हैं और रोज किसी ढोंगी साधु के पकड़े जाने की खबर पढ़ते हैं। हमारे बुजुर्ग एकाकी जीवन बिताने को संघर्षरत हैं। बच्चियां आज भी अपने हक के लिए बिलख रही हैं। हमारे अच्छे फल, फूल, सब्जी, कपड़े, पानी, पेट्रोल सब दूसरे राष्ट्र को निर्यात किए जाते हैं और हम अपने देश में ही द्वितीय नागरिक की तरह खराब और बचे-खुचे हुए सामान पाने की कतार में खड़े हैं। तो आखिर हम हैं कहां? क्या इस दिन के सपने देखे गए थे? क्या हमारे वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?

‘उतरा कहां स्वराज, बोल दिल्ली तू क्या कहती है
तू तो रानी बन गई,वेदना जनता क्यों सह्ती है
किसने किसके भाग्य दबा रखे हैं अपने कर में
उतरी थी जो विभा वन्दिनी,बोल हुई किस घर में’

एक गणतंत्र के रूप में हमने जितना हासिल किया है, अभी उससे ज्यादा हासिल करना बाकी है। राष्ट्र का निर्माण केवल गगनचुंबी मीनारों से नहीं होता, बल्कि देश के हर नागरिक की चाहतों की पूर्ति से होता है। हर एक को खुश रख पाना किसी के लिए सम्भव नहीं, लेकिन गणतंत्र संख्या का खेल है। यदि अधिकतम जनसंख्या की बातों को लेकर एक सहमति बनाई जा सकती है तो वास्तविकता में वही गणतंत्र की जीत है। सरकार हर तौर पर कई फैसले ले रही है, जो जनता की भलाई और इस राष्ट्र के उत्थान के लिए हैं। जनता को अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करना चाहिए।

‘हम ने बहुत सोच-समझ और देख-भाल के रखा है
अपने सीने में हमने गणतंत्र को पाल के रखा है।’

परिस्थितियां कितनी भी कठिन रही हों, भारतीय गणतंत्र ध्रुव तारे की तरह अटल रहा है। इसकी शास्वतता का कारण लोगों के दिलों में इस तंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। जब तक यह विश्वास बना रह्ता है, इसको कोई भी हिला नहीं सकता। इस विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार और जनता दोनों की है और इसका मूल मंत्र बस एक है-

‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।’

(लेखक लोकसभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं)

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अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए मिस्टर मीडिया!

इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है

राजेश बादल by
Published - Monday, 20 January, 2020
Last Modified:
Monday, 20 January, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो वही हुआ,जिसका डर था। पत्रकारिता के तमाम रूपों में बढ़ रही गैर जिम्मेदारी चिंता में डालती थी। इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है। अब भी अगर न चेते तो फिर विस्फोटक स्थिति बन जाएगी। बयालीस साल के पत्रकारिता जीवन में मैंने पाया कि आचार संहिता बनाने पर विचार तो हुआ, लेकिन अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। सब यह भी कहते रहे कि यह काम सरकार की ओर से नहीं होना चाहिए। सरकारी आचार संहिता एक किस्म की सेंसरशिप ही होती है।सरकार को आपकी नब्ज पर हाथ रखने का अवसर मिल जाता है।

अब केंद्र सरकार के चार मंत्रालय-सूचना और प्रसारण, आईटी, क़ानून और गृह मंत्रालय सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश बना रहे हैं। इनके आकार लेने के साथ ही पत्रकारिता के इस ताकतवर प्लेटफॉर्म पर सरकारी निगरानी बढ़ जाएगी। सूचना प्रसारण विभाग  पेशेवर पत्रकारिता के कान पकड़ेगा तो आईटी उसके हाथ-पैर काटने में सक्षम होगा। कानून मंत्रालय इस पत्रकारिता को कोर्ट के चक्कर लगवाएगा और गृह मंत्रालय अंत में आपका खात्मा कर देगा। इस तरह से भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले अंग ने जानबूझकर खुद को सरकारी हिरासत में सौंप दिया है।

वैसे तो मामला 2012 में ही शुरू हो गया था, जब चुनाव आयोग से निर्देश मिलने के बाद केंद्र सरकार ने अपने दिशा निर्देश तैयार कर लिए थे। भारी विरोध के मद्देनजर यह टलता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट बीच में आ गया तो 15 जनवरी तक केंद्र सरकार को इन्हें बना लेना था। अब इस महीने के अंतिम सप्ताह में एक तरह से यह आचार संहिता सर्वोच्च अदालत को सौंप दी जाएगी ।

आजादी के बहत्तर साल बाद भी अगर भारतीय पत्रकारिता का यह चेहरा है तो विनम्रता से निवेदन करना चाहता हूं कि हमने अपने घर को ठीक करने पर ध्यान नहीं दिया है। खतरे की घंटियां तो कब से बज रही थीं, हम ही उनकी अनदेखी करते रहे। इस लापरवाही और अक्षम्य कृत्य का फायदा कोई भी सरकार क्यों नहीं उठाना चाहेगी? अब तो यह भी कहने का समय हाथ से फिसल सा गया है कि संभल जाइए। फिर भी कहूंगा कि सोशल मीडिया के अलावा टीवी और प्रिंट पत्रकारिता पर लटकी तलवार की चिंता कर लीजिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

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हरिवंश नारायण ने पूर्व पीएम चंद्रशेखर की जिंदगी के अनछुए पन्नों से कुछ यूं कराया रूबरू

पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं

Last Modified:
Sunday, 19 January, 2020
Harivansh Narayan

पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह इन दिनों राज्यसभा के उप सभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पत्रकारिता में अपना लोहा मनवाने के बाद हरिवंश नारायण सिंह राजनीति में भी सफलता के नए आयाम स्थापित कर चुके हैं। वह जदयू सांसद हैं और अपनी नई भूमिका में अक्सर हो-हंगामे के बीच बेहतरीन तरीके से उच्च सदन को संभालते हुए नजर आते हैं। सभापति की गैरमौजूदगी में जिस तरह वह सदन का कामकाज संभालते हैं, वह काबिले तारीफ है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनकी इसी काबिलियत को प्रमुख आधार मानते हुए पिछले दिनों उन्हें 100 असरदार भारतीयों की सूची में शामिल किया है।

संसदीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में दुनिया भर में यात्रा करते हुए वह भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अपनाने के लिए अक्सर पाकिस्तान को निशाने पर लेते रहते हैं। सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में भी हरिवंश को शामिल किया जा चुका है। एक पत्रकार और ‘प्रभात खबर’ के संपादक के तौर पर झारखंड में ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने में उन्होंने बहुत काम किया है।  

इन सबके अलावा हरिवंश नारायण के व्यक्तित्व का एक पहलू और है। एक पत्रकार के तौर पर वह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के काफी करीबी रहे हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में उनके साथ काम भी कर चुके हैं। यही नहीं, वह रवि दत्त बाजपेयी के साथ मिलकर चंद्रशेखर पर एक किताब ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ (CHANDRA SHEKHAR: THE LAST ICON OF IDEOLOGICAL POLITICS) भी लिख चुके हैं। हमारी सहयोगी बिजनेस मैगजीन ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BW Businessworld) के साथ एक बातचीत में हरिवंश नारायण सिंह ने बताया कि आखिर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को क्यों वह ‘वैचारिक राजनीति’ (ideological politics) का आखिरी आइकन मानते हैं।

एक घंटे से ज्यादा की इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह का कहना था, ‘राजनीति में आने से पहले मैं एक पत्रकार रहा हूं और धर्मयुग, रविवार जैसे पब्लिकेशंस से जुड़ा रहा हूं। मैं उत्तर प्रदेश और बिहार के बॉर्डर पर स्थित बलिया का रहने वाला हूं और संयोग से जेपी (जयप्रकाश नारायण) भी उसी क्षेत्र के थे। ऐसे में मुझे छात्र जीवन और इसके बाद करियर के दौरान जेपी और उनके बाद चंद्रशेखर जी से जुड़े रहने का मौका मिला।’

हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘वर्ष 1972 में जब मैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में था तो उस दौरान जेपी आमतौर पर वहां सभाओं को संबोधित करने आते थे। शुरू में वहां 100 छात्र भी नहीं आए। कुछ महीनों बाद उन्हें सुनने के लिए 1.5 लाख लोग जुड़े। जो मुद्दा वह उठा रहे थे, उसकी बदौलत यह भीड़ बढ़ती गई। यह मार्च 1977 की बात है, मैं काम की वजह से मुंबई में था और तभी आपातकाल (Emergency) के बाद हुए लोकसभा चुनावों का परिणाम आया था। मुझे याद है कि इन आंकड़ों को मंत्रालय के बाहर बोर्ड पर लिखा गया था। इन परिणामों की झलक पाने के लिए आम आदमी के साथ ही फिल्म स्टार्स और नेताओं की भीड़ जुट गई थी। तब चंद्रशेखर ‘यंग इंडियन’ (Young Indian) नाम से साप्ताहिक पत्रिका मैगजीन निकालते थे। वह जो संपादकीय लिखते थे, वह आए दिन अखबारों की हेडलाइंस बना करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा ऐसा ही एक वाक्या मुझे आज भी याद है।’

हरिवंश नारायण ने बताया, ‘जब चंद्रशेखर जी से मेरी मुलाकात हुई, उस दौरान मैं ‘धर्मयुग’ (Dharmayug) में थे। उस दौरान जेपी को मुंबई के जसलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चंद्रशेखर ने पास में ही एक गेस्ट हाउस लिया हुआ था और वह अधिकतर समय उनके साथ ही रहते थे। उसी दौरान जेपी के निधन की किसी ने अफवाह उड़ा दी। यहां तक कि संसद ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दे दी। जब जसलोक अस्पताल के बाहर बहुत ज्यादा भीड़ एकट्ठी हो गई, तो चंद्रशेखर ने वहां आकर कहा कि यह फर्जी खबर है और जेपी उनके साथ हैं। फिर मैंने उनका इंटरव्यू लिया। उस दौरान भी मैं धर्मयुग में था। इसके बाद मैं उनके संपर्क में बना रहा। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो मैं बतौर जॉइंट सेक्रेटरी (अतिरिक्त सूचना सलाहकार) के तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ गया। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से जुड़े मिस्टर श्रीवास्तव उनके प्रेस एडवाइजर हुआ करते थे। यह भारतीय राजनीति की काफी बड़ी घटना थी, जब कोई बिना मंत्री बने सीधे प्रधानमंत्री बन गया था। वह काफी निर्णायक नेता थे और यदि उन्हें जनादेश मिला होता तो वह सबसे सफल प्रधानमंत्री साबित होते। यह सिर्फ मेरा मानना ही नहीं है, बल्कि आर वेंकटरमण, प्रणब मुखर्जी, मुचकुंद दुबे और एमके नारायणन जैसे तमाम दिग्गजों ने उनके बारे में लिखा है। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने लिखा भी था कि यदि चंद्रशेखर प्रधानमंत्री पद पर बने रहते तो अयोध्या विवाद का सौहार्दपूर्ण ढंग से तभी समाधान हो जाता। चंद्रशेखर ने उस दौरान कई चुनौतीपूर्ण मुद्दों का सामना किया। लेकिन उन्हें कभी इसका श्रेय नहीं मिला। इसी वजह से मेरे मन में यह किताब लिखने का ख्याल आया और मैंने इसका नाम ‘चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’ चुना।‘

इस बातचीत के दौरान हरिवंश नारायण सिंह ने यह भी बताया, ‘चंद्रशेखर गरीब परिवार से थे। उनके पास एक विकल्प यह भी था कि वह शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने परिवार की अच्छे से देखभाल करते, लेकिन इसके बजाय उन्होंने एक कठिन रास्ता चुना, यह जानते हुए भी कि यह काफी कठिन, चुनौतीपूर्ण और अनिश्चितताओं भरा होगा। चंद्रशेखर आचार्य नरेंद्र देव के सिद्धांतों से बहुत प्रभावित थे और वह लगातार उसी विचारधारा पर चलते रहे। अगले 15-20 साल काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहे। पार्टी के काम के दौरान उन्होंने कई बार पार्टी कार्यालय में साफ-सफाई भी की। यह उनकी लीडरशिप का ही कमाल था कि ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ (PSP) कांग्रेस के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई थी। वर्ष 1962 में उन्होंने संसद में प्रवेश किया।’

हरिवंश नारायण के अनुसार, ‘चंद्रशेखर का मानना था कि मुद्दे हमेशा व्यक्तित्व से बड़े होते हैं और ये मुद्दे ही देश को आगे ले जाने का काम करेंगे। वह हमेशा बैंकों, बीमा और कोयला सेक्टर का राष्ट्रीयकरण चाहते थे। इन मुद्दों के लिए लड़ते हुए वह कांग्रेस में शामिल हो गए। ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ ने उन्हें निष्कासित कर दिया। छह-सात महीने तक वह इससे अलग रहे। कांग्रेस में रहते हुए इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद वह कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए चुन लिए गए थे। बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद उन्होंने जनता पार्टी जॉइन कर ली। इंमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी चाहती थीं कि चंद्रशेखर कांग्रेस में वापस आ जाएं, लेकिन चंद्रशेखर ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद समाजवादी जनता पार्टी का उदय हुआ। चंद्रशेखर पर कई बार पार्टी छोड़ने (दल बदलने) के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन सच बात तो यह है कि उन्होंने कभी किसी पार्टी को नहीं छोड़ा। उन्हें उस पार्टी से निकाला गया था। चंद्रशेखर का मानना था कि हमारी आर्थिक नीतियों से अमीरों को फायदा हुआ है। सिर्फ अमीरों को ही लाइसेंस क्यों मिलना चाहिए? यही कारण था कि वह संसाधनों के राष्ट्रीयकरण पर जोर देते थे। यहां तक कि जब देश ने उदारीकरण को अपनाया, उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण पर जोर देने के साथ ही चंद्रशेखर ने अकेले इसके खिलाफ आवाज उठाई। उनका मानना था कि इस रास्ते पर चलकर देश कमजोर होगा। उनका मानना था कि लोग रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं। उन्होंने अपनी अंतिम पदयात्रा ‘एलपीजी’ (LPG) और ‘गैट’ (GATT) के खिलाफ की थी।’

चंद्रशेखर के बारे में हरिवंश नारायण सिंह ने बताया, ‘वह आरएसएस और उसकी विचारधारा के खिलाफ थे, लेकिन ‘स्वदेशी’ को लेकर उन्होंने उसके साथ मंच शेयर किया था। एक बार किसी ने टिप्पणी कि भारत में ज्यादा नोबेल विजेता पैदा क्यों नहीं होते हैं, उन्होंने कहा था कि यह मत भूलो के यह संत ग्यानेश्वर और तुकाराम जैसे संतों की भूमि भी है। इंदिरा गांधी के साथ बातचीत के दौरान चंद्रशेखर की विचारधारा के बारे में साफ पता चलता है। उस समय इंदिरा गांधी ने चंद्रशेखर से पूछा था कि आपने कांग्रेस को क्यों चुना? तो चंद्रशेखर का कहना था कि मैंने ‘PSP’ के साथ 15 साल तक काम किया, लेकिन मुझे लगा कि यह आगे बढ़ने में विफल रही। इंदिरा गांधी ने उनसे अगला सवाल किया कि वह कांग्रेस के साथ क्या करेंगे? तो चंद्रशेखर का कहना था कि वह इसे समाजवादी पार्टी बनाएंगे। जब इंदिरा गांधी ने यह पूछा कि यदि वह ऐसा करने में विफल रहे तो, इस पर चंद्रशेखऱ ने जो जवाब दिया उससे इंदिरा गांधी सन्न रह गईं। चंद्रशेखर का कहना था कि उस स्थिति में वह पार्टी को तोड़ देंगे यानी छिन्न-भिन्न कर देंगे। कांग्रेस उस समय एक काफी बड़ी पार्टी बन चुकी थी और किसी नई विचारधारा का इसके तहत पनपना मुश्किल था। इसके बाद भी चंद्रशेखर का यह सोचना उनके साहस को दर्शता है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका छोटा सा कार्यकाल शायद आजाद भारत में काफी मुश्किलों भरा समय था।’

हरिवंश नारायण सिंह के अनुसार, ‘बेशक, आर्थिक चुनौती बहुत महत्वपूर्ण थी और जब वित्त सचिव ने प्रधानमंत्री को बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो रहा है और भारत जल्द ही डिफॉल्टर देश हो सकता है, चंद्रशेखर का कहना था कि क्या यह संकट मेरा ही इंतजार कर रहा था। इससे पता चलता है कि पहले राज करने वालों ने अपनी जिम्मेदारियों को सही से नहीं निभाया था। चंद्रशेखर के अंदर दृढ़ विश्वास और साहस के साथ अकेले चलने की क्षमता थी। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वह विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रालय में शामिल क्यों हुए, तो उनका कहना था कि वह उन सरकारों में शामिल नहीं हो सकते, जिनसे उनके विचार मेल नहीं खाते हैं, फिर चाहे वो इंदिरा गांधी की सरकार हो या मोरारजी की। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने टीवी पर देश को संबोधित किया था। उस समय आरक्षण की आग धधक रही थी और अयोध्या विवाद भी गहरा रहा था। लोगों को लग रहा था कि वह इन सबसे पार पा लेंगे। वह अयोध्या विवाद में एक समाधान तक पहुंच भी गए थे। उन्होंने संविधान के दायरे में रहते हुए कश्मीरियों से बातचीत शुरू कर दी थी। उनकी विचारधारा में देश सबसे पहले शामिल रहता था, राजनीतिक पार्टियों को वह इसके बाद रखते थे। उनके पास अकेले आगे बढ़ने की क्षमता थी। उनके पास साहस, दृढ़ विश्वास और दूरदर्शिता थी। सच कहूं तो वह देश की वैचारिक राजनीति के आखिरी मोती (आइकन) थे।’

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दिल्ली चुनाव को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद ने यूं भिड़ाया ‘गणित’

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे

Last Modified:
Monday, 13 January, 2020
Amar Anand

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

यह वाराणसी नहीं है और न ही 2014, लेकिन यह चुनावी रण है और इस चुनावी रण में आमने-सामने दिख रहे वही दो चेहरे हैं, जो वाराणसी के चुनावी रण में 2014 में दिख रहे थे। फर्क इतना है कि यह लोकसभा नहीं, विधान सभा चुनाव है और वाराणसी की जगह दिल्ली है। फर्क यह भी है कि उस वक्त मोदी के चमकते चेहरे के सामने काफी कम चमक के साथ अपनी धमक लिए केजरीवाल मौजूद थे और यहां मुख्यमंत्री केजरीवाल की चमकती छवि के सामने अपनी दूसरी पारी में प्रधानमंत्री के रूप में चमक खोते जा रहे मोदी हैं। वही नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री के रूप में जिनकी लोकप्रियता देश के किसी भी पीएम और नेता से ज्यादा रही है। वही नरेंद्र मोदी जो अनुच्छेद 370, 35ए और मुस्लिम महिलाओं के लिए बनाए गए तलाक कानून की वजह से देश के हीरो के रूप में माने जाते रहे हैं और वो नरेंद्र मोदी, जिनकी पार्टी को दो बार से दिल्ली की जनता सातों सीटें समर्पित करती रही हैं। यही नहीं जिन मोदी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से एक भी शब्द दिल्ली की जनता सुनना पसंद नहीं करती रही है और जनता का रुख देखकर केजरीवाल को मोदी की सार्जनिक आलोचना से परहेज करना पड़ा, उन्हीं मोदी को चुनावी रण में केजरीवाल के खिलाफ बीजेपी की ओर से ला खड़ा किया गया है।

दिल्ली में काम किया है तो वोट देना कहने वाले सीएम के सामने काम के मामले में सवाल झेलने वाले पीएम की छवि का होना ये सीएम के कद को वजनदार बनाता है और पीएम के कद को कम करता है। जाहिर सी बात, बीजेपी के पास केजरीवाल के सामने मोदी से बढ़िया कोई जवाब नजर नहीं आया और मजबूरी में उन्हें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा। पीएम से नजदीकियों, बिहारी बहुल वोट बैंक की मजबूरी या कुछ भी कहें, कई मौकों और वाकयों के दौरान ऐसा लगा कि दिल्ली के सीएम बनने का सपना पालने वाले रील लाइफ के हीरो और गायक मनोज तिवारी अपने सपनों की रियल लाइफ की तरफ ले जाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अब इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ रही है। दरअसल मनोज तिवारी की सपनों की राह में उनके खुद का कलाकार ज्यादा और नेता कम होना तो है ही, पार्टी में हर्षवर्धन, विजय गोयल, प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं का उनके नाम पर असहमति-असहयोग भी नजर आता है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में विपक्ष से मोदी के मुकाबाले पीएम उम्मीदवार का चेहरा पूछने वाली बीजेपी दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ सीएम उम्मीदवार का चेहरा नहीं पेश कर पाई है।

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर कहा है, ‘मुझे पूरा भरोसा है कि लोकतंत्र के इस महापर्व में लोग उसी सरकार को चुनेंगे, जो उनकी आकांक्षाओं को पूरा करता हो। दिल्ली की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन लोगों को हराएगी जो पिछले पांच साल से जनता को सिर्फ गुमराह कर रहे हैं।‘ पिछले दिनों अमित शाह ने बूथ कार्यकर्ताओं की मीटिंग में केजरीवाल को निशाने पर तो लिया, लेकिन केजरीवाल के मुताबिक, वह सिर्फ उन्हें गाली देते नजर आए, उनकी कमियां नहीं बता पाए। अमित शाह केजरीवाल को अर्बन नक्सल भी कहते रहे हैं और उन्हें जेएनयू की विचारधारा से जोड़ते रहे हैं। जेएनयू में छात्रों के साथ हुई गुंडागर्दी के ठीक बाद हो रहे चुनाव की तारीख के ऐलान के भले ही कोई तार न जुड़े हों, मगर इस आग की लपटें भी चुनाव में असर डालेंगी।

केजरीवाल को अर्बन नक्सल बताने वाले अमित शाह और उनकी पार्टी जहां जेएनयू की पुरानी घटनाओं और सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से केजरीवाल को जोड़कर देखती रही है, वहीं केजरीवाल के केंद्र विरोध को भी जेएऩयू से ‘खाद-पानी’ मिलता रहा है या फिर वो सरकार के विरोध में अपने लिए समर्थन की तलाश में जेएनयू के साथ खड़े नजर आते रहे हैं। 

मोहल्ला क्लीनिक को और सरकारी स्कूलों की तालीम को लेकर अक्सर विरोधियों के निशाने पर रहने वाले केजरीवाल की सरकार से सेहत, बिजली-पानी और प्राइवेट स्कूलों की ‘दादागीरी’ के मामले में दिल्ली की  अधिकतर जनता तकरीबन संतुष्ट नजर आती है और बीजेपी के पास केजरीवाल की इस कारीगरी का जवाब फिलहाल जनता को तो नहीं दिखेगा। बीजेपी को अभी सोचना पड़ेगा कि वो किस तरीके से केजरीवाल से बेहतर विकल्प के रूप में खुद को साबित करेगी और वह भी पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने लेकर। रोजी रोटी और आर्थिक मसलों पर परेशान दिल्ली की ज्यादातर जनता को सिर्फ रोजमर्रा के सवालों का जवाब चाहिए और ये बात उनको बीजेपी की कार्यशैली से ज्यादा केजरीवाल की कार्यशैली में नजर आती है। तमाम विरोध, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद केजरीवाल में दिल्ली की ज्यादातर जनता को आम आदमी और आम आदमी के लिए काम करने वाला नेता नजर आता है।

आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार मानी जाने वाली बीजेपी ने जिस तरह से एनआरसी, सीएए, एनपीआर जैसे मुद्दों को आगे करने का काम किया है उससे न तो चुनाव जीतने में उसे सफलता मिलने वाली है और न ही इन मुद्दों पर विरोध में कमी आने वाली है। यही वजह है अनुच्छेद 370. 35A, मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक कानून और आखिरकार राम मंदिर जैसे मामलों में अपने ग्राफ को बढ़ाती हुई नजर आने वाली बीजेपी का असर धीरे-धीरे जनमानस में कम हो रहा है और वह जनाधार खो रही है।

महाराष्ट्र और झारखंड को खो चुकी बीजेपी के हाथ में दिल्ली आएगी, उसकी कोई गारंटी फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है और हां अगर पार्टी हारती है तो उसका एक कारण उनके नेताओं का आपसी अंतर्विरोध भी माना जाएगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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विस्तार के साथ ही कवरेज का दायरा सिकुड़ रहा है, परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया!

अगर हमारी मानसिक सीमाएं सिकुड़कर केवल टीआरपी की होड़ पर टिक जाएंगीं तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

राजेश बादल by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
mrmedia

राजेश बादल , वरिष्ठ पत्रकार ।।

अटपटा सा लगता है। अपने चैनल और अखबार देखिए। जिन्हें हम राष्ट्रीय कहते हैं, क्या वे वाकई पूरे हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनका बड़ा हिस्सा स्थानीय और चंद प्रदेशों की खबरों में सिमट जाता है। तुलनात्मक रूप से उत्तर पूर्व, पूरब, पश्चिम और दक्षिण के प्रदेशों की आंतरिक खबरों को कोई खास तरजीह नहीं मिलती। कभी कभार कुछ बहुत बड़ी घटना इन बीस से अधिक राज्यों में घट जाए तो थोड़े समय के लिए बिजली की तरह वहां के समाचार कौंध जाते हैं। सामान्य होते ही फिर उन राज्यों के समाचार नदारद हो जाते हैं। दिनों दिन हमारे मीडिया का विस्तार हो रहा है, कारोबार बढ़ रहा है, तकनीक के कारण संचार साधनों की पहुंच एकदम स्थानीय स्तर पर होती जा रही है। लेकिन कवरेज का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। ऐसा क्यों है? क्या इससे हम अपने पाठकों और दर्शकों के साथ न्याय कर रहे हैं? शायद नहीं। 

एक जमाना था, जब आज़ादी के बाद भारतीय राज्यों के निवासी अपने घरों से बाहर निकलकर नौकरी करने अथवा व्यापार करने के लिए दूर दूर छलांग लगाने में एक बार नहीं, दस बार सोचते थे। आज स्थिति बदली हुई है। बड़ी संख्या में दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत में रहते हैं तो उत्तर के लोग दक्षिण में बसे हैं। पूरब के बाशिंदे पश्चिम में हैं और पश्चिमवासी पूरब में डटे हुए हैं। ऐसे में सब अपने अपने प्रांत के समाचार देखना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं। मगर उनकी यह मानसिक खुराक पूरी नहीं होती। वे अपनी जमीन की खबरों के लिए तरसते हैं। दुनिया भर में फैले भारत के लोग उपग्रह- संचार सुविधा के जरिए अपने मुल्क़ के ताज़ातरीन घटनाक्रम से वाक़िफ़ रहना चाहते हैं। वे निराश हो जाते हैं, जब उन्हें भारत के प्रतिनिधि चैनल राष्ट्र की समग्र तस्वीर नहीं परोसते। वे किसी एक ऐसे चैनल या समाचारपत्र की तलाश में रहते हैं, जो उन्हें जानकारियों के स्तर पर संतुष्ट कर सके। क्या उन लोगों के प्रति भी हम अन्याय नहीं कर रहे हैं?

जब अखबारों और टेलिविजन के परदे पर संपूर्ण राष्ट्रीय चरित्र नहीं उभरता तो अंतरराष्ट्रीय समाचारों और सम सामयिक प्रसंगों की चर्चा करना ही क्या। विदेश नीति, व्यापार, रक्षा, वन और पर्यावरण, अंतरिक्ष विज्ञान, साहित्य और संस्कृति ऐसे ही क्षेत्र हैं। इनके  अंतरराष्ट्रीय कवरेज से वंचित करने की गैर इरादतन साजिश का मुकाबला कैसे हो? एक ही नमूना पर्याप्त होगा। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के समाचार सिर्फ तीसरे विश्वयुद्ध की आहट पर सिमट गए। दोनों मुल्कों के हथिया भण्डार की तुलना होने लगी। ऐसा लगा, जैसे दोनों देश जंग छेड़ने के लिए भारतीय मीडिया के इशारे का इंतजार कर रहे हैं। अपवाद छोड़ दीजिए। क्या किसी चैनल या अखबार ने इस बात पर अपने कवरेज को फोकस किया कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में दूसरी पारी खेलने के लिए चुनाव मैदान में हैं। जब वे पहली पारी के लिए प्रचार अभियान कर रहे थे तो लगातार अपने ट्वीट करके अमेरिका में खलबली मचा दी थी। इन ट्वीट में कहा गया था कि बराक ओबामा अपने सियासी हित में ईरान पर पक्के तौर पर हमला करेंगे। क्या यही बात  अब ट्रंप पर भी लागू नहीं होती? इसके अलावा वे महाभियोग का सामना कर रहे हैं। क्या ईरान पर हमले से उन्हें इस मामले में कोई राजनीतिक फायदा मिल सकता है? इन सवालों की पड़ताल पत्रकारिता के किस अंग ने की? यही नहीं, भारत को अमेरिकी दबाव में ईरान से रिश्ते कमजोर बिंदु पर ले जाने पड़े हैं। इसके क्या दूरगामी नुकसान होंगे? चाबहार बंदरगाह से कारोबार में रुकावटें बढ़ी हैं। पाकिस्तान को अमेरिका ने फिर फौजी ट्रेनिंग देने का फैसला किया है। हमारे लिए क्या चेतावनी है- इस पर भी शायद ही कहीं गंभीर बहस हुई हो। 

अगर हमारी मानसिक सीमाएं सिकुड़कर केवल टीआरपी की होड़ पर टिक जाएंगीं तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा? आज का नौजवान तो पहले ही अखबारों और टेलिविजन के खबरिया चैनलों से अपना फासला बना चुका है। परिणाम सोच लीजिए मिस्टर मीडिया! 

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

 

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यूनिवर्सिटी में जब जब नारा लगेगा ‘हम देखेंगे’ न्यूज चैनल से आवाज आएगी ‘कीप वाचिंग’

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते

प्रमिला दीक्षित by
Published - Wednesday, 08 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 January, 2020
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते। बच्चे लड़-भिड़कर एक हो जाते हैं, लेकिन बड़ों के बीच में पड़ने से परिवार का सौहार्द खत्म हो जाता है। लेकिन जब से मोहल्ले में टीआरपी लोभी डायरेक्टरों के शातिर सीरियलों की एंट्री हुई है, परिवार के लोग ही बच्चों को प्यादों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें सिखाते हैं हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन धीमे से उनके मन में बीज बो जाते हैं कि यूनिवर्सिटी तुम्हारे बाप की ही है। प्रेमचंद के हीरा-मोती को दुलत्ती मारकर फैज के लिए लड़ मरने की प्रेरणा देते हैं। अब नौजवान ‘हम देखेंगे’ कहकर ही पिटे जा रहा है। अबे देखोगे तो तब जब आंख-कान दोनों खुले रखोगे। विडियो में कोई दूसरा ऑडियो भरकर आंखों के सामने ठेल देगा तो देखकर भी का कर लोगे?

वीसीआर में रोज नए कैसेट भरे जा रहे हैं। आप बाएं कान से सुनते हो? लीजिए आप ये विडियो लीजिए। आप राइट मैन हो? तो आपके लिए ये दो विडियो! आज़ादी के बाद से ये क्रांति-व्रांति चतुर आदमी के चोंचले होते हैं। हमाई ना मानो तो अन्ना से पूछ लो। जेएनयू इस वक्त यूनिवर्सिटी नहीं है। किसी का कंधा है, किसी का मौका, किसी की प्रयोगशाला! और यहां आम आदमी इत्ता कन्फ्यूज कि यार असल में मसला क्या है, फीस या सीएए?  क्यूंकि हो सकता है कि दोनों को लेकर लोग आपके पक्ष में ना हों, लेकिन किसी एक पर हो सकते हैं।

बॉलिवुड में कोई खास दिलचस्पी या किसी से दुश्मनी नहीं है, लेकिन बाय गॉड इंडस्ट्री में जिस वक्त जिसका सितारा बुलंद होता है, इतने निहायत प्रोफेशनल होते हैं कि निर्भया जैसे मौके पर भी बोलने से पहले सोचते हैं कि  वक्त, छवि, पैसे का कोई नफा-नुकसान तो नहीं हो रहा? इसलिए जब जेएनयू में छपाक एंट्री होती है तो संशय होता है। इसमें रीढ़ दिखाने जैसा कुछ नहीं है। रीढ़ तब दिखती, जब मुंह से कुछ शब्द फूटते। लेकिन चूंकि वो स्क्रिप्ट में था नहीं और लिखा हुआ पढ़ने के आदी लोग इतने अबोध हैं कि वो जानते ही नहीं वो किसी मसले में कहां खड़े हैं!

कुछ पत्रकार दीपिका के समर्थन में लिख रहे हैं ब्रेव! लगे हाथों अपने प्रोग्राम की टाइमिंग भी बताए दे रहे हैं कि इत्ते बजे हमारा प्रोग्राम भी देख लीजिए, आज ही आएगा, दीपिका की पिक्चर आने में तो अभी टाइम है! वैसे, ‘हम देखेंगे’ का सही मजा तो चैनल वाले ले रहे हैं। जब-जब यूनिवर्सिटी से आवाज आएगी ‘हम देखेंगे’,  चैनल दुहराएंगे ‘कीप वाचिंग’!

बाकी आईआईटी कानपुर अब नज्मों पर शोध करेगा तो जाहिर है पानी से चलने वाली कार अब जावेद अख्तर ही खोजेंगे। और कित्ती आजादी चाहिए बे, इत्ती आजादी लेकर जाओगे कहां?

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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अखबारों को साख बचाने के लिए करना होगा ये काम

भारत, चीन और जापान में आज भी प्रिंट मीडिया की तूती बोल रही है। भारत में तो डिजिटल ही संकट में दिखता है

Last Modified:
Friday, 03 January, 2020
newspaper

प्रो. संजय द्विवेदी

बदलेंगे, बचेंगे और बढ़ेंगे भारत के अखबार ।।

डिजिटल मीडिया की बढ़ती ताकत, मोबाइल क्रांति और सोशल मीडिया की उपलब्धता ने पढ़ने की दुनिया को काफी प्रभावित किया है। पढ़े जाने वाले अखबार, अब पलटे भी कम जा रहे हैं। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने एक बार रायपुर में ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका के आयोजन में कहा था कि ‘पहले एक अखबार पढ़ने में मुझे 40 मिनट लगते थे अब उतनी देर में दर्जन भर अखबार पलट लेता हूं।’ वे ठीक कह रहे हैं, किंतु पढ़ने का समय घटने के लिए अखबार अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। अखबारों को देखें तो वे पुराने अखबारों से बहुत सुदर्शन हुए हैं। आज वे बेहतर प्रस्तुति के साथ, अच्छे कागज पर, उन्नत टेक्नोलॉजी की मशीनों पर छप रहे हैं। वे मोटे भी हुए हैं। उनकी प्रस्तुति टीवी से होड़ करती दिखती है। उनके शीर्षक बोलने लगे हैं, कई बार टीवी की भाषा ही उनकी भाषा है। उनका कलेवर बहुत आकर्षक हो चुका है। बावजूद इसके पठनीयता के संकट को देखते हुए यह जरूरी है कि अखबार नए तरीके से प्रस्तुत हों और ज्यादा ‘लाइव प्रस्तुति’ के साथ आगे आएं। तमाम समाचार पत्र ऐसे प्रयोग कर भी रहे हैं। अखबारों को चाहिए कि वे तटस्थता से हटकर एकात्मता की ओर बढ़ें। पूरे अखबार में एक लय और एक स्वर या संगीत की तरह एक सुर हो। ताकि उस भावभूमि का पाठ सीधा उस अखबार से अपना भावनात्मक रिश्ता जोड़ सके।

विशिष्टता की ओर बढ़ें-

एक समय में अखबार का सर्वग्राही होना उसकी सफलता की गारंटी होता था। वह सब कुछ साथ लेकर चलता था। किंतु अब समय है कि अखबार अपने आप में विशिष्टता पैदा करें कि आखिर वे किस पाठक वर्ग के साथ जाना चाहते हैं। इसका आशय यह भी है कि अखबार को अब अपना व्यक्तित्व विकसित करना होगा। उन्हें खास दिखना होगा। उसको किसे संबोधित करना है, इसका विचार करना होगा। उन्हें झुंड से अलग दिखना होगा। एक समर्पित संस्था की तरह काम करना होगा। अब वे सिर्फ खबर देकर मुक्त नहीं हो सकते, उन्हें अपने सरोकारों को स्थापित करने के लिए आगे आना होगा। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की हर हाथ में उपलब्धता के बाद खबर देने का काम अब अकेला अखबार नहीं करता। अखबार जब तक छपकर आता है, तब तक खबरें वायरल हो चुकी होती हैं। टीवी, डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया खबरें ब्रेक कर चुके होते हैं। यानि अब अखबार का मुख्य उत्पाद खबर नहीं है। उसका सरोकार, उसकी विश्लेषण शक्ति, उसकी खबरों के पीछे छिपे अर्थों को बताने की क्षमता, व्याख्या की शैली यहां महत्वपूर्ण हैं। अखबार को स्थानीय जनों से एक रिश्ता बनाना पड़ेगा जिसके मूल में खबर नहीं स्थानीय सामाजिक सरोकार होंगे। सामाजिक सरोकारों से गहरी संलग्नता ही किसी अखबार की स्वीकार्यता में सहायक होगी। शायद इसीलिए अब अखबार इवेंट्स और अभियानों का सहारा लेकर लोगों के बीच अपनी पैठ बना रहे हैं। इससे ब्रांड वैल्यू के साथ स्थानीय सरोकार भी स्थापित होते हैं।

डेस्क नहीं सीधे मैदान से-

अखबारों को अगर अपनी उपयोगिता बनाए रखनी है, तो उन्हें मैदानी रिर्पोटिंग पर ध्यान देना होगा। टीवी, डिजिटल सोशल मीडिया और हर जगह ज्ञान देने वाले की फौज है पर मैदान में उतरकर वास्तविक चीजें और खबरें करने वाले लोग कम हैं। एक ही ज्ञान इतने स्थानों से कॉपी होकर निरंतर प्रक्षेपित हो रहा है कि अब लोग नए विचारों की प्रतीक्षा में हैं। नई खबरों की प्रतीक्षा में हैं। ये खबरें डेस्क पर लिखी और रची हुई नहीं होंगी। इसमें माटी की महक और जमीन हो रहे संघर्षों की धमक होगी। इन खबरों में आम लोगों की जिंदगी होगी जो अपने पसीने की खुशबू से इस दुनिया बेहतर बनाने में लगे हैं। यहां सपने होंगे, उम्मीदें होंगी और असंभव के संभव बनाते भागीरथ होंगे। इसके लिए हमें बोलने के बजाए सुनने का अभ्यास करना होगा। इसे ही ‘इंटरेक्टिव’ होना कहते हैं। यह मंच एकतरफा बात के बजाए संवाद का मंच होगा। अपने पाठकों और उनकी भावनाओं का विचार यहां प्रमुख होगा। उन पर चीजें थोपी नहीं जाएंगी, उन्हें बतायी जाएंगी, समझायी जाएंगी और उस पर उनकी राय का भी आदर किया जाएगा।

लोकतांत्रिक विमर्शों के मंच बनकर ही अखबार अपनी साख बना और बचा पाएंगे। अखबार विचारों को थोपने के बजाए, विमर्श के मंच की तरह काम करेगें। सब पक्षों और सभी राय को जगह देते हुए एक सुंदर दुनिया के सपने को सच बनाते हुए दिखेंगे। समाचार और विचार पक्ष अलग-अलग हैं और उन्हें अलग ही रखा जाएगा। खबरों में विचारों की मिलावट से बचने के सचेतन प्रयास भी करने होंगे। विचार के पन्नों पर पूरी आजादी के साथ विमर्श हों, हर तरह की राय का वहां स्वागत हो। विचारों की विविधता भी हो और बहुलता भी हो। पत्रकार अपनी पोलिटिकल लाइन तो रखें तो लेकिन पार्टी लाइन से बचें यह भी ध्यान रखना होगा। क्योंकि अखबार की विश्वसनीयता और प्रामणिकता इससे ही स्थापित होती है।

समस्या नहीं समाधान बनें-

हमारे समाज की एक प्रवृत्ति है कि हम समस्याओं की ओर बहुत आकर्षित होते हैं और समाधानों की ओर कम सोचते हैं। अखबारों ने भी अरसे से मान लिया है कि उनका काम सिर्फ संकटों की तरफ इंगित करना है,उंगली उठाना है।हमारा समाज भी ऐसा मानता है कि हमसे क्या मतलब ? जबकि यह हमारा ही समाज है, हमारा ही शहर है और हमारा ही देश है। इसके संकट, हमारे संकट हैं। इसके दर्दों का समाधान ढूंढना और अपने लोगों को न्याय दिलाना हमारी भी जिम्मेदारी है। एक संस्था के रूप में अखबार बहुत ताकतवर हैं। इसलिए उन्हें सामान्यजनों की आवाज बनकर उनके संकटों के समाधान के प्रकल्प के रूप में सामने आना चाहिए। वे सहयोग के लिए हाथ बढ़ाएं और एक ऐसा वातावरण बनाएं जहां अखबार सामाजिक उत्तरदायित्वों का वाहक नजर आए। मजलूमों के साथ खड़ा नजर आए। ऐसे में पत्रकार सिर्फ घटना पर्यवेक्षक नहीं, कार्यकर्ता भी है। जिसे हम ‘जर्नलिस्टिक एडवोकेसी’ कह सकते हैं। ऐसे अभियान अखबार की जड़ें समाज में इतनी गहरी कर देते हैं कि वे ‘भरोसे का नाम’ बन जाते हैं।

मीडिया कन्वर्जेंस एक अवसर-

आज के समय में एक मीडिया में काम करते हुए आप दूसरे मीडिया का सहयोग लेते ही हैं। एक अखबार चलाने वाला संस्थान आज निश्चित ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय है तो वहीं वह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी उसी सक्रियता के साथ उपस्थित है। इस तरह हम अपने संदेश की शक्ति को ज्यादा प्रभावी और व्यापक बना सकते हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि प्रिंट पर लोग कम आ रहे हैं, या उनका ज्यादातर समय अन्य डिजिटल माध्यमों और मोबाइल पर गुजर रहा है। ऐसे में इस शक्ति को नकारने के बजाए उसे स्वीकार करने में ही भलाई है।

आपके अखबार की ‘ब्रांड वैल्यू’ है, सालों से आप खबरों के व्यवसाय में हैं, इसकी आपको दक्षता है, इसलिए आपने लोगों का भरोसा और विश्वास अर्जित किया है। इस भीड़ में अनेक लोग डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरों का व्यवसाय कर रहे हैं। किंतु आपकी यात्रा उनसे खास है। आपका अखबार पुराना है, आपके अखबार को लोग जानते हैं, भरोसा करते हैं। इसलिए आपके डिजिटल प्लेटफॉर्म को पहले दिन ही वह स्वीकार्यता प्राप्त है, जिसे पाने के लिए आपके डिजिटल प्रतिद्वंदियों को वर्षों लग जाएंगें। यह एक सुविधा है, इसका लाभ अखबार को मिलता ही है। अब कटेंट सिर्फ प्रिंट पर नहीं होगा। वह तमाम माध्यमों से प्रसारित होकर आपकी सामूहिक शक्ति को बहुत बढ़ा देगा। आज वे संस्थान ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं, जो एक साथ आफलाइन ( प्रिंट), आनलाइन( पोर्टल,वेब, सोशल मीडिया), आन एयर(रेडियो), मोबाइल(एप) आनग्राउंट( इवेंट) पर सक्रिय हैं। इन पांच माध्यमों को साधकर कोई भी अखबार अपनी मौजूदगी सर्वत्र बनाए रख सकता है। ऐसे में बहुविधाओं में दक्ष पेशेवरों की आवश्यकता होगी, तमाम पत्रकार इन विधाओं में पारंगत होंगे। उनके विकास का महामार्ग खुलेगा। मल्टी स्किल्ड पेशेवरों के साथ एकीकृत विपणन और ब्रांडिग सेल्युशन की बात भी होगी। कन्वरर्जेंस से मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग संभव होगा और लागत भी कम होगी। अचल संपत्ति की लागत और समाचार को एकत्र करने की लागत भी इस सामूहिकता से कम होगी।

प्रिंट मीडिया ही है लीडर-

सारे तकनीकी विकास और डिजिटिलाइजेशन के बावजूद भी भारत जैसे बाजार में प्रिंट ही कमा रहा है। एशिया और लैटिन अमरीका में प्रिंट के संस्करण विकसित हो रहे हैं। भारत, चीन और जापान में आज भी प्रिंट मीडिया की तूती बोल रही है। भारत में तो डिजिटल ही संकट में दिखता है क्योंकि उसने मुफ्त की आदत लगा दी है। जबकि प्रिंट मीडिया ने इसका खासा फायदा उठाया। सारी प्रमुख न्यूज वेबसाइट्स अपने प्रिंट माध्यमों की प्रतिष्ठा का लाभ लेकर अग्रणी बनी हुई हैं। भारत जैसे देश में क्षेत्रीय व भाषाई पत्रकारिता में विकास के अपार अवसर हैं। राबिन जेफ्री ने प्रिंट मीडिया के विकास के तीन चरण बताए थे- रेयर, एलीट और मास। अभी भारत ने तो ‘मास’ में प्रवेश ही लिया है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में मास कम्युनिकेशन के प्रोफेसर हैं।)

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बहुत याद आएंगे वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा...

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 02 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 02 January, 2020
radheshyam

प्रो. संजय द्विवेदी ।।

इस साल का दिसंबर महीना जाते-जाते एक ऐसा आघात दे गया है जिसे हमारे जैसे तमाम लोग अरसे तक भूल नहीं पाएंगे। यह 28 दिसंबर, 2019 का दिन था, शनिवार का दिन, इसी दिन शाम को हमारे प्रिय पत्रकार-संपादक और अभिभावक राधेश्याम शर्मा ने पंचकूला में आखिरी सांसें लीं। साल के आखिरी दिन 31 दिसंबर को भोपाल के माधवराव सप्रे संग्रहालय में नगर के बुद्धिजीवी पत्रकार और संपादक जुटे, उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देने। इस शोकसभा की खासियत यह थी कि यहां सभी धाराओं के बुद्धिजीवियों ने राधेश्याम शर्मा को जिस रूप में याद किया वह दुर्लभ है।

इस महती सभा में रघु ठाकुर से लेकर विजयदत्त श्रीधर, कैलाशचंद्र पंत, महेश श्रीवास्तव, लज्जाशंकर हरदेनिया, राजेंद्र शर्मा, राकेश दीक्षित, दविंदर कौर उप्पल, गिरीश उपाध्याय, विजयमनोहर तिवारी और लाजपत आहूजा तक की मौजूदगी बताती है कि राधेश्याम जी का संपर्कों का संसार कितना व्यापक था। एक पत्रकार जिसकी अपनी वैचारिक आस्थाएं बहुत प्रकट हों, जिसने अपने विचाराधारात्मक आग्रहों को कभी छिपाया नहीं, किंतु उसकी राजनीति के सभी धाराओं के नायकों से ‘भरोसे वाली दोस्ती हो’ यह संभव कहां है?

आज की पत्रकारिता में वैचारिक आस्थाएं जिस तरह कट्टरता में बदली हैं और अखाड़ों में पहलवानों की तरह खम ठोंके जा रहे हों वहां राधेश्याम जी जैसे पत्रकार की मौजूदगी एक दीपस्तंभ की तरह थी। जहां विचारों के साथ मनुष्यता और संवेदना जगह पाती थी। उन्होंने अपनी वैचारिक और व्यावसायिक प्रतिबद्धता को हमेशा अलग रखा।

अपने विद्यार्थी जीवन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में पढ़ते हुए ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए थे। 1956 में उन्होंने पूरी तरह अपने आपको पत्रकारीय कर्म में समर्पित कर दिया। तब से लेकर आजतक मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की पत्रकारिता में उन्होंने अपने उजले पदचिन्ह छोड़े। एक नगर प्रतिनिधि से काम प्रारंभ कर वे विशेष संवाददाता और फिर दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अखबार के संपादक बने। इतने बड़े अखबार के संपादक पद पर रहते हुए ही उन्होंने उसे छोड़कर मीडिया शिक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दिया और 1990 में भोपाल में स्थापित हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पहले महानिदेशक (अब पदनाम कुलपति है) बने। इसके बाद वे हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक भी बने। अपनी पूरी जीवन यात्रा में उन्होंने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया।

सक्रिय पत्रकार, योग्य संपादकः

भोपाल के तमाम लोग उनकी पत्रकारिता के गवाह हैं, जिन्होंने एक रिर्पोटर के रूप में उनकी सक्रियता भरे दिन देखे हैं। राजनेताओं से उनकी निकटता जगजाहिर थी। दैनिक युगधर्म के संवाददाता के रूप में वे भोपाल में पदस्थ थे। उनका अखबार जबलपुर से निकलता था, कुछ प्रतियां ही भोपाल आती थीं। किंतु उनका संपर्क और व्यवहार ऐसा था कि लोग उनपर भरोसा करते थे। कांग्रेस, भाजपा, सोशलिस्ट,कम्युनिस्ट सब उनके दोस्त थे। दोस्ती भी ऐसी कि ‘राज की बातें’ उन्हें बताते, जिसकी गवाही सुबह उनका अखबार देता था। राजनीतिक गलियारों में उन दिनों भोपाल के वीटी जोशी, लज्जाशंकर हरदेनिया, सत्यनारायण श्रीवास्तव, दाऊलाल साखी, तरूण कुमार भादुड़ी जैसे पत्रकारों की तूती बोलती थी। किंतु राधेश्याम जी इन सबमें अपनी संपर्कशीलता, सरल स्वभाव और पारिवारिक रिश्तों के चलते एक अलग स्थान रखते थे। आज भी भोपाल के लोग उन्हें याद कर भावुक हो उठते हैं।

बाद के दिनों में वे ‘युगधर्म’ के संपादक होकर जबलपुर चले गए और उसके बाद वे चंडीगढ़ चले गए। इन सारे प्रवासों के बीच भी भोपाल उनका एक घर बना रहा। वे आते तो सबकी हाल लेते, सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनस्थों के परिजनों, बच्चों की स्थिति, प्रगति,पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने अनेक सर्वोच्च नेताओं, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों और समकालीन विविध क्षेत्रों के लोगों से लंबे इंटरव्यू किए। मुलाकातें कीं। किंतु उन्हें दादा माखनलाल चतुर्वेदी के साथ उनकी भेंटवार्ता सबसे प्रेरक लगती थी। वे उसे बार-बार याद करते थे। इस भेंट में माखनलाल जी ने उनसे कहा था – “पत्रकार की कलम न अटकनी चाहिए, न भटकनी चाहिए, न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए।” राधेश्याम जी ने इसे अपना जीवन मंत्र बना लिया। अपने संवादों में वे अक्सर इस बात को रेखांकित करते थे। यह संयोग ही था कि वे बाद में दादा के नाम पर बने विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति भी बने। उनके मीडिया चिंतन पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल ने ‘मीडियाः क्रांति या भ्रांति’ शीर्षक से पुस्तक का प्रकाशन भी 2015 में किया, जिसमें मीडिया को लेकर उनके विमर्शों से हम परिचित हो सकते हैं। सही मायनों में संपादकों की विलुप्त हो रही पीढ़ी में वे एक ऐसे नायक हैं, जिन-सा होना बहुत कठिन है। अपने पद के वैभव और प्रभाव के परे वे बेहद संवेदनशील इंसान थे, जिसने सबका भला चाहा और किया।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय की बगिया के मालीः

उनके हिस्से एक ऐतिहासिक उपलब्धि है- भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका पहला महानिदेशक नियुक्त होना। एक-एक व्यक्ति को जोड़कर उन्होंने इस विश्वविद्यालय को खड़ा किया और उसकी प्रगति की हर सूचना पर हर्षित होते थे। वे जब भी मिलते तब कहते मैं तो इस ‘बगिया का माली’ रहा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर छोटे से छोटे व्यक्ति को यह अहसास कराते कि वह कितना महत्त्वपूर्ण है। उनकी इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने लिखा-“वे केवल राजनेताओं के ही नहीं, अपितु भोपाल के श्रेष्ठ पत्रकारों को एक माला में पिरोने वाले व्यक्ति भी थे।पारिवारिकता उनका वैशिष्ठ्य थी।”  पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पुराने छात्र जो आज मीडिया में शिखर पदों पर हैं, उन्हें एक पिता के रूप में याद करते हैं। उनका अभिभावकत्व इतना प्रखर था कि वे इसके अलावा किसी और संज्ञा से नवाजे भी नहीं जा सकते थे। आज जबकि यह विश्वविद्यालय देश में मीडिया शिक्षा का सबसे बड़ा और स्थापित केंद्र बन चुका है, राधेश्याम जी की स्मृति बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। उनके महानिदेशक रहते हुए ही मैंने भी स्नातक के छात्र रूप में विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करके आया था और कुलपति के पद की गरिमा को जानता था। किंतु राधेश्याम जी ने एक स्नातक के छात्र से न सिर्फ परिचय प्राप्त किया बल्कि अपने घर पर बुलाकर चाय-नाश्ता कराया और बेहद वात्सल्यमयी अपनी धर्मपत्नी से मिलाया। उनके उस दुलार को  सोचकर आज हैरत होती है कि पत्रकारिता के शिखरों पर रहे शर्मा सर इतनी आत्मीयता कहां से लाते हैं? वे बहुत बड़े थे, जीवन से, मन से और कृति से भी। इसका अहसास उनकी स्नेहछाया में बैठकर होता था।

बाद के दिनों में वे चंड़ीगढ़ चले गए और मैं अखबारों में काम करते हुए रायपुर, बिलासपुर, मुंबई की परिक्रमा कर भोपाल वापस आ गया। इन दिनों में कोई ऐसा समय नहीं था, जब उन्होंने हमें याद न किया हो। मैं बिलासपुर गया तो बोले मेरे भाई वहां डाक्टर हैं, उनसे मिलो। रायपुर में भी उनके दोस्तों की एक पूरी दुनिया थी। वे बोलते मिलते-जुलते क्यों नहीं ? हमेशा कहते थे “रोज अपने तीन पूर्व परिचितों से मिलो और एक नया संपर्क रोज बनाओ।” पत्रकारिता में आ रहे लोगों के लिए एक पाठ है यह। हम अमल नहीं कर पाए पर मानते हैं कि कर पाते तो दुनिया ज्यादा बड़ी और बेहतर होती। मेरी शादी से लेकर जीवन के हर प्रसंग उन्होंने चिठ्ठियां भेजीं, फोन किए। आज भी जब तक वे बहुत अस्वस्थ नहीं हो गए, फोन करते हालचाल पूछते। हालचाल मेरा, विश्वविद्यालय का, परिवार का, अपने दोस्तों का। कई बार यह लगता है कि वे इतनी आत्मीयता क्यों देते थे, ऐसा क्या था जो उन्हें हम जैसों से जोड़ता था। वे क्यों हमारी यह खुशफहमियां बनाए रखना चाहते थे कि हम बहुत खास हैं।

देश में ऐसे न जाने कितने लोग ऐसे थे जो मानते थे कि वे शर्मा जी के बहुत करीबी हैं। एक महापरिवार उन्होंने खुद बनाया था जिसके वे मुखिया थे। वे प्यार से बड़ी से बड़ी और कड़ी से कड़ी बात कहते जो हमेशा हमारे भले के लिए होती। ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका का प्रकाशन जब 13 साल पहले रायपुर से प्रारंभ किया तब उन्होंने इसके स्तंभ ‘मेरा समय’ के लिए अपनी पत्रकारीय यात्रा की पूरी कहानी लिखी। पत्रिका के बारे में बराबर पूछताछ करते और अच्छे सुझाव भी देते। उनके लिए हर व्यक्ति बहुत खास था या वे उसे इसका अहसास कराकर छोड़ते। बहुत गहरी आत्मीयता, वात्सल्य और संवेदना से उन्होंने जो दुनिया रची थी, हमें संतोष है कि हम भी उसके नागरिक थे और उनके साथ उंगलियां पकड़कर उस रास्ते पर थोड़ा चल सके, जिस पर वे पूरी जिंदगी चलते रहे। उस विचार पर भी, उस व्यवहार पर भी जो उन्होंने जिया और हमें जीने के लिए प्रेरित किया। उनका जाना एक सच्चाई है किंतु वे बने रहेंगे हमारी यादों में यह उससे बड़ी सच्चाई है, क्योंकि उन्हें भूलना खुद को भूलना होगा, अपनी जड़ों को भूलना होगा, आत्मीयता और औदार्य को भूलना होगा। रिश्तों की गरमाहट को भूलना होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर हैं।)

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मिस्टर मीडिया: साल भर जहरीली सांसें छोड़ता रहा मीडिया!

सत्ता के शिखरों ने अपने हित साधने में पत्रकारों और पत्रकारिता का भरपूर इस्तेमाल किया और हम खड़े-खड़े ग़ुबार देखते रहे

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 31 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 31 December, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

साल का आखिरी दिन। हम 2019 के पल-पल का मूल्यांकन कर सकते हैं। कुछ मित्र यकीनन खफा हो सकते हैं कि मेरे जेहन में इस साल पत्रकारिता के नजरिये से कोई सकारात्मक छवि नहीं उभर रही है। कहने में कोई हिचक नहीं है कि पूरे बरस हमने जहरीली सांसें छोड़ने के अलावा कोई काम नहीं किया। सियासी दावपेंचों के हम शिकार रहे। सत्ता के शिखरों ने अपने हित साधने में पत्रकारों और पत्रकारिता का भरपूर इस्तेमाल किया और हम खड़े-खड़े ग़ुबार देखते रहे। सारे साल हर महीने कुछ-कुछ पत्रकारिता चटकती रही और दरार चौड़ी होती गई।

जब किसी इमारत की नींव के कुछ पत्थर हिलते या खिसकते हैं तो फौरन पता नहीं चलता। वे पत्थर दिखते नहीं, क्योंकि जमीन में दबे रहते हैं। जब जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इमारत को बचाना मुश्किल हो जाता है। इस साल खबरनवीसी की नींव दरकती रही, हमें पता भी चलता रहा और हम असहाय इमारत को कमजोर होते देखते रहे। सवाल यह है कि क्या पेशेवर पत्रकार इस दिशा में कुछ कर सकते थे?

मेरा उत्तर है-हां! हम बहुत कुछ कर सकते थे। हम नहीं कर सके। इस बरस लोकसभा चुनाव हुए। इसके बाद हरियाणा,  महाराष्ट्र और झारखंड में विधान सभा चुनाव हुए। महंगाई जस की तस रही। बेरोजगारी में कमी नहीं आई। आर्थिक मोर्चे पर तनाव साल भर था। कश्मीर से 370 की ऐतिहासिक विदाई हुई। नागरिक संशोधन कानून आया और उसके बाद अनेक प्रदेशों में आंदोलन,हिंसा तथा अशांति की लपटें तेज होती गईं। पाकिस्तान पूरे साल हमें तिली लिली...करते हुए चिढ़ाता रहा। सब कुछ करने के बाद भी चीन के रवैये में कोई तब्दीली नहीं दिखी। अमेरिका ने हमसे दूरी नहीं बनाई तो निकटता भी नजर नहीं आई। ईरान जैसे पुराने शुभचिंतक से कारोबार में कमी करनी पड़ी। नेपाल और श्रीलंका ठंडे-ठंडे रहे तो म्यांमार की आंग सान सू की के चेहरे पर मुस्कराहट नहीं रही।

बांग्लादेश से साल की शुरुआत में बेहद मधुर और गहरे रिश्ते थे, लेकिन साल के अंत में उसका भी मुंह सूज गया। अफगानिस्तान के साथ तटस्थता बनी रही और भूटान ने खामोशी ओढ़े रखी। हिंदुस्तान के इन सरोकारों में हम कहां थे?  क्या कोई अखबार, रेडियो या टेलिविजन चैनल अपने खाते में कुछ दिखा सकता है? अपवाद के तौर पर इक्का-दुक्का चैनल हो सकते हैं, लेकिन सच तो यही है कि  हमारे चैनल अपनेःअपने राजनीतिक आग्रहों,पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण परदे पर अत्यंत विकृत चेहरा पेश करते रहे। पत्रकार बेरोजगारी की मार झेलते रहे और इधर-उधर लुढ़कते रहे। बेशक शिखर पर बैठे संपादकों या पत्रकारों को बहुत परेशान नहीं होना पड़ा, मगर जनवरी से दिसंबर तक हर पत्रकार सीने में जलन और आंखों में तूफान लिए परेशान सा था। कुल मिलाकर पेशेवर सरोकारों के लिए पूरे साल बड़ी गंभीर चुनौतियां रहीं। इससे हमारी छवि को भी धक्का लगा है। सियासी गठजोड़ घातक है।

दूर थे जब तक सियासत से तो हम भी साफ थे, खान में कोयले की पहुंचे तो हम भी काले हो गए। अगला साल कुछ नए संकल्प, जिद और कुछ कुछ प्रो-एक्टिव अप्रोच मांगता है। इस पर ध्यान देना होगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा

मिस्टर मीडिया: दंड तो यही बनता था, लेकिन क्या ये 'एनकाउंटर' है?

मिस्टर मीडिया: इसलिए उचित और जायज है मीडिया ट्रायल

मिस्टर मीडिया: महाराष्ट्र में क्यों चूके मीडिया के महारथी?

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‘बस पापाजी और कोई एडवेंचर न देना अब’

फिल्म की तर्ज पर देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हो गए हैं। लोग तौबा कर रहे हैं,खासतौर पर पत्रकार

प्रमिला दीक्षित by
Published - Tuesday, 31 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 31 December, 2019
Pramila Dixit

प्रमिला दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार।।

फिल्म ‘जब वी मेट’ में करीना कपूर का एक डायलॉग है-‘बस पापाजी, अब और एडवेंचर न देना इस रात में’। देश के हालात भी कुछ ऐसे ही हो गए हैं। लोग तौबा कर रहे हैं,खासतौर पर पत्रकार। हे मोदी जी, बस अब कोई और खबर न हो इस साल में।

किसी भी चैनल में जब ईयर एंडर यानी साल के आखिरी दिन चलाने के लिए पूरे साल का हिसाब-किताब दिखाने वाला प्रोग्राम बनता है तो साल की पांच-दस बड़ी खबरों को छांटा जाता है और उस पर डिटेल पैकेजिंग होती है। कभी-कभी पांच-छह खबरों के भी लाले हो जाया करते थे, लेकिन जब से ये हैपनिंग सरकार आई है, बाई गॉड, पत्रकारों का सोना भी मुहाल हो गया है। बेचारे पत्रकार को जरा नींद लगी नहीं कि पता चला कि कहीं सरकार बन गई। जल्दी उठ भी गए तो बाथरूम में ही पता पड़ता है कि चार लोग निपटा दिए गए एनकाउंटर में।  

मिसाल अजीब हो सकती है, लेकिन मुझे ठेठ देसी मिसालों में मजा आता है। जो दुर्गति नई-नवेली मां की होती है न,  बच्चे को फीड करा के डकार दिलाकर आराम की सोचती ही है कि बच्चा पॉटी कर देता है। पॉटी साफ करा के आराम करने की सोचती ही है कि बच्चा भूख से फिर बिलखने लगता है। फिर दूध पिलाकर डकार दिलाती है कि फिर पॉटी...और ये सिलसिला अनवरत चलता है।

यही हाल मोदी सरकार में टीवी चैनल्स और पत्रकारों का है। जब तक एक मुद्दे से मुक्त होते हैं, दूसरा मुंह बाए सामने होता है। क क से करतारपुर...र र से रामलला...म म से महाराष्ट्र... सा...रा तीन सौ पैंसठ दिन में तीन सौ सत्तर का भी काम कर दिया! 

कड़ी निंदा की निंदा तो होती थी, लेकिन निंदा के काम में कम से कम कुछ ब्रेक्स/इंटरवल की गुंजाइश तो थी। सर्जिकल स्ट्राइक हिट हुई तो सरकार ने सीक्वल भी बना दिया!

बची खुची कसर साल के आख़िरी धमाके सीएए और एनआरसी ने पूरी कर दी। अब पत्रकार बेचारा कोई विपक्षी दल का नेता भी नहीं है, जो इतने बवाल के बीच में भी विदेश निकल ले छुट्टियों पर। उसकी नियति मोदीजी की नीतियों को जनता तक सबसे पहले पहुंचाना है। इस चक्कर में उसका खुद का परिवार भले ही कोपभवन में चला जाए!

जिस देश में ‘समय बिताने के लिए करना है कुछ काम’ मूल मंत्र हो, वहां सरकार लगातार कड़े-खड़े-पड़े-लड़े, सब तरह के फैसले लेती जा रही है। अक्सर मोदीजी के फैन सोशल मीडिया पर कहते हैं–‘एक ही तो दिल है मोदीजी, कितनी बार लूटोगे!’ लेकिन मीडियाकर्मियों की गुजारिश तो यही होगी मोदीजी से, ‘एक ही वीकेंड है मोदी जी, कितनी बार नासोगे?’

अगर यही हाल रहा तो ये भी सत्तर साल के इतिहास में पहली बार होगा, जब किसी प्रधानमंत्री के चक्कर में पत्रकारों के घर गृहयुद्ध होगा!

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

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