वर्तमान सन्दर्भ में टीवी मीडिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है: आलोक मेहता

इन दिनों मीडिया के कई दिग्गज, राजनेता, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग और सामान्य जनता का एक वर्ग किसी लगाम, नियंत्रण, लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 07 September, 2020
Last Modified:
Monday, 07 September, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

आपने मुर्गों को लड़ते लड़ाते देखा है। कबूतर, कौव्वे से लेकर शेर हाथी को लड़ते देखा होगा। सामान्यतः घोड़ों को लड़ते कम देखा जाता है। हां चीन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में घोड़ों को भीषण खून खराबे वाली लड़ाई का प्रदर्शन करके कमाई की जाती रही है। कई देशों में पशुओं को लड़ाने के कथित खेलों पर अब प्रतिबन्ध लग चुके हैं। लड़ाई से किसी को क्या मिला है और मिलेगा। लेकिन इन दिनों समाज, देश दुनिया को शांति सद्भावना का सन्देश देने वाले कुछ टीवी मीडिया चैनल, संपादक या स्ववतंत्र रूप से सोशल मीडिया पर सक्रिय पूर्व संपादक, पत्रकार और साहित्य संस्कृतिकर्मी सार्वजनिक रूप से एक दूसरे से झगड़ने जैसी स्थितियों में दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक विचारधारा, सत्ता या प्रतिपक्ष से जुड़ाव तक मतभेद समझ में आ सकते हैं। लेकिन प्रतियोगिता अथवा निजी नाराजगी में एक दूसरे को अपराधी-देशद्रोही तक करार देने की पराकाष्ठा से क्या किसी को लाभ हो सकेगा?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो संविधान में हर भारतीय नागरिक को है। समाचार माध्यमों-पत्र पत्रिकाओं टीवी चैनल भी उसी अधिकार का लाभ पाते हैं। फिर कुछ नियम प्रावधान मीडिया के लिए बनते बदलते रहे हैं। इसलिए इन दिनों मीडिया के कई दिग्गज, राजनेता, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग और सामान्य जनता का एक वर्ग किसी लगाम, नियंत्रण, लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं। उन्हें ध्यान नहीं है, यह बात पिछले पांच दशकों में उठती और दबाई जाती रही है। मैं स्वयं 1970 से पत्रकारिता में होने के कारण राज्यों और केंद्र की सरकारों, अतिवादी सांप्रदायिक, आतंकवादी समूहों के दबावों और प्रयासों को देखता, समझता और झेलता रहा हूं। वर्तमान सन्दर्भ में टीवी मीडिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। वे क्यों सुशांत सिंह-रिया प्रकरण या चीन भारत सीमा विवाद या कोरोना महामारी के संकट को दिन रात अतिरंजित ढंग से दिखा रहे हैं। फिर प्रतियोगिता में एक दूसरे से मार काट क्यों कर रहे हैं? कौन कितना किस विषय को दिखाए यह तय कौन करेगा?

वास्तव में एक गंभीर कोशिश का ध्यान आता है। बात 2006 की है। उस समय मैं एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया का अध्यक्ष था और साथी वरिष्ठ संपादक सच्चिदानन्द मूर्ति महासचिव पदों पर थे। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस गठबंधन की सरकार सत्ता में थी। सरकार ने मीडिया के ब्रॉडकास्ट नियामक विधेयक तैयार कर लिया। इससे पहले केवल केबल प्रसारण के नियमन के लिए कुछ नियम कायदे बने हुए थे। लेकिन कांग्रेस के कुछ बड़े नेता-मंत्री टीवी चैनलों की बढ़ती संख्या और उपभोक्ता अधिकार के बहाने समूर्ण इलेट्रॉनिक मीडिया को कड़े कानून में बांधना चाहते थे। इस विधेयक में भारत के सभी सरकारी स्वायत्त और निजी रेडियो टीवी चैनल के प्रसारण के विषय, लिखी बोली दिखाई जाने वाली सामग्री तक पर सरकार की निगरानी का प्रावधान था। मेरी और मुझसे वरिष्ठ संपादक बीजी वर्गीज, कुलदीप नायर, मामन मैथ्यू सहित पत्रकारों की नजर में यह प्रस्तावित कानून एक मायने में आपातकाल के सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक था। इससे पहले प्रिंट माध्यम के लिए बिहार में लाया गया कानून या राजीव गांधी के सत्ता काल में आये प्रेस कानून का एडिटर्स गिल्ड तथा पत्रकार संगठनों और प्रतिपक्ष ने भी विरोध किया था। इसलिए मनमोहन सिंह की सरकार के प्रस्तावित विधेयक को क़ानूनी रूप मिलने से पहले हम सबने कड़ा विरोध अभियान शुरू कर दिया। गिल्ड के पदाधिकारी के नाते मंत्रियों, सूचना-प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार (पूर्व पत्रकार भी) आदि के साथ बैठकें हुई। इस कारण सरकार कुछ संशोधन इत्यादि पर विचार करने लगी। संयोग से तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री प्रिय रंजन दासमुंशी अस्वस्थ्य हो गए। इस कारण भी विधेयक रास्ते में अटक गया। फिर भी आशंका से चिंतित संपादकों ने वार्ताओं का सिलसिला जारी रखा।

यहां यह बात भी उल्लेख करना उचित होगा कि पहले गिल्ड केवल उन संपादकों कि संस्था बनी थी, जो अखबार या पत्रिका में प्रकाशन के सम्पूर्ण संपादक हों। मीडिया का विस्तार होने पर हमने टीवी समाचार चैनल के प्रमुख संपादकों को भी सदस्य बनाया। सदस्यता के लिए भी वरिष्ठ संपादकों की चयन समिति रही, ताकि निर्धारित मानदंडों वाले ही सदस्य बने। इस नए संकट में हमने एडिटर्स गिल्ड की तरफ से यह सुझाव दिया कि समाचार चैनल के संपादकों का एक सहयोगी संगठन स्वयं अपनी आचार संहिता तय कर लेगा और इसके लिए किसी सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश को भी मार्गदर्शन के लिए रखा जाएगा। फिर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रमुख न्यायाधीश जे एस वर्माजी को यह दायित्व सौंपा गया। इस तरह महीनों के कड़े विरोध, बातचीत और प्रस्तावों से वह विधेयक सरकार ने ठंडे बस्ते में रख दिया।

एडिटर्स गिल्ड में हरि जयसिंह के अध्यक्ष और मेरे महासचिव के कार्यकाल में संपादकों के लिए एक आचार संहिता बनाई गई और राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने स्वयं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एक छोटे सभाकक्ष में आकर उसे जारी किया था। इसी तर्ज पर 2007 से टीवी संपादकों और खासकर प्रसारण के लिए अपने नियम आचार संहिता बनाई। मेरे जैसे कितने ही संपादक और पत्रकार, विधिवेत्ता, सांसद समय-समय पर संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य भी रहे हैं। पूर्व वरिष्ठ न्यायाधीश उसके अध्यक्ष रहते हैं। प्रेस परिषद् ने भी बहुत नियम आचार संहिता बनाई, लेकिन कानूनी रूप से उसका दायरा अब तक प्रिंट मीडिया तक सीमित रहा है। परिषद् या समादकों की आचार संहिताओं में किसी सजा का प्रावधान नहीं है। मतलब इसे अपने जीवन मूल्यों की तरह स्वयं अपनाए जाने की अपेक्षा की जाती है। इस पृष्ठभूमि में आज भी सवाल यह है कि प्रकाशन या प्रसारण की सामग्री और प्राथमिकता कौन तय करे?

अपराध कथा को प्रथमिकता मिले या राजनीति या आर्थिक या मनोरंजक या व्यापारिक, फिल्मी, क्रिकेट या कबड्डी... हजारों विषय समाज में और दुनिया में हैं। कौन कितनी देर क्या दिखाए या बोले- कौन तय करे।

इन दिनों महा प्रगतिशील वर्ग तो पहले ही मीडिया को बिका हुआ, डरा हुआ कहकर बदनाम किए हुए हैं। अभी तो संसद में भी यह मुद्दा उठ सकता है। हम सब शुचिता के साथ स्वतंत्रता को आवश्यक मानते हैं, लेकिन एक दूसरे को नीचे दिखाकर भर्त्सना के साथ क्या क्रोध या रुदन के बाद सरकार को प्रसारण नियामक कानून बनवाने के लिए निमंत्रित करना चाहेंगे? सरकार किसी भी पार्टी की हो, प्रतिपक्ष का एक खेमा तो प्रसन्न ही होगा। सत्ता तो आती जाती रहती है। कानून तो हमेशा रहेगा। वैसे भी भारत के पुराने प्रेस कानून में संशोधन के एक प्रस्ताव पर विचार विमर्श जारी है। प्रसारण और सोशल मीडिया पर आवाज उठने से सरकार को कहां कोई नुकसान होगा। हां, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवाज उठाने वाले ही घायल होंगे और सामान्य नागरिक भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा बनाई जा सकने वाली नियामक व्यवस्था से चुनी गई सामग्री ग्रहण कर सकेंगे। आपसी लड़ाई के दौरान सबको भविष्य को ध्यान में रखकर स्वयं तय करना होगा- आत्म अनुशासन या सरकारी लगाम?

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ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं: प्रो. संजय द्विवेदी

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए।

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
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-प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान ।।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘त्याज्यम् न धैर्यम्, विधुरेऽपि काले’। अर्थात, कठिन से कठिन समय में भी हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए हम सही निर्णय लें, सही दिशा में प्रयास करें, तभी हम विजय हासिल कर सकते हैं। इसी मंत्र को सामने रखकर भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना वैक्सीन के 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पूरा कर इतिहास रच दिया है। 100 साल में आई सबसे बड़ी महामारी का मुकाबला करने के लिए अब पूरे देश के पास 100 करोड़ वैक्सीन डोज का मजबूत सुरक्षा कवच है। ये उपलब्धि भारत की है, भारत के प्रत्येक नागरिक की है।

पिछले वर्ष जब देश में कोरोना के कुछ ही मरीज सामने आए थे, उसी समय भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी वैक्‍सीन्‍स के लिए काम शुरू कर दिया गया था। हमारे वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके बहुत कम समय में देशवासियों के लिए वैक्‍सीन्‍स विकसित की हैं। आज दुनिया की सबसे सस्ती वैक्सीन भारत में है। भारत की कोल्ड चेन व्यवस्था के अनुकूल वैक्सीन हमारे पास है। इस प्रयास में हमारे प्राइवेट सेक्‍टर ने नवाचार और उद्यमिता की भावना का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। वैक्सीन्स की मंजूरी और नियामक प्रक्रिया को फास्ट ट्रैक पर रखने के साथ ही, वैज्ञानिक मदद को भी बढ़ाया गया है। यह एक टीम वर्क था, जिसके कारण भारत, दो मेड इन इंडिया वैक्सीन्स के साथ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीकाकरण के पहले चरण में ही गति के साथ इस बात पर जोर दिया कि ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों तक, जरूरतमंद लोगों तक वैक्सीन पहुंचे।

देश में 16 जनवरी से वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत हुई थी। शुरुआती 20 करोड़ वैक्सीन डोज देने में 131 दिन का समय लगा। अगले 20 करोड़ डोज 52 दिन में दिए गए। 40 से 60 करोड़ डोज देने में 39 दिन लगे। 60 करोड़ से 80 करोड़ डोज देने में सबसे कम, सिर्फ 24 दिन का समय लगा। इसके बाद 80 करोड़ से 100 करोड़ डोज देने में 31 दिन का वक्त लगा। अगर इसी रफ्तार से वैक्सीनेशन होता रहा, तो देश में 216 करोड़ वैक्सीन डोज लगने में करीब 175 दिन और लगेंगे। इसका मतलब है कि 5 अप्रैल, 2022 के आसपास ये आंकड़ा हम पार कर सकते हैं। हम भले ही 100 करोड़ डोज का आंकड़ा पार कर चुके हैं, लेकिन देश की 20 प्रतिशत आबादी ही अभी पूरी तरह वैक्सीनेट हुई है। 29 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन की एक डोज दी जा चुकी है। ऐसे में मास्क फ्री होने के लिए हमें अभी इंतजार करना होगा। जब तक 85 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेट नहीं हो जाती, तब तक ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। जिन देशों में मास्क से छूट दी गई है, वहां जनसंख्या घनत्व भारत की तुलना में काफी कम है। ऐसे में हमें अपनी जरुरतों के हिसाब से ही फैसला लेना चाहिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी तक देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी पूरी तरह वैक्सीनेटेड हो जाएगी। इस वक्त तक भारत ‘हर्ड इम्यूनिटी’ को अचीव कर लेगा। इसके बाद लोगों को मास्क नहीं लगाने की पूरी तरह छूट मिल सकती है। यानी मास्क से पूरी तरह से आजादी के लिए हमें अभी कम से कम 6 से 8 महीने और इंतजार करना होगा।

सेवा परमो धर्म: के मंत्र पर चलते हुए हमारे डॉक्टर्स, हमारी नर्सेस, हमारे हैल्थ वर्कर्स, इतनी बड़ी आबादी की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। इन सभी प्रयासों के बीच, ये समय लापरवाह होने का नहीं है। ये समय ये मान लेने का नहीं है कि कोरोना चला गया या फिर अब कोरोना से कोई खतरा नहीं है। हाल के दिनों में हम सबने बहुत सी तस्वीरें, वीडियो देखे हैं, जिनमें साफ दिखता है कि कई लोगों ने अब सावधानी बरतना या तो बंद कर दिया है, या बहुत ढिलाई ले आए हैं। ये बिल्‍कुल ठीक नहीं है। अगर आप लापरवाही बरत रहे हैं, बिना मास्क के बाहर निकल रहे हैं, तो आप अपने आप को, अपने परिवार को, अपने बच्चों को, बुजुर्गों को उतने ही बड़े संकट में डाल रहे हैं। संत कबीरदास जी ने कहा है, ‘पकी खेती देखिके, गरब किया किसान। अजहूं झोला बहुत है, घर आवै तब जान’। अर्थात, कई बार हम पकी हुई फसल देखकर ही अति आत्मविश्वास से भर जाते हैं कि अब तो काम हो गया, लेकिन जब तक फसल घर न आ जाए तब तक काम पूरा नहीं मानना चाहिए। यानि जब तक सफलता पूरी न मिल जाए, लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

कोविड-19 महामारी से सबसे बड़ा यह सबक मिलता है कि हमें मानवता और मानव हित के लिए पूरे विश्व के साथ मिलकर काम करना है और साथ-साथ ही आगे बढ़ना है। हमें एक-दूसरे से सीखना होगा और अपनी सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में एक-दूसरे का मार्गदर्शन भी करना होगा। इस महामारी की शुरुआत से ही भारत इस लड़ाई में अपने सभी अनुभवों, विशेषज्ञता और संसाधनों को वैश्विक समुदाय के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है और हमने तमाम बाधाओं के बावजूद इन अनुभवों को दुनिया के साथ ज्यादा से ज्यादा साझा करने की कोशिश भी की है। हम वैश्विक प्रथाओं से सीखने के लिए भी उत्सुक रहते हैं। भारत ने ‘कोविन प्लेटफॉर्म’ का निर्माण करके पूरी दुनिया को राह दिखाई है कि इतने बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन कैसे किया जाता है। पहाड़ हो या रेगिस्तान, जंगल हो या समंदर, 10 लोग हों या 10 लाख, हर क्षेत्र तक आज हम पूरी सुरक्षा के साथ वैक्सीन पहुंचा रहे हैं। इसके लिए देशभर में 1 लाख 30 हजार से ज्यादा टीकाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।

इस महामारी ने दुनिया के हर देश, हर संस्था, हर समाज, हर परिवार, हर इंसान के सामर्थ्य को, उनकी सीमाओं को बार-बार परखा है। वहीं, इस महामारी ने विज्ञान, सरकार, समाज, संस्था और व्यक्ति के रूप में भी हमें अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए सतर्क किया है। पीपीई किट्स और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर कोविड केयर और ट्रीटमेंट से जुड़े मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का जो बड़ा नेटवर्क आज भारत में बना है, वो काम अब भी चल रहा है। देश के दूर-सुदूर इलाकों में अस्पतालों तक वेंटिलेटर्स, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स पहुंचाने का भी तेज गति से प्रयास किया गया है। बीते डेढ़ साल में देश ने इतनी बड़ी महामारी से मुकाबला आपसी सहयोग और एकजुट प्रयासों से ही किया है। सभी राज्य सरकारों ने एक दूसरे से सीखने का प्रयास किया है, एक दूसरे के प्रयोगों को समझने का प्रयास किया है, एक दूसरे को सहयोग करने की कोशिश की है। ऐसे ही सामूहिक प्रयत्नों से हम इस लड़ाई में विजयी हो सकते हैं।

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इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता।

राजेश बादल by
Published - Thursday, 21 October, 2021
Last Modified:
Thursday, 21 October, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो सियासत की तरह पत्रकार बिरादरी भी बेशर्मी की हद पार करने लगी। यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। पर यह तय है कि हम लोगों की जमात में अब ऐसे पेशेवर भी दाखिल हो चुके हैं, जिन्हें चौराहों पर अपने पीटे जाने का भी कोई भय नहीं रहा है। एक बार सार्वजनिक रूप से अस्मत लुट जाए, फिर क्या रह जाता है? जिंदगी में यश की पूंजी बार-बार नहीं कमाई जा सकती।

बीते सप्ताह समाचार कवरेज की तीन वारदातों ने झकझोर दिया। एक चैनल पर निहायत ही गैरपेशेवर अंदाज में एक उत्साही एंकर ने खुल्लमखुल्ला अश्लील और अमर्यादित शब्द का उपयोग शो के सीधे प्रसारण में किया। उसने आपत्तिजनक भाषा के बाद रुकने और माफी मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। दूसरे चैनल पर एक वरिष्ठ एंकर को महात्मा गांधी के पूरे नाम का सही उच्चारण करने में एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा और उस दौरान भी एक बार सही, नाम नहीं पढ़ पाने के लिए उसे दर्शकों से माफी मांगनी पड़ी।

तीसरी घटना पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के साथ बेहद अपमानजनक और शिष्टाचार के खिलाफ बर्ताव की है। एक मंत्री उन्हें देखने गया और अपने साथ एक फोटोग्राफर को ले गया। पूर्व प्रधानमंत्री खुद उस समय फोटोग्राफर को रोकने की स्थिति में नहीं थे। वे संभवतया दवा के असर के चलते नींद में थे। लेकिन उनके परिवारजनों ने उस फोटोग्राफर को कई बार रोका। इसके बावजूद वह फोटोग्राफर नहीं रुका और मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए तस्वीरें लेता रहा। मंत्री जी ने भी उसे रोकने की जरूरत नहीं समझी। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। वे तस्वीरें मीडिया में जारी कर दी गईं। बाद में परिवार के लोगों ने इस पर गंभीर एतराज किया। इसके बावजूद पत्रकारिता के किसी भी हिस्से से उस छायाकार की निंदा के स्वर नहीं सुनाई दिए।

तीनों श्रेणी की समाचार जानकारियां गंभीर अपराध से कम नहीं हैं। उन्हें कौन सजा देगा, इसका निर्धारण करने वाली एजेंसियां भी अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं। इसके अलावा प्रेस काउंसिल तथा टीवी चैनल्स की संस्था ने भी इनका कोई संज्ञान नहीं लिया। इसका मतलब यह भी निकाला जाना चाहिए कि जिस तरह राजनीति का अपराधीकरण हमने मंजूर कर लिया है, उसी तरह की गुंडागर्दी पत्रकारिता का हिस्सा बनती जा रही है और किसी भी स्तर पर चिंता नहीं दिखाई दे रही है।

महान संपादक राजेंद्र माथुर पत्रकारिता में इस तरह की बढ़ती प्रवृति से प्रसन्न नहीं थे। वे मीडिया को किसी की यश हत्या करने की आदत को अच्छा नहीं मानते थे। वे कहा करते थे कि जीवन से ज्यादा चरित्र महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंदगी क्या है। आदमी अपना मर जाना पसंद करेगा, लेकिन अपने यश का खत्म हो जाना कोई पसंद नहीं करेगा। यश का मर जाना, इंसान के अपने मर जाने से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। किसी की यश हत्या आप इतनी आसानी से कैसे कर सकते हैं?

नौ फरवरी 1990 को उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ’मान लीजिए पत्रकार एक दस-बारह साल का बच्चा है। वह काला पेंट और ब्रश लेकर बगीचे में जाता है। वहां कुछ मूर्तियां भी हैं। वह शरारती बच्चा किसी मूर्ति के चेहरे पर कालिख पोत देता है। किसी पर मूंछ बना देता है। कोई मूर्ति काले रंग से अपने पर दाढ़ी लगी पाती है। किसी प्रतिमा को महिला से पुरुष बना देता है तो किसी को पुरुष से महिला बना देता है। इसके बाद उन मूर्तियों के पास लगातार कई दिन चाहने वाले और रिश्तेदार जुटते हैं। वे चौंकते हैं और मूर्तियों के जीवित संस्करणों से पूछते हैं कि अरे, यह कैसे हो गया? आप तो कभी मूंछ वाले नहीं थे। अखबार में तो मूंछ लगी है। दूसरे से कोई पूछता है कि आप तो पुरुष हैं। अखबार में तो महिला प्रकाशित हुआ है। वे बेचारे सफाई देते फिरते हैं कि यह तो पत्रकारों ने छाप दिया। ऐसे तो हम थे ही नहीं। कैसे पत्रकार हैं? कम से कम मुझसे पूछ तो लेते कि मेरे मूंछ हैं या नहीं। इसे आप गैर जिम्मेदार पत्रकारिता का नमूना मान सकते हैं।’ इस तरह किसी की यश हत्या से हमें बचना होगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

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'कई देशों में ऐसे निर्भीक पत्रकार हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं'

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है

Last Modified:
Monday, 18 October, 2021
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

फिलीपींस की महिला पत्रकार मारिया रेसा और रूस के पत्रकार दिमित्री मोरातोव को नोबल पुरस्कार देने से नोबेल कमेटी की प्रतिष्ठा बढ़ गई है, क्योंकि आज की दुनिया अभिव्यक्ति के भयंकर संकट से गुजर रही है। इन दोनों पत्रकारों ने अपने-अपने देश में शासकीय दमन के बावजूद सत्य का खांडा निर्भीकतापूर्वक खड़काया है। जिन देशों को हम दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना लोकतंत्र कहते हैं, ऐसे देश भी अभिव्यक्ति की आजादी के हिसाब से एकदम फिसड्डी-से दिखाई पड़ते हैं। ‘विश्व प्रेस आजादी तालिका’ के 180 देशों में फिलीपींस का स्थान 138 वां है और भारत का 142 वां ! यदि पत्रकारिता किसी देश की इतनी फिसड्डी हो तो उसके लोकतंत्र का हाल क्या होगा ? लोकतंत्र के तीन खंभे बताए जाते हैं।

विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ! मेरी राय में एक चौथा खंभा भी है। इसका नाम है— खबरपालिका, जो सबकी खबर ले और सबको खबर दे। पहले तीन खंभों के मुकाबले यह खंभा सबसे ज्यादा मजबूत है। हर शासक की कोशिश होती है कि इस खंभे को खोखला कर दिया जाए। शेष तीनों खंभे तो अक्सर पहले से काबू में ही रहते हैं लेकिन पत्रकारिता ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी उनके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के दम फुला रखे हैं। यही काम मारिया ने फिलीपींस में और मोरातोव ने रूस में कर दिखाया है। फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिग्गो दुतर्ते ने मादक-द्रव्यों के विरुद्ध ऐसा जानलेवा अभियान चलाया कि उसके कारण सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए और जेलों में ठूंस दिए गए। इस नृशंस अत्याचार के खिलाफ मारिया ने अपने डिजिटल मंच ‘रेपलर’ से राष्ट्रपति की हवा खिसका दी थी। राष्ट्रपति ने मारिया के विरुद्ध भद्दे शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी हत्या की भी धमकी दी थी लेकिन वे अपनी टेक पर डटी रहीं। इसी प्रकार मोरातोव ने अपने अखबार ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के अत्याचारों की पोल खोलकर रख दी।

रूस में तो अखबारों पर कम्युनिस्ट पार्टी का कठोर शिकंजा कसे रखने की पुरानी परंपरा थी। अब से 50-55 साल पहले जब मैं माॅस्को में ‘प्रावदा’ और ‘इजवेस्तिया’ पढ़ता था तो इन रूसी भाषा के ऊबाऊ अखबारों को देखकर मुझे तरस आता था लेकिन अब कम्युनिस्ट शासन खत्म होने के बावजूद पत्रकारिता की आजादी के हिसाब से रूस का स्थान दुनिया में 150 वाँ है। ऐसी दमघोंटू दशा में भी मोरातोव ने ‘नोवाया गज्येता’ के जरिए पूतिन की गद्दी हिला रखी थी। सरकारी भ्रष्टाचार और चेचन्या में किए गए पाशविक अत्याचारों की खबरें मोरातोव और उनके साथियों ने उजागर कीं। उनके छह साथी पत्रकारों को इसीलिए मौत के घाट उतरना पड़ा। इसीलिए नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते हुए उन्होंने इन छह साथी पत्रकारों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि यह पुरस्कार उन्हीं को समर्पित है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में ऐसे निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार अभी भी कई हैं, जो नोबेल पुरस्कार से भी बड़े सम्मान के पात्र हैं। उक्त दो पत्रकारों का सम्मान ऐसे सभी पत्रकारों का हौसला जरुर बढ़ाएगा। मारिया और मोरातोव को बधाई!

(साभार: https://www.drvaidik.in/)

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कुछ ऐसा ही मॉडल तो चाहते थे गांधी जी: प्रो. संजय द्विवेदी

‘स्वच्छ भारत अभियान’ को जन आंदोलन बनाने में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

Last Modified:
Monday, 18 October, 2021
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- प्रो. संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान

‘स्वच्छ भारत अभियान’ को जन आंदोलन बनाने में भारत के प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समाज और राष्ट्र के निर्माण में स्वच्छता की बुनियादी भूमिका के बारे में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों को भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विजन से एक सुनियोजित अभियान का रूप दिया है। गांधी जी कहते थे कि, ‘स्वराज सिर्फ साहसी और स्वच्छ जन ही ला सकते हैं।’ स्वच्छता और स्वराज के बीच के रिश्ते को लेकर गांधी जी इसलिए आश्वस्त थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि गंदगी अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी का करती है, तो वो गरीब है। गंदगी, गरीब से उसकी ताकत छीन लेती है। शारीरिक ताकत भी और मानसिक ताकत भी। गांधी जी जानते थे कि भारत को जब तक गंदगी में रखा जाएगा, तब तक भारतीय जनमानस में आत्मविश्वास पैदा नहीं हो पाएगा। जब तक जनता में आत्मविश्वास पैदा नहीं होता, तब तक वो आजादी के लिए खड़ी नहीं हो सकती। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लेकर चंपारण और साबरमती आश्रम तक, उन्होंने स्वच्छता को ही अपने आंदोलन का बड़ा माध्यम बनाया।

स्वच्छ भारत अभियान की यात्रा हर देशवासी को गर्व से भर देने वाली है। देश ने स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से जो हासिल किया है, वो हमें आश्वस्त करता है कि हर भारतवासी अपने कर्तव्यों के लिए कितना संवेदनशील है। जन आंदोलन की ये भावना स्वच्छ भारत मिशन की सफलता का आधार है। 2014 में देशवासियों ने भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प लिया था। 10 करोड़ से ज्यादा शौचालयों के निर्माण के साथ देशवासियों ने ये संकल्प पूरा किया है। करोड़ों माताएं, बहनें अब एक असहनीय पीड़ा से, अंधेरे के इंतजार से मुक्त हुई हैं। उन लाखों मासूमों का जीवन अब बच रहा है, जो भीषण बीमारियों की चपेट में आकर हमें छोड़ जाते थे। स्वच्छता की वजह से गरीब के इलाज पर होने वाला खर्च अब कम हुआ है। इस अभियान ने ग्रामीण इलाकों, आदिवासी अंचलों में लोगों को रोजगार के नए अवसर दिए हैं। पहले शहरों में कचरा सड़कों पर होता था, गलियों में होता था, लेकिन अब घरों से न केवल वेस्ट कलेक्शन पर बल दिया जा रहा है, बल्कि वेस्ट सेग्रीगेशन पर भी जोर है। बहुत से घरों में अब लोग गीले और सूखे कूड़े के लिए अलग अलग डस्टबिन रख रहे हैं। घर ही नहीं, घर के बाहर भी अगर कहीं गंदगी दिखती है, तो लोग स्वच्छता ऐप से उसे रिपोर्ट करते हैं और दूसरे लोगों को जागरूक भी करते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान से हमारी सामाजिक चेतना, समाज के रूप में हमारे आचार-व्यवहार में भी स्थाई परिवर्तन आया है। बार-बार हाथ धोना हो, हर कहीं थूकने से बचना हो, कचरे को सही जगह फेंकना हो, ये तमाम बातें सहज रूप से, बड़ी तेजी से सामान्य भारतीय तक हम पहुंचा पाए हैं। हर तरफ गंदगी देखकर भी सहजता से रहना, इस भावना से अब देश बाहर आ रहा है। अब घर पर या सड़क पर गंदगी फैलाने वालों को एक बार टोका जरूर जाता है। देश के बच्चे-बच्चे में पर्सनल और सोशल हाइजीन को को लेकर जो चेतना पैदा हुई है, उसका बहुत बड़ा लाभ कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में भी हमें मिल रहा है।

आज भारत हर दिन करीब एक लाख टन वेस्ट प्रोसेस कर रहा है। 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर ये अभियान शुरू किया गया था, तब देश में हर दिन पैदा होने वाले वेस्ट का 20 प्रतिशत से भी कम प्रोसेस होता था। आज हम करीब-करीब 70 प्रतिशत डेली वेस्ट प्रोसेस कर रहे हैं। लेकिन अब हमें इसे 100 प्रतिशत तक लेकर जाना है और ये काम केवल वेस्ट डिस्पोजल के जरिए नहीं होगा, बल्कि 'वेस्ट टू वेल्थ क्रिएशन' के जरिए होगा। इसके लिए भारत ने हर शहर में 100 प्रतिशत वेस्ट सेग्रीगेशन के साथ-साथ इससे जुड़ी आधुनिक मैटेरियल रिकवरी फेसिलिटीज बनाने का लक्ष्य तय किया है। इन आधुनिक फेसिलिटीज में कूड़े-कचरे को छांटा जाएगा, रीसायकिल हो पाने वाली चीजों को प्रोसेस किया जाएगा। इसके साथ ही, शहरों में बने कूड़े के पहाड़ों को प्रोसेस करके पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।

हमें यह याद रखना है कि स्वच्छता, एक दिन का, एक पखवाड़े का, एक साल का या कुछ लोगों का ही काम नहीं है। स्वच्छता हर किसी का, हर दिन, हर पखवाड़े, हर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला महाअभियान है। स्वच्छता जीवनशैली है, जीवन मंत्र है। जैसे सुबह उठते ही दांतों को साफ करने की आदत होती है, वैसे ही साफ-सफाई को हमें अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। स्वच्छ भारत अभियान जीवनरक्षक भी सिद्ध हो रहा है और जीवन स्तर को ऊपर उठाने का काम भी कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि स्वच्छ भारत अभियान ने अपनी कार्यक्रम अवधि के दौरान ही 3 लाख लोगों का जीवन बचाया है। दीर्घकाल में इससे प्रति वर्ष डेढ़ लाख लोगों का जीवन बचेगा। यूनीसेफ के एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2014 से 2019 के बीच में स्वच्छ भारत से भारत की अर्थव्यवस्था पर 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इससे 75 लाख से अधिक रोजगार के अवसर भारत में बने हैं, जिनमें से अधिकतर गांवों के लोगों को मिले हैं। इससे बच्चों की शिक्षा के स्तर पर, हमारी उत्पादन क्षमता पर, उद्यमशीलता पर सकारात्मक असर पड़ा है।

देश में बेटियों और बहनों की सुरक्षा और सशक्तिकरण की स्थिति में अद्भुत बदलाव आया है। गांव, गरीब और महिलाओं के स्वावलंबन और सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने वाला ऐसा ही मॉडल तो महात्मा गांधी चाहते थे। स्वच्छता, पर्यावरण सुरक्षा और जीव सुरक्षा-ये तीनों महात्मा गांधी के प्रिय विषय थे। प्लास्टिक इन तीनों के लिए बहुत बड़ा खतरा है। हमें वर्ष 2022 तक देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करने का लक्ष्य हासिल करना है। देशभर में करोड़ों लोगों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का संकल्प लिया है। यानी वो प्लास्टिक जिसका हम एक बार उपयोग करते हैं और फिर फेंक देते हैं, ऐसे प्ला‍स्टिक से हमें देश को मुक्त‍ करना है। इससे पर्यावरण का भी भला होगा, हमारे शहरों की सड़कों और सीवेज को ब्लॉक करने वाली बड़ी समस्या का समाधान भी होगा और हमारे पशुधन की और समुद्री जीवन की भी रक्षा होगी।

स्वच्छता को प्रभावी और स्थाई बनाने के लिए जरूरी है कि यह सभी नागरिकों की आदत, स्वभाव और व्यवहार का हिस्सा बने। जीने का तरीका स्वच्छता पर आधारित हो, सोचने का तरीका स्वच्छता पर केंद्रित हो। बहुत से लोग व्यक्तिगत सफाई, अपने घर और परिसर की सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं, लेकिन सार्वजनिक और सामुदायिक सफाई के प्रति उदासीन रहते हैं। इस मानसिकता में बदलाव जरूरी है। सर्वत्र स्वच्छता ही प्रभावी स्वच्छता होती है। स्वच्छता की जड़ों को मजबूत बनाने के लिए स्वच्छता की संस्कृति को नागरिकों के जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा। स्वच्छता को लेकर लोगों में गर्व की भावना होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों पर और अधिक बल देना होगा। सभी विद्यालयों और उच्च-शिक्षण संस्थानों में स्वच्छता को पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण विषय बनाना चाहिए। सभी शिक्षण तथा सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा स्वच्छता की मुहिम को और मजबूत बनाने के लिए रोचक और प्रेरक समारोह आयोजित करने चाहिए।

स्वच्छ भारत का वास्तविक अर्थ है साफ-सुथरा भारत। संकल्प और दृढ़-निश्चय की भावना से भारत इस क्षेत्र में अग्रसर हुआ है। स्वच्छ भारत, हमारी आंखों के सामने घटित हो रही क्रांतिकारी घटना है। सामूहिक एकजुटता के साधन के रूप में, एक जन आंदोलन के रूप में और एक राष्ट्रीय लक्ष्य जिसके लिए लगभग पूरी प्रतिबद्धता दिखाई दे रही है, स्वच्छ भारत हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की भावना का प्रतिबिंब है। आज पूरी दुनिया स्वच्छ भारत अभियान के हमारे इस मॉडल से सीखना चाहती है, उसको अपनाना चाहती है। स्वच्छ भारत अभियान में हासिल हमारी सफलताएं, स्वच्छता के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियां, हमारी पद्धतियां और हमारी व्यवस्थाएं आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक हैं। भारत अपनी नई योजनाओं और पर्यावरण के लिए प्रतिबद्धता के माध्यम से दुनिया को कई चुनौतियों से लड़ने में मदद कर रहा है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि हम उन भावी पीढ़ियों के लिए भी जिम्मेदार हैं, जिन्हें हम नहीं देख पाएंगे। आज हमारी पीढ़ी के सामने यह अवसर है कि हम अगली पीढ़ियों के लिए एक पूर्णतः स्वच्छ भारत का निर्माण करें। ‘स्वच्छ भारत’ की नींव पर ही ‘स्वस्थ भारत’ और ‘समृद्ध भारत’ का निर्माण होगा।

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ZEE-इनवेस्को विवाद में ‘संरक्षक’ की भूमिका निभा रहे हैं पुनीत गोयनका: डॉ.अनुराग बत्रा

मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 13 October, 2021
Last Modified:
Wednesday, 13 October, 2021
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डॉ.अनुराग बत्रा ।।

मैं लगभग तीन सप्ताह से इस विषय पर लिखना चाहता था, लेकिन मैंने संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए इस दौरान कुछ नहीं लिखा। मैं इस परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखने के लिए स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट होने की प्रतीक्षा कर रहा था। हालांकि, हर दिन नए और असंगत तथ्य सामने आने के कारण मैं आज इसे लिखने से खुद को रोक नहीं पाया। मैं 21 वर्षों से मीडिया का विद्यार्थी रहा हूं। गतिशील भारतीय मीडिया के बारे में सीखना, अवलोकन करना और लिखना मेरा जुनून और पेशा दोनों रहा है।

मैंने वर्ष 2000 में ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) समूह की सह-स्थापना की और करीब आठ साल पहले ‘बिजनेस वर्ल्ड’ (BW Businessworld) का अधिग्रहण (acquired) किया। मेरे करियर का अधिकांश समय भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का बारीकी से अध्ययन करने पर केंद्रित रहा है। मुझे सभी प्रमुख हितधारकों (stakeholders) के साथ बातचीत के माध्यम से इस बिजनेस की प्रकृति को जानने और समझने का सौभाग्य मिला है। मीडिया मालिकों, सीईओ और बड़े निवेशकों के साथ मेरा करीबी जुड़ाव, पेशेवर संबंध और गहरी दोस्ती रही है। इसलिए, मुझे विश्वास है कि इस लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह इस बारे में मेरे गहरे ज्ञान और समझ से आया है।

इस समय नवरात्रि चल रही हैं और आज अष्टमी है, जो हिंदुओं के लिए काफी शुभ दिन है। एक आस्थावान व्यक्ति के रूप में मैं अपने देवताओं की ‘त्रिमूर्ति’ में विश्वास करता हूं यानी भगवान ब्रह्मा-निर्माता, भगवान विष्णु-पालनकर्ता और भगवान शिव-संहारक हैं। मेरे हिसाब से ‘जी’ और उसके निवेशकों के बीच चल रहा विवाद इस ‘त्रिमूर्ति’ के साथ अपने सांसारिक तरीके से तुलना करता है। 

इस विवाद में मैं ‘एस्सेल ग्रुप’ (Essel Group) के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा को ‘जी’ का रचयिता (creator), उनके बेटे और एक दशक से ज्यादा समय से ‘जी’ के एमडी व सीईओ पुनीत गोयनका को इस समूह द्वारा बनाई गई शानदार शेयरधारक संपत्ति के संरक्षक (preserver) के रूप में और शेयरधारकों में से एक इनवेस्को (Invesco) को शेयरधारक मूल्य के विध्वंसक (destroyer) के रूप में देखता हूं।

इस बारे में कुछ तथ्य आपके सामने हैं-

कल रात एक चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन हुआ कि ‘इनवेस्को डेवलपिंग मार्केट फंड्स’ ने 'जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ को पहले एक बड़े भारतीय समूह के साथ कंपनी का विलय करने की पेशकश की थी। इस तरह की डील में ‘जी’ का काफी कम मूल्यांकन किया गया था, यह तथ्य बाद में ‘सोनी‘ के साथ सौदे में मीडिया दिग्गज को दिए गए मूल्यांकन से साबित हुआ।

आखिर इनवेस्को ऐसा ‘तांडव’ क्यों कर रहा था? हालांकि इस बारे में कोई यह तर्क दे सकता है कि नए सिरे से निर्माण करने के लिए रचनात्मक विनाश करने की आवश्यकता है। लेकिन इस तरह के विनाश से सिर्फ नए शेयरधारकों के लिए मूल्य निर्मित होंगे, जबकि मौजूदा शेयरधारकों को नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस पूरे मामले में एक सवाल यह भी उठता है कि ‘जी’ के शेयरों की कीमतों को किस दबाव में कम रखा जा रहा है, जबकि वास्तव में इसका वित्तीय प्रदर्शन लगातार अच्छा बना रहता है, जो पिछले समय में दोगुना तक बढ़ गया है। इसी के मद्देनजर इनवेस्को की मंशा पर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि उसके पीछे किसका हाथ है? शेयर की कीमतों को कम करने के पीछे क्या कारण हैं? क्या उसे किसी से मदद मिल रही है?

इन सब सवालों के बीच इन तथ्यों को ध्यान में रखने की जरूरत है- 

  • डील की शुरुआत इनवेस्को ने की थी, ‘जी’ ने नहीं।
  • इस डील में पेशकश की गई थी कि उपरोक्त विलय के पूरा होने पर रणनीतिक समूह के पास विलय की गई इकाई में बहुमत हिस्सेदारी होगी और पुनीत गोयनका को एमडी और सीईओ के रूप में नियुक्त किया जाएगा। अब बेहतर डील होने के बाद इस बात से क्यों पलटा जा रहा है, क्या डील में शेयरहोल्डर्स को ज्यादा वैल्यू देने की पेशकश की गई थी?
  • उस डील ने नई विलय की गई इकाई में प्रमोटर समूह को 7-8 प्रतिशत शेयरों की गारंटी दी थी। ऐसे में इनवेस्को सोनी डील के साथ प्रमोटर्स के संरक्षण को कमजोर पड़ने को लेकर क्यों सवाल उठा रहा है?
  • यह सर्वविदित है कि पुनीत गोयनका ‘जी’ में बड़ी योजनाओं के मामले में डॉ. सुभाष चंद्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं और कंपनी वर्षों से अच्छा प्रदर्शन कर रही है।  ऐसा लगता है कि चूंकि वह इस विशेष निवेशक के पसंदीदा सौदे के साथ आगे नहीं बढ़ रहे हैं, इसलिए इनवेस्को का इरादा उन्हें हटाने और कई नए निदेशकों को बोर्ड में लाने का प्रस्ताव इस सौदे को घुमाना है।
  • प्रश्न यह उठता है कि इनवेस्को इस सार्वजनिक कॉर्पोरेट विवाद के लिए चालक के रूप में एक अन्य बड़े व्यापारिक समूह के साथ सौदे का खुलासा करने में विफल क्यों रहा। ऐसा लगता है कि इनवेस्को द्वारा लगाए जा रहे आरोप उनके निहित संकीर्ण हितों को छिपाने का प्रयास है।
  • बोर्ड एक इकाई के रूप में कार्य करता है और इसमें इनवेस्को के नामांकित व्यक्ति भी शामिल हैं। तो वर्षों से बोर्ड की बैठकों के दौरान उनके नामांकित व्यक्तियों की टिप्पणियों के अभाव में, क्या इनवेस्को का सिर्फ भारतीय प्रमोटरों के नामांकित व्यक्तियों को लक्षित करना औचित्य की कसौटी पर खरा उतरता है?

सही नेतृत्व

मैंने जो तथ्य बताए हैं उसके आधार पर मुझे उम्मीद है कि ये स्थिति को एक अलग दृष्टिकोण देते हैं। मेरा यह भी मानना है कि इस मामले पर अपने विचार रखना महत्वपूर्ण है। मेरा विचार है कि पुनीत गोयनका विलय होने वाली इकाई के एमडी और सीईओ बने रहें। इसकी पीछे मेरे ये आठ कारण हैं:

1:- पुनीत अपने पिता डॉ सुभाष चंद्र के लिए एक आदर्श संतान हैं। पुनीत गोयनका के साथ काम करने वाला कोई भी व्यक्ति आपको बताएगा कि डॉ. सुभाष चंद्र जहां श्रेष्ठ रचनाकार, एक दयालु व्यक्ति और काफी मानवीय दृष्टिकोण वाले हैं, पुनीत, अपने पिता के इन गुणों के साथ ही बहुत ही तार्किक, निष्पक्ष और व्यावसायिक दृष्टिकोण रखते हैं।

2:- एमडी और सीईओ के रूप में वह कंपनी के प्रदर्शन को बढ़ाने में बेहद सफल रहे हैं और लगातार बेहतर परिणाम दे रहे हैं।

3:- विशेष रूप से यह बताना महत्वपूर्ण है कि वह प्रत्येक एम्प्लॉयी-चाहे वह कनिष्ठ हो या वरिष्ठ, सभी से काफी प्यार करते हैं। यह एक संगठन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

4:- वह हमेशा ही शीर्ष टैलेंट को पहचानते हैं और यही एक क्वॉलिटी नहीं है, जो उनके पास है। एक संगठन के तौर पर ‘जी’ को आगे बढ़ाने, स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए सही समय पर सही प्रतिभा को पहचानना एक महत्वपूर्ण कारक है।

5:- एक्सचेंज4मीडिया में हमने पुनीत गोयनका के इन गुणों को देखा है और दिग्गज जूरी ने उन्हें नौ साल पहले 'इम्पैक्ट पर्सन ऑफ द ईयर' के रूप में चुना। एक विजेता के रूप में वह उदय शंकर जैसे अन्य समकालीन दिग्गजों के बीच खड़े हैं।

6:- पुनीत गोयनका ने दिखाया है कि वह शेयरधारकों का सबसे अच्छा हित देखते हैं। इस लड़ाई में भी जिस तरह से उन्होंने संयमित तरीके से अपने आप को पेश किया है, वह बाकई में काबिले तारीफ है।

7:- पूरा मीडिया और मनोरंजन जगत खुले तौर पर और पूरे दिल से उनके द्वारा दिए गए सम्मान और स्नेह को प्रदर्शित करता है।

8:- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुनीत टेक्नोलॉजी और कंटेंट दोनों को गहराई से समझते हैं। न केवल यह एक बेहतरीन संयोजन है, बल्कि यह आज के विकसित मीडिया और मनोरंजन परिदृश्य में सबसे अच्छा कौशल भी है, खासकर जब उनमें लीडरशिप के तमाम अन्य गुण मौजूद हैं। 

अगर मुझे खुदरा निवेशक (retail investor) के रूप में विलय की गई इकाई में शेयर खरीदना पड़ा, तो यह तभी हो सकता है जब डॉ सुभाष चंद्रा के नेतृत्व वाले प्रमोटर समूह की पर्याप्त हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हुए पुनीत गोयनका कंपनी के लीडर बने रहें। इन 25 वर्षों में डॉ. चंद्रा ने जो रचना की, वह एक उत्कृष्ट कृति है,जिसे इस डिजिटल युग में पुनीत गोयनका द्वारा फिर से बनाया जा सकता है। उन्होंने अपने पिता को ‘जी’ का निर्माण करते देखा है और उनसे सीखा है, जबकि साथ ही वह अपनी शैली, दृष्टि और परिवर्तनकारी क्षमताओं को पेश करते हैं। मेरी नजर में वह बेजोड़ हैं और वह वास्तव में संरक्षक हैं।

(लेखक बिजनेसवर्ल्ड समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं।)

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‘उधार का सिंदूर’ संसद टीवी की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा मिस्टर मीडिया!

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 12 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 12 October, 2021
Sansad TV

राजेश बादल,  वरिष्ठ पत्रकार।।

भारतीय संसद का नया टेलिविजन चैनल शुरू हो चुका है। करीब एक दशक तक ‘राज्यसभा टीवी‘ और डेढ़ दशक तक ‘लोकसभा टीवी‘ पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद उन्हें ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ दिखा दी गई। अब ‘संसद टीवी‘ ने कोरी स्लेट पर इबारत लिखनी शुरू कर दी है। इन दोनों चैनलों के रहते भारत उन-गिने चुने देशों में शुमार था, जिसके दोनों सदनों के अपने चैनल थे।

सिफर से किसी भी नए काम की शुरुआत आसान नहीं होती। नए चैनल के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। इस चैनल को पूर्व के दोनों चैनलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी। यह नामुमकिन तो नहीं, पर बेहद कठिन जरूर है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संसद में फाइलों के जंगल और कायदे कानूनों के जाल से निकलकर चैनल को दौड़ाना अत्यंत टेढ़ी खीर है। चैनल के नियंताओं को यकीनन इसका अंदाजा होना चाहिए। शायद इसलिए उन्होंने ‘कब्र में दफन‘ हो चुके चैनलों की खाक को माथे से लगाना शुरू कर दिया है।

अपनी बात स्पष्ट करता हूं। आप लोगों ने नई बोतल में पुरानी शराब वाली कहावत अवश्य सुनी होगी। ‘संसद टीवी‘ के यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल अवतारों पर दोनों ‘स्वर्गीय चैनलों‘ के कार्यक्रमों की कुल दर्शक तथा सबस्क्राइबर्स की संख्या भी ‘संसद टीवी‘ में जोड़ दी गई है। यानी जो चैनल अलग लाइसेंस के साथ अवतरित हुए थे, वे अब मर चुके हैं, मगर उनके कार्यक्रम ‘संसद टीवी‘ के खाते में धड़क रहे हैं।

जो चैनल आज पैदा हुआ है, उसके कार्यक्रम पुराने चैनलों के लिए बनाए गए हैं तो उन चैनलों के लाइक्स, दर्शक संख्या और सबस्क्राइबर्स की संख्या का कोई नया चैनल कैसे इस्तेमाल कर सकता है? मान लिया जाए कि वे कार्यक्रम संसद के ‘मृत चैनलों‘ की संपत्ति हैं तो 2021 में जन्म लेने वाला चैनल अपने खाते में 2010 से 2020 तक के कार्यक्रमों की लाइक्स, टिप्पणियां और सबस्क्राइबर्स की संख्या कैसे जोड़ सकता है? कोई निजी प्रसारण कंपनी ऐसा करती तो शायद उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो जाती। लेकिन चूंकि मामला संसद का है तो बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

तनिक सख्त भाषा का इस्तेमाल करना चाहूं तो कह सकता हूं कि यह दर्शकों के साथ कंटेंट की धोखाधड़ी से अलग मामला नहीं है। बेहतर होता कि ‘संसद टीवी‘ का आलाकमान अपनी कमाई हुई पूंजी से यश पाने की कोशिश करता। उधार का सिंदूर उसकी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाएगा। आज दर्शक इतने अक्लमंद हैं कि वे समझते हैं कि जो कार्यक्रम उन्हें परोसे जा रहे हैं, वे साल भर से लेकर दस साल तक पुराने हैं और अगर वही पुराने कार्यक्रम दिखाने इतने जरूरी हैं तो फिर ‘संसद टीवी‘ की जरूरत ही क्या थी? संसद के इस भव्य और गरिमापूर्ण नए नवेले चैनल से यह उम्मीद तो नहीं ही थी।

यह ठीक वैसा ही है कि एक अखबार चलाने वाली कंपनी पुराना अखबार बंद कर दे और जब नया टाइटल लेकर नया समाचारपत्र प्रारंभ करे तो पुराने अखबार के साल भी उसमें जोड़ दे। वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि आजकल दर्शक बढ़ाने, लाइक्स और सबस्काइबर्स बढ़ाने का उद्योग भी खूब फल-फूल रहा है। अभी इस कारोबार पर लगाम लगाने की भी जरूरत है। क्या इस तरफ कोई ध्यान देगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

इस हकीकत को समझिए, फर्जी खबरों से मुकाबला करना आसान हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

मुश्किल दौर में है अफगानी मीडिया, भारतीय पत्रकारों को आगे आना होगा मिस्टर मीडिया! 

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साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा: राजेश बादल

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 05 October, 2021
Last Modified:
Tuesday, 05 October, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

तो वह नौबत आ ही गई। गांधी मार्ग पर चलते हुए साल भर से सत्याग्रह कर रहे किसानों पर व्यवस्था का गुस्सा फूटने लगा। कोई आंदोलन लंबे समय तक अहिंसक और शांतिपूर्वक तरीके से संचालित भी हो सकता है, किसान आंदोलन उसकी एक मिसाल है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जिस ढंग से इस किसान आंदोलन के बारे में अराजक और असंसदीय टिप्पणी की है, उसकी निंदा करने के अलावा और क्या हो सकता है। एक बैठक में उन्होंने कहा कि किसानों पर डंडे उठाने वाले कार्यकर्ता हर जिले में होने चाहिए। ऐसे पांच-सात सौ लोग जैसे को तैसा जवाब दे सकते हैं। एक निर्वाचित और संविधान की शपथ लेकर मुख्यमंत्री के पद पर बैठे राजनेता की यह टिप्पणी बताती है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अब राज्य सरकार के गले की फांस बन गए हैं।

पिछले चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ मिलकर जैसे-तैसे सरकार बनाई थी, लेकिन अब किसान आंदोलन के कारण खिसक रहे जनाधार ने उन्हें इस तरह का धमकी भरा बयान देने के लिए बाध्य कर दिया है।

प्रश्न यह है कि क्या किसी भी सभ्य लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को हिंसा और टकराव का खुलेआम समर्थन करना चाहिए? जिन वर्गो के हितों की हिफाजत के लिए अवाम उन्हें चुनकर भेजती है, उनमें किसान बहुसंख्यक है। 

यह देश सदियों से किसानों को अन्नदाता तो मानता रहा है, लेकिन उनके आर्थिक और सामाजिक कल्याण की उपेक्षा भी करता रहा है। आजादी के पहले से ही यह सिलसिला जारी है। किसानों को कई बार खेतीबाड़ी छोड़कर सड़कों पर उतरना पड़ा है। उन पर पुलिस की गोलियां भी बरसीं मगर कृषि के लिए रियायतें और उत्पादन का वाजिब मूल्य कभी नहीं मिला, चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो। 

एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि किसान सबका पेट भरने की चिंता अपने धर्म पालन की तरह करें और समाज उनके सरोकारों को रद्दी की टोकरी में फेंक दे।

हरियाणा के मुख्यमंत्री धरने पर बैठे किसानों के मुकाबले बेशक जिले-जिले में कार्यकर्ताओं की हथियारबंद फौज उतार दें, पर क्या वे भूल सकते हैं कि आंदोलनकारी लाखों किसान भी उन्हें वोट देते आए हैं और वे भारतीय प्रजातंत्र का अभिन्न अंग भी हैं।

आत्मरक्षा का अधिकार तो भारतीय दंड विधान भी देता है। कल्पना करें कि उन पांच-सात सौ लोगों की सेना से लड़ने के लिए हर किसान ने अगर एक-एक डंडा उठा लिया तो सरकार के लिए कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालना कठिन हो जाएगा।

पाकिस्तान में तानाशाह जनरल अयूब खान को ऐसे ही जनआंदोलन के सामने अपनी सत्ता छोड़कर भागना पड़ा था। भारत में भी जनता के व्यापक प्रतिरोध का परिणाम हम 1977 में देख चुके हैं।   

क्या यह संयोग मात्र है कि चौबीस घंटे के भीतर हरियाणा के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक शर्मनाक घटना घट गई। जिस अंदाज में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने खुलेआम सत्याग्रह कर रहे किसानों को धमकाया और अपने आपराधिक अतीत का हवाला दिया, उसने किसानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए समर्थकों को उकसाया। मंत्री ने साफ-साफ कहा था कि वे केवल मंत्री, सांसद या विधायक ही नहीं हैं। जो लोग उन्हें जानते हैं, उन्हें अतीत के बारे में भी पता होना चाहिए। यह बाहुबली मंत्री की साफ-साफ धमकी थी।

पिता से प्रोत्साहित बेटा और चार कदम आगे निकला। उसने गुस्से में जिस तरह किसानों को अपनी गाड़ी से रौंदा, वह भयावह और विचलित करने वाला है। इससे गुस्साए किसान भी हिंसा पर उतर आए। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन यह सच है कि जनप्रतिनिधियों के बयान किसानों की भावनाओं को आहत करने वाले थे।

दो पड़ोसी प्रदेशों में एक मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री का रवैया इस बात का प्रमाण है कि हुकूमतं अब किसान आंदोलन को हरसंभव ढंग से कुचलने पर आमादा हैं। वे किसानों के साथ अपराधियों की तरह सुलूक कर रही हैं। इसके अलावा लखीमपुर खीरी की यह घटना एक आशंका और खड़ी करती है। एक मंत्री पुत्र का आचरण यह साबित करता है कि भारतीय लोकतंत्र अब जो नई नस्लें तैयार कर रहा है, वे मुल्क को मध्ययुगीन सामंती बर्बरता के युग में ले जाना चाहती हैं। इस तरह की हैवानियत यकीनन हताशा और कुंठा का नतीजा है।

उत्तर प्रदेश आने वाले दिनों में विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रहा है। लखीमपुर खीरी की घटना के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या बंदूक की नोंक पर नागरिकों से उनके अधिकार तो नहीं छीने जा रहे हैं। 

हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता से पहले महात्मा गांधी के अहिंसक और सविनय अवज्ञा आंदोलनों से तत्कालीन हुकूमत बौखला उठी थी। फिर उसने दमनचक्र चलाया था। उस भयावह दौर में तात्कालिक नुकसान भले ही सत्याग्रहियों या स्वतंत्रता सेनानियों को उठाना पड़ा हो, मगर जीत अंतत: सच की हुई थी। सच सिर चढ़कर बोलता है और झूठ के पांव नहीं होते। यह बात सियासी नुमाइंदों को ध्यान में रखनी चाहिए।

(साभार: लोकमत)

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इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते मिस्टर मीडिया!

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 02 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 02 October, 2021
gandhi454874

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अनुभव से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। जब कोई उमरदराज बूढ़ा इस लोक से जाता है तो अपने साथ एक विशाल पुस्तकालय ले जाता है। इसी कारण कहा जाता है- जो बुजुर्ग दें, उसे सहेज कर रखना चाहिए। न जाने कब काम आ जाए। जो कौम अपने पूर्वजों को भूलने का अपराध करती है, उसके लिए हर सजा कम है। हम पत्रकारों ने इस कारण अपने पूर्वज शिखर पत्रकार गांधी को भूलने का अपराध किया है। उसके लिए कटघरे में खड़े हैं। कम से कम मैं तो यही महसूस करता हूं। आज उनके जन्मदिन पर गांधी की निर्भीक पत्रकारिता को याद करना जरूरी है। 

जब हम गांधी के संप्रेषण की बात करते हैं तो एक दुर्लभ संयोग देखते हैं। वो जितने बेहतर अंदाज में माइक पर या सभा में अपने विचारों को सुनने वालों तक पहुंचाते थे, उससे कहीं शानदार ढंग से वो पत्रकार या संपादक के रूप में लिखकर अपने भावों को बयान करते थे। करीब करीब सत्ताईस-अट्ठाईस साल तक गांधीजी संपादक के रूप में जिस तरह से  विचार व्यक्त करते रहे, वे वास्तव में आज के समाज तक पहुंचे ही नहीं। हम उन्हें स्वराज दिलाने वाले महानायक के रूप में जानते हैं, लेकिन पत्रकार के रूप में उनकी भूमिका पर ज्यादा चर्चा नहीं होती। आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन थी और इसका मकसद सिर्फ आजादी था। इसलिए भारतीय इतिहास के अनेक महापुरुषों की संप्रेषण शैली और पत्रकारिता पर आज ज्यादा चर्चा नहीं होती। इन महापुरुषों को केवल स्वतंत्रता सेनानी मानकर हम उनके समग्र मूल्यांकन पर क्यों ध्यान नहीं दे पाए- यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई।

गांधी को याद करते समय एक तो राष्ट्रपिता जैसा कुछ भाव मन में आता है। दो अक्टूबर और तीस जनवरी पर रस्म अदायगी होती है। इसके बाद अगले अवसर तक के लिए हमारी आंख लग जाती है। अगली तारीख आती है। हम फिर जाग जाते हैं। दरअसल गांधी का चेहरा जब भी जेहन में उभरता है तो वह आजादी दिलाने वाले महापुरुष का होता है। इसलिए गांधी के अन्य रूप हमें याद ही नहीं आते। खास तौर पर गांधी का पत्रकार वाला रूप। सिर्फ  इक्कीस साल की उमर में लंदन के ‘द वेजिटेरियन’ में प्रकाशित नौ लेखों की श्रृंखला से तहलका मचा देता है और तेईस साल का होने तक वह नियमित पत्रकार बन जाता है।  

गांधी जब दक्षिण अफ्रीका पहुंचे तो भरपूर नौजवान थे। वहां अदालत में पहला मुकदमा लड़ते हैं। तीसरे दिन ही गोरे अदालत में उनका अपमान करते हैं। विरोध में वे तमाम अखबारों में अपने लेखों की झड़ी लगा देते हैं। माहौल गांधी के पक्ष में बन जाता है। लंदन से ‘इंडिया’ नामक अखबार का प्रकाशन शुरू कराते हैं और दक्षिण अफ्रीका से उसके संवाददाता की तरह लंबे समय तक काम करते हैं।

एक सौ अठारह साल पहले दक्षिण अफ्रीका से 1903 में ‘इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन शुरू करते हैं। अंग्रेजी में ही नहीं, हिंदी, गुजराती और तमिल में भी उसके संस्करण प्रकाशित होते हैं। उसका कोई अंक महात्मा गांधी की रिपोर्ट के बिना नहीं छपता। हर महीने गांधी अपनी जेब से 1200 रुपए खर्च करते हैं। भारत आने तक वे अपनी जेब से 26000 रुपए इस समाचार पत्र में लगा चुके थे। अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा, ‘मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले या किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखा। सन 1915 में वे हिन्दुस्तान आते हैं। भारत भर में घूमते हैं। देश की समझने का प्रयास करते हैं और फिर लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पत्रकार बनते हैं। सन 1919 में यानी करीब एक सौ दो साल पहले गुजराती में ‘नवजीवन’ अखबार शुरू करते हैं। ‘यंग इंडिया’ के संपादक बनते हैं और उद्वेलित करने वाले विचारों की नदी बहा देते हैं। ‘यंग इंडिया’ का संपादक बनते ही पहला पत्र अखबार में उन लोगों को लिखते हैं, जो उनसे असहमत होते थे या उनका विरोध करते थे। दूसरा पत्र वे उन गोरों को लिखते हैं, जिसमें वे उन्हें भारत की आजादी के लिए सहमत करने वाले तर्क देते हैं। दोनों अखबार करीब करीब तेरह-चौदह साल निकलते रहे। इनमें प्रकाशित गांधी के विचार पढ़ जाइए। आज के भारत की समस्त चुनौतियों और समस्याओं का हल  उसमें है।

गांधी की संपादकीय दृढ़ता और साहस आज के पत्रकारों और संपादकों के लिए मिसाल है। सात मई, 1944 को यंग इंडिया में उन्होंने लोकतंत्र के समर्थन में लिखा था कि लोकतंत्र से अच्छी प्रणाली कोई दूसरी नहीं है। इतनी बड़ी आबादी के कारण हो सकता है कि उसमें कुछ दोष हों, लेकिन हमें उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यंग इंडिया की पत्रकारिता के लिए ही गांधी जी पहली बार जेल गए थे।  

एक उदाहरण- सन1919 में एक एक्ट लागू हुआ। इसके मुताबिक प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की पूर्व अनुमति गोरी हुकूमत ने जरूरी बना दी थी। विरोध में गांधी ‘सत्याग्रह’ का  प्रकाशन करते हैं। अखबार के प्रकाशन की अनुमति भी वे नहीं लेते। पहले अंक में ही लिखते हैं कि सत्याग्रह का प्रकाशन तब तक होता रहेगा, जब तक कि एक्ट वापस नहीं लिया जाता। यह साहस दिखाने वाले सिर्फ गांधी ही हो सकते थे। इसके बाद 1933 में उनकी पहल पर हरिजन कल्याण के लिए नया अखबार निकलता है। यह पहले अंग्रेजी फिर हिंदी में निकला। उनका इस समाचार पत्र के लिए उद्देश्य एकदम साफ था- सेवा। आज विचारों की खुराक हमें कहां मिलती है। न के बराबर। गांधी ने उस समय कहा था कि एक विचार पत्र होना चाहिए। यही वह समय है, जब गांधी साबरमती आश्रम हमेशा के लिए छोड़ देते हैं। कहते हैं, जब तक मुल्क आजाद नही होगा, साबरमती आश्रम नहीं लौटेंगे।

सरकार के दबाव और सेंसरशिप के विरोध में वे लिखते हैं- एक एक पंक्ति अगर दिल्ली में बैठे प्रेस सलाहकार को भेजना पड़े तो मैं स्वतंत्रतापूर्वक काम नही कर सकता। प्रेस की आजादी तो विशेषाधिकार है। गांधी के तेवर से सरकार परेशान हो चुकी थी। जब उन्होंने 1942 में अंग्रेजों! भारत छोड़ों आन्दोलन छेड़ा तो ‘हरिजन’ बंद करना पड़ा। गांधी जेल गए और इधर हरिजन पर ताला पड़ गया। बरतानवी सरकार ने एक-एक प्रति जला दी या जब्त कर ली। दो बरस बाद गांधी जी जेल से छूटे तो हरिजन का प्रकाशन फिर प्रारंभ कर दिया। सेवाग्राम से ही उन्होंने ‘सर्वोदय’ का प्रकाशन शुरू किया। यह उनके अंत समय तक जारी रहा। गांधी ने अपने को हमेशा पूर्णकालिक पत्रकार ही माना। उनका कहना था कि मैं पूर्णकालिक पत्रकार हूं, लेकिन इस समय सबसे बड़ा काम देश की आजादी है। इसके बाद मेरा काम पत्रकारिता है। उन्होंने साफ साफ कहा था, संपादक को कोई भी परिणाम भुगतना पड़े, लेकिन अपने विचार खुलकर व्यक्त करना चाहिए। अखबार के बारे में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि प्रकाशन के बाद वह संपादक और मालिक का समाचारपत्र नहीं रह जाता। वह पाठक का हो जाता है। एक संपादक-पत्रकार के रूप में इतना पेशेवर दृष्टिकोण तो आज के संपादक भी नहीं रखते। इस राष्ट्र-राज्य को इस युगपुरुष के प्रति कृतज्ञ क्यों नहीं होना चाहिए मिस्टर मीडिया?

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

सुप्रीम कोर्ट की चिंता संवैधानिक है मिस्टर मीडिया!

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खुशदीप सहगल का यूट्यूबर्स से बड़ा सवाल, इस तरह कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे?

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 27 September, 2021
Last Modified:
Monday, 27 September, 2021
Khushdeep Sehgal

यूट्यूबर्स की दुनिया भी गजब है। व्यूज पाने की ललक यहां भी सनक की हद तक है। कुछ वैसी ही जैसे कि मेनस्ट्रीम मीडिया में टीआरपी  और डिजिटल में हिट्स या विजिट्स के लिए होती है। यहां सेल्फ रेगुलेशन जैसी कोई व्यवस्था नहीं, इसलिए खुला खेल फर्रूखाबादी है। किसी का जब चाहे मानमर्दन कर दो, किसी को जो मर्जी कह दो, कोई रोकने वाला नहीं। इस तरह से व्यूज बड़ी संख्या में आ जाएं तो फिर तो खुद को तोप समझना लाजमी है। फिर दूसरों के कंधे पर बंदूक चलाने का ये शौक दुस्साहस की सीमा भी पार कर जाता है।

दरअसल देश में पॉलिटिकल डिवाइड इतना बढ़ गया है, इतने खांचे बंट गए हैं कि हर एक ने अपना कम्फर्ट जोन ढूंढ लिया है। राजनीति के इस तरफ या उस तरफ। दोनों तरफ देश के करोड़ों नागरिक भी हैं। नागरिक क्यों देश के अधिकांश पत्रकार भी खेमाबंद हैं। ये खेमाबंदी इतनी स्पष्ट है कि ये खेमे दिन के 24 घंटे दूसरे खेमे के कपड़े उतारने में लगे हैं। यूट्यूबर्स भी इससे अलग नहीं।

देश में एक और चलन दिख रहा है। अब नेताओं की जगह चर्चित पत्रकारों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा माहौल बना है तो पत्रकारों के साथ उनके संस्थानों को अन्तर्मन में झांकना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ?

लेकिन साथ ही मेरा कुकुरमुत्तों की तरह उग आए यूट्यूबर्स से पूछना है कि वो किस मुंह से अपने चौबारों पर चढ़ कर चिल्लाते रहते हैं कि फलाने या फलानी एंकर की फुलटू बेइज्जती हो गई। माफ कीजिए इन यूट्यूबर्स के लिए उनकी दुकानें चलने के लिए वही लोग मसाला हैं, जिनके पीछे ये दिन-रात पड़े रहते हैं। ये पत्रकार मान लीजिए किसी राजनीतिक विचारधारा विशेष के हैं, फिर भी उनका नाम जो बना है उसमें भी उनकी मेहनत का भी बड़ा हाथ है। ऐसे ही नहीं वो इस मुकाम तक पहुंच गए।

ये निशाना साधने वाले यूट्यूबर्स खुद भी गिरेबान में झांके, उन्होंने खुद कौन से तीर मारे हैं जो उन्हें दूसरों का मान मर्दन का अधिकार मिल गया। इन बड़े नामों के इस्तेमाल से कब तक व्युअरशिप की रोटियां सेंकोगे। दम है तो इनके नाम का इस्तेमाल किए बिना अच्छे, सार्थक, सकारात्मक कंटेट पर बड़ी इमारत बना कर दिखाइए।

काफी हद तक यूट्यूब चलाने वाले कुछ चर्चित पत्रकार भी ऐसी स्थिति बनने के लिए कैटेलिस्ट्स का काम कर रहे हैं। वो अपनी तरह की ब्रैंडेड पत्रकारिता को खाद पानी देने वाला मसाला ढूंढकर उसे ही परोसते रहते हैं। स्क्रीन पर हर वक्त दिखते रहने के शौक के साथ वही चंद नेताओं के साथ सियासी जुगाली, ग्राउंड रिपोर्टिंग के नाम मनमुताबिक पॉकेट्स में जाकर अपने एजेंडे को सूट करने वाली लोगों की बातचीत...इसके अलावा क्या।

इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि देश का हर वक्त चुनाव मोड में रहना...सत्तापक्ष अपनी दिनरात स्तुति करने वाले पत्रकारों से बहुत खुश रहता हो लेकिन वो जान ले कि स्वस्थ आलोचना को दरकिनार करना, जिस डाल पर बैठे हो उसी को काटना होता है।

ऐसे में निष्पक्ष, सच्चा कंटेट सामने लाना समुद्र से मोती निकालने समान हो गया है। राजनीति से इतर देखा जाए तो दुनिया में और भी बहुत कुछ है। देश की आबादी जल्दी ही डेढ़ अरब के आंकड़े को छूने वाली है तो यकीनन इतनी ही उनसे जुड़ी कहानियां भी होंगी लेकिन उन्हें सामने लाने में मेहनत कौन करे। इसके मुकाबले राजनीतिक बकर-बकर में कोई लागत नहीं।

कंटेट कैसा मिले, इसके लिए व्यूअर्स खुद भी जिम्मेदार हैं। वो हर वक्त राजनीतिक नकारात्मकता में ही डूबे रहना चाहते हैं या इसके बाहर की बहुत बड़ी सकारात्मक दुनिया में भी झांकना चाहते हैं। वो ये भी देखें कि जिन यूट्यूब चैनल्स पर वो जाते हैं, सब्सक्राइब करते हैं, उनके कर्ताधर्ताओं का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड क्या है, सिर्फ़ भड़काऊ हैडिंग, फोटो से व्यूज लेने वालों को कितना बढ़ावा देना है ये आपके ही हाथ में है...

यूनिक कंटेंट की साख रातोंरात नहीं बन जाती, उसके लिए बार बार लगातार परफॉर्म करके दिखाना होगा, बिना भड़काए, बिना किसी बड़े नाम वाले के कंधे पर बंदूक चलाए। ‘देशनामा’ की कोशिश इसी दिशा में बढ़ने की है, देखना है कि ये छोटा सा कदम कितनी दूर तक जा पाता है।

(वरिष्ठ पत्रकार खुशदीप सहगल की फेसबुक वॉल से साभार)

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अब सभी राजनीतिक दलों में यह 'महामारी' फैल चुकी है: राजेश बादल

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 22 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 22 September, 2021
rajeshbadal545

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदलना ठीक नहीं

भारतीय लोकतंत्र एक चिकने घड़े में तब्दील होता जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और बहुमत से नेता के चुनाव की परंपरा हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है। सभी राजनीतिक दलों में यह महामारी फैल चुकी है।

जिला पंचायतों, प्रदेश विधानसभाओं और संसद के लिए नेता चुनने की प्रक्रिया में प्रदूषण घुलता हुआ देखना विवशता है। हजार साल तक राजशाही का दंश झेल चुके देश में सामंती चरित्र एक बार फिर दाखिल हो चुका है। अब नेता पद का चुनाव निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं करते और न उन्हें वापस घर बैठाने की प्रक्रिया में कोई नुमाइंदा शरीक होता है।

सारा उपक्र म सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया जाता है। इस उद्देश्य से कुछ राज्यों में चुनाव के पहले विधायक दल नेता को आलाकमान के इशारे पर हटाने का सिलसिला इन दिनों चल रहा है। यह अभी जारी है। मतदाता अपने साथ इस ठगी की शिकायत आखिर किस मंच पर करे?

कर्नाटक, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब में मुख्यमंत्रियों को जिस तरीके से हटाया गया, उसकी यकीनन कोई तारीफ नहीं करेगा। इन प्रदेशों के उदाहरण साफ करते हैं कि नेता बदलने के खेल में दोनों शिखर पार्टियां शामिल हैं। जिन दो बड़े दलों को यह देश लोकतांत्रिक कमान सौंपता रहा है, उनमें इस प्रवृत्ति का पनपना गंभीर संकेत देता है।

उत्तराखंड को तो इन दलों ने शर्मनाक प्रयोगशाला बना दिया है। वहां मुख्यमंत्री जाते ही अपने विदाई संदेश की प्रतीक्षा करने लगता है। गंभीर बात इसलिए है कि चार साढ़े चार साल तक एक मुख्यमंत्री सरकार चलाता है, कार्यकाल में वह पार्टी घोषणापत्र के आधार पर मुद्दों का क्रियान्वयन करता है, साढ़े चार बरस वह फसल बोता है, सिंचाई करता है तो उत्पादन क्यों नहीं देखना चाहेगा।

अर्थात मुख्यमंत्री अपने काम का मतदाताओं की नजर में मूल्यांकन भी देखना चाहता है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। यह कैसे संभव है कि वोटर केवल चेहरा बदल जाने से उस पार्टी को दोबारा वोट दे दे। यदि चार -पांच साल सरकार ने खराब काम किया हो तो परिणाम बुरा ही मिलेगा। यदि येदियुरप्पा या कैप्टन अमरिंदर सिंह पांच से दस साल पार्टी की पतवार थाम सकते हैं तो चुनाव-वैतरणी क्यों पार नहीं लगा सकते?

ताबड़तोड़ हटाने से उनके समर्थकों की उदासीनता अथवा भितरघात का नया मोर्चा खुल जाता है- यह बात आलाकमान को ध्यान में रखनी चाहिए।

वैसे भी भारतीय संवैधानिक ढांचा किसी मुख्यमंत्री को हटाने की वैधानिक प्रक्रिया बताता है। जब मुख्यमंत्री विधायक दल का विश्वास खो दे तो पहले विधायक दल ही नया नेता चुनता है। कुछ दशकों से इस प्रक्रिया के बीच में दल का प्रदेश प्रभारी और आलाकमान का ऑब्जर्वर यानी दूत भी कूद पड़ा है। अब तो वे सीधे बंद लिफाफा लेकर आते हैं और फरमान सुनाते हैं।

कभी-कभी वे सीधे ही राज्यपाल से मिलकर विधायक दल के निर्णय की जानकारी दे देते हैं। यह अनुचित है और स्वस्थ संसदीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। यह तो मुख्यमंत्री का अपना अनुशासन है कि वह शिखर नेतृत्व का संदेश पाकर इस्तीफा पेश कर देता है। अन्यथा यदि उसके पास बहुमत हो और वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाए तो पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व को लेने के देने पड़ जाएं।

इसके अलावा एक नुकसान और है। आलाकमान ताजे चेहरे के नाम पर अपेक्षाकृत कनिष्ठ और प्रशासनिक अनुभव नहीं रखने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाता है। जो व्यक्ति पहली बार विधायक चुना गया हो, उसे तो संसदीय प्रक्रिया के बारीक पेंचों की समझ ही नहीं होती। उसके सामने चुनाव होते हैं और वह वोटर को लुभाने के लिए अंधाधुंध असंभव सी घोषणाएं करने लगता है।

इनमें से अधिकतर कभी पूरी नहीं होतीं। वह अफसरशाही पर लगाम भी नहीं लगा पाता और न ही अपने हिसाब से उनका मूल्यांकन कर पाता है। नए मुख्यमंत्री को पद संभाले चार-छह महीने भी नहीं बीतते कि चुनाव तारीखों का ऐलान हो जाता है। आचार संहिता लग जाती है। यानी बबुआ मुख्यमंत्री के लिए कुछ भी करने को नहीं रहता। वोट तो पुराने मुख्यमंत्री के काम या सरकार की छवि पर ही मिलता है।

सियासी अतीत को देखें तो ज्यादातर मामलों में चुनाव पूर्व नेता बदलने का कोई लाभ किसी पार्टी को नहीं मिला है। शरद पवार और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज भी चुनाव से पहले भेजे जाने पर पार्टी को जिता नहीं सके थे। अलबत्ता सुशील कुमार शिंदे और एकाध अन्य उदाहरण इसका अपवाद हैं। 

इसी तरह मुख्यमंत्री के मनोनयन का ढंग भी लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके लिए आवश्यक रस्मों का पालन होता है, लेकिन वास्तव में नए विधायकों को नेता चुनने की आजादी नहीं होती। अब तो इसे औपचारिक शक्ल भी दे दी गई है। विधायक दल प्रस्ताव पास करता है। उसमें कहा जाता है कि पार्टी का शिखर नेतृत्व या अध्यक्ष जिसे चुनेगा, वह विधायक दल को मंजूर होगा।

राजशाही में राजा ही तो सेनापतियों का चुनाव करता था। यह भी उसी तरह की कार्रवाई है। यह ठीक नहीं है। कोई अपने मत का अधिकार किसी दूसरे को कैसे दे सकता है? नेता चुनने का हक भारत के जन प्रतिनिधित्व कानून ने उसे दिया है। वह किसी अन्य को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इससे स्वस्थ्य लोकतांत्रिक परंपरा की हत्या होती है।

मान्यता है कि सियासी तीर अक्सर उलट कर लगते हैं। मुझे याद है कि 1980 में अर्जुन सिंह के साथ बहुमत नहीं था। वे कमलनाथ और संजय गांधी की मेहरबानी से मुख्यमंत्री बने थे, जबकि बहुमत शिवभानु सिंह सोलंकी के पास था और जब 1985 में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में पार्टी दोबारा जीत कर आई तो शपथ से पहले ही उन्हें पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया। अल्पमत के मोतीलाल वोरा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी।

बड़ी पार्टियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे संसदीय प्रक्रियाओं की हिफाजत और सम्मान करें। क्षेत्रीय दल तो पहले ही सामंती आचरण कर रहे हैं, उनसे क्या अपेक्षा करें!

(साभार: लोकमत)

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