कश्मीरियों को सोचना चाहिए कि उनकी जुबान ज्यादा कीमती है या जान?

पाकिस्तान की फौज और सरकार को खुश होना चाहिए कि कश्मीरियों से प्रतिबंध उठाने की मांग वे जितने जोरों से कर रहे हैं, उससे ज्यादा जोरों से भारत में हो रही है

डॉ. वेद प्रताप वैदिक by
Published - Thursday, 19 September, 2019
Last Modified:
Thursday, 19 September, 2019
Dr. Vaidik

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार।।

आज कश्मीर में प्रतिबंध लगे हुए पूरा डेढ़ महीना हो गया है। सरकार कहती है कि कश्मीर के हालात ठीक हैं। कोई पत्थरबाजी नहीं है। कोई लाठी या गोलीबारी नहीं है। न लोग मर रहे हैं और न घायल हो रहे हैं। मरीज़ों के इलाज के लिए अस्पताल खुले हुए हैं। हजारों आपरेशन हुए हैं। लोगों को राशन वगैरह ठीक से मिलता रहे, उसके लिए दुकानें खुली रहती हैं लेकिन मैंने अपने कश्मीरी दोस्तों और नेताओं से लैंडलाइन टेलिफोन पर बात की है। कुछ जेल से छूटे हुए कार्यकर्ता भी दिल्ली और गुरुग्राम में आकर मुझसे मिले हैं। वे जो कह रहे हैं, वह बिल्कुल इससे उल्टा है।

इन लोगों का कहना है कि कश्मीर में लोग बेहद तकलीफ में हैं। सड़कों पर कर्फ्यू लगा हुआ है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं। सैलानियों ने कश्मीर आना लगभग बंद कर दिया है। गरीब लोगों के पास रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। कोई किसी से बात नहीं कर पा रहा है। इंटरनेट और मोबाइल फोन बंद हैं। ज्यादातर घरों में लैंडलाइन फोन अब है ही नहीं। अखबार और टीवी चैनल्स भी पाबंदियों के शिकार हैं। शुक्रवार को कई मस्जिदों में नमाज भी नहीं पढ़ने दी जाती है, क्योंकि सरकार को डर है कि कहीं भीड़ भड़ककर हिंसा पर उतारू न हो जाए। दिल्ली से जाने वाले कई नेताओं को श्रीनगर हवाई अड्डे से ही वापस कर दिया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं के जवाब में कहा है कि सरकार वहां जल्दी से जल्दी हालात ठीक करने के लिए कदम उठाए। लगभग सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर मांग की जा रही है कि कश्मीरियों को अभिव्यक्ति की आजादी शीघ्रातिशीघ्र दी जाए। मुझे लगता है कि इस मांग पर अमल होना शायद अगले हफ्ते से शुरू हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार भारत-पाक वाग्युद्ध हो ले, उसके बाद भारत सरकार जरूर कुछ नरम पड़ेगी।

पाकिस्तान की फौज और सरकार को इस बात पर खुश होना चाहिए कि कश्मीरियों पर से प्रतिबंध उठाने की मांग वे जितने जोरों से कर रहे हैं, उससे ज्यादा जोरों से भारत में हो रही है। फिर भी यह प्रश्न उठता है कि मोदी सरकार ने इतने कड़े प्रतिबंध क्यों लगाए हैं? क्योंकि वह कश्मीर में खून की नदियां बहते हुए नहीं देखना चाहती। कश्मीर के लोगों को सोचना चाहिए कि उनकी जुबान ज्यादा कीमती है या उनकी जान? यही सवाल सबसे बड़ा है।

मैं तो समझता हूं कि कश्मीरी लोगों को अपना क्रोध या गुस्सा प्रकट करने की इजाजत वैसे ही मिलनी चाहिए, जैसी कि चीन ने हांगकांग के लोगों को दे रखी है। अहिंसक प्रदर्शन करने का पवित्र अधिकार सबको है। अब सही मौका है, जबकि जेल में बंद कश्मीरी नेताओं से सरकार मध्यस्थों के जरिये बात करना शुरू करे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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माफ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर भी नहीं जानते: राजेश बादल

भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते।

राजेश बादल by
Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
bhagat singh

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरदार भगत सिंह का नाम ज़ेहन में आते ही एक ऐसे जोशीले नौजवान का चेहरा उभरता है, जो अकेले दम पर हिन्दुस्तान की धरती को गोरी हुकूमत से मुक्त कराने का हौसला और जज़्बा रखता था। वही भगत सिंह जिसने असेंबली में बम फेंका था और हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। अगर आप भी यही जानते हैं तो माफ़ कीजिए आप सरदार भगत सिंह को रत्ती भर नहीं जानते। आज मैं आपको भगत सिंह का वह रूप दिखाना चाहता हूं जो आपके लिए एकदम नया है। यह रूप एक ऐसे पत्रकार और लेखक का है, जो अपने विचारों के तेज़ से देश की देह में हरारत पैदा कर देता था। हम और आप को वहां तक पहुंचने के लिए कई उमरें चाहिए, जहां भगत सिंह सिर्फ़ तेईस-चौबीस साल की आयु में जा पहुंचा था।

दरअसल इंसान को संस्कार सिर्फ माता पिता या परिवार से ही नहीं मिलते। समाज भी अपने ढंग से संस्कारों के बीज बोता है। पिछली सदी के शुरुआती साल कुछ ऐसे ही थे। उस दौर में संस्कारों और विचारों की जो फसल समाज और देश में उगी,  उसका असर आज भी  कहीं कहीं दिखाई देता है। उन दिनों गोरी हुक़ूमत ने ज़ुल्मों की सारी सीमाएं तोड़ दीं थीं। देशभक्तों को कीड़े मकौड़ों की तरह मारा जा रहा था। किसी को भी फांसी चढ़ा देना सरकार का शग़ल बन गया था। ऐसे में जब आठ साल के बालक भगत सिंह ने किशोर क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को वतन के लिए हंसते हंसते फांसी के तख़्ते चढ़ते देखा तो हमेशा के लिए करतार देवता की तरह उसके बालमन के मंदिर में प्रतिष्ठित हो गए। चौबीस घंटे करतार सिंह की तस्वीर भगत सिंह के साथ रहती थी। सराभा की फांसी के रोज़ क्रांतिकारियों ने जो गीत गाया था,  वो भगत सिंह अक्सर गुनगुनाया करता।  इस गीत की कुछ पंक्तियां थीं- 

फ़ख्र है भारत को ऐ करतार तू जाता है आज / जगत औ पिंगले को भी साथ ले जाता है आज / हम तुम्हारे मिशन को पूरा करेंगे संगियो / क़सम हर हिंदी तुम्हारे ख़ून की खाता है आज  

कुछ बरस ही बीते थे कि जलियां वाला बाग़ का बर्बर नरसंहार हुआ। सारा देश बदले की आग में जलने लगा। भगत सिंह का ख़ून खौल उठा। अवचेतन में कुछ संकल्प और इरादे समा गए। अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से लेकर कूका विद्रोह तक जो भी साहित्य मिला, अपने अंदर पी लिया। एक एक क्रांतिकारी की कहानी किशोर भगत सिंह की ज़ुबान पर थी। होती भी क्यों न? परिवार की कई पीढ़ियां अंग्रेज़ी राज से लड़तीं आ रहीं थीं। दादा अर्जुन सिंह,  पिता किशन सिंह,  चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह को देश के लिए मर मिटते भगत सिंह ने देखा था। चाचा स्वर्ण सिंह सिर्फ तेईस साल की उमर  में जेल की यातनाओं का विरोध करते हुए शहीद हो चुके थे। दूसरे चाचा अजीत सिंह को देश निकाला दिया गया था। दादा और पिता आए दिन आंदोलनों की अगुआई करते जेल जाया  करते थे। पिता गांधी और कांग्रेस के अनुयायी थे तो चाचा गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। घर में घंटों बहसें होतीं थीं। भगत सिंह के ज़ेहन में विचारों की फसल पकती रही। इसीलिए 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा तो भगत सिंह भी दसवीं की पढ़ाई छोड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। जब आंदोलन वापस लिया गया तो सारे नौजवानों से पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए कहा गया। तब इन नौजवानों के लिए लाला लाजपत राय ने नेशनल कॉलेज खोले। उनमें देशभक्त युवकों ने एडमिशन लिया था। ज़रा सोचिए! भगत सिंह पंद्रह-सोलह साल के थे और नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ रहे थे। आज़ादी कैसे मिले- इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा  किया करते थे। जितनी अच्छी हिन्दी और उर्दू,  उससे बेहतर अंग्रेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने पचास  रूपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी,  1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अदभुत है। एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है -

"इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को  एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है,  परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत  की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग -संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिन्दी (भारतीय) ही  क्यों न हो- ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुंचती है। क़ाज़ी नज़र -उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी,  विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है,  लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी,  पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता  है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती,तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं? ..तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विद्यमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक क्यों? ...हिंदी के पक्षधर सज्जनों  से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।"

 

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की  इस भाषा पर आप  क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने चौरानवे -पंचानवे साल पहले लिखी थी। आज भी भाषा के पंडित और पत्रकारिता के पुरोधा इतनी आसान हिंदी नहीं लिख पाते और माफ़ कीजिए हमारे अपने घरों के बच्चे क्या सोलह-सत्रह की उमर में आज इतने परिपक्व हो पाते हैं? नर्सरी- के जी - वन, के जी - टू के रास्ते पर चलकर इस उमर में वे दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ते हैं और उनके ज्ञान का स्तर क्या होता है - बताने की ज़रूरत नहीं। इस उमर तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों,  दार्शनिकों  और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आंखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे। उमर के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर चुपचाप घर छोड़ दिया। सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,

पूज्य पिता जी,

नमस्ते !

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो पूज्य बापू जी (दादा जी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे

आपका ताबेदार

भगत सिंह 

घर छोड़कर भगत सिंह उत्तर प्रदेश के  कानपुर जा पहुंचे। महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी उन दिनों कानपुर से प्रताप का प्रकाशन करते थे। उन दिनों वे बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते।  उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग़ में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक ‘मतवाला’ निकलता था। ‘मतवाला’ में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- ‘विश्व प्रेम’। पंद्रह और बाईस नवंबर 1924  को दो किस्तों में यह लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख के एक हिस्से में देखिए भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति -

"जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, अमीर-ग़रीब, छूत -अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहां विश्व बंधुत्व और कहां विश्व प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां दे सकती हैं। भारत जैसा ग़ुलाम देश तो इसका नाम भी नहीं ले सकता। फिर उसका प्रचार कैसे होगा ? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्रित करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणा प्रताप की तरह ज़िंदगी भर दर-दर ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं जाकर उस परीक्षा में उतीर्ण हो सकोगे ....तुम विश्व प्रेम का दम भरते हो। पहले पैरों पर खड़े होना सीखो। स्वतंत्र जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊंचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक तुम्हारे साथ कामागाटा मारु जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, तब तक डैम काला मैन कहलाओगे, जब तक देश में जालियांवाला बाग़ जैसे भीषण कांड होंगे, जब तक वीरागंनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार न होगा, तब तक तुम्हारा यह ढ़ोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति,   कैसा सुख और कैसा विश्व प्रेम? यदि वास्तव में चाहते हो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां को आज़ाद कराने के लिए कट मरो। बंदी मां को आज़ाद कराने के लिए आजन्म काले पानी में ठोकरें खाने को तैयार हो जाओ। मरने को तत्पर हो जाओ।" 

मतवाला में ही भगत सिंह का दूसरा लेख सोलह मई, 1925 को बलवंत सिंह के नाम से छपा। ध्यान दिलाने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों अनेक क्रांतिकारी छद्म नामों से लिखा करते थे। युवक शीर्षक से लिखे गए इस लेख के एक हिस्से में भगत सिंह कहते हैं -

"अगर रक्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हे युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं...सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुंह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फांसी के तख्ते पर हंसते हंसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, 'जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महंगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महंगी है क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ! भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठो! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रहो .....धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं  इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल -

वंदे मातरम !

प्रताप में भगत सिंह की पत्रकारिता  को पर लगे। बलवंत सिंह के नाम से छपे इन लेखों ने धूम मचा दी। शुरुआत में तो स्वयं  गणेश शंकर विद्यार्थी  को पता नहीं था कि असल में बलवंत सिंह कौन है ? और एक दिन जब पता चला तो भगत सिंह को उन्होंने गले से लगा लिया। भगत सिंह अब प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे। इन्हीं दिनों दिल्ली में तनाव बढ़ा। दंगे भड़क उठे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली भेजा। विद्यार्थी जी दंगों की निरपेक्ष रिपोर्टिंग चाहते थे। भगत सिंह उनकी  उम्मीदों पर खरे उतरे। प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की।इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अँगरेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी के लाड़ले  थे भगत सिंह। उनका लिखा एक एक शब्द विद्यार्थी जी को गर्व से भर देता। ऐसे ही किसी भावुक पल में विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को भारत में क्रांतिकारियों के सिरमौर चंद्रशेखर आज़ाद से मिलाया। आज़ादी के दीवाने दो आतिशी क्रांतिकारियों का यह अदभुत मिलन था। भगत सिंह अब क्रांतिकारी गतिविधियों में भरपूर भाग लेने लगे। साथ में पूर्ण कालिक पत्रकारिता भी चल रही थी। जब गतिविधियां बढ़ीं तो पुलिस को भी शंका हुई। खुफिया चौकसी और कड़ी कर दी गई। विद्यार्थी जी ने पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह को अलीगढ़ ज़िले के शादीपुर गांव के स्कूल में हेडमास्टर बनाकर भेज दिया। पता नहीं शादीपुर के लोगों को आज इस तथ्य की जानकारी है या नहीं। भगत सिंह शादीपुर में थे तभी विद्यार्थी जी को उनकी असली पारिवारिक कहानी पता चली थी। दरअसल भगत सिंह के घर छोड़ने के बाद उनकी दादी की हालत बिगड़ गई थी। दादी को लगता था कि शादी के लिए उनकी ज़िद के चलते ही भगत सिंह ने घर छोड़ा है। इसके लिए वो अपने को कुसूरवार मानती थीं। भगत सिंह को पता लगाने के लिए पिताजी ने अख़बारों में इश्तेहार दिए थे। ये इश्तेहार विद्यार्थी जी ने भी देखे थे,  लेकिन तब उन्हें पता नहीं था कि उनके यहां काम करने वाला बलवंत ही भगत सिंह है।बताते हैं कि इश्तेहार प्रताप में भी छपे थे। इनमें कहा गया था कि,  'प्रिय भगत सिंह अपने घर लौट आओ। तुम्हारी दादी बीमार हैं। अब तुम पर शादी के लिए कोई दबाव नहीं डालेगा। जब विद्यार्थी जी ने विज्ञापन देखा तो उनका माथा ठनका। विज्ञापन में भगत सिंह की फोटो भी छपी थी। चेहरा बलवंत सिंह से मिलता जुलता था। उन्हें लगा कि उनके यहां काम करने वाला ही असल में भगत सिंह था। इसी के बाद उन्होंने भगत सिंह के पिता को बुलाया। दोनों शादीपुर जा पहुंचे। विद्यार्थी जी ने भगत सिंह  को मनाया कि वो अपने घर लौट जाएँ।भगत सिंह विद्यार्थी जी का अनुरोध कैसे टालते। फौरन घर रवाना हो गए। दादी की सेवा की और कुछ समय बाद पत्रकारिता की पारी शुरू करने के लिए दिल्ली आ गए। दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्राट रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई। 

इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। ‘किरती’ में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका ‘महारथी’ में भी वे लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था - भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उप शीर्षक था- होली के दिन रक्त के छींटे। इस आलेख की भाषा और भाव देखिए-

"असहयोग आंदोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब में सिक्ख भी उठे। ख़ूब ज़ोरों के साथ। अकाली आंदोलन शुरू हुआ। बलिदानों की झड़ी लग गई।"

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं- "हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं  कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए  हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं । तड़प रहे  हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि  वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएं।"

जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख 'किरती' में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी  पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलो दिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बीएस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था। इसके भाग- दो में उनके लेख का शीर्षक था- युग पलटने वाला अग्निकुंड। इसमें वो लिखते हैं  - "सभी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है,  जिनमें न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओं जैसा त्याग। जो सिपाही तो होते थे,  लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं,  बल्कि अपने फ़र्ज़ के लिए निष्काम भाव से लड़ते मरते थे। सिख इतिहास यही कुछ था। मराठों का आंदोलन भी यही बताता है। राणा प्रताप के साथी राजपूत भी ऐसे ही योद्धा थे और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल और उनके साथी भी इसी मिट्टी और मन से बने थे"। 

यह थी भगत सिंह की पढ़ाई। बिना संचार साधनों के देश के हर इलाक़े का इतिहास भगत सिंह को कहां से मिलता था- कौन जानता है? मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें । इसमें भगत सिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएं लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें  भगत सिंह के शब्दों का कमाल देखिए- "फांसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है - कुछ कहना चाहते हो ? उत्तर मिलता है - वन्दे मातरम ! मां ! भारत मां तुम्हें नमस्कार और वह वीर फांसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को  दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के  इस अनमोल हीरे को बार बार प्रणाम। भगत सिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्दे मातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। इसकी भाषा उर्दू थी। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने  व्यवस्था के नियंताओं के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम,  साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज,  सत्याग्रह और हड़तालें,  विद्यार्थी और राजनीति,  मैं नास्तिक क्यों हूं, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं,  लेकिन देखिए भगत सिंह ने 90  साल पहले इस मसले पर क्या लिखा था- "जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वो ज़रूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे। उन धर्मों में उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे,  उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू क़ौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं,  व्यर्थ होगा। कितनी सटीक टिप्पणी है ? एकदम तिलमिला देती है।"

इसी  तरह एक और टिप्पणी देखिए- "जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं । हर कोई उन्हें अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग और संगठित ही क्यों न हो जाएं? हम मानते हैं  कि उनके अपने जन प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। उठो ! अछूत भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोबिंद सिंह की असली ताक़त तुम्ही थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही कुछ कर सके। तुम्हारी क़ुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखीं हुईं हैं। संगठित हो जाओ। स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिलेगा। तुम दूसरों की खुराक न बनो। सोए हुए शेरो ! उठो और बग़ावत खड़ी कर दो। 

इस तरह लिखने का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे। गोरी हुक़ूमत  ने चांद के जिस ऐतिहासिक फांसी अंक पर पाबंदी लगाईं थी,  उसमें भी भगत सिंह  ने छद्म नामों से अनेक आलेख लिखे थे। इस अंक को भारतीय पत्रकारिता की गीता माना जाता है।और अंत में उस पर्चे का ज़िक्र,  जिसने गोरों की चूलें हिला दी थीं। आठ अप्रैल, 1929  को असेम्बली में बम के साथ जो परचा फेंका गया,  वो भगत सिंह ने ही अपने हाथों से लिखा था। यह परचा कहता है - बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है... जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियमेंट का पाखंड छोड़कर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें... हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं  कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है,  लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती। 

इंक़लाब ! ज़िंदाबाद ! 

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कुलपति नहीं, खुद को मीडिया शिक्षक के रूप में देखते हैं प्रो. केजी सुरेश: मनोज कुमार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश मध्यप्रदेश की पत्रकारिता, खासकर मध्यप्रदेश की पत्रकारिता शिक्षा में भले ही अनचीन्हा नाम हो सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
kgsuresh

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश मध्यप्रदेश की पत्रकारिता, खासकर मध्यप्रदेश की पत्रकारिता शिक्षा में भले ही अनचीन्हा नाम हो सकता है लेकिन देश और दुनिया की पत्रकारिता और पत्रकारिता शिक्षा में सुप्रतिष्ठित नाम है। प्रोफेसर केजी सुरेश खांटी किस्म के पत्रकार रहे हैं। पीटीआई जैसी प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी में मुख्य राजनीतिक संवाददाता रहते हुए उन्होंने पत्रकारिता में नए आयाम गढ़े। पत्रकारिता एवं संचार विशेषज्ञ के रूप में दिल्ली से दुनिया भर में अपनी छाप छोडऩे वाले प्रोफेसर केजी सुरेश अपने उम्र से अधिक अनुभव रखते हैं। 26 सितम्बर को वे अपनी उम्र के एक नए पड़ाव पर होंगे और सुखद यह है कि इस बार पत्रकारिता में मील का पत्थर कहे जाने वाले स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा और राष्ट्रकवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के नाम से स्थापित पत्रकारिता स्कूल में अपना जन्मदिन सेलिब्रेट करेंगे। संचार और पत्रकारिता में दखल रखने वाले प्रोफेसर सुरेश दादा माखनलाल के सपनों को जमीन पर उतारने के लिए कृतसंकल्पित हैं। वे कहते हैं कि ‘एमसीयू से मैं एक शिक्षक के रूप में जुड़ा रहा हूं और आगे भी मैं एक शिक्षक की भूमिका में रहना पसंद करूंगा।’

प्रोफेसर सुरेश एमसीयू को एक नई पहचान देना चाहते हैं। लीक से हटकर काम करने में उनकी रुचि रही है और इसलिए वे नए जमाने के साथ पत्रकारिता शिक्षा को आगे ले जाना चाहते हैं। एमसीयू के नए कैंपस में कम्युनिटी रेडियो और इंटरनेट रेडियो की स्थापना करने की दिशा में कार्यवाही आरंभ कर दी है। एमसीयू के लम्बे समय से स्थगित प्रकाशनों को आरंभ करना और उन्हें स्तरीय स्वरूप देने की पहल भी की है। वे मीडिया एजुकेशन के अपने अनुभव के साथ किताबी बनाने के बजाय व्यवहारिक बनाना चाहते हैं ताकि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को मीडिया हाऊस में सम्मानजनक स्थान मिल सके। वे शिक्षण की गुणवत्ता को भी सुधारने की दिशा में चर्चा कर रहे हैं। वे परम्परागत ढंग से बाहर निकल कर आज के जमाने के साथ पत्रकारिता शिक्षा और शिक्षक को ले जाने के लिए संकल्पित हैं।  

यहां यह उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि एमसीयू आने के पहले प्रोफेसर केजी सुरेश स्कूल ऑफ मास मीडिया, यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज, देहरादून में डीन के पद पर कार्य कर रहे थे। एमसीयू को एक नई सूरत देने के लिए मध्यप्रदेश शासन ने उनके नाम का चयन किया तो यह उनके लिए अवसर था। प्रोफेसर सुरेश चाहते तो जिस जगह पर थे, वहां हैंडसम सेलरी थी और आजादी भी लेकिन चुनौतियों को हाथों में लेने वाले प्रोफेसर सुरेश ने झट से हामी भर दी। बातचीत में वे बताते हैं कि एशिया के पहले पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अपना अनुभव बांटना और यहां से नए अनुभव लेकर पत्रकारिता की नयी पीढ़ी को नई जमीन देने का उनका इरादा है। जहां तक हैंडसम सेलरी की बात है तो एक प्रतिबद्ध पत्रकार के लिए यह सब बेमानी है। वे कहते हैं कि मुझे संतोष होगा कि मध्यप्रदेश शासन और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मुझ पर जो भरोसा जताया है, उस पर मैं खरा उतऊं, तब मुझे संतोष होगा। स्वयं को कुलपति कहलाने के पहले वे पत्रकार कहलाना पसंद करते हैं।

प्रोफेसर केजी सुरेश का पत्रकारिता एवं संचार का फलक काफी बड़ा है। देहारदून के पहले वे भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहे हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने आइआइएमसी को नया स्वरूप दिया। आईआईएमसी के महानिदेशक के रूप में श्री सुरेश ने भारतीय भाषा पत्रकारिता को विस्तार दिया। अपने कार्यकाल में क्रमश: मराठी और मलयालम पत्रकारिता को अपने अमरावती, महाराष्ट्र और कोट्टायम, केरल परिसर शुरू किया गया। उन्होंने उर्दू के सर्टिफिकेट कोर्स को डिप्लोमा कोर्स में परिवर्तन कर और उपयोगी बनाया। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के सहयोग से आयआयएमसी ने संस्कृत पत्रकारिता में तीन महीने का प्रमाणपत्र कार्यक्रम भी शुरू किया था। नए दौर की पत्रकारिता को दृष्टि में रखकर न्यू मीडिया विभाग के अलावा भारतीय भाषा पत्रकारिता विभाग की भी स्थापना का श्रेय भी उन्हें जाता है। इसके अलावा भारत में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को बढ़ावा देने के लिए आयआयएमसी में सामुदायिक रेडियो केंद्र की स्थापना और पूरे भारत में मीडिया शिक्षकों के प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन के लिए राष्ट्रीय मीडिया संकाय विकास केंद्र की स्थापना शामिल हैं। 

प्रो. सुरेश प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की अकादमिक परिषद के सदस्य हैं। सोसाइटी ऑफ सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, कोलकाता, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की अनुसंधान समिति, सलाहकार परिषद, दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, दिल्ली विश्वविद्यालय, अकादमिक परिषद, हिमाचल प्रदेश के केंद्रीय विश्वविद्यालय और स्कूल ऑफ अबनिंद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ क्रिएटिव आर्ट्स एंड कम्युनिकेशन स्टडीज, असम विश्वविद्यालय, सिलचर के साथ स्कूल ऑफ मॉर्डन मीडिया के साथ भी संबद्ध रहे। प्रोफेसर सुरेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की राष्ट्रीय परिषद की पुरस्कार चयन समिति के सदस्य हैं। डीडी न्यूज नईदिल्ली में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में जुड़े रहे। इसके साथ ही एशियानेट न्यूज़ नेटवर्क में संपादकीय सलाहकार एवं डालमिया भारत एंटरप्राइजेज में गु्रप मीडिया सलाहकार भी रहे। प्रोफेसर सुरेश जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आपदा अनुसंधान के लिए विशेष केंद्र में संचार कौशल के लिए प्रभारी प्रोफेसर रहे हैं। 

प्रोफेसर सुरेश को राष्ट्रमंडल युवा कार्यक्रम एशिया द्वारा राष्ट्रमंडल युवा राजदूत नामित किया गया था। मीडिया में रिसर्च के लिए प्रेम भाटिया फैलोशिप प्राप्तकर्ता प्रोफेसर सुरेश को पीआरएसआई लीडरशिप अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। नवंबर 2018 में बिजनेस वर्ल्ड मैगज़ीन और एक्सचेंज4मीडिया द्वारा स्थापित मीडिया शिक्षा पुरस्कार, एकता, ब्रदरहुड और सांप्रदायिक सद्भाव और लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए पहला ख्वाजा गरीब नवाज अवॉर्ड से मीडिया शिक्षा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस वर्ष केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का प्रतिष्ठित ‘गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

प्रोफेसर सुरेश भारत के अंतरराट्रीय फिल्म महोत्सव के लिए भारतीय पैनोरमा 2018 और 2017 के प्रतिष्ठित फीचर फिल्म जूरी और नॉन-फिक्शन जूरी के सदस्य थे। मार्च 2015 में सियोल में वर्ल्ड मीडिया कॉन्फ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र पत्रकार हैं। प्रोफेसर सुरेश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान, यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, कतर, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका सहित पूरे भारत और दुनिया की यात्रा कर मीडिया शिक्षा में भारत के दृष्टिकोण से पूरी दुनिया को अवगत कराया है।

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दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद व अंत्योदय नोबल पुरस्कार का असली हकदार है: पूरन डावर

आज ही के दिन यानी 25 सितंबर 1916 को हमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक दार्शनिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री एवं कुशल राजनीतिज्ञ मिले थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 25 September, 2020
Last Modified:
Friday, 25 September, 2020
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

अंत्योदय एवं एकात्म मानववाद की अवधारणा के प्रणेता जनसंघ के अध्यक्ष रहे स्वर्गीय पंडित दीनदयाल उपाध्याय, जब तक पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक सेवा नहीं पहुंचती, तब तक देश विकसित नहीं कहला सकता, इस सोच के साथ जिस चिंतक ने राजनीति में शुचिता की कल्पना की, देश का दुर्भाग्य कि उन्हें हमने समय से पहले खो दिया।

आज ही के दिन यानी 25 सितंबर 1916 को हमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक दार्शनिक, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री एवं कुशल राजनीतिज्ञ मिले थे। पंडित उपाध्याय ने एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की कल्पना की थी, जहां विकास अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुंचे। वह वर्गहीन, जातिहीन और संघर्षमुक्त सामाजिक व्यवस्था के समर्थक थे। इस दिशा में नि:संदेह काफी प्रयास किए गए हैं, लेकिन फिर भी काफी कुछ किया जाना शेष है।

ये कहना गलत नहीं होगा कि मौजूदा वक्त में दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को आत्मसात करना बेहद जरूरी हो गया है। पूंजीवादी एवं समाजवादी विचारधाराएं हमें आगे होने का अहसास तो करा रही हैं, लेकिन इस अहसास में एक खोखलापन है। पंडित उपाध्याय को इस खोखलेपन का भान था, इसलिए वे कहते थे कि पूंजीवादी एवं समाजवादी विचारधाराएं केवल हमारे शरीर एवं मन की आवश्यकताओं पर विचार करती हैं और इसलिए वे भौतिकवादी उद्देश्य पर आधारित हैं, जबकि संपूर्ण मानव विकास के लिए इनके साथ ही आत्मिक विकास भी आवश्यक है।

दीनदयाल उपाध्याय जितने अच्छे राजनेता थे, उतने ही उच्च कोटि के चिंतक, विचारक और लेखक भी थे। वह केवल समस्या पर ध्यान आकर्षित नहीं करते थे, बल्कि उसका समाधान बताने में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने दुनिया को ‘अंत्योदय’ से परिचित कराया। एक ऐसा विचार जो सबसे पहले और सबसे अधिक सहायता उस व्यक्ति को उपलब्ध कराने पर जोर देता है, जिसकी जरूरत सबसे अधिक है। सरल शब्दों में कहें तो जरूरतमंदों में से एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना, जिसे मदद की दरकार सबसे ज्यादा हो और फिर उसी से शुरुआत करते हुए प्रत्येक व्यक्ति तक सहायता पहुंचाना। पंडित उपाध्याय मानते थे कि जिस झोपड़ी में पहले से ही दीया जल रहा है, वहां बल्ब लगाने से बेहतर होगा कि पहले उस घर को रोशन किया जाए, जो अंधकार में डूबा है। अंधेरे में जलाया गया एक छोटा सा दीया भी उम्मीदों के उजाले का प्रतीक बन सकता है।

पंडित दीनदयाल के चिंतन को मुख्यत: अंत्योदय के रूप में याद किया जाता है, लेकिन एकात्म मानववाद भी उनकी दूरदृष्टि को दर्शाता है। उनके द्वारा स्थापित एकात्म मानववाद की परिभाषा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा सामयिक है। दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि जिस प्रकार मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के ठीक रहने पर वह चरम सुख और वैभव की प्राप्ति कर सकता है, ठीक उसी तरह यदि समाज के प्रत्येक तबके पर ध्यान दिया जाए तो भारत को आदर्श राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। एकात्म मानववाद का उद्देश्य एक ऐसा स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल विकसित करना था, जिसमें विकास के केंद्र में मानव हो। यानी, व्यक्ति एवं समाज की आवश्यकता को संतुलित करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना। यह व्यक्तिवाद का खंडन करता है और एक पूर्ण समाज के निर्माण के लिए परिवार तथा मानवता के महत्व को प्रोत्साहित करता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कई दशक पहले ही आज की समस्या और उसके समाधान को रेखांकित कर दिया था। वे दूरदृष्टा थे, उन्हें पता था कि आजादी के बाद जिस तरह से पश्चिमी संस्कृति, विचारधारा को अपनाने की इच्छाएं जन्म ले रही हैं, वो आगे चलकर एक नई समस्या को जन्म देंगी। विकास की दौड़ में वह व्यक्ति सबसे पीछे छूट जाएगा, जिसके विकास के नाम पर सब कुछ किया जा रहा है। पंडित उपाध्याय के दर्शन, विचारों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मौजूदा परिस्थितियों, समस्याओं को देखकर उनका आकलन करके ही उन्होंने उन्हें लिखा है। आज यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय हमारे बीच होते तो अपनी उपलब्धियों के लिए उन्हें नोबल मिलना तय था।

11 फरवरी 1968 को वह हम सबको छोड़कर दुनिया से रुखसत हो गए। उनका निधन आज तक पहेली बना हुआ है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ से पटना जा रहे थे, इसी दौरान उनका शव मुगलसराय रेलवे यार्ड में पाया गया। उनकी मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए सीबीआई से भी जांच कराई गई, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। आज मुगलसराय स्टेशन का नाम दींनदयाल नगर रखकर उनकी स्मृति को संजोया गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की अवधारणा से प्रेरित होकर ही अंत्योदय अन्नपूर्णा सेवा शुरू की। उनके अवतरण दिवस पर उनकी स्मृति को पुन: नमन।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

राज्य सभा का मानसून सत्र करीब एक सप्ताह पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन बीते दिनों राज्य सभा में जो भी हुआ, वह बेहद शर्मनाक है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

राज्य सभा का मानसून सत्र करीब एक सप्ताह पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन बीते दिनों राज्य सभा में जो भी हुआ, वह बेहद शर्मनाक है। सदन की कार्रवाई के दरम्यान पक्ष, प्रतिपक्ष और संचालन करने वाले डिप्टी चेयरमैन, सभी ने संवैधानिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं के प्रति गरिमा और आदर नहीं दिखाया तो मीडिया भी पीछे नहीं रहा। उप सभापति का रवैया तो आपत्तिजनक था ही, लेकिन प्रतिपक्ष ने भी कोई जिम्मेदाराना बरताव नहीं किया। संसद संचालन की नियम पुस्तिका फाड़ने और माइक तोड़ने के प्रयास तथा आसंदी पर सवार होने की कोशिश किसी भी सभ्य लोकतंत्र का सुबूत नहीं है।

डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह अच्छे पत्रकार और संसदीय प्रक्रिया के जानकार माने जाते रहे हैं। एक जमाने में देश की प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका रविवार में वे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के सहयोगी हुआ करते थे। मैं उन दिनों रविवार के लिए खास रिपोर्टिंग करता था। इस तरह हम लोग एसपी की टीम का हिस्सा थे। तब श्री हरिवंश की छवि चमकीले पत्रकार की थी। उसके बाद वे एक दैनिक से जुड़े और फिर राज्य सभा में प्रतिष्ठित हुए। 

लेकिन मेरी चिंता पक्ष, विपक्ष और आसंदी के गैर जिम्मेदार व्यवहार के बारे में नहीं है। गंभीर मसला यह है कि संसद की कार्रवाई का कवरेज भी प्रकाशन और प्रसारण माध्यमों में गरिमापूर्ण नहीं था। लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंदिर के बारे में रिपोर्टिंग के अपने कुछ उसूल हैं, कुछ परंपराएं हैं और नियमावली है। मगर पत्रकारिता ने उस दिन की रिपोर्टिंग में इन उसूलों, परंपराओं और नियमावली को ताक में रख दिया। कुछ माध्यम उप सभापति के पीछे पड़े थे तो कुछ विपक्ष के। अभी तक अदालती मामलों के मीडिया ट्रायल की निंदा होती रही है, लेकिन अब तो पत्रकारों ने संसद-ट्रायल भी शुरू कर दिया है। यह बेहद अफ़सोसनाक है। संसदीय प्रक्रिया की रिपोर्टिंग पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक चश्में से कतई नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया के तमाम नए-नए अवतार दक्ष पत्रकार और संपादक संचालित नहीं करते। जो पेशेवर पत्रकार इनसे जुड़े हैं, उनकी तादाद अत्यंत कम है। अधिकतर तो आम नागरिकों के हाथ में ही हैं। दुर्भाग्य से उन्हें न तो संसद के नियमों की जानकारी है और न उसकी कार्रवाई के अंशों को अपने प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की बंदिशें पता हैं। वे अपनी अपनी विचारधारा के हिसाब से सदन के भीतर के व्यवहार पर ऊल-जलूल टिप्पणियां करते हैं। अनेक मामलों में यह विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में भी आता है। चाहे वह वॉट्सऐप हो, ट्विटर हो, इंस्टाग्राम हो, फ़ेसबुक हो या फिर सामूहिक ईमेल या फोन संदेश हों-उन पर भी दोनों सदनों के अंदर की गतिविधि को तोड़-मरोड़कर या ट्विस्ट करके नहीं भेजा जा सकता। क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है मिस्टर मीडिया?

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

मीडिया के हमाम में ये मेहमान अपने को निर्वस्त्र होते क्यों देखना चाहते हैं मिस्टर मीडिया!

 

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40 साल पहले बिल्कुल नहीं सोचा था कि ऐसा होगा: शशि शेखर

चालीस साल पहले आज ही के दिन झिझकता हुआ वाराणसी में ‘आज’ के दफ्तर में घुसा था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Shashi Shekhar

हिंदी पत्रकारिता जगत में एक ऐसा नाम, जो अपने काम और प्रोफेशनल नजरिए के लिए जाना जाता है। जी हां, यहां बात हो रही है हिंदी दैनिक अखबार ‘हिन्दुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर की। पत्रकारिता में उन्हें अब 40 साल का लंबा अनुभव हो गया है।

आज कल जिस उम्र में लोग करियर की शुरुआत करते हैं, उस उम्र में उन्होंने वह गौरव हासिल किया, जहां तक पहुंचने की चाहत लेकर पत्रकारिता से जुड़े अधिकांश युवा इस इंडस्ट्री में आते हैं। यानी महज 24 वर्ष की आयु में वे 'आज' अखबार का संपादक बने और फिर संपादक के तौर पर पहले 'आज', फिर 'आजतक' न्यूज चैनल, हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' और फिर 'हिन्दुस्तान' के समूह संपादक बन गए। इन दिनों वे 'हिन्दुस्तान' के प्रधान संपादक के तौर पर कार्यरत हैं। 

इस मौके पर उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के जरिये मीडिया में अपने चालीस के अनुभव को साझा किया है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

30 जून 1960 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी के गांव चंदीकारा में जन्मे शशि शेखर ने आगरा के बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश और इतिहास में ग्रेजुएशन करने के बाद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में स्नातकोत्तर किया। शशि शेखर ने पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी हासिल किया है। 1980 में उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा।

शशि शेखर को 40 साल की पत्रकारिता का अनुभव है। वे प्रिंट, टीवी और ऑनलाइन तीनों विधाओं में माहिर हैं। उनके करिअर की शुरुआत 1980 में वाराणसी के प्रसिद्ध दैनिक ‘आज’ से हुई। वर्ष 1984 में वे ‘आज’ अखबार के रेजिडेंट एडिटर बनाये गये। उन्होंने यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश में ‘आज’ अखबार का विस्तार किया। महज 24 साल की उम्र में वे आज अखबार के संपादक बन गए। वे ‘आज’ के इलाहाबाद और आगरा संस्करण के संपादक रहे। इसके बाद जनवरी 2001 से जुलाई 2002 तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कदम रखा और 'आजतक' न्यूज चैनल के साथ काम किया। वहां डेढ़ साल रहने के बाद वे वापस प्रिंट मीडिया में आ गए और इस बार उन्होंने अमर उजाला मेरठ में कार्यकारी संपादक का कार्यभार संभाला। पत्रकारिता तथा समाचारपत्र प्रबंधन में उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर अमर उजाला मैनेजमेंट ने उनको ग्रुप एडिटर और प्रेजिडेंट (न्यूज) नियुक्त किया। वे जुलाई 2002 से सितंबर 2009 तक 'अमर उजाला' अखबार में इस पद पर बने रहे। फिर सितंबर 2009 में वे ‘हिन्दुस्तान’ के साथ ‘नंदन’, ‘कांदबिनी’ और ‘लाइव हिंदुस्तान डॉट काम’ के मुख्य संपादक की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसके बाद उन्हें ‘हिन्दुस्तान’ का प्रधान संपादक बनाया गया।

शशि शेखर के बारे में कहा जाता है कि वे काम करते हुए कभी थकते नहीं हैं। अपनी इस असीम ऊर्जा से वे अपने अधीन कार्यरत सहकर्मियों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

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पुण्यतिथि विशेष: आज भी अमर उजाला परिवार के लिए प्रेरणा बनी हैं अनिल जी की ये खूबियां

भोर की पहली किरण फूटी भी न थी कि महायात्रा के लिए ‘अमर उजाला’ के यशस्वी प्रधान संपादक अनिल अग्रवाल आगरा में न्यू राजा मंडी स्थित अपने आवास से निकल पड़े।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Tribute

सुभाष ढल, सामाजिक कार्यकर्ता, आगरा।।

भोर की पहली किरण फूटी भी न थी कि महायात्रा के लिए ‘अमर उजाला’ के यशस्वी प्रधान संपादक अनिल अग्रवाल आगरा में न्यू राजा मंडी स्थित अपने आवास से निकल पड़े। परिवार से विदाई के वक्त अनिल जी जीवित लौटकर नहीं आएंगे, यह कल्पना से भी परे था। मैं बात कर रहा हूं 23 सितंबर 1989 की, जब वह बरेली में ‘अमर उजाला’ संस्थान के कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे थे। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शिरकत करने वाले थे। अनिल जी अभी बरेली पहुंचे ही नहीं थे कि सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। ऐसा लगा कि सवेरे-सवेरे अंधेरा हो गया।

अनिल जी से जुड़े कई ऐसे संस्मरण हैं, जो मुझे हमेशा याद रहेंगे। स्व.डोरीलाल अग्रवाल के यशस्वी पुत्र के साथ-साथ उनमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता थी। सक्रियता उनका कर्म क्षेत्र था। डोरीलाल जी का निधन हो चुका था। अभी यह तय नहीं हुआ था कि सुबह अखबार निकलेगा कि नहीं निकलेगा। अखबार निकलने की संभावना पर विचार चल रहा था। शोक व्यक्त करने आने वाले लोगों के साथ वह बातचीत कर रहे थे और जब भी समय निकलता था तो शव के सम्मुख बहुत तेजी से संपादकीय लिख रहे थे,' कारवां चलता रहेगा।'

मेरा परिचय उनसे धूलिया गंज प्रेस से हो चुका था। समय की धारा बढ़ी, हमें लेटर टू एडिटर लिखने का शौक लगा। कुछ पत्र छपे भी। एक बार अग्रसेन इंटर कॉलेज के सामने वे गाड़ी से निकले तो मेरी उनसे नमस्कार हुई। बोले-सुभाष कैसे हो? मैंने कहा- ठीक हूं भाई साहब। बोले-ठीक-ठाक लिख लेते हो तुम। फिर निरंतर उनसे संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। ‘अमर उजाला’ गुरु का ताल रोड के पास पहुंच गया था। वह अक्सर मुझे बहुत स्नेह करते थे और कई बार बोलते थे कि सुभाष मैं तुम्हें छोटा भाई मानता हूं। कभी हंसते थे तो कभी-कभी कड़ी फटकार भी लगाते थे। हम वाकई उद्दंडी थे। एक बार हमने उन्हें चार पन्नों का हिदायत भरा पत्र लिखा। अनिल जी का गुस्सा देखने लायक था। पत्र लिखा मैंने था, उस पर दस्तखत राम टंडन, गोपाल गुरु और के.एस तिवारी के भी थे।

मुझे ‘अमर उजाला’ बुलाया गया। मैंने गोपाल गुरु से कहा-‘गुरु मामला बढ़ गया है। चलो चारों चलते हैं, जो होगा सो देखा जाएगा।' गुरु हम सबमें तेज थे। सभी एक साथ चलने को तैयार हो गए। गुरु ने कहा कि एक समाचार बना लो। क्योंकि जाते ही अनिल जी यह पूछेंगे कैसे आना हुआ? कम से कम समाचार तो दे देंगे। हुआ भी यही, समाचार देकर अनिल जी ने सब को जाने के लिए बोल दिया। जैसे ही मैं चलने को हुआ, उन्होंने मुझसे  कहा-सुभाष तुम बैठो। मेरे बैठते ही दराज से उन्होंने पत्र निकाला और बोले इसको पढ़ो और इसका अर्थ समझाओ। मेरी स्थिति उस समय क्या हुई, बता नहीं सकता। सिर्फ इतना कहा कि मैं ही नहीं, बाकी इन तीनों को भी बुलाओ अंदर। अनिल जी बोले कि मैं तुम्हें छोटा भाई मानता हूं और बहुत प्यार करता हूं। तुमने जिस तरह के आरोप लगाए हैं, उन आरोपों में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। पर मेरी बात सच्ची थी। एक पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जिसका मुझे आज तक कष्ट है।

उनमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता थी। अभी उम्र केवल 36 बरस की ही थी। बहुत कुछ सीखने को मिला, क्योंकि उन दिनों मैं निहाल सिंह जी सांसद के साथ था, तो अनिल जी से अक्सर मुलाकातें होती रहती थीं। शाम को 3:00 बजे से लेकर 4:00 बजे तक वे लगभग फ्री रहते थे और यही टाइम हमारा अक्सर उनसे मिलने जाने का हुआ करता था। अक्सर वहां भगवान शंकर रावत जी भी मिलते थे।

1984 के लोकसभा चुनाव में यह चर्चा थी कि कांग्रेस से अनिल अग्रवाल जी चुनाव लड़ने जा रहे हैं। उन्होंने मुझे कहा कि निहाल भाई को बताना, मैं बिल्कुल इंटरेस्टेड नहीं था और कुछ लोगों के नाम लिए, जिन्होंने इस चर्चा को अफवाह का रूप दिया। ‘अमर उजाला’ के विस्तार की आधारशिला का यदि किसी व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह अनिल कुमार अग्रवाल ही थे। उनकी पुण्यतिथि पर मेरा कोटि कोटि नमन।

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ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिंदी पर ब्रेक: मनोज कुमार

चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं। शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
HindiDiwas

मनोज कुमार, वरिष्ठ ।।

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिंदी के चलन पर ब्रेक लग गया है। आप हिंदी के हिमायती हो और हिंदी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिंदी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिंदी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिंदी समाचार चैनलों ने हिंदी को हाशिये पर ला खड़ा किया है। हिंदी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं। संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है। अब मीडिया का हिंदी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिंदी की पूछ-परख कौन करेगा। हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है।

चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं। शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है। प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्नर। जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडिटर शब्द सहज हो गया है। यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिंदी को दरकिनार किया जा रहा है। हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिंदी का श्रेष्ठ चैनल या हिंदी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिंदी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम। 

हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिंदी माथे की बिंदी है। हिंदी से हमारा स्वाभिमान है। हिंदी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिंदी हाशिये पर है। हिंदी के चैनलों के पास हिंदी के शब्दों का टोटा है। उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है। दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रुचिकर लगता है। हिंदी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रुचि नहीं होती है। सच तो यह है कि हिंदी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिंदी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिंदी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है। हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिंदी से दूर हैं। इन संचार माध्यमों की आत्मा हिंदी के प्रति जाग गई तो हिंदी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है। हम तो हिंदी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिंदी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं। हिंदी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे। इसे हिंदी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं। कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे।

हिंदी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिंदी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है। मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी। परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिंदी में और इसी हिंदी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है। अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिंदी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है। अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिंदी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है। हिंदी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया। बताया गया कि हिंदी माध्यम में भी अवसर हैं। यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियों का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें। ऐसे में हिंदी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है। हालांकि हिंदी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं। हिंदी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिंदी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिंदी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं। एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिंदी आले में टांग दी जाती है। कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं। इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिंदी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है।

इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है। यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिंदीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है। उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है। यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है। मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो। मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं। जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं। अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है।

मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम। हम हिंदीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे। तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था। अखबार था तो पत्रकारिता थी। आज की तरह पेड न्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी। लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे। हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है। शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिंदी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए। हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है। किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढ़ने के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है, क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है। हिंदी की श्रेष्ठता के लिए, हिंदी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए। दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है। हिंदी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिंदी को गले लगाइए। हिंदी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है। एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिंदी में एक लेख लिखेंगे, हिंदी में संवाद करेंगे। हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा। मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा।

(लेखक भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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‘भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं’

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं।

राजेश बादल by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं। अगर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है कि हिंदी आखिरी सांसें गिन रही है। अगर अब ध्यान न दिया गया तो करोड़ों दिलों में धड़कने वाली ये भाषा जैसे विलुप्त हो जाएगी। करीब चालीस बरस से हिंदी के अस्तित्व पर आशंका जताने वालों को मैं खुद देख रहा हूं। पुरानी पीढ़ी के लोगों से भी हिंदी की चिंता सुनता आया हूं। ताज्जुब है कि दशकों से इस प्रलाप के बाद भी हिंदी किसी अमरबेल की तरह फैलती नजर आ रही है। आज जिस इलाके में हिंदी बोली, समझी और पढ़ी जा रही है। क्या सौ साल पहले भी यही स्थिति थी? उत्तर है-बिलकुल नहीं।

तब के हिन्दुस्तान में हिंदी के पंडित थे ही कितने? राज काज की भाषा उर्दू थी और उस पर फारसी का असर था। हिंदी का परिष्कार और प्रयोग तो पिछली सदी में ही पनपा और विकसित हुआ है। गुलाम भारत में भी हिंदी कभी जन-जन की भाषा नहीं रही। अलबत्ता यह अवश्य महसूस किया जाने लगा था कि अगर किसी भाषा में हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा बनने की संभावना है तो वो हिंदी ही है। भोजपुरी, अवधी, बृज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थान की अनेक बोलियों की छोटी छोटी नदियों ने आपस में मिलकर हिंदी की गंगा बहाई। संस्कृत का मूल आधार तो था ही। इसके बाद उर्दू और अंग्रेजी ने भी हिंदी के अनुष्ठान में अपनी-अपनी आहुतियां समर्पित कीं। अगर आप डेढ़-दो सौ साल की हिंदी-यात्रा देखें तो पाते हैं कि शुरुआती दौर की हिंदी आभिजात्य वर्ग के लिए थी। कठिन और संस्कृतनिष्ठ। आज के बच्चे अगर पढ़ें तो शायद उसे हिंदी ही न मानें।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, हिंदी बोलचाल की या यूं कहें आम अवाम की भाषा बनती गई। पूरब से रविन्द्रनाथ टैगोर हों या पश्चिम से महात्मा गांधी, उत्तर से भारतेंदु  हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हजारीप्रसाद द्विवेदी हों या फिर दक्षिण से-चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले क्रांतिकारी भी हिंदी को संपर्क की भाषा बना चुके थे। यकीन न हो तो सरदार भगतसिंह के विचार पढ़ लीजिए। सभी ने हिंदी को देश की प्रतिनिधि भाषा स्वीकार कर लिया था।

जरा याद कीजिए उस दौर के हिन्दुस्तान में अभिव्यक्ति के माध्यम कितने थे? सिर्फ़ एक माध्यम था और वो था मुद्रित माध्यम। किताबों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये उस काल में हिंदी लोगों तक पहुंचती थी। साक्षरता का प्रतिशत कम था। इसलिए लिखा गया साहित्य आम आदमी तक आसानी से पहुंचाना मुश्किल काम था। मगर आजादी के आंदोलन में हिंदी अभिव्यक्ति का एक बड़ा जरिया बन चुकी थी। कहा जा सकता है कि पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट करने में हिंदी की बड़ी भूमिका थी। जो भाषा हजारों में लिखी जाती थी और लाखों में बोली जाती थी, वो करोड़ों की भाषा बन गई थी।

आजादी के बाद प्रिंट माध्यम के साथ आकाशवाणी ने भी कंधे से कंधा मिलकर काम शुरू कर दिया। रेडियो ने तो हिंदी को प्रसारित करने में क्रांतिकारी काम किया। रेडियो सुनने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था। लिहाजा आकाशवाणी सुन-सुन कर लोगों ने हिंदी को जन-जन की भाषा और बोली बना दिया। तीसरा माध्यम आया भारतीय सिनेमा। हिंदी चलचित्रों ने तो वो काम किया, जो हिंदी के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करके भी सरकारें नहीं कर सकतीं थीं। दुनिया का अव्वल कारोबार बन चुके भारतीय सिनेमा ने दक्षिण भारत के उन इलाकों में भी लोगों को हिंदी सिखा दी, जो राजनीति का शिकार होकर हिंदी का उग्र विरोध करते आए थे। आज सारे विश्व में बोली और लिखी जाने वाली भाषाओं के जानकारों की संख्या देख लीजिए। हमारी हिंदी अलग से सितारों की तरह चमकती दिखाई देती है। भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं।

मैं इस लेख को आंकड़ों से भरकर उबाऊ और बोझिल नहीं बनाना चाहता। पाठक तमाम स्रोतों से इन्हें हासिल कर सकते हैं। आशय सिर्फ यह है कि हम हिंदी के विस्तार और प्रसार के नजरिये से आगे ही गए हैं। पीछे नहीं लौटे। मिसाल के तौर पर  पत्र-पत्रिकाओं को देख लीजिए। आजादी मिलने के समय हिंदी की मैगजीन और अखबार कितने थे? आप सौ तक की गिनती में समेट सकते थे। आज यह संख्या हजारों में है। समाचारपत्रों का हिसाब-किताब देखने के लिए एक भारी भरकम विभाग तैनात है। जिन अखबारों की प्रसार संख्या तीस-चालीस बरस पहले कुछ लाख होती थी, आज वो करोड़ों में जा पहुंची है। जाहिर है इन्हें पढ़ने वाले पेड़-पौधे अथवा मवेशी नहीं हैं? फिर कौन हैं जो हिंदी के मुद्रित प्रकाशनों की तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। सिर्फ प्रकाशनों की नफरी ही नहीं बढ़ रही, उनके कारोबार के ग्राफ में भी जबरदस्त उछाल आया है। दुनिया का कौन सा देश छूटा है, जहां हिंदी की किताबें नहीं मिलतीं। भारत के आधा दर्जन से ज़्यादा प्रकाशकों के विदेशों में अपनी किताबों के शोरूम हैं। हिन्दुस्तान में आज भी पचास फीसदी विश्वविद्यालय हिंदी नहीं पढ़ाते और दुनिया भर में पचास से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए।

यहां याद दिलाना जरूरी है कि जिस पाकिस्तान में उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से देवनागरी और हिंदी पर बंदिश है, उसी देश में पिछले साल छह भागों में अठारह सौ पन्नों की एक उपन्यास श्रृंखला हिंदी में छपी है। ‘दरवाजा खुलता है’ नाम से यह उपन्यास लाहौर के संगेमील प्रकाशन ने छापा है। पाकिस्तान में इसकी भारी मांग है और लोगों को भले ही समझ न आए, ड्राइंग रूम में सजा कर रखने के लिए वे इसे खरीद रहे हैं। अच्छी बात ये है कि उर्दू से हिंदी में इसका अनुवाद जाने माने भारतीय लेखक डॉक्टर केवल धीर ने किया है। हिंदी प्रेमियों के लिए क्या ये उदाहरण गर्व के कुछ पल उपलब्ध नहीं कराता?

हिंदी के लिए करिश्मा तो उस माध्यम ने किया, जिसे किसी जमाने में बुद्धू बक्सा कहा गया था और जिसके भारत में प्रवेश का भरपूर विरोध हुआ था। यह माध्यम है टेलिविजन। करीब करीब तीस साल से टेलिविजन भारत में घर-परिवार का सदस्य बन गया है। बेशक आज के भारत में सभी भारतीय भाषाओं में छोटे परदे ने अपनी घुसपैठ की है लेकिन सबसे आगे तो हिंदी ही है। खबरिया हों या मनोरंजन चैनल-हिंदी के दर्शक सबसे आगे की कतार में बैठे हैं। यही नहीं, अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी के चैनल, हिंदी के गाने और धारावाहिक उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हैं, जितने उन प्रदेशों की अपनी भाषा के चैनल। एक अनुमान के मुताबिक छोटे परदे ने इतने बरस में करीब पंद्रह करोड़ लोगों को हिंदी का जानकार बना दिया है। जब अहिंदी भाषी राज्यों के लोगों को राष्ट्रीय महत्त्व की कोई भी सूचना लेनी होती है और उन्हें अपनी भाषा के चैनल पर नहीं मिलती तो वे तुरंत हिंदी के चैनलों की शरण लेते हैं। बरसों से यह क्रम  चल रहा है। इस वजह से वो हिंदी समझने और बोलने भी लगे हैं।

टेलिविजन से आगे जाएं तो इन दिनों नई नस्ल की जीवन शैली सोशल मीडिया के इर्द गिर्द सिमट कर रह गई है। इंटरनेट, वेबसाइट ट्विटर, वॉट्सऐप, ब्लॉग, यू-ट्यूब और अन्य नए माध्यम अवतारों ने ज़िंदगी का रंग बदल कर रख दिया है। कारोबारी हितों ने हिंदी के बाजार देखा है, इसलिए सोशल मीडिया के सभी रूप हिंदी में उपलब्ध हैं। गांव, कस्बे और शहरों की नौजवान पीढ़ी इन सारे रूपों से एक दिन में अनेक घंटे रूबरू होती है। क्या आपको यकीन है कि हमारे लड़के-लडकियां अंग्रेजी में इतना महारथ हासिल कर चुके हैं कि उन्हें हिंदी की जरुरत ही नहीं है? कम से कम मैं तो नहीं सोचता। हिंदी में मोबाइल पर संदेश जाते हैं, मेल जाते हैं, गूगल बाबा हर भाषा से हिंदी में अनुवाद की सुविधा मुहैया कराते हैं तो जो लोग इस सुविधा का लाभ उठाते हैं वो कोई दक्षिण अफ़्रीका या ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं हैं। यह सब हिंदी की श्रीवृद्धि नहीं तो और क्या है।

फिर आज के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियों की बात क्यों की जाती है? क्यों भाषाविद् और पंडित छाती कूटते नजर आते हैं। अगर देश -विदेश में हिंदी जानने वाले लोग बढ़ रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, पैसा भी कमाया जा रहा है तो फिर चिंता करने वाले कौन हैं? इसका उत्तर वास्तव में हमारे घरों में मौजूद है। चिंता का कारण हिंदी का सिकुड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वाद में हो रही मिलावट है। हम लोग रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनकर झूमने लगते हैं लेकिन जब बेटा या बेटी आकर उसे बंद कर अंग्रेजी के गाने सुनने लगता है तो हमें लगता है ये लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते या इन्हें हिंदी क्यों अच्छी नहीं लगती। जब आप बाजार जाते हैं, पुस्तक मेलों में जाते हैं तो आप प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा और धर्मवीर भारती की किताबें देखने रुक जाते हैं और आपके बच्चे अंग्रेजी की किताबें खरीद कर उसका बिल ले रहे होते हैं। आप हैरानी से और कुछ बेगानेपन से बच्चों को घूरते हैं। आप टेलिविजन पर कोई हिंदी का सीरियल या गाना देखना चाहते हैं तो आपका बच्चा रिमोट आपके हाथ से लेकर चैनल बदल देता है। आप देखते रह जाते हैं। आप बच्चों के साथ हिंदी फिल्म देखना चाहते हैं और बच्चे आपके सामने अंग्रेजी फिल्म का प्रस्ताव रख देते हैं। आप जैसे-तैसे सिनेमा जाते भी हैं तो फिल्म की भाषा आपके ऊपर से निकल जाती है। बच्चे फिल्म के डायलॉग पर झूमते हैं, गानों पर खुद भी गाते हैं और आप बच्चों को विदेशियों की तरह देखते हैं।

जरा याद कीजिए। उन बच्चों की स्कूलिंग के दौरान आपने कभी उनके हिंदी में कम अंक आने पर चिंता की? मैथ्स, फिजिक्स, कैमिस्ट्री या अंग्रेजी में अनुतीर्ण होने पर निश्चित ही आपने टोका होगा, लेकिन हिंदी कमजोर होने पर शायद ही ध्यान दिया हो। जिन लोगों ने ध्यान दिया भी होगा तो उनका प्रतिशत बहुत कम है। बचपन में उस बच्चे के गलत अंग्रेजी बोलने पर भी आप पड़ोसियों के सामने गर्व से मुस्कराया करते थे। आप उसमें आधुनिक भारत के भविष्य की तस्वीर देखते थे।

दरअसल, ये उदाहरण आपको अटपटे लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी मानसिकता में ये नमूने घुल-मिल गए हैं।दिन में दस बार हम राष्ट्रभाषा का तिरस्कार होते अपनों के बीच देखते हैं और चूं तक नहीं करते। इस दुर्दशा पर अब तो आह या ठंडी सांस भी नहीं निकलती। हमारे स्कूलों में शुद्ध हिंदी के जानकार शिक्षक नहीं मिलते। उनकी व्याकरण कमजोर है। कॉलेजों में हिंदी के प्राध्यापक स्तरीय नहीं हैं। आधे से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। शिक्षक ठेके पर रखे जाते हैं। उन्हें एक एक पीरियड के हिसाब से पैसे मिलते हैं। ऐसे में ज्ञानवान लोग आपको कहां से मिलेंगे? क्या आप अपने बच्चे को हिंदी शिक्षक बनाना चाहेंगे? मैं जानता हूं। आपका उत्तर न में होगा।

अशुद्ध और मिलावटी भाषा का खतरा गंभीर है। मोबाइल और इंटरनेट पर विकृत हिंदी हमें नजर आती है। हम देखते रहते हैं। न केवल देखते रहते हैं बल्कि चंद रोज बाद उसी विकृत भाषा का हम भी इस्तेमाल करने लगते हैं। शास्त्रीय जानकारों की फ़सल हम नहीं उगा रहे हैं। हिंदी की अमरबेल तो फैलती रहेगी। उसे किसी सरकार या समाज के संरक्षण की जरुरत नहीं है। उसे आपकी मेहरबानी भी नहीं चाहिए। इतने माध्यमों का आविष्कार होने के बाद उसका विस्तार कोई नहीं रोक सकता। साल दर साल हिंदी के जानने समझने वाले बढ़ते ही जाएंगे। उसके लिए किसी तरह के विलाप की आवश्यकता नहीं है। बचाना है तो उसकी शुद्धता को बचाइये। उसकी आत्मा और उसकी मिठास को बचाइए। आने वाली पीढ़ियों को बताइए कि असल हिंदी कौन सी है? सरकारी मदद पर होने वाले कागजी सम्मेलनों में छाती पीटने से कुछ नहीं होगा। अपना घर ठीक कीजिए-हिंदी आपको दुआएं देगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैंं)

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‘यह केवल मेरा नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेक लोगों का दर्द है’

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
Hindi Diwas

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी। फिर भी, पूरा विश्वास है कि किसी भी माध्यम से उन्हें इस तथ्य की जानकारी मिलने पर वह चिंता के साथ बदलाव के लिए कोई उपयुक्त निर्देश दे सकते हैं। उन्होंने अपने सत्ता काल में कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं, फिर यह तो छोटा सा सुधार है। लेकिन भारत माता की राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा और उसकी मान्यता से जुड़ा कार्य है। यही नहीं, इससे उनकी और सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों और बातों को करोड़ों हिंदीभाषियों को सही रूप में पहुंचाने में सहायता मिलेगी। यदि सरकार में बैठे कोई मंत्री, पार्टी के नेता और खासकर अफसर नाराज हों, तो मुझे कोपभाजन बनने की चिंता नहीं है।

अवसर भी है-सरकार के वर्षों से चलाए जा रहे हिंदी दिवस (14 सितंबर)-हिंदी सप्ताह-हिंदी पखवाड़े का। कोविड काल में अधिक सार्वजनिक कार्यक्रम भी नहीं होंगे। विज्ञापन, बोर्ड, बैनर, यात्रा और खान-पान आदि के सरकारी खर्च भी शायद कम होंगे, लेकिन डिजिटल युग में एक बार फिर हिंदी के गौरव, संस्कृति, विश्वव्यापी प्रसार पर बोला, लिखा, पढ़ा जाएगा, इसलिए पहले थोड़ी कड़वी बात। ऐसा नहीं है कि इस 'महामारी काल के एकांतवास' दौर के कारण मैं सरकारी तंत्र पर अपनी भड़ास निकाल रहा हूं। सरकार और पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि संवाददाता और संपादक रहते पिछले करीब तीस-पैंतीस वर्षों से समय-समय पर खुद या अपने सहयोगी के माध्यम से यह मुद्दा उठाता रहा हूं। आप इस लंबी भूमिका के लिए क्षमा करें, क्योंकि यह केवल मेरा निजी नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेकानेक लोगों का दर्द है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के सबसे बड़े सूचना तंत्र-आकाशवाणी से करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले अधिकतम (बचाव के के लिए 99 प्रतिशत समझ लें) समाचार पहले अंग्रेजी में तैयार होते हैं और फिर हिंदी में अनुवाद के बाद प्रसारित होते हैं। प्रधानमंत्री के भाषण ही नहीं, ‘मन की बात’ की खबर पहले अंग्रेजी में बनती है और फिर उसका अनुवाद हिंदी समाचार उद्घोषक को थमाया जाता है। यह तो दुनिया जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवश्यक होने पर ही अंग्रेजी में बोलते हैं। ‘मन की बात’ के अलावा भी भारत के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में भाषण देते हैं, बातचीत करते हैं। हिंदीतर राज्यों में भारतीय भाषा के कुछ वाक्यों के बाद किसी सहयोगी से स्थानीय भाषा में अनुवाद की व्यवस्था करवा देते हैं। फिर भी ऐसा सरकारी शिकंजा क्यों है कि उनकी बात खबर के रूप में अंग्रेजी से अनुवाद के बात जनता जनार्दन तक पहुंचाई जाए?

यह भी माना जा सकता है कि आकाशवाणी वाले अच्छे योग्य अनुवादक से भी यह काम करवाते हों। मुझे पूर्णकलिक अथवा दैनिक भुगतान पर काम करने वालों को कोई नुकसान पहुंचाने की भी इच्छा नहीं है। फिर मित्र सूचना प्रसारण मंत्री यह भी कह सकते हैं कि आकाशवाणी-दूरदर्शन स्वायत्त प्रसार भारती के अंतर्गत हैं। मेरा निवेदन है कि संसद में उत्तर तो आप या प्रधानमंत्री को ही देना होता है। प्रसार भारती का खर्च सरकार और संसद से स्वीकृत होता है। फिर हिंदी में कही गई बात को मूल रूप में पहुंचाने पर कोई हस्तक्षेप कैसे कहेगा? समस्या यह है कि आकाशवाणी में भी शीर्ष पद पर कई आईएएस अधिकारी आते रहे हैं और उन्हें अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी जरूरी लगती है।

आकाशवाणी में अथवा ऐसे किसी भी संस्थान में सूचना-समाचारों के आदान-प्रदान के लिए व्यवस्था रहती है। आकाशवाणी के समाचार विभाग में इसे ‘समाचार पूल’ कहा जाता है। दशकों से इसमें अंग्रेजी का वर्चस्व रहा, क्योंकि हिंदी के साथ अन्य भाषाओँ में भी अनुवाद होते हैं। हम जैसे पत्रकारों के लिखने या आकाशवाणी में भी रहे कई श्रेष्ठ हिंदीभाषी लोगों के आग्रह पर 1993 के आस-पास अलग से ‘हिंदी समाचार पूल’ भी बना, ताकि अंग्रेजी से अधिक मूल भाषा में काम हो। रिकॉर्ड में कहने को यह आज भी है, लेकिन व्यवहार में दूसरे दर्जे वाली स्थिति है।

2014 से पहले मनमोहन राज में तो बेचारी हिंदी की कोई परवाह नहीं हो पाई। उन्हें कभी-कभार मजबूरी में हिंदी का भाषण उर्दू या गुरुमुखी लिपि में लिखवाकर पढ़ना पड़ता था। उनके सत्ता काल में मैंने एक वरिष्ठ संवाददाता से आकाशवाणी की इसी व्यवस्था पर पूरी छानबीन के बाद रिपोर्ट बनवाकर छापी। किसी हिंदी प्रेमी की लिखापढ़ी पर मंत्रालय से आकाशवाणी तक फाइल चली और महीनों बाद इस उत्तर के साथ बंद कर दी गई कि खबर अपुष्ट होगी। ऐसा कुछ नहीं है। अब इस पर कोई सीबीआई जांच की मांग करने से रहा। अब भाजपा की सरकार का दूसरा कार्यकाल आ गया और नई शिक्षा नीति में हिंदी और भारतीय भाषाओँ के महत्व को प्राथमिकता मिलने से हमें खुशी हुई है। इसलिए मुझे प्रसारण क्षेत्र की ताजी स्थिति पता करने की इच्छा हुई तो पता चला 73 साल में यह डिब्बा वहीँ अटका है। यह भी याद दिलाना ठीक होगा कि भारत के इसी प्रसारण तंत्र से अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी सहित दिग्गज साहित्यकार, कवि जुड़े रहे हैं। उनका हिंदी-अंग्रेजी दोनों पर अधिकार था और उनके मूल रूप में लिखे पर कोई अधिकारी उंगली नहीं उठा सकता था।

बहरहाल, अब पराकाष्ठा यह है कि महत्वपूर्ण अवसरों पर देश-विदेश में दिए गए भाषण के समाचार के लिए अंग्रेजी पर निर्भरता है। अकेले आकाशवाणी की ही नहीं, कई मंत्रालयों, सार्वजनिक संस्थानों में यही व्यवस्था है। आप कह सकते हैं कि निजी समाचार संस्थानों में भी ऐसा रहा या आज भी होगा। लेकिन, राष्ट्र भाषा के लिए सरकारी तंत्र में सुधार की बात क्यों नहीं सोची जाती। अनुवाद का आलम यह है कि सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत बजट की हिंदी प्रति उपलब्ध करना अनिवार्य है। गोपनीयता के कारण हिंदी की प्रति बजट भाषण के बाद दी जाती है। यदि किसी महानतम हिंदी संपादक, पत्रकार, लेखक को केवल हिंदी की प्रति देकर खबर और टिप्पणी लिखने को दे दी जाए, तो वह पसीने-पसीने हो जाएगा, क्योंकि अनुवाद की जटिलता में वह समझ ही नहीं सकेगा। अब भी सरकारी तंत्र में आर्थिक विषयों के हिंदी समाचार में हर पंक्ति के लिए हिंदी के ही शब्द कोष से अर्थ समझाना होगा। इसीलिए आकाशवाणी हो या अखबार-पत्रिका या टीवी चैनल, साथ में अंग्रेजी की प्रति रखकर सरल भाषा में जनता तक पहुंचाने का प्रयास होता है |

भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में भी लगभग यही स्थिति वर्षों से है। एक समय था, जब संवाददताता किसी सूचना अधिकारी या प्रमुख अधिकारी से संपर्क कर भाषण की प्रति मांग लेते थे। डिजिटल युग में तो सूचना केंद्र के सबसे निचले स्तर के बाबू साहब या साहिबा किसी संवाददाता या संपादक के फोन पर भी सीधा जवाब देते हैं-आपको वेबसाइट देखना नहीं आता हो तो कहीं से सीखिए। वहां जो सामग्री हो, उसको ले लीजिये। इतना बड़ा तमाचा उस दफ्तर में हमें आपातकाल में भी नहीं लगा, इसलिए वहां शिकायत कौन सुनेगा?  कोरोना काल नहीं, यह पिछले वर्षों के अनुभव हैं। मोदी राज में संयुक्त राष्ट्र संगठन में कम से कम संक्षिप्त सूचनाएं हिंदी अनुदित मिलने का इंतजाम हो गया।  भारत में यूरोप, अमेरिका, जापान जैसे देश या उनकी कंपनियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद हिंदी में सामग्री देने के प्रयास करने लगी हैं, लेकिन भारत सरकार के अफसर और बाबू आज भी अंग्रेजी के चरणों में नतमस्तक है। आशा तो बनी रहनी चाहिए कि देर-सवेर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उनकी सरकार द्वारा मूलतः हिंदी में कही गई बातें अंग्रेजी की झूठन बनाकर नहीं प्रसारित-प्रचारित की जाएगी। हिंदी सप्ताह-पखवाड़ा बंद कर,  वर्ष का हर दिन हिंदी और भारतीय भाषा का समझने की शुभकामनाएं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

तो वह घड़ी आ ही गई। अब हाई कोर्ट भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को केंद्र सरकार के नियंत्रण में लाने के पक्षधर दिखने लगे हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 11 September, 2020
Last Modified:
Friday, 11 September, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो वह घड़ी आ ही गई। अब हाई कोर्ट भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को केंद्र सरकार के नियंत्रण में लाने के पक्षधर दिखने लगे हैं। मुंबई उच्च न्यायालय ने अभिनेता सुशांत सिंह की मौत के मामले की टीवी रिपोर्टिंग पर रोक लगाने संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान इस तरह की राय प्रकट की। माननीय न्यायमूर्ति ने गुरुवार को कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि टीवी मीडिया केंद्र सरकार के नियंत्रण में क्यों नहीं है? अब शिखर सत्ता को दो सप्ताह में अपना उत्तर दाखिल करना है। गुरुवार को ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सुनंदा प्रकरण में मीडिया को समानांतर सुनवाई करने के लिए सावधान किया और परदे पर अभिव्यक्ति में संयम बरतने की सलाह दी। मुल्क की दो बड़ी अदालतों का एक ही दिन पत्रकारों को नसीहत देना संकेत है कि अभिव्यक्ति के इस घर में सब कुछ ठीक नहीं है। आप मान सकते हैं कि संदेश में गंभीर चेतावनी छिपी है।

इस कॉलम के जरिये मैं बीते दो साल से परदे पर गैरजिम्मेदारी भरी पत्रकारिता और मीडिया ट्रायल के बारे में आगाह करता रहा हूं। मैंने साफ-साफ कहा है कि वह दिन दूर नहीं, जब पत्रकार दल सड़कों पर रिपोर्टिंग के लिए निकल नहीं पाएंगे। अब यह दोहराने की जरूरत नहीं कि तमाम भारतीय खबरिया चैनल छोटे परदे पर नौटंकी करने लगे हैं। वे बड़बोलेपन और फूहड़ रिपोर्टिंग का पर्याय बन चुके हैं। अगर यही रवैया जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब पत्रकारिता चौथे स्तंभ के रूप में नहीं जानी जाए। उसका स्तंभ का दर्जा ही विलुप्त हो सकता है अथवा वह स्तंभ नहीं, बेहद कुपोषित दुबला पतला बांस नजर आए।

यह भी आशंका है कि लोकतंत्र कहीं तीन या साढ़े तीन स्तंभों पर टिका न दिखाई देने लगे। खेद की बात तो यह है कि वरिष्ठ और दिग्गज संपादक-पत्रकार इस दुर्दशा पर अपने होंठ सिले बैठे हैं। याद रखिए, जो पीढ़ी अपने उत्तराधिकारियों को तैयार नहीं करती और हालात से जूझने के लिए सैद्धांतिक प्लेटफॉर्म नहीं देती, उसे खुद भी इतिहास के कूड़ेदान में ही जगह मिलती है। भारतीय पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा।

अगर पत्रकारों के उत्पीड़न का हालिया ग्राफ देखें तो पता चलता है कि आजादी के बाद साठ बरस तक एक साल में पत्रकारों को सताने की चार-छह वारदातें हुआ करती थीं। मगर अब कोई सप्ताह ऐसा नहीं जाता, जिसमें पत्रकारों के जेल जाने, हत्या, पीत पत्रकारिता, उत्पीड़न और निष्पक्ष पत्रकारिता पर आक्रमण के चार-छह प्रकरण दर्ज नहीं होते हों। पत्रकारों के लिए क्या यह बेहद क्रूर और भयावह दौर नहीं है? यह सच है कि सियासत कभी अपनी आलोचना या निंदा पसंद नहीं करती। उसे अपनी प्रशंसा ही अच्छी लगती है। इसलिए वह जब तब पत्रकारिता को प्रलोभन,दबाव या परेशान करके अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। लेकिन अगर हमारे नाचने में ही दोष हो तो घर का आँगन टेढ़ा बताने का कोई फायदा नहीं मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

मीडिया के हमाम में ये मेहमान अपने को निर्वस्त्र होते क्यों देखना चाहते हैं मिस्टर मीडिया!

इस सच को चैनलों के संपादक-प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे मिस्टर मीडिया!

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