इस सच को चैनलों के संपादक-प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे मिस्टर मीडिया!

अभी तक खबरिया चैनल अपने दर्शकों से दुश्मनी निकाल रहे थे। अब उन्हें एक नया विरोधी मिल गया है।

राजेश बादल by
Published - Saturday, 18 July, 2020
Last Modified:
Saturday, 18 July, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

अभी तक खबरिया चैनल अपने दर्शकों से दुश्मनी निकाल रहे थे। अब उन्हें एक नया विरोधी मिल गया है। वे बार्क से रार ठान बैठे हैं। कुछ समय पूर्व लॉन्च हुए एक चैनल की टीआरपी में जबर्दस्त उछाल के कारण नेशनल ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन और नेशनल ब्रॉडकास्टिंग फेडरेशन ने यह मामला उठाया है। उन्हें लगता है कि बार्क ने कुछ गोलमाल किया है, अन्यथा एक नया नवेला चैनल इतने कम समय में साप्ताहिक प्रावीण्य सूची में दूसरे स्थान पर कैसे आ सकता है? लंबे समय तक नंबर वन की कुर्सी पर रहा चैनल तो कैलाश पर्वत की शिखर ऊंचाई पर जैसे खूंटा गाड़े बैठा है। उससे तो शिक़ायत क्या होगी, मगर दूसरे स्थान के लिए हर हफ्ते मारामारी देखने लायक है।

विडंबना है कि टीवी न्यूज चैनल इंडस्ट्री यह धारणा पाल कर बैठी है कि जब वह डीटीएच ऑपरेटर्स को उचित स्थान के लिए उनकी दरों के मुताबिक़ चढ़ावा देती है और बचे-खुचे केबल ऑपरेटर्स भी उनके चैनलों को पसंदीदा जगह मुहैया कराते हैं तो उसमें कोई नया खिलाड़ी कैसे दाख़िल हो सकता है। ये चैनल कांग्रेस पार्टी की तरह अपना घर ठीक ही नहीं करना चाहते। उनका कंटेंट कितना कमज़ोर है, भाषा अशुद्ध है, एंकर परदे को युद्ध भूमि समझते हैं, अभद्रता और अश्लीलता सारी सीमाएँ लांघ रही है तो दर्शक से बड़ा न्यायाधीश कौन हो सकता है? अंततः कंटेंट इज द किंग। इस सच को अगर चैनलों के संपादक और प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे।

कम खर्च में चैनल चलाना इन दिनों अक्लमंदी मानी जाती है। कंटेंट और टैलेंट पर बिना पैसा खर्च किए चैनल वीकली वरीयता सूची में अव्वल आना चाहते हैं तो माफ कीजिए, उनका यह सपना कभी पूरा नहीं होगा। एक जमाने में समाचार आधारित आधा घंटे की विशेष रिपोर्ट बनाने के लिए पांच-दस लाख रुपये तो मैंने खुद खर्च किए हैं। आज तो ये खबरिया चैनल स्ट्रिंगर की एफटीपी पर करीब करीब मुफ्त की फीड पर आधा घंटे का शो बना देते हैं। यकीन मानिए जितना शोषण इस इंडस्ट्री में स्ट्रिंगर्स का हो रहा है, उतना देश में किसी अन्य उद्योग में नहीं होता। इसलिए स्ट्रिंगर्स अपना पेट पालने के लिए कुछ और जुगाड़ करना चाहते हैं।

इसलिए कंटेंट और योग्य पेशेवरों पर पैसा बहाइए। आपको टीआरपी मिलेगी। हर नया चैनल शिखर पर पहुंचने के लिए अपनी संपादकीय सामग्री को गुणवत्ता के मान से बेहतर बनाना चाहता है। जो भी ऐसा करेगा, वह शिखर पर जाएगा। दो-तीन महीने तक वेतन नहीं देकर या टुकड़ों-टुकड़ों में वेतन देकर अथवा वेतन में कटौती करके आप प्रतिभा नहीं ख़रीद सकते। पत्रकारों की देह दफ्तर में काम कर सकती है, दिल और दिमाग़ नहीं। वह तो परिवार का पेट पालने के लिए फिक्रमंद होता है। इसलिए बार्क लंबे समय से देश के नंबर वन कहे जाने वाले चैनल का ठीक ही उदाहरण देता है कि चैनल शुरू होते ही उसने गुजरात का भूकंप और प्रयाग में कुंभ का बेमिसाल कवरेज किया था और उन दिनों करोड़ों रुपये खर्च किए थे।

मैं याद कर सकता हूं कि पंद्रह बरस पूर्व हिन्दुस्तान का पहला टीवी ट्रेवलॉग मैंने अरुणाचल प्रदेश से रामेश्वरम तक किया था। उस समय चैनल ने कोई पौन करोड़ रुपये उस पर व्यय किए थे। यूं ही कोई सत्यनारायण की कथा कराकर चैनल नंबर वन नहीं बनता। लव्वोलुआब यह है कि जितना चीनी डालेंगे, शरबत उतना ही मीठा होगा। टीआरपी में शिखर पर आना है तो शिखर का स्तर भी बनाइए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

राज्य सभा का मानसून सत्र करीब एक सप्ताह पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन बीते दिनों राज्य सभा में जो भी हुआ, वह बेहद शर्मनाक है।

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

राज्य सभा का मानसून सत्र करीब एक सप्ताह पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया, लेकिन बीते दिनों राज्य सभा में जो भी हुआ, वह बेहद शर्मनाक है। सदन की कार्रवाई के दरम्यान पक्ष, प्रतिपक्ष और संचालन करने वाले डिप्टी चेयरमैन, सभी ने संवैधानिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं के प्रति गरिमा और आदर नहीं दिखाया तो मीडिया भी पीछे नहीं रहा। उप सभापति का रवैया तो घोर आपत्तिजनक था ही, लेकिन प्रतिपक्ष ने भी कोई जिम्मेदाराना बरताव नहीं किया। संसद संचालन की नियम पुस्तिका फाड़ने और माइक तोड़ने के प्रयास तथा आसंदी पर सवार होने की कोशिश किसी भी सभ्य लोकतंत्र का सुबूत नहीं है।

ताज्जुब की बात है कि डिप्टी चेयरमैन खुद ही ऐसा व्यवहार कर रहे थे, जो किसी संसदीय पीठ पर विराजे विद्वान के लिए शोभा नहीं देता। खास तौर पर उस स्थिति में, जबकि आसंदी पर बैठे सज्जन की ख्याति एक बौद्धिक संपादक और विचारक की रही हो। मत विभाजन के लिए दिया गया उनका मासूम तर्क गले नहीं उतरता। सदन संचालन की जिम्मेदारी हर हाल में आसंदी की होती है। सरकार उनकी ओर से काम नहीं कर सकती। लेकिन इस मामले में तो सरकार ने ही जैसे उप सभापति का दायित्व संभाल लिया था।

डिप्टी चेयरमैन हरिवंश सिंह अच्छे पत्रकार और संसदीय प्रक्रिया के जानकार माने जाते रहे हैं। एक जमाने में देश की प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका रविवार में वे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के सहयोगी हुआ करते थे। मैं उन दिनों रविवार के लिए खास रिपोर्टिंग करता था। इस तरह हम लोग एसपी की टीम का हिस्सा थे। तब श्री हरिवंश की छवि चमकीले पत्रकार की थी। उसके बाद वे एक दैनिक से जुड़े और फिर राज्य सभा में प्रतिष्ठित हुए। सदन में रविवार के घटनाक्रम के बाद पत्रकारिता जगत में श्री हरिवंश से जुड़ी अनेक कथाएं भी उजाग़र हो रही हैं। यकीनन इनसे उप सभापति के बारे में कोई उज्जवल छवि नहीं बनती।

लेकिन मेरी चिंता पक्ष, विपक्ष और आसंदी के गैर जिम्मेदार व्यवहार के बारे में नहीं है। गंभीर मसला यह है कि संसद की कार्रवाई का कवरेज भी प्रकाशन और प्रसारण माध्यमों में गरिमापूर्ण नहीं था। लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंदिर के बारे में रिपोर्टिंग के अपने कुछ उसूल हैं, कुछ परंपराएं हैं और नियमावली है। मगर पत्रकारिता ने उस दिन की रिपोर्टिंग में इन उसूलों, परंपराओं और नियमावली को ताक में रख दिया। कुछ माध्यम उप सभापति के पीछे पड़े थे तो कुछ विपक्ष के। अभी तक अदालती मामलों के मीडिया ट्रायल की निंदा होती रही है, लेकिन अब तो पत्रकारों ने संसद-ट्रायल भी शुरू कर दिया है। यह बेहद अफ़सोसनाक है। संसदीय प्रक्रिया की रिपोर्टिंग पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक चश्में से कतई नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया के तमाम नए-नए अवतार दक्ष पत्रकार और संपादक संचालित नहीं करते। जो पेशेवर पत्रकार इनसे जुड़े हैं, उनकी तादाद अत्यंत कम है। अधिकतर तो आम नागरिकों के हाथ में ही हैं। दुर्भाग्य से उन्हें न तो संसद के नियमों की जानकारी है और न उसकी कार्रवाई के अंशों को अपने प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल करने की बंदिशें पता हैं। वे अपनी अपनी विचारधारा के हिसाब से सदन के भीतर के व्यवहार पर ऊल-जलूल टिप्पणियां करते हैं। अनेक मामलों में यह विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में भी आता है। चाहे वह वॉट्सऐप हो, ट्विटर हो, इंस्टाग्राम हो, फ़ेसबुक हो या फिर सामूहिक ईमेल या फोन संदेश हों-उन पर भी दोनों सदनों के अंदर की गतिविधि को तोड़-मरोड़कर या ट्विस्ट करके नहीं भेजा जा सकता। क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है मिस्टर मीडिया?

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

मीडिया के हमाम में ये मेहमान अपने को निर्वस्त्र होते क्यों देखना चाहते हैं मिस्टर मीडिया!

 

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40 साल पहले बिल्कुल नहीं सोचा था कि ऐसा होगा: शशि शेखर

चालीस साल पहले आज ही के दिन झिझकता हुआ वाराणसी में ‘आज’ के दफ्तर में घुसा था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Shashi Shekhar

हिंदी पत्रकारिता जगत में एक ऐसा नाम, जो अपने काम और प्रोफेशनल नजरिए के लिए जाना जाता है। जी हां, यहां बात हो रही है हिंदी दैनिक अखबार ‘हिन्दुस्तान’ के प्रधान संपादक शशि शेखर की। पत्रकारिता में उन्हें अब 40 साल का लंबा अनुभव हो गया है।

आज कल जिस उम्र में लोग करियर की शुरुआत करते हैं, उस उम्र में उन्होंने वह गौरव हासिल किया, जहां तक पहुंचने की चाहत लेकर पत्रकारिता से जुड़े अधिकांश युवा इस इंडस्ट्री में आते हैं। यानी महज 24 वर्ष की आयु में वे 'आज' अखबार का संपादक बने और फिर संपादक के तौर पर पहले 'आज', फिर 'आजतक' न्यूज चैनल, हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' और फिर 'हिन्दुस्तान' के समूह संपादक बन गए। इन दिनों वे 'हिन्दुस्तान' के प्रधान संपादक के तौर पर कार्यरत हैं। 

इस मौके पर उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के जरिये मीडिया में अपने चालीस के अनुभव को साझा किया है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

30 जून 1960 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी के गांव चंदीकारा में जन्मे शशि शेखर ने आगरा के बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से हिंदी, संस्कृत, इंग्लिश और इतिहास में ग्रेजुएशन करने के बाद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में स्नातकोत्तर किया। शशि शेखर ने पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी हासिल किया है। 1980 में उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा।

शशि शेखर को 40 साल की पत्रकारिता का अनुभव है। वे प्रिंट, टीवी और ऑनलाइन तीनों विधाओं में माहिर हैं। उनके करिअर की शुरुआत 1980 में वाराणसी के प्रसिद्ध दैनिक ‘आज’ से हुई। वर्ष 1984 में वे ‘आज’ अखबार के रेजिडेंट एडिटर बनाये गये। उन्होंने यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश में ‘आज’ अखबार का विस्तार किया। महज 24 साल की उम्र में वे आज अखबार के संपादक बन गए। वे ‘आज’ के इलाहाबाद और आगरा संस्करण के संपादक रहे। इसके बाद जनवरी 2001 से जुलाई 2002 तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कदम रखा और 'आजतक' न्यूज चैनल के साथ काम किया। वहां डेढ़ साल रहने के बाद वे वापस प्रिंट मीडिया में आ गए और इस बार उन्होंने अमर उजाला मेरठ में कार्यकारी संपादक का कार्यभार संभाला। पत्रकारिता तथा समाचारपत्र प्रबंधन में उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर अमर उजाला मैनेजमेंट ने उनको ग्रुप एडिटर और प्रेजिडेंट (न्यूज) नियुक्त किया। वे जुलाई 2002 से सितंबर 2009 तक 'अमर उजाला' अखबार में इस पद पर बने रहे। फिर सितंबर 2009 में वे ‘हिन्दुस्तान’ के साथ ‘नंदन’, ‘कांदबिनी’ और ‘लाइव हिंदुस्तान डॉट काम’ के मुख्य संपादक की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसके बाद उन्हें ‘हिन्दुस्तान’ का प्रधान संपादक बनाया गया।

शशि शेखर के बारे में कहा जाता है कि वे काम करते हुए कभी थकते नहीं हैं। अपनी इस असीम ऊर्जा से वे अपने अधीन कार्यरत सहकर्मियों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

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पुण्यतिथि विशेष: आज भी अमर उजाला परिवार के लिए प्रेरणा बनी हैं अनिल जी की ये खूबियां

भोर की पहली किरण फूटी भी न थी कि महायात्रा के लिए ‘अमर उजाला’ के यशस्वी प्रधान संपादक अनिल अग्रवाल आगरा में न्यू राजा मंडी स्थित अपने आवास से निकल पड़े।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 September, 2020
Last Modified:
Wednesday, 23 September, 2020
Tribute

सुभाष ढल, सामाजिक कार्यकर्ता, आगरा।।

भोर की पहली किरण फूटी भी न थी कि महायात्रा के लिए ‘अमर उजाला’ के यशस्वी प्रधान संपादक अनिल अग्रवाल आगरा में न्यू राजा मंडी स्थित अपने आवास से निकल पड़े। परिवार से विदाई के वक्त अनिल जी जीवित लौटकर नहीं आएंगे, यह कल्पना से भी परे था। मैं बात कर रहा हूं 23 सितंबर 1989 की, जब वह बरेली में ‘अमर उजाला’ संस्थान के कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे थे। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शिरकत करने वाले थे। अनिल जी अभी बरेली पहुंचे ही नहीं थे कि सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। ऐसा लगा कि सवेरे-सवेरे अंधेरा हो गया।

अनिल जी से जुड़े कई ऐसे संस्मरण हैं, जो मुझे हमेशा याद रहेंगे। स्व.डोरीलाल अग्रवाल के यशस्वी पुत्र के साथ-साथ उनमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता थी। सक्रियता उनका कर्म क्षेत्र था। डोरीलाल जी का निधन हो चुका था। अभी यह तय नहीं हुआ था कि सुबह अखबार निकलेगा कि नहीं निकलेगा। अखबार निकलने की संभावना पर विचार चल रहा था। शोक व्यक्त करने आने वाले लोगों के साथ वह बातचीत कर रहे थे और जब भी समय निकलता था तो शव के सम्मुख बहुत तेजी से संपादकीय लिख रहे थे,' कारवां चलता रहेगा।'

मेरा परिचय उनसे धूलिया गंज प्रेस से हो चुका था। समय की धारा बढ़ी, हमें लेटर टू एडिटर लिखने का शौक लगा। कुछ पत्र छपे भी। एक बार अग्रसेन इंटर कॉलेज के सामने वे गाड़ी से निकले तो मेरी उनसे नमस्कार हुई। बोले-सुभाष कैसे हो? मैंने कहा- ठीक हूं भाई साहब। बोले-ठीक-ठाक लिख लेते हो तुम। फिर निरंतर उनसे संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। ‘अमर उजाला’ गुरु का ताल रोड के पास पहुंच गया था। वह अक्सर मुझे बहुत स्नेह करते थे और कई बार बोलते थे कि सुभाष मैं तुम्हें छोटा भाई मानता हूं। कभी हंसते थे तो कभी-कभी कड़ी फटकार भी लगाते थे। हम वाकई उद्दंडी थे। एक बार हमने उन्हें चार पन्नों का हिदायत भरा पत्र लिखा। अनिल जी का गुस्सा देखने लायक था। पत्र लिखा मैंने था, उस पर दस्तखत राम टंडन, गोपाल गुरु और के.एस तिवारी के भी थे।

मुझे ‘अमर उजाला’ बुलाया गया। मैंने गोपाल गुरु से कहा-‘गुरु मामला बढ़ गया है। चलो चारों चलते हैं, जो होगा सो देखा जाएगा।' गुरु हम सबमें तेज थे। सभी एक साथ चलने को तैयार हो गए। गुरु ने कहा कि एक समाचार बना लो। क्योंकि जाते ही अनिल जी यह पूछेंगे कैसे आना हुआ? कम से कम समाचार तो दे देंगे। हुआ भी यही, समाचार देकर अनिल जी ने सब को जाने के लिए बोल दिया। जैसे ही मैं चलने को हुआ, उन्होंने मुझसे  कहा-सुभाष तुम बैठो। मेरे बैठते ही दराज से उन्होंने पत्र निकाला और बोले इसको पढ़ो और इसका अर्थ समझाओ। मेरी स्थिति उस समय क्या हुई, बता नहीं सकता। सिर्फ इतना कहा कि मैं ही नहीं, बाकी इन तीनों को भी बुलाओ अंदर। अनिल जी बोले कि मैं तुम्हें छोटा भाई मानता हूं और बहुत प्यार करता हूं। तुमने जिस तरह के आरोप लगाए हैं, उन आरोपों में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। पर मेरी बात सच्ची थी। एक पत्रकार को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जिसका मुझे आज तक कष्ट है।

उनमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता थी। अभी उम्र केवल 36 बरस की ही थी। बहुत कुछ सीखने को मिला, क्योंकि उन दिनों मैं निहाल सिंह जी सांसद के साथ था, तो अनिल जी से अक्सर मुलाकातें होती रहती थीं। शाम को 3:00 बजे से लेकर 4:00 बजे तक वे लगभग फ्री रहते थे और यही टाइम हमारा अक्सर उनसे मिलने जाने का हुआ करता था। अक्सर वहां भगवान शंकर रावत जी भी मिलते थे।

1984 के लोकसभा चुनाव में यह चर्चा थी कि कांग्रेस से अनिल अग्रवाल जी चुनाव लड़ने जा रहे हैं। उन्होंने मुझे कहा कि निहाल भाई को बताना, मैं बिल्कुल इंटरेस्टेड नहीं था और कुछ लोगों के नाम लिए, जिन्होंने इस चर्चा को अफवाह का रूप दिया। ‘अमर उजाला’ के विस्तार की आधारशिला का यदि किसी व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह अनिल कुमार अग्रवाल ही थे। उनकी पुण्यतिथि पर मेरा कोटि कोटि नमन।

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ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिंदी पर ब्रेक: मनोज कुमार

चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं। शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
HindiDiwas

मनोज कुमार, वरिष्ठ ।।

ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिंदी के चलन पर ब्रेक लग गया है। आप हिंदी के हिमायती हो और हिंदी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिंदी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिंदी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिंदी समाचार चैनलों ने हिंदी को हाशिये पर ला खड़ा किया है। हिंदी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं। संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है। अब मीडिया का हिंदी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिंदी की पूछ-परख कौन करेगा। हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है।

चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं। शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है। प्रधानमंत्री लिखने से अखबारों में जगह की कमी हो जाती है तो पीएम से काम चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सीएम हो गए और आयुक्त कमिश्नर। जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर लिखना सुहाता है तो संपादक के स्थान पर एडिटर शब्द सहज हो गया है। यानि समाचार चैनल से लेकर अखबार के पन्नों में भी हिंदी को दरकिनार किया जा रहा है। हालांकि इस दौर का मीडिया गर्व से इस बात को लिखता जरूर है कि हिंदी का श्रेष्ठ चैनल या हिंदी का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार लेकिन हिंदी को कितना स्थान है, यह उन्हें भी नहीं मालूम। 

हम हर साल 14 सितम्बर को इस बात को लेकर शोर मचाते रहें कि हिंदी माथे की बिंदी है। हिंदी से हमारा स्वाभिमान है। हिंदी हमारी पहचान है लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता से मीडिया में बदलते परिदृश्य में हिंदी हाशिये पर है। हिंदी के चैनलों के पास हिंदी के शब्दों का टोटा है। उनके पास सुप्रभात कमतर शब्द लगता है और गुडमार्निंग उनके लिए ज्यादा प्रभावी है। दस बड़ी खबरों के स्थान पर टॉप टेन न्यूज की सूची पर्दे पर दिखाना उन्हें ज्यादा रुचिकर लगता है। हिंदी के नाम पर कुमार विश्वास की कविता का पाठ कराने वाले चैनलों को कभी निराला या पंत की कविताओं को सुनाने या पढ़ाने में रुचि नहीं होती है। सच तो यह है कि हिंदी की पीठ पर सवार होकर अंग्रेजी की टोपी पहने टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जो हिंदी को हाशिये पर लाने की कोशिश शुरू की है, वह हिंदी के लिए अहितकर ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यजनक है। हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने वालों का दिल इस बात से दुखता है कि जिनकी पहुंच करोड़ों दर्शक और पाठक के बीच है, वही संचार माध्यम हिंदी से दूर हैं। इन संचार माध्यमों की आत्मा हिंदी के प्रति जाग गई तो हिंदी को प्रतिष्ठापित करने में कोई बड़ी बाधा नहीं होगी लेकिन यह संभव होता नहीं दिखता है। हम तो हिंदी के दिवस, सप्ताह और अधिक से अधिक हिंदी मास तक ही स्वयं को समेट कर रखना चाहते हैं। हिंदी की श्रीवृद्धि के नाम पर यह पाखंड हम दशकों से करते चले आ रहे हैं और शायद यह क्रम ना टूटे। इसे हिंदी के प्रति पाखंड परम्परा का नाम भी दे सकते हैं। कुछेक को यह नागवार गुजरेगा लेकिन सच से कब तक मुंह चुराएंगे।

हिंदी की यह दुर्दशा अंग्रेजी से प्रभावित हिंदी समाचार चैनलों के आने के पहले से हो रही है। मेरी तरह आपने भी कभी महाविद्यालय की परीक्षा दी होगी। परीक्षा में प्रश्र पत्र आपके सामने शिक्षक ने रखे होंगे और उसमें प्रश्र पहले हिंदी में और इसी हिंदी का रूपांतरण अंग्रेजी में दिया होता है। अब असल बात यह है कि प्रश्र पत्र के निर्देश को पढ़ें जिसमें साफ साफ लिखा होता है कि हिंदी में कोई त्रुटि हो तो अंग्रेजी के सवाल ही मान्य है। अर्थात हमें पहले समझा दिया गया है कि हिंदी के चक्कर में मत पड़ो, अंग्रेजी ही सर्वमान्य है। हिंदी पत्रकारिता में शिक्षा लेकर हाथों में डिग्री लेकर भटकते प्रतिभावान विद्यार्थियों को उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाता है तो इसका जवाब है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं पढ़ाया गया। बताया गया कि हिंदी माध्यम में भी अवसर हैं। यदि ऐसा है तो प्रावीण्य सूची में आने वाले विद्यार्थियों का भविष्य अंधेरे में क्यों है? टेलीविजन चैनलों में उनका चयन इसलिए नहीं हो पाता है कि वे अंग्रेजी नहीं जानते हैं या उस तरह की अंग्रेजी नहीं जानते हैं जिसके बूते पर वे एलिट क्लास को ट्रीटमेंट दे सकें। ऐसे में हिंदी के प्रति विमोह और अंग्रेजी के प्रति मोह स्वाभाविक हो जाता है। हालांकि हिंदी के प्रति समर्पित लोगों को ‘एक दिन हमारा भी टाइम आएगा’ जैसे भाव से भरे लोग उम्मीद से हैं। हिंदी के हितैषी भी इस बात का सुख का अनुभव करते हैं कि वे वर्ष में एक बार हिंदी को लेकर बोलते हैं, लिखते हैं और हिंदी की श्रीवृद्धि के लिए लिए विमर्श करते हैं। एक दिन, एक सप्ताह और एक माह के बाद हिंदी आले में टांग दी जाती है। कुछ लोग हैं जो वर्ष भर क्या लगातार हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए प्राण-प्रण से जुटे हुए हैं। इन लोगों की गिनती अंगुली भर की है लेकिन हिंदी को हाशिये पर डालने वालों की संख्या असंख्य है।

इस पर सबसे पहले मीडिया कटघरे में आता है। यूरोप की नकल करते हुए हम भूल जाते हैं कि हिंदीभाषी जनता ही इनके चैनल को टीआरपी दिलाती है। उनके होने से ही मीडिया का अस्तित्व है लेकिन करोड़ों लोगों की बोली-भाषा को दरकिनार कर उस अंग्रेजी को सिर पर कलगी की तरह बांधे फिरते हैं, जो उन्हें अपना अर्दली समझती है। यह भी सच है कि टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले साथियों में अधिसंख्य मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में शायद ही अंग्रेजियत हो लेकिन उन्हें टेलीविजन प्रबंधन भी लार्ड मैकाले की तरह अंग्रेजी बोलने और लिखने पर मजबूर करता है। मैकाले की समझ में यह बात आ गई थी कि भारत को बर्बाद करना है तो उसकी शिक्षा पद्धति को नष्ट करो और उनमें कुंठा भर दो। मैकाले यह करने में कामयाब रहा और मैकाले के रूप में आज लाखों मीडिया मैनेजर यही कर रहे हैं। जिस किसी को अंग्रेजी नहीं आती, वे हीनता के भाव से भरे हैं। अंग्रेजी उन पर लाद दिया गया है क्योंकि अंग्रेजी के बिना जीवन शून्य है।

मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि आज से कोई 35 वर्ष पूर्व जब पत्रकारिता का सबक लेने गया वहां भी अंग्रेजी जानने वाले को हमसे ज्यादा सम्मान तब भी मिलता था और आज भी हम। हम हिंदीपट्टी के लोग दरकिनार कर दिया करते थे। तब मीडिया उत्पन्न नहीं हुआ था। अखबार था तो पत्रकारिता थी। आज की तरह पेड न्यूज नहीं हुआ करता था बल्कि पीत पत्रकारिता की यदा-कदा चर्चा हुआ करती थी। लेकिन हमारे गुरु तो हिन्दुस्तानी भाषा में पगे-बढ़े थे और वे हमें आकर्षित करते थे। हमें लगता था कि जिस भाषा को समाज समझ सके, वही पत्रकारिता है। शायद आज भी हम पिछली पंक्ति में खड़े हैं तो हिंदी के प्रति मोह के कारण है या कह सकते हैं कि अंग्रेजी को अंगीकार नहीं किया, इसलिए भी पीछे धकेल दिए गए। हालांकि सच यह भी है कि हम जो कर रहे हैं, वह आत्मसंतोष है। किसी एक अघढ़ समाजी का फोन आता है कि आप का फलां लेख पढ़ने के बाद मैं आपको फोन करने से रोक नहीं पाया तो लगता है कि मैंने यहां आकर अंग्रेजी को परास्त कर दिया है, क्योंकि फोन करने वाला कोई टाई-सूट पहने नकली किस्म का बुद्धिजीवी नहीं बल्कि ठेठ भारतीय समाज का वह पुराने किस्म का कोई आदमी है जिसके पास दिमाग से अधिक दिल है। हिंदी की श्रेष्ठता के लिए, हिंदी को प्रतिष्ठापित करने लिए दिमाग नहीं दिल चाहिए। दिल वाले आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं और दिमाग वालों की जगह मीडिया में है। हिंदी को श्रेष्ठ स्थान दिलाना चाहते हैं तो दिल से हिंदी को गले लगाइए। हिंदी दिवस और सप्ताह, मास तो औपचारिकता है। एक बार प्रण लीजिए कि हर सप्ताह हिंदी में एक लेख लिखेंगे, हिंदी में संवाद करेंगे। हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा। मीडिया का क्या है, वह तो बदल ही जाएगा।

(लेखक भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

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‘भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं’

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं।

राजेश बादल by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नजर आते हैं। अगर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है कि हिंदी आखिरी सांसें गिन रही है। अगर अब ध्यान न दिया गया तो करोड़ों दिलों में धड़कने वाली ये भाषा जैसे विलुप्त हो जाएगी। करीब चालीस बरस से हिंदी के अस्तित्व पर आशंका जताने वालों को मैं खुद देख रहा हूं। पुरानी पीढ़ी के लोगों से भी हिंदी की चिंता सुनता आया हूं। ताज्जुब है कि दशकों से इस प्रलाप के बाद भी हिंदी किसी अमरबेल की तरह फैलती नजर आ रही है। आज जिस इलाके में हिंदी बोली, समझी और पढ़ी जा रही है। क्या सौ साल पहले भी यही स्थिति थी? उत्तर है-बिलकुल नहीं।

तब के हिन्दुस्तान में हिंदी के पंडित थे ही कितने? राज काज की भाषा उर्दू थी और उस पर फारसी का असर था। हिंदी का परिष्कार और प्रयोग तो पिछली सदी में ही पनपा और विकसित हुआ है। गुलाम भारत में भी हिंदी कभी जन-जन की भाषा नहीं रही। अलबत्ता यह अवश्य महसूस किया जाने लगा था कि अगर किसी भाषा में हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा बनने की संभावना है तो वो हिंदी ही है। भोजपुरी, अवधी, बृज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी और राजस्थान की अनेक बोलियों की छोटी छोटी नदियों ने आपस में मिलकर हिंदी की गंगा बहाई। संस्कृत का मूल आधार तो था ही। इसके बाद उर्दू और अंग्रेजी ने भी हिंदी के अनुष्ठान में अपनी-अपनी आहुतियां समर्पित कीं। अगर आप डेढ़-दो सौ साल की हिंदी-यात्रा देखें तो पाते हैं कि शुरुआती दौर की हिंदी आभिजात्य वर्ग के लिए थी। कठिन और संस्कृतनिष्ठ। आज के बच्चे अगर पढ़ें तो शायद उसे हिंदी ही न मानें।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, हिंदी बोलचाल की या यूं कहें आम अवाम की भाषा बनती गई। पूरब से रविन्द्रनाथ टैगोर हों या पश्चिम से महात्मा गांधी, उत्तर से भारतेंदु  हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हजारीप्रसाद द्विवेदी हों या फिर दक्षिण से-चक्रवर्ती राजगोपालाचारी। आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले क्रांतिकारी भी हिंदी को संपर्क की भाषा बना चुके थे। यकीन न हो तो सरदार भगतसिंह के विचार पढ़ लीजिए। सभी ने हिंदी को देश की प्रतिनिधि भाषा स्वीकार कर लिया था।

जरा याद कीजिए उस दौर के हिन्दुस्तान में अभिव्यक्ति के माध्यम कितने थे? सिर्फ़ एक माध्यम था और वो था मुद्रित माध्यम। किताबों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये उस काल में हिंदी लोगों तक पहुंचती थी। साक्षरता का प्रतिशत कम था। इसलिए लिखा गया साहित्य आम आदमी तक आसानी से पहुंचाना मुश्किल काम था। मगर आजादी के आंदोलन में हिंदी अभिव्यक्ति का एक बड़ा जरिया बन चुकी थी। कहा जा सकता है कि पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट करने में हिंदी की बड़ी भूमिका थी। जो भाषा हजारों में लिखी जाती थी और लाखों में बोली जाती थी, वो करोड़ों की भाषा बन गई थी।

आजादी के बाद प्रिंट माध्यम के साथ आकाशवाणी ने भी कंधे से कंधा मिलकर काम शुरू कर दिया। रेडियो ने तो हिंदी को प्रसारित करने में क्रांतिकारी काम किया। रेडियो सुनने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं था। लिहाजा आकाशवाणी सुन-सुन कर लोगों ने हिंदी को जन-जन की भाषा और बोली बना दिया। तीसरा माध्यम आया भारतीय सिनेमा। हिंदी चलचित्रों ने तो वो काम किया, जो हिंदी के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करके भी सरकारें नहीं कर सकतीं थीं। दुनिया का अव्वल कारोबार बन चुके भारतीय सिनेमा ने दक्षिण भारत के उन इलाकों में भी लोगों को हिंदी सिखा दी, जो राजनीति का शिकार होकर हिंदी का उग्र विरोध करते आए थे। आज सारे विश्व में बोली और लिखी जाने वाली भाषाओं के जानकारों की संख्या देख लीजिए। हमारी हिंदी अलग से सितारों की तरह चमकती दिखाई देती है। भारतीय सिनेमा का यह कर्ज हिंदी प्रेमी शायद ही कभी उतार पाएं।

मैं इस लेख को आंकड़ों से भरकर उबाऊ और बोझिल नहीं बनाना चाहता। पाठक तमाम स्रोतों से इन्हें हासिल कर सकते हैं। आशय सिर्फ यह है कि हम हिंदी के विस्तार और प्रसार के नजरिये से आगे ही गए हैं। पीछे नहीं लौटे। मिसाल के तौर पर  पत्र-पत्रिकाओं को देख लीजिए। आजादी मिलने के समय हिंदी की मैगजीन और अखबार कितने थे? आप सौ तक की गिनती में समेट सकते थे। आज यह संख्या हजारों में है। समाचारपत्रों का हिसाब-किताब देखने के लिए एक भारी भरकम विभाग तैनात है। जिन अखबारों की प्रसार संख्या तीस-चालीस बरस पहले कुछ लाख होती थी, आज वो करोड़ों में जा पहुंची है। जाहिर है इन्हें पढ़ने वाले पेड़-पौधे अथवा मवेशी नहीं हैं? फिर कौन हैं जो हिंदी के मुद्रित प्रकाशनों की तादाद बढ़ाते जा रहे हैं। सिर्फ प्रकाशनों की नफरी ही नहीं बढ़ रही, उनके कारोबार के ग्राफ में भी जबरदस्त उछाल आया है। दुनिया का कौन सा देश छूटा है, जहां हिंदी की किताबें नहीं मिलतीं। भारत के आधा दर्जन से ज़्यादा प्रकाशकों के विदेशों में अपनी किताबों के शोरूम हैं। हिन्दुस्तान में आज भी पचास फीसदी विश्वविद्यालय हिंदी नहीं पढ़ाते और दुनिया भर में पचास से ज़्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाए।

यहां याद दिलाना जरूरी है कि जिस पाकिस्तान में उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से देवनागरी और हिंदी पर बंदिश है, उसी देश में पिछले साल छह भागों में अठारह सौ पन्नों की एक उपन्यास श्रृंखला हिंदी में छपी है। ‘दरवाजा खुलता है’ नाम से यह उपन्यास लाहौर के संगेमील प्रकाशन ने छापा है। पाकिस्तान में इसकी भारी मांग है और लोगों को भले ही समझ न आए, ड्राइंग रूम में सजा कर रखने के लिए वे इसे खरीद रहे हैं। अच्छी बात ये है कि उर्दू से हिंदी में इसका अनुवाद जाने माने भारतीय लेखक डॉक्टर केवल धीर ने किया है। हिंदी प्रेमियों के लिए क्या ये उदाहरण गर्व के कुछ पल उपलब्ध नहीं कराता?

हिंदी के लिए करिश्मा तो उस माध्यम ने किया, जिसे किसी जमाने में बुद्धू बक्सा कहा गया था और जिसके भारत में प्रवेश का भरपूर विरोध हुआ था। यह माध्यम है टेलिविजन। करीब करीब तीस साल से टेलिविजन भारत में घर-परिवार का सदस्य बन गया है। बेशक आज के भारत में सभी भारतीय भाषाओं में छोटे परदे ने अपनी घुसपैठ की है लेकिन सबसे आगे तो हिंदी ही है। खबरिया हों या मनोरंजन चैनल-हिंदी के दर्शक सबसे आगे की कतार में बैठे हैं। यही नहीं, अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी के चैनल, हिंदी के गाने और धारावाहिक उतनी ही दिलचस्पी से देखे जाते हैं, जितने उन प्रदेशों की अपनी भाषा के चैनल। एक अनुमान के मुताबिक छोटे परदे ने इतने बरस में करीब पंद्रह करोड़ लोगों को हिंदी का जानकार बना दिया है। जब अहिंदी भाषी राज्यों के लोगों को राष्ट्रीय महत्त्व की कोई भी सूचना लेनी होती है और उन्हें अपनी भाषा के चैनल पर नहीं मिलती तो वे तुरंत हिंदी के चैनलों की शरण लेते हैं। बरसों से यह क्रम  चल रहा है। इस वजह से वो हिंदी समझने और बोलने भी लगे हैं।

टेलिविजन से आगे जाएं तो इन दिनों नई नस्ल की जीवन शैली सोशल मीडिया के इर्द गिर्द सिमट कर रह गई है। इंटरनेट, वेबसाइट ट्विटर, वॉट्सऐप, ब्लॉग, यू-ट्यूब और अन्य नए माध्यम अवतारों ने ज़िंदगी का रंग बदल कर रख दिया है। कारोबारी हितों ने हिंदी के बाजार देखा है, इसलिए सोशल मीडिया के सभी रूप हिंदी में उपलब्ध हैं। गांव, कस्बे और शहरों की नौजवान पीढ़ी इन सारे रूपों से एक दिन में अनेक घंटे रूबरू होती है। क्या आपको यकीन है कि हमारे लड़के-लडकियां अंग्रेजी में इतना महारथ हासिल कर चुके हैं कि उन्हें हिंदी की जरुरत ही नहीं है? कम से कम मैं तो नहीं सोचता। हिंदी में मोबाइल पर संदेश जाते हैं, मेल जाते हैं, गूगल बाबा हर भाषा से हिंदी में अनुवाद की सुविधा मुहैया कराते हैं तो जो लोग इस सुविधा का लाभ उठाते हैं वो कोई दक्षिण अफ़्रीका या ऑस्ट्रेलिया के लोग नहीं हैं। यह सब हिंदी की श्रीवृद्धि नहीं तो और क्या है।

फिर आज के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियों की बात क्यों की जाती है? क्यों भाषाविद् और पंडित छाती कूटते नजर आते हैं। अगर देश -विदेश में हिंदी जानने वाले लोग बढ़ रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, पैसा भी कमाया जा रहा है तो फिर चिंता करने वाले कौन हैं? इसका उत्तर वास्तव में हमारे घरों में मौजूद है। चिंता का कारण हिंदी का सिकुड़ना नहीं, बल्कि उसके स्वाद में हो रही मिलावट है। हम लोग रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनकर झूमने लगते हैं लेकिन जब बेटा या बेटी आकर उसे बंद कर अंग्रेजी के गाने सुनने लगता है तो हमें लगता है ये लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते या इन्हें हिंदी क्यों अच्छी नहीं लगती। जब आप बाजार जाते हैं, पुस्तक मेलों में जाते हैं तो आप प्रेमचंद, वृन्दावनलाल वर्मा और धर्मवीर भारती की किताबें देखने रुक जाते हैं और आपके बच्चे अंग्रेजी की किताबें खरीद कर उसका बिल ले रहे होते हैं। आप हैरानी से और कुछ बेगानेपन से बच्चों को घूरते हैं। आप टेलिविजन पर कोई हिंदी का सीरियल या गाना देखना चाहते हैं तो आपका बच्चा रिमोट आपके हाथ से लेकर चैनल बदल देता है। आप देखते रह जाते हैं। आप बच्चों के साथ हिंदी फिल्म देखना चाहते हैं और बच्चे आपके सामने अंग्रेजी फिल्म का प्रस्ताव रख देते हैं। आप जैसे-तैसे सिनेमा जाते भी हैं तो फिल्म की भाषा आपके ऊपर से निकल जाती है। बच्चे फिल्म के डायलॉग पर झूमते हैं, गानों पर खुद भी गाते हैं और आप बच्चों को विदेशियों की तरह देखते हैं।

जरा याद कीजिए। उन बच्चों की स्कूलिंग के दौरान आपने कभी उनके हिंदी में कम अंक आने पर चिंता की? मैथ्स, फिजिक्स, कैमिस्ट्री या अंग्रेजी में अनुतीर्ण होने पर निश्चित ही आपने टोका होगा, लेकिन हिंदी कमजोर होने पर शायद ही ध्यान दिया हो। जिन लोगों ने ध्यान दिया भी होगा तो उनका प्रतिशत बहुत कम है। बचपन में उस बच्चे के गलत अंग्रेजी बोलने पर भी आप पड़ोसियों के सामने गर्व से मुस्कराया करते थे। आप उसमें आधुनिक भारत के भविष्य की तस्वीर देखते थे।

दरअसल, ये उदाहरण आपको अटपटे लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी मानसिकता में ये नमूने घुल-मिल गए हैं।दिन में दस बार हम राष्ट्रभाषा का तिरस्कार होते अपनों के बीच देखते हैं और चूं तक नहीं करते। इस दुर्दशा पर अब तो आह या ठंडी सांस भी नहीं निकलती। हमारे स्कूलों में शुद्ध हिंदी के जानकार शिक्षक नहीं मिलते। उनकी व्याकरण कमजोर है। कॉलेजों में हिंदी के प्राध्यापक स्तरीय नहीं हैं। आधे से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। शिक्षक ठेके पर रखे जाते हैं। उन्हें एक एक पीरियड के हिसाब से पैसे मिलते हैं। ऐसे में ज्ञानवान लोग आपको कहां से मिलेंगे? क्या आप अपने बच्चे को हिंदी शिक्षक बनाना चाहेंगे? मैं जानता हूं। आपका उत्तर न में होगा।

अशुद्ध और मिलावटी भाषा का खतरा गंभीर है। मोबाइल और इंटरनेट पर विकृत हिंदी हमें नजर आती है। हम देखते रहते हैं। न केवल देखते रहते हैं बल्कि चंद रोज बाद उसी विकृत भाषा का हम भी इस्तेमाल करने लगते हैं। शास्त्रीय जानकारों की फ़सल हम नहीं उगा रहे हैं। हिंदी की अमरबेल तो फैलती रहेगी। उसे किसी सरकार या समाज के संरक्षण की जरुरत नहीं है। उसे आपकी मेहरबानी भी नहीं चाहिए। इतने माध्यमों का आविष्कार होने के बाद उसका विस्तार कोई नहीं रोक सकता। साल दर साल हिंदी के जानने समझने वाले बढ़ते ही जाएंगे। उसके लिए किसी तरह के विलाप की आवश्यकता नहीं है। बचाना है तो उसकी शुद्धता को बचाइये। उसकी आत्मा और उसकी मिठास को बचाइए। आने वाली पीढ़ियों को बताइए कि असल हिंदी कौन सी है? सरकारी मदद पर होने वाले कागजी सम्मेलनों में छाती पीटने से कुछ नहीं होगा। अपना घर ठीक कीजिए-हिंदी आपको दुआएं देगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैंं)

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‘यह केवल मेरा नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेक लोगों का दर्द है’

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 14 September, 2020
Last Modified:
Monday, 14 September, 2020
Hindi Diwas

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी क्या अप्रसन्न होंगे? बात उनकी सरकार और व्यवस्था की है। हां, उनके वरिष्ठ सहयोगियों के पास यह जानकारी नहीं होने से कुछ नाराजगी होगी। फिर भी, पूरा विश्वास है कि किसी भी माध्यम से उन्हें इस तथ्य की जानकारी मिलने पर वह चिंता के साथ बदलाव के लिए कोई उपयुक्त निर्देश दे सकते हैं। उन्होंने अपने सत्ता काल में कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं, फिर यह तो छोटा सा सुधार है। लेकिन भारत माता की राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा और उसकी मान्यता से जुड़ा कार्य है। यही नहीं, इससे उनकी और सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों और बातों को करोड़ों हिंदीभाषियों को सही रूप में पहुंचाने में सहायता मिलेगी। यदि सरकार में बैठे कोई मंत्री, पार्टी के नेता और खासकर अफसर नाराज हों, तो मुझे कोपभाजन बनने की चिंता नहीं है।

अवसर भी है-सरकार के वर्षों से चलाए जा रहे हिंदी दिवस (14 सितंबर)-हिंदी सप्ताह-हिंदी पखवाड़े का। कोविड काल में अधिक सार्वजनिक कार्यक्रम भी नहीं होंगे। विज्ञापन, बोर्ड, बैनर, यात्रा और खान-पान आदि के सरकारी खर्च भी शायद कम होंगे, लेकिन डिजिटल युग में एक बार फिर हिंदी के गौरव, संस्कृति, विश्वव्यापी प्रसार पर बोला, लिखा, पढ़ा जाएगा, इसलिए पहले थोड़ी कड़वी बात। ऐसा नहीं है कि इस 'महामारी काल के एकांतवास' दौर के कारण मैं सरकारी तंत्र पर अपनी भड़ास निकाल रहा हूं। सरकार और पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि संवाददाता और संपादक रहते पिछले करीब तीस-पैंतीस वर्षों से समय-समय पर खुद या अपने सहयोगी के माध्यम से यह मुद्दा उठाता रहा हूं। आप इस लंबी भूमिका के लिए क्षमा करें, क्योंकि यह केवल मेरा निजी नहीं, हिंदी भाषा से जुड़े अनेकानेक लोगों का दर्द है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के सबसे बड़े सूचना तंत्र-आकाशवाणी से करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले अधिकतम (बचाव के के लिए 99 प्रतिशत समझ लें) समाचार पहले अंग्रेजी में तैयार होते हैं और फिर हिंदी में अनुवाद के बाद प्रसारित होते हैं। प्रधानमंत्री के भाषण ही नहीं, ‘मन की बात’ की खबर पहले अंग्रेजी में बनती है और फिर उसका अनुवाद हिंदी समाचार उद्घोषक को थमाया जाता है। यह तो दुनिया जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवश्यक होने पर ही अंग्रेजी में बोलते हैं। ‘मन की बात’ के अलावा भी भारत के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में भाषण देते हैं, बातचीत करते हैं। हिंदीतर राज्यों में भारतीय भाषा के कुछ वाक्यों के बाद किसी सहयोगी से स्थानीय भाषा में अनुवाद की व्यवस्था करवा देते हैं। फिर भी ऐसा सरकारी शिकंजा क्यों है कि उनकी बात खबर के रूप में अंग्रेजी से अनुवाद के बात जनता जनार्दन तक पहुंचाई जाए?

यह भी माना जा सकता है कि आकाशवाणी वाले अच्छे योग्य अनुवादक से भी यह काम करवाते हों। मुझे पूर्णकलिक अथवा दैनिक भुगतान पर काम करने वालों को कोई नुकसान पहुंचाने की भी इच्छा नहीं है। फिर मित्र सूचना प्रसारण मंत्री यह भी कह सकते हैं कि आकाशवाणी-दूरदर्शन स्वायत्त प्रसार भारती के अंतर्गत हैं। मेरा निवेदन है कि संसद में उत्तर तो आप या प्रधानमंत्री को ही देना होता है। प्रसार भारती का खर्च सरकार और संसद से स्वीकृत होता है। फिर हिंदी में कही गई बात को मूल रूप में पहुंचाने पर कोई हस्तक्षेप कैसे कहेगा? समस्या यह है कि आकाशवाणी में भी शीर्ष पद पर कई आईएएस अधिकारी आते रहे हैं और उन्हें अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी जरूरी लगती है।

आकाशवाणी में अथवा ऐसे किसी भी संस्थान में सूचना-समाचारों के आदान-प्रदान के लिए व्यवस्था रहती है। आकाशवाणी के समाचार विभाग में इसे ‘समाचार पूल’ कहा जाता है। दशकों से इसमें अंग्रेजी का वर्चस्व रहा, क्योंकि हिंदी के साथ अन्य भाषाओँ में भी अनुवाद होते हैं। हम जैसे पत्रकारों के लिखने या आकाशवाणी में भी रहे कई श्रेष्ठ हिंदीभाषी लोगों के आग्रह पर 1993 के आस-पास अलग से ‘हिंदी समाचार पूल’ भी बना, ताकि अंग्रेजी से अधिक मूल भाषा में काम हो। रिकॉर्ड में कहने को यह आज भी है, लेकिन व्यवहार में दूसरे दर्जे वाली स्थिति है।

2014 से पहले मनमोहन राज में तो बेचारी हिंदी की कोई परवाह नहीं हो पाई। उन्हें कभी-कभार मजबूरी में हिंदी का भाषण उर्दू या गुरुमुखी लिपि में लिखवाकर पढ़ना पड़ता था। उनके सत्ता काल में मैंने एक वरिष्ठ संवाददाता से आकाशवाणी की इसी व्यवस्था पर पूरी छानबीन के बाद रिपोर्ट बनवाकर छापी। किसी हिंदी प्रेमी की लिखापढ़ी पर मंत्रालय से आकाशवाणी तक फाइल चली और महीनों बाद इस उत्तर के साथ बंद कर दी गई कि खबर अपुष्ट होगी। ऐसा कुछ नहीं है। अब इस पर कोई सीबीआई जांच की मांग करने से रहा। अब भाजपा की सरकार का दूसरा कार्यकाल आ गया और नई शिक्षा नीति में हिंदी और भारतीय भाषाओँ के महत्व को प्राथमिकता मिलने से हमें खुशी हुई है। इसलिए मुझे प्रसारण क्षेत्र की ताजी स्थिति पता करने की इच्छा हुई तो पता चला 73 साल में यह डिब्बा वहीँ अटका है। यह भी याद दिलाना ठीक होगा कि भारत के इसी प्रसारण तंत्र से अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी सहित दिग्गज साहित्यकार, कवि जुड़े रहे हैं। उनका हिंदी-अंग्रेजी दोनों पर अधिकार था और उनके मूल रूप में लिखे पर कोई अधिकारी उंगली नहीं उठा सकता था।

बहरहाल, अब पराकाष्ठा यह है कि महत्वपूर्ण अवसरों पर देश-विदेश में दिए गए भाषण के समाचार के लिए अंग्रेजी पर निर्भरता है। अकेले आकाशवाणी की ही नहीं, कई मंत्रालयों, सार्वजनिक संस्थानों में यही व्यवस्था है। आप कह सकते हैं कि निजी समाचार संस्थानों में भी ऐसा रहा या आज भी होगा। लेकिन, राष्ट्र भाषा के लिए सरकारी तंत्र में सुधार की बात क्यों नहीं सोची जाती। अनुवाद का आलम यह है कि सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत बजट की हिंदी प्रति उपलब्ध करना अनिवार्य है। गोपनीयता के कारण हिंदी की प्रति बजट भाषण के बाद दी जाती है। यदि किसी महानतम हिंदी संपादक, पत्रकार, लेखक को केवल हिंदी की प्रति देकर खबर और टिप्पणी लिखने को दे दी जाए, तो वह पसीने-पसीने हो जाएगा, क्योंकि अनुवाद की जटिलता में वह समझ ही नहीं सकेगा। अब भी सरकारी तंत्र में आर्थिक विषयों के हिंदी समाचार में हर पंक्ति के लिए हिंदी के ही शब्द कोष से अर्थ समझाना होगा। इसीलिए आकाशवाणी हो या अखबार-पत्रिका या टीवी चैनल, साथ में अंग्रेजी की प्रति रखकर सरल भाषा में जनता तक पहुंचाने का प्रयास होता है |

भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में भी लगभग यही स्थिति वर्षों से है। एक समय था, जब संवाददताता किसी सूचना अधिकारी या प्रमुख अधिकारी से संपर्क कर भाषण की प्रति मांग लेते थे। डिजिटल युग में तो सूचना केंद्र के सबसे निचले स्तर के बाबू साहब या साहिबा किसी संवाददाता या संपादक के फोन पर भी सीधा जवाब देते हैं-आपको वेबसाइट देखना नहीं आता हो तो कहीं से सीखिए। वहां जो सामग्री हो, उसको ले लीजिये। इतना बड़ा तमाचा उस दफ्तर में हमें आपातकाल में भी नहीं लगा, इसलिए वहां शिकायत कौन सुनेगा?  कोरोना काल नहीं, यह पिछले वर्षों के अनुभव हैं। मोदी राज में संयुक्त राष्ट्र संगठन में कम से कम संक्षिप्त सूचनाएं हिंदी अनुदित मिलने का इंतजाम हो गया।  भारत में यूरोप, अमेरिका, जापान जैसे देश या उनकी कंपनियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद हिंदी में सामग्री देने के प्रयास करने लगी हैं, लेकिन भारत सरकार के अफसर और बाबू आज भी अंग्रेजी के चरणों में नतमस्तक है। आशा तो बनी रहनी चाहिए कि देर-सवेर देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उनकी सरकार द्वारा मूलतः हिंदी में कही गई बातें अंग्रेजी की झूठन बनाकर नहीं प्रसारित-प्रचारित की जाएगी। हिंदी सप्ताह-पखवाड़ा बंद कर,  वर्ष का हर दिन हिंदी और भारतीय भाषा का समझने की शुभकामनाएं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

तो वह घड़ी आ ही गई। अब हाई कोर्ट भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को केंद्र सरकार के नियंत्रण में लाने के पक्षधर दिखने लगे हैं।

राजेश बादल by
Published - Friday, 11 September, 2020
Last Modified:
Friday, 11 September, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

तो वह घड़ी आ ही गई। अब हाई कोर्ट भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को केंद्र सरकार के नियंत्रण में लाने के पक्षधर दिखने लगे हैं। मुंबई उच्च न्यायालय ने अभिनेता सुशांत सिंह की मौत के मामले की टीवी रिपोर्टिंग पर रोक लगाने संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान इस तरह की राय प्रकट की। माननीय न्यायमूर्ति ने गुरुवार को कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि टीवी मीडिया केंद्र सरकार के नियंत्रण में क्यों नहीं है? अब शिखर सत्ता को दो सप्ताह में अपना उत्तर दाखिल करना है। गुरुवार को ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सुनंदा प्रकरण में मीडिया को समानांतर सुनवाई करने के लिए सावधान किया और परदे पर अभिव्यक्ति में संयम बरतने की सलाह दी। मुल्क की दो बड़ी अदालतों का एक ही दिन पत्रकारों को नसीहत देना संकेत है कि अभिव्यक्ति के इस घर में सब कुछ ठीक नहीं है। आप मान सकते हैं कि संदेश में गंभीर चेतावनी छिपी है।

इस कॉलम के जरिये मैं बीते दो साल से परदे पर गैरजिम्मेदारी भरी पत्रकारिता और मीडिया ट्रायल के बारे में आगाह करता रहा हूं। मैंने साफ-साफ कहा है कि वह दिन दूर नहीं, जब पत्रकार दल सड़कों पर रिपोर्टिंग के लिए निकल नहीं पाएंगे। अब यह दोहराने की जरूरत नहीं कि तमाम भारतीय खबरिया चैनल छोटे परदे पर नौटंकी करने लगे हैं। वे बड़बोलेपन और फूहड़ रिपोर्टिंग का पर्याय बन चुके हैं। अगर यही रवैया जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब पत्रकारिता चौथे स्तंभ के रूप में नहीं जानी जाए। उसका स्तंभ का दर्जा ही विलुप्त हो सकता है अथवा वह स्तंभ नहीं, बेहद कुपोषित दुबला पतला बांस नजर आए।

यह भी आशंका है कि लोकतंत्र कहीं तीन या साढ़े तीन स्तंभों पर टिका न दिखाई देने लगे। खेद की बात तो यह है कि वरिष्ठ और दिग्गज संपादक-पत्रकार इस दुर्दशा पर अपने होंठ सिले बैठे हैं। याद रखिए, जो पीढ़ी अपने उत्तराधिकारियों को तैयार नहीं करती और हालात से जूझने के लिए सैद्धांतिक प्लेटफॉर्म नहीं देती, उसे खुद भी इतिहास के कूड़ेदान में ही जगह मिलती है। भारतीय पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा।

अगर पत्रकारों के उत्पीड़न का हालिया ग्राफ देखें तो पता चलता है कि आजादी के बाद साठ बरस तक एक साल में पत्रकारों को सताने की चार-छह वारदातें हुआ करती थीं। मगर अब कोई सप्ताह ऐसा नहीं जाता, जिसमें पत्रकारों के जेल जाने, हत्या, पीत पत्रकारिता, उत्पीड़न और निष्पक्ष पत्रकारिता पर आक्रमण के चार-छह प्रकरण दर्ज नहीं होते हों। पत्रकारों के लिए क्या यह बेहद क्रूर और भयावह दौर नहीं है? यह सच है कि सियासत कभी अपनी आलोचना या निंदा पसंद नहीं करती। उसे अपनी प्रशंसा ही अच्छी लगती है। इसलिए वह जब तब पत्रकारिता को प्रलोभन,दबाव या परेशान करके अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। लेकिन अगर हमारे नाचने में ही दोष हो तो घर का आँगन टेढ़ा बताने का कोई फायदा नहीं मिस्टर मीडिया!

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क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

मीडिया के हमाम में ये मेहमान अपने को निर्वस्त्र होते क्यों देखना चाहते हैं मिस्टर मीडिया!

इस सच को चैनलों के संपादक-प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे मिस्टर मीडिया!

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वर्तमान सन्दर्भ में टीवी मीडिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है: आलोक मेहता

इन दिनों मीडिया के कई दिग्गज, राजनेता, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग और सामान्य जनता का एक वर्ग किसी लगाम, नियंत्रण, लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 07 September, 2020
Last Modified:
Monday, 07 September, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार ।।

आपने मुर्गों को लड़ते लड़ाते देखा है। कबूतर, कौव्वे से लेकर शेर हाथी को लड़ते देखा होगा। सामान्यतः घोड़ों को लड़ते कम देखा जाता है। हां चीन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में घोड़ों को भीषण खून खराबे वाली लड़ाई का प्रदर्शन करके कमाई की जाती रही है। कई देशों में पशुओं को लड़ाने के कथित खेलों पर अब प्रतिबन्ध लग चुके हैं। लड़ाई से किसी को क्या मिला है और मिलेगा। लेकिन इन दिनों समाज, देश दुनिया को शांति सद्भावना का सन्देश देने वाले कुछ टीवी मीडिया चैनल, संपादक या स्ववतंत्र रूप से सोशल मीडिया पर सक्रिय पूर्व संपादक, पत्रकार और साहित्य संस्कृतिकर्मी सार्वजनिक रूप से एक दूसरे से झगड़ने जैसी स्थितियों में दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक विचारधारा, सत्ता या प्रतिपक्ष से जुड़ाव तक मतभेद समझ में आ सकते हैं। लेकिन प्रतियोगिता अथवा निजी नाराजगी में एक दूसरे को अपराधी-देशद्रोही तक करार देने की पराकाष्ठा से क्या किसी को लाभ हो सकेगा?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो संविधान में हर भारतीय नागरिक को है। समाचार माध्यमों-पत्र पत्रिकाओं टीवी चैनल भी उसी अधिकार का लाभ पाते हैं। फिर कुछ नियम प्रावधान मीडिया के लिए बनते बदलते रहे हैं। इसलिए इन दिनों मीडिया के कई दिग्गज, राजनेता, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग और सामान्य जनता का एक वर्ग किसी लगाम, नियंत्रण, लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं। उन्हें ध्यान नहीं है, यह बात पिछले पांच दशकों में उठती और दबाई जाती रही है। मैं स्वयं 1970 से पत्रकारिता में होने के कारण राज्यों और केंद्र की सरकारों, अतिवादी सांप्रदायिक, आतंकवादी समूहों के दबावों और प्रयासों को देखता, समझता और झेलता रहा हूं। वर्तमान सन्दर्भ में टीवी मीडिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। वे क्यों सुशांत सिंह-रिया प्रकरण या चीन भारत सीमा विवाद या कोरोना महामारी के संकट को दिन रात अतिरंजित ढंग से दिखा रहे हैं। फिर प्रतियोगिता में एक दूसरे से मार काट क्यों कर रहे हैं? कौन कितना किस विषय को दिखाए यह तय कौन करेगा?

वास्तव में एक गंभीर कोशिश का ध्यान आता है। बात 2006 की है। उस समय मैं एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया का अध्यक्ष था और साथी वरिष्ठ संपादक सच्चिदानन्द मूर्ति महासचिव पदों पर थे। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस गठबंधन की सरकार सत्ता में थी। सरकार ने मीडिया के ब्रॉडकास्ट नियामक विधेयक तैयार कर लिया। इससे पहले केवल केबल प्रसारण के नियमन के लिए कुछ नियम कायदे बने हुए थे। लेकिन कांग्रेस के कुछ बड़े नेता-मंत्री टीवी चैनलों की बढ़ती संख्या और उपभोक्ता अधिकार के बहाने समूर्ण इलेट्रॉनिक मीडिया को कड़े कानून में बांधना चाहते थे। इस विधेयक में भारत के सभी सरकारी स्वायत्त और निजी रेडियो टीवी चैनल के प्रसारण के विषय, लिखी बोली दिखाई जाने वाली सामग्री तक पर सरकार की निगरानी का प्रावधान था। मेरी और मुझसे वरिष्ठ संपादक बीजी वर्गीज, कुलदीप नायर, मामन मैथ्यू सहित पत्रकारों की नजर में यह प्रस्तावित कानून एक मायने में आपातकाल के सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक था। इससे पहले प्रिंट माध्यम के लिए बिहार में लाया गया कानून या राजीव गांधी के सत्ता काल में आये प्रेस कानून का एडिटर्स गिल्ड तथा पत्रकार संगठनों और प्रतिपक्ष ने भी विरोध किया था। इसलिए मनमोहन सिंह की सरकार के प्रस्तावित विधेयक को क़ानूनी रूप मिलने से पहले हम सबने कड़ा विरोध अभियान शुरू कर दिया। गिल्ड के पदाधिकारी के नाते मंत्रियों, सूचना-प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार (पूर्व पत्रकार भी) आदि के साथ बैठकें हुई। इस कारण सरकार कुछ संशोधन इत्यादि पर विचार करने लगी। संयोग से तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री प्रिय रंजन दासमुंशी अस्वस्थ्य हो गए। इस कारण भी विधेयक रास्ते में अटक गया। फिर भी आशंका से चिंतित संपादकों ने वार्ताओं का सिलसिला जारी रखा।

यहां यह बात भी उल्लेख करना उचित होगा कि पहले गिल्ड केवल उन संपादकों कि संस्था बनी थी, जो अखबार या पत्रिका में प्रकाशन के सम्पूर्ण संपादक हों। मीडिया का विस्तार होने पर हमने टीवी समाचार चैनल के प्रमुख संपादकों को भी सदस्य बनाया। सदस्यता के लिए भी वरिष्ठ संपादकों की चयन समिति रही, ताकि निर्धारित मानदंडों वाले ही सदस्य बने। इस नए संकट में हमने एडिटर्स गिल्ड की तरफ से यह सुझाव दिया कि समाचार चैनल के संपादकों का एक सहयोगी संगठन स्वयं अपनी आचार संहिता तय कर लेगा और इसके लिए किसी सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश को भी मार्गदर्शन के लिए रखा जाएगा। फिर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रमुख न्यायाधीश जे एस वर्माजी को यह दायित्व सौंपा गया। इस तरह महीनों के कड़े विरोध, बातचीत और प्रस्तावों से वह विधेयक सरकार ने ठंडे बस्ते में रख दिया।

एडिटर्स गिल्ड में हरि जयसिंह के अध्यक्ष और मेरे महासचिव के कार्यकाल में संपादकों के लिए एक आचार संहिता बनाई गई और राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने स्वयं इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एक छोटे सभाकक्ष में आकर उसे जारी किया था। इसी तर्ज पर 2007 से टीवी संपादकों और खासकर प्रसारण के लिए अपने नियम आचार संहिता बनाई। मेरे जैसे कितने ही संपादक और पत्रकार, विधिवेत्ता, सांसद समय-समय पर संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य भी रहे हैं। पूर्व वरिष्ठ न्यायाधीश उसके अध्यक्ष रहते हैं। प्रेस परिषद् ने भी बहुत नियम आचार संहिता बनाई, लेकिन कानूनी रूप से उसका दायरा अब तक प्रिंट मीडिया तक सीमित रहा है। परिषद् या समादकों की आचार संहिताओं में किसी सजा का प्रावधान नहीं है। मतलब इसे अपने जीवन मूल्यों की तरह स्वयं अपनाए जाने की अपेक्षा की जाती है। इस पृष्ठभूमि में आज भी सवाल यह है कि प्रकाशन या प्रसारण की सामग्री और प्राथमिकता कौन तय करे?

अपराध कथा को प्रथमिकता मिले या राजनीति या आर्थिक या मनोरंजक या व्यापारिक, फिल्मी, क्रिकेट या कबड्डी... हजारों विषय समाज में और दुनिया में हैं। कौन कितनी देर क्या दिखाए या बोले- कौन तय करे।

इन दिनों महा प्रगतिशील वर्ग तो पहले ही मीडिया को बिका हुआ, डरा हुआ कहकर बदनाम किए हुए हैं। अभी तो संसद में भी यह मुद्दा उठ सकता है। हम सब शुचिता के साथ स्वतंत्रता को आवश्यक मानते हैं, लेकिन एक दूसरे को नीचे दिखाकर भर्त्सना के साथ क्या क्रोध या रुदन के बाद सरकार को प्रसारण नियामक कानून बनवाने के लिए निमंत्रित करना चाहेंगे? सरकार किसी भी पार्टी की हो, प्रतिपक्ष का एक खेमा तो प्रसन्न ही होगा। सत्ता तो आती जाती रहती है। कानून तो हमेशा रहेगा। वैसे भी भारत के पुराने प्रेस कानून में संशोधन के एक प्रस्ताव पर विचार विमर्श जारी है। प्रसारण और सोशल मीडिया पर आवाज उठने से सरकार को कहां कोई नुकसान होगा। हां, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवाज उठाने वाले ही घायल होंगे और सामान्य नागरिक भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा बनाई जा सकने वाली नियामक व्यवस्था से चुनी गई सामग्री ग्रहण कर सकेंगे। आपसी लड़ाई के दौरान सबको भविष्य को ध्यान में रखकर स्वयं तय करना होगा- आत्म अनुशासन या सरकारी लगाम?

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जाने-अनजाने मीडिया का एक वर्ग भी इस तरह के जाल में फंस जाता है: आलोक मेहता

राक्षस कभी भी, किसी भी रूप में तबाही के लिए आ सकता है। इसी तरह जहर के अनेक रूप होते हैं।

आलोक मेहता by
Published - Tuesday, 01 September, 2020
Last Modified:
Tuesday, 01 September, 2020
Alok5454

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

राक्षस कभी भी, किसी भी रूप में तबाही के लिए आ सकता है। इसी तरह जहर के अनेक रूप होते हैं। वह दवा के रूप में मिल सकता है,  नशे के रूप में मिल सकता है, तस्करी और हथियारों के रास्ते से हजारों जान ले सकता है। सुशांत सिंह की संदिग्ध हालात में मृत्यु की जांच के दौरान मुंबई के बॉलिवुड और राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र में ड्रग्स के नशे एवं धंधों की परतें खुलने के आसार दिख रहे हैं। मुंबई ही नहीं, दिल्ली से कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर प्रदेशों तक यह खतरनाक धंधा फैला हुआ है। निश्चित रूप से फिलहाल इस एक प्रकरण की जांच और कानूनी प्रक्रिया लंबी चलेगी, लेकिन जरूरत इस बात की होगी कि भारत में पिछले वर्षों के दौरान केमिकल्स, दवाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार-पर्यटन की आड़ में ड्रग्स के जहर से समाज की बर्बादी के लिए चल रही गतिविधियों को कठोरता से कुचला जाए।

सामान्यतः यह धारणा रहती है कि ड्रग्स के तार केवल विदेश से जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, थाइलैंड या अफ्रीकी देशों से चोरी-छिपे और माफिया की तस्करी से ड्रग्स पहुंचने के मामले सामने आते रहे हैं। ड्रग्स पर पचासों फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन यदि भारत में प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स ब्यूरो, सीबीआई की पिछले 25 से 30 वर्षों के दौरान भारत में ही अफीम-गांजे से अवैध रूप से तैयार या तस्करी की गई मादक सामग्री के प्रकरणों पर शोधनुमा अध्ययन किया जाए, तो बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। सबसे दुखद तथ्य यह है कि बहुत कम प्रकरणों में सजा के साथ अपराधियों, कंपनियों, अधिकारियों और नेताओं पर कार्रवाई हुई है। प्रारंभिक वर्षों में तो इस तरह के मामले केवल सीबीआई के अधीन ही रहते थे।

पत्रकार के नाते सीबीआई के तत्कालीन निदेशक डी.सेन के 1973-74 से किए गए पहले इंटरव्यू से अब तक अनेक निदेशकों और फिर प्रवर्तन निदेशालयों के निदेशकों से चर्चा और उनके सहयोगियों से अनौपचारिक ढंग से मिली जानकारियों ने बहुत विचलित रखा है। उनकी या अदालतों तक की समस्या यह रही है कि इस धंधे में सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाले लोग किसी दस्तावेज में सामने नहीं मिल पाते। वे हमेशा प्रतिष्ठा के मुखौटे लगाए घूमते हैं। देश-विदेश के संपर्क और सत्ता के संपर्क से एक हद तक मीडिया पर भी उनका प्रभाव रहा है। शायद यह पहला अवसर है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जहरीले धंधे पर नियंत्रण के लिए जांच एजेंसियों को पूरी छूट देकर किसी को भी नहीं बख्शने के आदेश दिए हुए हैं। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय गुप्तचर एजेंसियों का सहयोग भी लिया जा रहा है। इसकी वजह यह है कि ड्रग्स के धंधे का विस्तार होने से भारत के लाखों युवकों, युवतियों, गरीबों-अमीरों को नशे, अवैध कमाई, अपराध की तरफ धकेला जा रहा है।

यों अफीम-गांजे के उत्पादन और बिक्री पर सरकार का नियंत्रण रहता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड अफीम के उत्पादन में अग्रणी राज्य हैं। इसलिए वैध या अवैध कारोबार के लिए इन इलाकों में वर्षों से तस्कर, व्यापारी, पुलिस, नेता के गठजोड़ की जानकारियां केंद्रीय एजेंसियों को मिलती रहती हैं। अफीम से केमिकल्स बनाने के नाम पर अफीम मंगवाने वाली एक नामी केमिकल्स कंपनी के ट्रक रास्ते से गायब हो जाने का एक प्रकरण सामने आने पर बीस साल पहले हुई कार्रवाई में निचले स्तर के मैनेजर तक कार्रवाई सीमित रह गई। यही नहीं, जांच करने वाले एक प्रवर्तन निदेशक को ही हटा दिया गया। इसी तरह एक और ईमानदार निदेशक ने कई बड़े धंधेबाज और नेताओं से जुड़े मामले खोलने की कोशिश की, तो पहले उसका तबादला किया गया और देर-सबेर उसके मुंह खोलने की आशंका होने पर इस तरह आतंकित किया गया कि एक रात दिल का दौरा पड़ने से उसकी मृत्यु हो गई। इस तरह इसे प्राकृतिक मौत ही बताया गया।

पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों या नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़-झारखण्ड जैसे राज्यों में हथियारों के तस्कर, आतंकवादी मादक पदार्थों का सहारा लेकर ही अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। मासूम बच्चों, महिलाओं का उपयोग किया जाता है। उन्हें नशे पर निर्भर बनाकर उन्हें मरने-मारने के लिए तैयार किया जाता है। यही माफिया दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में सिगरेट, गांजे, हुक्के के माध्यम से किशोर, युवक-युवतियों को अपने जाल में फंसा रहा है। यदाकदा पुलिस कार्रवाई होती है, लेकिन समाज में यह नशीला जहर जितनी तेजी से पैर पसार रहा है, सामान्य पुलिस से काबू पाना मुश्किल लगता है।

अफ्रीका के कुछ देश या अफगानिस्तान-पाकिस्तान इस जहर के धंधे से ही पतन के कगार पर पहुंच गए हैं। लंदन-न्यूयॉर्क-पेरिस या टोक्यो और बैंकॉक जैसे शहर मादक पदार्थों के बढ़ते प्रभाव से परेशान हैं। भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई एजेंसियां विभिन्न मंत्रालयों-विभागों से जुड़ी हुई हैं। उनमें फाइलें घूमती हैं। अफसरों में प्रतियोगिता के साथ टकराव होता है। कानूनी प्रक्रिया वर्षों तक चलने से अधिकारी बदलते ही नहीं दुनिया से भी दूर चले जाते हैं। आवश्यकता इस बात कि है कि इस तरह के अपराध के लिए एक सशक्त समन्वित एजेंसी और विभाग हो तथा विश्रेष्ठ अदालतों में समय सीमा के साथ अभियुक्त दंडित हों।

दूसरी तरफ, जाने-अनजाने मीडिया का एक वर्ग भी मोह या भ्रम जाल में फंस जाता है। यदि ताजे प्रकरण की ही बात की जाए तो सुशांत सिंह मामले में जब ड्रग्स माफिया के तार जुड़े होने की आशंका सामने आने लगी तो अति प्रगतिशील कहलाने वाले नामी पत्रकारों और उनके मीडिया संस्थानों ने अन्य मीडियकर्मियों द्वारा इस मामले को तूल दिए जाने के आरोप मढ़ते हुए विरोधी अभियान ही शुरू कर दिया। यह भी संभव है कि पर्दे के पीछे उनके आका इस धंधे से लाभ कमा रहे हों। वे यह भूल जाते हैं कि ड्रग्स के जहरीले धंधों से ही बीमारी, बेरोजगारी, गरीबी, अपराध, अत्याचार बढ़ते हैं।

सरकार किसी की भी हो, समाज और भविष्य को खोखला करने वाले तत्वों को जड़ से नष्ट करना जरूरी है। जर्मनी, जापान, सिंगापुर जैसे देशों ने पूरी शक्ति लगाकर कठोरतम कानूनों से नशे के जहरीले नागपाश को नियंत्रित किया है। चीन में तो मृत्युदंड तक का प्रावधान है। भारत में मानव अधिकारों के नाम पर अतिवादियों, तस्करों, नकाबपोश धनपतियों और नेताओं के प्रश्रय से फल-फूल रहे अपराधियों को राहत नहीं दी जानी चाहिए। मुंबई से शुरू हुआ अभियान पूरे देश में जारी रखना होगा।

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क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

अमेरिका से खबर है कि सीएनएन के पत्रकार जिम अकोस्टा को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों से इतनी धमकियां मिलीं कि उन्हें निजी सुरक्षा कर्मी रखने पर मजबूर होना पड़ा

राजेश बादल by
Published - Friday, 28 August, 2020
Last Modified:
Friday, 28 August, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अमेरिका से खबर है कि सीएनएन के पत्रकार जिम अकोस्टा को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों से इतनी धमकियां मिलीं कि उन्हें निजी सुरक्षा कर्मी रखने पर मजबूर होना पड़ा। सुनने में अटपटा लगता है। प्रजातंत्र का एक बड़ा स्तंभ इस कदर उतारू हो जाए तो आप इसे कौन सा तंत्र कहेंगे? वैसे तो डोनाल्ड ट्रंप जबसे राष्ट्रपति बने हैं, पत्रकारों से उनकी कभी नहीं बनी। वहां एक तरह से लंगड़ा लोकतंत्र है।

लेकिन हम हिन्दुस्तान के लोकतंत्र और मीडिया की बात करते हैं। इन दिनों अनेक राज्यों में पत्रकारों के साथ मारपीट से लेकर उनकी हत्या तक की खबरें मिल रही हैं। क्या अर्थ लगाया जाए कि पत्रकारों को अब राज नेताओं से बचने के लिए प्रबंधकों से बॉडीगार्ड भत्ता मांगना चाहिए। भत्ता मिले या न मिले, जान सलामत रह जाए, यही बहुत है।

इसलिए आंकड़ों में नहीं जाते हुए चालीस-इकतालीस साल पहले के हिन्दुस्तान की एक घटना बताना चाहता हूं, जब हम लोगों को अपनी पत्रकारिता के शुरुआती दौर में राजनेता और प्रशासन के आपराधिक गठजोड़ से जान बचाने के लिए निजी सुरक्षा तंत्र की मदद लेनी पड़ी थी। उन दिनों जवान थे, इसलिए खोजी पत्रकारिता का जुनून था। बलात्कार की एक घटना का विरोध कर रहे जुलूस पर पुलिस ने गोलियां चलाई। कुछ लोग घायल हुए। इसकी मजिस्ट्रेट ने जांच की। गोपनीय जांच रिपोर्ट हम नौजवान पत्रकारों के हाथ लगी। हमारे एक साथी शिव अनुराग जी ने स्थानीय समाचार पत्र में छाप दिया। छपते ही हड़कंप मच गया। कलेक्टर बौखला गए। गुप्त रिपोर्ट छपी कैसे?

उन्होंने हम पत्रकारों को धमकाना शुरू कर दिया। वे पत्रकारों से रिपोर्ट का स्रोत जानना चाहते थे। हम बाध्य नहीं थे। कलेक्टर की मदद स्थानीय विधायक कर रहे थे। वे सत्ता पक्ष के थे। इसलिए हमें और मुश्किल पेश आ रही थी। डाकू समस्या वाले ज़िले में हमें जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं। इस कारण हम लोगों ने निजी सुरक्षा कर्मियों का सहारा लिया। बात बिगड़ती गई। त्रस्त हम लोगों ने भोपाल कूच किया। करीब पंद्रह पत्रकार कई दिन भोपाल की सड़कों पर भटकते रहे। आखिरकार मेहनत रंग लाई। मुख्यमंत्री को सात घंटे की मैराथन बहस के बाद ज्यूडिशियल जांच का ऐलान करना पड़ा। भारत की आजादी के बाद पत्रकारों के उत्पीड़न की जांच करने वाला पहला और अब तक का आखिरी जांच आयोग। आयोग की सुनवाई महीनों चली। पत्रकार निजी सुरक्षा में सुनवाई और गवाही के लिए जाते थे। आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति डीपी पांडे ने पत्रकारों की शिकायतें सच पाईं। कलेक्टर की भर्त्सना हुई। यही नहीं, प्रेस काउंसिल ने भी सुओमोटो जांच कराई। उसका दल जांच करने आया। उसने भी शिकायतें सच पाईं। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह पहला मौका था, जब किसी एक मामले की दो अर्धन्यायिक जांचें हुईं और दोनों में पत्रकार सच पाए गए थे। अफसोस। पत्रकार लड़ाई जीत कर भी हार गए। राज्य सरकार ने कलेक्टर और अन्य अफसरों तथा राजनेता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

राजनीति और नौकरशाही के गठजोड़ के चलते भले ही हम लोगों को न्याय नहीं मिला। मगर यहां तक अगर बात पहुंची तो इसलिए कि उस दौर की सियासत में सारे लीडर एक जैसे नहीं थे। कुछ थे, जो गन्दी राजनीति करते थे और नौकरशाही को भी अपने घिनौने खेल में घसीटते थे। हमाम में सारे नंगे नहीं थे। हम लोगों का संघर्ष अगर एक अंजाम तक पहुंचा था तो उसकी वजह यही थी कि लोकतंत्र के तीन स्तंभ मिलकर इस चौथे स्तंभ का समर्थन करते थे। आज हालत एकदम उलट गई है। दुर्भाग्य यह है कि राह भटककर पगडण्डी पर चलने वाला मीडिया भी अपने को राजमार्ग पर चलता हुआ समझता है। इस मानसिकता का क्या किया जाए? क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

इसी तर्ज पर हिन्दुस्तान में झोलाछाप मीडिया भी विकराल आकार लेता जा रहा है मिस्टर मीडिया!

मीडिया के हमाम में ये मेहमान अपने को निर्वस्त्र होते क्यों देखना चाहते हैं मिस्टर मीडिया!

इस सच को चैनलों के संपादक-प्रबंधक भुला देंगे तो वक्त के गर्त में समा जाएंगे मिस्टर मीडिया!

टीवी संस्कृति में चैनल ऐसा अध्याय लिख रहे हैं, जिसे कोई भी नहीं पढ़ेगा मिस्टर मीडिया!  

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