‘तभी मीडिया की सार्थकता है और तभी उसका मूल्य है’

एक वर्ग मीडिया को कोसने में सारी हदें पार कर रहा है तो दूसरा वर्ग मानता है कि जो हो रहा है, वह स्वाभाविक है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 23 October, 2019
Last Modified:
Wednesday, 23 October, 2019
Media

प्रो. संजय द्विवेदी।।

मीडिया की दुनिया में आदर्शों और मूल्यों का विमर्श इन दिनों चरम पर है। विमर्शकारों की दुनिया दो हिस्सों में बंट गयी है। एक वर्ग मीडिया को कोसने में सारी हदें पार कर रहा है तो दूसरा वर्ग मानता है कि जो हो रहा है, वह स्वाभाविक है तथा काल-परिस्थिति के अनुसार ही है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया में भारतीय मीडिया और समाज के पारंपरिक मूल्यों का बहुत महत्त्व नहीं है।

एक समय में मीडिया के मूल्य थे सेवा, संयम और राष्ट्र कल्याण। आज व्यावसायिक सफलता और चर्चा में बने रहना ही सबसे बड़े मूल्य है। कभी हमारे आदर्श महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, विष्णुराव पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी और गणेशशंकर विद्यार्थी थे। ताजा स्थितियों में अब सामान्यत: ऐसा दिखाई नहीं देता है। अब सिद्धांत भी बदल गए हैं। ऐसे में मीडिया को पारंपरिक चश्मे से देखने वाले लोग हैरत में हैं।

इस अंधेरे में भी कुछ लोग मशाल थामे खड़े हैं, जिनके नामों का जिक्र अकसर होता है, किंतु यह नितांत व्यक्तिगत मामला माना जा रहा है। यह मान लिया गया है कि ऐसे लोग अपनी बेचैनियों या वैचारिक आधार के नाते इस तरह से हैं और उनकी मुख्यधारा के मीडिया में जगह सीमित है। तो क्या मीडिया ने अपने नैसर्गिक मूल्यों से भी शीर्षासन कर लिया है, यह बड़ा सवाल है।

सच तो यह है भूमंडलीकरण और उदारीकरण इन दो शब्दों ने भारतीय समाज और मीडिया दोनों को प्रभावित किया है। 1991 के बाद सिर्फ मीडिया ही नहीं, पूरा समाज बदला है। उसके मूल्य, सिद्धांत, जीवनशैली में क्रांतिकारी परिर्वतन परिलक्षित हुए हैं। एक ऐसी दुनिया बन गयी है या बना दी गई है, जिसके बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है। आज भूमंडलीकरण को लागू हुए तीन दशक होने जा रहे हैं। उस समय प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंह राव और तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी शुरुआत की, तबसे हर सरकार ने कमोबेश इन्हीं मूल्यों को पोषित किया।

एक समय तो ऐसा भी आया जब अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में उदारीकरण का दूसरा दौर शुरू हुआ तो स्वयं नरसिंह रावजी ने टिप्पणी की, ‘हमने तो खिड़कियां खोली थीं, आपने तो दरवाजे भी उखाड़ दिए।’ यानी उदारीकरण-भूमंडलीकरण या मुक्त बाजार व्यवस्था को लेकर हमारे समाज में हिचकिचाहटें हर तरफ थीं। एक तरफ वामपंथी, समाजवादी, पारंपरिक गांधीवादी इसके विरुद्ध लिख और बोल रहे थे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपने भारतीय मजूदर संघ एवं स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया को प्रश्नांकित कर रहा था।

यह साधारण नहीं था कि संघ विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को ‘अनर्थ मंत्री’ कहकर संबोधित किया। खैर ये बातें अब मायने नहीं रखतीं। 1991 से 2019 तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है और सरकारें, समाज व मीडिया तीनों ‘मुक्त बाजार’ के साथ रहना सीख गए हैं। यानी पीछे लौटने का रास्ता बंद है।

बावजूद इसके यह बहस अपनी जगह कायम है कि हमारे मीडिया को ज्यादा सरोकारी, ज्यादा जनधर्मी, ज्यादा मानवीय और ज्यादा संवेदनशील कैसे बनाया जाए? व्यवसाय की नैतिकता को किस तरह से सिद्धांतों और आदर्शों के साथ जोड़ा जा सके? यह साधारण नहीं है कि अनेक संगठन आज भी मूल्य आधारित मीडिया की बहस से जुड़े हुए हैं। इनमें ब्रह्मकुमारीज और प्रो. कमल दीक्षित द्वारा चलाए जा रहे ‘मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति’ के अभियानों को देखा जाना चाहिए। प्रो. दीक्षित इसके साथ ही ‘मूल्यानुगत मीडिया’ नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन भी कर रहे हैं, जिनमें इन्हीं विमर्शों को जगह दी जा रही है।

इस सारे समय में पठनीयता का संकट, सोशल मीडिया का बढ़ता असर, मीडिया के कंटेट में तेजी से आ रहे बदलाव, निजी नैतिकता और व्यावसायिक नैतिकता के सवाल, मोबाइल संस्कृति से उपजी चुनौतियों के बीच मूल्यों की बहस को देखा जाना चाहिए। इस समूचे परिवेश में आदर्श, मूल्य और सिद्धांतों की बातचीत भी बेमानी लगने लगी है। बावजूद इसके एक सुंदर दुनिया का सपना, एक बेहतर दुनिया का सपना देखने वाले लोग हमेशा एक स्वस्थ और सरोकारी मीडिया की बहस के साथ खड़े रहेंगे। संवेदना, मानवीयता और प्रकृति का साथ ही किसी भी संवाद माध्यम को सार्थक बनाता है। संवेदना और सरोकारी समाज जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है, तो मीडिया उससे अछूता कैसे रह सकता है।

सही मायने में यह समय गहरी सांस्कृतिक निरक्षता और संवेदनहीनता का समय है। इसमें सबके बीच मीडिया भी गहरे असमंजस में है। लोक के साथ साहचर्य और समाज में कम होते संवाद ने उसे भ्रमित किया है। चमकती स्क्रीनों, रंगीन अखबारों और स्मार्ट हो चुके मोबाइल उसके मानस और कृतित्व को बदलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में मूल्यों की बात कई बार नक्कारखाने में तूती की तरह लगती है।

जब मीडिया के विमर्शकार,संचालक यह सोचने बैठेंगे कि मीडिया किसके लिए और क्यों, तब उन्हें इसी समाज के पास आना होगा। रूचि परिष्कार, मत निर्माण की अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करना होगा। क्योंकि तभी मीडिया की सार्थकता है और तभी उसका मूल्य है। लाख मीडिया क्रांति के बाद भी ‘भरोसा’ वह शब्द है जो आसानी से अर्जित नहीं होता। लाखों का प्रसार आपके प्राणवान और सच के साथ होने की गारंटी नहीं है। ‘विचारों के अनुकूलून’ के समय में भी लोग सच को पकड़ लेते हैं। मीडिया का काम सूचनाओं का सत्यान्वेषण ही है, वरना वे सिर्फ सूचनाएं होंगी,खबर या समाचार नहीं बन पाएंगी।

कोई भी मीडिया सत्यान्वेषण की अपनी भूख से ही सार्थक बनता है, लोक में आदर का पात्र बनता है। हमें अपने मीडिया को मूल्यों, सिद्धांतों और आदर्शों के साथ खड़ा करना होगा, यह शब्द आज की दुनिया में बोझ भले लगते हों पर किसी भी संवाद माध्यम को सार्थकता देने वाले शब्द यही हैं। सच की खोज कठिन है पर रुकी नहीं है। सच के साथ खड़े रहना कभी आसान नहीं था। हर समय अपने नायक खोज ही लेता है। इस कठिन समय में भी कुछ चमकते चेहरे हमें इसलिए दिखते हैं, क्योंकि वे मूल्यों के साथ, आदर्शों की दिखाई राह पर अपने सिद्धांतों के साथ डटे हैं। समय ऐसे ही नायकों को इतिहास में दर्ज करता है और उन्हें ही मान देता है। आइए भारतीय मीडिया के पारंपरिक अधिष्ठान पर खड़े होकर हम अपने वर्तमान को सार्थक बनाएं।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में प्रोफेसर हैं)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

प्राइम टाइम का एजेंडा भी अब वर्चुअल दुनिया से ही तय होने लगा है: राजदीप सरदेसाई

क्या न्यूज टीवी नफरतियों की आवाज बन रही है? इसका संक्षिप्त जवाब है, हां। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज साम्प्रदायिक जहर उगलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है।

Last Modified:
Thursday, 23 June, 2022
tvchannel5412

प्राइम टाइम का एजेंडा भी अब वर्चुअल दुनिया के हो-हल्ले से ही तय होने लगा 

‘क्या न्यूज टीवी नफरतियों की आवाज बन रही है? इसका संक्षिप्त जवाब है, हां। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज साम्प्रदायिक जहर उगलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है।‘ ये कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का। उनका ये आर्टिकल हाल ही में हिंदी दैनिक अखबार ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप ज्यों का त्यों यहां पढ़ सकते हैं-

नूपुर शर्मा विवाद के बाद से भारतीय टीवी न्यूज मीडिया की सर्वत्र आलोचना की जा रही है। लेफ्ट-लिबरलों का कहना है कि न्यूज टीवी नफरतियों के लिए बोलने का मंच बन रही है। वहीं दक्षिणपंथियों और विशेषकर हिंदुत्ववादियों का कहना है कि न्यूज टीवी पर सिलेक्टिव रोष जताया जाता है और उस पर मुस्लिम कट्‌टरपंथी कुछ भी बोलने के बावजूद बच निकलते हैं। तो आखिर सच्चाई क्या है?

सबसे पहले लेफ्ट-लिबरलों का तर्क लेते हैं। क्या न्यूज टीवी नफरतियों की आवाज बन रही है? इसका संक्षिप्त जवाब है, हां। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज साम्प्रदायिक जहर उगलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। 1990 के दशक में सरकारी तंत्र द्वारा संचालित दूरदर्शन के एकाधिकार से मुक्त होने के बाद जब निजी न्यूज चैनल सामने आई थीं, तब उनमें वैसी गलाकाट स्पर्धा नहीं थी, जैसी आज दिखलाई देती है।

जब टीवी न्यूज इंडस्ट्री नई थी तो सम्पादकों और पत्रकारों पर बाजार का दबाव नहीं था और वे जर्नलिज्म-फर्स्ट की नीति से काम कर सकते थे। लेकिन आज देश में 24 घंटे चलने वाली कोई चार सौ न्यूज चैनल हैं और अधिक से अधिक दर्शकों को अपने खेमे में लाने की मारामारी है, जिससे सनसनी रचने की होड़ मची हुई है। यही कारण है कि आज न्यूज टीवी पर जो डिबेट-फॉर्मेट प्रचलित है, उसमें होने वाली बहसें बहुत ध्रुवीकृत हो जाती हैं।

पहले जमीनी रिपोर्ट ही न्यूज का स्रोत होती थीं, लेकिन अब टीवी स्टूडियो में बैठे लार्जर-दैन-लाइफ एंकर्स खबर के बजाय शोरगुल की संस्कृति रचने में व्यस्त हो चुके हैं। अब तो बहस का स्वरूप भी आमूलचूल बदल गया है। मुझे याद आता है कि 1990 के दशक में एक बार मैंने वरिष्ठ कांग्रेस नेता वी.एन.गाडगिल को सेकुलरिज्म पर लिखे उनके एक निबंध पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया था।

मेरी योजना थी कि दूसरा पहलू अरुण शौरी रखेंगे, जो कि गाडगिल जितने ही प्रखर बौद्धिक थे। लेकिन गाडगिल ने यह कहते हुए मना कर दिया कि मैं एक गम्भीर विषय को तू-तू-मैं-मैं में नहीं बदलना चाहता। उस जमाने में किसी विषय पर चर्चा या बहस के लिए दो या तीन मेहमानों को ला पाना कठिन था, लेकिन आज टीवी चैनल पर दस-दस विश्लेषक होते हैं और वे एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते रहते हैं।

यह केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में हो रहा है, जिससे समाचार-संकलन की परम्परागत पत्रकारिता खत्म होती जा रही है। टीआरपी नामक दोषपूर्ण रेटिंग सिस्टम के प्रभाव में आकर अनेक न्यूज चैनल यह मान बैठे हैं कि धार्मिक मसलों पर शोरगुल वाली बहसें करने से ही दर्शक मिलेंगे। वैसे में महंगाई या अर्थव्यवस्था जैसे नीरस समझे जाने वाले विषयों पर कोई चैनल क्यों डिबेट करेगा।

अमेरिका में फॉक्स न्यूज नफरत से मुनाफा कमाने के लिए बदनाम है। जबकि भारत की न्यूज-चैनल तो अब फॉक्स से भी आगे चली गई हैं। लेकिन जब समाज में ही हेट-स्पीच आम हो गई हो तो अकेले न्यूज-टीवी को दोष देने से क्या होगा? इस साल की शुरुआत में एक हेट स्पीच ट्रैकर ने बताया था कि 2014 के बाद से मीडिया में असंसदीय भाषा के इस्तेमाल की सुनामी आ गई है। अब जरा दक्षिणपंथियों की दलील पर बात कर लें।

याद करें कि लगभग एक दशक पूर्व अमेरिका में फॉक्स न्यूज का उदय ही इसलिए हुआ था, क्योंकि दक्षिणपंथी राजनेताओं को आपत्ति थी कि मुख्यधारा के अमेरिकी न्यूज-मीडिया पर लेफ्ट-लिबरलों का दबदबा है। शुरू में फॉक्स न्यूज भी फेयर एंड बैलेंस्ड की बात करती थी। धीरे-धीरे दक्षिणपंथियों और उनकी बातों को मीडिया में अधिक स्पेस मिलने लगा।

अगर भारत के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो इस आरोप से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक जमाने में हमारे मीडिया में हिंदुत्ववादियों के विचारों को कोई जगह नहीं दी जाती थी। लेकिन 1992 के बाद जब भाजपा भारतीय राजनीति की धुरी बन गई, तो बदलाव नजर आने लगा।

पहले लेफ्ट-लिबरल्स नैरेटिव बनाते और चलाते थे, लेकिन अब बहुतेरे न्यूजरूम में दक्षिणपंथियों की तूती बोलती है। यह बात भी एक भ्रम ही है कि न्यूज टीवी में अल्पसंख्यक समुदाय के कट्‌टरपंथियों को बढ़ावा दिया जाता है। अधिकतर समय तो टीवी बहसों में टोपीधारी मुस्लिम प्रवक्ताओं का मखौल ही उड़ाया जाता है और उनका एक बुरा चेहरा सामने रखा जाता है। इनमें से कुछ टीवी-मौलानाओं की तो प्रामाणिकता भी संदिग्ध है।

नूपुर शर्मा विवाद न्यूज-टीवी के लिए भले खतरे की घंटी हो, लेकिन अब सोशल मीडिया ही सार्वजनिक चर्चाओं की दशा-दिशा तय करने लगा है। आज अनेक न्यूज चैनल ट्विटर ट्रेंड्स को फॉलो करती हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

(साभार: दैनिक भास्कर)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

शाकाहारी होने का अर्थ हिंदू या काफिर होना नहीं है: डॉ. वैदिक

मालदीव की राजधानी माले में एक अजीब-सा हादसा हुआ। 21 जून को योग-दिवस मनाते हुए लोगों पर हमला हो गया। काफी तोड़-फोड़ हो गई।

Last Modified:
Thursday, 23 June, 2022
maldives54454

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

माले में योग का विरोध क्यों ?

मालदीव की राजधानी माले में एक अजीब-सा हादसा हुआ। 21 जून को योग-दिवस मनाते हुए लोगों पर हमला हो गया। काफी तोड़-फोड़ हो गई। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। मालदीव में यह योग-दिवस पहली बार नहीं मनाया गया था। 2015 से वहां बराबर योग-दिवस मनाया जाता है। उसमें विदेशी कूटनीतिज्ञ, स्थानीय नेतागण और जन-सामान्य लोग होते हैं।

इन योग-शिविरों में देसी-विदेशी या हिंदू-मुसलमान का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता है। इसके दरवाजे सभी के लिए खुले होते हैं। यह योग-दिवस सिर्फ भारत में ही नहीं मनाया जाता है। यह दुनिया के सभी देशों में प्रचलित है, क्योंकि संयुक्तराष्ट्र संघ ने इस योग-दिवस को मान्यता दी है।

मालदीव में इसका विरोध कट्टर इस्लामी तत्वों ने किया है। उनका कहना है कि योग इस्लाम-विरोधी है। उनका यह कहना यदि ठीक होता तो संयुक्तराष्ट्र संघ के दर्जनों इस्लामी देशों ने इस पर अपनी मोहर क्यों लगाई है? उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया? क्या मालदीव के कुछ उग्रवादी इस्लामी लोग सारी इस्लामी दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं?

सच्चाई तो यह है कि मालदीव के ये विघ्नसंतोषी लोग इस्लाम को बदनाम करने का काम कर रहे हैं। इस्लाम का योग से क्या विरोध हो सकता है? क्या योग बुतपरस्ती सिखाता है? क्या योगाभ्यास करने वालों से यह कहा जाता है कि तुम नमाज़ मत पढ़ा करो या रोजे मत रखा करो? वास्तव में नमाज और रोज़े, एक तरह से योगासन के ही सरल रूप हैं। यह ठीक है कि योगासन करने वालों से यह कहा जाता है कि वे शाकाहारी बनें। शाकाहारी होने का अर्थ हिंदू या काफिर होना नहीं है। कुरान शरीफ की कौनसी आयत कहती है कि जो शाकाहारी होंगे, वे घटिया मुसलमान माने जाएंगे? जो कोई मांसाहार नहीं छोड़ सकता है, उसके लिए भी योगासन के द्वार खुले हुए हैं।

योग का ताल्लुक किसी मजहब से नहीं है। यह तो उत्तम प्रकार की मानसिक और शारीरिक जीवन और चिकित्सा पद्धति है, जिसे कोई भी मनुष्य अपना सकता है। क्या मुसलमानों के लिए सिर्फ वही यूनानी चिकित्सा काफी है, जो डेढ़-दो हजार साल पहले अरब देशों में चलती थी? क्या उन्हें एलोपेथी, होमियोपेथी और नेचरोपेथी का बहिष्कार कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! आधुनिक मनुष्य को सभी नई और पुरानी पेथियों को अपनाने में कोई एतराज क्यों होना चाहिए? इसीलिए यूरोप और अमेरिका में एलोपेथी चिकित्सा इतनी विकसित होने के बावजूद वहां के लोग बड़े पैमाने पर योग सीख रहे हैं, क्योंकि योग सिर्फ चिकित्सा ही नहीं है, यह शारीरिक और मानसिक रोगों के लिए चीन की दीवार की तरह सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम भी है।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

डॉ. वैदिक बोले, मोदी सरकार की इसी कमी की वजह से सैन्यपथ बना 'अग्निपथ'

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था, अग्निपथ योजना के विरुद्ध चला आंदोलन पिछले सभी आंदोलन से भयंकर सिद्ध होगा।

Last Modified:
Monday, 20 June, 2022
agnipath45421

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सैन्यपथ बन गया अग्निपथ!

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था, अग्निपथ योजना के विरुद्ध चला आंदोलन पिछले सभी आंदोलन से भयंकर सिद्ध होगा। वही अब सारे देश में हो रहा है। पहले उत्तर भारत के कुछ शहरों में हुए प्रदर्शनों में नौजवानों ने थोड़ी-बहुत तोड़-फोड़ की थी, लेकिन अब पिछले दो दिनों में हम जो दृश्य देख रहे हैं, वैसे भयानक दृश्य मेरी याददाश्त में पहले कभी नहीं देखे गए। दर्जनों रेलगाड़ियों, स्टेशनों और पेट्रोल पंपों में आग लगा दी गई, कई बाजार लूट लिए गए, कई कारों, बसों और अन्य वाहनों को जला दिया गया और घरों व सरकारी दफ्तरों को भी नहीं छोड़ा गया। अभी तक पुलिस इन प्रदर्शनकारियों का मुकाबला बंदूकों से नहीं कर रही है, लेकिन यही हिंसा विकराल होती गई तो पुलिस ही नहीं, सेना को भी बुलाना पड़ जाएगा।

कोई आश्चर्य नहीं कि अगर सरकार का पारा गर्म हो गया तो भारत में चीन के त्येन आन मान स्कवेयर की तरह भयंकर हत्याकांड शुरू हो सकता है। मुझे विश्वास है कि मोदी सरकार इस तरह का कोई बर्बर और हिंसक कदम नहीं उठाएगी। ऐसा कदम उठाते समय हो सकता है कि छात्रों और नौजवानों को भड़काने का दोष विपक्षी नेताओं के मत्थे मढ़ा जाए, लेकिन मैं पहले ही कह चुका हूं कि नौजवानों का यह आंदोलन स्वतः स्फूर्त है। इसका कोई नेता नहीं है। यह किसी के उकसाने पर शुरू नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि विरोधी दल अब इस आंदोलन का फायदा उठाने के लिए इसका डटकर समर्थन करने लगें, जैसा कि उन्होंने करना शुरू कर दिया है। इस आंदोलन से डरकर सरकार ने कई नई रियायतों की घोषणाएं जरूर की हैं और वे अच्छी हैं।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का रवैया काफी रचनात्मक है और भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने तो यहां तक कह दिया है कि चार साल तक फौज में रहने वाले जवान को वे अपने दफ्तर में सबसे पहले मौका देंगे। चार साल का फौजी अनुभव रखने वाले जवानों को कहीं भी उपयुक्त रोजगार मिलना ज्यादा आसान होगा। इसके अलावा इस अग्निपथ योजना का लक्ष्य भारतीय सेना को आधुनिक और शक्तिशाली बनाना है और पेंशन पर खर्च होने वाले पैसे को बचाकर उसे आधुनिक शास्त्रास्त्रों की खरीद में लगाना है।

अमेरिका, इस्राइल तथा कई अन्य शक्तिशाली देशों में भी कमोबेश इसी प्रणाली को लागू किया जा रहा है लेकिन मोदी सरकार की यह स्थायी कमजोरी बन गई है कि वह कोई भी बड़ा देशहितकारी कदम उठाने के पहले उससे सीधे प्रभावित होने वाले लोगों की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश नहीं करती। जो गलती उसने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने, नोटबंदी करने और नागरिकता कानून लागू करते वक्त की वही गलती उसने अग्निपथ पर चलने की कर दी! यह सैन्य-पथ स्वयं सरकार का अग्निपथ बन गया है। अब वह भावी फौजियों के लिए कितनी ही रियायतें घोषित करती रहे, इस आंदोलन के रुकने के आसार दिखाई नहीं पड़ते। यह अत्यंत दुखद है कि जो नौजवान फौज में अपने लिए लंबी नौकरी चाहते हैं, उनके व्यवहार में आज हम घोर अनुशासनहीनता और अराजकता देख रहे हैं। क्या ये लोग फौज में भर्ती होकर भारत के लिए यश अर्जित कर सकेंगे? सच्चाई तो यह है कि हमारी सरकार और ये नौजवान, दोनों ही अपनी-अपनी मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

‘सिर्फ मीडिया ही नहीं, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी लीजेंड व्यक्तित्व थे अभय ओझा’

जब से मैं मीडिया वर्ल्ड में आया, तभी से उनकी काबिलियत और इंसानियत को लेकर उनके साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हो गए थे। मगर साथ जुड़ने का मौका ‘न्यूज नेशन’ में मिला।

Last Modified:
Sunday, 19 June, 2022
Abhay Ojha

सैयद तारिक अहमद,
सीनियर सेल्स पर्सन।।

अभय ओझा, सिर्फ मीडिया इंडस्ट्री ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी एक लीजेंड व्यक्तित्व थे। ये ‘थे’ लिखना मेरे लिए कितना कठिन होगा, इससे महसूस कर सकते हैं कि एक रोज पहले ही हमारी उनसे बात हुई थी  और भविष्य को लेकर कई ताने-बाने हम दोनों ने बुने थे  और आज सुबह चार बजे वह ‘थे’ हो गए।

जब से मैं मीडिया वर्ल्ड में आया, तभी से उनकी काबिलियत और इंसानियत को लेकर उनके साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हो गए थे। मगर साथ जुड़ने का मौका ‘न्यूज नेशन’ में मिला। महज छह महीने के उस साथ में वो मेरे लीजेंड से कब बड़े भाई बन गए, पता ही नहीं चला। आज मेरे ऊपर से अभय ओझा यानी मेरे लीजेंड का साया उठ गया।

अब ऐसा लग रहा है कि मेरे गुरूर, मेरे गुरु ओझा जी को अपने जीवन का अनमोल समय इस दुनिया को देना था। ऊपर वाले ने उन्हें बुलाकर हम लोगों को तन्हा कर दिया है। पर लगता है कि अच्छे लोगों की जरूरत सिर्फ हमें ही नहीं, बल्कि ऊपर वाले को भी होती है। कहने को तो बहुत कुछ है, पर लिख नहीं पा रहा हूं। कोरोना के समय जब मेरा पूरा परिवार कोरोना की चपेट में था तो फोन करना और मेरी जरूरत को जानने की कोशिश करना, उनका रोजाना का नियम था।

और आज ऐसा है कि वो चुपचाप चले गए और हम कुछ कर नहीं सके। ये मुझे पूरी जिंदगी सालता रहेगा। मेरे गुरु, मेरे लीजेंड, आपको मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि। अल्लाह आपकी आत्मा को शांति दे। खुदा हाफिज अभय ओझा सर।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पूरन डावर ने बताया, देश का व्यापारिक संतुलन बिगड़ने के पीछे क्या है बड़ा कारण

कोई भी साम्यवादी देश या अप्रजातांत्रिक देश किसी का सगा नहीं हो सकता। नाटो विश्व शांति के लिए कभी खतरा नहीं, बल्कि शांति के लिए आवश्यक है।

पूरन डावर by
Published - Wednesday, 15 June, 2022
Last Modified:
Wednesday, 15 June, 2022
Puran Dawar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

हम आजादी के बाद सोवियत गुट में रहे। ऐसे में बड़ी योजनाएं रूस के साथ, सारा आयुध रूस से...स्वाभाविक है। इसे रूस की आपके कठिन समय पर सहायता कहें या अपना उद्देश्य, मेरा मानना है कि कोई भी साम्यवादी देश या अप्रजातांत्रिक देश किसी का सगा नहीं हो सकता। अमेरिका के सहयोग से भारत की स्थिति बेहतर रहती।

परमाणु अविस्तार नीति विश्व शांति के लिए सदैव आवश्यक है। भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया, केवल यूक्रेन ने ही नहीं, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूके व यूरोप सहित लगभग सबने प्रतिबंध लगाए। मेरा मानना है कि जब तक देश पूरी तरह परिपक्व न हो जाए और परमाणु हथियार का इस्तेमाल अंतिम उपाय के रूप में यदि जरूरी न हो, तब तक उसका प्रयोग रोकना आवश्यक है। यह बात अलग है कि हमारी सीमा के असुरक्षित होने और पाकिस्तान के भी परमाणु संपन्न होने के कारण अपनी रक्षा के लिए और एक बड़े लोकतंत्र के नाते हमें इनकी आवश्यकता थी, लेकिन हमने पहले इनका इस्तेमाल न करने पर अपनी प्रतिबद्धता रखी।

समय आने पर बुश ने स्वयं भारत के साथ परमाणु संधि की, उसके पीछे का उद्देश्य स्पष्ट था। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हमें इसे हर हाल में बचाना होगा। यह अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा के अनुरूप है। नाटो विश्व शांति के लिए कभी खतरा नहीं, बल्कि शांति के लिए आवश्यक है। इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान में जंगलराज था। यह अपने देशवासियों के उत्पीड़न सहित पूरे विश्व के लिए खतरा थे। इन देशों को दुरुस्त करना और प्रजातंत्र के लिए प्रयास करना अमेरिका के मूल उद्देश्यों में है।

भारत के आगे पाक एक कमजोर देश था। यदि भारत की आक्रामकता कहीं अमेरिका ने समझी तो बचाव का प्रयास किया। यद्यपि भारतीय के नाते हम इसका समर्थन नहीं कर सकते। अमेरिका एवं रूस में हमेशा शीत युद्ध रहा है। साम्यवादी देश क्यूबा उस महाद्वीप में है और अमेरिका का उद्देश्य हर देश को स्वतंत्र और हर देश में प्रजातंत्र है। (refer to Jefferson Declaration of Independence)

नाटो का सदस्य बनने मात्र से रूस को खतरा हो सकता है, इसलिए यूक्रेन को समाप्त कर दिया जाए, बजाय इसके अपनी शक्ति को बड़ा कर संभावित खतरे से लड़ने की क्षमता बनाए। रूस से सटे अनेक देश नाटो के सदस्य हैं। रूस पर कब हमला हो गया जो यूक्रेन के नाटो सदस्य बनने के बाद हो जाता। वास्तविकता यह है कि यूक्रेन, रूस के खतरे से अपने आपको बचाने और सुरक्षित करने के लिए ही नाटो की सदस्यता चाहता था। उसे रूस से खतरा था, यह इस युद्ध ने सिद्ध कर दिया।

यूक्रेन को बलि का बकरा नहीं बनाया, बल्कि अमेरिका न युद्ध को टालने के हर संभव प्रयास किए। धमकी भी दीं, लेकिन रूस नहीं माना और यूक्रेन अभी नाटो का सदस्य बना नहीं। ऐसे में अमेरिका यदि बीच में सीधे कूदता तो विश्वयुद्ध उसी दिन शुरू हो जाना था। वह यूक्रेन की यथासंभव मदद कर रहा है और जब तक विश्व युद्ध टल सके, टाल रहा है।

मैं निर्यातक हूं। सोवियत ट्रेड को नजदीक से देखा है। बंद अर्थव्यवस्था के कारण पूरा दोहन भारत का हुआ है। भारत के व्यापारिक संतुलन बिगड़ने का बड़ा कारण यह रहा है। अनेक उदाहरण और संस्मरण हैं, पूरा एक अलग लेख लिखा जा सकता है। यह मेरे निजी विचार और सोच है। विचारधाराओं में भिन्नता समाज का एक भाग है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

भारत से कमजोर हुए रिश्ते, तो कम हुई अमेरिका की चौधराहट: राजेश बादल

अमेरिका इन दिनों परेशान है। उसकी चौधराहट पर अब सीधे-सीधे सवाल उठने लगे हैं।

Last Modified:
Tuesday, 14 June, 2022
IndiAmerica5454

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अमेरिका इन दिनों परेशान है। उसकी चौधराहट पर अब सीधे-सीधे सवाल उठने लगे हैं। मुल्क के भीतर राष्ट्रपति जो बाइडेन की लोकप्रियता में कमी का एक कारण यह भी है। उनकी अपनी पार्टी में ही अप्रूवल रेटिंग में नौ फीसदी गिरावट ने उनके नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

कोरोना काल के दौरान चीन से दूरी और बढ़ी। रूस-यूक्रेन जंग के दौरान रूस से संबंध बेहद खराब हुए और उसके बाद भारत के रूस का साथ देने के कारण भारत से उसने दूरी बना ली। एशिया के तीन बड़े देशों भारत, चीन और रूस (रूस यूरोप और एशिया में बंटा हुआ है) में से भारत के साथ उसके संबंध मधुर थे, लेकिन उसे एक संप्रभु मित्र नहीं, बल्कि एक पिछलग्गू देश की जरूरत थी।

भारत की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के चलते ऐसा होना संभव नहीं था। जब भारत के रिश्ते अच्छे माने जा रहे थे, तब भी वह एकपक्षीय यातायात जैसा था। अब एक बार फिर वह कोशिश में है कि भारत के साथ सामान्य संबंध बहाल हों। यद्यपि भारत ने अपनी ओर से अमेरिका के साथ किसी अनुबंध, संधि या गठबंधन से बाहर आने का ऐलान नहीं किया है। पर, संबंधों में आई खटास के कारण भी किसी तिलिस्मी पर्दे में नहीं छिपे हैं।

अब अमेरिका किसी भी कीमत पर भारत और चीन के रिश्ते सामान्य होते नहीं देखना चाहता। वह अपनी ओर से इस बारे में सारे प्रयास कर चुका है। उसके एक उप सुरक्षा सलाहकार तो भारत यात्रा के दौरान एक तरह से धमका कर गए थे। उन्होंने कहा था कि भारत पर जब चीन का हमला होगा तो रूस नहीं बल्कि अमेरिका ही मदद के लिए सामने आएगा।

इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था। दशकों तक अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के बीच निरंतर आग में घी डालने का काम किया है। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ बातचीत में भी उसने भारत को भरोसे में नहीं लिया था। हालिया घटनाक्रम एक बार फिर इस बात की पुष्टि करता है।

हाल ही में अमेरिकी फौज के एक कमांडर जनरल चार्ल्स एफ्लिन दिल्ली आए थे। उन्होंने बाकायदा पत्रकारों से बात की और भारत को आगाह किया कि उसे चीन से लद्दाख क्षेत्र में सावधान रहने की जरूरत है। चीन वहां सामरिक नजरिये से महत्वपूर्ण ढांचे बना रहा है। किसी तीसरे देश के जनरल की ऐसी टिप्पणी तनिक अटपटी थी। भारत आकर उसका कोई आला फौजी अधिकारी चीन के लिए इस आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करे, यह अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार के अनुकूल नहीं है।

निश्चित रूप से इसके पीछे चीन को उकसाने की मंशा भी छिपी थी। लिहाजा अगले ही दिन चीन ने अमेरिका को आड़े हाथों लिया और उसके जनरल के बयान की निंदा की। चीनी प्रवक्ता झाओली झियन ने अमेरिकी फौजी के बयान को खारिज कर दिया और कहा कि वह भारत और चीन के बीच बेवजह तनाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का मसला है। इसे आपसी बातचीत से निपटाने की कोशिशें जारी हैं। प्रवक्ता ने कहा कि ‘दोनों पक्ष विवाद को संवाद और विचार-विमर्श के जरिये सुलझाने के इच्छुक हैं। उनमें ऐसा करने की क्षमता भी है। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने तनाव बढ़ाने और दोनों देशों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश की है। ये शर्मनाक है।’

इसके बाद भी बयान युद्ध जारी रहा। अमेरिका की ओर से उत्तेजक टिप्पणियां रुकी नहीं और उसके रक्षा मंत्री जेम्स ऑस्टिन ने सिंगापुर में चीन के आक्रामक रवैये पर गहरी चिंता जताई। दिलचस्प यह कि उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने दोस्तों के साथ खड़ा रहेगा।

भारत खामोशी से दोनों महाशक्तियों के बीच इस अंताक्षरी को देख रहा है। कहा जाए तो इस मसले पर वह तनिक दुविधा में भी है। अमेरिका और भारत के बीच संबंधों में अनेक अवसर आए हैं, जब अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय हितों के लिए भारत के हितों को नजरअंदाज किया है। भारत ने दुनिया के चौधरी की इस दबंगई को एक-दो मर्तबा सकुचाते-सकुचाते स्वीकार भी किया है।

एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में जिस तरह परमाणु अप्रसार के मसले पर ईरान की घेराबंदी की गई थी, उससे अमेरिका के यूरोप के साथी ही संतुष्ट नहीं थे। इसके बावजूद भारत ने अपने अनेक आर्थिक, कारोबारी, सामरिक और सियासी हितों को छोड़ते हुए ईरान से कच्चे तेल का आयात एक तरह से रोक दिया। भारत को नुकसान तो हुआ ही, ईरान से सदियों पुराने संबंधों को भी झटका लगा था। ईरान के लिए भी हिन्दुस्तान का यह रवैया अप्रत्याशित था।

इससे अमेरिका को भ्रम हुआ कि वह जो भी चाहेगा हिन्दुस्तान से करा लेगा। पर वह समझने को तैयार नहीं है कि उसके देश के हित हर लोकतांत्रिक देश के हित नहीं हो सकते। भारत और रूस के संबंध अपने विशिष्ट कारणों से हमेशा बने रहेंगे। वे एशिया में शक्ति संतुलन का काम भी करते हैं। क्या भारत एक साथ पाकिस्तान, चीन और रूस के साथ शत्रुतापूर्ण रिश्ते रख सकता है, खासतौर पर उन स्थितियों में जबकि रूस ने कई बार आड़े वक़्त पर भारत की मदद की है।

कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में उसने भारत के लिए अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के मामले में भी उसने खुलकर भारत का साथ दिया है।

अमेरिका को यह हकीकत समझनी होगी। उसे ध्यान रखना चाहिए कि एक परखे हुए दोस्त को बार-बार धोखा देने वाला कभी भरोसेमंद नहीं हो सकता। भारत एक लोकतांत्रिक सहयोगी के रूप में उसका शुभचिंतक तो हो सकता है, मगर जब-जब परीक्षा की घड़ी आएगी, भारत को पहले अपने राष्ट्रीय हित देखने ही होंगे।

(साभार: लोकमत)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

 ‘विश्व मंचों पर हिंदी के साथ हो रहे अन्याय के बीच यह छोटी सी खुशखबरी है’

संयुक्तराष्ट्र संघ में अभी भी दुनिया की सिर्फ छह भाषाएं आधिकारिक रूप से मान्य हैं। अंग्रेजी, फ्रांसीसी, चीनी, रूसी, हिस्पानी और अरबी!

Last Modified:
Monday, 13 June, 2022
hindi45451

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हिंदी के लिए खुला विश्व-द्वार

संयुक्तराष्ट्र संघ में अभी भी दुनिया की सिर्फ छह भाषाएं आधिकारिक रूप से मान्य हैं। अंग्रेजी, फ्रांसीसी, चीनी, रूसी, हिस्पानी और अरबी! इन सभी छह भाषाओं में से एक भी भाषा ऐसी नहीं है, जो बोलने वालों की संख्या, लिपि, व्याकरण, उच्चारण और शब्द-संख्या की दृष्टि से हिंदी का मुकाबला कर सकती हो। इस विषय की विस्तृत व्याख्या मेरी पुस्तक 'हिंदी कैसे बने विश्वभाषा?' में मैंने की है। यहां तो मैं इतना ही बताना चाहता हूं कि हिंदी के साथ भारत में ही नहीं, विश्व मंचों पर भी घनघोर अन्याय हो रहा है लेकिन हल्की-सी खुशखबर अभी-अभी आई है।

संयुक्तराष्ट्र संघ की महासभा ने अपने सभी 'जरूरी कामकाज' में अब उक्त छह आधिकारिक भाषाओं के साथ हिंदी, उर्दू और बांग्ला के प्रयोग को भी स्वीकार कर लिया है। ये तीन भाषाएं भारतीय भाषाएं हैं, हालांकि पाकिस्तान और बांग्लादेश को विशेष प्रसन्नता होनी चाहिए, क्योंकि बांग्ला और उर्दू उनकी राष्ट्रभाषाएं हैं। यह खबर अच्छी है लेकिन अभी तक यह पता नहीं चला है कि संयुक्तराष्ट्र के किन-किन कामों को 'जरूरी' मानकर उनमें इन तीनों भाषाओं का प्रयोग होगा। क्या उसके सभी मंचों पर होने वाले भाषणों, उसकी रपटों, सभी प्रस्तावों, सभी दस्तावेजों, सभी कार्रवाइयों आदि का अनुवाद इन तीनों भाषाओं में होगा? क्या इन तीनों भाषाओं में भाषण देने और दस्तावेज़ पेश करने की अनुमति होगी? ऐसा होना मुझे मुश्किल लग रहा है लेकिन धीरे-धीरे वह दिन आ ही जाएगा, जबकि हिंदी संयुक्तराष्ट्र की सातवीं आधिकारिक भाषा बन जाएगी। हिंदी के साथ मुश्किल यह है कि वह अपने घर में ही नौकरानी बनी हुई है, तो उसे न्यूयॉर्क में महारानी कौन बनाएगा? हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और हिंदी देश में अधमरी (अर्धमृत) पड़ी हुई है। कानून-निर्माण, उच्च शोध, विज्ञान विषयक अध्यापन और शासन-प्रशासन में अभी तक उसे उसका उचित स्थान नहीं मिला है।

जब 1975 में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ था, तब भी मैंने यह मुद्दा उठाया था और 2003 में सूरिनाम के विश्व हिंदी सम्मेलन में मैंने हिंदी को सं.रा. की आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित करवाया था। 1999 में भारतीय प्रतिनिधि के नाते संयुक्तराष्ट्र में मैंने अपने भाषण हिंदी में देने की कोशिश की, लेकिन मुझे अनुमति नहीं मिली। केवल अटलजी और नरेंद्र मोदी को अनुमति मिली, क्योंकि हमारी सरकार को उसके लिए कई पापड़ बेलने पड़े थे। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भरसक कोशिश की कि हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिले, लेकिन कोई मुझे यह बताए कि हमारे कितने भारतीय नेता और अफसर वहां जाकर हिंदी में अपना काम-काज करते हैं? जब देश में सरकार का सारा महत्वपूर्ण काम-काज (वोट मांगने के अलावा) अंग्रेजी में होता है तो संसार में वह अपना काम-काज हिंदी में कैसे करेगी? अंग्रेजी की इस गुलामी के कारण भारत दुनिया की अन्य समृद्ध भाषाओं का भी लाभ लेने से खुद को वंचित रखता है। देखें, शायद संयुक्त राष्ट्र की यह पहल भारत को अपनी भाषायी गुलामी से मुक्त करवाने में कुछ मददगार साबित हो जाए!

(डॉ. वैदिक भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

नई पीढ़ी के लिए दृष्टांत हैं प्रो. संजय द्विवेदी की किताब ‘न हन्यते’ के स्मृति लेख

प्रो. संजय द्विवेदी की उदार लोकतांत्रिक चेतना का प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘न हन्यते’ है। इस पुस्तक में दिवंगत हुए परिचितों, महापुरुषों के प्रति आत्मीयता से ओत-प्रोत संस्मरण और स्मृति लेख हैं।

Last Modified:
Monday, 13 June, 2022
Book Review

प्रो. कृपाशंकर चौबे।।

प्रो. संजय द्विवेदी की उदार लोकतांत्रिक चेतना का प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘न हन्यते’ है। ‘न हन्यते' पुस्तक में दिवंगत हुए परिचितों, महापुरुषों के प्रति आत्मीयता से ओत-प्रोत संस्मरण और स्मृति लेख हैं। ये स्मृति लेख नई पीढ़ी के लिए दृष्टांत हैं कि अपने समय के आदरणीयों को श्रद्धांजलि देते समय कैसी उदारता अपेक्षित है। एक साथ इतने विविध विचारधाराओं के लोगों के संपर्क में आना और अपने हृदय में उन्हें स्थान देना, संजय द्विवेदी की संवेदनशीलता और उनके उदारमना व्यक्तित्व को दर्शाती है। उनके जैसा संवेदनशील लेखक ही कह सकता है कि मृत्यु के बाद भी अपने पितरों को स्मृतियों में रखकर उनका पूजन, अर्चन करने वाली प्रकृति जीवित माता-पिता के अपमान को क्या सह पाएगी?

द्विवेदी का यह प्रश्न क्या चीख नहीं बन जाता? संजय द्विवेदी कहते हैं कि टूटते परिवारों, समस्याओं और अशांति से घिरे समाज का चेहरा हमें यह बताता है कि हमने अपने पारिवारिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ किया है। अपनी परंपराओं का उल्लंघन किया है। मूल्यों को बिसराया है। इसके कुफल हम सभी को उठाने पड़ रहे हैं। आज फिर एक ऐसा समय आ रहा है जब हमें अपनी जड़ों की ओर झांकने की जरूरत है। बिखरे परिवारों और मनुष्यता को एक करने की जरूरत है। भारतीय संस्कृति के उन उजले पन्नों को पढ़ने की जरूरत है जो हमें अपने बड़ों का आदर सिखाते हैं। जो पूरी प्रकृति से पूजा एवं सद्भावना का रिश्ता रखते हैं। जहां कलह, कलुष और अवसरवाद के बजाय प्रेम, सद्भावना और संस्कार हैं।

पितृऋण-मातृऋण से मुक्ति इसी में है कि हम उन आदर्श परंपराओं का अनुगमन करें, उस रास्ते पर चलें जिन पर चलकर हमारे पुरखों ने इस देश को विश्वगुरु बनाया था। पूरी दुनिया हमें आशा के साथ देख रही है। हमारी परिवार नाम की संस्था, हमारे रिश्ते और उनकी सघनता-सब कुछ दुनिया के लिए आश्चर्यलोक ही हैं। हम उनसे न सीखें जो पश्चिमी भोगवाद में डूबे हैं, हमें पूरब के ज्ञान-अनुशासन के आधार पर एक नई दुनिया बनाने के लिए तैयार होना है। श्रवण कुमार, भगवान राम जैसी कथाएं हमें प्रेरित करती हैं, अपनों के लिए सब कुछ उत्सर्ग करने की प्रेरणा देती हैं। मां, मातृभूमि, पिता, पितृभूमि इसके प्रति हम अपना सर्वस्व अर्पित करने की मानसिकता बनाएं, यही इस समय का संदेश है। इसी से प्रेरित होकर संजय द्विवेदी ने अपनी किताब 'न हन्यते' को अपने समय के नायकों को याद करने का ही निमित्त बनाया है। यह एक परंपरा का पाठ है जिसमें हम अपने दिवंगत वरिष्ठों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। इसमें श्रद्धेय व्यक्तियों का स्मरण है। उनके प्रदेय का रेखांकन है। 'न हन्यते' एक तरह से वैचारिक पितृमोक्ष है। अपने वरिष्ठों के लिए शब्द सुमनों से श्रद्धा निवेदन करने का अवसर भी।

संजय द्विवेदी ने इस पुस्तक में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लंबे समय तक प्रवक्ता रहे माधव गोविंद वैद्य, राजनीतिक चिंतक और पर्यावरणविद् अनिल माधव दवे, पत्रकारिता गुरु और अध्यात्मिक चिंतक प्रो. कमल दीक्षित, मध्य प्रदेश के सृजनशील पत्रकार शिव अनुराग पटेरिया, पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षिका दविंदर कौर उप्पल, छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी, वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति-महानिदेशक राधेश्याम शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार श्याम लाल चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार और आचार्य नन्द किशोर त्रिखा, भारत-भारतीयता को समर्पित मुंबई के पत्रकार मुजफ्फर हुसैन, लम्बे समय तक तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में रहीं जयललिता, छत्तीसगढ़ के गांधी नाम से विख्यात संत पवन दीवान, छत्तीसगढ़ के प्रखर पत्रकार देवेन्द्र कर, जाने माने पत्रकार बसंत कुमार तिवारी, माओवादियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले 'बस्तर के टाइगर' महेंद्र कर्मा, छत्तीसगढ़ के प्रमुख राजनेता नन्द कुमार पटेल और उनके सुपुत्र दिनेश पटेल, छत्तीसगढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेता लखी राम अग्रवाल, छत्तीसगढ़ में बस्तर की आवाज समझे जाने वाले बलिराम कश्यप, वरिष्ठ पत्रकार राम शंकर अग्निहोत्री को आत्मीयता से याद किया है। और तो और उतनी ही आत्मीयता से संजय द्विवेदी नक्सल नेता कानू सान्याल को याद करते हैं।

इस किताब के श्रद्धांजलि लेख दीर्घजीवी और पठनीय हैं। इनमें निबंध की बुनावट है और रेखाचित्र सी चुस्ती। अपनी सहजता में विशिष्ट इन स्मृति लेखों को संजय द्विवेदी ने इतनी जीवंतता से रचा है कि पिछली आधी शताब्दी का राजनीतिक तथा पत्रकारिता का परिदृश्य भी सजीव हो उठता है।

पुस्तक : न हन्यते

लेखक : प्रो. संजय द्विवेदी

मूल्य : 250 रुपये

प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 4754/23, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002

(लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हैं।) 

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अपने बेहतर भविष्य को लेकर मुसलमानों को समझनी ही होगी यह बात: कमर वहीद नकवी

नूपुर शर्मा टिप्पणी विवाद पर भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग करीब दो हफ्ते बाद जो गुस्सा जता रहा है, वह बिलकुल बेतुका है और राजनीतिक नासमझी का सबूत है।

Last Modified:
Sunday, 12 June, 2022
Qamar Waheed

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार।।

नूपुर शर्मा टिप्पणी विवाद पर भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग करीब दो हफ्ते बाद जो गुस्सा जता रहा है, वह बिलकुल बेतुका है और राजनीतिक नासमझी का सबूत है। उनका गुस्सा इतने दिनों बाद क्यों भड़का? क्या उनके पास इस सवाल का कोई तार्किक जवाब है? जाहिर है कि व्यापक अरब प्रतिक्रिया के बाद भारतीय मुसलमानों के इस वर्ग को लगा कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए। मैंने अपने पिछले ट्वीट में कहा था कि अरब प्रतिक्रिया पर हड़बड़ी में कदम उठा कर बीजेपी भारतीय मुसलमानों को गलत संकेत दे रही है और वही हुआ भी।

हालांकि, अरब प्रतिक्रिया के बाद मोदी सरकार के पास ऐसा कदम उठाने के सिवा और कोई चारा भी नहीं था। सरकार ने यही कदम पहले उठा लिया होता तो मामला बढ़ता ही नहीं। सरकार की तरफ से यह बड़ी गलती हुई। अब इस मामले में विलम्बित प्रदर्शन कर भारतीय मुसलमान जवाबी गलती कर रहे हैं।

वे कौन लोग हैं, जिन्होंने नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को धमकियां दीं और क्यों? जुमे की नमाज के बाद देश के कई हिस्सों में क्यों हिंसा की गई? ऐसा करके इन लोगों ने उस व्यापक भारतीय जनमत की अवहेलना की है, जो इस मामले में पूरी एकजुटता से उनके साथ खड़ा था। भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग यदि यह सोचता है कि अरब समर्थन से उसका सीना चौड़ा हो गया है तो यह निरी मूर्खता है। भारतीय मुसलमानों का हित केवल और केवल इस बात में ही है और रहेगा कि व्यापक भारतीय जनमत का समर्थन उसके साथ रहे। यह बात समझनी ही पड़ेगी।

मैं इस बात का सख्त विरोधी हूं कि भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व उलेमा या पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे किसी धार्मिक संगठन के हाथ में हो। दो कारण हैं। पहला यह कि धार्मिक नेतृत्व किसी समाज को प्रगति के रास्ते पर ले ही नहीं जा सकता क्योंकि ऐसा नेतृत्व अनिवार्य रूप से रुढ़िवादी होता है। दूसरा कारण यह कि आजादी के बाद से अब तक मुसलमानों के इस धार्मिक नेतृत्व ने लगातार साबित किया है कि उनमें रत्ती भर भी राजनीतिक समझ और दूरदर्शिता नहीं है। शाहबानो विवाद, यूनिफॉर्म सिविल कोड, बाबरी मस्जिद समेत तमाम मुद्दों पर यह राजनीतिक नासमझी खुल कर सामने आ चुकी है।

इस नेतृत्व ने भारतीय मुसलमानों को धार्मिक आवेश के हवाई गुब्बारे में फुलाकर जमीनी सच्चाई से उनका मुंह मोड़ दिया, वे प्रगति के मोर्चे पर तो पिछड़े ही, उनकी सोच और छवि पर भी बुरा असर पड़ा। दूसरे, इस नेतृत्व की लफ्फाजियों से संघ का समर्थन लगातार बढ़ा, उसे नए तर्क मिले। ओवैसी समेत कुछ कोशिशें मुसलमानों की अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करने की भी हुईं, लेकिन सभी नाकाम हुईं और आगे भी होंगी।

तीन कारण हैं। पहला, उन्होंने हमेशा मुसलमानों के धार्मिक नेतृत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया, उसे बदलने की कोई कोशिश कभी की ही नहीं। दूसरा, केवल मुसलमानों के नाम पर बनी पार्टी को व्यापक भारतीय जनमत का समर्थन कभी मिल ही नहीं सकता तो वोट की राजनीति में ऐसी पार्टी कुछ कर ही नहीं सकती। ज्यादा से ज्यादा ऐसे नेता जोशीले नारे और भड़काऊ भाषण देकर सभाओं में तालियां बजवा सकते हैं, बस।

फिर ऐसी कोई भी पार्टी अंततः ‘जिन्ना सिंड्रोम’ को जन्म देकर हिंदुत्ववादी ताकतों को हिंदुओं में असुरक्षा की भावना भड़काए रखने के लिए नए तर्क देती है। जाहिर है इससे मुसलमानों का कभी कोई भला नहीं हो सकता। इसका राजनीतिक लाभ हमेशा हिंदुत्ववादी ताकतों को ही मिलता है। मुसलमानों का सबसे बड़ा संकट यही है कि उनके पास कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है, जो उन्हें धार्मिक कठघरे से निकालकर उनमें नई सोच जगाकर लोकतंत्र में अपना जायज हिस्सा पाने के लिए उन्हें रास्ता दिखा सके। हिंदुत्ववादी ताकतें इस स्थिति से खुश हैं क्योंकि इससे उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया है।

तथाकथित सेकुलर दलों ने भी मुसलमानों का हमेशा नुकसान ही किया है, क्योंकि वे मुस्लिम नेतृत्व की नासमझियों की आलोचना कर उन्हें सही रास्ता दिखाने के बजाय चुप रहे। वोट बैंक की मजबूरियां! सेकुलर चिंतकों ने हिंदू सांप्रदायिकवाद की तो खुलकर आलोचना की, लेकिन मुसलमानों के ऐसे कदमों पर बोलने से बचते रहे, जब उन्हें बोलना चाहिए था। क्योंकि इससे उनके उदारवादी लेबल को नुकसान पहुंचता। इन सब कारणों से मुसलमान जमीनी सच्चाइयों से दूर एक अलग लोक में जीते रहे।

पढ़े-लिखे मुसलमानों और मुस्लिम युवाओं को नए सिरे से सोचना होगा, नया विमर्श चलाना होगा और नई सोच का एक नया मुस्लिम समाज गढ़ना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि भावनाओं के ज्वार में बह जाने के बजाय अपनी जायज बातें रखने और उन्हें मनवा लेने के और रास्ते क्या हैं? यह बात मुसलमानों को समझनी ही होगी कि एक सेकुलर समाज में ही उनका भविष्य बेहतर है और रहेगा। इसलिए उन्हें अपना नेतृत्व भी सेकुलर राजनीतिक ढांचे में ही देखना होगा। और धार्मिक मुद्दों के बजाय अपने आर्थिक मुद्दों और सामाजिक सुधारों पर ही पूरा ध्यान लगाना होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

डॉ. वैदिक ने बताया, भारत जैसा देश कोई और क्यों नहीं

इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के सदस्य 57 देश हैं। आश्चर्य है कि अभी तक सिर्फ 16 देशों ने ही अपनी प्रतिक्रिया दी है।

Last Modified:
Thursday, 09 June, 2022
Muslim5465.jpg

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत जैसा कोई और नहीं

इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के सदस्य 57 देश हैं। आश्चर्य है कि अभी तक सिर्फ 16 देशों ने ही अपनी प्रतिक्रिया दी है। दिल्ली में हुए पैगंबर-कांड पर शेष मुस्लिम राष्ट्र अभी तक क्या विचार कर रहे हैं, कुछ पता नहीं। शायद वे यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर भाजपा प्रवक्ता ने पैगंबर मोहम्मद के बारे में वास्तव में कहा क्या है? जो कुछ टीवी चैनल पर कहा गया है और बाद में टवीट किया गया है, उसे पूरी तरह से हटा लिया गया है। इसीलिए अब उसके विरुद्ध जो कुछ भी कहा जाएगा, वह किसी अन्य स्त्रोत से जानकर कहा जाएगा। यह भारत-विरोधी अभियान अब वैसे ही चलेगा, जैसे कि अफवाहों के दम पर कई अभियान चला करते है।

भारत सरकार के प्रवक्ता और हमारे राजदूतों ने सभी देशों को आगाह कर दिया है कि भारत सरकार का इस तरह के निरंकुश बयानों से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन दुनिया के सभी इस्लामी देशों में भारत को बदनाम करने का अभियान अभी जोरों से चलता रहेगा। भारत सरकार इसकी काट करती रहेगी, लेकिन उसको इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। यदि कोई देश भारत से संबंध तोड़ता है तो उससे भारत का नुकसान जरूर होगा, लेकिन उस देश का नुकसान भारत से कहीं ज्यादा होगा।

अंतरराष्ट्रीय संबंध कभी भी एकतरफा नहीं होते। जहां तक मोदी सरकार का सवाल है, उसने इस्लामी राष्ट्रों के साथ अपने संबंध काफी घनिष्ट बनाए हैं। यदि मोदी खुद भी एक बयान जारी करके इस्लामी राष्ट्रों की समझ को ठीक कर दें तो इसमें कोई बुराई नहीं है। जैसे उन राष्ट्रों ने भारत का विरोध करके एक औपचारिकता निभाई है, वैसे ही मोदी भी कूटनीतिक औपचारिकता निभा सकते हैं। इस मामले को लेकर कानपुर में जरूर तोड़-फोड़ हुई है, लेकिन देश के हिंदुओं और मुसलमानों ने काफी संयम का परिचय दिया है।

शिवलिंग और पैगंबर के बारे में कही गई आपत्तिजनक बातों को उन्होंने अपने जी से नहीं लगाया और वे सारा तमाशा भौंचक होकर देख रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं के भड़काने का कोई खास असर दिखाई नहीं पड़ रहा है। एक सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि देश के 89 प्रतिशत हिंदू और 85 प्रतिशत मुसलमान किसी भी अन्य धर्म के लोगों को ठेस पहुंचाने के विरुद्ध में हैं। जो 10-15 प्रतिशत लोग ऐसा नहीं मानते, उनका कहना है कि किसी को भी अच्छा लगे या बुरा, सच तो सच है। उसे बोलने और लिखने की आजादी सबको मिलनी चाहिए। मैं भी इस बात को मानता हूं लेकिन जो बुरा लगे, वह बोलकर आप किसका भला करते हैं? आपकी अच्छी बात का भी असर तो अच्छा नहीं होगा। इसीलिए जो कुछ भी बोला जाए, वह सच तो हो, लेकिन प्रिय भी हो। इसे ही सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात् कहा गया है। झूठ मत बोलो। हमेशा सच बोलो लेकिन वह कटु न हो, यह भी जरूरी है।

भारत के ज्यादातर लोग इसी बात में विश्वास करते हैं। इसीलिए यहां दर्जनों देशी और विदेशी धर्म और संप्रदाय सैकड़ों वर्षों से फल-फूल रहे हैं। क्या दुनिया का कोई अन्य देश ऐसा है, जिसमें इतनी विविधता हो और उसके साथ-साथ इतनी सहिष्णुता भी हो? इस अनन्य भारतीय संस्कार का ही परिणाम है कि भारत के मुसलमान, ईसाई, यहूदी, अहमदिया और बहाई लोग अपने विदेशी स्वधर्मियों के मुकाबले अधिक उदार, अधिक भक्तिमय और अधिक मानवीय हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए