वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने यूं समझाया भाषाओं का ‘गणित’

भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 14 September, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Rahul Dev

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के सामने अलग-अलग अंशों में लेकिन लगभग अटल और अपरिहार्य दिखते लोप के सामने निरुपाय खड़ी दिखती हैं।

भाषाओं का यह संकट अपने दीर्घावधि निहितार्थों और बहुआयामी प्रभावों में भारतीय सभ्यता का संकट बन जाता है। कारण सीधा है। भाषा और संस्कृति,राष्ट्र, राष्ट्बोध और राष्ट्रीयता का गर्भनाल जैसा संबंध है। भाषा इनकी गर्भनाल है। भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है। भाषा में ही संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपादान, उसकी चिन्तन-आध्यात्मिक-ज्ञान-साहित्य-शास्त्रीय-लोक संपदा निर्मित, संचारित और प्रवाहित होती है। संस्कृति के अन्य रूप- साहित्य, ललित कलाएं, गीत संगीत, स्थापत्य, वेशभूषा, खानपान, पर्व त्यौहार, सामाजिक रीतियां, परंपराएं, लोकाचार आदि मुख्यतः भाषा के कारण और माध्यम से ही प्रकट होते हैं।

100 साल पहले 1918 में चेन्नई में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति स्थापित करने वाले महात्मा गांधी और उसके 40 साल बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने भाषा संबंधी प्रावधान बनाते समय इसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की थी कि जिन महान उद्देश्यों, राष्ट्रनिर्माण के जिन सपनों को सामने रखकर उन्होंने यह पुरुषार्थ किए थे, भारतीय राष्ट्र और उसके भविष्य का जो चित्र उन्होंने अपने सामने रखा था उसका साकार रूप 70 साल में ही इतना अलग, इतना विकृत हो जाएगा।  लेकिन हमारी आंखों के सामने आज जो दृश्य है और निकट भविष्य में आकार लेता दिखाई दे रहा है, वह इतना विकराल है, गहरे संस्कृतिमूलक आयामों में राष्ट्र निर्माताओं की कल्पना के इतना विपरीत है कि विश्वास नहीं होता।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त अपनी मौलिक अंतःप्रेरणा और साभ्यतिक आभा के आलोक में भारत एक बार फिर चमचमाकर खड़ा होगा, अपना नवनिर्माण करेगा वह सपना आज अंग्रेजी के ऐसे भाषायी साम्राज्यवाद की जकड़ में है जो दिनोंदिन मजबूत होती जा रही है। 150 वर्षों के प्रयासों के बाद भी 15% भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेजी इस देश की 85% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है। अंग्रेजी़ न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंचे अवसरों, रोज़गारों से वंचित करोड़ों युवा प्रतिभाएं आज रोज कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास को तिल तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। अंग्रेज़ी से वंचित होना दोयम दर्जे का भारतीय होना है। केवल किसी भारतीय भाषा में जीने-काम करने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी वालों के सामने दीन हो जाता है। इस आत्मदैन्य को अपनी बातचीत में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों, अभिव्यक्तियों को ढूंसता हिन्दुस्तानी ही आज प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी है।

वर्तमान से अब ज़रा भविष्य में चलते हैं। सन 2050 की कल्पना कीजिए। तब तक हमारा भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका होगा। भारतीय प्रतिभा, उद्यमशीलता और हमारी बुनियादी लोकतांत्रिकता विश्वमंच पर भारत का अटल उदय सुनिश्चित कर चुके हैं। चरम गरीबी, कुपोषण, भुखमरी, शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन बड़ी हद तक मिट चुके होंगे। आम भारतीयों का जीवन स्तर, सुविधाएं काफी ऊपर आ चुके होंगे। देश के 50-60% भाग का शहरीकरण हो चुका होगा। आधुनिक सुख सुविधाएं, तकनीकी यंत्र, साधन गांव-गांव तक पहुंच चुके होंगे। सारा देश डिजिटल जीवन पद्धति को बहुत बड़ी हद तक अपना चुका होगा। ब्रॉडबैंड और उसके माध्यम से मिलने वाली अनंत सेवाएं आम हो चुकी होंगे।

अब कल्पना के घोड़े दौड़ाइए और सोचिए-उस भारत के अधिकतर नागरिक अपने जीवन के सारे प्रमुख काम किस भाषा में कर रहे होंगे? पूरे देश में शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, शोध, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, न्याय जैसे हर बड़े क्षेत्र में किस भाषा का प्रमुखता से उपयोग हो रहा होगा? वह देश भारत होगा, भिंडिया या सिर्फ़ इंडिया?  उस इंडिया में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हमारी बड़ी 22 और 16 सौ से अधिक छोटी भाषाओं-बोलियों की स्थिति क्या होगी? कहां होंगी वे? होंगी भी कि नहीं?

मेरा अपना आकलन है कि रहेंगी तो जरूर लेकिन गरीबों की गरीब भाषाएं बनकर। हाशियों की भाषा बन कर। गालियों की भाषा बन कर। गीत-संगीत, मनोरंजन, फिल्में, ये भाषाओं में बचे रहेंगे, हालांकि इनमें भी तब तक आधी से ज्यादा अंग्रेजी प्रवेश कर चुकी होगी। आज बनने वाली हिंदी फिल्मों में आधी से ज्यादा के शीर्षक अब अंग्रेजी के होते हैं। उनके संवादों में हिंदी नहीं हिंग्लिश ज्यादा होती है। पूरी तरह अंग्रेजी में बनने वाली फिल्में और नेटफ्लिक्स जैसे आधुनिक मंचों पर भारतीय अंग्रेजी धारावाहिक आम हो चले हैं। यह प्रक्रिया बढ़ती ही जाएगी।

भाषाई अखबारों, फिल्मों और धारावाहिकों का विस्तार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आंखों देखा विवरण भी अब हिंदी व भाषाओं में होने लगा है। इस विस्तार पर मुग्ध भाषायी मीडिया और साहित्यकार अपनी भाषाओं पर किसी तरह के संकट की बात को अरण्य रोदन कह देते हैं। यह दूरदृष्टिहीनता है। भविष्य देखना है तो बच्चों की ओर देखना चाहिए। बच्चों की जो पीढ़ियां अधिकाधिक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़ी होंगी वे क्या भाषाई अखबारों, साहित्य, पुस्तकों, टीवी समाचारों की पाठक- दर्शक होंगी? हिंदी के कितने लेखकों, पत्रकारों, राजभाषा अधिकारियों के बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ते हैं? इसलिए आज यह जो विस्तार दिख रहा है अगले 20-25 साल का खेल है। उसके बाद ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी का ही वर्चस्व हर क्षेत्र में दिखेगा।

संसार में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषा शास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी। इनमें भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी। भारत की आदिवासी भाषाओं में 196 तो अभी यूनेस्को के अनुसार ही गंभीर संकटग्रस्त भाषाएं हैं। संकटग्रस्त भाषाओं की इस वैश्विक सूची में भारत सबसे ऊपर है। यूनेस्को का भाषा एटलस 6000 में से 2500 भाषाओं को संकटग्रस्त बताता है। यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोचिरो मत्सूरा ने कहा था, ‘एक भाषा की मृत्यु उसे बोलने वाले समुदाय की अमूर्त विरासत, परंपराओं और वाचिक अभिव्यक्तियों का नष्ट हो जाना है।‘

भारत की अनुमानित 1957 में कम से कम 1416 लिपिहीन मातृभाषाएं हैं। ये सब आसन्न संकट में हैं। पर भारत के प्रभु और बुद्धिजीवी वर्ग तथा सामान्य जन को इन छोटी भाषाओं की तो क्या अपनी बड़ी भाषाओं की भी चिन्ता और उनके संकट को देखने समझने, बचाने में कोई रुचि नहीं है। ये वे विशाल,10 लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली भाषाएं हैं, जिन्हें भारत के 90% लोग बोलते-बरतते हैं।

किसी भी समाज में भाषा के नियामक-निर्णायक तत्व क्या हैं? भाषा और समावेशी, समतामूलक, लोकतांत्रिक विकास का क्या संबंध है? भाषा और शिक्षा का क्या संबंध है? भाषा का राष्ट्र, राष्ट्र भाव और राष्ट्र निर्माण से क्या संबंध है? राष्ट्र बोध के केंद्रीय महत्व के इन बिंदुओं पर स्वतंत्रता के बाद भारत में सिर्फ एक बार 1967 में उच्चतम स्तर पर समग्रता से विचार मंथन हुआ था राष्ट्रीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में। उसके बाद उस तरह का कोई विचार कुंभ भाषाओं की बदलती स्थितियों, चुनौतियों और भविष्य पर हुआ हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है।

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि विरल भाषिक समृद्धि और विविधताओं के भारत के पास 70 साल में भी अपनी कोई भाषा नीति नहीं है,  न ही उसको बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है। अब भी अगर वह नहीं बनाई गई तो अपनी इस अमूल्य और आधारभूत सांस्कृतिक संप्रभुता से दो-तीन पीढ़ियों में ही वंचित होकर हम पश्चिम, मुख्यतः अमेरिका के सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे।

भाषा मनुष्य की श्रेष्ठतम संपदा है। सारी मानवीय सभ्यताएं भाषा के माध्यम से ही विकसित हुई हैं। आदिम समाज तो हो सकते हैं लेकिन आदिम भाषाएं नहीं होतीं। संचार के वाचिक और लिखित माध्यम रूप में यह एक समाज के भावनात्मक जीवन और संस्कृति का सर्वोत्तम उद्घोष है। एक सांस्कृतिक संस्थान होने के कारण यह अपने बोलने-बरतने वालों को एक जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में पहचान और अद्वितीयता देती है। जातीयता का एक प्रबल कारक होती है। समाज के सभी क्षेत्रों में-प्रबंधन, प्रशासन, वैज्ञानिक सूचनाओं, शिक्षा और शोध का माध्यम हो या ज्ञान निर्माण का, भाषा विकास का सबसे शक्तिशाली उपकरण है।

भाषा के विकास को हम उन भूमिकाओं से परिभाषित कर सकते हैं जिन्हें वह अपने समुदाय में निभाती है और जिन क्षेत्रों में वह प्रमुखता से इस्तेमाल की जाती है। किसी समुदाय में कोई भाषा कितनी प्रतिष्ठा पाती है, यह सीधा इस बात पर निर्भर करता है कि वह भाषा अपने समुदाय की कितनी तरह की अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करती है-जैसे व्यापार, अर्थतंत्र, तकनीकी, नवाचार, शोध, मौलिक वैज्ञानिक चिंतन,  उद्यमिता, प्रबंधकीय निर्णय आदि। एक बहुभाषी और बहुजातीय समाज में उसकी आधिकारिक भाषा/भाषाएं सभी सभी वर्गों को तभी स्वीकार्य होती हैं जब वे शिक्षा, आजीविका, व्यवसाय, शोध, तकनीक, नवाचार, विकास और प्रशासनात्मक, प्रबंधकीय निर्णय प्रक्रियाओं की प्रमुख भाषा होती है।

भाषाओं के संकट से भी बड़ा संकट है उसको न देख पाना। कमोबेश यह समस्या सारे भाषा समूहों के साथ है। लेकिन हिंदी वालों के साथ तो रोग की हद तक है। बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान और पत्रकार प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है, हिंदी में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, हिंदी फिल्म और टीवी उद्योग बढ़ रहा है तब हिंदी के सामने संकट कैसे हो सकता है?

संक्षिप्त उत्तर यह है। अब हम वाचिक युग में नहीं लिखित और डिजिटल युग में हैं। इसलिए भाषा का बोली रूप उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अपर्याप्त है। यह देखने की बजाय कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या कितनी बढ़ रही है जो हमें देखना चाहिए वह यह है कि उस भाषा को अपनी इच्छा से पढ़ने-लिखने और सभी गंभीर कार्य क्षेत्रों में व्यवहार करने वाले लोग बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? उस भाषा माध्यम के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या घट रही है या बढ़ रही है? ज्ञान ग्रहण, ज्ञान निर्माण, भविष्य निर्माण, न्याय,विज्ञान, प्रशासन, व्यापार, प्रबंधन, शोध आदि जीवन के निर्णायक क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग घट रहा है या बढ़ रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न, जिसे पूछते ही आपके सामने अपनी भाषा का भविष्य साकार खड़ा हो जाएगा यह है-आपकी भाषा की मांग कितनी है? है कि नहीं? घट रही है या बढ़ रही है? इस कसौटी पर हिंदी सहित सारी भारतीय भाषाओं को कसें तो उत्तर बिल्कुल साफ है। आज देश के छोटे से छोटे गांव में गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक भाषा मांग रहा है-अंग्रेजी। किसी भी भारतीय भाषा की मांग नहीं है भारत में। इस बाजार युग में जिस चीज की मांग नहीं है वह कैसे चलेगी, कैसे बचेगी?

अभी देश के 30 से 40% बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। भले ही कितनी अधकचरी अंग्रेजी वहां पढ़ाई जाती हो, खुद शिक्षकों को ठीक से आती हो या नहीं, यह निर्विवाद रूप से सबका अनुभव है कि जो बच्चा बचपन से एक बार अंग्रेजी माध्यम में पढ़़ गया, वह कभी अपने परिवार और परिवेश की, विरासत की भाषा का नहीं होता। उसमें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से प्रेम,  लगाव, गर्व की जगह एक हेयभाव और नापसंदगी पैदा होती जाती है जो आयु के साथ बढ़ती ही रहती है। अपनी भाषा से यह दूरी उसे भाषा से परिचित तो बनाए रखती है, लेकिन उसमें कुछ भी गंभीर पढ़ने वाला और काम करने वाला नहीं रहने देती। भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार की यही स्थिति है।

10 साल पहले के एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत की सभी भाषा-माध्यम विद्यालयों में प्रवेश दर हर साल घट रही थी। सिर्फ दो भाषाएं अपवाद थीं-अंग्रेजी और हिंदी। अंग्रेजी में यह वार्षिक वृद्धि दर 250% से अधिक थी। हिंदी में लगभग 35%। अब जब हिंदीभाषी राज्यों में भी सरकारें हिंदी-माध्यम विद्यालय बंद या बदल कर उन्हें अंग्रेजी-माध्यम करती जा रही है तो हिंदी का भविष्य स्पष्ट है। ठीक यही चीज़ हर प्रदेश में हो रही है।

यूनेस्को के कहने पर विश्व के श्रेष्ठ भाषाविदों ने किसी भी भाषा की जीवंतता और संकटग्रस्तता नापने के लिए 9 कसौटियां निर्धारित की हैं। पहली है, एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी के बीच उस भाषा का अंतरण, जाना कितना हो रहा है? दूसरी कसौटियों में प्रमुख हैं ज्ञान विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में उस भाषा में काम हो रहा है या नहीं,  घट रहा है या बढ़ रहा है? वह भाषा नई तकनीक और आधुनिक माध्यमों को कितना अपना रही है? उस भाषा के विविध रूपों का दस्तावेजीकरण कितना और किस स्तर का है? उस समाज की महत्वपूर्ण राजकीय/अराजकीय संस्थाओं की उस भाषा के बारे में नीतियां और रुख़ कैसे हैं? अंतिम लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है उस भाषा समुदाय का अपनी भाषा के प्रति रुख़ क्या है, भाव क्या है?

इनमें से किसी भी कसौटी पर किसी भी भारतीय भाषा को तोल लीजिए तुरंत समझ में आ जाएगा कि भविष्य के संकेत संकट की ओर इशारा करते हैं या विकास-विस्तार की ओर।

एक बार फिर 2050 पर चलते हैं। उस वैश्विक महाशक्ति, आधुनिक, वैश्वीकृत, संपन्न-सबल इंडिया में जब हर नागरिक अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण काम सिर्फ अंग्रेजी में कर रहा होगा, उसमें भारत, भारतीयता और भारतीय सभ्यता ने 5000-6000 वर्ष की अपनी अविच्छिन्न यात्रा में जो समूची साहित्यिक-सांस्कृतिक-ज्ञान-लौकिक-आध्यात्मिक संपदा अर्जित की है वह इस संपदा की निर्मात्री भाषाओं के बिना कैसे जीवंत और जीवित रहेगी, अगली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगी? क्या अंग्रेज़ी यह कर सकती है?

रंगरूप में भारतीय लेकिन दिलो-दिमाग, जीवन शैली, सोच-संस्कार से अमेरिका के उन नकलची नागरिकों का भारत-बोध, अपनी साभ्यतिक ऊंचाईयों-विरासत की स्मृति, सांस्कृतिक संप्रभुता का अहसास कैसा होगा?

कम से कम मुझे स्पष्ट दिखता है कि समूची भारतीय सभ्यता लोप, विस्मृति और भयानक हाशियाकरण की कगार पर खड़ी है। उसके पास शायद सिर्फ दो पीढ़ियों का समय है बचने के लिए। यानि हमारी और हमारे बच्चों की पीढ़ी आज अगर चाहे, राजसत्ता को बुद्धि आ जाए, समूचा राष्ट्र संकल्पबद्ध हो, राष्ट्रीय और निजी महत्व के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में जुटे तो इस प्रक्रिया को हम रोककर उलट सकते हैं। वरना शैशव से ही अंग्रेजी/अंग्रेज़ियत में पली, पढ़ी और बढ़ी पीढ़ियां चाहेंगी भी तो इस संपदा और सभ्यता को पुनर्जीवित करना उनके लिए असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा।

यहां महत्वपूर्ण हो जाती है प्रत्येक भाषा में काम करने,, लिखने वाले साहित्यकारों-लेखकों-विद्वानों- बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों, मीडिया, पत्रकारों और संपूर्ण नागर समाज की भूमिका। यही वे वर्ग हैं जो अपने अपने क्षेत्रों में, अपने भाषा समाज में एक विमर्श उत्पन्न करते हैं, चिंतन को आगे बढ़ाते हैं, महत्वपूर्ण चिंताओं,संकटों और सरोकारों के प्रति समाज को जागरूक करते हैं।

कमाल यह है कि ऐसे अभूतपूर्व प्राणांतक संकट से देश का लगभग समूचा नियंता प्रभु वर्ग, नीति निर्माता, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएं, सरकारें, मीडिया और व्यापक नागर समाज अनभिज्ञ और इसलिए उदासीन दिखते हैं। इस विराट सभ्यतामूलक संकट का मुख्य कारण, उस का सबसे बड़ा स्रोत सीधा और स्पष्ट है-अंग्रेज़ी और उसके प्रति हमारा शर्मनाक दासतापूर्ण और शर्मनाक  सम्मोहन।

भारतीय चरित्र इजराइली चरित्र जैसा नहीं है जिसने 2000 साल से मृत पड़ी हिब्रू को आज वैज्ञानिक शोध, नवाचार और आधुनिक ज्ञान निर्माण की श्रेष्ठतम वैश्विक भाषाओं में एक बना दिया है। जिसके बल पर 40 लाख की जनसंख्या वाला इजरायल एक दर्जन से ज्यादा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार जीत चुका है। सारे इस्लामी देशों की शत्रुता के बावजूद अपनी पूरी अस्मिता, धमक और शक्ति के साथ अजेय बना विश्व पटल पर विराजमान है। विश्व गुरु बनने के सपने देखता भारत चाहे तो इजराइल से प्रेरणा ले सकता है।

(नवनीत पत्रिका से साभार)

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पिछले दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता को अगर लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो प्रश्न यह है कि इस महत्वपूर्ण स्थान की क्या हम रक्षा कर पा रहे हैं?

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 27 May, 2020
Last Modified:
Wednesday, 27 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

पत्रकारिता को अगर लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो प्रश्न यह है कि इस महत्वपूर्ण स्थान की क्या हम रक्षा कर पा रहे हैं? यह कोई कानूनी अधिकार नहीं है न ही यह कोई गाड़ियों पर प्रेस लिखकर घूमने की तरह वीआईपी सुविधा है अथवा कोई अधिमान्यता पत्र। यह वास्तव में अवाम की ओर से अपने हितों के लिए सौंपा गया एक ऐसा वचन पत्र है, जिसका अर्थ हर संकट-काल में आम आदमी के साथ खड़ा हो जाना है। ठीक वैसा ही, जैसा आपातकाल के समय कमोबेश समूची पत्रकारिता ( अपवादों को छोड़कर) प्रतिपक्ष और जनता के साथ खड़ी हो गई थी।

कोरोना काल भी ठीक वैसा ही है। विडंबना यह है कि आज की समूची पत्रकारिता (अपवादों को छोड़कर) अवाम से दूर खड़ी नजर आ रही है। अनेक स्थानों पर बीते दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है। जन धारणा यही है कि जब कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका अवाम के दिल और दिमाग की जबान पढ़ने में नाकाम रहे तो पत्रकारिता को उनकी पीड़ा को मुखरित करना चाहिए। इस अपेक्षा में कुछ भी गलत नहीं है। दुनिया भर में और हिन्दुस्तान में इस पवित्र पेशे की यही प्रचलित परिभाषा है। आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक अनेक अवसरों पर पत्रकार दुखी और तकलीफज़दा लोगों के लिए हमसफर बने हैं।

मगर बीते दिनों एक बड़ा वर्ग अवाम से पल्ला झाड़ता दिखाई दे रहा है। वह सिक्के का एक ही पहलू देख रहा है। अगर पटरियों पर श्रमिक कटते हैं तो यह कुतर्क दिया जाता है कि वे रेल लाइन पर सोए ही क्यों? अगर नंगे पांव धूप में पैरों में छाले पड़ जाएं, वे पत्थर की तरह सख़्त हो जाएं, उनकी संवेदना चली जाए तो कहा गया कि तेज गर्मी में निकलेंगे तो ऐसा ही होगा। कोई भूखा सड़क पर चलते-चलते दम तोड़ दे तो कहा गया कि गर्मी के दिनों में खाली पेट निकलने से तो लू लगती ही है। किसी गर्भवती श्रमिक महिला को सड़क पर प्रसव हो गया तो यह समाचार प्रकाशित हुआ कि वह अस्पताल क्यों नहीं गई? पैंतालीस बरस पहले अदम के इस अहसास को अपने भीतर आज अनुभव कीजिए-

भुखमरी की जद में है या दार के साये में है/अहले हिन्दुस्तान अब तलवार के साये में है

छा गई है जेहन की परतों पर मायूसी की धूप/ आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है

बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ/ और कश्ती कागजी पतवार के साये में है

क्या कोई सामूहिक शर्म हमारे अंदर शेष है? श्रमिक सड़क पर इसलिए उतरे हैं क्योंकि उनके डेरों से मालिकों ने किराया नहीं देने के कारण बाहर कर दिया है। वे इसलिए भूखे हैं क्योंकि काम देने वालों ने बकाया मजदूरी नहीं दी है। घर बैठे पैसे देने का तो सवाल ही नहीं उठता। वे नंगे पांव इसलिए हैं क्योंकि हजार किलोमीटर चलने लायक चप्पल उनके पैरों में नहीं थी। चप्पलें टूटती गईं, श्रमिक उन्हें फेंकते गए और आगे बढ़ते गए। सड़क पर प्रसव इसलिए हुआ क्योंकि अस्पतालों में कोरोना के अलावा अन्य बीमारी का इलाज नहीं हो रहा है। वह भी केवल पैसे वालों का। वे रेल पटरियों पर इसलिए सोते हैं क्योंकि उन्हें इस हाल में पहुंचाने वालों ने छत और बिस्तर मुहैय्या नहीं कराए। वे अपने अस्थायी ठिकानों से पुश्तैनी गांव के लिए इसलिए निकले हैं क्योंकि गांव अभी महानगरों की तरह क्रूर और संवेदनहीन नहीं हुए हैं। सोच यह है कि महानगर में मौत लिखी है-चाहे भूख से हो या कोरोना से। कोरोना से भी गांव में मरना है। जब दोनों जगह मौत लिखी है तो अपने पुरखों के गांव में जाकर क्यों न मरें? कम से कम चार कंधे तो मिल जाएंगे। यानी करोड़ों श्रमिक जीने की चाह लेकर नहीं निकले हैं। वे सुकून से मरना चाहते हैं। संसार में क्या कोई दूसरा उदहारण याद है, जब मरने के लिए इतनी बड़ी तादाद में मजदूर निकले हों? इस पीड़ित मानवता को पत्रकारिता के मंच पर कितना स्थान मिला है? याद रखिए राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह भी परीक्षा की घड़ी में अवाम के साथ ही खड़े होते थे। 

हम अपने रंगीन परदों पर उत्तर कोरिया के तानाशाह की कथाएं दिखाते हैं।लेकिन अपने मुल्क़ की स्याह और बदरंग हो रही तस्वीर नहीं दिखाते। हम अजगर और शेर की जंग दिखाते हैं। हम चीन को सबक सिखाना चाहते हैं। हम पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहते हैं। हम नेपाल को सबक सिखाना चाहते हैं। हम सबक़ सिखाना चाहते हैं, लेकिन खुद सबक नहीं सीखना चाहते। यह बहुत भारी पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

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मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!  

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मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 19 May, 2020
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं। यानी वे असली वीडियो हैं, लेकिन कोरोना के संदर्भ में फर्जी हैं। पिछले दिनों घर लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के कुछ वीडियो देखकर मेरा भी मन विचलित हो गया। मैंने एक-दो वीडियो अपने फेसबुक मंच पर साझा कर दिए। बाद में कुछ मित्रों ने उन पर संदेह किया। खोज की तो पाया कि वे वीडियो वाकई ताजे नहीं थे। मैंने फेसबुक प्लेटफॉर्म पर इसके लिए माफी भी मांगी।

इसी क्रम में ऐसे ही चंद वीडियो कुछ टेलिविजन चैनलों ने भी दिखा दिए। बाद में उन्हें भी असलियत पता चली और उन्होंने वीडियो गिरा दिए (चैनल की भाषा में हटाने के लिए गिराना ही प्रचलित है) लेकिन तब क्या हो सकता था। तीर कमान से निकल चुका था। यह अपराध अनजाने में हुए, मगर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया है।

मुश्किल यह है कि जो लोग इस तरह के वीडियो का दुरुपयोग करते हैं, उनमें से अधिकतर पत्रकार नहीं होते। वे बस इरादतन ऐसा करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे एक समूचे प्रोफेशन की साख पर सवाल खड़ा हो जाता है। हो सकता है कि किसी स्तर पर कोई पत्रकार भी इसमें शामिल हो जाता हो, पर ज्यादातर तो ऐसा करने से बचते हैं। सोशल मीडिया पर इस प्रवृति पर कैसे लगाम लगाईं जा सकती है?

कुछ चैनल वायरल का सच या वायरल वीडियो की पड़ताल करते हैं मगर इससे दर्शक के मन में पत्रकारिता के बारे में जो छवि बनती है, वह नहीं बदलती। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि जब वायरल का सच दिखाया जा रहा हो तो वास्तव में वही दर्शक बैठा हो। जब इस गंभीर अनैतिक कृत्य को आप आधा घंटे के कार्यक्रम की शक्ल देते हैं, तो फिर वह भी एक शो हो जाता है। हमें इससे आगे कुछ सोचना होगा। इसके विरोध में कानूनी तौर पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, जब तक कि उससे समाज या देश को कोई बहुत बड़ी हानि नहीं हो। हालिया वर्षों में ऐसे भी मामले आए हैं, जब सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए अथवा दंगे भड़काने के लिए उनका दुरुपयोग किया गया, किन्तु उससे इस सिलसिले पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगी। पाया गया कि इनमें भी पत्रकारों का हाथ नहीं था।

इसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसे असामाजिक तत्व भारतीय मीडिया के कंधे का सहारा लेकर अपनी मंशा पूरी करना चाहते हैं। इन्हें रोकना ही होगा। चैनलों की एसोसिएशन इस बात पर तय कर सकती है कि इस बारे में लगातार स्क्रॉल (पट्टी) चलाई जाती रहे,  ब्रेक के दौरान बीस-तीस सेकंड के संदेश प्रसारित किए जाएं और न्यूज एंकर हर दो तीन घंटे बाद इन नक़ली आपराधिक खबरों से दर्शकों को आग़ाह करें। यदि प्रतिदिन कुल आधा घंटे का ऐसा प्रसारण हो और यह सिलसिला कम से कम साल भर तक चले तो ऐसे कुटेवों पर काबू पाया जा सकता है।

इस मामले में समाचार पत्रों और रेडियो से भी सहयोग लिया जा सकता है। इन प्रसारण संदेशों में कहा जाए कि एक व्यक्ति की इस हरकत से समूचा ताना बाना चरमरा सकता है तो शायद कुछ रोक लगे। कुछ तो जागरूक होंगे ही। ये तो महज कुछ सुझाव हैं। इनसे भी अलग कदम उठाए जा सकते हैं। प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब, प्रेस एसोसिएशन, श्रमजीवी पत्रकार संघ, नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट, भारतीय पत्रकार संघ, आंचलिक पत्रकार संघ और अन्य जितने भी संगठन हैं, उन्हें आगे आना होगा। यदि आज इस पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले कल में यह चुनौती विकराल रूप ले लेगी मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!   

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता के लिए ये वाकई मुश्किल दौर है

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'इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में'

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है

Last Modified:
Monday, 18 May, 2020
corona

-प्रो. संजय द्विवेदी

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है, उसके कारण उपजे संकट भी सामने हैं। दिनों दिन बढ़ती आबादी हमारे देश का कितना बड़ा संकट है यह भी खुलकर सामने है, किंतु इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में। संकटों में भी राजनीति तलाशने का अभ्यास भी सामने आ रहा है। मीडिया से लेकर विचारकों के समूह कैसे विचारधारा या दलीय आस्था के आधार पर चीजों को विश्लेषित और व्याख्यायित कर रहे हैं कि सच कहीं सहम कर छिप गया है। देश के दुख, देश के लोगों के दुख और संघर्ष भी राजनीतिक चश्मों से देखे और समझाए जा रहे हैं।

ऐसे कठिन समय में सच को व्यक्त करना कठिन है, बहुत कठिन। क्योंकि सभी विचारवंतों के ‘अपने अपने सच’ हैं। जो राजनीतिक आस्थाओं के आधार देखे और परखे जा रहे हैं। भारतीय बौद्धिकता और मीडिया के शिखर पुरुषों ने इतना निराश कभी नहीं किया था। साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बताने वाले देश ने राजनीतिक आस्थाओं को ही सच का पर्याय मान लिया है। संकटों के समाधान खोजने, उनके हल तलाशने और देश को राहत देने के बजाए जख्म को कुरेद-कुरेद कर हरा करने में मजा आ रहा है। यह सडांध तब और गहरी होती दिखती है, जब कुछ लोग पलायन की पीड़ा भोग रहे हिंदुस्तान के दुख में भी आनंद की अनुभूति सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि देश के नेता के सिर उसका ठीकरा फोड़ा जा सके।

केंद्र की मजबूत सरकार और उसके मजबूत नेता को विफल होते देखने की हसरत इतनी प्रबल है कि वह लोगों की पीड़ा और आर्तनाद में भी आनंद का भाव खोज ले रही है। हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों की विफलता दरअसल एक नेता की विफलता नहीं है। यह समूचे लोकतंत्र और इतने सालों में विकसित तंत्र की भी विफलता है। सामान्य संकटों में भी हमारा पूरा तंत्र जिस तरह धराशाही हो जाता है वह अद्भुत है। बाढ़, सूखा, भूकंप और अन्य दैवी आपदाओं के समय हमारे आपदा प्रबंधन के सारे इंतजाम धरे रह जाते हैं। सामान्यजन इसकी पीड़ा भोगता है। यह घुटनाटेक रवैया निरंतर है और इस पर लगाम कब लगेगी कहा नहीं जा सकता। व्यंग्य कवि स्व. प्रदीप चौबे ने लिखा – बाढ़ आए या सूखा मैं खाऊं तू खा। यानि जहां बाढ़ आ रही है, वहां सालों से हर साल आ रही। फिर उसी इलाके में सूखा भी हर साल आ रहा है। यानि इस संकट ने उस इलाके में एक इको सिस्टम बना लिया है और उसके साथ लोग जीना सीख गए हैं। हमारा महान प्रशासनिक तंत्र इन संकटों से निजात पाने के उपाय नहीं खोजता, उसके लिए हर संकट में एक अवसर है।

हम अपने संकटों को चिन्हिंत करें तो वे ज्यादा नहीं हैं, वे आमतौर पर विपुल जनसंख्या और उससे उपजे हुए संकट ही हैं। उत्तर भारत के राज्यों के सामने यह कुछ ज्यादा विकराल हैं क्योंकि यहां की राजनीति ने राजनेता और राजनीतिक योद्धा तो खूब दिए किंतु जमीन पर उतरकर संकटों के समाधान तलाशने की राजनीति यहां आज भी विफल है। ये इलाके आज भी जातीय दंभ, अहंकार, माफियाराज, लूटपाट, गुंडागर्दी के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसलिए उत्तर भारत के राज्य इस संकट में सबसे ज्यादा परेशानहाल दिखते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बंगाल जिस तरह पलायन की पीड़ा से बेहाल हैं, उसे देखकर आंखें भर आती हैं। एक बार दक्षिण और पश्चिम के राज्यों महाराष्ट्र,गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल की ओर हमें देखना चाहिए। आखिर क्या कारण हैं हमारे हिंदी प्रदेश हर तरह के संकट का कारण बने हुए हैं।पलायन, जातिवाद, सांप्रदायिकता, माफिया,भ्रष्टाचार, ध्वस्त स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था सब इनके हिस्से हैं। यह संभव है कि समुद्र के किनारे बसे राज्यों की व्यवस्थाएं, अवसर और संभावनाएं बलवती हैं। किंतु उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य भी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी संभावनाओं को जमीन पर उतारा है। प्रधानमंत्रियों का राज्य रहा उत्तर प्रदेश आज भी देश और दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। अपनी विशाल आबादी और विशाल संकटों के साथ। जमाने से कभी गिरिमिटिया मजदूरों के रूप में विदेशों में ले जाए जाने की पीड़ा तो आजादी के बाद मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, रंगून जैसे महानगरों में संघर्ष करते, पसीना बहाते लोग एक सवाल की तरह सामने हैं। यही हाल बिहार का है। एक जमाने में गांवों में गाए जाने वाले लोकगीत भी इसी पलायन के दर्द का बयान करते हैं-

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए हो, रेलिया बैरन।

(रेल मेरी दुश्मन है जो मेरे पति को लेकर जा रही है)

मेरे पिया गए रंगून किया है वहां से टेलीफून,

तुम्हारी याद सताती है जिया में आग लगाती है।

आजादी के बाद भी ये दर्द कम कहां हुए हैं? स्वदेशी, स्वावलंबन का ‘गांधी पथ’ छोड़कर सत्ताधीश नए मार्ग पर दौड़ पड़े जो गांवों को खाली करा रहे थे और शहरों को बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भर रहे थे। एक समय में आत्मनिर्भर रहे हमारे गांव अचानक ‘मनीऑर्डर एकोनामी’ पर पलने लगे। गांवों में स्वरोजगार के काम ठप पड़ गए। कुटीर उद्योग ध्वस्त हो गए। भारतीय समाज को लांछित करने के लिए उस पर सबसे बड़ा आरोप वर्ण व्यवस्था का है। जबकि वर्ण व्यवस्था एक वृत्ति थी, टेंपरामेंट थी। आपके स्वभाव, मन और इच्छा के अनुसार आप उसमें स्थापित होते थे। व्यावसायिक वृत्ति का व्यक्ति वहां क्षत्रिय बना रहने के मजबूर नहीं था, न ही किसी को अंतिम वर्ण में रहने की मजबूरी थी। अब ये चीजें काल बाह्य हैं। वर्ण व्यवस्था समाप्त है।

जाति भी आज रूढ़ि बन गयी किंतु एक समय तक यह हमारे व्यवसाय से संबंधित थी। हमारे परिवार से हमें जातिगत संस्कार मिलते थे-जिनसे हम विशेषज्ञता प्राप्त कर‘जाब गारंटी’भी पाते थे। इसमें सामाजिक सुरक्षा थी और इसका सपोर्ट सिस्टम भी था। बढ़ई, लुहार, सोनार, निषाद, माली, धोबी, कहार ये जातियां भर नहीं है। इनमें एक व्यावसायिक हुनर और दक्षता जुड़ी थी। गांवों की अर्थव्यवस्था इनके आधार पर चली और मजबूत रही। आज यह सारा कुछ उजड़ चुका है। हुनरमंद जातियां आज रोजगार कार्यालय में रोजगार के लिए पंजीयन करा रही हैं या महानगरों में नौकरी के लिए धक्के खा रही हैं। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था दोनों ही अब अपने मूल स्वरूप में काल बाह्य हो चुके हैं। अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में जाति के गुण के बजाए, जाति की पहचान खास हो गयी है। इसमें भी कुछ गलत नहीं है। हर जाति का अपना इतिहास है, गौरव है और महापुरुष हैं। ऐसे में जाति भी ठीक है, जाति की पहचान भी ठीक है, पर जातिभेद ठीक नहीं है। जाति के आधार भेदभाव यह हमारी संस्कृति नहीं। यह मानवीय भी नहीं और सभ्य समाज के लिए जातिभेद कलंक ही है।

हमें हमारे गांवों की ओर देखना होगा। मनीषी धर्मपाल की ओर देखना होगा, उन्हें पढ़ना होगा, जो बताते हैं कि किस तरह हमारे गांव स्वावलंबी थे। जबकि आज नई अर्थव्यवस्था में किसान आत्महत्या करने लगे और कर्ज को बोझ से दबते चले गए। 1991 के लागू हुयी नई आर्थिक व्यवस्था ने पूरी तरह से हमारे चिंतन को बदलकर रख दिया। संयम के साथ जीने वाले समाज को उपभोक्ता समाज में बदलने की सचेतन कोशिशें प्रारंभ हुयीं। 1991 के खड़ा हुआ यह अर्थतंत्र इतना निर्मम है कि वह दो महीने भी आपको संकटों में संभाल नहीं सकता। आप देखें तो छोटे उद्यमियों की छोड़ें,बड़ी कंपनियों ने भी अपने कर्मियों के वेतन में तत्काल कटौती करने में कोई कमी नहीं की। यहां से जो गाड़ी पटरी से उतरी है,संभलने को नहीं है। ईएमआई के चक्र ने जो जाल बुना है, समूचा मध्यवर्ग उससे जूझ रहा है। निम्न वर्ग उससे स्पर्धा कर रहा है। इससे समाज में बढ़ती गैरबराबरी और स्पर्धा की भावना एक बड़े समाज को निराशा और अवसाद से भर रही है। जाहिर है संकट हमारे हैं, इसके हल हम ही निकालेगें। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषकों के संकट, बढ़ती जनसंख्या के सवाल हमारे सामने हैं। इनके ठोस और वाजिब हल निकालना हमारी जिम्मेदारी है। कोरोना संकट ने हमें साफ बताया है कि हम आज भी नहीं संभले तो कल बहुत देर हो जाएगी। अंधे पूंजीवाद और निर्मम कॉरपोरेट की नीतियों से अलग एक मानवीय,संवेदनशील समाज बनाने की जरूरत है जो भले महानगरों में बसता हो उसकी जड़ों में संवेदना और आत्मीयता हो। सिर्फ हासिल करने और हड़पने की चालाकी न हो। देने का भाव भी हो। भरोसा कीजिए हम इस दुखों की नदी को पार कर जाएंगें।

 (लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर व कुलसचिव हैं) 

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‘सुधीर सर, दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है’

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा।

Last Modified:
Saturday, 16 May, 2020
Sudhir Chaudhary

सुधीर चौधरी सर, आपके साथ काम करते हुए सिर्फ चार महीने ही हुए हैं, पर जिस तरह का साहस आपने कल दिखाया, उसने ये अहसास दिलाया कि एक संपादक का साहस क्या होता है। रीढ़विहीन पत्रकारिका का आरोप झेल रहे दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है। जिस तरह आपने कोरोना वायरस की न्यूजरूम एंट्री से डटकर मुकाबला करने की ठानी, वो बहुत DARING है।

चूंकि आप ‘जी न्यूज’ का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसे में हम सबका मानना था कि आपको ऑफिस आकर अपना लोकप्रिय शो ‘डीएनए’ (DNA) नहीं करना चाहिए, आप चाहते तो इस सर्वमान्य निवेदन को स्वीकार कर सकते थे, पर आपने अपने परिवार और हितैषियों की इच्छा के विरुद्ध जाकर लगातार न्यूजरूम में साथियों के साथ कंधा मिलाकर खड़े होने को चुना। वाकई ये हमारे लिए किसी पुलित्जर अवॉर्ड से कहीं ज्यादा है, कि कठिन समय में हमारे नेतृत्वकर्ता ने हमें मझधार में नहीं छोड़ा।

मुझे याद है होली के बाद की वो पहली मीटिंग जिसमें आपने ये कहा था कि हमें न्यूजरूम व मीटिंग में गैदरिंग नहीं करनी है। उसी दिन से सिर्फ अतिआवश्यक टीम ही ऑफिस आ रही थी, डिजिटल की पूरी टीम 40 दिन से ज्यादा समय से वर्क फ्रॉम होम कर रही है। आपने कोरोना की गंभीरता को समय से पहले भांपा था और लगातार इससे बचने के हरसंभव उपाय पर बात की, पर होनी को कौन टाल सकता है।

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा। आप और न्यूजरूम के साथी अपना पूरा ध्यान रखिएगा, वर्क फ्रॉम होम की टीम भी अपने न्यूजरूम के हर साथी के प्रति चिंतित है। कोरोना के साथ हम ये लड़ाई जल्दी ही जीतेंगे, ये मन में विश्वास है।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से साभार)

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ऐसे कठिन समय में PM मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता।

Last Modified:
Thursday, 14 May, 2020
Pro. Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी।।

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता। उसकी जिम्मेदारी है कि टूटे हुए मनों, दिलों और आत्मा पर लग रही खरोंचों पर मरहम ही रखे। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 मई,2020 के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए। कोरोना के अंधेरे समय में जब दुनिया की तमाम प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाएं संकटों से घिरी हैं और घबराई हुई हैं, तब भी वे उम्मीदों और सपनों का साथ नहीं छोड़ते। एक समर्थ नेता की तरह वे लोगों में निराशा नहीं भरते, बल्कि भरोसा जगाते हैं। वे निराश और हताश नहीं हैं, बल्कि संकटों में अवसर की तलाश कर रहे हैं। वे कोरोना महामारी के व्यापक प्रसार के क्षणों में भी कहते हैं कि ‘हम कोरोना से लड़ेंगें और आगे बढेंगे।’

कोरोना संकट के बाद अखबार बुरी खबरों से भरे पड़े हैं। गांव जाते हुए ट्रेन से कटते श्रमिक, भूख से बिलखते हुए बच्चे, गहरी असुरक्षा से घिरे छोटी गाड़ियों,साइकिलों, मोटरसाइकिलों और पैदल ही गांव को जाते लोग जैसी तमाम छवियां मन को दुखी कर जाती हैं। इस नकारात्मकता के संसार में सोशल मीडिया पर अखंड विलाप करते लोग भी हैं, जो लोकतंत्र की बेबसी और हमारे सरकारी तंत्र की विफलताओं की रूदाली कर रहे हैं। इस गहरे अंधकार, नकारात्मक सूचनाओं के संसार में एक राष्ट्रनायक का काम क्या है? सही मायने में एक राष्ट्र के नायक का यही कर्तव्य है कि वह राष्ट्रजीवन में निराशा और अवसाद के बादल न चढ़ने दे। वह दुखी जनों को और संतप्त न करे। कठिनतम जीवन संघर्ष में लगी जनता को प्रेरित कर उन्हें रास्ता दिखाए।

देश की विशाल आबादी हमारा संकट है। बावजूद इसके इस प्रश्न पर बोलना खतरे से खाली भी नहीं है। सारे संसाधन पैदा होते ही अगर कम हो जाते हैं तो इसका कारण हमारी विशाल जनसंख्या ही है। शायद इसलिए मोदी यह कहते नजर आ रहे हैं कि ‘अर्थ केंद्रित वैश्वीकरण या मनुष्य केंद्रित वैश्वीकरण?’ उनका यह प्रश्न खुद से भी है, देश से भी और नीति-निर्माताओं से भी है। उन देशों से भी है जो तमाम चमकीली प्रगति के बाद भी गहरी निराशा में हैं। मोदी मानते हैं कि आपदा को अवसर में बदला जा सकता है। लोगों के दुख कम किए जा सकते हैं। उन्होंने भुज के उदाहरण से समझाने की कोशिश भी की है कि कैसे खत्म हुए इलाके फिर सांस लेने लगते हैं, धड़कने लगते हैं।

प्रधानमंत्री के इस भाषण की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्द का कई बार इस्तेमाल किया। यह आत्मनिर्भर भारत ही दरअसल अपने पैरों पर खड़ा भारत, स्वावलंबी भारत है। जहां अपने जरूरत की चीजें और उनका निर्माण हम कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ‘वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट’ जैसे अभियान के माध्यम से इसे संभव भी कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री जो उदार आर्थिक नीतियों के पक्ष में रहे हैं, अगर आज आत्मनिर्भर भारत को एकमात्र मार्ग बता रहे हैं, तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। यानी अब वह स्थिति है जिसमें भारत एक ग्लोबल लीडर बनने की आतुरता दिखा रहा है। वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि ‘लोकल ने हमें बचाया है, लोकल के लिए वोकल बनिए और यही हमारा जीवन मंत्र होना चाहिए।’ 

कोरोना के वैश्विक संकट ने भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के सामने जैसे प्रश्न खड़े किए हैं, उनके उत्तर हमेशा सकारात्मक नहीं हो सकते। सरकारों और उसके तंत्र को कोसते आए हम लोग अचानक उसकी श्रेष्ठता और जनपक्षधरता का बखान नहीं कर सकते। यह तंत्र जैसा भी है, बना और बनाया गया है। यह जितना भी उपयोगी या अनुपयोगी है, सच यह है कि वही हमारे काम आ रहा है। बहुनिंदित पुलिस, सरकारी डॉक्टर, नर्स, सफाई और स्वच्छता से जुड़ा सरकारी तंत्र ही इस महान संकट में अपनी जान जोखिम में डालकर आपके पास पहुंच रहा है। बावजूद इसके कि हर जगह उनके लिए फूल नहीं बरस रहे। कहीं पत्थर हैं तो कहीं व्यापक असहयोग। आप सोचें कि जिस तरह निजीकरण की अंधी आंधी 1991 से चली और यह लगा कि सरकार का काम स्कूल, अस्पताल और सेवा के तमाम काम करना नहीं है, ये सारे काम तो निजी क्षेत्र में ही गुणवत्ता से संभव हैं। आप कल्पना करें कि अगर यह बुरे और खराब सेवाएं देने वाले सरकारी अस्पताल भी हमारे पास न होते क्या होता?     

हम जानते हैं कि कभी भी नायक उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ते। देश की विशाल आबादी जो अपने संकटों के कारण अब महानगरों से पलायन कर रही है। उसकी उम्मीदें टूट रही हैं और वह किसी भी हाल में अपने गांव या घर पहुंचना चाहती है। ऐसे में सरकारों का दायित्व क्या है? राष्ट्रनायकों का दायित्व क्या है? यही कि वे भरोसे को दरकने न दें। उम्मीदों को टूटने न दें। सपनों को मरने न दें। हमें यह मान लेना चाहिए कि देश की इतनी विशाल आबादी के लिए कोई भी तंत्र या व्यवस्था द्वारा बनाए गए इंतजाम नाकाफी ही साबित होंगे। किंतु जहां जैसे संकट खड़े हो रहे हैं, सरकारें और समाज पीड़ित जनों के साथ खड़े होते ही हैं। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है कि उसके प्रति विश्वास खत्म हो चुका है। वे कुछ भी करें, अब वह भरोसा हासिल नहीं कर सकते। यह भरोसा धीरे-धीरे तोड़ा गया है। सरकार, मीडिया, समाज आदि सबने मिलकर सरकारी संस्थाओं, सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, सरकारी सेवाओं से लोगों का भरोसा डिगाया है। सरकारी फोन से लेकर सरकारी पीडीएस की दुकानों की तरफ देखने की हमारी खास दृष्टि है।

आप यह भी देखें कि प्राइवेट विश्वविद्यालय, प्राइवेट फोन कंपनियां, प्राइवेट अस्पताल भी तमाम गलतियां करते हैं पर निशाने पर सरकारी संस्थाएं ही होती हैं। मीडिया के निशाने पर भी सरकारी संस्थाएं ही होती हैं, जैसे निजी क्षेत्र में रामराज्य कायम हो। सरकारों की जड़ता, नीति-नियंताओं की स्वार्थपरता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। अपनी ही संस्थाओं के प्रति सरकारें अनुदार होती गयीं और निजी क्षेत्र पर उनकी कृपा और संवेदना बरसने लगी। किंतु जब संकट आन पड़ा तो वही बहुनिंदित, लापरवाह और कथित तौर पर भ्रष्ट तंत्र ही हमारे काम आया। आज भी नीचे के स्तर पर हमारे सफाई कामगारों, नर्स बहनों से लेकर, सेनिटाइजेशन के काम से जुड़े लोग, पुलिसकर्मियों से लेकर आंगनबाड़ी की बहनों की सेवाओं की ओर देखना चाहिए।

सही मायनों में मोदी सपनों के सौदागर हैं। वे निराश नहीं होते, निराशा नहीं बांटते। अवसाद की परतें तोड़ते हैं और उजास जगाते हैं। वे इसीलिए अपने इस भाषण में एक नायक की तरह बात करते हैं। वे कहते हैं ‘कर्मठता की पराकाष्ठा और कौशल(क्राफ्ट) की पूंजी से ही भारत आत्मनिर्भर बनेगा।’ वे जोड़ते हैं कि मिट्टी की महक से बनेगा नया भारत। हम देखें तो एक नायक तौर पर मोदी संभावनाओं में ही निवेश कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्रियों के साथ सतत संवाद कर रहे हैं। उन्हें नेतृत्व दे रहे हैं। अपनी ओर से विविध वर्गों से संवाद कर रहे हैं।

एक लोकतंत्र में संवाद से ही दुनिया बनती और अवसर सृजित होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि संकट गहरा है, इंतजाम नाकाफी हैं, सेवाएं गुणवत्तापूर्ण नहीं है, रामराज्य अभी भी प्रतीक्षित ही है, ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन करने वालों की संख्या सीमित है। फिर भी हिंदुस्तान का मन मरा नहीं है। अपनी विशाल आबादी, विशाल संकटों के बाद उसका हौसला टूटा नहीं है। उसकी संवेदनाएं मरी नहीं है। हमारे श्रमदेव और श्रमदेवियों की अपार उपेक्षा के बाद भी, हमारे किसानों के लाख संकटों के बाद भी भारत फिर उठ खड़ा होगा और सपनों की ओर दौड़ लगाएगा, भरोसा कीजिए। कोरोना संकट के बाद का भारत एक नई तरह से सोचेगा, व्यवहार करेगा। साथ ही ज्यादा आत्मनिर्भर और ज्यादा समर्थ होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर और कुलसचिव हैं)

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'हैप्पी बर्थडे चित्रा त्रिपाठी, यही खूबियां बनाती हैं आपको दूसरों से खास'

चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
MALVIKA HARIOM

मालविका हरिओम, कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता।।

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर गोरखपुर से निकलने वाली एक बड़ी शख्सियत के रूप में चित्रा त्रिपाठी ने न सिर्फ अपने शहर और अपने प्रदेश का ही नाम रोशन किया, बल्कि उन सभी लोगों को गर्व की अनुभूति भी करवाई, जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहे। उनकी मम्मी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद तमाम दूसरी भारतीय महिलाओं की तरह घर पर ही रहीं। सिर्फ परिवार को देखा और अपने सपनों को तिलांजलि दे दी, लेकिन वे अपनी बेटी चित्रा में लगातार कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक को भरती रहीं। यही कारण है कि कुछ अच्छा करने का जज्बा जन्म के साथ ही मां के आशीर्वाद के रूप में चित्रा को मिल गया और फिर उस सफर को देखें तो जिन छोटी जगहों के बच्चे ठीक से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर पाते, वहां से एक लड़की अपने दम पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और एक दिन उस ऊंचाई पर पहुंच जाती है, जहां से दुनिया उसे आसानी से देख सके।

सुंदर चेहरा, विनम्र स्वभाव, संवेदनशील हृदय और कुछ कर गुजरने का जज्बा, इन सबको मिलाकर चित्रा की एक ऐसी तस्वीर तैयार होती है जो श्रोताओं और दर्शकों को एक अपनत्व और जुड़ाव का अहसास कराती है। चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं। सोशल मीडिया पर उनके भावनात्मक लाइव प्रसारण उनकी सकारात्मक छवि को स्थापित और पुख्ता करते हैं।

आज चित्रा एक सेलिब्रिटी हैं। लेकिन मुझे याद आती है वो प्यारी चित्रा, जिसे मैंने गोरखपुर में उसके संघर्ष के दिनों में देखा था। वहां कई नए लड़के-लड़कियां जो बतौर रिपोर्टर अखबारों में काम करते थे, घर आया करते थे। पतिदेव डॉ. हरिओम उन दिनों जिलाधिकारी गोरखपुर के पद पर तैनात थे और हम दोनों ही चूंकि सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि लेते थे, इसलिए कोई न कोई घर पर इंटरव्यू लेने या बातचीत करने जरूर आ जाता था। इसी सिलसिले में एक दिन चित्रा का भी आना हुआ। लॉन में दो कुर्सियाँ लगाई गईं। उन दिनों वहां एक लोकल चैनल 'सत्या' हुआ करता था। चित्रा उसी में खबरें पढ़ती थीं। सुंदर चेहरा, चमकती आंखें, गर्दन तक कटे हुए छोटे-छोटे बाल, नई उम्र का उत्साह, गज़ब का आत्मविश्वास और कुछ कर गुजरने का जज्बा, ये सबकुछ एकसाथ मुझे उस लड़की में नज़र आया। ज़िलाधिकारी का इंटरव्यू लेने के नाते चित्रा पूरी तैयारी के साथ आई थी। हाथ में ढेर सारे पन्ने, उन पर लिखे हुए सवाल और चेहरे पर हमेशा की तरह एक प्यारी-सी मुस्कुराहट। इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। चित्रा ने साबित कर दिया कि ख़ूबसूरत चेहरे के साथ-साथ उसमें क़ाबिलियत भी भरपूर है।

फिर एक दिन किसी काम से जब ‘सत्या’ चैनल पर जाना हुआ तो गर्मी के दिनों में दूसरे फ्लोर पर, एक कमरे के छोटे-से स्टूडियो में चित्रा खबरें पढ़ने के लिए तैयार खड़ी थी। गर्मी की वजह से चेहरे पर काफ़ी पसीना आ रहा था। मैंने देखा कि वो खबरों की तैयारी के साथ-साथ, अपने मेकअप का काम भी ख़ुद ही देख रही थी। हम दोनों मिले, थोड़ी-सी बात हुई और उसके बाद वो अपने समाचार प्रसारण की तैयारी में लग गई। मैं देखती ही रह गई कि इतनी छोटी-सी लड़की में कितना आत्मविश्वास है और काम के प्रति कितनी लगन और ईमानदारी है। समाचार पढ़ने में अभी वक़्त था लेकिन चित्रा को खाली बैठना गंवारा नहीं था। वह कुर्सी पर बैठ गयी और समाचार पढ़ने की रिहर्सल करने लगी। जब मैंने उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुराई। वो मुस्कुराहट मुझे आज तक याद है।

आज चित्रा मेरी छोटी बहन की तरह है। हम लोग फोन पर बात करते हैं, मिल भी लेते हैं। जब भी उसको देखती हूं तो यही लगता है कि लड़कियां अब किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अच्छी सोच हो, काम के प्रति निष्ठा हो और कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो छोटे शहरों से आई लड़कियां भी देश-दुनिया की तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। चित्रा ने यह कर दिखाया। आज 'चित्रा त्रिपाठी' सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि एक 'प्रेरणा' है, उन तमाम लड़कियों के लिए जो न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं बल्कि समाज-दुनिया की बेहतरी के लिए कुछ अच्छा और सकारात्मक भी करना चाहती हैं।

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाओं के साथ प्रिय चित्रा के लिए मेरी ये पंक्तियां-

ऊंची लहरों पे चढ़ के आई हूं
मैं जमाने से लड़ के आई हूं
मुफ्त का ज्ञान ना थोपो मुझपर
अपने हिस्से का पढ़ के आई हूं

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'पत्रकार संगठन कब तक इस खुशफहमी में जीते रहेंगे कि वे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है!'

मैं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से सीधे सवाल करना चाहता हूं कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ को स्वतंत्र भारत की सरकारों ने अब तक लंगड़ा/अपाहिज क्यों बनाए रखा है?

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
Vinod Bhardwaj

विनोद भारद्वाज, वरिष्ठ पत्रकार।।

कोरोना से संक्रमित पत्रकार साथी ‘दैनिक जागरण’ के उप समाचार संपादक पंकज कुलश्रेष्ठ की कुर्बानी के बाद आज मैं भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से ये सीधे सवाल करना चाहता हूं कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ को स्वतंत्र भारत की सरकारों ने अब तक लंगड़ा/अपाहिज क्यों बनाए रखा है?

अन्य तीनों स्तम्भों की तरह इस चौथे स्तम्भ को सरकार ने सुरक्षित और संरक्षित क्यों नहीं किया? इस चौथे स्तम्भ को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति आर्थिक और कानूनी अधिकारों से वंचित रखने की साजिश क्यों होती रही है? यही प्रश्न मेरा मीडिया घरानों से भी है कि अब तक सरकार को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति अधिकार और सुविधा सम्पन्न करने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया?

स्वतन्त्र भारत की अब तक की सरकारों ने मीडिया/पत्रकारों का सिर्फ निज स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया है। केवल सरकारें (विधायिका)ही नहीं, कार्यपालिका और न्यायपालिका भी इस चौथे स्तम्भ का अपने हितों के लिए दुरुपयोग की हद तक इस्तेमाल करने में पीछे नहीं दिखी हैं। लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों का भरसक प्रयास यही रहता है कि मीडिया/पत्रकार नाम का ये चौथा स्तम्भ उनकी तरह मजबूत/सुरक्षित न होने पाए!

हम पत्रकारों ने भी इसी अधोगति को अपनी नियति मान लिया है। हम सिर्फ इसी खुशफहमी में जिंदा रहकर गर्व महसूस करते हैं कि सब हमको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं, नेताओं-अधिकारियों से दुआ सलाम है हमारी..बहुत पूछ है हमारी..जबकि हाल बिल्कुल उलट है! अपने हालातों/दुर्गति पर ईमानदारी से गौर करके अपनी अंतरात्मा से तो पूछिए कि क्या हम यथार्थ में अन्य तीनों स्तम्भों के पासंग में भी टिकते हैं?

आखिर इन चौतरफा दुर्गतियों के बीच हमारे पत्रकार भाई/पत्रकार संगठन कब तक इस खुशफहमी में जीते रहेंगे कि वे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है! मौजूदा सरकार को इस तथाकथित चौथे स्तम्भ के बारे में अब अपना नजरिया साफ तौर पर स्पष्ट करना ही चाहिए।

सरकार से जवाब मांगिये साथियों कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को अब तक लंगड़ा, मजबूर और दया का पात्र बनाकर क्यों रखा गया है? इस चौथे स्तम्भ को लंगड़ा बनाए रखने के पीछे अन्य तीनों स्तम्भों के बीच आखिर कौन सी दुरभिसन्धि है और क्यों?

सरकार यह भी खुले मंच से स्पष्ट करे कि वह इस चौथे स्तम्भ को अन्य तीनों स्तम्भों की भांति सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत करना चाहती है या नहीं! ...और यदि वह ऐसा नहीं करना चाहती तो क्यों? इस देश की जनता को भी ये जानने का पूरा हक है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को नजरंदाज और बर्बाद करके वह तीन स्तम्भों के बूते तिपाया बनकर तृप्त/खुश क्यों है?

अब हम पत्रकारों को अपनी ये दुर्गति किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। हमको सरकार से ये सारे सवाल करने और उन्हें जवाब देने के लिए मजबूर करने का पूरा हक है। अपने साथी पंकज कुलश्रेष्ठ के परिवार के लिए आर्थिक और सरकारी संरक्षण की माग और उसकी पूर्ति कराना हमारा हक है, कोई भीख नहीं!

(लेखक ‘ताज प्रेस क्लब’, आगरा के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

डेढ़ महीने से ज़्यादा हो गया। अभी दो-तीन महीने और चलेगा, ऐसी आशंका है। उसके बाद साल भर तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स होंगे।

राजेश बादल by
Published - Sunday, 10 May, 2020
Last Modified:
Sunday, 10 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।। 

डेढ़ महीने से ज़्यादा हो गया। अभी दो-तीन महीने और चलेगा, ऐसी आशंका है। उसके बाद साल भर तक इसके आफ्टर इफेक्ट्स होंगे। यानी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर लौटने में दो साल तो लग जाएंगे। तब तक मीडिया के तमाम अवतार क्या इसी तरह दिखाते,सुनाते और पढ़ाते रहेंगे, जैसे आज कर रहे हैं। क्या पत्रकारिता के किसी केंद्र में इस बात पर बहस हो रही है कि एक हजार घंटे से भी अधिक समय से मीडिया की चिमनी से कोरोना का ज़हरीला धुआं निकल रहा है। इस मानसिक प्रदूषण का दर्शकों,श्रोताओं और पाठकों पर कितना असर पड़ रहा है, किसी ने सोचा है।

आज सिर्फ सरकारी माध्यमों की बात। इनको देखें तो लगता है कि आकाशवाणी के तमाम केंद्रों को इनदिनों जैसे लकवा मार गया है। अधिकतर केंद्र एक ही प्रसारण दोहराते हैं। उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों की खुशबू कपूर की तरह उड़ गई है। विविध संस्कृति की झलक नहीं सुनाई देती। सुबह से लेकर रात तक सारे प्रसारण सिर्फ कोरोना के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गए हैं। कोरोना पर भी श्रोता सुनने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कुछ नया तो हो। रोज-रोज वही घिसी-पिटी सूचनाएं और उन्हीं को ड्यूटी की तरह दोहराते रेडियो जॉकी और जानकार। कहां गई हमारी पेशेवर हुनरमंदी? बोझिल और अवसादग्रस्त दिमागों को राहत भी चाहिए। सुगम संगीत, फिल्म संगीत, लोकगीत और रेडियो-साहित्य का अनमोल ख़जाना जैसे किसी ने लूट लिया है। एफएम गोल्ड का तो सत्यानाश ही कर दिया गया। इसी तरह अन्य चैनलों की दुर्दशा है। मत भूलिए कि लॉकडाउन के दरम्यान एक ही घर में बच्चे,बूढ़े,महिलाएं और पुरुष बंद हैं। क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी वर्गों का ध्यान रखा जा रहा है? कतई नहीं।

इसी तरह दूरदर्शन और उनके तमाम केंद्रों में इन दिनों अधिक से अधिक बोर करने वाले कार्यक्रमों की होड़ लगी है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को छोड़ दें तो कुछ भी नया और ताजगी भरा नहीं है। वैसे तो ये दोनों धारावाहिक भी दूरदर्शन ने तीस-पैंतीस साल पहले बनाए थे। कथावस्तु को छोड़ दें तो इन धारावाहिकों की तकनीक, प्रस्तुति और पटकथा एकदम बासी और आउट ऑफ डेट हो चुकी है। अगर इतने पुराने धारावाहिक ही दिखाने थे तो भारत का पहला धारावाहिक ‘बीवी नातियों वाली’ क्यों नहीं दिखाया गया? उसके बाद सुपरहिट ‘हम लोग’, ‘तमस’, ‘बूंद बूंद’, ‘मालगुडी डेज’ और कालजयी ‘मिर्जा गालिब’ के प्रदर्शन पर विचार नहीं किया गया। मत भूलिए कि इस दौरान दो तीन नई पीढियां आ चुकी हैं और हमें उनके लिए कंटेंट उन्हीं के हिसाब से तैयार करना पड़ेगा। तभी वे दूरदर्शन और सरकारी रेडियो पर ठहरेंगे।

सरकारी प्रचार माध्यम लोगों के दिलों में जगह क्यों नहीं बनाते? उन्हें देखते ही उबकाई सी क्यों आती है-किसी ने सोचा है? अपवाद के तौर पर रेडियो-टीवी के कुछ प्रस्तोता हो सकते हैं, जो हर तरह के कार्यक्रम पेश करने में माहिर हैं, मगर पुराने फिल्म संगीत की जानकार कोई प्रस्तोता कम्पोस्ट खाद बनाने की विधि समझाएगी तो अटपटा लगता ही है। या दूरदर्शन पर समाचार विश्लेषण में कोई ऐसा एंकर स्क्रीन पर हो, जिसने पढ़ना-लिखना ही छोड़ दिया हो अथवा विषय की गहराई तक समझ न हो तो वह केवल नौकरी करता ही नज़र आता है। हर एंकर अशोक श्रीवास्तव नहीं हो सकता। यह बात तो समझनी होगी मिस्टर सरकारी मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!   

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता के लिए ये वाकई मुश्किल दौर है

उस सूरत में अपने आपको भी जवाब देना होगा मिस्टर मीडिया!

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‘भाई पंकज कुलश्रेष्ठ को यही होगी सच्ची श्रद्धांजलि’

कल रात 10.30 बजे सोशल मीडिया पर एक बड़े मीडिया ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार की कोरोना से इंतकाल की खबर आयी।

Last Modified:
Friday, 08 May, 2020
Rajeev Gupta

राजीव गुप्ता।।

कल रात 10.30 बजे सोशल मीडिया पर एक बड़े मीडिया ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार की कोरोना से इंतकाल की खबर आयी। सब को जिज्ञासा हुई कि कौन सा पत्रकार और कौन सा मीडिया संस्थान, लेकिन कुछ ही समय में मीडिया ग्रुप का व पत्रकार भाई पंकज ‪कुलश्रेष्ठ का नाम सामने आते ही लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि भगवान न करे अगर कुछ हो गया तो क्या आगरा की व्यवस्था में यहां के निवासियों को धरती पर नरक भोगना पड़ेगा। आज भाई पंकज कुलश्रेष्ठ के असमय ‪निधन ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या भारतीय शासन व प्रशासन की व्यवस्था में हम पंगु हैं, असहाय हैं, क्या कलम की ताकत कम हो गयी है, क्या मानव अधिकार कुछ नहीं हैं।

मीडिया जो शहर के उच्च पद तक पहुंच रखता है। संस्थान पीएमओ तक पहुंच सकता है, फिर भी वरिष्ठ पत्रकार भाई पंकज जी को हम आगरा प्रशासन व व्यवस्था से इलाज न दिला सके। यहीं पर सवाल उठता है कि अगर सुरक्षाकर्मी की ही सुरक्षा को आंच आ जाए तो बाक़ी लोगों का क्या होगा। अखबार किसी भी व्यवस्था की आंख होते हैं और क्या हमारी आंख देखकर भी अनदेखा कर गई या कलम बेबस थी। आज सभी मीडिया को एकजुट होकर शहर को बचाना चाहिए, नहीं तो देखते देखते रोम जल जाएगा और नीरो बंसी बजाता रहेगा, वाली कहावत हो जाएगी।

कहीं हम दबाव में तो नहीं। कल रात की घटना के बाद आज चिंता का दिन है। आम मरीज़ को इलाज नहीं है। कोरोना के मरीज के इलाज या क्वारंटाइन सेंटर पर अव्यवस्था की विडियो सोशल मीडिया पर दिल दहला देती हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या हो गया कि आगरा मॉडल की जो तारीफ़ हो रही थी, उसका गणित कब, कहां और केसे बदल गया? शहर तो छोड़िए, बाहर के लोगों को आगरा की चिंता सता रही है। उनके अनेक सवाल होते हैं, पूछते हैं कि सरकार व प्रशासन क्या कर रहा है? क्या लोग डर के मारे अपनी बीमारी छिपा रहे हैं? इतने पॉजिटिव मरीज हैं तो क्या व्यवस्था है। क्या क्वारंटाइन सेंटर, अस्पताल, दवाई खाना, किट, डॉक्टर ऑर पैरा मेडिकल स्टाफ में दिल्ली जैसे महानगर की जनसंख्या के अनुसार आगरा आगे है। कहां और क्या कमी है? क्या आगरा की इस स्थिति को अनदेखी से चाइना का बुहान शहर तो नहीं बना रहे?

आज रेड क्रॉस डे की स्वर्ण जयंती है और भाई पंकज कुलश्रेष्ठ को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब मीडिया व शहर एकजुट होकर कमियों को दूर कराए, न कि आलोचना में समय लगाए। तभी आगरा कोरोना से जीत पाएगा उसे हराया व भगाया जा सकेगा। भावभीनी श्रद्धांजलि शत-शत नमन्

(लेखक नेशनल चैम्बर के पूर्व अध्यक्ष और सामाजिक संस्था लोक स्वर के अध्यक्ष हैं)

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‘किसी की FB वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए, यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव था शशि’

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए

Last Modified:
Friday, 08 May, 2020
srinet

दिनेश श्रीनेत, वरिष्ठ पत्रकार

अमर उजाला बरेली के सिटी संस्करण में उन दिनों लगातार नए चेहरे आते रहते थे। बहुत से लोग ट्रेनिंग के लिए कुमाऊं ब्यूरो से बुलाए जाते थे। उनकी अच्छी तरह से घिसाई हो, इसके लिए सिटी संस्करण में भेज दिया जाता था। सिटी में काम करना सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण था। करीब 12 से 14 घंटों की ड्यूटी, एक-एक मिनट की डेडलाइन को फॉलो करना, हमेशा सांस अटकी रहना कि कौन सी खबर छूट जाए या फोटो कैप्शन में कोई चूक हो जाए। हर रोज के अखबार और छूटी खबरों पर अगले दिन गहन समीक्षा होती थी।

वीरेन डंगवाल उन दिनों अखबार के सलाहकार संपादक थे और इस तानाशाही भरे माहौल में एक उदारवादी चेहरा भी। साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के प्रति उनके मन में खास अनुराग रहता था। वे चापलूसी और दिखावा करने वालों को ताड़ लेते थे और उनका सार्वजनिक रूप से मजाक भी बना देते थे। वे किसे पसंद करते हैं और किसे नहीं यह हमें बहुत बाद में पता लगता था। तो पहाड़ी ब्यूरो से आने वाले नवोदितों के बीच कुछ कवि ह्रदय और वाम आंदोलन से जुड़े युवा भी हमारी टीम का हिस्सा बन जाते थे। एक दिन छोटे कद का बेहद दुबला-पतला शख्स न्यूजरूम में दिखा। पता चला कि उनका नाम शशिभूषण द्विवेदी है और वे यहां डेस्क पर सहयोग करेंगे।

धीरे-धीरे हमें रोजमर्रा के कामकाज के अलावा शशि की साहित्यिक दिलचस्पियां भी पता चलने लगीं। उन्हीं दिनों डंगवाल जी की पहल से एक साहित्यिक सप्लीमेंट शुरू हुआ था। उसका नाम 'आखर' था। मैं उस सप्लीमेंट का प्रभारी था और शशि को मेरा सहयोगी बनाया गया था। नया-नया इंटरनेट आया था। शशीभूषण ने इंटरनेट से कई दिलचस्प साहित्यिक जानकारियां जुटानी शुरू कीं जिसका इस्तेमाल हम 'आखर' में किया करते थे। उन्हीं दिनों इंटरनेट पर एक साहित्यिक पत्रिका निकली थी जिसके संपादक राजेश रंजन थे। जो इन दिनों ऐपल कंपनी में भारतीय भाषाओं के प्रभारी हैं। वहां से हमने राजेंद्र यादव की बेटी के संस्मरण साभार लिए थे। शशि ने मेरे लिए इंटरनेट में एक छोटी सी खिड़की हिंदी साहित्य के लिए भी खोल दी, जो बाद में मेरे बहुत काम आई।

मैंने उन्हीं दिनों शशिभूषण की कहानियां भी पढ़ीं जो मुझे पसंद भी आईं। शशि डेस्क पर थे इसलिए दोपहर में वे घर पर ही रहते थे। बरेली का एक इलाका था, सुभाष नगर जो शहर के दूसरे इलाकों के मुकाबले कुख्यात और सस्ता था। ज्यादातर नए पत्रकार उसी इलाके में रहा करते थे। शशि ने भी वहीं पर एक कमरा ले रखा था। मैं रिपोर्टिंग में था तो अक्सर दोपहर में जब कभी पास में बेसिक शिक्षा विभाग के दफ्तर रिपोर्टिंग करने निकलता तो फुरसत मिलने पर शशि से मिलने चला जाता था। शशिभूषण तब बैचलर थे और उन्होंने बहुत छोटी सी गृहस्थी बसा रखी थी।

एक अंधेरे से आंगन से ऊपर को सीढ़ियां जाती थीं। आंगन के ऊपर लगी लोहे की ग्रिल को पार करके मैं उनके कमरे में पहुंचता था। हमारी बातचीत का विषय पहले पढ़ी गई किताबें, नई साहित्यिक पत्रिकाएं और साहित्यकारों से जुड़े किस्से होते थे। शशि के पास साहित्यिक बिरादरी से जुड़ी ढेरों सूचनाएं होती थीं। बाद में कभी-कभी मैं और राजेश शर्मा मजाक में कहते थे कि अगर साहित्य के पाठकों के लिए कोई स्टारडस्ट जैसी पत्रिका निकले तो शशिभूषण से बेहतर संपादक कोई नहीं हो सकता। शशि मेरे लिए चाय बनाते थे और हम तीन-चार घंटों तक गपशप करते रहते थे। उनके कमरे की एक खिड़की सुभाष नगर के नाले से लगे विशाल मैदान की तरफ खुलती थी। जब सूरज ढलने लगता तब मैं दफ्तर के लिए रवाना हो जाता। कभी अकेले कभी उनको भी साथ ले लेता था।

शशि अपनी कहानियों पर बहुत मेहनत करते थे। उस समय तक उनका एक संग्रह आ चुका था। यह ज्ञानपीठ से आया था, 'ब्रह्महत्या और अन्य कहानियां'। शशि को अपनी कहानियों मे ऐतिहासिक प्रतीकों के इस्तेमाल का शगल था। वे अक्सर इस बारे में बात भी करते थे। इतिहास से संबंधित अपनी जानकारियों और अध्ययन का इस्तेमाल वे अपने कथानक में करते थे। मुझे उनकी एक कहानी बहुत पसंद थी, जो एक मुसलिम अविवाहित महिला शिक्षिका के बारे में थी। इस कहानी के अलावा उस समय तक प्रकाशित ज्यादातर कहानियों में वे जटिल संरचना वाली कहानियां बुनना पसंद करते थे। मेरी उनसे इस पर बहस होती थी।

मैं कहता था कि उनकी कहानियों का कथ्य अत्यधिक प्रयोगधर्मिता के बोझ से दब जाता है। इसके बावजूद उनकी कहानियां किसी चमत्कार के मानिंद हैं। पात्रों और स्थितियों के प्रति विडंबनात्मक उपहास के भाव में उनकी लेखनी का कौशल झलकता था। उनकी कहानियों मे ऐतिहासिक गाथा या मिथ वर्तमान के नैतिक प्रश्नों के साथ गुत्थमगुत्था हो जाती थी। इसे वे किस्सागोई की शैली में पिरोते थे और बीच-बीच में अपने पाठक से संवाद करते हुए ब्रेख्त की शैली में उसे 'एलिनिएट' भी करते चलते थे। कहानी किसी रोलर-कोस्टर की तरह अतीत से वर्तमान, किस्से से यथार्थ, करुणा से परिहास और हकीकत से फैंटेसी के बीच पाठकों को झुलाती रहती थी।

जब आप उनकी कहानियों को पढ़ते हैं तो वह छोटे कद का चमकती आंखों वाला दुबला-पतला सा शख्स कुछ और ही लगने लगता था। शशिभूषण का ईमानदार मूल्यांकन नहीं हुआ है। शायद इसकी एक वजह यह भी है कि वे बहुतों को नाराज कर देते थे। शराब पीने और बहक जाने के बहुत से किस्से मैंने दूसरों से सुने हैं मगर मैं किसी ऐसी घटना का गवाह नहीं रहा हूं। शशि का तबादला अमर उजाला के नोएडा ऑफिस हो गया। वे वहां गहरे तनाव और फ्रस्ट्रेशन से गुजरे। बाद में वहां के माहौल पर एक अद्भुत कहानी लिखी थी जो अखबारवालों के बीच खूब सर्कुलेट हुई। कादंबिनी पत्रिका जॉइन करने के बाद मैं उनसे दो-तीन बार मिला हूं। मगर उन मुलाकातों में वो शशिभूषण नहीं मिला जिससे मैं अपने न्यूजरूम या सुभाषनगर की गलियों में मिला था।

अभी पिछले बुकफेयर में वे बहुत धज के साथ किसी प्रकाशक के स्टॉल पर आयोजित परिचर्चा में मिले थे। जाने क्यों मुझे हमेशा लगता था कि वो शशि कभी न कभी जरूर मिलेगा और खुलेगा। वह संकोच भरी मुस्कान और परिहास उड़ाती सिकुड़ी आंखों वाला शशि कभी दिल्ली में ओढ़े गए आवरण से निकलकर बाहर आ ही जाएगा। मगर आज जो हुआ वह किस कदर अप्रत्याशित और एबरप्ट था। ठीक उनकी कहानियों की तरह। किसी ने उन्हें टैग कर रखा था, सिर्फ यह लिखकर कि "कह दो कि यह झूठ है!" मैंने क्लिक किया और उनकी वॉल पर चला गया जो श्रद्धांजलि संदेशो से भरी थी।

"किसी की खुद की वॉल उसके ही मृत्यु संदेशों से पट जाए। शशि यह तो तुम्हारी कहानियों में संभव हो सकता था... मैं स्तब्ध हूं और मन बोझिल है। कुछ अधूरा छूट गया था तुम्हारे साथ जिसकी टीस हमेशा रहेगी।"

(साभार: फेसबुक वाल से)

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