वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने यूं समझाया भाषाओं का ‘गणित’

भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 14 September, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Rahul Dev

राहुल देव, वरिष्ठ पत्रकार।।

सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के सामने अलग-अलग अंशों में लेकिन लगभग अटल और अपरिहार्य दिखते लोप के सामने निरुपाय खड़ी दिखती हैं।

भाषाओं का यह संकट अपने दीर्घावधि निहितार्थों और बहुआयामी प्रभावों में भारतीय सभ्यता का संकट बन जाता है। कारण सीधा है। भाषा और संस्कृति,राष्ट्र, राष्ट्बोध और राष्ट्रीयता का गर्भनाल जैसा संबंध है। भाषा इनकी गर्भनाल है। भाषा के बिना किसी समाज/समूह की संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कृति की सबसे बड़ी, सबसे प्रभावी और शक्तिशाली वाहिका भाषा ही होती है। भाषा में ही संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपादान, उसकी चिन्तन-आध्यात्मिक-ज्ञान-साहित्य-शास्त्रीय-लोक संपदा निर्मित, संचारित और प्रवाहित होती है। संस्कृति के अन्य रूप- साहित्य, ललित कलाएं, गीत संगीत, स्थापत्य, वेशभूषा, खानपान, पर्व त्यौहार, सामाजिक रीतियां, परंपराएं, लोकाचार आदि मुख्यतः भाषा के कारण और माध्यम से ही प्रकट होते हैं।

100 साल पहले 1918 में चेन्नई में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति स्थापित करने वाले महात्मा गांधी और उसके 40 साल बाद भारत के संविधान निर्माताओं ने भाषा संबंधी प्रावधान बनाते समय इसकी दूर-दूर तक कल्पना नहीं की थी कि जिन महान उद्देश्यों, राष्ट्रनिर्माण के जिन सपनों को सामने रखकर उन्होंने यह पुरुषार्थ किए थे, भारतीय राष्ट्र और उसके भविष्य का जो चित्र उन्होंने अपने सामने रखा था उसका साकार रूप 70 साल में ही इतना अलग, इतना विकृत हो जाएगा।  लेकिन हमारी आंखों के सामने आज जो दृश्य है और निकट भविष्य में आकार लेता दिखाई दे रहा है, वह इतना विकराल है, गहरे संस्कृतिमूलक आयामों में राष्ट्र निर्माताओं की कल्पना के इतना विपरीत है कि विश्वास नहीं होता।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त अपनी मौलिक अंतःप्रेरणा और साभ्यतिक आभा के आलोक में भारत एक बार फिर चमचमाकर खड़ा होगा, अपना नवनिर्माण करेगा वह सपना आज अंग्रेजी के ऐसे भाषायी साम्राज्यवाद की जकड़ में है जो दिनोंदिन मजबूत होती जा रही है। 150 वर्षों के प्रयासों के बाद भी 15% भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेजी इस देश की 85% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है। अंग्रेजी़ न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंचे अवसरों, रोज़गारों से वंचित करोड़ों युवा प्रतिभाएं आज रोज कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास को तिल तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। अंग्रेज़ी से वंचित होना दोयम दर्जे का भारतीय होना है। केवल किसी भारतीय भाषा में जीने-काम करने वाला व्यक्ति अंग्रेज़ी वालों के सामने दीन हो जाता है। इस आत्मदैन्य को अपनी बातचीत में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों, अभिव्यक्तियों को ढूंसता हिन्दुस्तानी ही आज प्रतिनिधि हिन्दुस्तानी है।

वर्तमान से अब ज़रा भविष्य में चलते हैं। सन 2050 की कल्पना कीजिए। तब तक हमारा भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका होगा। भारतीय प्रतिभा, उद्यमशीलता और हमारी बुनियादी लोकतांत्रिकता विश्वमंच पर भारत का अटल उदय सुनिश्चित कर चुके हैं। चरम गरीबी, कुपोषण, भुखमरी, शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन बड़ी हद तक मिट चुके होंगे। आम भारतीयों का जीवन स्तर, सुविधाएं काफी ऊपर आ चुके होंगे। देश के 50-60% भाग का शहरीकरण हो चुका होगा। आधुनिक सुख सुविधाएं, तकनीकी यंत्र, साधन गांव-गांव तक पहुंच चुके होंगे। सारा देश डिजिटल जीवन पद्धति को बहुत बड़ी हद तक अपना चुका होगा। ब्रॉडबैंड और उसके माध्यम से मिलने वाली अनंत सेवाएं आम हो चुकी होंगे।

अब कल्पना के घोड़े दौड़ाइए और सोचिए-उस भारत के अधिकतर नागरिक अपने जीवन के सारे प्रमुख काम किस भाषा में कर रहे होंगे? पूरे देश में शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, शोध, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, न्याय जैसे हर बड़े क्षेत्र में किस भाषा का प्रमुखता से उपयोग हो रहा होगा? वह देश भारत होगा, भिंडिया या सिर्फ़ इंडिया?  उस इंडिया में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हमारी बड़ी 22 और 16 सौ से अधिक छोटी भाषाओं-बोलियों की स्थिति क्या होगी? कहां होंगी वे? होंगी भी कि नहीं?

मेरा अपना आकलन है कि रहेंगी तो जरूर लेकिन गरीबों की गरीब भाषाएं बनकर। हाशियों की भाषा बन कर। गालियों की भाषा बन कर। गीत-संगीत, मनोरंजन, फिल्में, ये भाषाओं में बचे रहेंगे, हालांकि इनमें भी तब तक आधी से ज्यादा अंग्रेजी प्रवेश कर चुकी होगी। आज बनने वाली हिंदी फिल्मों में आधी से ज्यादा के शीर्षक अब अंग्रेजी के होते हैं। उनके संवादों में हिंदी नहीं हिंग्लिश ज्यादा होती है। पूरी तरह अंग्रेजी में बनने वाली फिल्में और नेटफ्लिक्स जैसे आधुनिक मंचों पर भारतीय अंग्रेजी धारावाहिक आम हो चले हैं। यह प्रक्रिया बढ़ती ही जाएगी।

भाषाई अखबारों, फिल्मों और धारावाहिकों का विस्तार हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आंखों देखा विवरण भी अब हिंदी व भाषाओं में होने लगा है। इस विस्तार पर मुग्ध भाषायी मीडिया और साहित्यकार अपनी भाषाओं पर किसी तरह के संकट की बात को अरण्य रोदन कह देते हैं। यह दूरदृष्टिहीनता है। भविष्य देखना है तो बच्चों की ओर देखना चाहिए। बच्चों की जो पीढ़ियां अधिकाधिक अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर बड़ी होंगी वे क्या भाषाई अखबारों, साहित्य, पुस्तकों, टीवी समाचारों की पाठक- दर्शक होंगी? हिंदी के कितने लेखकों, पत्रकारों, राजभाषा अधिकारियों के बच्चे हिंदी माध्यम में पढ़ते हैं? इसलिए आज यह जो विस्तार दिख रहा है अगले 20-25 साल का खेल है। उसके बाद ऊपर से नीचे तक अंग्रेजी का ही वर्चस्व हर क्षेत्र में दिखेगा।

संसार में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषा शास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी। इनमें भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी। भारत की आदिवासी भाषाओं में 196 तो अभी यूनेस्को के अनुसार ही गंभीर संकटग्रस्त भाषाएं हैं। संकटग्रस्त भाषाओं की इस वैश्विक सूची में भारत सबसे ऊपर है। यूनेस्को का भाषा एटलस 6000 में से 2500 भाषाओं को संकटग्रस्त बताता है। यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोचिरो मत्सूरा ने कहा था, ‘एक भाषा की मृत्यु उसे बोलने वाले समुदाय की अमूर्त विरासत, परंपराओं और वाचिक अभिव्यक्तियों का नष्ट हो जाना है।‘

भारत की अनुमानित 1957 में कम से कम 1416 लिपिहीन मातृभाषाएं हैं। ये सब आसन्न संकट में हैं। पर भारत के प्रभु और बुद्धिजीवी वर्ग तथा सामान्य जन को इन छोटी भाषाओं की तो क्या अपनी बड़ी भाषाओं की भी चिन्ता और उनके संकट को देखने समझने, बचाने में कोई रुचि नहीं है। ये वे विशाल,10 लाख से ज्यादा जनसंख्या वाली भाषाएं हैं, जिन्हें भारत के 90% लोग बोलते-बरतते हैं।

किसी भी समाज में भाषा के नियामक-निर्णायक तत्व क्या हैं? भाषा और समावेशी, समतामूलक, लोकतांत्रिक विकास का क्या संबंध है? भाषा और शिक्षा का क्या संबंध है? भाषा का राष्ट्र, राष्ट्र भाव और राष्ट्र निर्माण से क्या संबंध है? राष्ट्र बोध के केंद्रीय महत्व के इन बिंदुओं पर स्वतंत्रता के बाद भारत में सिर्फ एक बार 1967 में उच्चतम स्तर पर समग्रता से विचार मंथन हुआ था राष्ट्रीय उच्चतर अध्ययन संस्थान, शिमला में। उसके बाद उस तरह का कोई विचार कुंभ भाषाओं की बदलती स्थितियों, चुनौतियों और भविष्य पर हुआ हो, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है।

इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि विरल भाषिक समृद्धि और विविधताओं के भारत के पास 70 साल में भी अपनी कोई भाषा नीति नहीं है,  न ही उसको बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया गया है। अब भी अगर वह नहीं बनाई गई तो अपनी इस अमूल्य और आधारभूत सांस्कृतिक संप्रभुता से दो-तीन पीढ़ियों में ही वंचित होकर हम पश्चिम, मुख्यतः अमेरिका के सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे।

भाषा मनुष्य की श्रेष्ठतम संपदा है। सारी मानवीय सभ्यताएं भाषा के माध्यम से ही विकसित हुई हैं। आदिम समाज तो हो सकते हैं लेकिन आदिम भाषाएं नहीं होतीं। संचार के वाचिक और लिखित माध्यम रूप में यह एक समाज के भावनात्मक जीवन और संस्कृति का सर्वोत्तम उद्घोष है। एक सांस्कृतिक संस्थान होने के कारण यह अपने बोलने-बरतने वालों को एक जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में पहचान और अद्वितीयता देती है। जातीयता का एक प्रबल कारक होती है। समाज के सभी क्षेत्रों में-प्रबंधन, प्रशासन, वैज्ञानिक सूचनाओं, शिक्षा और शोध का माध्यम हो या ज्ञान निर्माण का, भाषा विकास का सबसे शक्तिशाली उपकरण है।

भाषा के विकास को हम उन भूमिकाओं से परिभाषित कर सकते हैं जिन्हें वह अपने समुदाय में निभाती है और जिन क्षेत्रों में वह प्रमुखता से इस्तेमाल की जाती है। किसी समुदाय में कोई भाषा कितनी प्रतिष्ठा पाती है, यह सीधा इस बात पर निर्भर करता है कि वह भाषा अपने समुदाय की कितनी तरह की अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करती है-जैसे व्यापार, अर्थतंत्र, तकनीकी, नवाचार, शोध, मौलिक वैज्ञानिक चिंतन,  उद्यमिता, प्रबंधकीय निर्णय आदि। एक बहुभाषी और बहुजातीय समाज में उसकी आधिकारिक भाषा/भाषाएं सभी सभी वर्गों को तभी स्वीकार्य होती हैं जब वे शिक्षा, आजीविका, व्यवसाय, शोध, तकनीक, नवाचार, विकास और प्रशासनात्मक, प्रबंधकीय निर्णय प्रक्रियाओं की प्रमुख भाषा होती है।

भाषाओं के संकट से भी बड़ा संकट है उसको न देख पाना। कमोबेश यह समस्या सारे भाषा समूहों के साथ है। लेकिन हिंदी वालों के साथ तो रोग की हद तक है। बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान और पत्रकार प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है, हिंदी में सबसे ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, हिंदी फिल्म और टीवी उद्योग बढ़ रहा है तब हिंदी के सामने संकट कैसे हो सकता है?

संक्षिप्त उत्तर यह है। अब हम वाचिक युग में नहीं लिखित और डिजिटल युग में हैं। इसलिए भाषा का बोली रूप उसे बनाए रखने और बढ़ाने के लिए अपर्याप्त है। यह देखने की बजाय कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या कितनी बढ़ रही है जो हमें देखना चाहिए वह यह है कि उस भाषा को अपनी इच्छा से पढ़ने-लिखने और सभी गंभीर कार्य क्षेत्रों में व्यवहार करने वाले लोग बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? उस भाषा माध्यम के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या घट रही है या बढ़ रही है? ज्ञान ग्रहण, ज्ञान निर्माण, भविष्य निर्माण, न्याय,विज्ञान, प्रशासन, व्यापार, प्रबंधन, शोध आदि जीवन के निर्णायक क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग घट रहा है या बढ़ रहा है?

सबसे बड़ा प्रश्न, जिसे पूछते ही आपके सामने अपनी भाषा का भविष्य साकार खड़ा हो जाएगा यह है-आपकी भाषा की मांग कितनी है? है कि नहीं? घट रही है या बढ़ रही है? इस कसौटी पर हिंदी सहित सारी भारतीय भाषाओं को कसें तो उत्तर बिल्कुल साफ है। आज देश के छोटे से छोटे गांव में गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों के लिए सिर्फ एक भाषा मांग रहा है-अंग्रेजी। किसी भी भारतीय भाषा की मांग नहीं है भारत में। इस बाजार युग में जिस चीज की मांग नहीं है वह कैसे चलेगी, कैसे बचेगी?

अभी देश के 30 से 40% बच्चे अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। भले ही कितनी अधकचरी अंग्रेजी वहां पढ़ाई जाती हो, खुद शिक्षकों को ठीक से आती हो या नहीं, यह निर्विवाद रूप से सबका अनुभव है कि जो बच्चा बचपन से एक बार अंग्रेजी माध्यम में पढ़़ गया, वह कभी अपने परिवार और परिवेश की, विरासत की भाषा का नहीं होता। उसमें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से प्रेम,  लगाव, गर्व की जगह एक हेयभाव और नापसंदगी पैदा होती जाती है जो आयु के साथ बढ़ती ही रहती है। अपनी भाषा से यह दूरी उसे भाषा से परिचित तो बनाए रखती है, लेकिन उसमें कुछ भी गंभीर पढ़ने वाला और काम करने वाला नहीं रहने देती। भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार की यही स्थिति है।

10 साल पहले के एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत की सभी भाषा-माध्यम विद्यालयों में प्रवेश दर हर साल घट रही थी। सिर्फ दो भाषाएं अपवाद थीं-अंग्रेजी और हिंदी। अंग्रेजी में यह वार्षिक वृद्धि दर 250% से अधिक थी। हिंदी में लगभग 35%। अब जब हिंदीभाषी राज्यों में भी सरकारें हिंदी-माध्यम विद्यालय बंद या बदल कर उन्हें अंग्रेजी-माध्यम करती जा रही है तो हिंदी का भविष्य स्पष्ट है। ठीक यही चीज़ हर प्रदेश में हो रही है।

यूनेस्को के कहने पर विश्व के श्रेष्ठ भाषाविदों ने किसी भी भाषा की जीवंतता और संकटग्रस्तता नापने के लिए 9 कसौटियां निर्धारित की हैं। पहली है, एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी के बीच उस भाषा का अंतरण, जाना कितना हो रहा है? दूसरी कसौटियों में प्रमुख हैं ज्ञान विज्ञान के आधुनिक क्षेत्रों में उस भाषा में काम हो रहा है या नहीं,  घट रहा है या बढ़ रहा है? वह भाषा नई तकनीक और आधुनिक माध्यमों को कितना अपना रही है? उस भाषा के विविध रूपों का दस्तावेजीकरण कितना और किस स्तर का है? उस समाज की महत्वपूर्ण राजकीय/अराजकीय संस्थाओं की उस भाषा के बारे में नीतियां और रुख़ कैसे हैं? अंतिम लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण कसौटी है उस भाषा समुदाय का अपनी भाषा के प्रति रुख़ क्या है, भाव क्या है?

इनमें से किसी भी कसौटी पर किसी भी भारतीय भाषा को तोल लीजिए तुरंत समझ में आ जाएगा कि भविष्य के संकेत संकट की ओर इशारा करते हैं या विकास-विस्तार की ओर।

एक बार फिर 2050 पर चलते हैं। उस वैश्विक महाशक्ति, आधुनिक, वैश्वीकृत, संपन्न-सबल इंडिया में जब हर नागरिक अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण काम सिर्फ अंग्रेजी में कर रहा होगा, उसमें भारत, भारतीयता और भारतीय सभ्यता ने 5000-6000 वर्ष की अपनी अविच्छिन्न यात्रा में जो समूची साहित्यिक-सांस्कृतिक-ज्ञान-लौकिक-आध्यात्मिक संपदा अर्जित की है वह इस संपदा की निर्मात्री भाषाओं के बिना कैसे जीवंत और जीवित रहेगी, अगली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगी? क्या अंग्रेज़ी यह कर सकती है?

रंगरूप में भारतीय लेकिन दिलो-दिमाग, जीवन शैली, सोच-संस्कार से अमेरिका के उन नकलची नागरिकों का भारत-बोध, अपनी साभ्यतिक ऊंचाईयों-विरासत की स्मृति, सांस्कृतिक संप्रभुता का अहसास कैसा होगा?

कम से कम मुझे स्पष्ट दिखता है कि समूची भारतीय सभ्यता लोप, विस्मृति और भयानक हाशियाकरण की कगार पर खड़ी है। उसके पास शायद सिर्फ दो पीढ़ियों का समय है बचने के लिए। यानि हमारी और हमारे बच्चों की पीढ़ी आज अगर चाहे, राजसत्ता को बुद्धि आ जाए, समूचा राष्ट्र संकल्पबद्ध हो, राष्ट्रीय और निजी महत्व के हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने में जुटे तो इस प्रक्रिया को हम रोककर उलट सकते हैं। वरना शैशव से ही अंग्रेजी/अंग्रेज़ियत में पली, पढ़ी और बढ़ी पीढ़ियां चाहेंगी भी तो इस संपदा और सभ्यता को पुनर्जीवित करना उनके लिए असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा।

यहां महत्वपूर्ण हो जाती है प्रत्येक भाषा में काम करने,, लिखने वाले साहित्यकारों-लेखकों-विद्वानों- बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों, मीडिया, पत्रकारों और संपूर्ण नागर समाज की भूमिका। यही वे वर्ग हैं जो अपने अपने क्षेत्रों में, अपने भाषा समाज में एक विमर्श उत्पन्न करते हैं, चिंतन को आगे बढ़ाते हैं, महत्वपूर्ण चिंताओं,संकटों और सरोकारों के प्रति समाज को जागरूक करते हैं।

कमाल यह है कि ऐसे अभूतपूर्व प्राणांतक संकट से देश का लगभग समूचा नियंता प्रभु वर्ग, नीति निर्माता, बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, राजनीतिक दल, संसद, विधानसभाएं, सरकारें, मीडिया और व्यापक नागर समाज अनभिज्ञ और इसलिए उदासीन दिखते हैं। इस विराट सभ्यतामूलक संकट का मुख्य कारण, उस का सबसे बड़ा स्रोत सीधा और स्पष्ट है-अंग्रेज़ी और उसके प्रति हमारा शर्मनाक दासतापूर्ण और शर्मनाक  सम्मोहन।

भारतीय चरित्र इजराइली चरित्र जैसा नहीं है जिसने 2000 साल से मृत पड़ी हिब्रू को आज वैज्ञानिक शोध, नवाचार और आधुनिक ज्ञान निर्माण की श्रेष्ठतम वैश्विक भाषाओं में एक बना दिया है। जिसके बल पर 40 लाख की जनसंख्या वाला इजरायल एक दर्जन से ज्यादा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार जीत चुका है। सारे इस्लामी देशों की शत्रुता के बावजूद अपनी पूरी अस्मिता, धमक और शक्ति के साथ अजेय बना विश्व पटल पर विराजमान है। विश्व गुरु बनने के सपने देखता भारत चाहे तो इजराइल से प्रेरणा ले सकता है।

(नवनीत पत्रिका से साभार)

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किसान आंदोलन को पत्रकारिता से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए मिस्टर मीडिया! 

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
RajeshBadal7

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एडिटर्स गिल्ड ने इस बारे में चिंता जताई है कि पत्रकारों का एक वर्ग किसान आंदोलन के पीछे खलिस्तानी आतंकवादियों का हाथ बता रहा है। उसके पास कोई सुबूत नहीं है। लाखों किसान ठिठुरते मौसम में गेंहू की फसल सेवा छोड़कर कोरोना के भयावह दौर में बचाव की बंदिशों को धता बताते हुए जान जोखिम में डालकर छह महीने का राशन लेकर सड़कों पर उतरे हैं तो उनका अभिनंदन क्यों नहीं होना चाहिए? इससे तो लोकतंत्र अधिक जीवंत और स्वस्थ्य होता है। इसलिए एडिटर्स गिल्ड का अपने सरोकारों के प्रति संवेदनशील होना पूरी तरह जायज है। सवाल तो यह है कि आंदोलन को विपक्ष की साजिश और उग्रवाद-पोषित बताने वाली बेसिर पैर की पत्रकारिता की भर्त्सना कहां और किस प्लेटफॉर्म पर होनी चाहिए? 

याद आ रहा है कि एक दो दिन पहले किसान आंदोलन के बारे में वॉट्सऐप के एक समाचार समूह पर चर्चा चल रही थी। एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी किसान आंदोलन को पहले खालिस्तानी ठहराते रहे, फिर आतंकवादियों का हाथ बताते रहे, फिर उन्होंने चीन और पाकिस्तान को जिम्मेदार बताया, इसके बाद कांग्रेस का हाथ बताया और जब उनके तरकश के सारे तीर खाली गए तो वे मुझ पर ही आक्रामक हो गए। बोले, ‘आप तो विपक्ष की भाषा बोलते हैं।’ मेरे लिए उनके हमलावर होने की वजह बेतुकी थी। सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार को सिर्फ सरकारी जबान बोलनी चाहिए? यदि ऐसा होता तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने से पहले लोकनायक जेपी के आंदोलन को पत्रकारों का कोई समर्थन ही नहीं मिलता। दूसरी बात यह कि अगर पत्रकारिता विपक्ष की भाषा बोल भी रही है तो उसमें क्या कोई राजद्रोह जैसा पाप छिपा है? लोकतंत्र में चौथे स्तंभ की अवधारणा का अर्थ ही यह है जब सरकार की गाड़ी पटरी से उतरे तो उसके कान उमेठने का काम पत्रकारिता करे?

भारतीय पत्रकारिता के कालजयी संपादक राजेंद्र माथुर मानते थे कि सौ फीसदी निष्पक्षता जैसी कोई चीज नहीं होती। आखिर आपातकाल के दरम्यान पत्रकार सड़कों पर सरकार के खिलाफ ही तो उतरे थे। उसके बाद बिहार प्रेस बिल तथा मानहानि विधेयक के विरोध में भी अखबारनवीस सड़कों पर आए थे। पालेकर अवॉर्ड के लिए, भचावत और मणिसाना आयोग की सिफारिशों के लिए जब पत्रकारों ने संघर्ष छेड़ा तो उसे श्रम संगठनों, रेलवे यूनियनों और तमाम औद्योगिक कर्मचारी संगठनों ने अपना भरपूर समर्थन दिया था। राजेंद्र माथुर के मुताबिक एक संपादक या पत्रकार के पेशेवर जीवन में अक्सर निष्पक्षता पर चुनौती आती है। पत्रकारिता को कोई एक पक्ष लेने की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में उसे सरकार का नहीं, बल्कि आम अवाम का पक्ष लेना चाहिए। यही पत्रकारिता का धरम है। वैसे तो इस मुल्क का अतीत गवाह है कि राष्ट्रीय संकट की घड़ी में पत्रकारिता हरदम निर्वाचित हुकूमत के साथ खड़ी रही है। चाहे वह 1962, 1965, 1971 और कारगिल की जंगें रहीं हों अथवा पोखरण में परमाणु परीक्षण, अंतरिक्ष अनुसंधानों से मिले गर्व के पल हों अथवा कोरोना जैसे भयावह दौर का मुकाबला। गुजरात का भूकंप हो या सुनामी का कहर। हर स्थिति में पत्रकारिता ने अपनी व्यवस्था का साथ दिया है। लेकिन अगर चुनी हुई सरकार गलत फैसले लेती है तो उसका विरोध भी पत्रकारिता का राष्ट्रीय कर्तव्य है। अगर हुकूमत सोचती है कि पत्रकारिता हरदम उसकी बजाई धुन पर नृत्य करती रहेगी तो यह उसकी ग़लतफहमी है। पत्रकारिता दलदल में नहीं जाए, इसके लिए जरूरी है कि वह किसी दल के दामन में नहीं बंधे मिस्टर मीडिया! 

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

  

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एक बेमिसाल मोती थे राजीव कटारा, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया: क़मर वहीद नक़वी

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
rajivkatara5

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

राजीव कटारा जैसे बेमिसाल मोती आसानी से नहीं मिलते। उन्हें हमने ऐसे खो दिया, इसका बड़ा मलाल है और रहेगा।

1986 में जब हम लोग साप्ताहिक ‘चौथी दुनिया’ को शुरू करने के लिए ऐसे पत्रकार ढूँढ रहे थे, जिन्हें पत्रकारिता का कोई अनुभव हो या न हो, लेकिन जिनमें पत्रकारिता को लेकर एक अलग तरह का जज़्बा हो, तब पहली बार राजीव कटारा से मुलाक़ात हुई और तुरन्त ही वह ‘चौथी दुनिया’ का हिस्सा बन गये।

‘चौथी दुनिया’ केवल एक अख़बार नहीं था, बल्कि हिन्दी पत्रकारिता में एक विलक्षण प्रयोग था, सिर्फ़ कंटेंट के तौर पर ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता के पेशेगत ढाँचे को लेकर भी वह एक प्रयोग था, छोटी-सी टीम, मामूली संसाधन लेकिन कहीं कोई दफ़्तरशाही नहीं।

राजीव बेहद ख़ुशनुमा और जीवन के हर मामले में 100 टंच खरे और ईमानदार इनसान थे। अपने काम को लेकर पूरी तरह गम्भीर, कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते थे। पढ़ना-लिखना, समझना, सीखना और पत्रकारिता के उसूलों से इंच भर भी नहीं डिगना, राजीव पूरी ज़िन्दगी इसी तरह जिये। न किसी के प्रति कभी कोई दुर्भावना, न क्रोध और न किसी प्रकार की राजनीति में शामिल होना। लेकिन जो बात ग़लत है, आप राजीव से कभी उसे ‘सही’ नहीं कहलवा सकते थे। जो ग़लत है, सो ग़लत है, चाहे वह बात कहीं से भी आयी हो।

वह कुछ दिनों के लिए टीवी में भी आये और  1995 में ‘आज तक’ की शुरुआती टीम का हिस्सा बने, लेकिन उन दिनों टीवी की 90 सेकेंड की स्टोरी की सीमा में बँधना उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा और वह प्रिंट में वापस लौट गये। इस तरह की सीमाओं से उन्हें हमेशा ही परेशानी होती थी।

राजीव जैसे प्रतिभासम्पन्न, प्रतिबद्ध, पेशे और जीवन के हर सम्बन्धों के प्रति सौ फ़ीसदी ईमानदार और बेहद संवेदनशील पत्रकार बिरले ही मिलते हैं। वह वाक़ई एक बेमिसाल मोती थे, जिन्हें हमने असमय ही खो दिया। श्रद्धाँजलि।

(साभार: वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी की फेसबुक वाल से)

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इस ओर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 20 November, 2020
Last Modified:
Friday, 20 November, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

गुरुवार को एक खबर भारत की प्रतिष्ठित एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) से प्रसारित हुई। इसके मुताबिक भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एयर स्ट्राइक की है। देखते ही देखते जंगल में आग की तरह यह समाचार फैल गया। सोशल मीडिया के तमाम अवतारों पर और कुछ टीवी चैनलों ने इसे ब्रेक कर दिया। लेकिन शाम होते होते डायरेक्टर जनरल (मिलिट्री ऑपरेशंस) ने इसका खंडन जारी कर दिया।

‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ भारत की ऐसी समाचार एजेंसी है, जिसकी साख दशकों से दुनिया भर में है। इसकी खबर सौ फ़ीसदी सत्यता की गारंटी मानी जाती रही है। सरकारी मंत्रालय और आला अफसर तक पीटीआई के समाचार पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं। जब ऐसी संस्था से गलत जानकारी जारी हो जाती है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? ताज्जुब है कि इस समाचार संस्था ने खंडन तो जारी किया मगर खेद प्रकट करने की जरूरत तक नहीं समझी। इन दिनों ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ पर वैसे भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में असत्य सूचना से उसकी छवि पर यकीनन आंच आएगी। एजेंसी से यह देश जानने का हक रखता है कि इतना संवेदनशील समाचार उसने किस आधार पर जारी किया?

गौरतलब यह है कि जम्मू कश्मीर प्रदेश में आने वाले दिन स्थानीय चुनाव की सरगर्मियों से भरे होंगे। इसके बाद बंगाल राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। इस चुनावी माहौल में सियासी फ़ायदा उठाने के लिए कुछ राजनीतिक दल और असामाजिक तत्व अक्सर झूठे समाचारों के जरिये अफ़वाहों का बाजार गर्म करने का प्रयास करते हैं। जाहिर है कि वे पत्रकारों के कंधे पर से बंदूक चलाते हैं। उनका उल्लू सीधा हो जाता है,  लेकिन पत्रकारिता को नुक़सान हो जाता है।

गंभीर प्रश्न यह है कि पत्रकारिता में हमेशा तथ्य की दोबारा पड़ताल करने और जांचने की समझाइश दी जाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिक ऑपरेशन जैसे संवेदनशील मामलों में तो यह और भी आवश्यक है कि प्राप्त सूचना को क्रॉस चेक किया जाए। एजेंसी को अपनी साख के कारण इस पर ध्यान देना जरूरी था। यह नहीं हुआ। पीटीआई की खबर थी, इसलिए चैनलों के पास अविश्वास करने का कोई आधार नहीं था। गनीमत थी कि यह समाचार उसने दिन में जारी किया। इससे अखबारों में छपने से पहले ही डीजीएमओ ने उसके गलत होने का प्रतिवाद जारी कर दिया। यदि यही सूचना रात में जारी होती तो बेहद मुश्किल हो जाती। अखबारों और सोशल मीडिया के तमाम अवतारों को भी अब यह ध्यान देना पड़ेगा कि एजेंसी की खबर की भी सरकारी या अधिकृत प्रवक्ता से पुष्टि कर ली जाए। बिना जांच पड़ताल के खबर प्रकाशित और प्रसारित करना तो अपराध ही है। इस पर ध्यान नहीं दिया तो किसी दिन भारी ब्लंडर हो जाएगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

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भारत-अमेरिकी संबंध: रिश्ते देश से होते हैं न कि किसी व्यक्ति से: पूरन डावर

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में विश्व में उस देश की छवि बिगड़ी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 November, 2020
Last Modified:
Saturday, 07 November, 2020
PuranDabar

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की छवि विश्व में बिगड़ी है। पहले चुनाव में जब अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिए ट्रम्प की प्रत्याशी के रूप में घोषणा हुई थी। मैं अमेरिका में ही व्यावसायिक भ्रमण पर था और उनका पहला भाषण टीवी पर सुनकर लगा कि ऐसा व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति कभी हो ही नहीं सकता। भारतीय राजनीति से भी कहीं नीचा स्तर और मेरे दिमाग में अमेरिका की इमेज सदैव ब्रह्मा जी की तरह रही। मेरा मानना था कि अमेरिकी जनता ऐसे व्यक्ति को कभी स्वीकार कर ही नहीं सकती।

उसके बाद पूरा चुनाव फॉलो ही नहीं किया। यदा कदा मेरे एक मित्र मुझे बताते थे कि ट्रम्प जीत रहा है तो मैं उन पर बिगड़ जाता और कहता कि अमेरिका भारत नहीं है, ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन ऐसा ही हुआ। अमेरिका में अधिकांशतः हर राष्ट्रपति को दो टर्म मिले हैं। अमेरिका ने गलती सुधारी और एक टर्म में उतरना पड़ा। हालांकि जो बिडेन का स्तर भी कमोबेश एक सा है।

विश्व में अमेरिका के आधिपत्य के ह्रास के लक्षण हैं। स्पष्ट है कि जहां तक भारत के अमेरिका से संबंध की बात है तो दोनों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। दोनों को सदैव एक-दूसरे की आवश्यकता है। ओबामा से भी उतने ही संबंध थे, ट्रम्प से भी हैं और अब बिडेन से भी रहेंगे। वैसे भारत सहित एशियंस ने ट्रम्प को कतई वोट नहीं किया। उनके रहते सबकी नौकरियां-वीजा खतरे में थे। जहां तक मोदी जी की बात है, उन्हें ट्रम्प हों या बिडेन कोई फर्क नहीं पड़ता। रिश्ते देश से होते हैं, न कि किसी व्यक्ति से। कल ट्रम्प थे, आज मोदी हैं कल कोई और...।

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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अनुचित था पुलिस का यह तरीका

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है

राजेश बादल by
Published - Thursday, 05 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 05 November, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मुंबई में रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद पत्रकारिता जगत में एक नई बहस चल पड़ी है। एक वर्ग अरनब पर इस कार्रवाई के खिलाफ है और मानता है कि अरनब गोस्वामी लगातार महाराष्ट्र सरकार को निशाने पर लेते हुए चैनल में खबरें और बहसें चला रहे थे। इस वजह से यह एक्शन हुआ। दूसरा धड़ा यह मानता है कि अरनब अपनी पत्रकारिता में संतुलन का पालन नहीं कर रहे थे। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार, शिवसेना और कांग्रेस के खिलाफ निंदनीय अभियान छेड़ दिया था। यह एक पक्षीय पत्रकारिता इस पेशे के सिद्धांतों का पालन नहीं करती। इसलिए ऐसी कार्रवाई तो होनी ही थी।

दोनों पक्ष अपनी अपनी जगह सच हैं, लेकिन मेरा नजरिया कुछ हटकर है। मेरा निवेदन है कि जब हम पत्रकारिता के पेशे में कदम रखते हैं तो खोजी, निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता के लिए सरकार या किसी अन्य पक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई के लिए भी तैयार रहते हैं। अगर आप किसी पर हमला करते हैं तो वह पक्ष जवाबी कार्रवाई के लिए आजाद है। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक भावना पत्रकार को संरक्षण देने की होनी चाहिए। पर यह संरक्षण उसके कर्तव्य निर्वहन के कारण ही मिलना चाहिए। अरनब गोस्वामी को उनके पत्रकारिता कर्म के कारण हिरासत में नहीं लिया गया है। वह एक आपराधिक मामला है, जो पहले से चल रहा था। किसी आपराधिक कृत्य के लिए किसी पत्रकार को अपनी बिरादरी, समाज अथवा सरकार से संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। हम तहलका के संपादक के मामले में यह देख चुके हैं।

पर मुंबई पुलिस ने जिस तरीके से हिरासत में लिया, वह उचित नहीं था। अरनब का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही वे कोई शातिर बदमाश हैं। वैसे तो भारतीय दण्ड संहिता भी किसी अपराधी तक को इस तरह अरेस्ट करने की अनुमति नहीं देती। इसलिए मैं कहूंगा कि अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी का तरीका अनुचित है। मगर महाराष्ट्र पुलिस का यह कदम देश के पत्रकारों के लिए यह गंभीर संदेश है कि अगर वे संतुलन की लक्ष्मण रेखा लांघेंगे तो फिर किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार रहें मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले डॉ. अनुराग बत्रा, मीडिया के लिए इससे बुरा दौर नहीं हो सकता

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 November, 2020
Last Modified:
Wednesday, 04 November, 2020
Arnab Goswami

डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।

चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है और इस तरह का कृत्य कल को किसी दूसरे के घर को भी निशाना बना सकता है। हमारे लोकतंत्र में, कानून का शासन सर्वोपरि है और यह सिर्फ मीडिया प्रोफेशनल्स और पत्रकारों पर सबसे ज्यादा लागू होता है। इसलिए, मीडिया और देश में हम सभी के लिए अरनब गोस्वामी को गिरफ्तारी के दौरान घसीटे जाने और उनसे दुर्व्यवहार किए जाने के जो दृश्य देखने को मिले हैं, उनके खिलाफ आगे आना चाहिए। अरनब की गिरफ्तारी के दौरान जिस तरह के दृश्य देखने को मिले, वह मुझे काफी हैरान और परेशान करने वाले लगे।

पिछले करीब आठ हफ्तों से टीआरपी पर विवाद और न्यूज चैनल्स व मीडिया संगठनों के बीच झगड़ा देखने को मिल रहा है, लेकिन एक्सचेंज4मीडिया के रूप में हमने तथ्यात्मक और संतुलित रुख अपनाए रखा है। हमारा मानना है कि सही चीजों को सही कारण के लिए और सही तरीके से करना चाहिए और हमने वही किया है।

हालांकि आज जो कुछ भी हुआ, वह काफी डराने वाला है। हम इस तरह के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। अगर मुंबई में अरनब के साथ ऐसा हो सकता है तो नोएडा में किसी भी मीडिया मालिक या संपादक, पत्रकार या देश के किसी भी हिस्से में किसी भी अन्य मीडिया पेशेवर के साथ ऐसा हो सकता है।

इससे बुरी मिसाल नहीं हो सकती

मैंने एक सम्मानित मीडिया कंपनी के और बेहद ही संतुलित सीईओ को फोन किया, जिन्हें मैं अपना मित्र कहता हूं और उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे यह कॉलम नहीं लिखना चाहिए। उन सीईओ ने मुझसे कहा कि उन्हें (अरनब को) आत्महत्या के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है। मैं अपने दोस्त और आप सभी से कहता हूं कि आज जो कुछ हुआ और पुराने मामले को महत्वहीन नहीं बताया जाना चाहिए और इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह पुराना केस था जिसे बंद कर दिया गया था। लोग ये मानेंगे कि इसे सामान्य के अलावा अन्य कारणों से फिर से खोला गया।

मैं यहां दो अक्टूबर 2020 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर सुप्रीम कोर्ट के बयान का उल्लेख करना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,  'उकसाने के अपराध में दोषी ठहराने के लिए अपराध विशेष को अंजाम देने की मनोदशा दिखनी चाहिए।'

अरनब को साथ दुर्व्यवहार और बाद में उनकी गिरफ्तारी पुलिसिया कार्यशैली का सबसे खराब उदाहरण है और यह सरकारी मशीनरी और शक्ति का दुरुपयोग है। मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में यह हमारा कर्तव्य कि हम इसके खिलाफ अपनी आवाज उठाएं, भले ही हमें इस तरह की पत्रकारिता पसंद हो अथवा नहीं।

फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर (Voltaire) का कहना था, ‘हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं। परन्तु विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा।’

मुझे आज भी यह याद है। मैं किसी भी प्रोफेशनल, पत्रकार, मीडिया मालिक के साथ खड़ा रहूंगा, भले ही मैं उनके संपादकीय विचारों से असहमत होऊं। यदि अरनब गोस्वामी जैसी मीडिया हस्ती इस तरह की पुलिसिया बर्बरता और सत्ता के दुरुपयोग का शिकार हो सकती है, तो हमें मीडिया के रूप में इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। चुप रहना मेरे या हमारे लिए कोई विकल्प नहीं है, न ही आपमें से किसी के लिए एक विकल्प होना चाहिए।

कुछ अन्य प्रमुख मीडिया मालिकों के खिलाफ भी विभिन्न तरह की जांच चल रही हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि उनके साथ भी भविष्य में इस तरह हो सकता है। इसलिए उन सभी को अरनब का समर्थन करना चाहिए ताकि भारतीय मीडिया की रीढ़ न टूटे।

लोकतंत्र की रक्षा करने वालों और कानून की नुमाइंदगी करने वालों ने खुद का आज एक बुरा चेहरा दिखाया है।

भारतीय मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में हमारे विभिन्न दृष्टिकोण  अथवा विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन आज जो कुछ हुआ, उसकी एकतरफा निंदा किए जाने और अरनब को सुरक्षित रखने व न्याय दिलाने में मदद करने का समय है। 

मुझे आज महात्मा गांधी की वह बात याद आ रही है, जो उन्होंने कई दशक पहले कही थी-

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मीडिया में एंटरप्रिन्योर बनने के लिए यह सबसे अच्छा समय है: डॉ. अनुराग बत्रा

28 अक्टूबर को माखनलाल यूनिवर्सिटी के तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन सत्र के दौरान  'बिजनेस वर्ल्ड' और 'एक्सचेंज4मीडिया' ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 29 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 29 October, 2020
dr anurag batra

देश के विख्यात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में 26 अक्टूबर से नवागत विद्यार्थियों के आत्मीय प्रबोधन और करियर मार्गदर्शन के लिए तीन दिवसीय ‘सत्रारंभ 2020’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तीसरे दिन 28 अक्टूबर को समापन सत्र के दौरान 'बिजनेस वर्ल्ड' और 'एक्सचेंज4मीडिया' ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ.अनुराग बत्रा ने भी नवागत विद्यार्थियों के लिए अपने विचार व्यक्त किए।

‘मीडिया मैनेजमेंट’ विषय पर डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि अगर मीडिया में रहना चाहते हैं तो जितना हो सके मीडिया को पढि़ए, मीडिया को देखिए और मीडिया को सुनिए। उन्होंने कहा कि मीडिया में उद्यमी बनने के लिए यह सबसे अच्छा समय है। एक सफल मीडिया एंटरप्रिन्योर बनने के लिए जुनून, सकारात्मकता और उद्देश्य प्रमुख हैं। उन्होंने नवागत विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि आप लक्ष्य बनाइए, महत्वाकाक्षांए पालिए, ऊर्जा अपने आप आएगी।

नवागत विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मूलभूत रूप से हम कॉन्टेंट किएटर्स हैं। कॉन्टेंट को चाहे ऑडियो, वीडियो या फिर टेक्स्ट के जरिए क्रीएट किया जाए, लेकिन उसका डिस्ट्रीब्यूशन जरूरी है फिर चाहे वह किसी भी माध्यम से ही क्यों न किया जाए। उन्होंने कहा कि 14 साल पहले मैंने एक कॉलम लिखा था, जोकि आज के दौर के हिसाब से बिल्कुल फिट बैठता है। डॉ. बत्रा ने बताया कि उन्होंने उस कॉलम में ‘टीएमटी’ का जिक्र किया था, जिसका मतलब था टेलीकॉम, मीडिया और टेक्नोलॉजी। इसमें बताया था कि ये आने वाले समय में एक साथ आएंगे और इसका रूपांतरण होगा, जो सही मायनों में हुआ भी। ऐडवर्टाइजिंग मैडिसन रेवेन्यू बन गया है, एंटरटेनमेंट कॉन्टेंट का मतलब हॉलीवुड से है और टेक्नोलॉजी सिलिकॉन वैली बन गया है। उन्होंने कहा कि आज हर कोई एक मीडिया ब्रैंड है। कोई भी डोमेन एक्सपर्ट एक मीडिया ब्रैंड्स बना सकते हैं।  

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सत्रारंभ-2020 के समापन सत्र में महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा ने‘संचार में शोध: भारतीय दृष्टि’ विषय पर नवागत विद्यार्थियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि शोध एक गंभीर मुद्दा है इसलिए उसमें एक दृष्टि होना आवश्यक है। शोध एक उपाधि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि वह तपस्या है। यह बहुत परिश्रम और गहन अध्ययन का विषय है। भारतीय संदर्भों के बिना भारतीय समाज को समझना मुश्किल है। इसलिए शोध में भारतीय दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र के पास जाता है, वैसे-वैसे वह जानने लगता है, उसे बोध होने लगता है, विज्ञान की समझ बढ़ती है।   

प्रो. संजीव शर्मा ने कहा कि पढऩा ही पर्याप्त नहीं, यह आवश्यक है कि हमने जो पढ़ा है उसका बोध कितना है। जो सीखा है, उसको आत्मसात कर, उसे अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है। हमारा अध्ययन हमारी समझ को विकसित करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन कहता है कि सत्य बोलना ही महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु उसकी प्रस्तुति भी महत्व रखती है। हमारी प्रस्तुति सुरुचिपूर्ण हो। भाषा शुद्ध हो। शब्दों के चयन में बहुत सावधानी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भी कोई सूचना को समाचार के रूप में प्रकाशित करने से पहले पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर लेना चाहिए ताकि बाद में उसके लिए खेद प्रकट न करना पड़े।

समापन सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि कुछ लोगों ने गूगल सर्च को ही रिसर्च समझ लिया है। शोध एक वृहद विषय है। उन्होंने बताया कि आज ऐसे शोध की आवश्यकता है, जो समाज के हित में हो। जिस समय में पत्रकारिता में फेक कंटेंट की भरमार है, तब पत्रकारिता में शोध की अत्यंत आवश्यकता है। आज मीडिया में विशेषज्ञता की आवश्यकता है। इसलिए नवागत विद्यार्थियों को अध्ययन की प्रवृत्ति विकसित करना चाहिए।

‘मीडिया मैनेजमेंट’ विषय पर कुलपति प्रो. केजी सुरेश ने कहा कि मीडिया मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम को हमें मीडिया गवर्नेंस के तौर पर पढ़ाना चाहिए। आज अनेक युवा मीडिया के क्षेत्र में अपने स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं। मीडिया गवर्नेंस पाठ्यक्रम के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वे अपने स्टार्टअप को अच्छी प्रकार से स्थापित कर सकें।

 ‘कम्प्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में संभावनाएं’ विषय पर स्कूल ऑफ कम्प्यूटर साइंस यूपीएस, देहरादून के डीन डॉ. मनीष प्रतीक ने कहा कि प्रोग्राम लैंग्वेज हिन्दी और अंग्रेजी भाषा से अलग नहीं है, ये भी एक भाषा ही है। आज प्रोग्राम लैंग्वेज के साथ ही एल्गोरिदम को सीखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि आईटी का उपयोग करके आप अच्छे पत्रकार बन सकते हैं। आईटी के माध्यम से आप डेटा का विश्लेषण कर सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से मीडिया के क्षेत्र में फेक कंटेंट की पहचान करने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। 

‘ऑडियो स्ट्रीमिंग का भविष्य’ जैसे नवाचारी विषय पर सुप्रसिद्ध आरजे और कम्युनिकेशन विशेषज्ञ सुश्री सिमरन कोहली ने कहा कि पॉडकास्ट के क्षेत्र में बड़े संस्थान निवेश कर रहे हैं। इसका अर्थ यही है कि भारत में रेडियो का विस्तार हो रहा है। पॉडकास्ट के क्षेत्र में आने से पहले विद्यार्थियों को इसकी तकनीक को समझ लेना चाहिए। यूनिसेफ जैसी संस्थाएं भी रेडियो और पॉडकास्ट के माध्यम से जन-जागरूकता के कार्यक्रम चला रही हैं। उन्होंने कहा कि सामुदायिक रेडियो भारत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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सरकार की गोद में बैठना या हरदम तलवार तानना संतुलित पत्रकारिता नहीं मिस्टर मीडिया!

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना

राजेश बादल by
Published - Monday, 19 October, 2020
Last Modified:
Monday, 19 October, 2020
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत में संपादकों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ऐतिहासिक मोड़ पर है। पहली बार इसने अपने अध्यक्ष और महासचिव को  बाकायदा मतदान के जरिए चुना। खास बात यह है कि चुनाव की समूची प्रक्रिया ऑन लाइन संपन्न हुई। यह भी पहली बार है, जब एक महिला संपादक सीमा मुस्तफा इसकी अध्यक्ष निर्वाचित हुई हैं और महासचिव के रूप में संजय कपूर होंगे। अब नए पदाधिकारी दो-चार दिन में अपना कार्यभार संभाल लेंगे। उनसे मुल्क की पत्रकारिता को ताकत मिलनी चाहिए। इस कारण इस बार इस स्तंभ में गिल्ड की चर्चा का संदर्भ सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि इस शिखर संस्था से मौजूदा पत्रकारिता की विराट अपेक्षाएं हैं।  

इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मुल्क में इन दिनों प्रिंट और टीवी पत्रकारिता की साख पर गंभीर संकट है। खबरिया चैनल के परदे और समाचार पत्रों के पन्ने जिस तरह की खबरें उगल रहे हैं, उनसे उनकी स्थिति उपहासपूर्ण और कुछ कुछ विदूषक जैसी हो गई है। तमाम तरह के दबावों ने पत्रकारिता का चेहरा टेढ़ा मेढ़ा कर दिया है। निष्पक्ष, निर्भीक और बेधड़क अखबारनवीसी कहीं हाशिए पर  चली गई है और हुक्मरान इसका फायदा उठाते नजर आते हैं। इसमें उनकी क्या गलती है? कोई भी सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती। जब उसे लगता है कि मीडिया को बांटकर वह अपने पक्ष में भी संपादकों की एक जमात खड़ी कर सकती है तो वह नहीं चूकती। ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता पर उल्टा असर पड़ता है। पत्रकारों पर हमले बढ़ जाते हैं, तीखी आलोचना करने वालों को बेरोजगार होना पड़ता है और पेशागत सरोकार सत्तारूढ़ दल की मुट्ठी में कैद हो जाते हैं। इन दिनों कमोबेश यही स्थिति है। पिछले चवालीस साल की पत्रकारिता अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इतने खराब हालात कभी नही बने। 

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के लिए हाल के बर्षों में यह एक बड़ी चुनौती रही है। अंदरूनी तौर पर निश्चित ही गिल्ड के पदाधिकारी इस दुविधा से गुजरे होंगे। पिछले महीने जब सदस्यों की ऑन लाइन आम सभा हुई तो अनेक सदस्यों ने इस पवित्र पेशे पर छाई काली घटाओं को रेखांकित किया था। उन्होंने उलाहना दिया था कि गिल्ड अपनी भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं कर रही है। इसी के बाद नए चुनाव जल्द कराने का फैसला हुआ। अभी तक इस संस्था में कभी मतदान की स्थिति नहीं बनी, मगर इस बार तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई। इसमें  कमर वहीद नकवी, राजदीप सरदेसाई और सच्चिदानंद मूर्ति शामिल थे। समिति ने ऑन लाइन मतदान की एक गोपनीय प्रणाली ईजाद की और यह कामयाब रही।

अब गिल्ड को समग्र हिन्दुस्तान के संपादकों की प्रतिनिधि संस्था में तब्दील करना नए अध्यक्ष और महासचिव की जिम्मेदारी है। भाषाई, क्षेत्रीय और प्रादेशिक स्तर पर अनुभवी और निष्पक्ष संपादकों को इसमें जगह देनी होगी तथा पत्रकारों-संपादकों का एक मुखर स्वर बनाना होगा। तभी इसकी सार्थकता है। याद करना होगा कि भारत के इतिहास में बिहार प्रेस बिल और उसके बाद मानहानि विधेयक का समूची पत्रकार बिरादरी ने विरोध किया था। तब सरकार को झुकना पड़ा था। इसके लिए सरकार से निरपेक्ष रिश्ता रखना होगा। अच्छे कदम के लिए तारीफ करें और खराब रवैए की निंदा करें यही अच्छी पत्रकारिता  की निशानी है। सरकार की गोद में बैठना या उसके सामने हरदम तलवार ताने रहना संतुलित पत्रकारिता नहीं है मिस्टर मीडिया!        

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: TRP के खेल में उलझ गया बाजार!

मिस्टर मीडिया: क्या पत्रकारिता भी संसदीय पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना पर उतर आई है?

पत्रकारिता के इस शर्मनाक दौर में हमारी चुप्पी को वक्त कभी माफ नहीं करेगा मिस्टर मीडिया!

क्या समाज जब खुलकर हमारे खिलाफ मोर्चा खोलेगा, तभी हम जागेंगे मिस्टर मीडिया!

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लोकमंगल की पत्रकारिता और वर्तमान चुनौतियां

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
channel

मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

अपने जन्म से लेकर अब तक की पत्रकारिता लोकमंगल की पत्रकारिता रही है। लोकमंगल की पत्रकारिता की चर्चा जब करते हैं तो यह बात शीशे की तरह साफ होती है कि हम समाज के हितों के लिए लिखने और बोलने की बात करते हैं। लोकमंगल के वृहत्तर दायित्व के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ कहा गया है। वर्तमान समय में सबसे ज्यादा आलोचना के केन्द्र में पत्रकारिता है और समाज सवाल कर रहा है कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के निहित दायित्वों से दूर कैसे हो रहा है? वह कैसे किसी के पक्ष में बोल रहा है या किसी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है? यह सवाल भी पत्रकारिता के समक्ष यक्ष प्रश्र की तरह खड़ा है कि पत्रकारिता पर समाज का भरोसा टूट रहा है। निश्चित रूप से यह सवाल बेबुनियाद नहीं हो सकते हैं। कोई बड़ा बदलाव पत्रकारिता के निश्चित उद्देश्यों से भटकने के कारण उपजा होगा लेकिन पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से भटकी है अथवा समाज की अपेक्षा पत्रकारिता से बढ़ी है, इस पर विवेचन करने की आवश्यकता है।

पत्रकारिता के समक्ष उपजे सवालों को टाला नहीं जा सकता है लेकिन जो आरोप दागे जा रहे हैं, उन्हें यथास्थिति भी नहीं माना जा सकता है। पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम में ओज भरने का कार्य किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात नए भारत के निर्माण में अपनी सशक्त भूमिका निर्वहन किया है। स्मरण रहे कि यही पत्रकारिता है जिसने पूरी ताकत के साथ आपातकाल का प्रतिकार किया। यह वही पत्रकारिता है जिसने उन हिस्सों से पर्दा उठाने का काम किया है जिसके पीछे जाने कितने राज दफन हो चुके थे। हालांकि इन सब बातों को देखें और समझें तो लगता नहीं कि पत्रकारिता अपने लोकमंगल के दायित्व से परे हो गया है।

पत्रकारिता का मूल स्वर विरोध का है और यही विरोध लोकमंगल के दायित्वों की पूर्ति की आश्वस्ती है। हिक्की ने अखबार का प्रकाशन इसलिए आरंभ किया था कि वह समाज को असली चेहरा दिखा सके। स्वाधीनता संग्राम में अखबारों ने समाज में जन-जागरण का महती जवाबदारी का निर्वहन किया। लोगों में देश-प्रेम जगाया और अंग्रेज शासकों के खिलाफ उनके मन में क्रांति का भाव उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। स्वाधीनता के बाद नए भारत के निर्माण की जवाबदारी पत्रकारिता की थी। पंचवर्षीय योजना के माध्यम से विकास कार्यों का श्रीगणेश हुआ और इसके साथ ही घपले-घोटाले भी शुरू हो गए थे जिस पर से पर्दा उठाने का काम पत्रकारिता ने किया। यह लोकमंगल की ही पत्रकारिता ही थी। यह वह दौर था जब अखबारों में छपने वाली खबरों से पूरा तंत्र हिल जाया करता था। गांधी समाचार-पत्र को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। इस ताकत से शासकों में भय था और इस बात का प्रमाण खुले तौर पर 1975 में आपातकाल के दरम्यान मिला जब पत्रकारिता पर बंदिशें लगा दी गई। उस दौर के शासकों को इस बात का इल्म था कि जो पत्रकारिता अंग्रेजों को देश-निकाला दे सकती है, वही पत्रकारिता उनकी कुर्सी भी डुला सकती है। आपातकाल में पत्रकारिता पर जो जोर-जुल्म हुए वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है तो यह बात भी गर्व के साथ पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज है कि पत्रकारिता झुकने के बजाय प्रतिकार करती हुई गर्व से खड़ी रही। भाजपा के वरिष्ठ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी का यह बयान हमेशा उल्लेख में आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पत्रकारिता को झुकने के लिए कहा गया था, वह रेंगने लगी।’ यह बात सच हो सकती है लेकिन सौफीसदी सच नहीं क्योंकि बहुतेरे अखबार खिलाफ में खड़े थे अपनी बुनियादी उसूलों के साथ।

यह वह दौर था जब अधिकतम आठ पन्नों के अखबार हुआ करते थे। बहुत सारे अखबार तो चार पन्नों के ही थे। तब आधुनिक मशीनों की आमद नहीं हुई थी। पुरानी पद्धति से अखबारों का प्रकाशन होता था। यह वही दौर था जब संपादक की सत्ता सर्वोपरि थी। प्रबंधन पीछे हाथ बांधे खड़ा होता था। अखबार के पन्नों में पहले खबरों को जगह मिलती थी, विज्ञापन दूसरे क्रम पर था। साल 75 के बाद पत्रकारिता का चेहरा बदलता गया। शायद यह वही कालखंड था जब लोकमंगल की पत्रकारिता पर ग्रहण लगने लगा। अब नई तकनीक की प्रिंटिंग मशीनों का आगमन होने लगा था। अखबारों के पन्नों में भी एकाएक बढ़ोत्तरी होती गई। श्वेत-श्याम अखबार रंगीन होने लगे। पेज-थ्री का चलन उस दौर में नहीं था लेकिन छाया दिखने लगी थी। महंगी मशीनें और अखबार के पन्नों में वृद्धि से लागत में बढ़ोत्तरी होने लगी। पांच पैसे में बिकने वाला अखबार अब रुपय्या में बिकने लगा। हालांकि लागत और विक्रय मूल्य में अंतर काफी था और इस अंतर को पाटने के लिए विज्ञापनों का स्पेस लगातार बढऩे लगा। कंटेंट के स्थान पर विज्ञापनों को प्रमुखता मिलने लगी और संपादक की सत्ता भी तिरोहित होने लगी और प्रबंधन मुख्य भूमिका में आने लगा था। 

90 के दशक आते-आते लोकमंगल की पत्रकारिता की सूरत बदल चुकी थी। इधर टेलीविजन चैनल पसरने लगे थे। पाठक अब ग्राहक में और ग्राहक दर्शक में बदल रहे थे। साथ में पत्रकारिता मीडिया में हस्तांतरित हो चुका था। एक समय ऐसा आया कि लगने लगा कि मुद्रित माध्यम बीते जमाने की बात हो जाएगी और टेलीविजन पूरे समाज पर कब्जा कर लेगा। शुरुआत कुछ ऐसी ही थी लेकिन जल्द ही संकट के बादल छंट गए और संचार के दोनों माध्यमों ने अपना-अपना स्थान बना लिया। लेकिन पाठकों से दर्शकों में तब्दील हुए लोगों की लालसा-आकांक्षा बढऩे लगी। श्वेत-श्याम अखबारों की छपाई उन्हें उबाने लगी और अखबारों में भी वे टेलीविजन के अक्स देखने लगे। प्रबंधन ने इस अवसर का लाभ उठाया और अखबारों को टेलीविजन की शक्ल में बदलने में जुट गए। एकाएक अखबारों के खर्चों में मनमानी वृद्धि होने लगी और नुकसान का प्रतिशत बढ़ गया। ऐसे में विज्ञापन एकमात्र सहारा था और विज्ञापनों ने उस आधार को भी निरस्त कर दिया जिसमें तय था कि खबरें साठ प्रतिशत होंगी और विज्ञापन चालीस प्रतिशत। अब हालत यह हो गई कि जो स्थान बचा, वह खबरों के लिए। प्रतिशत की कोई भूमिका शेष नहीं रही। ऐसे में पत्रकारिता के समक्ष लोकमंगल की जवाबदारी पर सवाल उठने लगे। 

अखबारों के पन्नों से गांव की खबरें हाशिये पर चली गई और सामाजिक सरोकार की खबरों का स्थान भी अपेक्षित रूप में न्यूनतम हो गया। राजनीति खबरों ने स्थान अधिक ले लिया। इसी दौर में पेड-न्यूज नाम की बीमारी ने पत्रकारिता को घेर लिया। हालांकि किसी समय पीत-पत्रकारिता का रोग था जो अब बकायदा खबरों को बेचने के लिए कुख्यात होने लगा। पीत-पत्रकारिता में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी के पक्ष या विपक्ष में खबरें या लेख लिखे जाते थे लेकिन पेड-न्यूज में तो अखबारों के स्पेस बेचे जाने की शिकायतें मिलने लगी। इन सबके बावजूद अखबार लोकमंगल की खबरों से स्वयं को दूर नहीं कर पाए क्योंकि पाठकों के लिए इन खबरों का होना जरूरी था। घपले-घोटाले से पर्दा उठाने के साथ ही जन-समस्याओं को शासन-प्रशासन के समक्ष रखना भी लोकमंगल की पत्रकारिता का दायित्व था, सो पूरी जिम्मेदारी के साथ किया गया। 

एक सच यह भी है कि पाठकों को ग्राहक में बदलने का उपक्रम अखबारों से ही शुरू हुआ। स्मरण करना होगा कि अखबारों के साहित्यिक पृष्ठों पर सवाल के जवाब मांगे जाते थे और सही जवाब देने वालों के नाम और तस्वीर प्रकाशित करने का प्रलोभन दिया जाता था। शुरुआत यहां से होती है और बाद में अखबार बाल्टी और मग तक उपहार के रूप में देने लगते हैं। इसके लिए अखबार के ग्राहकों से महीना-दो-महीना इस बात की कसरत करायी जाती है कि वे अखबार के पन्ने पर छपे कूपन को सम्हाल कर रखें और नियत तिथि पर जमा करायें। ऐसा करके अखबार प्रबंधन अपनी प्रसार संख्या तो बढ़ा ही रहा था, लोगों में लालच का भाव पैदा हो रहा था जो उनके भीतर का विरोध खत्म कर रहा था। हैरानी तो इस बात की है कि जो लोग पत्रकारिता अथवा मीडिया पर सियापा करते हैं, वही लोग एक पचास रुपए की बाल्टी के लिए घर में कूपन चिपकाते बैठे रहते हैं। हालांकि सब शामिल नहीं हैं लेकिन बहुतेरे इसमें शामिल हैं। जब आप स्वयं पाठक से ग्राहक बन जाने के लिए तैयार हों तो प्रबंधन क्यों खुश नहीं होगा? टेलीविजन मीडिया के पास बेचने के लिए बाल्टी और मग नहीं है तो वह बेबुनियाद की बहस करा कर मनोरंजन के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाता है। सवाल यह है कि जो चीज आपको पसंद नहीं, उसे देख, सुन और पढ़ क्यों रहे हैं? क्यों उस पर टिप्पणी कर दूसरों को देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं? सच तो यह है कि टेलीविजन की बहस चलती है आधे घंटे और उसकी चर्चा होती है 24 घंटे। ट्रोल करके हम आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपरोक्ष रूप से उन्हें लोकप्रिय बना रहे हैं।  

कोरोना के इस भयावह दौर में अखबार पूरी शिद्दत के साथ संकट की तस्वीर को सामने रख रहे थे तो जो कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी तस्वीर से समाज का हौसला अफजाई कर रहे थे। यहां पर ठीक उलट टेलीविजन के पर्दे पर टीआरपी का खेल चल रहा था। हिन्दी सिनेमा के एक नायक की कथित आत्महत्या पर टेलीविजन चैनलों का ध्यान था और इसके बाद सिने-जगत में नशे के कारोबार को लेकर टेलीविजन बहस-मुबाहिस में जुट गया। कोरोना से समाज को किस संकट से गुजरना पड़ रहा है? सरकारें कितनी बेपरवाह हो रही हैं? प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जैसे गंभीर और लोकमंगल के विषय नदारद थे। यह पहला मौका नहीं था जब टेलीविजन की पत्रकारिता लोकमंगल के विषय से स्वयं को दूर कर रही थी बल्कि उसका यह रवैया हमेशा से रहा है। कुछेक अवसरों को छोड़ दें तो अखबारों के मुकाबले टेलीविजन की पत्रकारिता में लोकमंगल कोई विषय नहीं है। 

24 घंटे के खबरिया चैनलों को देखते दर्शकों को लगा कि समूची पत्रकारिता से लोकमंगल नदारद है। इसलिए पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संदेह किया जाने लगा लेकिन यह अधूरा सच है। लोकमंगल के विषय का केन्द्र में रखे बिना पत्रकारिता हो नहीं सकती है। यही कारण है जिन विषयों से समाज का सीधा रिश्ता होता है, वह खबरें पाठकों तक पहुंचायी जाती हैं। प्राकृतिक आपदाएं हों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कवरेज लगातार मिलता है और लोकमंगल के लिए यह आवश्यक भी है। एक तरफ 24 घंटे के न्यूज चैनलों की चुनौती है कि वह लगातार ताजा खबरें कहां से लाए? तो दूसरी तरफ 24 घंटे में एक बार छपकर आने वाले अखबार पाठकों को निराशा में नहीं धकेलते हैं और ना ही टेलीविजन चैनलों की तरह शोर मचाते हैं। अखबारों और टेलीविजन दोनों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है तकनालाजी के खर्चों की भरपाई करने की। टेलीविजन चैनलों की टीआरपी गिरने का अर्थ है राजस्व में कमी आना और राजस्व में कमी होने से टेलीविजन का संचालन मुश्किल सा काम है। कुछ ऐसी ही हालत अखबारों की है। कोरोना के इस भयावह संकट के दरम्यान अखबारों ने अपने पैर समेट लिए हैं और अखबारों के पन्नों में कटौती कर कुछ राहत पाने की कोशिश की है। फिर भी कहा जा सकता है कि जिस दर पर पाठकों को अखबार मिलता है और जिस लागत पर अखबार प्रिंट होता है, उन दोनों में बड़ा अंतर है और इस अंतर को पाटने का एकमात्र जरिया विज्ञापन है। 

लोकमंगल की पत्रकारिता को तीन कालखंड में विभाजित करके देखना होगा। स्वाधीनता के पहले की पत्रकारिता, स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता और आपातकाल के बाद की पत्रकारिता। स्वाधीनता के पहले लोकमंगल अर्थात स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य के साथ पत्रकारिता हो रही थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण की पत्रकारिता थी और आपातकाल के बाद पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन और बीते तीन दशकों में प्रोफेशन से व्यवसाय में बदल गई है। लोकमंगल की पत्रकारिता को धक्का पत्रकारिता शिक्षण के कारण भी हुआ है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह पत्रकारिता की डिग्री कोर्स आरंभ किया गया और देशभर के सैकड़ों पत्रकारिता संस्थानों से हर वर्ष बहुसंख्या में युवा पत्रकारिता में आए। इनमें से चुनिंदा पत्रकारों ने लोकमंगल की पत्रकारिता के मर्म को समझा और कामयाब हो गए जबकि अधिकांश इसमें नाकामयाब रहे।

दरअसल, पत्रकारिता शिक्षा दूसरे पाठ्यक्रमों की तरह नहीं है। इसमें जमीनी अनुभव की जरूरत होती है जो पत्रकारिता को लोकमंगल की ओर ले जाती है। अधिसंख्य पत्रकारिता संस्थानों में पत्रकार नहीं पढ़ाते हैं बल्कि गैर-पत्रकार पढ़ाते हैं जो उन्हें किताबी ज्ञान तो दे देते हैं लेकिन स्वयं के पास व्यवहारिक ज्ञान नहीं होने के कारण गंभीर पत्रकार का निर्माण नहीं कर पाते हैं। अच्छे नम्बरों से पत्रकारिता की परीक्षा पास कर लेने का अर्थ अच्छा पत्रकार बन जाना नहीं है बल्कि कामयाब पत्रकार के लिए घिस-घिस कर चंदन होना पड़ता है। एक और बड़ी कमी यह है कि पत्रकारिता की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों को सपने दिखाये जाते हैं और जब वे जमीन पर काम करने आते हैं तो उन्हें सच्चाई का सामना करना पड़ता है जिससे उनके भीतर का साहस टूटने लगता है। आज भी पत्रकारों के पास अच्छी सैलरी नहीं है बल्कि कहा जाए कि एक परिवार का गुजर-बसर भी बमुश्किल होता है तो गलत नहीं होगा। इसके बाद नौकरी की गारंटी नहीं होती है क्योंकि प्रबंधन अपनी मर्जी से कभी भी बाहर का रास्ता दिखा देता है। कोरोना के इस भयानक संकट के दौर में पत्रकार सबसे ज्यादा परेशानी में हैं, यह बात हम सब जानते हैं। 

कुछ चुनौतियां हैं जो लोकमंगल की पत्रकारिता को बाधित करती हैं, तो दूसरी तरफ पत्रकारिता के निहित उद्देश्य इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि लोकमंगल की पत्रकारिता हमेशा कायम रहेगी। गांधी जी पत्रकारिता की जिस शुद्धता की बात करते थे, आज वह शायद संभव ना हो लेकिन पत्रकारिता में मिलावट हो, यह भी संभव नहीं। भारत सहित पूरी दुनिया के आंकड़ों का विशेषण करें तो पाएंगे कि सबसे खतरनाक कार्य पत्रकारिता का है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पत्रकारीय दायित्व पूर्ण करते हुए पत्रकार मारे जाते हैं। लेकिन यह समाज को आश्वस्त करने की बात है कि पत्रकारिता पर मंडराते खतरा देखने के बाद भी डरने या पीछे हटने के स्थान पर प्रति वर्ष जज्बे से भरे युवा पत्रकारिता को करियर बनाने के लिए आते हैं और आ रहे हैं। 

लोकमंगल की पत्रकारिता पर संकट पत्रकारिता से या पत्रकारों से नहीं है बल्कि यह संकट प्रबंधन से है। प्रबंधन अपने निहित आर्थिक स्वार्थ के लिए किसी भी तरह का करार कर लेता है और लोकमंगल से जुड़ी कई बातें दबकर रह जाती है। किसी समय शशि कपूर अभिनीत फिल्म ‘न्यू देहली टाइम्स’ इस बात का गवाह है। पत्रकारिता में आने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को एक बार यह फिल्म जरूर दिखायी जानी चाहिए। यह वह सच है जो लोकमंगल की पत्रकारिता के रास्ते में तब भी बाधा थी और आज तो इसका स्पेस लगातार बढ़ रहा है। हालांकि यह भी सच है कि जब-जब पत्रकारिता के समक्ष संकट बढ़ा है, तब-तब पत्रकारिता और तल्ख हुई है। वर्तमान समय का संकट यह है कि हर कोई पत्रकारिता से उम्मीद रखता है कि वह उसके पक्ष में बोले और ऐसा नहीं करने पर पत्रकारिता को अनेक उपमा दी जाती है। इस बात को मान लेना अनुचित नहीं होगा कि किसी दौर में सहिष्णुता अधिक थी तो किसी दौर में यह सहिष्णुता कम हुई है लेकिन सत्ता के लिए पत्रकारिता हमेशा से संकट रही है और बनी रहेगी क्योंकि समाज के चौथे स्तम्भ होने के कारण यह उसका मूल कर्तव्य है। सबसे बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता पर समाज एक तरफ अविश्वास करता है और अखबार और टेलीविजन की खबरें समाज के लिए नजीर बनती हैं। अब समय आ गया है कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था का अधिकार क्षेत्र बढ़ना चाहिए और बेलाग होती मीडिया पर नियंत्रण हो। यह एक पहल है जिसकी जरूरत वर्तमान समय को है। हालांकि दौर कितना भी बुरा आए और कैसी भी परिस्थिति हो, पत्रकारिता अपने लोकमंगल की जवाबदारी से विमुख नहीं हो सकती है। क्योंकि लोकमंगल की पत्रकारिता की नींव में गांधी, तिलक और विद्यार्थीजी की सोच और दृष्टि समाहित है। 

(लेखक शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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डॉ. वैदिक बोले, सराहनीय हैं केंद्र की ये दो पहल, राज्य सरकार को भी देना चाहिए ध्यान

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2020
Modi

डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत सरकार ने इधर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। एक तो किसानों को संपत्ति कार्ड देने की घोषणा और दूसरा केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के हाथ में नोटों की गड्डी देना ताकि वे जमकर खर्च करें, त्यौहार मनाएं और बाजारों में खरीदी का दौरदौरा आ जाए।

देश के करोड़ों किसानों के पास अपने झोपड़े, मकान और खेती की जमीन भी है। उनकी कीमत चाहे बहुत कम हो, लेकिन उनके लिए तो वही सब कुछ है। उनका वह सब कुछ है लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि वे उसके मालिक हैं। सरकार यह काम पहली बार कर रही है कि कानूनी तौर पर उनकी संपत्ति पर उनका स्वामित्व स्थापित होगा। शुरू-शुरू में एक लाख किसानों को ये कार्ड मिलेंगे। ये किसान छह राज्यों के 750 गांवों में होंगे। धीरे-धीरे देश के सभी किसानों को यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। लेकिन इस किसान-लाभकारी योजना के मार्ग में कई बाधाएं हैं। सबसे पहले तो यही कि जब जमीनें नपेंगी तो पड़ौसियों से बड़ी तकरारें होंगी। फिर स्वामित्व को लेकर भाई-बहनों में झड़प हो सकती है। लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय खेती को हम बहुत उपजाऊ और आधुनिक बनाना है, बैंकों से कर्ज लेना है और कंपनियों से अनुबंध करना है तो स्वामित्व पर कानूनी मुहर जरूरी है। यह व्यवस्था भारतीय किसानों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

आजकल कोरोना महामारी की वजह से बाजार ठंडे पड़ गए हैं। बाजार तो हैं लेकिन खरीददार नहीं है। सरकार ने बाजारों में चमक लाने के लिए एक आकर्षक योजना की चूसनी लटकाई है। इसका आनंद सिर्फ सरकारी कर्मचारी ही ले पाएंगे। सभी कर्मचारियों को 10-10 हजार रुपए अग्रिम मिलेंगे। यह कर्ज ब्याजमुक्त होगा। इसे दस किस्तों में लौटाना होगा। इसके अलावा कर्मचारियों को तीन साल में एक बार देश में यात्रा करने का जो भत्ता मिलता है, वह उन्हें बिना यात्रा किए ही मिलेगा लेकिन उन्हें उसका तीन गुना पैसा खरीदी पर लगाना होगा। उसकी रसीद भी देनी होगी। वे ऐसा माल खरीद सकेंगे, जिस पर 12 प्रतिशत या उससे ज्यादा जीएसटी देनी पड़ती है। इसका अर्थ क्या हुआ? यही न कि सरकार जितना पैसा देगी, उससे तीन गुना ज्यादा बाजार में आ जाएगा। उम्मीद है कि एक लाख करोड़ से ज्यादा रुपया बाजार में चला आएगा। यदि राज्य-सरकारें भी ऐसी पहल करें तो देश के बाजार चमक उठेंगे। केंद्र सरकार राज्यों की सरकारों को भी 12 हजार करोड़ रु. का कर्ज दे रही है और 25 हजार करोड़ रु. बुनियादी ढांचे पर खर्च करेगी।

ये दोनों पहल सराहनीय हैं लेकिन देश के करोड़ों मजदूर के बारे में भी कुछ पहल शीघ्र होनी चाहिए।

(साभार: http://www.drvaidik.in/ )

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