‘ट्रंप के भारत दौरे को हमें इस नजरिये से भी देखना चाहिए’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार अपने देश का अतिथि है और हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका आतिथ्य बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिये

पूरन डावर by
Published - Monday, 24 February, 2020
Last Modified:
Monday, 24 February, 2020
PURAN DAWAR

पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक।।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार अपने देश का अतिथि है और हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका आतिथ्य बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिये। जब विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियां नजदीक आती हैं तो विश्व के लिये सुखद परिणाम आना निश्चित है।

व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो अमेरिका उपभोक्ता वस्तुओं में विश्व का सबसे बड़ा बाजार है। आबादी बेशक विश्व की तीन प्रतिशत है, लेकिन विश्व की 24 प्रतिशत खपत अमेरिका में है। ऐसे में सारे श्रम आधारित घरेलू उत्पाद, जिनमें अभी भारत का हिस्सा मात्र एक से 1.5% है, बढ़ाने की बड़ी गुंजाइश है। ऐसे में दोनों देश जितने नजदीक आएंगे, संभावनाएं उतनी बढ़ेंगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति को मात्र अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि विश्व के राष्ट्रपति के रूप में देखा जाता है। अमेरिका एवं डालर का महत्व यूं ही नहीं है। विश्व में जितना रिसर्च पर खर्च होता है, उसमें केवल अमेरिका का हिस्सा 64% है। अमेरिका की आबादी विश्व की मात्र 3% है। पूरा विश्व उस रिसर्च का लाभ लेता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के परिवार की यात्रा को मात्र पाकिस्तान के संदर्भ में देखना बेमानी है। विश्वशक्ति के साथ रिश्ते और व्यापारिक मजबूती अधिक महत्वपूर्ण है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है: राजेश बादल

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रादेशिक पार्टियों में कलह और सामंती चरित्र 

हिंदुस्तानी लोकतंत्र में प्रादेशिक पार्टियों को ग्रहण सा लग गया है। स्थापना के दशकों बाद भी जम्हूरियत से उनका जमीनी फासला बढ़ता जा रहा है। बहुदलीय तंत्र किसी भी गणतांत्रिक देश की खूबसूरती का सबब होता है। पर जब दलों के अंदर राजरोग पनपने लगें तो फिर प्रजातांत्रिक शक्ल के विकृत होने का खतरा बढ़ जाता है। बिहार में लोकतांत्रिक जनतापार्टी (लोजपा) का आंतरिक घटनाक्रम कुछ ऐसी ही कहानी कहता है। चिराग रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी हैं। जिस तरह राजतंत्र में राजकुमार ही उत्तराधिकारी होता था और कभी कभी हम पाते थे कि उत्तराधिकार के लिए जंग छिड़ जाती थी। ऐसी ही अंदरूनी लड़ाई इस नन्ही सी पार्टी में भी नजर आ रही है। राजघराने की तर्ज पर राजा के भाई ने भतीजे की पीठ में खंजर घोंप दिया।

वैसे तो यह इस प्रदेश की इकलौती कहानी नहीं है। इसी दौर में लालू यादव ने आरजेडी को जन्म दिया। वे घनघोर समाजवादी और लोकतंत्र समर्थक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में प्रशिक्षित हुए थे। लेकिन उनका लोकतंत्र राजतंत्र में तब्दील हो गया, जब उन्होंने पत्नी और सियासत के ककहरे से अपरिचित राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। उसके बाद अगली पीढ़ी भी राजपाट संभालने लगी। सत्तारूढ़ जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार क्या अपने आप में सामंती चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते? पड़ोसी उत्तर प्रदेश ने भी यही कहानी दोहराई। मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। कुछ बरस बाद पार्टी उनके पुत्र व भाई की कलह का शिकार बन गई। अंततः कमान पुत्र अखिलेश यादव के हाथ में आई। इन दलों में एक और स्थाई रोग चस्पा हो गया। ये दल, यादव कुल की जातियों के रौब तले दब गए। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी का उदभव कुछ जातियों से नफ़रत के बीज से हुआ। इन दलों ने समर्थकों को लोकतांत्रिक बनाना तो दूर, उन्हें सामंती प्रजा बना दिया। क्या मायावती के बाद दल में स्वाभाविक निर्वाचित प्रतिनिधियों की दूसरी पंक्ति नजर आती है? इन दलों को अन्य जातियों के वोटों की खातिर कुछ टुकड़े उनको भी डालने पड़े। पर समग्र समाज का प्रतिनिधित्व करने में ये दल नाकाम रहे। इसीलिए ढाई-तीन दशक बाद भी बौने ही हैं। राष्ट्रीय पार्टी के रूप में विकसित नहीं हो पाए। वे शायद राष्ट्रीय होना ही नहीं चाहते। अपनी छोटी छोटी रियासतों से ही गदगद हैं।

हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने जिसकी नींव डाली, क्या वह दल युवराजों के अपने खंडित साम्राज्य में तब्दील नहीं हो चुका है? वे जनादेश का मखौल उड़ाते दिखाई देते हैं। जिस पार्टी से चुनाव अभियान में मोर्चा लेते हैं, परिणाम आने के बाद उसी से हाथ मिलाकर गद्दी नशीन हो जाते हैं, पुराने जमाने के छोटे राजाओं की तरह। सिद्धांत-सरोकार कपूर की तरह उड़ जाते हैं। पढ़े लिखे मतदाता भी इन नए नरेशों की स्तुति करते हैं। कमोबेश यही हाल पंजाब का है। वहां अकाली दल भी सामूहिक नेतृत्व को तिलांजलि देकर एक परिवार को ही क्षत्रप बना बैठा है। क्या उस  परिवार से अलग कोई राजनेता उस पार्टी का अध्यक्ष बनने की सोच भी सकता है? महाराष्ट्र में सरकार चला रही शिवसेना भी उत्तराधिकार परंपरा निभा रही है। एक जमाने में इस दल में चचेरे भाइयों के बीच शक्ति संघर्ष देखने को मिला था। अंततः युवराज उद्धव ठाकरे के हाथ में कमान आई। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी कोई अपवाद नहीं है। इस पार्टी के भीतर कितने चुनाव हुए हैं। क्या वाकई दल में सब कुछ गणतांत्रिक ढंग से चल रहा है। शरद पवार के बिना पार्टी के अस्तित्व की कौन कल्पना कर सकता है। तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) का भी हाल ऐसा ही है। करुणानिधि ने राजा की तरह पार्टी को चलाया। राजपरिवार जैसे संघर्ष  इसके अंदर भी हुए, शक्ति केंद्र पनपे और फिर एक युवराज के हाथ में कमान आ गई। नवोदित आम आदमी पार्टी का भी यही हाल है। अरविंद केजरीवाल से बड़ी आशाएं थीं। लेकिन क्या हुआ। इस पार्टी पर भी तानाशाही के घुड़सवार चढ़ बैठे। उनकी टीम में स्वतंत्र सोच रखने वाले अधिकतर लोग उनके साथ नहीं रहे। आशुतोष, कुमार विश्वास, किरण बेदी, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आशीष खेतान, मेधा पाटकर, एडमिरल रामदास, कपिल मिश्रा, अंजलि दमानिया, कप्तान गोपीनाथ और प्रो. आनंद कुमार तक उनसे पल्ला झाड़ चुके हैं। अरविन्द की कार्यशैली दरअसल निरंकुश अधिनायक की है।

वैसे तो 25-30 बरस एक विराट लोकतंत्र की आयु में कोई खास मायने नहीं रखते, मगर हिंदुस्तान में इन वर्षों ने यकीनन लोकतंत्र का चेहरा विकृत किया है। नब्बे के दशक में जब राजनीतिक अस्थिरता के खेत में कुकुरमुत्तों की तरह ढेर सारी प्रादेशिक पार्टियों की फसल उगी तो उम्मीद थी कि जम्हूरियत की फसल लहलहाएगी। पर ऐसा न हुआ। इन दलों ने लोकतंत्र मजबूत करने के बजाए उसमें घुन लगा दिया। वे भूल गए कि जातियों की महामारी के कारण यह देश पहले ही बहुत भुगत चुका है। भारतीय संविधान की भावना तो ऐसी नहीं है। तो अब क्या माना जाए। इस मुल्क की मिटटी या मिजाज सिर्फ राजतन्त्र के लिए बचा है? एक अखिल भारतीय रियासत राष्ट्र की छोटी छोटी आधुनिक रियासतों का सहारा लेकर हुकूमत करे। जब कोई महीन सा राजपरिवार बड़ा हो जाए तो वह सल्तनत संभाल रहे राजघराने को हटा दे। अवाम धीरे धीरे लोकतंत्र को बौना होते तब तक देखती रहे, जब तक कि वह दम न तोड़ दे। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित ही वह बेहद दुखद होगा। इस आलेख का मक़सद केवल प्रादेशिक पार्टियों की शैली पर ध्यान केंद्रित करना था। दोनों बड़ी पार्टियों पर आईन्दा विश्लेषण करेंगे।

(साभार: लोकमत समाचार)

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'पं. माधवराव सप्रे ने दिए पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार'

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था।

Last Modified:
Saturday, 19 June, 2021
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-प्रो.संजय द्विवेदी

गुलाम भारत में अनेक प्रखर स्वाधीनचेता नागरिक भी रहते थे, जिनमें एक थे पं. माधवराव सप्रे। भारतबोध उनके चिंतन और चिति का हिस्सा था। वे अपनी पत्रकारिता, साहित्य लेखन,संपादन, अनुवाद कर्म और भाषणकला से एक ही चेतना भारतीय जन में भरना चाहते हैं वह है भारतबोध। सप्रे जी का सही मूल्यांकन अनेक कारणों से नहीं हो सका। किंतु हम उनकी रचना, सृजन और संघर्ष से भरी यायावर जिंदगी को देखते हैं, तो पता चलता है कि किस तरह उन्होंने अपने को तपाकर भारत को इतना कुछ दिया। उनका भी भाव शायद यही रहा होगा- चाहता हूं ‘मातृ-भू तुझको अभी कुछ और भी दूं।’

मराठीभाषी होने के बाद भी उन्हें हिंदी नवजागरण का पुरोधा कहा गया तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। उनके संपादन में निकले पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी केसरी’ इसकी बानगी हैं। वे ‘कर्मवीर’ जैसे विशिष्ठ प्रकाशन के मूल में रहे। उसके प्रेरणाश्रोत रहे। पत्रकारिता को राष्ट्रीय और लोकधर्मी संस्कार देने वाले वे विरल संपादकों में एक हैं। सप्रे जी लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। उनका समूचा लेखन इसीलिए भारतबोध की अनुभूति से प्रेरित है। अपने एक लेख ‘सुराज्य और सुराज्य’ में वे लिखते हैं-’अंग्रेज सरकार का राज्य, व्यवस्थित और शासन की दृष्टि से सुराज्य होने पर भी, हम लोगों के लिए सुखकारी या लाभदायक नहीं है और यदि हाल की पद्धति कायम रही तो होना भी संभव नहीं है, क्योंकि यह राज्य केवल गोरे राज्याधिकारियों की सलाह पर चलता है, जिन्हें हिन्दुस्तान के हित की अपेक्षा गोरे लोगों का हित अधिक प्रिय है।’ उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति गुस्सा है पर वे उसे अपेक्षित संयम से व्यक्त करते हैं। उन्हें यह सहन नहीं कि कोई विदेशी उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि पर आकर शासन करे। वे अंग्रेजी राज के नकारात्मक प्रभावों को अपने लेखों में व्यक्त करते हुए देश पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित करते हैं। हालांकि वे पूर्व के भारतीय राजाओं और पेशवाओं के राज में हुई जनता की उपेक्षा और दमन को भी जानते हैं। वे मानते हैं कि इसी कारण विदेशियों को जनता का प्रारंभिक समर्थन भी मिला, क्योंकि भारतीय राजा जनता के साथ संवेदना से नहीं जुड़े थे। बावजूद इसके उनका भारतप्रेम उनकी लेखनी से प्रकट होता है। वे लिखते हैं-’ जेलखाने का शासन जैसा कष्ट देता है, उसी तरह अंग्रेजी राज्य-प्रबंध के कानून और कायदों से प्रजा चारों ओर से जकड़ी हुई है। अंग्रेजी व्यापारियों का भला करने के लिए,खुले व्यापार का तत्व शुरू करने से, इस देश का व्यापार डूब गया।’ नागपुर से छपने वाले अपने अखबार ‘हिंदी केसरी’ को उन्होंने आजादी के आंदोलन का मुखपत्र ही बना दिया था। इसमें देश भर में चल रहे आंदोलनों के समाचार छपते रहते थे। इससे पाठकों को राष्ट्रीय आंदोलन की आंच और धमक का पता चलता था। 24 अगस्त,1907 के अंक में इलाहाबाद, चैन्नै,राजमुंदरी,कोचीन आदि थानों के समाचार छपे हैं। एक समाचार कोचीन का है, उसकी भाषा देखिए- ‘राजा के कालेज में कुछ विद्यार्थियों ने एक बड़ी सभा की थी, उसमें वंदेमातरम् गीत गाया था और वंदेमातरम् का जयघोष किया था। यह खबर सुनकर दीवान ने प्रिंसिपल से इसकी कैफियत मांगी है।’  इस प्रकार की साहसी और भारतप्रेम से भरी पत्रकारिता के चलते हुए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 22, अगस्त,1908 में वे गिरफ्तार किए गए और नवंबर में उनकी रिहाई हुई।

उनका समूचा लेखन, अनुवाद कर्म भारतीय मनीषा से प्रेरित है। वे समर्थ गुरू रामदास की पुस्तक ‘दासबोध’ का अनुवाद करते हैं। हमें पता है समर्थ गुरू रामदास शिवाजी के गुरु ही नहीं एक आध्यात्मिक विभूति थे। उनके आशीष से ही छत्रपति ने मराठा राज्य की स्थापना की। शिवाजी के राज्य के शासन मूल्य बताते हैं कि गुरूकृपा से व्यक्ति का किस तरह रूपांतरण हो जाता है। सप्रे जी लोकमान्य तिलक रचित ‘गीता रहस्य’ का भी अनुवाद हिंदी में करते हैं। इस खास पुस्तक को हिंदी पाठकों को सुलभ कराते हैं। ‘महाभारत मीमांशा’ का अनुवाद भी इसी कड़ी का एक कार्य है। इसके साथ ही उन्होंने ‘शालोपयोगी भारतवर्ष’ को भी मराठी  से अनूदित किया। सप्रेजी ने 1923-24 में ‘दत्त-भार्गव संवाद’ का अनुवाद किया था जो उनकी मृत्यु के बाद छपा। उनका एक बहुत बड़ा काम है काशी नागरी प्रचारणी सभा की ‘विज्ञान कोश योजना’ के तहत अर्थशास्त्र की मानक शब्दावली बनाना। जिसके बारे में कहा जाता है कि हिंदी में अर्थशास्त्रीय चिंतन की परंपरा प्रारंभ सप्रे जी ने ही किया।

संस्थाओं को गढ़ना, लोगों को राष्ट्र के काम के लिए प्रेरित करना सप्रे जी के भारतप्रेम का अनन्य उदाहरण है। रायपुर, जबलपुर, नागपुर, पेंड्रा में रहते हुए उन्होंने न जाने कितने लोगों का निर्माण किया और उनके जीवन को नई दिशा दी।  26 वर्षों की उनकी पत्रकारिता और साहित्य सेवा ने मानक रचे। पंडित रविशंकर शुक्ल, सेठ गोविंददास, गांधीवादी चिंतक सुंदरलाल शर्मा, द्वारिका प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीधर वाजपेयी,माखनलाल चतुर्वेदी, लल्ली प्रसाद पाण्डेय,मावली प्रसाद श्रीवास्तव सहित अनेक हिंदी सेवियों को उन्होंने प्रेरित और प्रोत्साहित किया। जबलपुर की फिजाओं में आज भी यह बात गूंजती है कि इस शहर को संस्कारधानी बनाने में सप्रे जी ने एक अनुकूल वातावरण बनाया। जिसके चलते जबलपुर साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति का केंद्र बन सका। 1920 में उन्होंने जबलपुर में हिंदी मंदिर की स्थापना की, जिसका इस क्षेत्र में सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ाने में अनूठा योगदान है।

अपने अप्रतिम योगदान के बाद भी आजादी के तमाम नायकों की तरह माधवराव सप्रे को न तो समाज ने उस तरह याद किया , न ही साहित्य की समालोचना में उन्हें उस तरह याद किया गया जिसके वे पात्र थे। निश्चित ही भारतीय भावधारा, भारतबोध की उनकी आध्यात्मिक धारा की पत्रकारिता के नाते उन्हें उपेक्षित किया गया। भारत के धर्म, उसकी अध्यात्म की धारा से जुड़कर भारत को चीन्हने की कोशिश करने वाला हर नायक क्यों उपेक्षित है, यह बातें आज लोक विमर्श में हैं। शायद इसीलिए आज 150 वर्षों के बाद भी माधवराव सप्रे को हिंदी जगत न उस तरह से जानता है न ही याद करता है। उनकी भावभूमि और वैचारिक अधिष्ठान भारत की जड़ों से जुड़ा हुआ है। वे इस देश को उसके नौजवानों को जगाते हुए भारतीयता के उजले पन्नों से अवगत कराना नहीं भूलते। इसीलिए वे गीता के रहस्य खोजते हैं, महाभारत की मीमांसा करते हैं, समर्थ गुरू रामदास के सामर्थ्य से देशवासियों को अवगत कराते हैं। वे नौजवानों के लिए लेख मालाएं लिखते हैं। उनका यह प्रदेय बहुत खास है।

वे अनेक संस्थाओं की स्थापना करते हैं। जिनमें हिंदी सेवा की संस्थाएं हैं, सामाजिक संस्थाएं तो विद्यालय भी हैं। जबलपुर में हिंदी मंदिर, रायपुर में रामदासी मठ, जानकी देवी पाठशाला इसके उदाहरण हैं।19 जून,1871 को मध्यप्रदेश के एक जिले दमोह के पथरिया में जन्में सप्रे जी 23 अप्रैल,1926 को रायपुर में देह त्याग देते हैं। कुल 54 वर्षों की जिंदगी जीकर वे कैसे खुद को सार्थक करते हैं, सब कुछ सामने है। उनके बारे में  गंभीर शोध और अध्ययन की बहुत आवश्यकता है। उनकी 150 वीं जयंती प्रसंग ने हमें यह अवसर दिया है हम अपने इस पुरखे की याद को देश भर में फैलाएं। यह संयोग ही है देश की आजादी की 75 वीं वर्षगांठ का प्रसंग भी साथ आया है। खुशियां दुगुनी हैं। इसलिए इस महान भारतपुत्र याद कर हम मातृभूमि के प्रति भी श्रध्दा निवेदन करेंगें और आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार भी होंगें। यह बहुत सुखद है कि भोपाल में उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए श्री विजयदत्त श्रीधर ने माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान की स्थापना की है। जरूरी है कि शासन स्तर पर भी उनकी स्मृति में  कुछ महत्वपूर्ण काम किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन कलमवीरों से प्रेरणा पाकर भारतबोध से भरी मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करें।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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'डिजिटल की दुनिया में दिखा क्रांतिकारी परिवर्तन, प्रिंट से भी ज्यादा मिल रहे हैं विज्ञापन'

प्रोफेसर केजी सुरेश ने वर्तमान दौर में डिजिटल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता का हवाला देते हुए कहा कि आज 28 प्रतिशत विज्ञापन डिजिटल की तरफ जा रहे हैं

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
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वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चित प्रकोष्ठ की ओर से 'डिजिटल दौर में मीडिया का बहुआयामी स्वरूप' विषयक सात दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत सोमवार को हुई। ऑनलाइन आयोजित कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति प्रोफेसर केजी सुरेश ने कहा कि डिजिटल की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला है। आज चार साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुजुर्ग ऑनलाइन कनेक्ट हो रहे हैं। कल तक जिन बच्चों को मोबाइल से दूर रखा जाता था, उन्हें आज मोबाइल से सीखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

प्रोफेसर केजी सुरेश ने कोरोना काल से पत्रकारों को निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि फिक्की ने मीडिया सेक्टर में 25 प्रतिशत का उछाल आने की संभावना जताई है। प्रोफेसर केजी सुरेश ने वर्तमान दौर में डिजिटल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता का हवाला देते हुए कहा कि आज 28 प्रतिशत विज्ञापन डिजिटल की तरफ जा रहे हैं, जबकि प्रिंट को सिर्फ 25 प्रतिशत विज्ञापन मिल रहा है।

बतौर विशिष्ट अतिथि जनसंचार केंद्र राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर संजीव भानावत ने कहा कि आज छापाखानों से निकलकर पत्रकारिता मोबाइल में कैद हो चुकी है। कंटेंट का डिस्ट्रिब्यूशन तेजी से हो रहा है। डिजिटल दौर में पत्रकारिता मल्टीटास्किंग हो चुकी है। डिजिटल मीडिया में न स्पेस का संकट है न समय का। प्रोफेसर संजीव भानावत ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान दौर में मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर चर्चा करते हुए महाभारत के संजय को पहला युद्ध संवाददाता बताया। उन्होंने कहा कि पहले नारद व संजय के पास जो ताकत थी, उसे आज डिजिटल माध्यम ने आम जनता को दी है। हर नई तकनीक कुछ नए खतरे को लेकर आती है, लेकिन इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। आज प्रिंट, इलेक्ट्रानिक सभी माध्यम मोबाइल में समा गए हैं।

कुलपति प्रोफेसर निर्मला एस मौर्य ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि समय के साथ समाज की सोच बदलती है। बदलते युग के साथ जनसंचार में भी बदलाव आता है। कभी एक पन्ने से शुरू हुई पत्रकारिता आज डिजिटल माध्यम तक पहुंची है। उन्होंने कहा कि समय की मांग के अनुरूप मीडिया का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। आज इंटरनेट मीडिया के कारण अब मिनटों में पूरी दुनिया का हाल जान लेते हैं। कुलपति ने प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता हमेशा बरकरार रहने की भी बात कही।

अतिथियों का स्वागत आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चित प्रकोष्ठ के समन्वयक प्रो. मानस पांडेय एवं कार्यशाला की रूपरेखा एवं संचालन संयोजक डॉ. मनोज मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनील कुमार ने किया। सात दिवसीय कार्यशाला के आयोजन सचिव डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। कार्यशाला में सह संयोजक डॉ. धर्मेंद्र सिंह, प्रो. राजेश शर्मा, प्रो. राघवेंद्र मिश्र, डॉ. अवध बिहारी सिंह, डॉ. चंदन सिंह, डॉ. कौशल पांडेय, डॉ. बुशरा जाफरी, डॉ. प्रभा शर्मा, डॉ. छोटेलाल, लता चौहान, डॉ. सतीश जैसल, डॉ. राधा ओझा, डॉ. दयानंद उपाध्याय, डॉ. विजय तिवारी, डॉ. शशि कला यादव, वीर बहादुर सिंह समेत देश के 21 राज्यों से प्रतिभागियों ने भाग लिया।

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'कश्मीर का मसला और हमारा इतिहास बोध'

भारत में अजीब दुविधा है। लोकतंत्र सबको अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन शायद नागरिक अभी उसके लिए तैयार नहीं हैं।

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

भारत में अजीब दुविधा है। लोकतंत्र सबको अभिव्यक्ति का अधिकार देता है, लेकिन शायद नागरिक अभी उसके लिए तैयार नहीं हैं। गैर जिम्मेदारी के आलम में अक्सर वे ऐसे विचार प्रकट करते हैं, जो देश को नुकसान पहुंचाते हैं। अनजाने में जो ऐसी बात करे, उसे तो एक बार क्षमा किया जा सकता है। मगर जानबूझकर कही गई बातें किस श्रेणी में रखी जाएं? सभ्य समाज को यह समझने की जरूरत है। कश्मीर पर ताजा बहस इसी तरह की है। चंद रोज पहले कांग्रेस की प्रथम पंक्ति के एक नेता ने डिजिटल मंच पर कहा कि यदि उनका दल सत्ता में आया तो अनुच्छेद -370 फिर बहाल करने पर विचार करेगा। साफ है कि इसे सियासी रंग दिया गया है। मगर यह पार्टी की अधिकृत राय नहीं है, लेकिन क्या नेताजी को कश्मीर-प्रसंग में अपने दल की सरकार का इतिहास पता है। शायद नहीं। अन्यथा वे इस तरह नहीं कहते। क्या वे नहीं जानते थे कि अनुच्छेद-370 के समापन की शुरुआत तो जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में ही हो गई थी। पिछले साल केंद्र सरकार ने जिस 370 को खत्म किया, वह एक तरह से खोखली थी। कई प्रावधान तो नेहरू, शास्त्री और इंदिरा गांधी के समय ही नहीं रहे थे।

इसे समझने के लिए अतीत याद करना होगा। भारतीय संविधान सभा में जम्मू कश्मीर के चार लोग थे। ये थे शेखअब्दुल्ला, मिर्ज़ा अफजल बेग़, मोहम्मद सईद मसूदी और मोतीराम बागड़ा। संविधान सभा ने उनकी सहमति से अनुच्छेद-370 स्वीकार किया तो खास बिंदु थे- राज्य अपना संविधान बनाएगा, रक्षा, विदेश व संचार भारत के जिम्मे थे, संवैधानिक बदलाव के लिए राज्य की मंजूरी जरूरी थी, यह सहमति राज्य संविधान सभा से पुष्टि चाहती थी। राज्य संविधान सभा काम पूरा करने के बाद भंग हो जानी थी। राष्ट्रपति को 370 हटा सकते थे पर संविधान सभा की अनुमति जरूरी थी। लब्बोलुआब यह कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा सर्वोच्च थी और 370 का भविष्य उसे ही तय करना था। यह अस्थायी व्यवस्था थी। सितंबर, 51 में संविधान सभा के चुनाव हुए। सारी सीटें नेशनल कांफ्रेंस ने जीतीं। वज़ीरेआज्म शेख़अब्दुल्ला चुने गए। राज्य की यह पहली निर्वाचित सरकार थी। इसके बाद जुलाई, 52 में केंद्र-नेशनल कांफ्रेंस समझौते में दोनों पक्षों ने 370 मंजूर कर ली। अब विधानसभा ही सर्वोच्च थी। केंद्र दखल देने की स्थिति में नहीं था। राज्य का झंडा भी अलग था। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार सीमित ही लागू होने थे। आंतरिक गड़बड़ी की स्थिति में ही केंद्र राज्य की मंजूरी से इमरजेंसी लगा सकता था। धारा 356 व 360 लागू नहीं की जा सकती थी। संसद व कश्मीर विधानसभा ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी। नवंबर, 52 में महाराजा की गद्दी समाप्त कर दी गई। युवराज कर्णसिंह पहले सदर ए रियासत चुने गए।

इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने रंग बदले। वे कश्मीर की आजादी की बात करने लगे। उन्हें अमेरिका ने भड़काया था। बदले रुख से जनता और मंत्रिमंडल में व्यापक असंतोष था। सदर ए रियासत कर्णसिंह ने शेखअब्दुल्ला को केबिनेट की बैठक बुलाकर शांति कायम कराने का निर्देश दिया। शेख ने निर्देश को धता बताया और गुलमर्ग घूमने चले गए। सदर ए रियासत ने सरकार बर्खास्त कर दी और शेख गिरफ्तार कर लिए गए। नेशनल कांफ्रेंस ने बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद को नया नेता चुना। नई सरकार बनी। नेहरू, शेख़ के धोखे से खफा थे। जनवरी, 54 में नए नेतृत्व ने दिल्ली समझौते में आस्था जताई कस्टम, आयकर और उत्पादन कर भी केंद्र को वसूलने का हक मिला। सुप्रीम कोर्ट को मान्यता दी गई। फरवरी, 54 में एक बार फिर राज्य सरकार ने भारत विलय पर मोहर लगा दी। संविधान सभा ने माना कि भारतीय संविधान कश्मीर पर लागू होगा। मई, 54 में राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान कश्मीर पर लागू कर दिया। नवंबर में नेशनल कांफ्रेंस ने ऐलान किया कि न कश्मीर कभी पाकिस्तान में मिलेगा और न आजादी की कोशिश करेगा। दरअसल शेख़अब्दुल्ला का रवैया उनकी पार्टी के लोगों ने पसंद नहीं किया था।

अक्टूबर, 56 में कश्मीर के संविधान का अंतिम मसविदा संविधान सभा में पेश हुआ। इसमें कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बताया गया। संविधान 26 जनवरी, 57 से लागू हो गया। संविधान सभा भंग हो गई। नए चुनाव हुए। इनमें नेशनल कांफ्रेंस ने 60 सीटें जीतीं। बख्शी ग़ुलाम मोहम्मद ने फिर सरकार बनाई। इसके बाद 1959 में संविधान सभा ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के कश्मीर में प्रभावशील होने को मंज़ूरी दी। कश्मीर में प्रवेश परमिट 1961 में खत्म हो गया। राज्य में 62 के तीसरे चुनाव के बाद गुलाम मोहम्मद सादिक 64 में प्रधानमंत्री बने। इसी साल राष्ट्रपति ने अध्यादेश के जरिए धारा 356 व 357 कश्मीर में लागू कर दी। राज्य में राष्ट्रपति शासन का रास्ता भी साफ हो गया। इस समय शास्त्रीजी प्रधानमंत्री थे। अनुच्छेद 370 छिन्न भिन्न हो चुका था। पर अभी भी काम बाक़ी था। तीस मार्च, 65 को विधान सभा ने सर्वानुमति से संविधान संशोधन किया कि सदर ए रियासत का पद राज्यपाल कहा जाएगा। राज्य में प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री होगा। बाद के वर्ष भी 370 के निरंतर सिकुड़ते जाने की कहानी है। मसलन राज्य से लोकसभा सांसद निर्वाचित होने लगे। हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन आ गया। अनुच्छेद 226 और 249 लागू हो गए।

यहां नेहरू जी के इकोनॉमिक टाइम्स में छपे भाषण का जिक्र जरूरी है। उन्होंने कहा था, ‘अनुच्छेद 370 संविधान का स्थाई हिस्सा नहीं है। यह जब तक है, तब तक है। इसका प्रभाव कम हो चुका है। हमें इसे धीरे धीरे कम करना जारी रखना है।’ यह निष्कर्ष निकालने में हिचक नहीं कि कांग्रेस पार्टी 370 के समापन में अपने योगदान को ही याद नहीं करना चाहती।    

(साभार: लोकमत समाचार)

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हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है मिस्टर मीडिया!

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है?

राजेश बादल by
Published - Friday, 11 June, 2021
Last Modified:
Friday, 11 June, 2021
Mister Media

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

कमाल है। ऐसे पत्रकार तो कभी नहीं थे। हर सूचना को सच मान लेना और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल लेना कौन सा पेशेवर धर्म है? बीते दिनों कई उदाहरण सामने आए। एक नमूना यह कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली आए तो मान लिया गया कि उनका इस्तीफा होने ही जा रहा है। इस आशय की खबरें प्रसारित होने लगीं। यह भी मान लिया गया कि दिल्ली से भेजे गए नौकरशाह उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही जा रहे हैं।

डिजिटल मीडिया के कुछ मंचों से प्रधानमंत्री का चित्र गायब हो गया तो कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है। फिर खबर फैली कि अलग पूर्वांचल प्रदेश बनाया जा रहा है। उसमें गोरखपुर भी आएगा। मुख्यमंत्री को उस छोटे से राज्य के बस्ते में ही बंद कर दिया जाएगा। अतीत का उदाहरण दिया गया कि नारायण दत्त तिवारी के साथ भी ऐसा हुआ था। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। फिर एक समय ऐसा आया, जब उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा समझा जाने लगा। लेकिन वे नए नवेले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। उत्थान और पतन की यह गाथा योगी के साथ भी चस्पा कर दी गई।

पत्रकारिता में सियासत के परदे के पीछे की कहानी समझने और उसका विश्लेषण करने का हुनर क्यों नदारद हो गया? इन दिनों प्रत्येक सूचना या अफवाह के आधार पर नया काल्पनिक सच गढ़ने की शैली क्यों विकसित हो गई। हमारे राजनीतिक विश्लेषक इतने बौने हो गए कि वे सियासी सूचना की तह तक जाने का प्रयास तक नहीं करते। पत्रकारिता में दशकों से एक मंत्र प्रचलित है कि जो कहा जाता है, वह किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वह होठों से नहीं फूटता। बेशक यह बुर्जुआ लोकतंत्र की निंदनीय परंपरा है, मगर आज के आधुनिक हिन्दुस्तान ने इसे अभी तक छोड़ा नहीं है।

फिर हमारे खबरनवीस या जानकार इस मंत्र का जाप क्यों नहीं करते। वे ऐसा करें तो टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाली आधी ब्रेकिंग न्यूज बंद हो जाएं, जो आगे जाकर गलत साबित होती हैं। कम से कम तीस फीसदी ऐसी बहसें बंद हो जाएं, जो काल्पनिक सच पर हुआ करती हैं। मसलन, अगर योगी हट गए तो उनके उत्तराधिकारी कौन होंगे। इसी तरह मध्य प्रदेश में सिंधिया ग्वालियर से भोपाल जाएं तो यह छप जाए कि शिवराज का इस्तीफा होने ही जा रहा है।

हमारी पत्रकारिता को यह कैसी सनसनी का रोग लग गया है, जो खून में हरारत नहीं चाहता, एक शर्तिया उबाल चाहता है। अफीम के नशे की तरह। नए पत्रकारों की पौध तैयार करने वाले तमाम विश्वविद्यालयों पर यह करारा तमाचा भी है, जो उन्हें पॉलिटिकल रिपोर्टिंग और राइटिंग पढ़ाते हैं। अखबारों और टीवी चैनलों के मालिकों- संपादकों के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती है। अधकचरी जानकारियों को सच बता देना और फिर उस सच का विश्लेषण करना उन्हें मूषक बनाता है। पत्रकारिता को यह मूषक फिर विदूषक बना देता है मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

पत्रकारिता में हो रही इस गंभीर चूक को कैसे रोका जाए मिस्टर मीडिया?

भारतीय पत्रकारिता को मुख्य न्यायाधीश को शुक्रिया तो कहना ही चाहिए मिस्टर मीडिया!

इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

कृपया अपनी जिम्मेदारी तलाश कीजिए मिस्टर मीडिया!

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सांप-छछूंदर के जैसी हो गई है ट्विटर की स्थिति: राजेश बादल

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है।

Last Modified:
Tuesday, 08 June, 2021
socialmedia6

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

डिजिटल माध्यमों से टकराव कितना घातक 

केंद्र सरकार और सूचना-सामग्री विस्तार करने वाली परदेसी कंपनियों के बीच तनातनी अब निर्णायक मोड़ पर है। इस चरण में भारतीय बुद्धिजीवी समाज का दखल अब जरूरी दिखाई देने लगा है। कंपनियों के साथ विवाद का सीधा सीधा समाधान अदालत के जरिए नहीं हो तो अच्छा। दोनों पक्षकारों को ही किसी व्यावहारिक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। केंद्र सरकार चाहे तो इस पचड़े से बाहर निकलने के लिए किसी तीसरे तटस्थ पक्ष को मध्यस्थ बना सकती है। इसका कारण यह है कि दूरगामी नजरिए से बीजेपी के लिए इसके सियासी परिणाम मुश्किल भरे हो सकते हैं।

ऊपर से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ट्विटर को चेतावनी में कुछ अनुचित नहीं लगता। भारतीय क्षेत्र में सक्रिय सूचना विस्तार करने वाले किसी भी अवतार को भारत के नए आईटी नियमों का पालन करना चाहिए। इससे पहले ट्विटर को तीन महीने की मोहलत दी गई थी कि वह नए नियमों को लागू करे। इनमें एक नोडल संपर्क व्यक्ति की नियुक्ति करना भी शामिल है, जो उपभोक्ताओं की शिकायतों का निराकरण करने में सक्षम हो। यह मामला न्यायालय में लंबित है। मुकदमों के बोझ तले दबे न्यायालय से निर्णय आने में वक्त तो लगेगा ही। यकीनन केंद्र सरकार चाहती होगी कि फैसले से पहले ही मामले का पटाक्षेप हो जाए तो बेहतर।

दरअसल सरकार की शीघ्रता का एक कारण सियासी भी हो सकता है। इसका एक उदाहरण तो हाल ही में आया, जब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा और बी एल संतोष ने ट्विटर पर दो दस्तावेज परोसे। इन पर कांग्रेस पार्टी ने एतराज किया। ट्विटर की अपनी अंदरूनी पड़ताल में पाया गया कि एक दस्तावेज में कांग्रेस के लेटरपैड के साथ छेड़छाड़ की गई है। तब उसने मैन्युपुलेटेड की मोहर लगा दी। तथ्यों की पड़ताल करने वाली प्रामाणिक संस्था ऑल्ट न्यूज ने भी अपनी जांच में इस इरादतन शरारत को सच पाया। जाहिर है कि बीजेपी को यह रास नहीं आना था। उसे कैसे मंजूर हो सकता था कि सारी दुनिया जाने कि उसके प्रवक्ता ने दस्तावेज में शरारत करके ट्विटर के मंच का दुरुपयोग किया है। बता दूं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भले ही मैन्युपुलेटेड सामग्री प्रचलन में हो, भारतीय दंड संहिता में इसे फर्जीवाड़ा अथवा जालसाजी माना जा सकता है। इसकी वैधानिक व्याख्या का नतीजा गैर जमानती वारंट या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

अब ट्विटर की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। वह मैन्युपुलेटड टैग हटाती है तो इस अपराध की मुजरिम बनती है कि वह जानबूझकर नकली दस्तावेज के जरिए भारत के करोड़ों उपभोक्ताओं को वैचारिक ठगी का निशाना बना रही है। इसके अलावा संसार में फैले भारतीय मूल के करोड़ों लोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत ट्विटर के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई कर सकते हैं कि वह नकली दस्तावेज बिना मैन्युपुलेटेड का टैग लगाए दे रही है। लोग उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं। दूसरी ओर ट्विटर यदि टैग नहीं हटाती तो भी भारत में फर्जी और भ्रामक प्रचार की मुजरिम बनती है। कांग्रेस पार्टी या कोई अन्य उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करा सकता है। इसके अलावा भारत सरकार का कोप भाजन भी उसे बनना पड़ेगा।

इस समूचे घटनाक्रम का राजनीतिक पहलू यह है कि आठ विधानसभाओं के चुनाव सर पर हैं। हमने देखा है कि चुनावों के दरम्यान सोशल-डिजिटल माध्यमों का भरपूर उपयोग-दुरुपयोग होता है। हाल ही के बंगाल विधानसभा चुनाव इसकी उम्दा बानगी हैं। इन मंचों से झूठी सूचनाएं भी फैलाई जाती हैं। राजनीतिक विरोधियों का चरित्र हनन किया जाता है। सभी दल इसमें शामिल होते हैं। अनुभव कहता है कि इसमें भारतीय जनता पार्टी बाजी मार ले जाती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना समेत अनेक दल इसमें पिछड़ जाते हैं। ऐसे में ट्विटर, वॉट्सऐप या अन्य डिजिटल अवतारों से यदि बीजेपी की जंग जारी रही तो आने वाले चुनाव उसके लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। निश्चित रूप से पार्टी यह जोखिम उठाना पसंद नहीं करेगी? अतीत में उसने कभी अपने जिस श्रेष्ठतम तीर का इस्तेमाल सियासी विरोधियों को निपटाने में किया था, वह अब उलट कर आ लगा है और उसके गले की हड्डी बन गया है। शायद इसीलिए आईटी के नए नियमों पर न तो संसद में बहस हुई और न कानूनी जामा पहनाया गया। नए नियमों के तहत भारत में एक संपर्क अधिकारी की नियुक्ति से सरकार की उस तक सीधी पहुंच हो जाएगी। वह उस अधिकारी को येन केन प्रकारेण प्रभावित भी कर सकेगी।

वैसे इक्कीसवीं सदी में आए दिन विकसित हो रहे नए नए डिजिटल मंचों का सौ फीसदी साक्षरता वाले पश्चिम और यूरोप के कई देश सार्थक, सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग कर रहे हैं। भारत ही इतना बड़ा राष्ट्र है, जहां के राजनेता डिजिटल संप्रेषण और अभिव्यक्ति की पेशेवर संस्कृति नहीं सीख पाए हैं। वे सियासी विरोधियों को पटखनी देने के लिए किसी भी भाषा में ट्वीट कर सकते हैं। इन नए नए मंचों पर कम शब्दों पर अपने को व्यक्त करना होता है, जो भारतीय नेताओं को नहीं आता। ज्यादातर राजनेता पढ़ते लिखते नहीं हैं। वे भाषा के मामले में एक जंगलीपन या गंवारू अभिव्यक्ति करते हैं। आखिर दुनिया का विराट और प्राचीनतम लोकतंत्र इन असभ्यताओं को क्यों स्वीकार करे? अपने को एक भद्र और शालीन तरीके से अभिव्यक्त करने का ढंग इन राजनेताओं को कब आएगा?

(साभार: लोकमत समाचार)

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‘जिन गैर हिंदी भाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी, उन्हें हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं’

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं।

Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार ।।

दिल्ली सरकार के गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल और शोध-संस्थान में केरल की नर्सों को लिखित आदेश दिया गया है कि वे अस्पताल में मलयालम में बातचीत न करें। वे या तो हिंदी बोलें या अंग्रेजी बोलें, क्योंकि दिल्ली के मरीज मलयालम नहीं समझते। नर्सों को यह भी कहा गया है कि इस आदेश का उल्लंघन करनेवालों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

जिस अफसर ने यह आदेश जारी किया है, क्या वह यह मानकर चल रहा है कि केरल की नर्सें दिल्ली के मरीजों से मलयालम में बात करती हैं? यह संभव ही नहीं है। किसी नर्स का दिमाग क्या इतना खराब हो सकता है कि वह मरीज से उस भाषा में बात करेगी, जो उसका एक वाक्य भी नहीं समझ सकता? ऐसा क्यों करेगी? हमें गर्व होना चाहिए कि केरल के लोग काफी अच्छी हिंदी बोलते हैं। शर्म तो हम हिंदीभाषियों को आनी चाहिए कि हम मलयालम तो क्या, दक्षिण या पूरब की एक भी भाषा न बोलते हैं और न ही समझते हैं। पंत अस्पताल में लगभग 350 मलयाली नर्सें हैं। वे मरीजों से हिंदी में ही बात करती हैं। अगर वे अंग्रेजी में ही बात करने लगें तो भी बड़ा अनर्थ हो सकता है, क्योंकि ज्यादातर साधारण मरीज अंग्रेजी भी नहीं समझते। उन नर्सों का ‘दोष’ बस यही है कि वे आपस में मलयालम में बात करती हैं।

इस आपसी बातचीत पर भी यदि अस्पताल का कोई अधिकारी प्रतिबंध लगाता है तो यह तो कानूनी अपराध है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। केरल की नर्सें यदि आपस में मलयालम में बात करती हैं तो इसमें किसी डॉक्टर या मरीज को कोई आपत्ति क्यों हो सकती है? यदि पंजाब की नर्सें पंजाबी में और बंगाल की नर्सें बंगाली में आपसी बात करती हैं और आप उन्हें रोकते हैं, उन्हें हिंदी या अंग्रेजी में बात करने के लिए मजबूर करते हैं तो आप एक नए राष्ट्रीय संकट को जन्म दे रहे हैं।

आप अहिंदीभाषियों पर हिंदी थोपने का अनैतिक काम कर रहे हैं। जिन अहिंदीभाषियों ने इतने प्रेम से हिंदी सीखी है, उन्हें आप हिंदी का दुश्मन बना रहे हैं। इसका एक फलितार्थ यह भी है कि किसी भी अहिंदीभाषी प्रांत में हिंदी के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाएगा। यह लेख लिखते समय मेरी बात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से हुई और पंत अस्पताल में डॉक्टरों से भी। सभी इस आदेश को किसी अफसर की व्यक्तिगत सनक बता रहे थे। इसका दिल्ली सरकार से कोई संबंध नहीं है। मुख्यमंत्री केजरीवाल को बधाई कि इस आदेश को रद्द कर दिया गया है।

(लेखक, भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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अभिव्यक्ति पर राजद्रोह का अंकुश अनुचित, पर स्वीकारनी होगी लक्ष्मण रेखा: आलोक मेहता

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

आलोक मेहता by
Published - Monday, 07 June, 2021
Last Modified:
Monday, 07 June, 2021
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा की और राजद्रोह का कठोरतम कानून  सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर लागू करने के राज्य सरकारों के प्रयासों को नितांत अनुचित ठहरा दिया। न्याय के मंदिर से यही अपेक्षा थी। सर्वोच्च अदालत ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि हिंसा के जरिये अराजकता पैदा करने वाली उत्तेजक देशद्रोह जैसी प्रचार सामग्री पर इस कानून का प्रयोग संभव है। इस निर्णय से देशभर के पत्रकारों को बड़ी राहत महसूस हुई है, लेकिन राज्य सरकारों, उनकी पुलिस को भी अपनी सीमाओं को समझकर मनमानी की प्रवृत्ति को बदलना होगा।

यह फैसला देश के एक नामी पत्रकार विनोद दुआ के एक टीवी कार्यक्रम में की गई टिप्पणी पर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के विरुद्ध दायर याचिका पर आया है। लेकिन कुछ अन्य राज्यों में भी ऐसे मुकदमे दर्ज हुए हैं। संभवतः कुछ गंभीर हिंसा के प्रमाणित मामलों को छोड़कर अन्य प्रकरणों में निचली अदालतों से ही पत्रकार दोषमुक्त घोषित हो जाएंगे।  यह विवाद एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित करता है कि राजद्रोह,  सरकारी गोपनीयता के नाम पर ब्रिटिश राज के काले कानूनों में आवश्यक संशोधन संसद द्वारा सर्वानुमति से शीघ्र होने चाहिए।

इसके साथ ही यह मुद्दा भी गंभीर है कि प्रिंट, टीवी चैनल, सीरियल, फिल्म,  सोशल मीडिया को कितनी आजादी और उन पर कितना नियंत्रण हो? सरकार, प्रतिपक्ष और समाज कभी खुश, कभी नाराज। नियम-कानून, आचार संहिताएं,पुलिस व  अदालत  के सारे निर्देशों के बावजूद समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। सूचना संसार कभी सुहाना, कभी भूकंप की तरह डगमगाता हुआ तो  कभी ज्वालामुखी की तरह फटता दिखाई देता है। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी ने नियंत्रण कठिन कर दिया है। सत्ता व्यवस्था ही नहीं, अपराधी-माफिया, आतंकवादी समूह से भी दबाव, विदेशी ताकतों का प्रलोभन और प्रभाव संपूर्ण देश के लिए खतरनाक बन रहा है।  इन परिस्थितियों में विश्वसनीयता तथा भविष्य की चिंता स्वाभाविक है। यह भी सही है कि कश्मीर के आतंकवादी समूह और छत्तीसगढ़,  झारखंड,  उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा, अत्याचार और आतंक फैलाने वाले नक्सली संगठनों या उनके सरगनाओं को मानव अधिकार के नाम पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए, फिर भले ही पत्रकारिता या चिकित्सा अथवा स्वयंसेवीसेवी संस्था का चोगा पहने हुए हों। कार्यपालिका, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र तय हैं तो पत्रकारिता की भी लक्ष्मण रेखा को स्वीकारना होगा।

ब्रिटेन में केबल टीवी एक्ट का प्राधिकरण है।  भारत में जब तक ऐसी नियामक संस्था नहीं हो, तब तक भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा निर्धारित नियमों, आचार संहिता का पालन टीवी-डिजिटल मीडिया में भी किया जाए।  फिलहाल, प्रिंट मीडिया का प्रभावशाली वर्ग ही प्रेस परिषद् के नियम-संहिता की परवाह नहीं कर रहा है, क्योंकि उसके पास दंड देने का कोई अधिकार नहीं है, जबकि प्रेस परिषद् के अध्यक्ष सेवानिवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश ही होते हैं। इन दिनों तो परिषद् ही गंभीर विवादों में उलझ गई है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान में हर नागरिक के लिए है। पत्रकार उसी अधिकार का उपयोग करते हैं। समाज में हर नागरिक के लिए मनुष्यता, नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर्तव्य के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं। पत्रकारों पर भी वह लागू होने चाहिए। सरकार से नियंत्रित व्यवस्था नहीं हो, लेकिन संसद, न्याय पालिका और पत्रकार बिरादरी द्वारा बनाई गई पंचायत यानी मीडिया परिषद् जैसी संस्था के मार्गदर्शी नियम, लक्ष्मण रेखा का पालन तो हो।

न्यायपालिका के सामने एक गंभीर मुद्दा भी उठाया जाता रहा है कि मानहानि कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है, जिससे ईमानदार मीडियाकर्मी को तमाम नेता, अधिकारी या अपराधी तंग करते हैं। अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समय रहते सरकार, संसद, न्यायपालिका, मीडिया नए सिरे से मीडिया के नए नियम कानून, आचार संहिता को तैयार करे। नया मीडिया आयोग,  मीडिया परिषद् बने। पुराने गोपनीयता अथवा मानहानि के कानूनों की समीक्षा हो। तभी तो सही अर्थों में भारतीय गणतंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साबित किया जा सकेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक पद्मश्री से सम्मानित संपादक और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया।

Last Modified:
Saturday, 05 June, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। इसके अलावा उसने आंध्र प्रदेश के दो टेलिविजन चैनलों के खिलाफ राज्य सरकार के राजद्रोह मामले पर भी सकारात्मक रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने तो यहां तक कहा है कि राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए की स्पष्ट व्याख्या करने की आवश्यकता है। संपादकों की सर्वोच्च संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में सुप्रीम कोर्ट की इस भावना का सम्मान किया है। अब मीडिया में बहस छिड़ गई है कि वास्तव में अंग्रेजों के जमाने के इस कानून की इस देश को जरूरत है अथवा नहीं। इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे।

दरअसल जब 1857 का गदर नाकाम हो गया तो गोरी हुकूमत बौखला गई। बगावत की असफलता उस दौर के बुद्धिजीवियों की कुंठा का सबब बन गई थी। वे लिखत-पढ़त में अपना असंतोष खुलकर व्यक्त करने लगे थे। मौलाना बाकर अली पहले पत्रकार थे, जिन्हें गोरों ने 1858 में अभिव्यक्ति की आजादी से घबराकर फांसी दे दी थी। तब तक कोई राजद्रोह कानून भारत में नहीं था। इस फांसी का भी बड़ा विरोध हुआ। इसके बाद मैकाले ने 1860 में आज के राजद्रोह कानून की नींव रखी। इस कानून का उसी ने प्रारूप तैयार किया था। दस साल बाद यह कानून गुलाम हिन्दुस्तान में भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया। जाहिर है कि इसके पीछे मंशा यह थी कि अंग्रेजी राज के प्रति कोई अपने विचारों को खुलकर व्यक्त नहीं कर सके। क्रांतिकारी चाफेकर बंधुओं (दोनों सगे भाई थे) के खिलाफ इसी कानून का इस्तेमाल किया था। बाद में दो अंग्रेज अफसरों की हत्या के आरोप में उनको फांसी दी गई थी। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र में गणपति समारोहों में गोरी सत्ता के खिलाफ प्रवचन -कीर्तन करते थे। बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध मुकदमा भी इसी कानून के अनुसार चलाया गया था। महात्मा गांधी के खिलाफ 1922 में कार्रवाई के लिए इसी का सहारा लिया गया। उन्होंने यंग इंडिया में लेखन से सरकार की नींद हराम कर दी थी। आजादी के बाद संविधान सभा की बैठकें हुईं तो नेहरू ने इसका विरोध किया लेकिन नेहरू विरोधियों ने इसका समर्थन किया। इस कारण यह आजाद भारत में भी बना रहा। यह भी याद रखने की बात है कि खुद अंग्रेजों ने अपने मुल्क में यह कानून समाप्त कर दिया है। 

यह तर्क तो समझ में आता है कि हिन्दुस्तान पर हुकूमत कर रही परदेसी बरतानवी सत्ता यहां के नागरिकों पर गुलामी की नकेल डाले रखने के लिए यह कानून बनाए रखे। मगर स्वतंत्र भारत में लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारों को अपने ही मतदाताओं से आखिर बगावत की आशंका क्यों है। सरकार से असहमति के लिए पत्रकारिता माध्यम अपने मंच का इस्तेमाल क्यों न करे और फिर हर पांच साल बाद तो मतदाताओं के पास यह अधिकार है कि वे अपने मत से सरकार को हटा दें। इस तरह राजद्रोह का चाबुक सरकार को चलाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। फिर भी हमने देखा है कि पिछले पांच-छह साल में इस कानून का इस्तेमाल बढ़ा है। यदि सरकार अपनी नीतियों की तीखी आलोचना को राजद्रोह मानती है तो फिर एक जमाने में ‘ब्लिट्ज’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘रविवार’ और ‘नई दुनिया’ ने जो पत्रकारिता की है, उनके संपादकों को तो फांसी पर लटका पर दिया जाना चाहिए था। संसार भर के कार्टूनिस्टों के आदर्श आरके लक्ष्मण यदि आज सक्रिय पारी खेल रहे होते तो उन्हें भी शायद सूली चढ़ा दिया जाता। समझ से परे है कि जो गठबंधन और पार्टी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई हो, उसे किसी तूती की आवाज से क्यों कांपना चाहिए?

बीते छह साल के आंकड़े डराने वाले हैं। एक साल में में विनोद दुआ के अलावा आठ पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के दस्तावेज कहते हैं कि साल 2014 में 58, 2015 में 30, 2016 में 35, 2017 में 51, 2018 में 70 और 2019 में 93 राजद्रोह के मामले पंजीबद्ध किए गए थे। इनमें सिर्फ 10 लोगों को ही न्यायालय ने दोषी माना। अधिकतर मामलों में तो चार्जशीट तक ही दाखिल नहीं हो पाती।

शुभ संकेत है कि न्यायपालिका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी भावना प्रकट की है। भारतीय पत्रकारिता यकीनन 124 ए जैसे अन्य कानूनों के समापन का स्वागत करेगी। सरकार को भी इस मुद्दे पर प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए। लेकिन यदि उसका रुख नहीं बदलता तो राजद्रोह की तलवार तो मीडिया पर तनी ही है मिस्टर मीडिया!

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'यह तस्वीर सारी राजनीतिक पार्टियों की है, देखने में बहुत छोटी, मगर अत्यंत गंभीर’

दुनियाभर में कोरोना महामारी एक भयावह त्रासदी की शक्ल में सामने है। डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, प्रशासकों और कारोबारियों से लेकर आम आदमी तक मौत के इस विकराल हरकारे से थर्रा उठे हैं।

Last Modified:
Thursday, 03 June, 2021
leaders54

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

छवि चमकाने के तरीके कितने अलोकतांत्रिक

दुनियाभर में कोरोना महामारी एक भयावह त्रासदी की शक्ल में सामने है। डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, प्रशासकों और कारोबारियों से लेकर आम आदमी तक मौत के इस विकराल हरकारे से थर्रा उठे हैं। लेकिन सियासी जमातों को इससे शायद अधिक अंतर नहीं पड़ता दिखाई देता। वे उसी ढर्रे पर जिंदगी जी रहे हैं और इस देश को चला रहे हैं। यहां तक कि उनके अपने निजी उत्सवों पर भी कोई शोक या मातम की छाया नहीं दिखाई देती। अवाम के बीच वे अपनी छवि चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में दबे पांव दाखिल हो गई इस सामंती मनोवृति को इरादतन क्रूरता की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाना चाहिए।

हाल ही में एक हिंदी भाषी प्रदेश में जाना हुआ। उस दिन सत्ताधारी पार्टी के एक तीसरी पंक्ति के युवा नेता का जन्मदिन था। पूरी राजधानी बड़े-बड़े कट आउट और बैनरों से पटी पड़ी थी। उस नेता के समर्थकों ने शहरभर में अपनी जेब से खर्च करके यह आडम्बर किया था। इन बैनरों में लिखा हुआ था कि जन-जन के लाडले नेता को अमुक की ओर से मुबारकबाद। इसके बाद ढेर सारी तस्वीरें उस विशाल पोस्टर में दिखाई दे रही थीं। यह एक व्यक्ति को जम्हूरियत का पर्याय बनाने का भौंडा उपक्रम था। उससे भी अधिक बेशर्म प्रदर्शन नेताजी के घर के सामने था। एक ढोल पर चंद नौजवान नाच रहे थे। किसी के चेहरे पर मास्क नहीं। सामाजिक दूरी का पालन नहीं। याने कोरोना से बचाव का कोई बंदोबस्त नहीं। पास में चार-छह पुलिसकर्मी खड़े थे। वह नेता मुस्कुराते हुए डिब्बे में लड्डू लेकर बाहर आया। स्थानीय चैनलों के पेड कैमरामैन और पत्रकार दौड़ पड़े। बाइट ली, फुटेज बनाया, लड्डू खाए और चल दिए। किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रतीक, व्यक्ति अथवा संस्था को उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।

यह तस्वीर कमोबेश सारी राजनीतिक पार्टियों की है। देखने में बहुत छोटी, मगर अत्यंत गंभीर। किसी सियासी संगठन में कोई पदाधिकारी बन जाए। नियुक्ति के बाद पहली बार शहर में आए। किसी का जन्मदिन आ जाए और केंद्रीय नेता प्रदेश के दौरे पर आए- इस तरह के बैनर, पोस्टर, समर्थक समूहों या फैन्स क्लबों के नारों से सार्वजनिक स्थान पट जाते हैं। शहर की पर्यावरण चिंता पर आंसू बहाने वाले आम के पत्तों और डालियों से स्वागत द्वार बना देते हैं। कई क्विंटल गुलाब और अन्य फूलों का छिड़काव हो जाता है। न केंद्रीय नेता को कुछ ऐतराज होता है और न संगठन की ओर से कोई कार्रवाई होती है। बल्कि कभी-कभी तो केंद्रीय नेता खुद ही ऐसा करने के निर्देश देते हैं। ऐसे आयोजनों की इन विद्रूपताओं पर समाज की तरफ से भी कोई नोटिस नहीं लिया जाता। गंभीर सवाल यह है कि जब लोकतंत्र में सामूहिक नेतृत्व ही सब कुछ माना जाता है तो किसी एक व्यक्ति को महिमामंडित करने की परंपरा किसी राष्ट्र के लिए कितनी उचित है। क्या हम मध्यकाल की राजा या बादशाह- पूजन की मानसिकता पर फिर लौट रहे हैं, जिसमें महाराजा या सुल्तान को ईश्वर की तरह माना जाता था। उस धारणा के पीछे यही मंशा होती थी कि राजा कभी गलत कर नहीं सकता तथा हर मामले में वही अधिनायक निर्णय लेगा। भले ही वह देश के हित में हो या नहीं। इस संक्रमित और दूषित मानसिकता की वापसी भारत के लिए बेहद गंभीर चेतावनी है।

इस मानसिकता की पुनर्स्थापना के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? स्वतंत्रता के बाद हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने वाले लीडर आजादी के आंदोलन से निकले खरे-खरे नेता थे। चाहे वे पक्ष के रहे हों या प्रतिपक्ष के। लोग उनके आचरण पर भरोसा करते थे। उन नेताओं के चरित्र पर शंका नहीं होती थी। बाद की सियासी पीढ़ियों ने कुछ इस तरह गुलगपाड़ा किया कि राजशाही को संवैधानिक रूप से दफनाने के बाद भी भारत की मिट्टी से सामंती अंकुरण निकल आए। नवोदित नेताओं ने अपने महिमामंडन को राज करने की शैली का ही एक हिस्सा मान लिया। वे अपनी छवि चमकाने के लिए फैन्स क्लब बनाने लगे। काली कमाई से प्राप्त धन का इस्तेमाल इस तरह का प्रोपेगंडा करने में होने लगा। जिस देश में गांधी, नेहरू, लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए लोग कई किलोमीटर दूर से पैदल चलकर आया करते थे, उसी देश में रैलियों के लिए एक ही पार्टी के नेता अपने अपने अनुयाइयों को बसों और ट्रैक्टरों में ढोकर ले जाने लगे। भले ही पार्टी एक है, पर आजकल उसकी रैली में बसों या ट्रैक्टरों पर उस नेता की तस्वीर के साथ बैनर लगे होते हैं, जो उन्हें भरकर लाता है। उन्हें लंच पैकेट देता है और सौ से पांच सौ रुपए की दक्षिणा भी देता है। विडंबना है कि यही राजनीतिक दल अपने नेताओं की करतूत का बचाव यह कहते हुए करते हैं कि असल लोकतंत्र तो यही है। पार्टी के भीतर सबको स्थान मिलना चाहिए। कह सकते हैं कि सामंतशाही का युग फिर लौट रहा है। जिस क्षेत्रीय राजा की जितनी बड़ी सेना और समर्थक, उसका उतना ही बड़ा लोकतांत्रिक आधार। इस पर हम गर्व करें या शर्म।

गणतंत्र के खोल में पनपते इन विषाक्त नमूनों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो दिन दूर नहीं, जब भारतीय लोकतंत्र किसी अधिनायक के कब्जे में होगा और फिर हम टुकुर टुकुर देखते रहेंगे। हाथ मलते रहेंगे। यह संघर्ष तो हमारी जमीन से निकले सियासतदानों के खिलाफ होगा। इसके लिए बरतानवी सत्ता को दोषी नहीं ठहरा सकेंगे। फिर जहरीली मानसिकता के इस उभार को दबाने का तरीका क्या हो- यह यक्ष प्रश्न है।

(साभार: लोकमत समाचार)

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