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क्या वाकई डिजिटल मीडिया को FDI की कोई जरूरत है?
प्रिंट मीडिया को एफडीआई के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी, जबकि डिजिटल मीडिया को एफडीआई सरप्राइज गिफ्ट की तरह मिली है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
डॉ. धीमंत पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार।।
अंग्रेजी में इसे कहते हैं प्लेजंट शोक। हिंदी में-खबर सुनते ही जान निकल गई और अगर थोड़ा रीजनल तड़का डालकर कहें तो-हाय रे, मैं मर जावां। इसलिए नहीं कि मोदी सरकार ने डिजिटल मीडिया में 26% एफडीआई का ऐलान किया है, बल्कि इसलिए कि इस बहाने सरकार ने पहली बार आधिकारिक तौर पर देश में डिजिटल मीडिया के अस्तित्व को स्वीकार किया है। इससे पहले मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आखिर में उनके सूचना प्रसारण मंत्री ने शान से कहा था कि हम डिजिटल मीडिया को रेकग्नाइज ही नहीं करते हैं।
डिजिटल मीडिया में एफडीआई के मायने समझें, इससे पहले ये समझ लें कि ये डिजिटल मीडिया की कोई मांग नहीं है, बल्कि ये देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति में सरकार की जरूरत या फिर मजबूरी है। प्रिंट मीडिया को एफडीआई के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी, जबकि डिजिटल मीडिया को एफडीआई सरप्राइज गिफ्ट की तरह मिली है। पर क्या वाकई डिजिटल मीडिया को एफडीआई की कोई जरूरत है? इस सवाल के दो जवाब हैं, क्योंकि देश में डिजिटल मीडिया भी दो तरह के हैं।
पहले तो देश के मीडिया जगत को देखें तो आज देश में 1,05,443 न्यूजपेपर्स और जर्नल्स प्रकाशित होते हैं। उनमे से टॉप 20 ऐसे हैं जो एफडीआई के बारे में सोच सकते हैं। टेलिविजन न्यूज चैनल्स आज देश में 400 से ज्यादा हैं, जिनमें से 34 प्रमुख हैं और एफडीआई के बारे में सोचने वाले तो मुश्किल से 10 हैं। वैसे ही, डिजिटल मीडिया–न्यूज पोर्टल्स लाखों में हैं, जिनमें से प्रमुख 60 हैं। उनमें से भी एफडीआई के बारे में सोचने वाले तो मुश्किल से 10 होंगे।
बड़े मीडिया हाउसेज के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए 26% एफडीआई बिजनेस स्ट्रैटेजी का हिस्सा हो सकती है। लाखों की बात भले ही न करें पर हजारों जेन्युइन डिजिटल मीडिया ओनर जो ज्यादातर पत्रकार कम एंटरप्रिन्योर हैं, उनके लिए ये एफडीआई एक न्यूज आइटम से ज्यादा और कुछ भी नहीं है।
हम जैसे कई पत्रकार कम एंटरप्रिन्योर के लिए डिजिटल मीडिया की ब्यूटी यह है कि यह लो कॉस्ट बिजनेस मॉडल है। जिसके निवेश की व्यवस्था हमने खुद हमारे रिसोर्सेज से की है। आज देश के बड़े से बड़े प्रिंट और टीवी मीडिया हाउसेज में छंटनी का भयानक दौर चल रहा है। उसका एकमात्र कारण यह है कि उन लोगों ने बिना लंबा सोचे समझे, अपनी आय से ज्यादा खर्चा मैनपावर, मशीनरी और इंफ्रॉस्ट्रक्चर में किया और जब संतुलन गड़बड़ाया तो उसका शिकार सबसे पहले अपने एंप्लाइज को बनाया। नेशनल से लेकर रीजनल तक सब जगह ये हाहाकार है।
एफडीआई कोई खैरात या जादुई छड़ी नहीं है, जिससे डिजिटल या अन्य किसी मीडिया में उससे आते ही कोई चमत्कार हो जाएगा। जितनी बड़ी एफडीआई, उतनी ही बड़ी वो जिम्मेदारी है। विदेशी निवेशक को आपको वो रिटर्न देना पड़ेगा, जिस मुनाफे की उम्मीद में वो निवेश करेगा। सरकारी विज्ञापन कम या बंद ही हो रहे हैं। मंदी के दौर में कॉर्पोरेट और कॉमर्शियल विज्ञापन कम हो रहे हैं और कब तक यह स्थिति रहेगी, ये कोई दावे के साथ कह नहीं सकता। ऐसे में निवेश पर रिटर्न आयेगा कहां से? ‘सेक्रेड गेम्स’ वाला त्रिवेदी भी कहां से बचेगा? एंप्लाइज के बाद अब नंबर आयेगा एंप्लॉयर्स का। आने वाले दौर में अब कई सौ चैनल और कई हजार न्यूजपेपर शायद ही देखने को मिलेंगे। टिकेगा वही, जिसे डिजिटल मीडिया के लो कॉस्ट मॉडल जैसी महारत होगी।
डिजिटल मीडिया को भविष्य का मीडिया कहा जाता है, इसलिए वर्तमान में सरकार ने उसकी ओर अभी तक देखा ही नहीं। केंद्र और राज्यों में डिजिटल मीडिया को न एक्रेडिशन कार्ड मिलता है और न सरकारी विज्ञापन। डिजिटल मीडिया के लिए सरकार अगर गंभीरता से कुछ करना चाहती है, तो ये सब करे। डिजिटल मीडिया टिक पायेगा, तभी तो कभी एफडीआई के बारे में सोच पायेगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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