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मिस्टर मीडिया: समय का संकेत नहीं समझने का है ये नतीजा
लगातार मिल रहे इस तरह के संकेतों को संयुक्त कर देखें तो साफ है कि अब हमें अपना घर ठीक करने की नौबत आ गई है
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
तो वह घड़ी आ ही गई। वक्त की चाल तो पहले से ही आगाह कर रही थी। लोकतंत्र के तीन स्तंभ स्वयंभू चौथे स्तंभ को नसीहतें दे रहे हैं कि उन्हें जिम्मेदार पत्रकारिता करनी चाहिए। मैं करीब-करीब साल भर ही यात्राएं करता हूं। अपनी यायावरी से निकले संदेशों के आधार पर इस कॉलम में लगातार मैंने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि अब प्रत्यास्थता की सीमा आ चुकी है। आम अवाम अब गैर जिम्मेदार नेताओं को तो बर्दाश्त करने के लिए तैयार है, लेकिन इस तरह की पत्रकारिता को स्वीकार नहीं करना चाहती। यह सामाजिक सोच में जबरदस्त अंतर्विरोध है।
विधायिका ने तो अनेक अवसरों पर कहा है कि मीडिया को अपनी जवाबदेही समझनी चाहिए। कार्यपालिका ने भी अपने ढंग से पत्रकारिता के लिए इकतरफा फिजूल की एडवाइजरी जारी करना शुरू कर दिया है। अमुक चीज दिखाएं और अमुक न दिखाएं। यह प्रकाशित करें और वह प्रकाशित न करें। नागरिक संशोधन कानून के बाद असम के हाल बताने,प्रकाशित करने या दिखाने पर पत्रकारिता को बाकायदा सरकारी सीख दी गई थी। इसके बाद जामिया में पत्रकारों के साथ सार्वजनिक रूप से दुर्व्यवहार हुआ।
एक न्यायपालिका बची थी तो बीते दिनों हैदराबाद की घटना पर उसकी रोक सामने आई कि इस प्रसंग में क्या नहीं दिखाना चाहिए। लगातार मिल रहे इस तरह के संकेतों को संयुक्त कर देखें तो साफ है कि अब हमें अपना घर ठीक करने की नौबत आ गई है। अब हम समाज में उस तरह सम्मान या प्रतिष्ठा नहीं पा रहे हैं, जैसे कुछ दशक पहले प्राप्त करते थे। एक ओर तो हम अपने को प्रोफेशनल कहते हैं तो दूसरी तरफ़ हम पेशेवर सिद्धांतों से बिचकते जा रहे हैं। विचार करने की जरूरत है कि हमने सोच की रीढ़ को लुंज पुंज क्यों हो जाने दिया है?
तीन-चार महीने पहले पत्रकारों के एक कार्यक्रम में गया था। उसमें खुलकर चिंता जताई गई थी कि पत्रकार साथी समाज में अब बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखे जा रहे हैं। ‘मीडिया तो बिका हुआ है’, यह टिप्पणी अब आम हो गई है। यह धारणा विश्वास में बदल जाए, इसके पहले ही सावधान होना वक्त का तकाजा है। यह पत्रकारिता घरानों और उनके मालिकों के लिए भी चेतावनी है। अगर वे अपने पत्रकारों का रोबोट की तरह इस्तेमाल करते रहे तो उनके अपने अस्तित्व का संकट दूर नहीं है। पत्रकारिता में प्रबंधन अपने छिपे एजेंडे नहीं चला सकता। दूर थे जब तक सियासत से तो हम भी साफ थे/खान में कोयले की पहुंचे तो हम भी काले हो गए/ समय आ पहुंचा है कि हम चेत जाएं मिस्टर मीडिया!
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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