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अपने बेहतर भविष्य को लेकर मुसलमानों को समझनी ही होगी यह बात: कमर वहीद नकवी

नूपुर शर्मा टिप्पणी विवाद पर भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग करीब दो हफ्ते बाद जो गुस्सा जता रहा है, वह बिलकुल बेतुका है और राजनीतिक नासमझी का सबूत है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार।।

नूपुर शर्मा टिप्पणी विवाद पर भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग करीब दो हफ्ते बाद जो गुस्सा जता रहा है, वह बिलकुल बेतुका है और राजनीतिक नासमझी का सबूत है। उनका गुस्सा इतने दिनों बाद क्यों भड़का? क्या उनके पास इस सवाल का कोई तार्किक जवाब है? जाहिर है कि व्यापक अरब प्रतिक्रिया के बाद भारतीय मुसलमानों के इस वर्ग को लगा कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए। मैंने अपने पिछले ट्वीट में कहा था कि अरब प्रतिक्रिया पर हड़बड़ी में कदम उठा कर बीजेपी भारतीय मुसलमानों को गलत संकेत दे रही है और वही हुआ भी।

हालांकि, अरब प्रतिक्रिया के बाद मोदी सरकार के पास ऐसा कदम उठाने के सिवा और कोई चारा भी नहीं था। सरकार ने यही कदम पहले उठा लिया होता तो मामला बढ़ता ही नहीं। सरकार की तरफ से यह बड़ी गलती हुई। अब इस मामले में विलम्बित प्रदर्शन कर भारतीय मुसलमान जवाबी गलती कर रहे हैं।

वे कौन लोग हैं, जिन्होंने नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को धमकियां दीं और क्यों? जुमे की नमाज के बाद देश के कई हिस्सों में क्यों हिंसा की गई? ऐसा करके इन लोगों ने उस व्यापक भारतीय जनमत की अवहेलना की है, जो इस मामले में पूरी एकजुटता से उनके साथ खड़ा था। भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग यदि यह सोचता है कि अरब समर्थन से उसका सीना चौड़ा हो गया है तो यह निरी मूर्खता है। भारतीय मुसलमानों का हित केवल और केवल इस बात में ही है और रहेगा कि व्यापक भारतीय जनमत का समर्थन उसके साथ रहे। यह बात समझनी ही पड़ेगी।

मैं इस बात का सख्त विरोधी हूं कि भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व उलेमा या पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे किसी धार्मिक संगठन के हाथ में हो। दो कारण हैं। पहला यह कि धार्मिक नेतृत्व किसी समाज को प्रगति के रास्ते पर ले ही नहीं जा सकता क्योंकि ऐसा नेतृत्व अनिवार्य रूप से रुढ़िवादी होता है। दूसरा कारण यह कि आजादी के बाद से अब तक मुसलमानों के इस धार्मिक नेतृत्व ने लगातार साबित किया है कि उनमें रत्ती भर भी राजनीतिक समझ और दूरदर्शिता नहीं है। शाहबानो विवाद, यूनिफॉर्म सिविल कोड, बाबरी मस्जिद समेत तमाम मुद्दों पर यह राजनीतिक नासमझी खुल कर सामने आ चुकी है।

इस नेतृत्व ने भारतीय मुसलमानों को धार्मिक आवेश के हवाई गुब्बारे में फुलाकर जमीनी सच्चाई से उनका मुंह मोड़ दिया, वे प्रगति के मोर्चे पर तो पिछड़े ही, उनकी सोच और छवि पर भी बुरा असर पड़ा। दूसरे, इस नेतृत्व की लफ्फाजियों से संघ का समर्थन लगातार बढ़ा, उसे नए तर्क मिले। ओवैसी समेत कुछ कोशिशें मुसलमानों की अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करने की भी हुईं, लेकिन सभी नाकाम हुईं और आगे भी होंगी।

तीन कारण हैं। पहला, उन्होंने हमेशा मुसलमानों के धार्मिक नेतृत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया, उसे बदलने की कोई कोशिश कभी की ही नहीं। दूसरा, केवल मुसलमानों के नाम पर बनी पार्टी को व्यापक भारतीय जनमत का समर्थन कभी मिल ही नहीं सकता तो वोट की राजनीति में ऐसी पार्टी कुछ कर ही नहीं सकती। ज्यादा से ज्यादा ऐसे नेता जोशीले नारे और भड़काऊ भाषण देकर सभाओं में तालियां बजवा सकते हैं, बस।

फिर ऐसी कोई भी पार्टी अंततः ‘जिन्ना सिंड्रोम’ को जन्म देकर हिंदुत्ववादी ताकतों को हिंदुओं में असुरक्षा की भावना भड़काए रखने के लिए नए तर्क देती है। जाहिर है इससे मुसलमानों का कभी कोई भला नहीं हो सकता। इसका राजनीतिक लाभ हमेशा हिंदुत्ववादी ताकतों को ही मिलता है। मुसलमानों का सबसे बड़ा संकट यही है कि उनके पास कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है, जो उन्हें धार्मिक कठघरे से निकालकर उनमें नई सोच जगाकर लोकतंत्र में अपना जायज हिस्सा पाने के लिए उन्हें रास्ता दिखा सके। हिंदुत्ववादी ताकतें इस स्थिति से खुश हैं क्योंकि इससे उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया है।

तथाकथित सेकुलर दलों ने भी मुसलमानों का हमेशा नुकसान ही किया है, क्योंकि वे मुस्लिम नेतृत्व की नासमझियों की आलोचना कर उन्हें सही रास्ता दिखाने के बजाय चुप रहे। वोट बैंक की मजबूरियां! सेकुलर चिंतकों ने हिंदू सांप्रदायिकवाद की तो खुलकर आलोचना की, लेकिन मुसलमानों के ऐसे कदमों पर बोलने से बचते रहे, जब उन्हें बोलना चाहिए था। क्योंकि इससे उनके उदारवादी लेबल को नुकसान पहुंचता। इन सब कारणों से मुसलमान जमीनी सच्चाइयों से दूर एक अलग लोक में जीते रहे।

पढ़े-लिखे मुसलमानों और मुस्लिम युवाओं को नए सिरे से सोचना होगा, नया विमर्श चलाना होगा और नई सोच का एक नया मुस्लिम समाज गढ़ना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि भावनाओं के ज्वार में बह जाने के बजाय अपनी जायज बातें रखने और उन्हें मनवा लेने के और रास्ते क्या हैं? यह बात मुसलमानों को समझनी ही होगी कि एक सेकुलर समाज में ही उनका भविष्य बेहतर है और रहेगा। इसलिए उन्हें अपना नेतृत्व भी सेकुलर राजनीतिक ढांचे में ही देखना होगा। और धार्मिक मुद्दों के बजाय अपने आर्थिक मुद्दों और सामाजिक सुधारों पर ही पूरा ध्यान लगाना होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)


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