क्या अक्षय को सम्मान में मिली कनाडा की नागरिकता या फिर उन्होंने खुद ली?

पिछले दिनों पीएम मोदी का नॉन पॉलिटिकल इंटरव्यू कर अक्षय कुमार ने बटोरी थीं काफी सुर्खियां

Last Modified:
Wednesday, 08 May, 2019
Akshay Kumar

नीरज नैय्यर
वरिष्ठ पत्रकार।।

कभी-कभी आप अच्छे की आस लगाते हैं और बुरा हो जाता है। बॉलिवुड अभिनेता अक्षय कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गैर-राजनीतिक इंटरव्यू लेते वक़्त अक्षय कुमार को लगा होगा कि यह उनके करियर और लोकप्रियता में मील का पत्थर साबित होगा, लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत आये। अब अक्षय को अपनी नागरिकता पर उठे सवालों के जवाब देने पड़ रहे हैं। उन्हें लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि वो केवल रील लाइफ में ही देशभक्त नहीं हैं, बल्कि रियल लाइफ में भी उनके लिए देश पहले आता है।

अक्षय के लिए राहत की बात यह है कि कुछ ‘बड़े नाम’ उनके साथ खड़े हैं। बड़े नामों का साथ मुश्किल से मिलता है, अक्षय इसके लिए खुद को ‘लकी’ कह सकते हैं। क्योंकि आमिर खान ने जब देश में असहिष्णुता का जिक्र किया था तो उन्हें किसी का साथ नहीं मिला। न स्टारडम उनके काम आया, न ही कुछ और। सोशल मीडिया पर एक ऐसी हवा चली, जिसने ‘सरफ़रोश’ के देशभक्त एसीपी राठौड़ को देशविरोधी बनाकर छोड़ दिया। नतीजतन, कई कंपनियों ने उनसे नाता तोड़ लिया और सरकार को भी इस दिव्यज्ञान की प्राप्ति हुई कि आमिर भारत के ‘अतुल्य गुणों’ का गुणगान करने के लिए अवगुणी हैं।

शायद इसके पीछे आमिर का अक्षय की तरह पत्रकार न बनना मुख्य कारण था। यदि आमिर खान भी पीएम का कोई अ-पॉलिटिकल इंटरव्यू लेने में सक्षम होते तो उन्हें अक्षम करने की कोशिशें परवान नहीं चढ़तीं। ख़ैर, यह बात पुरानी हो चुकी है और आमिर भी अब तक सीख गए होंगे कि दिल की बात को जुबां पर लाना फिल्मों में ही अच्छा लगता है, आम जिंदगी में नहीं।

अक्षय कुमार का तर्क है कि उनका पासपोर्ट भले ही कनाडा का हो, लेकिन दिल हिन्दुस्तानी है। इसलिए उनकी नागरिकता को लेकर बहस बंद होनी चाहिए। चलिए मान भी लें कि अक्षय का दिल हिन्दुस्तानी है, फिर भी यह सवाल तो कायम रहेगा ही कि इस हिन्दुस्तानी दिल ने अभी तक हिन्दुस्तानी पासपोर्ट हासिल क्यों नहीं किया? यदि अक्षय को कनाडा के पासपोर्ट पर यात्रा करने या कनाडावासी कहलाने पर ज्यादा ख़ुशी होती है तो फिर हिन्दुस्तानी दिल में हिन्दुस्तान कहां है?

अक्षय पहले भी कई मर्तबा कह चुके हैं कि फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वह कनाडा में बसेंगे तो क्या अब तक जो वह करते आये हैं, उसे छदम देशभक्ति नहीं कहा जाना चाहिए? जब अदनान सामी भारत की नागरिकता पाने के लिए 16 सालों तक मशक्कत कर सकते हैं तो अक्षय के हिन्दुस्तानी दिल में यह इच्छा क्यों नहीं जागी, यह सवाल भी उनसे पूछा जाना चाहिए? अक्षय मानवीय आधार पर हमें देशभक्ति का पाठ पढ़ा सकते हैं या उस पर सवाल उठा सकते हैं। हमें वोट का महत्व समझा सकते हैं, लेकिन नैतिक आधार पर वह ऐसा नहीं कर सकते। यह अधिकार उनके पास कभी था ही नहीं, और न ही उन्होंने इसे प्राप्त करने का प्रयास ही किया। महज दिल को हिन्दुस्तानी कहकर हिन्दुस्तानी नहीं हुआ जा सकता, इसके लिए विधिवत प्रक्रिया का पालन भी करना पड़ता है। अक्षय इस पूरे एपिसोड से दुखी हैं और उन्हें होना भी चाहिए, क्योंकि वह खुद को एक ऐसे रूप में पेश करते रहे, जिसे अपनाने के लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं किया।

अक्षय कुमार यदि अच्छे की आस में गैर-राजनीति इंटरव्यू न करते तो शायद देशवासी उनके देशभक्ति के पर्दे को उठाने में इतनी दिलचस्पी भी नहीं दिखाते। पहले भी यह मुद्दा सुर्खियाँ बंटोर चुका है, लेकिन कभी इतना लंबा नहीं खिंचा। यहां तक कि अक्षय के इस झूठ को भी तवज्जो नहीं दी गई कि उन्हें कनाडा की ऑनररी सिटीज़नशिप मिली हुई है। यानी कनाडा ने उन्हें सम्मान में अपने देश की नागरिकता दी है,जबकि ऐसा नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा होता तो अक्षय के पास कनाडा का पासपोर्ट नहीं होता। कनाडा की ऑनररी सिटीज़नशिप सिर्फ एक सांकेतिक सम्मान है, इसके साथ कोई विशेष अधिकार नहीं आता। सीधे शब्दों में कहें तो ऑनररी सिटीज़न को न वहां का पासपोर्ट मिलता है और न ही वोट डालने का अधिकार।

इससे तो यही स्पष्ट होता है कि अक्षय कुमार ने खुद कनाडा का पासपोर्ट बनवाया। संभव है कि अक्षय पर आया यह संकट जल्द समाप्त हो जाएगा, क्योंकि उन पर बड़े नामों का हाथ है, लेकिन जो कंपनियां देशभक्त के रूप में अक्षय की छवि को अब तक भुनाती आई हैं, क्या वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगी और क्या उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए, यह सबसे बड़ा सवाल है। इसके अलावा यह भी एक सवाल है कि क्या हाथ में तिरंगा थामकर, देश की मिट्टी का हवाला देकर, वह व्यक्ति लोगों को देश में बने टाइल्स (कजरिया) खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है, जो खुद पूरी तरह भारतीय न हो?
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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'डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए तैयार हों नए पत्रकार'

एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ाकर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
journalism4

प्रो. संजय द्विवेदी ।।

एक समय था जब माना जाता है कि पत्रकार पैदा होते हैं और पत्रकारिता पढ़ाकर सिखाई नहीं जा सकती। अब वक्त बदल गया है। जनसंचार का क्षेत्र आज शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 2020 को लोग चाहे कोरोना महामारी की वजह से याद करेंगे, लेकिन एक मीडिया शिक्षक होने के नाते मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष भारत में मीडिया शिक्षा के 100 वर्ष पूरे हुए थे। वर्ष 1920 में थियोसोफिकल सोसायटी के तत्वावधान में मद्रास राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में डॉक्टर एनी बेसेंट ने पत्रकारिता का पहला पाठ्यक्रम शुरू किया था। लगभग एक दशक बाद वर्ष 1938 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को एक सर्टिफिकेट कोर्स के रूप में शुरू किया गया। इस क्रम में पंजाब विश्वविद्यालय, जो उस वक्त के लाहौर में हुआ करता था, पहला विश्वविद्यालय था, जिसने अपने यहां पत्रकारिता विभाग की स्थापना की। भारत में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थापक  कहे जाने वाले प्रोफेसर पीपी सिंह ने वर्ष 1941 में इस विभाग की स्थापना की थी। अगर हम स्वतंत्र भारत की बात करें, तो सबसे पहले मद्रास विश्वविद्यालय ने वर्ष 1947 में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की स्थापना की। 

   इसके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय, मैसूर के महाराजा कॉलेज, उस्मानिया यूनिवर्सिटी एवं नागपुर यूनिवर्सिटी ने मीडिया शिक्षा से जुड़े कई कोर्स शुरू किए। 17 अगस्त, 1965 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय जन संचार संस्थान की स्थापना की, जो आज मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पूरे एशिया में सबसे अग्रणी संस्थान है।  आज भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एवं जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से मीडिया शिक्षण एवं प्रशिक्षण का कार्य कर रहे हैं। भारत में मीडिया शिक्षा का इतिहास 100 वर्ष जरूर पूर्ण कर चुका है, परंतु यह अभी तक इस उलझन से मुक्त नहीं हो पाया है कि यह तकनीकी है या वैचारिक। तकनीकी एवं वैचारिकी का द्वंद्व मीडिया शिक्षा की उपेक्षा के लिए जहां उत्तरदायी है, वहां सरकारी उपेक्षा और मीडिया संस्थानों का सक्रिय सहयोग न होना भी मीडिया शिक्षा के इतिहास की तस्वीर को धुंधली प्रस्तुत करने को विवश करता है।

भारत में जब भी मीडिया शिक्षा की बात होती है, तो प्रोफेसर के. ई. ईपन का नाम हमेशा याद किया जाता है। प्रोफेसर ईपन भारत में पत्रकारिता शिक्षा के तंत्र में व्यावहारिक प्रशिक्षण के पक्षधर थे। प्रोफेसर ईपन का मानना था कि मीडिया के शिक्षकों के पास पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के साथ साथ मीडिया में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी होना चाहिए, तभी वे प्रभावी ढंग से बच्चों को पढ़ा पाएंगे। आज देश के अधिकांश पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षण संस्थान, मीडिया शिक्षक के तौर पर ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें अकादमिक के साथ साथ पत्रकारिता का भी अनुभव हो। ताकि ये शिक्षक ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार कर सकें, ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम तैयार कर सकें, जिसका उपयोग विद्यार्थी आगे चलकर अपने कार्यक्षेत्र में भी कर पाएं।  पत्रकारिता के प्रशिक्षण के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें से एक दमदार तर्क यह है कि यदि डॉक्टरी करने के लिए कम से कम एम.बी.बी.एस. होना जरूरी है, वकालत की डिग्री लेने के बाद ही वकील बना जा सकता है तो पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण पेशे को किसी के लिए भी खुला कैसे छोड़ा जा सकता है?

 दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छह स्तरों पर होती है। सरकारी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में, दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों में, तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों में, चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इस पूरी प्रक्रिया में हमारे सामने जो एक सबसे बड़ी समस्या है, वो है किताबें। हमारे देश में मीडिया के विद्यार्थी विदेशी पुस्तकों पर ज्यादा निर्भर हैं। लेकिन अगर हम देखें तो भारत और अमेरिका के मीडिया उद्योगों की संरचना और कामकाज के तरीके में बहुत अंतर है। इसलिए मीडिया के शिक्षकों की ये जिम्मेदारी है, कि वे भारत की परिस्थितियों के हिसाब से किताबें लिखें।

मीडिया शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आज मीडिया एजुकेशन काउंसिल की आवश्यकता है। इसकी मदद से न सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के पाठ्यक्रम में सुधार होगा, बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की जरुरतों के अनुसार पत्रकार भी तैयार किये जा सकेंगे। आज मीडिया शिक्षण में एक स्पर्धा चल रही है। इसलिए मीडिया शिक्षकों को ये तय करना होगा कि उनका लक्ष्य स्पर्धा में शामिल होने का है, या फिर पत्रकारिता शिक्षण का बेहतर माहौल बनाने का है। आज के समय में पत्रकारिता बहुत बदल गई है, इसलिए पत्रकारिता शिक्षा में भी बदलाव आवश्यक है। आज लोग जैसे डॉक्टर से अपेक्षा करते हैं, वैसे पत्रकार से भी सही खबरों की अपेक्षा करते हैं। अब हमें मीडिया शिक्षण में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनमें विषयवस्तु के साथ साथ नई तकनीक का भी समावेश हो।

न्यू मीडिया आज न्यू नॉर्मल है। हम सब जानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण लाखों नौकरियां गई हैं। इसलिए हमें मीडिया शिक्षा के अलग अलग पहलुओं पर ध्यान देना होगा और बाजार के हिसाब से प्रोफेशनल तैयार करने होंगे। नई शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं पर ध्यान देने की बात कही गई है। जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए आज एक बड़ी आवश्यकता है क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करना। भाषा वो ही जीवित रहती है, जिससे आप जीविकोपार्जन कर पाएं और भारत में एक सोची समझी साजिश के तहत अंग्रेजी को जीविकोपार्जन की भाषा बनाया जा रहा है। ये उस वक्त में हो रहा है, जब पत्रकारिता अंग्रेजी बोलने वाले बड़े शहरों से हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शहरों और गांवों की ओर मुड़ रही है। आज अंग्रेजी के समाचार चैनल भी हिंदी में डिबेट करते हैं। सीबीएससी बोर्ड को देखिए जहां पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। क्या हम अन्य राज्यों के पाठ्यक्रमों में भी इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं, जिससे मीडिया शिक्षण को एक नई दिशा मिल सके।

एक वक्त था जब पत्रकारिता का मतलब प्रिंट मीडिया होता था। अस्सी के दशक में रिलीज हुई अमेरिकी फिल्म Ghostbusters (घोस्टबस्टर्स) में सेक्रेटरी जब वैज्ञानिक से पूछती है कि ‘क्या वे पढ़ना पसंद करते हैं? तो वैज्ञानिक कहता है ‘प्रिंट इज डेड’। इस पात्र का यह कहना उस समय हास्य का विषय था, परंतु वर्तमान परिदृश्य में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर जिस तरह के सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उसे देखकर ये लगता है कि ये सवाल आज की स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से हमें ये सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार खत्म हो जाएंगे। वर्ष 2008 में अमेरिकी लेखक जेफ गोमेज ने ‘प्रिंट इज डेड’ पुस्तक लिखकर प्रिंट मीडिया के खत्म होने की अवधारणा को जन्म दिया था। उस वक्त इस किताब का रिव्यू करते हुए एंटोनी चिथम ने लिखा था कि, ‘यह किताब उन सब लोगों के लिए ‘वेकअप कॉल’ की तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं, किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है।’ वहीं एक अन्य लेखक रोस डावसन ने तो समाचारपत्रों के विलुप्त होने का, समय के अनुसार एक चार्ट ही बना डाला। इस चार्ट में जो बात मुख्य रूप से कही गई थी, उसके अनुसार वर्ष 2040 तक विश्व से अखबारों के प्रिंट संस्करण खत्म हो जाएंगे।  मीडिया शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रमों में इस तरह के बदलाव करने चाहिए, कि वे न्यू मीडिया के लिए छात्रों को तैयार कर सकें। आज तकनीक किसी भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मीडिया में दो तरह के प्रारूप होते हैं। एक है पारंपरिक मीडिया जैसे अखबार और पत्रिकाएं और और दूसरा है डिजिटल मीडिया। अगर हम वर्तमान संदर्भ में बात करें तो सबसे अच्छी बात ये है कि आज ये दोनों प्रारूप मिलकर चलते हैं। आज पारंपरिक मीडिया स्वयं को डिजिटल मीडिया में परिवर्तित कर रहा है। जरूरी है कि मीडिया शिक्षण संस्थान अपने छात्रों को 'डिजिटल ट्रांसफॉर्म' के लिए पहले से तैयार करें। देश में प्रादेशिक भाषा यानी भारतीय भाषाओं के बाजार का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा के उपभोक्ताओं का डिजिटल की तरफ मुड़ना लगभग पूरा हो चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2030 तक भारतीय भाषाओं के बाजार में उपयोगकर्ताओं की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच जाएगी और लोग इंटरनेट का इस्तेमाल स्थानीय भाषा में करेंगे। जनसंचार की शिक्षा देने वाले संस्थान अपने आपको इन चुनौतियों के मद्देनजर तैयार करें, यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

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‘अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?’

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
Reporter554

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश के हित और अभिव्यक्ति के सरोकार 

लोकतंत्र में कोई भी महत्वपूर्ण स्तंभ सौ फीसदी निर्दोष नहीं हो सकता। इस निष्कर्ष से शायद ही कोई असहमत हो। न कार्यपालिका, न विधायिका, न न्याय पालिका और न ही पत्रकारिता। वैसे तो पत्रकारिता को संवैधानिक तौर पर इस तरह का कोई दर्जा हासिल नहीं है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ लेने वाले पत्रकार यदि अवाम का भरोसा जीतते हैं और अपना काम ईमानदारी से करते हैं तो फिर इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि पत्रकारिता संवैधानिक रूप से लोकतंत्र का स्तंभ है अथवा नहीं।

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। बीते दिनों पत्रकारिता का यह धर्म समाज के एक वर्ग में बहस का बिंदु बना हुआ है। उसका मानना है कि मुल्क के अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी, कोरोना के परीक्षण तथा बचाव के टीकों की गति में सुस्ती और जलती चिताओं के दृश्य दिखा कर भारतीय पत्रकार अच्छा नहीं कर रहे हैं। वे पश्चिम और यूरोप के देशों का हवाला देते हैं कि वहां भी मुर्दों की तस्वीरें और वीडियो नहीं दिखाए जाते। निस्संदेह वहां इस तरह के विचलित करने वाली सामग्री परदे और पन्नों पर नहीं परोसी जाती। मगर यह भी ध्यान देना होगा कि उन देशों में इलाज के अभाव में दम तोड़ना कितना अमानवीय और क्रूर माना जाता है। एक निर्दोष मौत भी अस्पताल में हो जाए तो सिस्टम को करोड़ों डॉलर का भुगतान करना पड़ जाता है। क्या भारत में हम इतनी सक्षम स्वास्थ्य प्रणाली बना पाए हैं, जो किसी पत्रकार को आलोचना का कोई अवसर ही नहीं दे।

बीते दिनों देखा गया कि एक तरफ तो कमोबेश सारे प्रदेशों में कोरोना के चलते लॉकडाउन की स्थिति है। धारा 144 लगी है, जिसमें चार से ज्यादा व्यक्ति एकत्रित नहीं हो सकते। अधिकांश शहरों में कर्फ्यू लगा है। मास्क जरूरी और दो गज की दूरी से बच्चा बच्चा वाकिफ है। इसके बावजूद चुनाव आयोग की अनुमति से पांच राज्यों में हजारों नागरिक रैलियों में मास्क के बगैर और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करते हुए सियासी पार्टियों में ले जाए गए। जब वे लौटे तो कोरोना का कई गुना विकराल रूप उनके साथ आया। गाँव गाँव में लोग संक्रामक महामारी के शिकार हो गए। इस खतरनाक हालत को देखते हुए यदि मद्रास हाई कोर्ट टिप्पणी करता है कि चुनाव आयोग के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए तो इसमें क्या अनुचित है? भारतीय पत्रकारों ने इस टिप्पणी को प्रकाशित और प्रसारित कर दिया तो इस पर चुनाव आयोग के खिसियाने की कोई वजह नजर नहीं आती। लेकिन आयोग इतना बौखलाया कि सीधे सुप्रीम कोर्ट चला गया। वह मद्रास उच्च न्यायालय की इस मौखिक टिप्पणी के प्रकाशित और प्रसारित होने से खफा था। उसका तर्क था कि जब वह टिप्पणी अदालत के रिकॉर्ड में नहीं रखी गई तो उसे पत्रकार कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय ने उसका अनुरोध ठुकरा दिया। इतना ही नहीं इस आला संस्था ने संवाददाताओं की रिपोर्टिंग को सही ठहराया। उसने कहा कि पत्रकारिता ने अपना धर्म निभाया है। अदालत रिपोर्टिंग नहीं रोक सकती। दरअसल पत्रकारिता की आजादी अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही एक पहलू है। यह स्वतंत्रता तो भारत का संविधान ही देता है। बेहतर होगा कि चुनाव आयोग पत्रकारिता की शिकायत करने के बजाय कुछ बेहतर करे। सच तो यह है कि उच्च न्यायालयों ने कोरोना की जमीनी हकीकत पर लगातार नजर रखकर सराहनीय काम किया है।

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी ने पिछले दिनों एक वर्ग से प्रायोजित उस बहस को भी विराम दे दिया है, जो कहता था कि कोरोना से निपटने में व्यवस्था की नाकामी उजागर करना देशहित में उचित नहीं है और संविधान प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकारों को अस्थाई तौर पर निलंबित कर देना चाहिए। असल में यह चर्चा देशहित और पत्रकारिता का घालमेल कर रही थी। जब सारे संसार के अखबार और टीवी चैनल इस क्रूर काल में भारत की चुनावी  रैलियों और कुम्भ के जमावड़े की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो भारत के पत्रकार इसे देश हित का मानकर चुप कैसे रह सकते हैं। यह भारत की सुरक्षा अथवा किसी शत्रु देश का हमला या कोई आतंकवादी वारदात नहीं है, जिसे मुल्क की हिफाजत से जोड़कर देखा जाए।

प्रसंग के तौर पर मुंबई में एक होटल पर आतंकवादी हमले को याद करना आवश्यक है। आतंकवादियों ने मुंबई के अनेक ठिकानों पर हमले किए थे। जवाब में सेना की कमांडो कार्रवाई की गई। उसे भारतीय टीवी चैनलों ने सीधा प्रसारित कर दिया था। पाकिस्तान में बैठे उग्रवादी आकाओं ने उस प्रसारण को देखकर अपने साथियों को निर्देश दिए थे। यह प्रसारण देश हित में कतई उचित नहीं था। इसीलिए भारत सरकार ने इन हमलों के बाद 27 नवंबर 2008 को सभी खबरिया चैनलों को दिशा निर्देश जारी किए थे। मैं स्वयं उन दिनों एक समूह के अनेक चैनलों का प्रमुख था और इन दिशा निर्देशों को जारी किया था। इनमें कहा गया था कि जन हित और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर कोई भी चैनल इस तरह का कवरेज नहीं दिखाएगा, जिससे किसी स्थान और व्यक्ति की लोकेशन पता चलती हो। इतना ही नहीं, घायलों और मृतकों के शवों को भी प्रसारित नहीं किया जाएगा। अन्यथा उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। तब किसी ने सुप्रीम कोर्ट में जाने की नहीं सोची और ईमानदारी से पत्रकारिता के धर्म को निभाया और आज तक उसका पालन हो रहा है। देशहित अलग है और पत्रकारिता के कर्तव्य अलग। अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?

(साभार: लोकमत समाचार)

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आज हम जिस संकट से घिरे हैं, यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है: मनोज कुमार

आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है। स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है।

Last Modified:
Thursday, 06 May, 2021
Manoj Kumar

मनोज कुमार,

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ‘समागम’ ।।

आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है। स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है। बार-बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है। आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है। खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है। अस्पताल मनमानी फीस वसूल रहे हैं। जान बचाने के लिए लोग अपने घर और संपत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं। हालात बद से बदतर हुए जा रहे हैं। शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गईं लेकिन तमाम अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा। कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है। यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड़े नहीं होते हैं? यह बात बहुत साफ है कि सरकार कोई और नहीं, हम हैं क्योंकि हमने उन्हें चुनकर सत्ता सौंपी है। हमारे सामने विकल्प है कि वे हमारे चयन पर खरे नहीं उतरते हैं तो अगली बार उन्हें बेदखल कर सकते हैं। खैर, यह बात तब होगी जब हम इस विकट स्थिति से उबर जाएंगे। अभी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करना जरूरी है।

आपदा को अवसर बनाकर जो लोग धन बटोरने में जुटे हुए हैं, उनके खिलाफ खड़े होकर हम संकट में समाधान की पहल कर सकते हैं। इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी से इनकार करना मुश्किल है, लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मेरी बात आपको आहत कर सकती है लेकिन सच यही है कि हम अपनी और अपनों की जान बचाने के लिए इस कालेधंधे को बढ़ावा देते हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि बाजार की कीमत क्या है और हम उसकी कीमत क्या चुका रहे हैं। फर्क पड़ता है उन बहुसंख्यक आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जिनका हक मारा जा रहा है।

जब हम स्वयं को शिक्षित और जागरूक होने का दावा करते हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम इन कालाबाजारियों को ट्रेप करें और पुलिस के हाथों सौंप दें। हमारे भीतर तक डर इतना समा चुका है कि अच्छे खासे शिक्षित लोग भी कोरोना से बचाव की दवा और ऑक्सीजन जैसी जरूरी चीजों का बेवजह भंडारण कर रहे हैं। कालाबाजारियों और जमाखोर दोनों ही समाज के लिए नासूर बन चुके हैं। इन दोनों वृत्तियों के मनोरोगियों के खिलाफ हम और आप खड़े हो जाते हैं तो स्थिति स्वयमेव नियंत्रण में आ जाएगी। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है और मनमाना वसूले गए बिलों की वापसी कराई गई है। यही नहीं, सरकार का आग्रह है कि ऐसे अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जाए। अब हमें सरकार के साथ खड़ा होकर उन सभी लोगों को बेनकाब करना है जो समाज के लिए नासूर बनते जा रहे हैं।

कोरोना का जो भयावह मंजर है, उससे हम थरथरा रहे हैं, लेकिन इस भयावह मंजर में एक-एक सांस बचाने के लिए डॉक्टर और उनकी मेडिकल टीम जुटी हुई है, उसका हमें धन्यवाद कहना चाहिए। निश्चित रूप से जिस दबाव में डॉक्टर्स और मेडिकल टीम काम कर रही है, उनके व्यवहार में कभी कुछ तल्खी आ सकती है। कभी वे अपनी ड्यूटी पर थोड़ी देर से आते हैं तो पैनिक होने के बजाय उनका सहयोग कीजिए। जो मनमानी वसूली हो रही है, वह अस्पताल प्रबंधन की है, लेकिन आम लोगों में यह धारणा बन चुकी है कि डॉक्टर लूट रहे हैं। यह शिकायत भी दूर होनी चाहिए। अस्पातल प्रबंधन के निर्देश और दबाव में डॉक्टर जरूरत न होने के बाद भी ऐसी दवा लेने की सलाह दे रहे हैं, जिसकी जरूरत ही नहीं है। एक मित्र की सीटी रिपोर्ट एकदम क्लीयर और ऑक्सीजन लेवल 100 होने के बाद भी फेवीफ्लू दवा जिसका डोज पहले दिल 3200 एमजी और बाद के पांच दिन प्रतिदिन 1600 एमजी लेने की सलाह दी गई। यही नहीं, इलाज के लिए गए व्यक्ति का पुराना मेडिकल रिकार्ड भी नहीं पूछा जाता है।

जिस व्यक्ति का मैं उल्लेख कर रहा हूं, वह पहले से लीवर के रोग से पीड़ित है और डॉक्टर द्वारा निर्देशित दवा लेन पर शर्तिया उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। अकारण अस्पताल में भर्ती कराने का भी दबाव बनाया जाता है। एक पत्रकार मित्र को भी जब डॉक्टर ने एडमिट करने की बात कही तो उस मित्र ने पूछ लिया कि आपके अस्पताल के मुख्य द्वार पर ‘नो बेड अवेलेबल’ लिखा है तो आप मुझे कहां एडमिट करेंगे। डॉक्टर निरुत्तर। एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि उन पर अस्पताल का दबाव रहता है, इसलिए ऐसी दवा लिखी जाती है। यह अपने आपमें दुर्भाग्यजनक है। मेरे एक मित्र को डॉक्टरों के समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की शिकायत थी लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि डॉक्टरों के लौटने का वक्त क्या है? डॉक्टर की आलोचना कर आप उनके मनोबल को तोडक़र अपना नुकसान कर रहे हैं। सिक्के के दो पहलू होते हैं और हमें दोनों तरफ देखना होगा। डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ शिद्दत के साथ मानव सेवा में जुटे हुए हैं।इन सब को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए लेकिन जो संकट के समय भी धन संग्रहण में जुटे हैं, उन्हें  सरकार के संज्ञान में लाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

एक-एक सांस के लिए लड़ते मरीजों और उनके परिजनों से लाखों का बिल वसूलने वाले अस्तपाल प्रबंधन के खातों की जांच इनकम टेक्स डिपार्टमेंट द्वारा की जानी चाहिए। नकद लेन-देन पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तथा इस बात की भी जांच हो कि कोरोना बीमारी के पहले अस्पताल की आय और व्यय कितना था और वर्तमान में कितना है, तो स्थिति साफ हो जाएगी। यह किसी को परेशान करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि आम आदमी को राहत दिलाने की और सरकार के प्रयासों को मजबूती दिलाने में एक कदम हो सकता है। बिलिंग काउंटर के पास सीसीटीवी कैमरा लगाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि समस्त किस्म के व्यवहार की रिकार्डिंग हो और उन पर नियंत्रण पाया जा सके। वक्त बहुत नाजुक है। सबको सबका सहयोग चाहिए। यह वक्त दोषारोपण का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर आगे बढ़कर मुसीबत से निकलने का है। सरकार की कमियां बताने में गुरेज न हो, लेकिन निंदारस से बाहर आना होगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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आज दो गुरुओं के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है: मनोज कुमार

आज दो लोगों के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है। चलते-चलते सिखाने वाले गुरुओं के जाने से दुखी हूं। चिंता इस बात की है कि अब ये लोग कहां मिलेंगे।

Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
ManojKumar645

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के संचार विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दविंदर कौर उप्पल का चार मई की तड़के (करीब ढाई बजे) निधन हो गया। दरअसल वे कोरोना वायरस से संक्रमित थीं और उनका इलाज रेड क्रॉस अस्पताल में रहा था। बता दें कि इस साल 11 अप्रैल को वे अपने घर पर फिसल गईं थीं, जिसकी वजह से उनके पैर में काफी चोट आई थी और उनकी सर्जरी हुई थी।

वहीं दूसरी तरफ इंदौर के प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार और पत्रकार प्रभु जोशी का निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से कोरोना संक्रमित थे, उनका इलाज चल रहा था। जोशी एक चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता के तौर पर जाने जाते थे।

प्रभु जोशी के चित्र लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में ऑस्ट्रेलिया के त्रिनाले में प्रदर्शित हुए थे। प्रभु जोशी को गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यूएसए) का जलरंग के लिए थामस मोरान अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। ट्वेंटी फर्स्ट सैचुरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में वे शामिल रहे। भारत भवन का चित्रकला और मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान भी उन्हें मिला।

प्रभु जोशी इंदौर आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव पद पर भी कार्यरत थे। कई रेडियो प्रोग्रामों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का श्रेय उन्हें जाता है। इसके लिए उन्हें कई अंततराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए। वर्तमान में लेखन और चित्रकारी में सक्रिय थे।

इन दोनों को याद करते हुए ‘समागम’ पत्रिका के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार ने लिखा-   

‘अब सुबह खुश खबर नहीं लाती है। आज सुबह फोन की घंटी बजी। दिल धड़का। किसी अनहोनी खबर की आशंका थी, वही हुआ। मैडम उप्पल नहीं रही। अपने पीछे वे अपने चाहने वालों का बडा कुनबा छोड़ गई। मेरा उनसे एक पत्रकार और उनसे उम्र में काफी छोटा होने के कारण अनुज का रिश्ता था। एक वजह देशबंधु से जुड़ा होना भी था।

एमसीयू से रिटायर होने के मुद्दत बाद एक एनजीओ के वर्कशाप में मुलाकात हुई। एक हौले से मुस्कराहट के साथ हालचाल पूछा। उनके घर का पता मिला तो उन्हें ‘समागम’ भेजने लगा। एक दिन उनका फोन आता है कि अच्छी पत्रिका निकाल रहे हो। कुछ पुरानी यादें ताजा हो गई।

एक दिन कम्युनिटी रेडियो के सिलसिले में कुछ जानने के लिये उनका फोन आया। इस बीच मेरे काम की जानकारी लेती रहीं। तारीफ करती। इधर कुछ शारीरिक दिक्कत के चलते उनका पढ़ना पहले की अपेक्षा कम हो गया था लेकिन सोशल मीडिया पर वे सक्रिय रहीं। दीक्षित सर के बाद उप्पल मेम का जाना मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे। ओम शांति शांति’

वहीं दूसरी तरफ, प्रभु दा के चले जाने की खबर गले से नहीं उतर रही है। प्रभु जोशी मेरे अनाम गुरु थे। बात 90-92 के आसपास की होगी। अखबार में वेतन अल्प था तो फ्री लान्सिंग कर कुछ जुगाड़ कर लिया करते थे। उन दिनों दा भोपाल में पोस्टेड थे। ‘वार्ता’ या कुछ अन्य प्रोग्राम किया करता था। एक दिन मजाक में ‘दा’ कहते हैं ‘मनोज कोई बडा काम कर लो’, जिज्ञासा से पूछा, ‘क्या’ तो हंसी के साथ कहा, ‘शादी कर लो’। उनसे मजाक कर सकूं, यह हैसियत ना तब थी, ना आज है। फिर उन्होने कहा कि कहानी से नाट्य रुपांतरण करो। मैने अपनी विवशता जताई कि यह विधा मुझे नहीं आती है, तो उन्होंने कहा, ‘कुछ नहीं है। कोशिश करो’। मैं भी जुट गया। रात भर घंटों की मेहनत के बाद लिखा, लेकिन मन में डर था कि अब कुटाई होने वाली है। सहमा-सहमा उनके पास स्क्रिप्ट लेकर पहुंचा। मेरी कोशिश थी कि वहां से खिसक लूं, लेकिन यह सम्भव नहीं था। महज 5 मिनट में रिजल्ट आ गया। 'दा ने मुझे पास कर दिया था। सच तो यह है कि उन्होने कॉपी में काफी सुधार किया था। लेकिन मेरा उत्साह बढ़ाते रहे।

इसके बाद 15 -15 मिनट की लघु नाटिका लिखने का अवसर दिया। आज जब फाइल पलट रहा था तो हैरान रह गया कि किस तरह मैने 50 से अधिक नाटक लिख लिया था।

भोपाल से जाने के बाद उनसे जीवन्त रिश्ता नहीं रहा, लेकिन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में जाना आना लगा रहा। इस दरम्यान कुछ समय चोरी कर उनसे मिलने गया। प्रभु दा वैसे ही थे लेकिन मुझ पर उम्र असर दिखाने लगी थी।

आज दो लोगों के जाने से मन अवसाद में डूबा जा रहा है। चलते-चलते सिखाने वाले गुरुओं के जाने से दुखी हूं। चिंता इस बात की है कि अब ये लोग कहां मिलेंगे। ईश्वर कृपा कर। अब कोई बुरी खबर ना देना। शत-शत नमन

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'बेमिसाल शिक्षक और जनसरोकारों के लिए जूझने वाली योद्धा थीं प्रो. दविंदर कौर उप्पल'

वे माखनलाल विश्वविद्यालय के जनसंचार में मेरी अध्यापक रहीं। बाद के दिनों में मुझे उनके साथ काम करने का मौका उनके विभाग में ही मिला।

Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
Uppal54

-प्रो. संजय द्विवेदी 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग की अध्यक्ष रहीं प्रो. दविंदर कौर उप्पल का जाना एक ऐसा शून्य रच रहा है, जिसे भर पाना कठिन है। वे एक बेमिसाल अध्यापक थीं, बेहद अनुशासित और अपने विद्यार्थियों से बहुत ज्यादा उम्मीदें रखने वालीं। उन्होंने पढ़ने- पढ़ाने, फिल्में देखने, संवाद करने और सामाजिक सरोकारों के लिए सजग रहते हुए अपनी पूरी जिंदगी बिताई। उनके पूरे व्यक्तित्व में एक गरिमा थी, नफासत थी और विलक्षण आत्मानुशासन था। वे लापरवाही और कैजुअलनेस के बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं। बेलाग और बेबाक। उन्हें अगर लगेगा कि यह ठीक नहीं है तो वे बोलेंगीं। जरूर बोलेंगी। सामने उनका विद्यार्थी है या कुलपति, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। एक बहुत छोटे शहर शहडोल के एक कस्बे से निकल चंडीगढ़, सागर होते हुए वे भोपाल में आईं। इन अनुभवों ने उन्हें गढ़ा था। बनाया था।

वे माखनलाल विश्वविद्यालय के जनसंचार में मेरी अध्यापक रहीं। बाद के दिनों में मुझे उनके साथ काम करने का मौका उनके विभाग में ही मिला। मैं सौभाग्यशाली हूं कि उनकी अकादमिक विरासत और उनका विभागीय उत्तराधिकार भी मुझे मिला। मैं उनकी सेवानिवृत्ति के बाद दस वर्षों तक जनसंचार विभाग का अध्यक्ष रहा। वे बेहद गरिमामय और सहजता से नए नेतृत्व को तैयार का बड़ा मन रखती थीं। अपनी सेवानिवृत्ति के काफी पहले ही उन्होंने कुलपति के आदेश से मुझे विभाग का समन्वयक बनाने का आदेश जारी करवा दिया। उस समय के तत्कालीन कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र से मैंने कहा ‘सर मैडम के रहने तक उनके साथ ही काम करना ठीक है। छोटा सा विभाग है, दो लोगों की क्या जरूरत।’ उन्होंने कहा कि ‘मैडम ने ही कहा कि संजय को अब जिम्मेदारियां संभालने का अभ्यास करना चाहिए।’ मैंने मैडम से कहा ‘आप ऐसा क्यों कर रही हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘अब मैं फिल्में देखूंगी, किताबें पढ़ूंगी। अब तुम संभालो। कल संभालना ही है, तो अभी प्रारंभ करो।’  मैं मीडिया की दुनिया से आया था, इस तरह उन्होंने मुझे अकादमिक क्षेत्र के लिए तैयार किया।

जनसंचार शिक्षा के क्षेत्र में, शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में उनका नाम बहुत बड़ा है। वे शोध में खास रूचि रखती थीं और विद्यार्थियों को प्रेरित करती थीं। अनेक विद्यार्थियों में उन्होंने वह आग जगाई, जिसे लेकर वे जीवन युद्ध में सफल हो सके। संचार, विकास संचार, शोध और सिनेमा उनकी खास रूचि के विषय थे। विकास के मुद्दों पर उनकी गहरी रूचि थी, ताकि सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला लाया जा सके। विकास और जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने अनेक रेडियो कार्यक्रम बनाए। इसरो के साथ झाबुआ प्रोजेक्ट में काम किया। उनके रेडियो रूपक ‘एक कंठ विषपायी’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। इसे 2016 का सबसे अच्छा महिला कार्यक्रम घोषित किया गया। यह कार्यक्रम रशीदा बी और चंपा बाई पर केंद्रित था, जिनका परिवार भोपाल गैस त्रासदी ने बरबाद कर दिया था। भोपाल गैस त्रासदी के बाद गैस पीड़ितों के संर्घष में, नर्मदा बचाओ आंदोलन में भी उनका सहयोग रहा। वे सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़कर बड़ी संवेदना के साथ विषयों को रखती थीं। किंतु कहीं से उनके मन में किसी के प्रति दुराव नहीं था। अपने आग्रहों के साथ रहते हुए भी वे वैचारिक छूआछूत से भी दूर थीं, नहीं तो हम जैसे अनेक विद्यार्थी उनके निकट स्थान कैसे पाते। उनका दिल बहुत बड़ा था और मन बहुत उदार। ऊपर से कड़े दिखने के बाद भी वे गहरी ममता और वात्सलल्य से भरी हुई थीं। बहुत खिलखिलाकर हंसना और हमारी गलतियां भूल जाना, उनकी आदत थी।

सागर विश्वविद्यालय से लेकर एमसीयू तक उनकी एक लंबी शिष्य परंपरा है। उनके विद्यार्थी आकाश की ऊंचाई पर हैं, लेकिन उनके सामने बौनापन महसूस करते। बिना समय लिए आप उनसे मिल नहीं सकते। उनकी अपनी जिंदगी थी, जो वे अपनी शर्तों पर जी रही थीं। मुझे नहीं पता कि कितने लोग मेरी तरह बिना समय लिए उनके पास चले जाते थे, पर पहुंचने पर वे थोड़ा अनमनी हो जाती थीं, कुछ देर बाद ही सामान्य होतीं। मैं जानता कि समय लेने पर वे कम से कम एक सप्ताह बाद ही बुलाएंगी, जबकि मेरी आदत है जिन रास्तों से गुजरो वहां अपनों के घर दस्तक देते जाओ। मेरे गुरू अब स्वर्गीय प्रो. कमल दीक्षित भी कहते थे –’फोन कर लिया करो पंडित अगर मैं इंदौर में होता तब।’ मैं कहता ’सर मैं दिल की आवाज पर चलता हूं, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि आप न मिले हों।’ उप्पल मैम हर चीज में टोकतीं पर मैं अपनी करता। वे पैर छूकर प्रणाम को बुरा मानती थीं,पर मैंने कभी उनकी बात नहीं मानी। पर वे कहना नहीं भूलतीं और बाद के दिनों में एक दिन उन्होंने कहा अब बहुत बड़े हो गए हो, अच्छा नहीं लगता। मैं उनसे कहता मैम हम अपने अध्यापक से बड़े कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपनी बहुत सी किताबें, पत्रिकाएं मुझे दीं और हिदायत भी कि कुछ गंभीर लेखन करो। उन्हें मेरा अखबारी लेखन पसंद था, किंतु वे ज्यादा उम्मीदें रखती थीं।

मेरी बेटी शुभ्रा के जन्म के मौके पर वे बहुत खुश हुयीं। घर आईं बहुत और प्यार जताया। ऐसे मौके पर उनका वात्सल्य साफ दिखता था। मेरी पत्नी भूमिका और बेटी शुभ्रा उनके लिए मुझसे ज्यादा खास थे। उनके हर फोन पर काम की बातें बाद में पहले शुभ्रा और भूमिका की चिंता रहती थी। मेरे आईआईएमसी के महानिदेशक बनने पर उनका फोन आया और बोलीं ‘बधाई डीजी साहब।’ मैंने कहा ‘मैम आशीर्वाद दीजिए’। उन्होंने हंसते हुए कहा ‘वो तो तुम जबरिया ले ही लेते हो।’ उनकी आवाज में एक अलग तरह की खुशी मैंने महसूस की। कॉलेज और स्कूलों में आती लड़कियां उन्हें पंसद थीं। वे स्त्रियों के अधिकारों और उनके सम्मान को लेकर बहुत सजग थीं। महिलाओं को अधिकार दिलाने के मुद्दों पर काम करना उनको भाता था। वे बहुत खुश होतीं जब ग्रामीण और सामान्य घरों से आने वाली छात्राएं कुछ बेहतर करतीं। उनका वे विशेष ध्यान और संरक्षण भी करती थीं। मुझे लगता है, संवेदना के जिस तल पर वे सोचती और काम करती थीं, हम वहां तक नहीं पहुंच पाए। हमारे हिस्से सिर्फ यह गर्व आया कि हम उप्पल मैम के विद्यार्थी हैं। काश उनके सुंदर, संवेदना से भरे और पवित्र मन का थोड़ा हिस्सा हमें भी मिलता तो शायद हम ज्यादा सरोकारी, ज्यादा मानवीय हो पाते। उनकी यादें बहुत हैं। मन विकल है। पूरी जिंदगी उन्होंने किसी की मदद नहीं ली, अब जब वे जा चुकी हैं तो भी हम उनसे बहुत दूर हैं, बहुत दूर। उन्होंने हमें कामयाब जिंदगी दी, नजरिया दिया और वे सूत्र दिए जिनके सहारे हम अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकते थे। लेकिन हमारे मन पर ताजिंदगी कितना बोझ रहेगा कि हम उनके आखिरी वक्त पर उनके पास नहीं हैं। मैं ही नहीं उनके तमाम विद्यार्थी ऐसा ही सोचते हैं। इस कठिन समय में उनका जाना अतिरिक्त दुख दे गया है। हमारी दुनिया और खाली हो गयी है। भावभीनी श्रद्धांजलि।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

 

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जानें, क्यों मनाया जाता है विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस?

तीन मई 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस' है, यह दिन हर वर्ष प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।

Last Modified:
Monday, 03 May, 2021
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तीन मई 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस' है, यह दिन हर वर्ष प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। ऐसा नहीं है कि इस दिन किसी देश में प्रेस को स्वतंत्रता मिल गई थी या उसकी स्वतंत्रता छिन गई थी, बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में तय किया था कि यदि प्रेस की आजादी के बारे में तीन मई को हर वर्ष पूरी दुनिया में बात की जाए तो अच्छा रहेगा, लिहाजा तब से हर साल 3 मई को विश्व प्रेस दिवस मनाया जाता है।

बता दें कि साल 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला किया था। 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' ने भी तीन मई को यह दिवस मनाने की घोषणा की थी। साल 1993 में यूनेस्को महासम्मेलन के 26वें सत्र में इससे संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था और तब से लेकर अब तक हर साल तीन मई को यह दिवस मनाया जाता है। यह दिन प्रेस की स्वतंत्रता के सिद्धांत, प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन और प्रेस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए मारे गए लोगों को याद करने और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देने का दिन है।

हर साल यह दिन किसी थीम यानी विषय पर आधारित होता है और इस साल की विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का विषय है- 'लोगों के अच्छे के लिए सूचना।' प्रेस का हमेशा से दायित्व रहा है कि वो हर एक जानकारी को बिल्कुल सटीक और सही तरीके से लोगों तक पहुंचाए, ताकि लोगों को उस खबर के बारे में उतना ही सच पता चल सके, जितना कि वास्तविक रूप से उस खबर में है।

हर साल अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तीन मई को यूनेस्को द्वारा 'गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज' दिया जाता है, जिसकी शुरुआत साल 1997 में हुई थी। यह पुरस्कार उस व्यक्ति अथवा संस्थान को दिया जाता है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो।  

सभी प्रजातांत्रिक देशों में मीडिया की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आमतौर पर सत्ताधारी दल का हमेशा ये यह प्रयास होता है कि वह उन सूचनाओं को जनता के सामने ना आने दे, जिससे जनता में सरकार के प्रति आक्रोश हो और इसके लिए सत्ताधारी पार्टियां तमाम तरह के प्रयास करती रही हैं, सत्ता मे आसीन पार्टियां सिर्फ उन्हीं सूचनाओं को बाहर लाने देती हैं जो उनके हित में हो।

लेकिन आज के डिजिटल युग में जनता जागरूक है और और वह हर मुद्दों पर अपनी राय रखती है। ऐसे में सरकार के सामने सूचना को छिपाना बड़ा ही मुश्किल काम होता है। 3 मई को स्वतंत्रता दिवस मनाने के पीछे एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम वैश्विक समुदाय को यह संदेश दें कि प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे मौलिक अधिकारों में से एक महत्वपूर्ण अधिकार है और हम इन पर किसी भी तरह की बंदिश स्वीकार नहीं करेंगे।

जरूरत इस बात की है कि प्रेस आस-पास घटने वाली घटनाओं का बेबाक और ईमानदारीपूर्वक विश्लेषण करें और आम जनता तक उसे पहुंचाने का प्रयास जारी रखें। अगर, जनता को कहीं भी लगेगा कि उसे मिलने वाली सूचना में पक्षपात किया गया है तो सबसे ज्यादा प्रेस की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता प्रभावित होगी। मोबाइल और तकनीक के इस युग में सरकार कोई भी सूचना ज्यादा समय तक छुपा कर नहीं रख सकती है। इंटरनेट के इस युग में जहां पलक झपकते ही सूचना फैल जाती है, ऐसे में सरकार की अहमियत बढ़ जाती है कि वह अपने स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात ना करे और उन सूचनाओं को भी फैलने से रोके जिससे देशहित को नुकसान पहुंचता हो।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को परिभाषित किया गया है। प्रेस की स्वतंत्रता को इसी के अंतर्गत रखा गया है। संविधान के इस प्रावधान के अनुसार, भारत का हर नागरिक अपने विचारों को रखने के लिए स्वतंत्र है। इसके साथ ही, नागरिकों को अपने विचारों को लिखित तौर पर प्रसारित, प्रचारित और प्रचालित करने का भी हक प्राप्त है, लेकिन आवश्यकतानुसार इस पर प्रतिबंध भी लगाने का प्रावधान किया गया है।

आजादी के बाद, भारतीयों को सबसे पहले प्रेस की स्वतंत्रता की समझ आपातकाल के दिनों में आई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया था। जबकि एक सफल प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए प्रेस की स्वतंत्रता का होना निहायत ही जरूरी है। इसके बिना जनता के हितों की रक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती है। आज भी कई ऐसे देश हैं जहां प्रेस को शासकों ने अपनी मर्जी के अधीन कर रखा है। उन्हें यह डर सताता है कि जनता को अगर सही सूचना मिल गई तो उनके खिलाफ बगावत हो सकती है और यही कारण है कि कई देशों में प्रेस को अब भी वह स्वतत्रता हासिल नहीं है जिसकी वह हकदार है। उदाहरण के लिए अभी हाल ही में बर्मा में समाचारपत्रों का प्रकाशन फिर से शुरू हो सका है। गौरतलब है कि बर्मा में अभी सैन्य तानाशाही शासन सत्ता में है।

इस अवसर पर, सरकार को चाहिए कि वह प्रेस में कार्यरत सभी पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया कराए, जिससे कि वह अपने कार्य को सही तरीके से अंजाम दे सके और जनता को बगैर पक्षपात के खबरें मिल सके।

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बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें करना : मनोज कुमार

जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है।

Last Modified:
Monday, 03 May, 2021
WorldPressFreedomDay45

मनोज कुमार, 

वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ‘समागम’ ।।

तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था। तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं। इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की। पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है। खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है। दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है। लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं। हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है। इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है।

भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरुआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था। आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ, वह कई बार बताया जा चुका है। उसे दोहराने का अर्थ समय और स्पेस खराब करना है। लेकिन एक सच यह है कि पत्रकारिता इसके बाद से दो हिस्सों में बंटती चली गई। लोगों ने मिशन से बाहर आकर इसे प्रोफेशन मान लिया। अखबारों और पत्रिकाओं की संख्या मे इजाफा होना शुरू हो गया। कल तक जिनके लिए किसी स्कूल में शिक्षक बन जाना आसान था, उन्हें यह भी आसान लगा कि पत्रकार बन जाओ। ना शिक्षा की पूछ-परख और ना ही अनुभव का कोई लेखा-जोखा। मैं कुछ ऐसे पत्रकारों को जानता हूं जो शीर्ष संस्थाओं के प्रमुख हैं लेकिन जमीनी पत्रकारिता से उनका कोई वास्ता नहीं रहा। डिग्री हासिल की और सुविधाजनक ढंग से बड़े पदों पर आसीन हो गए। नयी पीढ़ी उन्हें प्रखर पत्रकार और आचार्य संबोधित करने लगे। मिश्री घुली बातों से वे चहेते बन गए और आज जिस बात का हम रोना रो रहे हैं, वह इन्हीं महानुभावों की वजह से उत्पन्न हुआ है। इसमें तथाकथित प्रखर पत्रकार और आचार्य बन चुके रसमलाई में लिपटे लोगों की गलती तो थोड़ी है। इससे बड़ी गलती उन दिग्गज लोगों की है जो जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में लग रहे।

बेहिसाब पत्रकारिता के शिक्षण संस्थान शुरू हो रहे हैं। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों को पत्रकारिता को छोडक़र शेष सारी विधायें सिखायी जाती हैं। डिग्री और बेहतर नौकरी के साथ सुविधाजनक जिंदगी की चाहत लिए पत्रकारिता के नौनिहाल सवाल करना भी जानते हैं। संवाद और अध्ययन से उनकी कोसों दूरी है। कभी किसी पर इनकी खबर का केवल इंट्रों देख लीजिए तो माथा पीट लेंगे। पू्रफ रीडिंग जैसी बुनियादी सबक कभी इन्हें सिखाया नहीं गया। जुम्मा-जुम्मा चार साल की पत्रकारिता और वरिष्ठ पत्रकार का खिताब। इन सालों में एक खबर ऐसी नहीं कि जो छाप छोड़ गई हो। हालांकि निराशाजनक स्थिति के बावजूद मैं कह सकता हूं कि कुछेक विद्यार्थी हैं जो पत्रकारिता करने आये थे और पत्रकारिता कर रहे हैं। पत्रकारिता शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन के दौरान उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं दिया गया कि पत्रकारिता और मीडिया क्या है? आज पत्रकारिता दिवस है और सोशल मीडिया में निश्चित रूप से मीडिया को शुभकामनाएं दी जा रही होंगी। प्रेस की स्वतंत्रता के मायने यह नहीं है कि आपको लिखने की आजादी है। प्रेस स्वतंत्रता का अर्थ है आप सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करें। पेजथ्री की पत्रकारिता से बाहर आकर एक बार विद्यार्थी, पराडकर, गांधी और तिलक को पढ़ें। मैं यह भी नहीं कहता कि आधुनिक संचार माध्यमों में वह सबकुछ संभव है जो पराधीन भारत की पत्रकारिता में था लेकिन जैसे सृष्टि ने मां बनाया तो सदियां बदल जाने के बाद भी मां ही है, वैसे ही माध्यम बदल जाए, विकास हो जाए लेकिन पत्रकारिता की आत्मा जिंदा रहना चाहिए। पत्रकारिता हमारी अस्मिता है।

जब हम प्रेस स्वतंत्रता की बात करते हैं तो इन दिनों कोरोना काल में जो कुछ घट रहा है, वह हमें आईना दिखाने के लिए बेहतर है। देशभर में पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों को अर्जियां दी जा रही हैं। फिर राजशाही की तरह सरकार हम पर एहसान कर कहती है कि फलां सरकार ने पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मान लिया है। समाज में शुचिता और सकरात्मकता का भाव उत्पन्न करने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की। सरकार के प्रयासों को लोगों तक पहुंचाने की अपेक्षा पत्रकारिता से। लेकिन पत्रकारों को फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए सरकारों से बात करना होगी। क्या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह हमारा ध्यान रखे? इस स्थिति के लिए भी हम दोषी हैं। रोहित सरदाना की मृत्यु हो जाती है तो हम खेमें में बंट जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि वो भी एक पत्रकार था और हम सब भी। यह भी सच है कि जिस अखबार, पत्रिका या चैनल में काम करेंगे, उसकी नीति के अनुरूप बोलना होगा। यह बंधन सबके लिए है। हमारी आपस की बैर और खेमेबाजी राजनीतिक दलों के लिए सुविधा पैदा करती है। आज सचमुच में प्रेस स्वतंत्र होता तो सरकारें आगे आकर फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर मानने के लिए मजबूर होती लेकिन दुर्भाग्य से हम खेमेबाज पत्रकार हैं। इसलिए सब बातें बेमानी है।

उम्मीद कीजिए और भरोसा रखिए कि देश के कोने कोने से कोराना के चलते जो पत्रकार जान गंवा रहे हैं, उनसे हम सीख लें। एक साथ खड़े हो जाएं। जिस दिन हम यह साहस कर पाएंगे हर प्रबंधन को आगे आकर वेतन आयोग की शर्ते मानना होगी और सरकारों को भी। लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा कि क्योंकि एक ऐसी अदृश्य शक्ति है जो हमें इसमें या उसमें बांट रही है।   

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IIMC के DG प्रो.संजय द्विवेदी ने बताया, पत्नी संग मिलकर कैसे जीती कोरोना से जंग

मुझे और मेरी पत्नी श्रीमती भूमिका को एक ही दिन बुखार आया। बुखार के साथ खांसी भी तेज थी। जो समय के साथ तेज होती गई।

विकास सक्सेना by
Published - Tuesday, 04 May, 2021
Last Modified:
Tuesday, 04 May, 2021
ProfSanjayDwivedi

-प्रो.संजय द्विवेदी,

महानिदेशक (DG), भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली ।।

ये सच में बहुत कठिन दिन हैं। डरावने, भय और आशंकाओं से भरे हुए। मीडिया में आती खबरें दहशत जगा रही थीं। कई मित्रों, शुभचिंतकों और जानने वालों की मौत की खबरें सुनकर आंखें भर आती थीं। लगता था यह सिलसिला कब रूकेगा? बुखार आया तो लगा कि हमारे भी बुरे दिन आ गए हैं। रात में सोना कठिन था। फिल्में देखने और पढ़ने-लिखने में भी मन नहीं लग रहा था। बुखार तो था ही, तेज खांसी ने बेहाल कर रखा था। एक रोटी भी खा पाना कठिन था। मुंह बेस्वाद था। कोरोना का नाम ही आतंकित कर रहा था। मन कहता था ‘मौसमी बुखार ही है, ठीक हो जाएगा।’ बुद्धि कहती थी ‘अरे भाई कोरोना है, मौसमी बुखार नहीं है।’ अजीब से हालात थे। कुछ अच्छा सोचना भी कठिन था।

मुझे और मेरी पत्नी श्रीमती भूमिका को एक ही दिन बुखार आया। बुखार के साथ खांसी भी तेज थी। जो समय के साथ तेज होती गई। टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद मैंने तत्काल गंगाराम अस्पताल, दिल्ली के डॉक्टर अतुल गोगिया से ऑनलाइन परामर्श लिया। उनकी सुझाई दवाएं प्रारंभ कीं। इसके साथ ही होम्योपैथ और आर्युवेद की भी दवाएं लीं। हम लगभग 20 दिन बहुत कष्ट में रहे। साढ़े छः साल की बेटी शुभ्रा की ओर देखते तो आंखें पनीली हो जातीं। कुछ आशंकाएं और उसका अकेलापन रूला देता। करते क्या, उसे अलग ही रहना था। मैं और मेरी पत्नी भूमिका एक कक्ष में आइसोलेट हो गए। वह बहुत समझाने पर रोते हुए उसी कमरे के सामने एक खाट पर सोने के लिए राजी हो गयी। किंतु रात में बहुत रोती, मुश्किल से सोती। दिन में तो कुछ सहयोगी उसे देखते, रात का अकेलापन उसके और हमारे लिए कठिन था। एक बच्चा जो कभी मां-पिता के बिना नहीं सोया, उसके यह कठिन था। धीरे-धीरे उसे चीजें समझ में आ रही थीं। हमने भी मन को समझाया और उससे दूरी बनाकर रखी।

लीजिए लिक्विड डॉइटः

दिन के प्रारंभ में गरम पानी के साथ नींबू और शहद, फिर ग्रीन टी, गिलोय का काढ़ा और हल्दी गरम पानी। हमेशा गर्म पानी पीकर रहे। दिन में नारियल पानी, संतरा या मौसमी का जूस आदि लेते रहे। आरंभ के तीन दिन लिक्विड डॉइट पर ही रहे। इससे हालात कुछ संभले। शरीर खुद बताता है, अपनी कहानी। लगा कुछ ठीक हो रहा है। फिर खानपान पर ध्यान देना प्रारंभ किया। सुबह तरल पदार्थ लेने के बाद फलों का नाश्ता जिसमें संतरा, पपीता, अंगूर, किवी आदि शामिल करते थे। 

खुद न करें इलाजः

खान-पान, संयम और धीरज दरअसल एक पूंजी है। किंतु यह तब काम आती हैं, जब आपका खुद पर नियंत्रण हो। मेरी पहली सलाह यही है कि बीमारी को छिपाना एक आत्मछल है। खुद के साथ धोखा है। अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें  कहीं का नहीं छोड़ता। इसलिए तुरंत डॉक्टर की शरण में जाना आवश्यक है। होम आइसोलेशन का मतलब सेल्फ ट्रीटमेंट नहीं है। यह समझन है। प्रकृति के साथ, आध्यात्मिक विचारों के साथ, सकारात्मकता के साथ जीना जरूरी है। योग- प्राणायाम की शरण हमें लड़ने लायक बनाती है। हम अपनी सांसों को साधकर ही अच्छा, लंबा निरोगी जीवन जी सकते हैं।

 इन कठिन दिनों के संदेश बहुत खास हैं। हमें अपनी भारतीय जीवन पद्धति, योग, प्राणायाम, प्रकृति से संवाद को अपनाने की जरूरत है। संयम और अनुशासन से हम हर जंग जीत सकते हैं। भारतीय अध्यात्म से प्रभावित जीवन शैली ही सुखद भविष्य दे सकती है। अपनी जड़ों से उखड़ने के परिणाम अच्छे नहीं होते। हम अगर अपनी जमीन पर खड़े रहेंगें तो कोई भी वायरस हमें प्रभावित तो कर सकता है, पराजित नहीं। यह चौतरफा पसरा हुआ दुख जाएगा जरूर, किंतु वह जो बताकर जा रहा है, उसके संकेत को समझेंगें तो जिंदगी फिर से मुस्कराएगी।

मेरे सबकः

1.    होम आईसोलेशन में रहें किंतु सेल्फ ट्रीटमेंट न लें। लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

2.    पौष्टिक आहार, खासकर खट्टे फलों का सेवन करें। संतरा, अंगूर, मौसम्मी, नारियल पानी, किन्नू आदि।

3.    नींबू, आंवला, अदरक, हल्दी, दालचीनी, सोंठ को अपने नियमित आहार में शामिल करें।

4.    नकारात्मकता और भय से दूर रहें। जिस काम में मन लगे वह काम करें। जैसे बागवानी, फिल्में देखना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना।

5.    यह भरोसा जगाएं कि आप ठीक हो रहे हैं। सांसों से जुड़े अभ्यास, प्राणायाम, कपाल भाति, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम 15 से 30 मिनट तक अवश्य करें।

6.    दो समय पांच मिनट भाप अवश्य लें। हल्दी-गुनगुने पानी से दो बार गरारा भी करें।

7.    दवा के साथ अन्य सावधानियां भी जरूरी हैं। उनका पालन अवश्य करें। शरीर को अधिकतम आराम दें। ज्यादा से ज्यादा नींद लें, क्योंकि इसमें कमजोरी बहुत आती है और शरीर को आराम की जरूरत होती है।

8.   अगर सुविधा है तो बालकनी या लान में सुबह की गुनगुनी धूप जरूर लें। साथ ही सप्ताह में एक बार डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी की गोलियां भी लें। साथ ही विटामिन सी और जिंक की टेबलेट भी ले सकते हैं।

 

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इस तरह का व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है मिस्टर मीडिया!

पत्रकारों पर कोरोना काल कहर बनकर टूटा है। अपने फर्ज को अंजाम देते हमारे अनेक साथी शहीद हुए हैं।

राजेश बादल by
Published - Sunday, 02 May, 2021
Last Modified:
Sunday, 02 May, 2021
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

पत्रकारों पर कोरोना काल कहर बनकर टूटा है। अपने फर्ज को अंजाम देते हमारे अनेक साथी शहीद हुए हैं। सैकड़ों पत्रकार अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। याद नहीं आता कि हिंदुस्तान के किसी भी पत्रकार ने इस आफत की घड़ी में अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ा हो अथवा अपनी जान बचाने का प्रयास किया हो। इस अभूतपूर्व भयावह संकट काल में यह सोचना भी फिजूल है कि किसी पत्रकार ने अपनी भूमिका के साथ बेईमानी की हो। ठीक उसी तरह, जैसे कि एक डॉक्टर के बारे में यह ख्याल भी नहीं आ सकता कि वह कोरोना संक्रमितों का इलाज़ करने के बजाय उनसे दूर भागने की कोशिश करेगा।

लेकिन हाल ही में कोरोना संक्रमण से पीड़ित एक एंकर हृदयाघात से दिवंगत हुआ तो तमाम सोशल और डिजिटल माध्यमों में उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर तीखी निंदा की गई। यह दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में किसी भी स्वर्गीय इंसान की आलोचना निंदनीय और घृणित माना जाता है। जीवित रहते भले ही हम उससे असहमति रखें, उससे उग्र बहस करें मगर मौत के बाद माफ कीजिए, उनकी बुराई करने की मुहिम उचित नहीं ठहराई जा सकती। इसलिए वैचारिक आधार पर मूल्यांकन अच्छा नहीं है। सियासत ने हमें पहले ही बहुत से खंडों में बांट दिया है। अब और बंटवारा पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं है।

एक जानकारी के मुताबिक, भारत में कोविड-19 के कारण देह छोड़ने वाले पत्रकारों की संख्या ढाई सौ से अधिक है। करीब डेढ़ हजार से अधिक अभी भी पीड़ित हैं। इनमें बहुत से मामले ऐसे हैं, जिनमें पत्रकारों ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया है। केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया इस चौथे स्तंभ के प्रति सम्मानजनक नहीं रहा है। इस खौफनाक दौर में ये मौतें आकस्मिक हैं और किसी पत्रकार को अपनी मृत्यु के बाद परिवार के लिए कोई आर्थिक बंदोबस्त करने का अवसर नहीं मिला है। हकीकत तो यह है कि चिकित्सा पर ही उसकी जमापूंजी खर्च हो रही है। कुछ उदाहरण तो ऐसे भी हैं, जिनमें पत्रकार की जान चली गई और वह अपने इलाज पर बड़ा कर्ज लिए चला गया। अब उसका परिवार यह ऋण चुकाएगा। ऐसे में सरकार का दायित्व बनता है कि कम से कम बीस-पच्चीस लाख रुपये की आर्थिक मदद उसके परिवार को दे। मगर उल्टा हो रहा है। इंदौर के दो पत्रकारों के परिवार को चार लाख रुपये दिलाने में उसके साथियों को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। ऐसे मामलों में सरकारी मशीनरी की बेरुखी निंदनीय है।

‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने अपने ताजा बयान में केंद्र सरकार के पत्रकारों के प्रति इस उदासीन रवैये पर ध्यान खींचा है। गिल्ड का कहना है कि सियासतदानों का पत्रकारों के प्रति यह उपेक्षा भाव ठीक नहीं है। उन्हें न तो ढंग से दवाएं मिलीं और न ही चिकित्सकीय सहयोग। गिल्ड ने पत्रकारों को कोरोना से बचाव के टीके लगाने में प्राथमिकता देने का आग्रह भी किया है, क्योंकि वे मोर्चे पर तैनात फ्रंटलाइन योद्धा हैं और महामारी से जुड़ी तमाम खबरें आम अवाम तक पहुंचाते हैं। सरकारों को उन्हें फ्रंटलाइन योद्धा क्यों नहीं मानना चाहिए? विडंबना यह है कि कोई भी हुकूमत अपनी आलोचना करने वालों पर यह मेहरबानी नहीं करती, जबकि देश का तंत्र कोरोना से लड़ने में नाकाम साबित हो रहा हो। इसलिए सरकारों से उम्मीद रखने के बजाय खुद पर ही भरोसा करना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

कृपया अपनी जिम्मेदारी तलाश कीजिए मिस्टर मीडिया!

अवसाद की खबरों में आशा की भाषा कहां है मिस्टर मीडिया?

आत्मघाती पत्रकारिता से बचने का उपाय तत्काल खोजना आवश्यक है मिस्टर मीडिया!

भारतीय संसदीय पत्रकारिता के नजरिये से यह एक बड़ा नुकसान है मिस्टर मीडिया!

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'विकट समय में हर धड़कन को बचाने वाले योद्धा श्रमिक साथियों को सलाम'

मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई। वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं।

Last Modified:
Saturday, 01 May, 2021
labourday5454

 मनोज कुमार, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई। वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं। वही श्रमिक साथी जिनके पास जीवन जीने लायक मजदूरी से मिला मेहताना होता है। घर पर कोई पक्की छत नहीं। धरती को बिछा लेते हैं और आसमां को ओढ़ लेते हैं। इनकी उम्मीदें भी कभी हिल्लोरे नहीं मारती है। मोटरकार से लेकर जहाज तक खड़ा कर देते हैं लेकिन इसमें सवार होने की इच्छा कभी नहीं होती है। ये श्रमिक रचनाकार हैं और इनसे समाज की धड़कन है। इन्हें अपना अधिकार भी पता है और दायित्व भी। अधिकार के लिए कभी अड़े नहीं लेकिन दायित्व से पीछे हटे नहीं। आज की तारीख से पहले अखबार में खबर छपी कि देश के प्लांट मे ऑक्सीजन निर्माण में जुटे श्रमिकों ने अपने खाना इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें पहले काम पूरा करना है। यह जज्बा श्रमिकों में ही हो सकता है। श्रमिक श्रेष्ठ हैं तो इसलिए नहीं कि वे श्रमिक हैं बल्कि एक तरह से वे रचियता हैं। मांगना इनकी आदत में नहीं है। देना इनकी फितरत में शामिल है। आत्मस्वाभिमान से जीने वाले श्रमिक साथी अपना भोजन छोड़कर एक संदेश दिया है कि आओ, पहले जान बचायें। एक-एक जान की कीमत श्रमिक साथियों को पता है।

इस हाहाकार समय में सब डरे हुए हैं। सहमे हुए हैं। अपना जीवन कैसे बचा लें, यह हर व्यक्ति की चिंता है। धड़कन बचाने के लिए तिजोरियों के ताले खोल दिए गए हैं। जमीन-जायदाद बेचकर जीवन बचाने की जद्दोजहद चल रही है। यह हालात किसी एक घर, एक परिवार, एक शहर या देश की नहीं बल्कि हर जगह है। जीवन बचाना इस समय सबसे बड़ी जरूरत है। इस बैरी बीमारी ने रिश्तों के मायने सिखा दिया है। लोभ-लालच से परे भी कोई जिंदगी होती है, यह भी हम सीखने लगे हैं। लेकिन एक बड़ी सच्चाई यह है कि इस कोरोना बीमारी के पहले भी और वर्तमान समय में और शायद दुनिया के रहने तक एक ऐसा वर्ग है जिसके जेहन में सिर्फ एक बात है कि मनुष्य बने रहना। वह है हमारे श्रमिक। ऐसा नहीं है कि कोरोना श्रमिकों से कोई दोस्ती निभा रहा है या उनकी जान बख्श रहा है। सरकारी आंकड़ों में उनकी गिनती नहीं के बराबर है। उनके पास तिजोरी नहीं है। बैंकों में खाते नहीं है और अस्पताल में इलाज के लिए कोई सोर्स और रसूख नहीं है, लेकिन उनके पास है उनका आत्मविश्वास। वे खोकर भी दुखी होना जाहिर नहीं करते हैं। उल्टे दुखी लोगों के आंसू पोंछने में वे सबसे आगे होते हैं। भोजन छोड़कर ऑक्सीजन बनाने में जुटे श्रमिकों की खबर इसकी बानगी है। ऐसी अनगिनत खबरें होंगी जो आपके आसपास से गुजर रही होगी लेकिन अखबारों की सुर्खियों में जगह नहीं पा रही हैं। एक ऑटो चालक इन्हीं में से एक है जो अपना नफा-नुकसान छोडक़र लोगों की सेवा में जुटा हुआ है। उन्होंने कभी कोई मांग नहीं की कि उन्हें कोरोना वॉरियर ऐलान किया जाए। अपने लिए ना जतन मांगा और न मांगा कुछ।  

मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक। खामोशी के साथ वे जीते हैं उन्हें अपनी ताकत भी पता है। लेकिन वे अपनी ताकत का उपयोग नहीं करते हैं। वे सहिष्णु हैं। उपकार करना उनकी ताकत है। अपने नेक कार्यों को लेकर इतराना उन्हें आता नहीं। उनकी जिंदगी में रंग नहीं है तो बदरंग भी नहीं है। सेवा का भीतर से जो सतरंगी दुनिया उन्हें हमेशा ऊर्जावान रखती है, वही उनकी दुनिया है। श्रमिक साथियों का हक देने की बात हमेशा होती रही लेकिन कागज से कभी बाहर नहीं आ पाया। वायदों और बातों में लिपटी चिकनी-चुपड़ी राजनीतिक ऐलान को वो बेहतर जानते हैं। वो जो कसी हुई मुठ्ठी चित्रों में जो आपको दिखती है, वही उनकी ताकत है। वो रच सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं। जब एक साथ खड़े हो जाएं तो सरकारें हिल जाती हैं। परिवर्तन की ऐसी बयार चलती है कि सत्ताधीशों के सामने कुचलने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। इतिहास इस बात का गवाह है। ऐसे अनगिनत किस्से आप पढ़ सकते हैं जब श्रमिक आंदोलन को कुचला गया।

वो जब कहते हैं कि मेहनतकश जब भी अपना हिस्सा मांगेगे/इक गांव नहीं/ इक खेत नहीं/ पूरी की पूरी दुनिया मांगेगे। श्रमिक साथी हमेशा इस बात से मुतमइन हैं कि ‘हम होंगे कामयाब’। उनकी कामयाबी कभी छीनने में नहीं रही। वे एक टुकड़ा जमीन और एक टुकड़ा आसमा से खुश हैं। आज इस कोरोना काल में श्रमिक साथी अपनी किसम की अपने फितरत से मानवता की मिसाल कायम कर रहे हैं। दुख और अफसोस इस बात का है कि हम उनकी इस नेक-नीयती को सम्मान नहीं दे पाते हैं। खैर, उन्हें इस बात का रंज भी नहीं है। वे बुनियाद के पत्थर बने रहना चाहते हैं और उन्हें इसी का संतोष है। इस विकट समय में हर धड़कन को बचाने वाले योद्धा श्रमिक साथियों को सलाम।  

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