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विश्व मच्छर दिवस पर विशेष: देश की GDP में यूं बढ़ोतरी करते हैं मच्छर :)

मच्छर शब्द कमजोरी का प्रतीक बन गया है। हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि कृपया मच्छर समाज को मच्छर न समझें

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

पीयूष पांडे, व्यंग्यकार व वरिष्ठ पत्रकार।।

आज है। इस खास अवसर पर मच्छरों के एक नेता से मैंने एक्सक्लूसिव बात की। मच्छरों के ये नेता डेंगू फैलाने का जिम्मा अपने कंधे पर लिए हैं और जिस बेतकल्लुफी से इन्होंने बात की, उसके बाद कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने मन की बात खोलकर रख दी।

आप महामारी क्यों फैला रहे है? आपका प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

जिसे आप प्रकोप कह रहे हैं, वो हमारी लोकप्रियता है। आज उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और हरियाणा से दिल्ली तक हर शख्स डेंगू-डेंगू कर रहा है। हमारी लोकप्रियता का सेंसेक्स स्टॉक मार्केट से भी ऊपर है।

लेकिन आप बीमारी फैला रहे हैं। ये अच्छी बात नहीं है।

तुम इंसानों के यहां अभी भी स्कूलों में गीता पढ़ाने को लेकर विवाद है। लेकिन हमने पैदा होते ही गीता सार समझ लिया। यानी कर्म कर, फल की चिंता मत कर। तो हमारा पूरा समाज कर्म कर रहा है।

 आप गरीबों को ज्यादा सताते हैं?

ये निराधार आरोप है। डेंगू मच्छर धर्म निरपेक्ष, शर्म निरपेक्ष और शिकार निरपेक्ष हैं। हम न धर्म के आधार पर भेद करते हैं और न अमीर-गरीब देखकर डंक मारते हैं।

क्या ये सच नहीं है कि कुछ लोग सॉफ्ट टारगेट हैं, जिन्हें आप पहला निशाना बनाते हैं?

बिलकुल नहीं। सॉफ्ट टारगेट तो हमारे लिए सनी लियोनी है। वस्त्र मुक्त अभियान की प्रणेता सनी लियोनी को हम कभी भी अपना शिकार बना सकते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करते। ये हमारी ईमानदारी भी है और आपके आरोप का जवाब भी।

डेंगू मच्छर इंसानों को मौत के मुंह में ले जा रहे हैं। आखिर आप साबित क्या करना चाहते हैं?

मच्छर एक गाली हो गई है। मच्छर शब्द कमजोरी का प्रतीक बन गया है। हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि कृपया मच्छर समाज को मच्छर न समझें। दुनिया में हर साल साढ़े सात लाख लोगों को मच्छर कम्युनिटी ऊपर पहुंचाकर बता रही है कि उन्हें सीरियसली लिया जाए। भारत में डेंगू मच्छर इस दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं और उन्हें खासी कामयाबी भी मिली है।

लेकिन जान लेकर ही क्यों?

देखिए हमारा पहला मकसद लोगों को अस्पताल पहुंचाना ही होता है। हम दरअसल राष्ट्र की समृद्धि में योगदान भी देना चाहते हैं। क्योंकि पीड़ितों की वजह से अस्पतालों का, डॉक्टरों का, पैथोलोज़ी लैब का, दवाइयों की दुकानों का टर्नओवर बढ़ता है और इससे देश की जीडीपी में बढ़ोतरी होती है। लेकिन कुछ लोग चल बसते हैं तो उनकी अपनी गलती की वजह से। वक्त पर अस्पताल न पहुंचकर, खुद डॉक्टर बनकर और सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर वे खुद अपनी जान लेते हैं। हमारा कोई दोष नहीं।

आपने कहा कि आप अमीर-गरीब में फर्क नहीं करते। लेकिन डेंगू मच्छर कभी नेताओं को नहीं डसता। उन्हें कभी अस्पताल नहीं पहुंचाता?

मैं शर्मिन्दा हूं। निश्चय ही आपका यह आरोप सही है कि हम नेताओं को नहीं काटते। दरअसल, बीते कई वर्षों से हमारी कोर कमेटी इस बात पर बहस कर रही है लेकिन हर बार यही तय होता है कि राजनेताओं को काटने से हमें खुद डेंगू जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। हो सकता है कि ऐसी कोई बीमारी हो जाए,जिसका इलाज ही न हो। मैं सिर झुकाकर यह आरोप स्वीकार करता हूं।

आखिरी सवाल, आपका प्रकोप 20 साल पहले तक नहीं था। कोई नहीं जानता था डेंगू को। अचानक कैसे आपका उदय हो गया?

इंसान जब मच्छर जैसी हरकत करने लगा। गंदगी खुद फैलाए और नाम हमारा धरने लगा तो हमें भी लगा कि इंसानों को उनकी औकात बता दी जाए।


टैग्स पीयूष पांडे व्यंग्य मच्छर के मन की बात
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