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सिर्फ नेता पर ही नहीं, मुद्दों पर भी होगा 2024 का लोकसभा चुनाव: विनोद अग्निहोत्री
हालांकि भाजपा नीत एनडीए बार-बार विपक्षी गठबंधन इंडिया से यह सवाल जरूर पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले उनके पास नेता कौन है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago
विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और वरिष्ठ सलाहकार संपादक, अमर उजाला ग्रुप।
देश की सियासत हर रोज नई करवट ले रही है। अगले लोकसभा चुनावों को लेकर अब जो तस्वीर बन रही है, उसमें एक अकेले मोदी बनाम कई दलों की मिलजुली लड़ाई नहीं, बल्कि दो महागठबंधनों के बीच चुनावी महासंग्राम होने जा रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा और उसके नए पुराने सहयोगी 38 दलों का गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस यानी एनडीए होगा, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और उसके साथ जुटे 26 दलों का महागठबंधन, जिसे इंडियन नेशनल डेवलेपमेंटल इन्कल्यूसिव एलायंस, जिसे संक्षेप में इंडिया नाम दिया गया है, के बीच मुकाबला होगा। विपक्ष तो पहले से ही सबकी मिली-जुली ताकत से ही ताकतवर भाजपा का मुकाबला करने की तैयारी कर रहा था, लेकिन अब भाजपा जो 'मोदी अकेला सब पर भारी' की माहौलबंदी (नेरेटिव) बनाकर मोदी बनाम सब के नारे के साथ लोकसभा चुनावों में जाना चाहती थी, अब विपक्ष की सामूहिक चुनौती का जवाब अपनी सामूहिक चुनौती से ही देगी। हालांकि भाजपा नीत एनडीए बार-बार विपक्षी गठबंधन इंडिया से यह सवाल जरूर पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले उनके पास नेता कौन है। अपनी इस कमजोरी पर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब इंडिया के नेता अपने मुद्दों से देने की कोशिश करेंगे। यानी अगला लोकसभा चुनाव नेता के साथ-साथ दोनों गठबंधनों के नाम और मुद्दों पर भी होगा।
जहां तक मुद्दों की बात है, तो दोनों ही खेमों ने अपने-अपने मुद्दे भी तय कर लिए हैं। हालांकि विपक्षी गठबंधन इंडिया जिसकी अगली बैठक मुंबई में प्रस्तावित है, समान न्यूनतम कार्यक्रम अभी आना बाकी है, जिसमें उसके सारे मुद्दे कार्यक्रम और विज़न को सार्वजनिक किया जाएगा, लेकिन मोटे तौर पर विपक्ष लोकतंत्र संविधान और संघवाद को बचाने के नारे के साथ महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, अग्निवीर योजना, पुरानी पेंशन की बहाली, मणिपुर की जातीय हिंसा, सीमाओं पर चीनी अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सत्ताधारी गठबंधन को घेरेगा। जबकि अपने भाषणों में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस आक्रामक तरीके से विपक्षी दलों के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और परिवारवाद की राजनीति को लेकर तीखे हमले शुरू कर दिए हैं, उससे साफ है कि भाजपा नीत एनडीए इसे विपक्षी गठबंधन के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा बनाएगा। हालांकि भोपाल के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने जिस प्रखरता से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की जरूरत की बात कही थी, उससे लगा था कि भाजपा जनसंघ के जमाने से चले आ रहे अपने इस पुराने एजेंडे को धार देकर 2024 के लोकसभा चुनावों में हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ेगी। लेकिन इसके बाद अपने किसी भी संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस मुद्दे की चर्चा न करने से लगता है कि यूसीसी को लेकर अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के विरोध का ध्यान में रखकर शायद भाजपा फिलहाल इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल सकती है। क्योंकि पूर्वोत्तर में भाजपा को सहयोगी दलों और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल से दोस्ती की जरूरत महसूस हो रही है। इसके लिए यूसीसी पर जोर न देना वक्त की ज़रूरत है।
पहले हिमाचल प्रदेश फिर कर्नाटक की शानदार जीत के बाद कांग्रेस बेहद उत्साहित है और तेलंगाना में जिस तरह कांग्रेस का ग्राफ दिनोंदिन बढ़ रहा है, उससे दक्षिण के इस नवोदित राज्य में अब मुकाबला सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और कांग्रेस के बीच होता जा रहा है। भाजपा जो तेलंगाना को लेकर बेहद उत्साहित थी, उसका आकर्षण कमजोर होता दिख रहा है, इसे ठीक करने के लिए ही पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष को बदल कर सांसद किशन रेड्डी को तेलंगाना प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना दिया है। उधर उत्साहित कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनावों में भी जीत के दावे कर रही है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सुलह कराकर कांग्रेस ने खुद को संगठित रूप से चुनाव में जाकर भाजपा से मुकाबले के लिए तैयार कर लिया है।
महाराष्ट्र में भाजपा यहीं नहीं रुकी। एक साल बाद महाविकास अघाड़ी की प्रमुख घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में सेंध लगाते हुए शरद पवार के भतीजे और राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री अजित पवार के साथ नौ विधायकों को तोड़ कर उन्हें तत्काल एकनाथ शिंदे सरकार में मंत्रिपद की शपथ भी दिला दी गई। एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार इससे बेहद आहत हैं और उन्होंने भाजपा को उसकी जगह भेजने के एलान के साथ जनता के बीच जाने का फैसला कर लिया है। उधर, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी को अव्यवस्थित करने के साथ ही अब बिहार में भाजपा ने अपने सियासी ऑपरेशन तेज कर दिए हैं। एक तरफ राज्य के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ अदालत में प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप पत्र दायर करके तेजस्वी के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। इससे सत्ताधारी महागठबंधन पर दबाव बढ़ गया है। महाराष्ट्र में दो बार ऑपरेशन लोटस के बाद भाजपा ने मीडिया के जरिए बिहार में सियासी हांका लगाना भी शुरू कर दिया है कि जल्दी ही बिहार में महागठबंधन में टूट हो सकती है। हालांकि राजद जदयू और कांग्रेस समेत महागठबंधन में शामिल सभी दलों ने इसका पुरजोर खंडन किया।
यूं तो लोकसभा चुनाव अप्रैल मई 2024 में होने हैं, लेकिन चुनावी घमासान शुरू हो चुका है। सत्ताधारी भाजपा न सिर्फ अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन को दुरुस्त कर रही है, बल्कि कुछ पुराने और नए सहयोगी भी जुटाने की कोशिश में है। महाराष्ट्र, प. बंगाल और बिहार तो उसके लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं, कर्नाटक की हार के बाद दक्षिण के राज्यों में भी भाजपा को अपनी सीटें 2019 की तुलना में बढ़ती नहीं दिख रही हैं। कर्नाटक में 2019 में अपने एक सहयोगी के साथ भाजपा ने 28 में 26 लोकसभा सीटें जीती थीं। अब बदले हुए परिदृश्य में यह संख्या बरकरार रखने की कठिन चुनौती है। इसलिए कर्नाटक में भाजपा ने जनता दल (एस) को अपने साथ लाने के लिए देवेगौड़ा परिवार से बातचीत शुरु कर दी है। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक और कुछ अन्य आंचलिक दलों के साथ भाजपा गठबंधन में है। पर्वोत्तर में मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, अरुणाचल और असम में भी कई क्षेत्रीय और आंचलिक दलों के साथ भाजपा गठबंधन में है। आंध्रप्रदेश में पार्टी चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी के बीच किसी एक साथ गठबंधन की तैयारी में है। उम्मीद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम के साथ फिर से दोस्ती करने की ज्यादा है। तेलंगाना में बीआरएस और भाजपा ने जिस तरह एक दूसरे के प्रति अपना रुख नरम किया है और बीआरएस अध्यक्ष तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की विपक्षी गठबंधन से दूरी बनी है,वह दक्षिण के इस राज्य में नए समीकरणों का संकेत है।
दोनों खेमों की इन तैयारियों के बावजूद आंतरिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। विपक्षी गठबंधन इंडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती प. बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब में सहयोगी दलों के बीच सीटों के बंटवारे की है। केरल में कांग्रेस और वाम मोर्चा आमने सामने की लड़ाई में हैं। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस वाम मोर्चे के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच राजनीतिक विरोध दुश्मनी में बदल चुका है। ऐसे में कौन किसको किस हद तक बर्दाश्त करेगा। इसी तरह दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस नेताओं कार्यकर्ताओं के बीच चूहे बिल्ली का बैर है। शीर्ष स्तर पर नेताओं की दोस्ती क्या जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं नेताओं और जनाधार को भी एकजुट कर सकेगी। क्या ये दल अपना वोट सहयोगी दल के उम्मीदवार को स्थानांतरित करवा पाएंगे। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल को किस हद तक स्वीकार करेगी और क्या इनके बीच आसानी से सीटों का बंटवारा हो पाएगा। हालांकि बिहार, तमिलनाडु, झारखंड और महाराष्ट्र में कांग्रेस और सहयोगी दलों का गठबंधन पहले से ही है। लेकिन महाराष्ट्र में कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव) और एनसीपी (शरद पवार) के बीच सीटों के बंटवारे का पेंच भी सुलझाया जाना है। कुछ पेंच बिहार में भी फंस सकता है, लेकिन उम्मीद है कि इन राज्यों में सीट बंटवारे में ज्यादा दिक्कत शायद न आए।
इसी तरह एनडीए में भी कुछ पेंच हैं। बिहार में जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा तीन तीन सीटें चाहते हैं, जबकि चिराग पासवान 2019 में लोजपा द्वारा जीती गई सभी छह सीटों पर दावा कर रहे हैं, वहीं उनके चाचा पशुपति पारस भी वही सीटें अपने कोटे में चाहते हैं। दोनों के बीच हाजीपुर की सीट जो दिवंगत रामविलास पासवान की लोकसभा सीट रही है, को लेकर भी खींचतान है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर भी कम से कम पांच लोकसभा सीटों पर दावा कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित पवार) के बीच भी सीटों को लेकर खींचतान तय है। अजित पवार ने 2019 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ी गई लोकसभा की सभी सीटों पर दावा किया है, जबकि शिवसेना (शिंदे) उन सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जो सीटें 2019 में शिवसेना के खाते में गईं थीं।
इन आंतरिक चुनौतियों में एनडीए के हक में एक बात यह है कि सहयोगी दलों के मुकाबले भाजपा की ताकत और प्रभाव काफी ज्यादा है और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय और मजबूत नेता का नाम सहयोगी दलों की सबसे बड़ी जरूरत है। इसलिए एनडीए में सीट बंटवारे पर थोड़ी बहुत शुरुआती खींचतान के बाद समझौता होने में खासी दिक्कत नहीं आनी चाहिए। जबकि विपक्षी गठबंधन इंडिया एक राष्ट्रीय दल कांग्रेस और क्षेत्रीय छत्रपों का एक ऐसा ढीला गठबंधन है, जिसमें हर दल और हर नेता की अपने अपने राज्य और प्रभाव क्षेत्र में बेहद मजबूत स्थिति है। कई राज्यों में कांग्रेस छत्रप नेताओं और सहयोगी दलों की जूनियर पार्टनर है। इसलिए इस गठबंधन नेताओं की जिद और अहम का टकराव भी एक समस्या है, जिसे बेहद करीने और परिपक्वता से सुलझाने की जरूरत है। उम्मीद है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे इसमें कारगर साबित होंगे और छत्रप नेताओं को भी अपने अहम को किनारे रखना होगा। जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो अगर विपक्षी गठबंधन इंडिया में भ्रष्टाचार के सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव और तमाम जांच के घेरे में आने वाले कई नेता हैं, तो सत्ताधारी गठबंधन एनडीए में भी कई तरह की जांच का सामना करने वाले विभिन्न दलों के नेता और सजा पा चुके जजपा नेता अजय चौटाला भी हैं। इसलिए यह मुद्दा जनता के बीच कितना असर डालेगा यह भी एक सवाल है। इसी तरह परिवार आधारित दल और नेता भी दोनों ही तरफ हैं। कुल मिलाकर अभी तक जो परिस्थिति बन रही है, उसके हिसाब से 2024 का लोकसभा चुनाव 2019 से अलग दिखाई दे रहा है। लेकिन उसके पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की चुनौती भी कांग्रेस और भाजपा के सामने है। इनके चुनाव नतीजे भी क्या संकेत देंगे इसका जवाब इसी साल नवंबर दिसंबर में मिलेगा।
(साभार- अमर उजाला डिजिटल)
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