खबरों की गहरी समझ रखनेवाले राणा य़शवंत आईआईएमसी के छात्र रह चुके हैं और कई जाने-माने चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
आईटीवी नेटवर्क (ITV Network) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर ये है कि ‘इंडिया न्यूज’ (India News) चैनल के मैनेजिंग एडिटर रह चुके राणा यशवंत ने इस समूह में जोरदार तरीके से वापसी की है। अब उन्हें ‘इंडिया न्यूज नेटवर्क’ (India News Network) का मैनेजिंग एडिटर बनाया गया है। समाचार4मीडिया से बातचीत में राणा यशवंत ने इस खबर पर अपनी मुहर लगा दी है।
बता दें कि राणा यशवंत ने इसी साल अप्रैल में ‘इंडिया न्यूज’ में मैनेजिंग एडिटर (प्रोग्रामिंग और ब्रैंडेड कंटेंट) के पद से इस्तीफा दे दिया था। फिलहाल वे अपने नए वेंचर यूट्यूब चैनल ‘द फ्रंट’ (The Front) में बतौर संपादक अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
खबरों की दुनिया में रहने और खबरों की गहरी समझ रखनेवाले राणा य़शवंत मूलत: बिहार के छपरा जिले के रामपुर कला गांव के रहने वाले हैं और वहीं से उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की है। इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने पटना में रहकर की। बाद में वे बनारस आ गए और यहां रहकर उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की। वे आईआईएमसी के 1996-97 बैच के छात्र रह चुके हैं और कई जाने-माने चैनलों में भी विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। इनमें ‘जी न्यूज’, ‘आजतक’, ‘महुआ’ और ‘इंडिया न्यूज’ जैसे चैनल शामिल है।
उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। ‘अर्धसत्य’ कार्यक्रम के लिए उन्हें रेड इंक अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। साल 2012 में उन्हें राजीव गांधी ग्लोबल एक्सिलेंस अवॉर्ड भी मिल चुका है। वर्ष 2016 में उनका काव्य संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ भी मार्केट में आया था, जिसने काफी प्रशंसा बटोरी थी। समाचार4मीडिया की ओर से राणा यशवंत को नई पारी के लिए शुभकामनाएं।
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केरल हाई कोर्ट से राहत मिलने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जल्द ही BARC को नई टीवी रेटिंग नीति लागू करने का निर्देश दे सकता है। नई व्यवस्था में लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को रेटिंग्स से बाहर रखा जाएगा।
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Samachar4media Bureau
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) जल्द ही ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया को टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी 2026 लागू करने का निर्देश दे सकता है। केरल हाई कोर्ट द्वारा पॉलिसी पर लगी अंतरिम रोक हटाए जाने के बाद अब टीवी रेटिंग्स से लैंडिंग पेज के जरिए मिलने वाली व्यूअरशिप को बाहर रखा जाएगा। उद्योग सूत्रों के अनुसार, BARC अगले सप्ताह नई पद्धति के तहत टीवी रेटिंग्स जारी कर सकता है।
नई व्यवस्था के लागू होने के बाद पहली बार भारत की टीवी ऑडियंस मेजरमेंट प्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। इससे विभिन्न चैनलों की रैंकिंग, विज्ञापन दरों और वितरण रणनीतियों पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है। पॉलिसी के अनुसार, यदि सेट-टॉप बॉक्स ऑन करते ही कोई चैनल अपने आप खुलता है, तो उस शुरुआती व्यूअरशिप को टीवी रेटिंग में शामिल नहीं किया जाएगा। हालांकि, यदि दर्शक उसी चैनल को अपनी इच्छा से देखते रहते हैं, तो बाद की व्यूअरशिप को गिना जाएगा।
हालांकि, उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि BARC का लंबित लाइसेंस नवीनीकरण फिलहाल अलग प्रक्रिया है। इसमें बोर्ड का पुनर्गठन, गवर्नेंस सुधार और तेजी से बढ़ रही कनेक्टेड टीवी (CTV) व्यूअरशिप को मापने के लिए भविष्य की रणनीति जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं। इसलिए लाइसेंस नवीनीकरण में अधिक समय लग सकता है, लेकिन इससे नई रेटिंग प्रणाली लागू होने में कोई बाधा नहीं आएगी।
BARC ने अदालत में सरकार का समर्थन करते हुए कहा कि लैंडिंग पेज दर्शकों की वास्तविक पसंद नहीं बल्कि फोर्स्ड व्यूइंग (अनैच्छिक देखने) को बढ़ावा देते हैं, जिससे कुछ चैनलों की रेटिंग कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है। वहीं विज्ञापन एजेंसियों ने नई व्यवस्था का स्वागत करते हुए कहा कि इससे टीवी रेटिंग्स अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनेंगी तथा विज्ञापन निवेश वास्तविक दर्शक व्यवहार के आधार पर तय किया जा सकेगा।
हालांकि, कुछ प्रसारकों ने BARC की तकनीकी तैयारी और लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को पूरी तरह अलग करने की क्षमता पर सवाल भी उठाए हैं। उनका मानना है कि नीति लागू करना आसान है, लेकिन करोड़ों टीवी घरों में इसे तकनीकी रूप से सटीक तरीके से लागू करना बड़ी चुनौती होगी। इसके बावजूद सरकार की प्राथमिकता फिलहाल नई रेटिंग प्रणाली को जल्द लागू करना है, जबकि BARC में संरचनात्मक सुधार और लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
भारत में टेलीविजन विज्ञापनों की समय सीमा (Ad Duration) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत में टेलीविजन विज्ञापनों की समय सीमा (Ad Duration) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर विज्ञापन इंडस्ट्री तीन हिस्सों में बंटी नजर आ रही है। Advertising Agencies Association of India (AAAI) का कहना है कि विज्ञापनों की अवधि तय करने का फैसला मार्केट पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वहीं Indian Society of Advertisers (ISA) ने प्रति घंटे विज्ञापनों की सीमा बढ़ाकर 15 मिनट करने की मांग की है। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स ने सरकार से इस पूरे मामले में किसी भी तरह के नियामकीय हस्तक्षेप (Regulatory Forbearance) को खत्म करने और पूरी आजादी देने की मांग दोहराई है।
ये अलग-अलग राय इस सप्ताह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) और इंडस्ट्री से जुड़े प्रमुख संगठनों AAAI, ISA, Indian Broadcasting and Digital Foundation (IBDF) तथा News Broadcasters & Digital Association (NBDA) के बीच हुई बैठकों में सामने आई। मंत्रालय फिलहाल Cable Television Networks Rules के तहत लागू विज्ञापन अवधि के नियमों की समीक्षा कर रहा है।
बैठक से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ISA ने मौजूदा विज्ञापन सीमा को बढ़ाने का सुझाव दिया है। फिलहाल एक घंटे में 20 फीसदी यानी 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की अनुमति है। ISA का प्रस्ताव है कि इसे बढ़ाकर 25 फीसदी, यानी 15 मिनट प्रति घंटे किया जाए। विज्ञापनदाताओं के संगठन का कहना है कि इससे ब्रॉडकास्टर्स की कमाई बढ़ेगी और दर्शकों के देखने के अनुभव पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
बैठक में शामिल एक सूत्र ने बताया कि यह प्रस्ताव ब्रॉडकास्टर्स की आय और दर्शकों के हितों के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से दिया गया है। उनका कहना है कि टीवी इंडस्ट्री की मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए यह बढ़ोतरी बहुत अधिक नहीं है और इससे दर्शकों पर विज्ञापनों का बोझ भी नहीं बढ़ेगा।
हालांकि AAAI ने इस मुद्दे पर बिल्कुल अलग रुख अपनाया। संगठन ने मंत्रालय से कहा कि विज्ञापनों की अवधि सरकार तय न करे, बल्कि इसे पूरी तरह मार्केट की मांग और प्रतिस्पर्धा पर छोड़ दिया जाए।
AAAI का कहना है कि आज टेलीविजन चैनल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं। डिजिटल मीडिया पर विज्ञापन दिखाने की अवधि को लेकर कोई कानूनी सीमा नहीं है, जबकि टीवी पर अब भी सख्त नियम लागू हैं।
बैठक से जुड़े एक अन्य सूत्र के अनुसार, AAAI ने मंत्रालय से कहा कि जब डिजिटल मीडिया पर विज्ञापनों की कोई सीमा नहीं है, तो सिर्फ टेलीविजन पर सीमा लागू रखना प्रतिस्पर्धा के लिहाज से असमान स्थिति पैदा करता है। ऐसे में कंटेंट और विज्ञापनों के बीच संतुलन तय करने का अधिकार मार्केट को ही मिलना चाहिए।
AAAI ने मंत्रालय से यह भी आग्रह किया कि टेलीविजन ऑडियंस रेटिंग्स (TV Ratings) जल्द से जल्द दोबारा शुरू की जाएं। संगठन का कहना है कि विज्ञापनदाता और एजेंसियां मीडिया प्लानिंग और निवेश से जुड़े फैसले विश्वसनीय और पारदर्शी रेटिंग्स के आधार पर ही लेते हैं।
वहीं ब्रॉडकास्टर्स ने विज्ञापन सीमा बढ़ाने की मांग नहीं की, लेकिन सरकार से इस पूरे क्षेत्र में नियामकीय छूट देने की अपनी पुरानी मांग दोहराई।
IBDF का कहना है कि इस मामले में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, क्योंकि दर्शकों का व्यवहार खुद ही मार्केट को नियंत्रित करता है। संगठन के अनुसार, यदि कोई चैनल जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाता है तो दर्शक चैनल बदल देते हैं। इससे उसकी टीआरपी गिरती है और अंततः विज्ञापन से होने वाली कमाई भी कम हो जाती है।
बैठक में मौजूद एक सूत्र ने कहा कि दर्शकों के हाथ में रिमोट होता है। यदि उन्हें लगता है कि किसी चैनल पर जरूरत से ज्यादा विज्ञापन आ रहे हैं तो वे तुरंत दूसरा चैनल देखना शुरू कर देते हैं। यही मार्केट का प्राकृतिक संतुलन है और यह अपने आप एक प्रभावी सेल्फ-रेगुलेशन का काम करता है।
News Broadcasters & Digital Association (NBDA) ने भी नियामकीय छूट की मांग का समर्थन किया, लेकिन साथ ही न्यूज चैनलों की अलग आर्थिक चुनौतियों पर भी जोर दिया।
चर्चा में मौजूद लोगों के अनुसार, NBDA ने मंत्रालय को बताया कि मौजूदा विज्ञापन सीमा का ढांचा 2006 में बनाया गया था। उस समय टीवी इंडस्ट्री की परिस्थितियां आज की तुलना में बिल्कुल अलग थीं।
NBDA का कहना है कि मनोरंजन चैनलों के मुकाबले न्यूज चैनलों का कंटेंट बार-बार नहीं दिखाया जा सकता। उन्हें पूरे दिन लगातार लाइव रिपोर्टिंग, नई खबरें और ताजा कंटेंट तैयार करना पड़ता है, जिस पर भारी खर्च आता है। इसके अलावा चुनाव, प्राकृतिक आपदा, आपातकाल और राष्ट्रीय महत्व की अन्य घटनाओं के दौरान न्यूज चैनल सार्वजनिक सेवा की भी अहम भूमिका निभाते हैं।
एक सूत्र ने बताया कि NBDA का कहना था कि न्यूज चैनलों के खर्च पर तो कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन उनकी कमाई पर सख्त नियम लागू हैं। इससे एक असंतुलन पैदा होता है, खासकर तब जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय सभी पक्षों की राय जानने के बाद भविष्य की नीति पर फैसला लेना चाहता है। जहां विज्ञापनदाता सीमित बढ़ोतरी के पक्ष में हैं, वहीं विज्ञापन एजेंसियां पूरी तरह मार्केट आधारित व्यवस्था चाहती हैं। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स का मानना है कि प्रतिस्पर्धा और दर्शकों का व्यवहार ही जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाने पर स्वाभाविक रोक लगाने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए सरकारी सीमा तय करने की जरूरत नहीं है।
पृष्ठभूमि
साल 2012 में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की सीमा तय की थी। TRAI का कहना था कि यह फैसला दर्शकों के हितों की रक्षा करने और उनका देखने का अनुभव बेहतर बनाने के लिए लिया गया है।
ब्रॉडकास्टर्स ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि विज्ञापन का समय पूरी तरह व्यावसायिक फैसला है और इस मामले में TRAI अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चला गया है।
यह मामला एक बार फिर तब चर्चा में आया, जब मई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने TRAI के इस अधिकार को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि विज्ञापन सीमा तय करने का नियम व्यापक जनहित में है।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद टीवी इंडस्ट्री में विज्ञापन नियमों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। खासकर ऐसे समय में, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन अवधि को लेकर कोई समान प्रतिबंध लागू नहीं है। एक ओर विज्ञापनदाता सीमित बढ़ोतरी चाहते हैं, दूसरी ओर विज्ञापन एजेंसियां मार्केट आधारित व्यवस्था की मांग कर रही हैं, जबकि ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि दर्शकों की पसंद और मार्केट की प्रतिस्पर्धा ही इस क्षेत्र को संतुलित रखने के लिए पर्याप्त है।
मीडिया कंपनी एनडीटीवी (NDTV) ने वित्त वर्ष 2026-27 (Q1 FY27) की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं। कंपनी की आय (Revenue) में सालाना आधार पर अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है
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टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी 2026 के विवादित लैंडिंग पेज (Landing Page) प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केरल हाईकोर्ट इस सप्ताह 24 जुलाई को अपना फैसला सुना सकता है।
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टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी 2026 के विवादित लैंडिंग पेज (Landing Page) प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केरल हाई कोर्ट इस सप्ताह 24 जुलाई को अपना फैसला सुना सकता है। मंगलवार को लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) और DEN Networks की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कठपालिया ने केंद्र सरकार की नई नीति पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी 2026 ऐसे प्रावधान लागू करने की कोशिश कर रही है, जिन्हें सीधे तौर पर लागू नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार कार्यकारी नीति (Executive Policy) के जरिए उन लैंडिंग पेज नियमों को दोबारा लागू करना चाहती है, जिन्हें पहले भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) लागू करने में सफल नहीं हो पाया था। उनका यह भी कहना है कि इसी मुद्दे से जुड़े मामले फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित हैं।
अब मीडिया और ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की नजर 24 जुलाई को आने वाले केरल हाई कोर्ट के फैसले पर है। माना जा रहा है कि यह फैसला टीवी रेटिंग व्यवस्था और केबल डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े नियमों पर आगे की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकता है।
PVR INOX के जून 2026 तिमाही में मुनाफे में लौटने की उम्मीद है। बड़ी फिल्मों की सफलता और मजबूत बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से कंपनी को फायदा मिल सकता है।
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देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन PVR INOX जून 2026 तिमाही में एक बार फिर मुनाफे में लौट सकती है। Moneycontrol की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान रिलीज हुई कई बड़ी फिल्मों और महामारी के बाद भारतीय सिनेमा के सबसे मजबूत पहले छह महीनों की बदौलत कंपनी का प्रदर्शन बेहतर रहने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में 'Peddi', 'Karuppu', 'Bhooth Bangla', 'Vaazha 2' और 'Drishyam 3' जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया। इसके चलते पूरे इंडस्ट्री का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 12.1% बढ़कर 2,760 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
कोविड के बाद सबसे शानदार रहा पहला छह महीनों का कारोबार
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए जनवरी से जून 2026 का समय बेहद शानदार रहा। इस दौरान देशभर में फिल्मों का कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 6,398 करोड़ रुपये रहा, जो कोविड महामारी के बाद किसी भी साल की पहली छमाही का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
इसी अवधि में सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या भी बढ़ी। करीब 37.8 करोड़ लोगों ने थिएटर में फिल्में देखीं, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 5% अधिक है। इससे पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही ठहराव की स्थिति भी टूटी है।
'धुरंधर: द रिवेंज' ने दिया बड़ा सहारा
इस बढ़त में आदित्य धर की फिल्म 'Dhurandhar: The Revenge' की बड़ी भूमिका रही। रिपोर्ट के मुताबिक, इस फिल्म ने अकेले भारत की पहली छमाही के कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में करीब 20% योगदान दिया। यह 2026 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल रही और थिएटर कारोबार को नई रफ्तार देने में मददगार साबित हुई।
जून तिमाही में मुनाफे की उम्मीद
ब्रोकरेज फर्म प्रभुदास लीलाधर, के अनुसार PVR INOX जून तिमाही में 21.8 करोड़ रुपये का समायोजित शुद्ध लाभ (Adjusted PAT) दर्ज कर सकती है। पिछले साल की समान अवधि में कंपनी को 54 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।
वहीं, कंपनी की आय (Revenue) 12.5% बढ़कर 1,652 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
बढ़ेंगे दर्शक और टिकट से कमाई
रिपोर्ट के अनुसार, जून तिमाही में PVR INOX के सिनेमाघरों में आने वाले दर्शकों की संख्या 7% बढ़कर 3.64 करोड़ तक पहुंच सकती है।
इसके साथ ही औसत टिकट कीमत बढ़कर 268 रुपये और प्रति ग्राहक फूड एंड बेवरेज (F&B) पर खर्च बढ़कर 160 रुपये रहने का अनुमान है। इससे संकेत मिलता है कि दर्शक अब सिनेमाघरों में पहले की तुलना में अधिक खर्च कर रहे हैं।
मार्च तिमाही में भी कंपनी ने की थी वापसी
इससे पहले मार्च 2026 तिमाही में भी PVR INOX ने मजबूत प्रदर्शन किया था। कंपनी ने 186.7 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया था, जबकि उसकी आय में लगभग 26% की बढ़ोतरी हुई थी। उस दौरान 'Dhurandhar: The Revenge', 'Border 2' और 'Project Hail Mary' जैसी फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया था।
दूसरी छमाही से भी बड़ी उम्मीदें
विश्लेषकों का मानना है कि साल की दूसरी छमाही में 'Ramayana', 'King' और 'Love & War' जैसी बड़ी फिल्मों की रिलीज से सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या और बढ़ सकती है।
इंडस्ट्री के जानकारों का अनुमान है कि अगर मौजूदा रफ्तार बनी रही तो 2026 में भारत का कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 15,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है, जो अब तक के वार्षिक रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकता है।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ने भी केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए अदालत में कहा कि लैंडिंग पेज पर दिखाई देने वाली व्यूअरशिप वास्तविक दर्शकों की पसंद नहीं, बल्कि "फोर्स्ड व्यूइंग" होती है।
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केरल हाई कोर्ट में मंगलवार को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी, 2026 को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। विवाद का केंद्र नीति की वह धारा है, जिसके तहत टीवी सेट-टॉप बॉक्स के "लैंडिंग पेज" से मिलने वाली दर्शक संख्या (व्यूअरशिप) को आधिकारिक टीवी रेटिंग (टीआरपी) में शामिल नहीं किया जाएगा। ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) और डेन नेटवर्क्स (DEN Networks) ने इस प्रावधान को चुनौती देते हुए कहा है कि केंद्र सरकार वही काम अप्रत्यक्ष रूप से कर रही है, जिसे भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) सीधे तौर पर लागू नहीं कर सका था और जिस पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण काथपालिया ने अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में ट्राई ने प्रसारकों और वितरकों को लैंडिंग पेज पर रेटेड चैनलों को रखने से रोकने का निर्देश जारी किया था। हालांकि, दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (TDSAT) ने इस निर्देश को रद्द कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि वितरकों के व्यावसायिक अधिकारों पर रोक केवल ट्राई अधिनियम की धारा 36 के तहत विधिवत बनाए गए विनियमों (Regulations) के माध्यम से ही लगाई जा सकती है, न कि केवल प्रशासनिक आदेश से। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई टीवी रेटिंग नीति लैंडिंग पेज पर चैनल दिखाने पर सीधे रोक नहीं लगाती, लेकिन उसकी व्यूअरशिप को टीआरपी से बाहर करके उसकी व्यावसायिक उपयोगिता समाप्त कर देती है। उनका कहना है कि सरकार वह परिणाम हासिल करना चाहती है, जिसे सीधे लागू करने पर कानूनी विवाद है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के टाटा प्रेस, साकाल पेपर्स और बेनेट कोलमैन जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विज्ञापन और व्यावसायिक अभिव्यक्ति भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। इसलिए विज्ञापन से जुड़े आर्थिक अधिकारों को प्रभावित करना मौलिक अधिकारों पर प्रत्यक्ष असर डालता है।
वहीं केंद्र सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि यह नीति केवल रेटिंग मापने की कार्यप्रणाली (Measurement Methodology) से जुड़ी है और इसमें न तो लैंडिंग पेज पर चैनल रखने पर रोक है और न ही विज्ञापन देने पर। सरकार का कहना है कि केवल इतना तय किया गया है कि लैंडिंग पेज से उत्पन्न व्यूअरशिप को आधिकारिक टीआरपी गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला ट्राई के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से संबंधित है, जबकि वर्तमान विवाद पूरी तरह रेटिंग पद्धति का है, इसलिए दोनों मामलों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने भी केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए अदालत में कहा कि लैंडिंग पेज पर दिखाई देने वाली व्यूअरशिप वास्तविक दर्शकों की पसंद नहीं, बल्कि "फोर्स्ड व्यूइंग" होती है। BARC के अनुसार, उसकी डेटा वैलिडेशन क्वालिटी इनिशिएटिव और 2020 में लागू किए गए लैंडिंग पेज एल्गोरिद्म से यह पाया गया था कि इस तरह की व्यूअरशिप टीआरपी को कृत्रिम रूप से बढ़ाती है। इसलिए नई नीति केवल उसी सिद्धांत को औपचारिक रूप से लागू करती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया जाता है। हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि BARC का मौजूदा एल्गोरिद्म पहले से ही ऐसी गड़बड़ियों को रोकता है और सरकार ने यह साबित नहीं किया कि वह व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी।
दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने कहा कि वह सभी तर्कों पर विचार करने के बाद शुक्रवार को अंतरिम राहत से जुड़े मामले पर आदेश देंगे। इस मामले पर पूरे प्रसारण उद्योग, केबल और डीटीएच कंपनियों, विज्ञापनदाताओं तथा BARC की नजर है, क्योंकि अदालत का फैसला भविष्य में भारत में टीवी रेटिंग प्रणाली और लैंडिंग पेज विज्ञापनों के व्यावसायिक महत्व को प्रभावित कर सकता है।
विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) और राज नायक (Raj Nayak) का पेशेवर संबंध काफी पुराना है। दोनों ने स्टार इंडिया (Star India) में साथ काम किया था।
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मीडिया और मनोरंजन उद्योग के वरिष्ठ पेशेवर विकास खनचंदानी का दंगल टीवी (Dangal TV) के साथ कंसल्टिंग अनुबंध जल्द समाप्त होने वाला है। इस घटनाक्रम की पुष्टि उद्योग से जुड़े सूत्रों ने की है। दंगल टीवी के साथ अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सलाहकार (Advisor) के रूप में नेटवर्क की रणनीतिक दिशा तय करने और उसके विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विकास खनचंदानी ने दंगल टीवी के लिए बिजनेस स्ट्रैटेजी (Business Strategy), डिस्ट्रीब्यूशन (Distribution) और तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल तथा FAST (Free Ad-Supported Streaming Television) इकोसिस्टम से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में योगदान दिया।
वर्तमान में विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर की कई कंपनियों के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हुए हैं। वह दीपक धर (Deepak Dhar) के नेतृत्व वाली बनिजय एशिया (Banijay Asia) के साथ भी कंसल्टिंग भूमिका निभा रहे हैं, जो देश की प्रमुख कंटेंट प्रोडक्शन कंपनियों में शामिल है।
इस घटनाक्रम के बाद उद्योग में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) राज नायक (Raj Nayak) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (Chairman & Managing Director) बनने के बाद YAAP Digital के साथ कंसल्टिंग भूमिका में जुड़ सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में न तो विकास खनचंदानी और न ही YAAP Digital की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि की गई है।
विकास खनचंदानी (Vikas Khanchandani) और राज नायक (Raj Nayak) का पेशेवर संबंध काफी पुराना है। दोनों ने स्टार इंडिया (Star India) में साथ काम किया था, जहां विकास खनचंदानी ने अपने मीडिया करियर की शुरुआत सेल्स और मार्केटिंग रणनीतियों से की थी।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा टीवी ऑडियंस रेटिंग्स (TRP) जारी किए जाने पर लगी रोक का असर अब टीवी इंडस्ट्री के अंदर साफ तौर पर दिखने लगा है।
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ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा टीवी ऑडियंस रेटिंग्स (TRP) जारी किए जाने पर लगी रोक का असर अब टीवी इंडस्ट्री के अंदर साफ तौर पर दिखने लगा है। अब तक जहां चैनलों के प्रोग्रामिंग प्रमुख हर सप्ताह मिलने वाली रेटिंग्स के आधार पर नए शो, कहानी, टाइम स्लॉट और कलाकारों से जुड़े फैसले लेते थे, वहीं अब उन्हें बिना किसी ठोस दर्शक डेटा के ही निर्णय लेने पड़ रहे हैं।
अब तक इस फैसले को विज्ञापन कारोबार के नजरिए से देखा जा रहा था, लेकिन टीवी इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा असर कंटेंट और प्रोग्रामिंग टीमों पर पड़ रहा है। ये टीमें किसी भी शो के प्रदर्शन का आकलन करने और आगे की रणनीति तय करने के लिए BARC की रेटिंग्स पर काफी हद तक निर्भर रहती थीं। ऐसे समय में जब टीवी चैनल त्योहारी सीजन की तैयारी में जुटे हैं और बड़े पैमाने पर नए शो लॉन्च कर रहे हैं, रेटिंग्स का न होना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने BARC को निर्देश दिया था कि वह नई टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पंजीकरण पूरा होने तक सभी श्रेणियों की टीवी रेटिंग्स प्रकाशित करना बंद कर दे। इसके बाद पूरे टीवी उद्योग के पास प्रदर्शन मापने का साझा और विश्वसनीय पैमाना फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
नए शो लॉन्च हो रहे, लेकिन नहीं मिल रहा दर्शकों का फीडबैक
पिछले कुछ हफ्तों में कई बड़े मनोरंजन चैनलों ने अपने नए शो लॉन्च किए हैं। इनमें Star Plus का 'Sairaab', Colors का 'Juhi Mui', Zee TV के 'Tu Hi Re Dil Mein' और 'Dilo Ki Ram Leela', तथा Sony SAB का 'Hastinapur Ke Veer' शामिल हैं।
आम तौर पर इन शो के प्रसारण के बाद प्रोग्रामिंग टीमें हर हफ्ते आने वाली रेटिंग्स का विश्लेषण करतीं और यह तय करतीं कि कहानी, कलाकार, प्रोमोशन या टाइम स्लॉट में किसी बदलाव की जरूरत है या नहीं। लेकिन अब ये सभी फैसले बिना दर्शकों के वास्तविक डेटा के लिए जा रहे हैं।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह स्थिति सिर्फ शो के प्रदर्शन का आकलन करने में देरी नहीं कर रही, बल्कि टीवी चैनलों की जोखिम लेने की क्षमता पर भी असर डाल सकती है। खासकर ऐसे समय में, जब त्योहारी सीजन टीवी कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण दौर माना जाता है।
'अब डेटा नहीं, अनुभव के भरोसे हो रहे फैसले'
मार्केटिंग विशेषज्ञ और कॉलमनिस्ट शुभ्रांशु सिंह का कहना है कि BARC रेटिंग्स बंद होने से यह साफ हो गया है कि टीवी इंडस्ट्री किस हद तक लगातार मिलने वाले दर्शक डेटा पर निर्भर हो चुकी है।
उनके मुताबिक, टीवी इंडस्ट्री में लंबे समय से भरोसे के साथ रेटिंग्स का इस्तेमाल किया जाता रहा है। अब रेटिंग्स नहीं होने पर चैनलों को वैकल्पिक आंकड़ों जैसे Connected TV, डिजिटल व्यूअरशिप, रीच अनुमान और अन्य स्वतंत्र मापन उपकरणों पर ज्यादा भरोसा करना पड़ सकता है।
हालांकि उनका मानना है कि सबसे ज्यादा असर प्रोग्रामिंग टीमों पर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों (GEC) की प्रोग्रामिंग हर सप्ताह मिलने वाले मिनट-दर-मिनट डेटा के आधार पर लगातार बदली जाती है। अब फैसले अनुभव और अनुमान के आधार पर लिए जा रहे हैं। यह रचनात्मक प्रक्रिया के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन बजट और कारोबारी बैठकों में ऐसे फैसलों को सही ठहराना आसान नहीं होगा।
उनका कहना है कि जब किसी के पास स्पष्ट डेटा नहीं होता तो संस्थाएं आमतौर पर सुरक्षित विकल्प चुनती हैं और नए प्रयोगों से बचती हैं।
त्योहारी सीजन में बढ़ी चिंता
शुभ्रांशु सिंह के अनुसार, त्योहारी सीजन वह समय होता है जब नए शो लॉन्च होते हैं, विज्ञापन खर्च बढ़ता है और प्रीमियम विज्ञापन स्लॉट की सबसे ज्यादा मांग रहती है। ऐसे में रेटिंग्स उपलब्ध न होने से विज्ञापन दर तय करना भी मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने कहा कि बड़े शो भले ही विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करते रहें, लेकिन वे कार्यक्रम जिनकी प्रीमियम कीमतें रेटिंग्स के आधार पर तय होती थीं, उन्हें ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यूज चैनलों के पास डिजिटल प्लेटफॉर्म पर YouTube, ऐप ट्रैफिक और सोशल मीडिया जैसे कई रियल-टाइम संकेत उपलब्ध हैं, लेकिन ये टीवी दर्शकों का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए किसी नए शो की सफलता का आकलन फिलहाल उसके प्रभाव और चर्चा के आधार पर होगा, न कि किसी आधिकारिक आंकड़े से।
न्यूजरूम में भी बदल रहा है फैसला लेने का तरीका
शुभ्रांशु सिंह का कहना है कि टीवी न्यूज रूम में भी रेटिंग्स न होने से निर्णय लेने का तरीका बदल गया है।
उनके मुताबिक, अब वह स्कोरबोर्ड ही नहीं रहा जिसके आधार पर संपादकीय फैसलों की तुलना की जाती थी। ऐसे में संपादकीय अनुभव और निर्णय क्षमता फिर से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
हालांकि उनका यह भी मानना है कि जब अलग-अलग कार्यक्रमों के प्रदर्शन का स्पष्ट डेटा नहीं होगा, तो ज्यादातर चैनल सुरक्षित और एक जैसे फॉर्मेट अपनाने लगेंगे। इसका सबसे ज्यादा असर नए और तेजी से आगे बढ़ रहे चैनलों पर पड़ सकता है।
'हर गुरुवार का कामकाज प्रभावित हुआ'
SUN Udaya की प्रोग्रामिंग हेड वैष्णवी एचएस का कहना है कि साप्ताहिक BARC रेटिंग्स हमेशा से प्रोग्रामिंग और क्रिएटिव टीमों के लिए निर्णय लेने का सबसे महत्वपूर्ण आधार रही हैं। उन्होंने कहा कि BARC रेटिंग्स न मिलने से सिर्फ उनका हर गुरुवार प्रभावित नहीं हुआ है, बल्कि नए शो और नए आईपी (IP) लॉन्च करने की योजना बनाना भी मुश्किल हो गया है।
हालांकि वह मानती हैं कि हर चुनौती अपने साथ नए अवसर भी लेकर आती है।
उनके मुताबिक, जिस तरह कोविड-19 के दौरान इंडस्ट्री ने नए प्रयोग किए थे, उसी तरह यह दौर भी प्रोग्रामिंग में नए प्रयोगों के लिए अवसर बन सकता है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल उनकी टीम अपने अनुभव, ब्रांड की ताकत और पिछले वर्षों की रेटिंग्स के आधार पर दर्शकों के व्यवहार का अनुमान लगा रही है। साथ ही उम्मीद है कि त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले BARC रेटिंग्स दोबारा शुरू हो जाएंगी।
'डेटा नहीं तो सबसे ऊंची आवाज ही सच बन जाएगी'
Sales Strategist LLP के संस्थापक और Connected TV विशेषज्ञ विशाल खन्ना का कहना है कि यह सिर्फ अस्थायी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव है।
उनके मुताबिक, टीवी प्रोग्रामिंग पूरी तरह साप्ताहिक फीडबैक सिस्टम पर चलती है। सप्ताह के बीच में डेटा आता है और उसी के आधार पर सप्ताहांत तक कलाकार, कहानी, टाइम स्लॉट और अन्य बदलाव किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि अब यह प्रक्रिया धीमी नहीं हुई है, बल्कि पूरी तरह टूट गई है। फैसले अब भी लिए जा रहे हैं, लेकिन बिना किसी मापन प्रणाली के।
विशाल खन्ना का कहना है कि जब निष्पक्ष आंकड़े उपलब्ध नहीं होते, तब संगठन में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति की राय ही सबसे बड़ा 'डेटा' बन जाती है।
उन्होंने कहा कि पहले जिन फैसलों का आधार आंकड़े होते थे, अब वे वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर लिए जा रहे हैं। इनमें कुछ फैसले सही भी होंगे, लेकिन यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं होगा कि कौन-सा फैसला वास्तव में सफल रहा।
नए शो लॉन्च करने से भी बच सकते हैं चैनल
विशाल खन्ना का मानना है कि इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर उन नए कार्यक्रमों पर पड़ेगा जिन्हें अभी मंजूरी मिलनी है। उनके मुताबिक, कोई भी प्रोग्रामिंग प्रमुख ऐसी स्थिति में किसी नए और जोखिम वाले शो को लॉन्च नहीं करना चाहेगा, जब उसके प्रदर्शन को मापने का कोई भरोसेमंद तरीका ही मौजूद न हो।
ऐसे में पहले से सफल फॉर्मेट को आगे बढ़ाया जाएगा, लोकप्रिय चेहरों को फिर से मौका मिलेगा और नए प्रयोगों को कुछ समय के लिए टाल दिया जाएगा।
उनका कहना है कि BARC रेटिंग्स पर लगी रोक सिर्फ दर्शकों की माप को नहीं रोक रही, बल्कि यह चुपचाप यह भी तय कर रही है कि आने वाले महीनों में टीवी पर किस तरह के शो बनेंगे और कौन-से नहीं।
अनुभव और अनुमान के सहारे आगे बढ़ रही इंडस्ट्री
कुल मिलाकर, टीवी इंडस्ट्री फिलहाल ऐसे दौर से गुजर रही है जहां नए शो लॉन्च हो रहे हैं, विज्ञापन सौदे भी हो रहे हैं और प्रोग्रामिंग टीमों को हर सप्ताह फैसले भी लेने पड़ रहे हैं। लेकिन BARC के दर्शक आंकड़ों के बिना अब ये निर्णय वास्तविक डेटा के बजाय अनुभव, अनुमान और पुराने रुझानों के आधार पर लिए जा रहे हैं। ऐसे में टीवी इंडस्ट्री के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी सीजन से ठीक पहले यह बदलाव आने वाले महीनों में चैनलों की कंटेंट रणनीति और नए शो लॉन्च करने के तरीके को भी प्रभावित कर सकता है।
देश की DTH और केबल टीवी कंपनियों ने सरकार से मांग की है कि टीवी सेवाएं चाहे सैटेलाइट, केबल या इंटरनेट के जरिए दी जाएं, सभी के लिए एक जैसे नियम बनाए जाएं।
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Samachar4media Bureau
देश की DTH और केबल टीवी कंपनियों ने सरकार से मांग की है कि टीवी सेवाएं चाहे सैटेलाइट, केबल या इंटरनेट के जरिए दी जाएं, सभी के लिए एक जैसे नियम बनाए जाएं। कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग नियम होने से प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ रहा है।
यह मांग ऐसे समय में आई है, जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट के तहत Telecommunications (Television, Radio and Associated Services) Rules, 2026 को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रहा है। इन मसौदा नियमों को 12 जून को सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया गया था।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि नए नियमों में पुराने लाइसेंसिंग सिस्टम को हटाकर एक नई ऑथराइजेशन व्यवस्था लाना स्वागत योग्य कदम है। लेकिन उनका मानना है कि मसौदे में अभी भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए अलग वित्तीय और नियामकीय शर्तें रखी गई हैं, जिससे समान प्रतिस्पर्धा नहीं हो पा रही है।
फिलहाल निजी DTH कंपनियों को हर साल ऑथराइजेशन शुल्क देना पड़ता है, बैंक गारंटी जमा करनी होती है और कई तरह के नियामकीय नियमों का पालन करना पड़ता है।
वहीं, प्रसार भारती के मुफ्त DTH प्लेटफॉर्म DD Free Dish पर ऐसे नियम लागू नहीं हैं। दूसरी ओर, इंटरनेट आधारित नई सेवाएं जैसे Application-based Linear Television Distribution (ALTD) और Free Ad-supported Streaming Television (FAST) चैनल भी प्रस्तावित नियमों के दायरे से बाहर हैं।
केबल ऑपरेटर भी अभी केबल टेलीविजन नेटवर्क्स एक्ट के तहत काम कर रहे हैं। उद्योग का कहना है कि इससे भी नियामकीय असमानता बनी हुई है।
उद्योग के अधिकारियों के मुताबिक, DTH कंपनियां जल्द ही मसौदा नियमों पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया सरकार को सौंपेंगी। उनकी कई मांगें ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) द्वारा पहले से दिए गए सुझावों से मिलती-जुलती हैं।
इन मांगों में TRAI की कई पुरानी सिफारिशों को लागू करना भी शामिल है। TRAI पहले ही ALTD और FAST सेवाओं पर परामर्श प्रक्रिया पूरी कर चुका है और जल्द ही अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप सकता है।
उद्योग चाहता है कि DTH कंपनियों पर लगने वाला ऑथराइजेशन शुल्क मौजूदा 8% से घटाकर 3% किया जाए। इसके अलावा बैंक गारंटी की राशि कम करने, ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) की परिभाषा स्पष्ट करने और सरकार के ऑडिट अधिकारों पर भी स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
AIDCF ने यह भी मांग की है कि सभी टीवी प्लेटफॉर्म पर एक समान प्रोग्रामिंग और विज्ञापन संहिता (Programming & Advertisement Code) लागू हो। साथ ही DD Free Dish पर चरणबद्ध तरीके से एन्क्रिप्शन लागू किया जाए और ग्राउंड-आधारित प्रसारण सेवाओं से जुड़ी TRAI की सिफारिशों को भी नए नियमों में शामिल किया जाए।
यह मांग ऐसे समय में आई है, जब देश में पेड टीवी बाजार लगातार सिकुड़ रहा है।
FICCI-EY मीडिया एंड एंटरटेनमेंट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत में DTH ग्राहकों की संख्या घटकर 4.9 करोड़ रह गई है, जबकि दो साल पहले यह 6.2 करोड़ से अधिक थी।
इसी अवधि में लीनियर टीवी वितरण से होने वाली आय 2024 के 38,500 करोड़ रुपये से घटकर 2025 में 35,400 करोड़ रुपये रह गई। इसकी बड़ी वजह यह रही कि करीब 1.15 करोड़ परिवारों ने पेड टीवी सेवाएं लेना बंद कर दिया। हालांकि, प्रति उपभोक्ता औसत आय (ARPU) 2.4% बढ़कर 288 रुपये हो गई।
उद्योग का कहना है कि आज दर्शक एक ही टीवी चैनल को केबल, DTH और इंटरनेट- तीनों माध्यमों से देख सकते हैं। ऐसे में अलग-अलग प्लेटफॉर्म के लिए अलग नियम अब व्यावहारिक नहीं रह गए हैं।
कंपनियों का तर्क है कि यदि ALTD, FAST और DD Free Dish जैसी सेवाओं पर समान नियम लागू नहीं किए गए, तो कुछ प्लेटफॉर्म बिना अतिरिक्त लागत और नियमों का पालन किए बाजार में प्रतिस्पर्धा करेंगे, जबकि लाइसेंस प्राप्त कंपनियों पर पूरा नियामकीय बोझ बना रहेगा।
अब मीडिया, प्रसारण और निवेश जगत की नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी है। माना जा रहा है कि यदि सरकार TRAI की सिफारिशों को शामिल करते हुए सभी टीवी प्लेटफॉर्म के लिए समान नियामकीय ढांचा लागू करती है, तो इससे भारत के टीवी वितरण उद्योग की प्रतिस्पर्धा और भविष्य की दिशा पर बड़ा असर पड़ सकता है।
संसद ने सरकार के प्रस्तावित 'टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो और संबद्ध सेवाएं) नियम, 2026' पर भी चर्चा शुरू कर दी है।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
सरकार की ओर से भारत की टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट व्यवस्था में बड़े बदलाव और पूरे ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर को एकीकृत नियामक ढांचे के तहत लाने की योजना अब संसद की जांच के दायरे में आ गई है। राज्यसभा और लोकसभा, दोनों सदनों के सांसदों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) से ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के भविष्य, प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 और मसौदा टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी है।
संसद के दोनों सदनों में पूछे जाने वाले सवालों से साफ है कि सांसद सरकार की दो महत्वपूर्ण नीतिगत पहलों पर स्पष्टता चाहते हैं, जो भारत के ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर की तस्वीर बदल सकती हैं। एक ओर सवाल टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम और रेटिंग एजेंसियों के नियामक ढांचे से जुड़े हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार की उस योजना पर सवाल उठाए गए हैं, जिसके तहत टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के अंतर्गत ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े कई नियमों को एक ही ढांचे में लाने का प्रस्ताव है।
राज्यसभा में BARC और नई टीवी रेटिंग नीति पर उठे सवाल
राज्यसभा में सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनके सवालों का केंद्र BARC है, जो फिलहाल देश में टीवी दर्शकों की रेटिंग मापने वाली प्रमुख संस्था है।
उन्होंने सरकार से पूछा है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने BARC को निर्देश दिया है कि वह प्रस्तावित टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पंजीकरण पूरा होने तक सभी श्रेणियों की टीवी रेटिंग प्रकाशित करना बंद कर दे।
उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि यदि ऐसा कोई निर्देश दिया गया है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं और टीवी रेटिंग्स दोबारा कब से जारी होने की संभावना है।
डॉ. ब्रिटास ने सरकार से यह भी पूछा है कि क्या नई नीति के तहत मौजूदा व्यवस्था की जगह एक से अधिक टीवी ऑडियंस मीजरमेंट एजेंसियों को काम करने की अनुमति देने की योजना है।
इसके अलावा उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि इन एजेंसियों के चयन, पंजीकरण, मान्यता, नियमन और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हटाने की प्रक्रिया में केंद्र सरकार की क्या भूमिका होगी। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा है कि इन एजेंसियों की परिचालन और कार्यात्मक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सरकार कौन-कौन से सुरक्षा उपाय प्रस्तावित कर रही है।
उन्होंने सरकार से यह भी जानकारी मांगी है कि टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत पारदर्शिता बढ़ाने, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने, सैंपल कवरेज का विस्तार करने और टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कौन-कौन से बड़े सुधार प्रस्तावित किए गए हैं।
ये सवाल ऐसे समय में उठाए गए हैं, जब पूरा मीडिया उद्योग सरकार की नई टीवी रेटिंग व्यवस्था को लेकर नजर बनाए हुए है। संसद में उठे इन सवालों से संकेत मिलता है कि सांसद यह जानना चाहते हैं कि क्या नई नीति के तहत कई रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देकर टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम की मौजूदा संरचना में बड़ा बदलाव किया जाएगा और इस पूरे सिस्टम में सरकार की निगरानी की भूमिका क्या होगी।
ब्रॉडकास्टिंग नियमों के मसौदे पर भी दोनों सदनों में चर्चा
संसद ने सरकार के प्रस्तावित टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 पर भी सवाल उठाए हैं। इन नियमों का उद्देश्य ब्रॉडकास्टिंग से जुड़े कई मौजूदा दिशा-निर्देशों को टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के तहत एकीकृत नियामक ढांचे में शामिल करना है।
राज्यसभा में सांसद नरेश बंसल, डॉ. कविता पाटीदार और रामराव सखाराम वडकुटे ने सरकार से पूछा है कि क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इन मसौदा नियमों को जारी कर दिया है और क्या इनका उद्देश्य मौजूदा ब्रॉडकास्टिंग नियमों को एकीकृत ढांचे में लाना है।
उन्होंने सरकार से मसौदा नियमों की प्रमुख विशेषताओं, इन्हें अंतिम रूप देने और लागू करने की समयसीमा तथा नए नियामक ढांचे में उद्योग को सहज रूप से स्थानांतरित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की भी जानकारी मांगी है।
लोकसभा में भी उठे वही सवाल
यह मुद्दा लोकसभा में भी उठाया गया है, जिससे साफ है कि प्रस्तावित ब्रॉडकास्टिंग सुधार दोनों सदनों के सांसदों की प्राथमिकता में शामिल हैं।
लोकसभा सांसद मुकेशकुमार चंद्रकांत दलाल और दिनेशभाई मकवाणा ने सरकार से पूछा है कि क्या टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 का मसौदा जारी किया जा चुका है। उन्होंने इन नियमों की प्रमुख विशेषताओं की भी जानकारी मांगी है।
दोनों सांसदों ने सरकार से यह भी पूछा है कि इन नियमों को लागू करने की क्या योजना है और नए ढांचे में ब्रॉडकास्टर्स तथा अन्य संबंधित पक्षों को सहयोग देने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाएंगे।
लोकसभा सदस्यों ने यह भी जानना चाहा है कि क्या मसौदा नियमों में उभरते डिजिटल मीडिया को बढ़ावा देने, स्थानीय ब्रॉडकास्टर्स और कम्युनिटी रेडियो को मजबूत करने तथा ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में ब्रॉडकास्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर बनाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
इसके अलावा उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या सरकार प्रस्तावित ढांचे के तहत मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में नए सूचना केंद्र और कम्युनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित कर डिजिटल कनेक्टिविटी और स्थानीय प्रसारण नेटवर्क का विस्तार करने पर विचार कर रही है।
ब्रॉडकास्टिंग सुधारों पर संसद ने मांगा रोडमैप
राज्यसभा और लोकसभा में उठाए गए सवालों से स्पष्ट है कि संसद केवल सरकार के व्यापक ब्रॉडकास्टिंग सुधारों की ही समीक्षा नहीं कर रही, बल्कि भारत के टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम के भविष्य को लेकर भी जवाब चाहती है।
BARC की भूमिका, एक से अधिक रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देने की संभावना, ऑडियंस मीजरमेंट संस्थाओं की स्वतंत्रता और टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट-2023 के तहत ब्रॉडकास्टिंग नियमों के एकीकरण जैसे मुद्दों पर सांसद यह जानना चाहते हैं कि इन प्रस्तावित सुधारों का असर ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं, रेटिंग एजेंसियों, स्थानीय प्रसारकों और पूरे मीडिया उद्योग पर किस तरह पड़ेगा।
अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से उम्मीद की जा रही है कि वह संसद में इन सभी सवालों का औपचारिक जवाब देगा। माना जा रहा है कि इन जवाबों से टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत BARC के भविष्य, सरकार की टीवी ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर नीति और टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स-2026 को लागू करने के रोडमैप पर पहली आधिकारिक तस्वीर सामने आएगी।