मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को लेकर क्या-क्या बोला, पढ़ें यहां

अवॉर्ड लेने के लिए मनीला पहुंचे रवीश कुमार ने पब्लिक लेक्चर में भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Ravish Kumar

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार इस साल का प्रतिष्ठित रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड (Ramon Magsaysay Awards) पाने के लिए फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे हुए हैं। रवीश कुमार को यह अवॉर्ड दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी, लेकिन अवॉर्ड लेने से पहले मनीला में शुक्रवार को उन्होंने मैगसायसाय के मंच से पब्लिक लेक्चर दिया। इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। बता दें कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रवीश कुमार को 9 सितंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे यह अवॉर्ड दिया जाएगा।

रैमन मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने लोगों के समक्ष जो बातें कहीं, उन्हें एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर पब्लिश किया है, जिसे हम आपके समक्ष हूबहू रख रहे हैं।

‘नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है। गौरव के इस क्षण में मेरी नजर चांद पर भी है और जमीन पर भी, जहां चांद से भी ज्यादा गहरे गड्ढे हैं। दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए। यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज से। सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा। देश सही सूचनाओं से बनता है। फेक न्यूज, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है। रैमन मैगसायसाय फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं कि क्या बोल रहा हूं। आपके पास अंग्रेजी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं।

दो महीने पहले जब मैं 'Prime Time' की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया। कॉलर आईडी पर फिलीपींस फ्लैश कर रहा था। मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है। यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है। अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं।

खैर, फिलीपींस के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं। मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेजी में एक महिला की आवाज थी, ‘May I please speak to Mr Ravish Kumar?’ हजारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी। मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया। उस तरफ से आ रही आवाज मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमन मैगसायसाय पुरस्कार दिया जा रहा है। मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिंदी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है। गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है। उसमें कोई दम नहीं है। अब मैं अपने विषय पर आता हूं।

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है। नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है। यह जानते हुए कि इस समय नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से खुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा। दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है। नफरत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है। रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है। मगर असंभव नहीं है।

नागरिकता के लिए जरूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो। आज स्टेट का मीडिया और उसके बिजनेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है। मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना। मीडिया अब सर्विलांस स्टेट का पार्ट है। वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है। प्राइवेट मीडिया और गवर्नमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है। इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है। ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है।

न्यूज चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है। इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है। मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं-एक, नेशनल और दूसरे, एंटी-नेशनल। एंटी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है। असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है। उस आत्मा पर रोज हमला होता है। जब नागरिकता खतरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी। नागरिक तो दोनों हैं। जो खुद को नेशनल कहता है, और जो एंटी-नेशनल कहा जाता है।

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है और लोगों के बीच लेजिटिमाइज हो चुका है। फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा। उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया। यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है। हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं। अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली। फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया। कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया। यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है। हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से खुद ही अलग हो गए।

कश्मीर में दूसरी कहानी है। वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। क्या आप बगैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटीजन की कल्पना कर सकते हैं? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे और वह उस सिटीजन के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है।

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत। नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं। पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है। कैसे रिपोर्टिंग करनी है। इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है। बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें। जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ, जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है। यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है। मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की। पीसीआई बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया। दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है। प्रोपेगंडा के जरिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा तो उधर से गुब्बारा मार दिया। वैसे, भारत के न्यूज चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं। बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं। आप हंसें नहीं। वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए। यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटीजन जर्नलिज्म' को गढ़ना शुरू किया था। इसके जरिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटीजन जर्नलिज्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटीजन जर्नलिज्म दोनों अलग चीजें हैं। लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया। न्यूजरूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे। आज भी कई सारे न्यूजरूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के जरिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते। यह सिटीजन जर्नलिज्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ।

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एंटी-नेशनल बताने लगेगा। मीडिया लगातार सिटीजन जर्नलिज्म के स्पेस को एंटी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज्म में नहीं है। जर्नलिज्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है। मेरे ख़्याल से सिटीजन जर्नलिज्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म सूचना के खिलाफ हो जाए। उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नजर आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे। असमहति की आवाज को गद्दार कहने लगे। इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है।

जब मीडिया ही सिटीजन के खिलाफ हो जाए तो फिर सिटीजन को मीडिया बनना ही पड़ेगा। यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटीजन और सिटीजन जर्नलिज्म दोनों के खतरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नजर आती है। उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया सिटीजन जर्नलिज्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है। सिटीजन जर्नलिज्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके।

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है। वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है। अगर आप इस मीडिया के जरिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है। यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है। कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज में एक ही प्रकार की सूचना है। एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके। इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है। (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे। इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है। एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है।

भारत में बहुत कुछ शानदार है, यह एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज्यादातर हिस्सा गटर हो गया है। भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है, लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर रात कुचलने आ जाता है। भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है।

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र खूब जिंदा है। हर दिन सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है। इनकी अब खबरें नहीं बनती। उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है। इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद विडियो बनाने लगे हैं। फोन से बनाए गए उस विडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के वॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है। इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाजी करे। इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए वॉट्सऐप ग्रुप के लिए विडियो बना रहा है। आंदोलन करने वाले सिटीजन जर्नलिज्म करने लगते हैं। अपना विडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं।

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटीजन को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है? सिटीजन बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है। अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है? नागरिक फिर भी लड़ रहा है।

मुझे हर दिन वॉट्सऐप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं। कभी-कभी यह संख्या ज्यादा भी होती है। हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए। जब भी मैं अपना वॉट्सऐप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता। मैं हजारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने वॉट्सऐप को पब्लिक न्यूजरूम कहता हूं। देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए। गालियां आईं, धमकियां भी आईं। आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए। अपनी और इलाके की खबरों को लेकर। ये वे खबरें हैं, जो न्यूज चैनलों की परिभाषा के हिसाब से खत्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब खुद परेशानी में पड़ते हैं तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है। उनके जहन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है।

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे। उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया। जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटीजन जर्नलिज्म के नाम पर जर्नलिज्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटीजन के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया। मीडिया का यही भविष्य होना है। उसके पत्रकारों को सिटीजन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटीजन बन सकें।

ठीक उसी समय में, जब न्यूज चैनलों से आम लोग गायब कर दिए गए और उन पर डिबेट शो के जरिये पॉलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे। गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे। मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा। क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया।

'Prime Time' का मिजाज (नेचर) बदल गया। हजारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं। जिन परीक्षाओं के रिजल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं। अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है। 'Prime Time' की 'जॉब सीरीज' का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिजल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला। जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था। बस मेरा वॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूजरूम में बदल गया। सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई।

'Prime Time' अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है। ये वॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था। एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली खबरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे। मेरा न्यूजरूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है। यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है। तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं। जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे। 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते। जर्नलिज्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटीजन एंड सिटीजनशिप। मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटीजन को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटीजन अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे। डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे।

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है। वह 'Prime Time' देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे। उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और 'Prime Time' देखा। वह भारत के लोकतंत्र की सिटीजन है। जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा। उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में खुद लिखकर मुझसे माफी मांगी। अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं। महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है। जब घर में वह मेरा शो चलाता है तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं। मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटीजन जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटीजन से भी जूझना होगा। चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं। सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं। उनका जोखिम बढ़ जाता है। आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है। आज का सिटीजन दोहरे दबाव में हैं। उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े। जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है।

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा। वर्ना उसकी आवाज वॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी। पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए जरूरी निर्भीकता का माहौल बनाए। स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो। इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है। उस इतिहास को छीना जा रहा है।

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस-अनगिनत नाम हैं। ये सब सिटीजन जर्नलिस्ट थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया। उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें। गांधी खुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे। चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूजरूम बनाकर बैठ गई। वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी। उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है।

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है। किसी भी देश को जिंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है। सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमजोर होगा। इसलिए एक बार फिर सिटीजन जर्नलिज्म की जरूरत तेज हो गई है। वह सिटीजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रैटेजी से अलग है। इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं। कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटीजन जर्नलिज्म के एसेंस को जिंदा किए हुए हैं। उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है। जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है।

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी। आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं। गांधी ने एक बड़े अखबार के बारे में कहा, जिसमें खबर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है। गांधी ने कहा था कि यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की। आज अखबार डर गए हैं। वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं। गांधी ने कहा था- ‘आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ खबर सुननी हो, तो एक-दूसरे से पूछ लें। अगर पढ़ना ही चाहें  तो सोच-समझकर अखबार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों। भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है।‘ गांधी होते तो यही कहते जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं।

आज बड़े पैमाने पर सिटीजन जर्नलिस्ट की जरूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत है सिटीजन डेमोक्रेटिक की। (DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS CITIZEN DEMOCRATIC।)

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं। NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं। डॉ. प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है। मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे खूब प्यार दिया है। मैं सबका हूं। मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है। मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे। मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे। अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं। मेरा दोस्त अनुराग यहां है। मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी। मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं। काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए। अच्छा नागरिक बना कीजिए।

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समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 14 December, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 December, 2019
Sudhir Chaudhary

अगर आप सुधीर चौधरी की ट्विटर टाइम लाइन पर जाएंगे तो पाएंगे तमाम लोग उन्हें अपने मम्मी-पापा के साथ सेल्फी खींचकर भेज रहे हैं और लगभग हर ट्वीट पर सुधीर चौधरी एक इमोशनल कमेंट के साथ रिट्वीट कर रहे हैं। इसी के साथ ट्विटर पर एक हैशटैग ट्रेंड हो रहा है, सेल्फी विद मम्मी पापा (#SelfieWithMummyPapa) तो हमने पूरा माजरा समझने की कोशिश की।

पता चला कि पूरे देश की मीडिया जब 13 दिसंबर को सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल पर देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शन पर डिस्कशन करने में जुटी थी, तो ऐसे में सुधीर चौधरी ने अपने स्पेशल शो ‘डीएनए’ में इन विरोध प्रदर्शनों के अलावा एक इमोशनल इश्यू भी उठाया। सुधीर चौधरी का यह मुद्दा देश के सीनियर सिटीजंस से जुड़ा है। दरअसल, सरकार वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल से जुड़े बिल में एक संशोधन का प्रस्ताव लेकर आई है यानी अमेंडमेंट बिल लेकर आई है।

मेंटिनेस एंड वेलफेयर आफ पैरंट्स एंड सीनियर सिटीजंस अमेंडमेंट बिल 2019 में सरकार ने ये प्रावधान किए हैं कि मां-बाप की देखभाल के लिए केवल बेटा या बेटी ही जिम्मेदार नहीं होंगे, बल्कि बेटे की पत्नी यानी उनकी बहू, बेटी का पति यानी उनका दामाद और और नाती-पोते भी जिम्मेदार होंगे। इसके लिए बाकायदा सख्त बाध्यकारी प्रावधान इस बिल में रखे गए हैं।

सुधीर चौधरी ने अपनी रिपोर्ट में ढेर सारी रिसर्च और इमोशनल प्रेजेंटेशन के साथ इस मुद्दे को दिखाया। उसके बाद उन्होंने ‘डीएनए’ देख रहे दर्शकों से कहा कि जो लोग अपने पैरेंट्स से दूर रहते हैं, वे उनको फोन कर उनसे अपने मन की बात करें। इस मौके पर उन्होंने देश की यंग जेनरेशन जो खूब सेल्फी पोस्ट करती रहती है, से अपने मम्मी-पापा के साथ तस्वीरें ट्विटर पर शेयर करने की बात भी कही। उनकी बात का देश के युवाओं पर कितना असर हुआ, ये जानने से पहले आप लोग भी नीचे विडियो पर क्लिक कर डीएनए शो की ये क्लिप जरूर देखिए, क्योंकि हम भारतीय कई बार तमाम हालातों के चलते अपने पैरेंट्स के साथ कुछ गलतियां कर बैठते हैं, पर ये क्लिप आपको उन गलतियों को सुधारने के लिए प्रेरित करेगी।

देखते ही देखते सैकड़ों हजारों लोग सुधीर चौधरी को टैग करके अपने मम्मी-पापा के साथ सेल्फी खींचकर ट्विटर पर शेयर करने लगे। किसी के मम्मी या पापा नहीं थे तो उसने मौसी, दादी या दादा को भी इस सेल्फी में शामिल किया और सुधीर चौधरी ने ज्यादातर ट्वीट्स पर एक शानदार कमेंट के साथ उनको रिट्वीट किया। देखते-देखते इसके साथ शुरू किया गया टि्वटर ट्रेंड #SelfieWithMummyPapa (सेल्फी विद मम्मी-पापा ) ट्विटर के टॉप ट्रेंड्स में भी आ गया। सुधीर चौधरी की ट्विटर टाइमलाइम पर मौजूद कुछ ऐसे ट्वीट्स का स्क्रीन शॉट आप यहां देख सकते हैं।

 

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निर्भया केस के आरोपित ने अजीत अंजुम के खुलासे को यूं बनाया ‘ढाल’

अपने वकील के माध्यम से अदालत में दायर की है याचिका, कोर्ट ने 20 दिसंबर दी है अगली तारीख

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 14 December, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 December, 2019
Ajit Anjum

आपको याद होगा कि ‘न्यूज 24’ और ‘इंडिया टीवी’ के पूर्व मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने पिछले महीने अपने ट्विटर अकाउंट पर कई ट्वीट्स के जरिए एक खुलासा किया था। इस खुलासे में उन्होंने बताया था कि कैसे निर्भया का दोस्त अवनींद्र टीवी चैनल पर आने के लिए पैसे लेता था। पैसे लेते हुए उसका स्टिंग ‘न्यूज 24’ ने किया, लेकिन इसलिए नहीं दिखाया क्योंकि इससे केस पर फर्क पड़ता। उनके इसी खुलासे को अब निर्भया गैंगरेप केस के एक आरोपित पवन गुप्ता के पिता ने ढाल बनाने की कोशिश की है।

पवन गुप्ता के पिता ने वकील एपी सिंह के जरिए दिल्ली की एक कोर्ट में याचिका दाखिल की है कि निर्भया गैंगरेप के वक्त बस में मौजूद अवनींद्र के बारे में यह खुलासा हुआ है कि उसने पैसे लेकर इंटरव्यू दिए हैं। ऐसे में अवनींद्र की गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उसकी गवाही को तो खारिज किया ही जाए, उसके खिलाफ एफआइआर भी दर्ज की जाए।

ऐसे में ये मामला पेचीदा हो जाता है क्योंकि इस पूरे केस का इकलौता गवाह निर्भया का दोस्त अवनींद्र ही है। कहा जा रहा है कि इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद वह न्यूज चैनल्स से गायब ही हो गया है और अभी तक सामने आया नहीं है।

यह भी पढ़ें: निर्भया के बॉयफ्रेंड के बारे में अजीत अंजुम ने किया ये बड़ा खुलासा

वकील एपी सिंह की याचिका पर 13 दिसंबर को दिल्ली की कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। जज ने वकील एपी सिंह से पूछा कि ये अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं? वकील एपी सिंह को लगा कि इस मामले में उन्हें अभी और होमवर्क की जरूरत है। उन्होंने फौरन कोर्ट से इसकी तैयारी के लिए और समय मांग लिया। कोर्ट ने उन्हें 20 दिसंबर की अगली तारीख दी है। इधर सुप्रीम कोर्ट में केस की अगली तारीख 17 दिसंबर है और दूसरी तरफ तिहाड़ जेल में आरोपितों की फांसी की तैयारियां चल रही हैं।

जैसे ही राष्ट्रपति दया याचिका खारिज करेंगे, तिहाड जेल को डेथ वारंट मिलेगा और प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। ऐसे में अगर वकील एपी सिंह की याचिका पर दिल्ली का कोर्ट कोई बड़ा फैसला लेता है तो न केवल फांसी कुछ दिनों के लिए टल सकती है, बल्कि निर्भया के दोस्त के लिए भी परेशानी खड़ी हो सकती है।

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प्रसारण के दौरान टीवी चैनल्स को रखना होगा इन बातों का विशेष ध्यान

सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा सभी प्राइवेट सैटेलाइट टीवी चैनल्स को इस बारे में जारी एडवाइजरी का पालन करने के लिए कहा गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 12 December, 2019
Last Modified:
Thursday, 12 December, 2019
TV Channels

केंद्र सरकार ने सभी सैटेलाइट टीवी चैनल्स के लिए एडवाइजरी जारी की है। इस एडवाइजरी में कहा गया है कि टीवी चैनल्स को ऐसे कंटेंट दिखाने से बचना चाहिए, जिससे हिंसा भड़क सकती है या कानून व्यवस्था को लेकर समस्या उत्पन्न हो सकती है। नागरिकता संशोधन बिल पर इन दिनों बवाल चल रहा है। लिहाजा एडवाइजरी को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

सूचना प्रसारण मंत्रालय की तरफ से 11 दिसंबर को जारी इस एडवाइजरी में लिखा है, ‘पहले भी कई मौकों पर टीवी चैनल्स को 1995 के केबल टेलिविजन नेटवर्क अधिनियम में वर्णित कार्यक्रम और विज्ञापन संहिता के अनुरूप कंटेंट प्रसारित करने के लिए कहा जाता रहा है। एक बार फिर से सभी चैनल्स को ऐसे कंटेंट के प्रसारण से बचने की सलाह दी जाती है जो हिंसा को बढ़ावा देता हो या जिससे कानून व्यवस्था को लेकर समस्या उत्पन्न हो सकती हो या अन्यथा जिससे राष्ट्र-विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता हो या राष्ट्र की अखंडता किसी भी तरह से प्रभावित होती हो।’

इसके साथ ही सरकार ने सभी प्राइवेट सैटेलाइट टीवी चैनल्स को इस एडवाइजरी का पालन करने के लिए कहा है। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा इस बारे में जारी की गई एडवाइजरी की कॉपी आप यहां देख सकते हैं।

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टीवी टुडे नेटवर्क: स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) का कारनामा, मोदी सरकार को फायदा

सोशल मीडिया पर वायरल एक स्टिंग ऑपरेशन का जिक्र गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में संसद में भी किया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 12 December, 2019
Last Modified:
Thursday, 12 December, 2019
TV Today Network

कुछ लोग परदे के पीछे के खिलाड़ी होते हैं। बड़े-बड़े कारनामों के बावजूद देश उनको नहीं जान पाता। जमशेद खान जैसे अंडरकवर रिपोर्टर भी उन्हीं में से एक हैं। टीवी टुडे नेटवर्क की स्पश्ल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) के प्रमुख जमशेद ने अपनी टीम के साथ मिलकर पिछले दशक में जितने स्टिंग किए हैं, शायद ही किसी और रिपोर्टर ने किए हों।

चाहे वो धार्मिक चेहरों से नकाब उठाना हो या राजनीतिक हस्तियों के मंसूबों से। इंटरनेशनल क्रिकेट के परदे के पीछे के खेलों का खुलासा करना हो या फिर आपकी सिक्योरिटी में तैनात पुलिस वालों की ‘सुपारी किलर’ की मानसिकता को उजागर करना हो, कोई भी फील्ड इस एसआईटी टीम के स्टिंग ऑपरेशंस से अछूता नहीं रहा है। लेकिन एक के बाद एक कश्मीर पर उनके कई ऑपरेशंस चर्चा का विषय बन गए हैं और इसका सीधा फायदा मिल रहा है मोदी सरकार को। सरकार इन ऑपरेशंस का हवाला देकर बता रही है कि कैसे उसकी कही गई बातें सही सिद्ध हो रही है।

घाटी में पत्थरबाजों के स्टिंग के बाद जमशेद और टीम ने एक स्टिंग ऑपरेशन 2017 में किया, जिसके जरिये उन्होंने घाटी के हवाला रैकेट का पर्दाफाश किया गया। यही वो ऑपेऱशन था जिसके चलते मोदी सरकार ने एनआईए जांच बैठा दी। इस मामले में नईम खान जेल गया, उसके बाद गिरफ्तारियों की लाइन लग गई, यहां तक कि यासीन मलिक जैसे नेता भी जेल में हैं।

इसके बाद हवाला रैकेट पर एक और ऑपरेशन ‘अलमंड्स’ किया गया, अब एक नया और हालिया स्टिंग चर्चा में है। यह सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस ऑपरेशन का जिक्र गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में संसद में भी किया। ये ऑपरेशन जुड़ा था उन लोगों के पर्दाफाश से, जो पैसे लेकर घाटी में स्कूल जलाने से लेकर, भीड़ भड़काने और दंगा फैलाने तक के लिए तैयार हैं।

इस स्टिंग में दिल्ली में एक राजनीतिक पार्टी के पूर्व कार्यकर्ता से लेकर घाटी का एक स्थानीय क्रिकेटर और प्रॉपर्टी एजेंट तक तमाम लोग शामिल थे। ऐसे में मोदी सरकार के समर्थक इस ऑपरेशन की क्लिप्स को सोशल मीडिया पर जमकर शेयर कर रहे हैं। आप भी इस स्टिंग को यहां देख सकते हैं।

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कवरेज के दौरान हुआ कुछ ऐसा कि रो पड़ा ‘आजतक’ का क्राइम रिपोर्टर

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है रिपोर्टर का फोटो, लोग कह रहे हैं सच्ची पत्रकारिता

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 10 December, 2019
Last Modified:
Tuesday, 10 December, 2019
Aajtak

हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ की क्राइम टीम में जाने-पहचाने चेहरे हैं। शम्स ताहिर खान की अगुवाई में इस टीम में तमाम ऐसे नए चेहरे भी जुड़े हैं, जो पिछले कई साल से ‘आजतक’ को टॉप पर बनाए हुए हैं। ऐसे में क्राइम की खबरों पर तो वो आगे रहते ही हैं, किसी बड़ी दुर्घटना के वक्त भी उन्हीं को मोर्चे पर भेजा जाता है। लेकिन ऐसी दुर्घटनाओं को कवर करते वक्त जब लाशों पर लाशें निकल रही हों, तो किसी का भी कलेजा मुंह को आ सकता है। ‘आजतक’ के क्राइम रिपोर्टर पुनीत शर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ, जब वो दिल्ली की अनाज मंडी की उस आग को कवर कर रहे थे, जिसके चलते 43 लोगों की जानें चली गई थीं।

आप तस्वीर में देख सकते हैं कि पुनीत शर्मा की क्या हालत हो गई थी उस वक्त। ऑन एयर बोलते-बोलते वो रो पड़े थे क्योंकि हर लाश के साथ ही उसके परिवार और साथियों की चीखें उनके कानों में भी पड़ रही थीं। लेकिन ‘आजतक’ की स्क्रीन से लिया गया उनका ये भावुक फोटो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

उन्हीं के एक सीनियर साथी ‘एनडीटीवी’ के सीनियर स्पेशल कॉरस्पोंडेंट मुकेश सेंगर ने भी पुनीत के इस फोटो को शेयर किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा है, 'दिल्ली में आग लगने के हादसे ने हर किसी को हिला दिया, रुला दिया! ‘आजतक’ में संवाददाता छोटा भाई पुनीत शर्मा भी अपने आंसू नहीं रोक सका,पत्रकारिता का एक पहलू ये भी है।'

वहीं कमलदीप अरोड़ा लिखते हैं, 'आज दिल्ली में हुए हादसे में हुई 43 मौत पर इमोशनल होने पर लाइव रिपोर्टिंग में आंख में आंसू आये आजतक के क्राइम रिपोर्टर छोटे भाई पुनीत शर्मा के। ये भी एक पहलू हैं, सच्ची पत्रकारिता का।'

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अरनब गोस्वामी बोले- BJP सरकार कांग्रेस से भी बड़ी गलती कर रही है

उन्होंने अपने हालिया शो के जरिए ये साबित किया है कि वह किसी पार्टी को नहीं, बल्कि मुद्दे को तवज्जो देते हैं, फिर भले ही उसका जुड़ाव किसी भी दल से क्यों न हो

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 09 December, 2019
Last Modified:
Monday, 09 December, 2019
Arnab Goswami

वरिष्ठ पत्रकार अरनब गोस्वामी को अक्सर भाजपा समर्थक पत्रकार के रूप में देखा जाता है,लेकिन उन्होंने अपने हालिया शो के जरिए ये साबित किया है कि वह किसी पार्टी को नहीं, बल्कि मुद्दे को तवज्जो देते हैं, फिर भले ही उसका जुड़ाव किसी भी दल से क्यों न हो।

अरनब गोस्वामी ने अपने शो ‘द डिबेट’ में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर मोदी सरकार की कार्यप्रणाली पर जमकर प्रहार किया। शो की शुरुआत अरनब ने इस अंदाज में की, मानो वह अपने विरोधियों को बता रहे हों कि उनके लिए क्या ज्यादा मायने रखता है।

उन्होंने कहा, ‘अमूमन लोग मुझसे पूछते हैं कि जब आप किसी मुद्दे को उठाते हैं तो उसका आधार क्या होता है? क्या भाजपा या कांग्रेस के आधार पर उठाते हैं? मेरा जवाब होता है ‘नहीं’। मेरे दिमाग में बस ब्लैक एवं व्हाइट, सही और गलत होता है और मैं अपनी पत्रकारिता को कभी कठिन नहीं बनाता। मेरे लिए जो सही है, वो सही है और जो गलत, वो गलत।’  इसके बाद अरनब ने भाजपा को भी सही-गलत का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि भाजपा को भी समझना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत। नागरिकता संशोधन बिल के मामले में भाजपा बड़ी गलती कर रही है।’

अरनब ने यह भी साफ किया कि बिल पर आपत्ति जताकर वह कांग्रेस के एजेंडे का समर्थन नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनकी नजर में असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ के लिए कांग्रेस ही सबसे बड़ी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, ‘मैं असम से हूं लेकिन मैं आज देश के नागरिक के रूप में अपनी बात रखना चाहूंगा। मैं असम के हाल के लिए कांग्रेस को कुसूरवार ठहराता रहा हूं, मगर भाजपा सरकार उससे भी बड़ी गलती कर रही है।’

उन्होंने बिल के उस प्रावधान पर एतराज जताया है, जिसके मुताबिक,अफगानिस्तान,पाकिस्तान,बांग्लादेश से आए हिंदू, जैन, बौद्ध, ईसाई, सिख शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने में आसानी होगी। इसके अलावा अब भारत की नागरिकता पाने के लिए 11 साल नहीं, बल्कि 6 साल तक इस देश में रहना अनिवार्य होगा। वैसे, बिल को यदि धर्म का चश्मा उतारकर देखा जाये तो सवाल उठता है कि क्या इससे अवैध रूप से भारत में घुसने वालों पर लगाम लगाई जा सकेगी? मुस्लिमों को छोड़कर दूसरे देशों में रहने वालों को भारत का नागरिक बनाने से क्या समस्या हल हो पायेगी? यही सवाल अरनब गोस्वामी ने भी सरकार से पूछा है।

‘रिपब्लिक टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ अरनब ने आगे कहा, ‘मुद्दा हमेशा से अवैध प्रवासियों का रहा है, न कि उनके धर्म का। भाजपा बस संघ परिवार को खुश करने में लगी है। पाकिस्तान या बांग्लादेश में रहने वाले कहीं भी जाएं, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन भारत ही क्यों? क्या हमारा देश धर्मशाला है? हम सभी को इस मुद्दे पर भाजपा से सवाल करना चाहिए।’

उन्होंने भाजपा सरकार की कवायद को सियासी नफे-नुकसान के तहत लिया गया फैसला भी बताया, साथ ही सरकार को इसके दूरगामी परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी। दरअसल, नागरिकता संशोधन बिल को लेकर अधिकांश मीडिया में सरकार जैसी ही राय है, यानी सबकुछ अच्छा है। मगर अरनब गोस्वामी ने इन बिंदुओं को उठाकर यह बताने का प्रयास किया है कि मीडिया का काम केवल अच्छे पर ही फोकस करना नहीं होता। अरनब के इस ‘डिबेट’ को भले ही किसी भी रूप में देखा जाये, लेकिन जो सवाल उन्होंने उठाये हैं, उनका जवाब तो भाजपा से मांगा ही जाना चाहिए। साथ ही यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि अरनब को लेकर गलतफहमी पालने वालों की गलतफहमी अब काफी हद तक दूर हो जाएगी।       

पूरी डिबेट आप यहां देख सकते हैं:

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फीमेल सिंगर की इस बात पर कैसे शर्म से लाल हुए राजदीप सरदेसाई, देखें विडियो

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019 के मौके पर राजदीप सरदेसाई समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं देश की जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 07 December, 2019
Last Modified:
Saturday, 07 December, 2019
Rajdeep Sardesai

मौका था इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019 का और मंच पर थीं बंगाली गायकी की उभरती हुई स्टार लग्नजिता चक्रवर्ती। सामने राजदीप सरदेसाई समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं देश की जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं। लग्नजिता ने ऐसे में मंच से कहा कि मेरा सबसे पहला क्रश राजदीप सरदेसाई थे। यह सुनकर राजदीप सरदेसाई का चेहरा शर्म से लाल या यूं कहे कि ब्लश (Blush) करने लगा और वह मुस्कुराने लगे।

लग्नजिता कहती चलीं गईं, ‘मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि राजदीप आज मेरे सामने बैठे हैं और मैं पिछले 15 मिनट से खुद को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही हूं।‘ वह बताने लगीं कि पांचवी-छठी क्लास में जब वह पढ़ती थीं, तभी से राजदीप उनका पहला क्रश थे और कैसे उनके घर वाले भी इस बात को लेकर उनका मजाक बनाते थे। यही नहीं, उन्होंने मंच से ही बोल दिया, 'राजदीप आई लव यू'। वे यहां ही नहीं रुकी उन्होंने ये भी कहा कि वे अपने बिस्तर पर राजदीप के लिए जगह भी बनाकर रखती थी।

अब बारी थी राजदीप सरदेसाई की। लगभग हर कोई उन पर दबाव बनाने लगा कि उसका जवाब दें। राजदीप को कुछ समझ में नहीं आ रहा था क्या बोलें। फिर उन्होंने एक सेफलाइन ली, क्योंकि उनकी पत्नी सागरिका घोष भी बंगाली हैं तो उन्होंने कहना शुरू किया, ‘मैं शुरू से ही बंगाली महिलाओं के संपर्क में रहा हूं, उनके साथ जिंदगी बिताई है, उनसे काफी कुछ सीखा है।‘

वह यह कहकर बचने की कोशिश करने लगे कि तुम काफी अच्छा गाती हो। लेकिन मंच से फिर लग्नजिता ने बोल दिया कि इस देश में जितने जर्नलिस्ट हुए हैं, उनमें प्रणॉय रॉय के बाद दूसरे सबसे हैंडसम पत्रकार आप हो।

इसके बाद राजदीप का चेहरा वाकई में देखने लायक हो गया। अब वह कोशिश करने लगे कि टॉपिक चेंज हो। कॉन्क्लेव की बात करने लगे और गाने की फरमाइश करने लगे। लेकिन यह घटना मीडिया हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। आप पूरे वाकये को इस विडियो क्लिप में देख सकते हैं।

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अंजना ओम कश्यप ने संभाला मोर्चा, यूं किया अलका लाम्बा पर पलटवार

हैदराबाद में दुष्कर्म के बाद वेटनरी डॉक्टर की हत्या के मुद्दे पर ‘हल्ला बोल’ में हो रही थी चर्चा, शो के दौरान अलका लाम्बा ने कर दिया था वॉकआउट

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 December, 2019
Last Modified:
Wednesday, 04 December, 2019
Anjana Om Kashyap Alka Lamba

हैदराबाद रेप केस को लेकर ‘आजतक’ की मशहूर एंकर अंजना ओम कश्यप के शो ‘हल्ला बोल’ में कांग्रेस नेता अलका लाम्बा भड़क गईं। शो के दौरान दोनों के बीच तकरार इतनी बढ़ गई कि अलका लाम्बा शो से वॉकआउट कर गईं। इस बीच उन्होंने अंजना ओम कश्यप और ‘आजतक’ पर अपने खिलाफ एजेंडा चलाने के आरोप भी लगाए। लडाई यहीं खत्म नहीं हुई। इसके बाद अलका लाम्बा के समर्थक इस शो की क्लिप सोशल मीडिया पर चलाने लगे और 'आजतक' व अंजना को ट्रोल करने लगे। यहां तक कि लालू यादव की पार्टी आरजेडी के ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट से इसे शेयर करके 'आजतक' और अंजना पर सवाल उठाए गए। जब अलका भी इस मुहिम में शामिल हुईं, तो अंजना को भी मैदान में उतरना पड़ा।

दरअसल, 'हल्ला बोल' में हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर के रेप केस पर चर्चा हो रही थी। अन्य गेस्ट्स के अलावा निर्भया की मां और अलका लाम्बा भी इस शो में मौजूद थीं। अंजना ने अलका को कहा कि रेप विक्टिम का नाम मत लीजिए, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस हैं। इस पर अलका भड़क गईं और कहने लगीं कि आप मेरे खिलाफ एजेंडा चला रही हो। तब अंजना ने उन्हें शो की वह क्लिप दिखाईं, जहां 2 बार वो रेप विक्टिम डॉक्टर का नाम ले चुकी थीं। लेकिन पहले से ही भरी बैठीं अलका कहने लगीं कि निर्भया की मां को कोई दिक्कत नहीं थी, मुझे भी तो नाम मीडिया से ही पता चला था। मेरे बोलने पर ही क्यों आपत्ति है। फिर वो गुस्से में शेम ऑन यू अंजना, शेम ऑन आजतक कहकर शो से वॉकआउट कर गईं।

अलका शायद दूध की जली थीं, बिना बात के हंगामा किया। लेकिन उसके बाद अलका लाम्बा की टीम काम में लग गई। अलका लाम्बा ने एक विडियो क्लिप शेयर की, जिस पर लिखा था, अलका लाम्बा ने अंजना कश्यप की बैंड बजा दी। क्लिप देखकर नहीं लगा कि अंजना कुछ गलत कह रही हैं। उसके बाद आरजेडी ने शेयर कर दिया। अलका के पक्ष में तमाम लोग शेयर करने लगे। अलका की टीम ने तब तक अंजना कश्यप की वो ट्वीट ढूंढ निकाली, जिसमें 4 दिन पहले अंजना खुद रेप विक्टिम का नाम ले रही थीं। अलका ने उसे शेयर करते हुए लिखा, ‘’@anjanaomkashyap आप कल @aajtak के लाइव शो में मुझे कह रहीं थीं कि "हम सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का सम्मान करते हैं".. रेप पीड़िता का नाम मैंने लिया है... कुछ तो शर्म करो... बेहतर होगा पत्रकारिता छोड़ कर कहीं कोई दूसरा रोज़गार खोज लो... अंजना ओम मोदी... Sorry अंजना ओम कश्यप’’।

अब अंजना को जवाब देने आना ही था, अंजना ने लिखा, ’जिस दिन का मेरा ये ट्वीट है उस दिन तक सभी नाम ले रहे थे। जब हैदराबाद की लड़की के परिवार की तरफ से लोकल प्रशासन ने ये गाइडलाइन जारी की कि आप नाम नहीं लें और बदला हुआ नाम ‘दिशा’ इस्तेमाल करें तो हमने उसका सम्मान किया। शो में जो हुआ उसका सच ये है।' अंजना ने इसके साथ ही हल्ला बोल शो का एक विडियो भी शेयर किया, जिससे कहानी थोड़ी स्पष्ट हुई।

अंजना इस विडियो में अलका लाम्बा को समझाती हैं कि रेप विक्टिम का नाम न लें, लेकिन अलका इसे पर्सनल अटैक की तरह लेती हैं और भड़क जाती हैं। अंजना अलका से माफी मांगती हैं, लेकिन उन्हें वो क्लिप भी दिखाती हैं, जिसमें दो बार अलका रेप विक्टिम का नाम ले रही थीं। इससे अलका और भड़क जाती हैं और गुस्से में शो से वॉकआउट कर जाती हैं। ये लड़ाई अभी भी सोशल मीडिया पर जारी है।

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कैसे पूरे मुल्क की आवाज बन गया अरनब गोस्वामी का ये शो, देखें विडियो

बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ तो शामिल हुए ही, आम जनता को भी अपनी बात रखने का मौका मिला, महज 35 मिनट में मिले 1.35 लाख से ज्यादा मैसेज

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 December, 2019
Last Modified:
Wednesday, 04 December, 2019
Arnab Goswami

हैदराबाद कांड को लेकर पूरे देश में गुस्सा है। यह गुस्सा सड़क से संसद होते हुए न्यूज चैनल्स के स्टूडियो तक जा पहुंचा है। हर चैनल सभ्य समाज के सपने को तार-तार करने वाली इस वारदात पर बात कर रहा है, लेकिन जिस अंदाज में वरिष्ठ टीवी पत्रकार अरनब गोस्वामी ने इस मुद्दे को उठाया है वो काबिल-ए-तारीफ है। ‘रिपब्लिक टीवी’ के शो ‘डिबेट’ में अरनब ने हैदराबाद कांड पर चर्चा की। इस चर्चा में बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ तो शामिल हुए ही, आम जनता को भी अपनी बात रखने का मौका दिया गया।

अरनब ने इस प्रयोग के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया है कि देश की जनता आखिरकार क्या चाहती है, उसे अपने सांसदों से क्या अपेक्षा है? अरनब की इस ‘डिबेट’ में अपनी बात रखने के लिए बड़ी संख्या में लोग आगे आए। महज 35 मिनट में चैनल को 1.35 लाख से ज्यादा संदेश मिले और बहस शुरू होते ही यह संख्या लगातार बढ़ती चली गई। पूरे शो के दौरान अरनब गोस्वामी को लोगों के संदेश पढ़ने के लिए मशक्कत करनी पड़ी, क्योंकि वॉट्सऐप पर मैसेज इतनी तेजी से आ रहे थे कि पढ़ना मुश्किल हो गया था।

आमतौर पर डिबेट शो में केवल कुछ लोगों को स्टूडियो में बैठाकर मुद्दे पर चर्चा हो जाती है और अंत में एंकर उसका सार अपने विचारों के साथ प्रस्तुत कर देता है। लेकिन अरनब ने इस सोच को विस्तार देते हुए उन लोगों को भी बहस का हिस्सा बनाया, जिन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित होना पड़ता है यानी आम जनता। दिल्ली से लेकर दुबई तक ‘रिपब्लिक टीवी’ के दर्शकों ने अपनी सोच को शब्दों के रूप में अरनब तक पहुंचाया। कुछ दर्शकों को बतौर पैनलिस्ट भी शो में शामिल किया गया और गौर करने वाली बात यह है कि लगभग सभी ने एक सुर में बलात्कारियों को मौत की सजा देने की वकालत की।

‘रिपब्लिक टीवी’ और अरनब गोस्वामी सोशल मीडिया पर #justicefordisha और #deathforrapist नाम से कैंपेन भी चलाये हुए हैं और वहां भी उन्हें लोगों का साथ मिल रहा है। इसके अलावा, सरकार के नाम सात सूत्रीय मांगों का एक चार्टर भी तैयार किया है। मसलन, सभी बलात्कारियों को फांसी पर लटकाया जाए, उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए, उनके चेहरे न ढके जाएं, उनके नाम उजागर किये जाएं, सरकार की तरफ से बलात्कार के आरोपितों को कोई कानूनी सहायता उपलब्ध न कराई जाए, बलात्कार के सभी मामलों का जल्द से जल्द निपटारा किया जाए और दोषियों को जनता के पैसों पर जिंदा रखना बंद हो।

हैदराबाद कांड को लेकर लोग यह सवाल कर रहे थे कि आखिर मीडिया इस मामले को प्रमुखता से क्यों नहीं उठा रहा है, लेकिन अरनब की ‘डिबेट’ देखकर शायद वह अब ये सवाल न करें। अरनब और उनके चैनल ने इस मामले को अभियान की शक्ल दे दी है। एक ऐसा अभियान, जिसमें आम जनता की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है।

महज 35 मिनट में 1.35 लाख से ज्यादा वॉट्सऐप मैसेज मिलना इसका सबूत है कि लोग अरनब की बात न केवल सुन रहे हैं, बल्कि उस पर अमल भी कर रहे हैं। लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर को न्याय दिलाने की लड़ाई को ‘रिपब्लिक टीवी’ के ‘डिबेट’ ने नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जहां से उम्मीद की जा सकती है कि सरकार लोगों की भावनाओं को समझेगी और उसके अनुरूप कानून में बदलाव करेगी।

‘रिपब्लिक टीवी’ पर पूरी बहस आप यहां देख सकते हैं-

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इन तीन पत्रकारों ने लूट ली इस हफ्ते पूरे देश की मीडिया की ‘महफिल’

इस हफ्ते हैदराबाद रेप केस के अलावा दो बड़ी राजनीतिक खबरें रहीं, जिनको लेकर पूरे देश में राजनीतिक घमासान मचा रहा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 04 December, 2019
Last Modified:
Wednesday, 04 December, 2019
Journalist

इस हफ्ते हैदराबाद रेप केस के अलावा दो बड़ी राजनीतिक खबरें रहीं, जिनको लेकर पूरे देश में राजनीतिक घमासान मचा रहा। ये दो खबरें थीं शरद पवार का मोदी के बारे में बयान और राहुल बजाज का अमित शाह के सामने सरकार को घेरना, खासतौर पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के मुद्दे को लेकर। ऐसे में उन तीन पत्रकारों का जिक्र होना बेहद जरूरी है, जो इन दोनों खबरों से जुड़े हुए हैं। जिनके सवालों की वजह से यह खबरें इतनी बड़ी बनीं, यहां तक कि उनके विरोधी चैनल्स और अखबारों ने भी इन्हें ब्रेकिंग के साथ चलाया।

यह तीनों पत्रकार है ‘एबीपी न्यूज’ के राजनीतिक संपादक पंकज झा, ‘एबीपी मांझा’ के मैनेजिंग एडिटर ‘राजीव खांडेकर’ और ‘न्यूज24’ के ब्यूरो चीफ अमित कुमार। शरद पवार ने यह खुलासा किया था कि पीएम मोदी ने किसानों के मुद्दे पर उनके साथ मीटिंग करने के बाद उन्हें अपने साथ हाथ मिलाने का ऑफर दिया था और सुप्रिया सुले को केंद्रीय मंत्री पद तक का ऑफर दिया था, लेकिन शरद पवार ने विनम्रता के साथ इनकार कर दिया। जाहिर है कि इतनी बड़ी खबर को बाकी चैनल्स, अखबार और मीडिया वेबसाइट्स चलाए बिना रह न सके और वह भी बाकायदा ‘एबीपी न्यूज’ को क्रेडिट देने के साथ। शरद पवार का इंटरव्यू ‘एबीपी मांझा’ के राजीव खांडेकर और ‘एबीपी न्यूज’ के पंकज झा ने किया था, ऐसे में दोनों को इस बड़े ‘राजनीतिक तूफान’ का क्रेडिट मिलना चाहिए।

इसी तरह उद्योगपति राहुल बजाज ने जब एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह के सामने देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर सवाल उठाया, साथ ही साध्वी प्रज्ञा को लेकर भी सरकार को घेरा और कहा एक तरफ तो वो नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताती हैं और पीएम कहते हैं कि उसे कभी मन से माफ नहीं करेंगे और दूसरी तरफ आप उसे रक्षा मामलों की समिति में सदस्य चुन लेते हैं। ऐसे में अमित शाह ने बताया कि प्रज्ञा ठाकुर को उस समिति से हटा दिया गया है और बीजेपी संसदीय पार्टी की मीटिंग में शामिल होने पर रोक लगा दी गई है।

ऐसे में तमाम पत्रकारों ने राहुल बजाज के सवाल के लिए ‘न्यूज24’ के ब्यूरो चीफ अमित कुमार को क्रेडिट दिया। दरअसल, अमित कुमार ने 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी से इंटरव्यू के दौरान साध्वी प्रज्ञा को लेकर सवाल पूछा था कि वह गोडसे को देशभक्त बताती हैं। मोदी ने इसी इंटरव्यू में कहा था कि वे साध्वी को मन से कभी माफ नहीं कर पाएंगे और ये वो इकलौता बयान है जो मोदी ने साध्वी प्रज्ञा को लेकर दिया है। बार-बार मीडिया अमित कुमार के उसी इंटरव्यू में दिए गए मोदी के बयान को दोहराती है। विपक्ष भी इसी आरोप को उनके इंटरव्यू से उठाता है। राहुल बजाज ने भी इंटरव्यू की उसी लाइन को उठाया और सवाल पूछा। पंकज झा और राजीव खांडेकर के साथ-साथ अमित कुमार को इस हफ्ते की दो बड़ी राजनीतिक खबरों से जुड़े रहने के लिए समाचार4मीडिया की तरफ से ढेरों बधाइयां।

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