मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को लेकर क्या-क्या बोला, पढ़ें यहां

अवॉर्ड लेने के लिए मनीला पहुंचे रवीश कुमार ने पब्लिक लेक्चर में भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Ravish Kumar

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार इस साल का प्रतिष्ठित रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड (Ramon Magsaysay Awards) पाने के लिए फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे हुए हैं। रवीश कुमार को यह अवॉर्ड दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी, लेकिन अवॉर्ड लेने से पहले मनीला में शुक्रवार को उन्होंने मैगसायसाय के मंच से पब्लिक लेक्चर दिया। इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। बता दें कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रवीश कुमार को 9 सितंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे यह अवॉर्ड दिया जाएगा।

रैमन मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने लोगों के समक्ष जो बातें कहीं, उन्हें एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर पब्लिश किया है, जिसे हम आपके समक्ष हूबहू रख रहे हैं।

‘नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है। गौरव के इस क्षण में मेरी नजर चांद पर भी है और जमीन पर भी, जहां चांद से भी ज्यादा गहरे गड्ढे हैं। दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए। यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज से। सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा। देश सही सूचनाओं से बनता है। फेक न्यूज, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है। रैमन मैगसायसाय फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं कि क्या बोल रहा हूं। आपके पास अंग्रेजी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं।

दो महीने पहले जब मैं 'Prime Time' की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया। कॉलर आईडी पर फिलीपींस फ्लैश कर रहा था। मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है। यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है। अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं।

खैर, फिलीपींस के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं। मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेजी में एक महिला की आवाज थी, ‘May I please speak to Mr Ravish Kumar?’ हजारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी। मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया। उस तरफ से आ रही आवाज मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमन मैगसायसाय पुरस्कार दिया जा रहा है। मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिंदी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है। गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है। उसमें कोई दम नहीं है। अब मैं अपने विषय पर आता हूं।

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है। नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है। यह जानते हुए कि इस समय नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से खुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा। दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है। नफरत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है। रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है। मगर असंभव नहीं है।

नागरिकता के लिए जरूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो। आज स्टेट का मीडिया और उसके बिजनेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है। मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना। मीडिया अब सर्विलांस स्टेट का पार्ट है। वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है। प्राइवेट मीडिया और गवर्नमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है। इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है। ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है।

न्यूज चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है। इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है। मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं-एक, नेशनल और दूसरे, एंटी-नेशनल। एंटी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है। असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है। उस आत्मा पर रोज हमला होता है। जब नागरिकता खतरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी। नागरिक तो दोनों हैं। जो खुद को नेशनल कहता है, और जो एंटी-नेशनल कहा जाता है।

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है और लोगों के बीच लेजिटिमाइज हो चुका है। फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा। उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया। यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है। हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं। अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली। फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया। कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया। यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है। हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से खुद ही अलग हो गए।

कश्मीर में दूसरी कहानी है। वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। क्या आप बगैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटीजन की कल्पना कर सकते हैं? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे और वह उस सिटीजन के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है।

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत। नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं। पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है। कैसे रिपोर्टिंग करनी है। इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है। बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें। जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ, जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है। यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है। मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की। पीसीआई बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया। दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है। प्रोपेगंडा के जरिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा तो उधर से गुब्बारा मार दिया। वैसे, भारत के न्यूज चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं। बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं। आप हंसें नहीं। वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए। यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटीजन जर्नलिज्म' को गढ़ना शुरू किया था। इसके जरिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटीजन जर्नलिज्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटीजन जर्नलिज्म दोनों अलग चीजें हैं। लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया। न्यूजरूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे। आज भी कई सारे न्यूजरूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के जरिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते। यह सिटीजन जर्नलिज्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ।

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एंटी-नेशनल बताने लगेगा। मीडिया लगातार सिटीजन जर्नलिज्म के स्पेस को एंटी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज्म में नहीं है। जर्नलिज्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है। मेरे ख़्याल से सिटीजन जर्नलिज्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म सूचना के खिलाफ हो जाए। उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नजर आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे। असमहति की आवाज को गद्दार कहने लगे। इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है।

जब मीडिया ही सिटीजन के खिलाफ हो जाए तो फिर सिटीजन को मीडिया बनना ही पड़ेगा। यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटीजन और सिटीजन जर्नलिज्म दोनों के खतरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नजर आती है। उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया सिटीजन जर्नलिज्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है। सिटीजन जर्नलिज्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके।

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है। वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है। अगर आप इस मीडिया के जरिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है। यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है। कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज में एक ही प्रकार की सूचना है। एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके। इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है। (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे। इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है। एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है।

भारत में बहुत कुछ शानदार है, यह एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज्यादातर हिस्सा गटर हो गया है। भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है, लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर रात कुचलने आ जाता है। भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है।

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र खूब जिंदा है। हर दिन सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है। इनकी अब खबरें नहीं बनती। उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है। इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद विडियो बनाने लगे हैं। फोन से बनाए गए उस विडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के वॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है। इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाजी करे। इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए वॉट्सऐप ग्रुप के लिए विडियो बना रहा है। आंदोलन करने वाले सिटीजन जर्नलिज्म करने लगते हैं। अपना विडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं।

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटीजन को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है? सिटीजन बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है। अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है? नागरिक फिर भी लड़ रहा है।

मुझे हर दिन वॉट्सऐप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं। कभी-कभी यह संख्या ज्यादा भी होती है। हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए। जब भी मैं अपना वॉट्सऐप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता। मैं हजारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने वॉट्सऐप को पब्लिक न्यूजरूम कहता हूं। देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए। गालियां आईं, धमकियां भी आईं। आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए। अपनी और इलाके की खबरों को लेकर। ये वे खबरें हैं, जो न्यूज चैनलों की परिभाषा के हिसाब से खत्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब खुद परेशानी में पड़ते हैं तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है। उनके जहन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है।

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे। उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया। जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटीजन जर्नलिज्म के नाम पर जर्नलिज्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटीजन के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया। मीडिया का यही भविष्य होना है। उसके पत्रकारों को सिटीजन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटीजन बन सकें।

ठीक उसी समय में, जब न्यूज चैनलों से आम लोग गायब कर दिए गए और उन पर डिबेट शो के जरिये पॉलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे। गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे। मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा। क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया।

'Prime Time' का मिजाज (नेचर) बदल गया। हजारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं। जिन परीक्षाओं के रिजल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं। अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है। 'Prime Time' की 'जॉब सीरीज' का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिजल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला। जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था। बस मेरा वॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूजरूम में बदल गया। सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई।

'Prime Time' अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है। ये वॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था। एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली खबरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे। मेरा न्यूजरूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है। यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है। तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं। जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे। 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते। जर्नलिज्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटीजन एंड सिटीजनशिप। मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटीजन को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटीजन अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे। डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे।

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है। वह 'Prime Time' देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे। उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और 'Prime Time' देखा। वह भारत के लोकतंत्र की सिटीजन है। जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा। उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में खुद लिखकर मुझसे माफी मांगी। अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं। महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है। जब घर में वह मेरा शो चलाता है तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं। मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटीजन जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटीजन से भी जूझना होगा। चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं। सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं। उनका जोखिम बढ़ जाता है। आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है। आज का सिटीजन दोहरे दबाव में हैं। उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े। जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है।

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा। वर्ना उसकी आवाज वॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी। पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए जरूरी निर्भीकता का माहौल बनाए। स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो। इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है। उस इतिहास को छीना जा रहा है।

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस-अनगिनत नाम हैं। ये सब सिटीजन जर्नलिस्ट थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया। उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें। गांधी खुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे। चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूजरूम बनाकर बैठ गई। वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी। उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है।

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है। किसी भी देश को जिंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है। सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमजोर होगा। इसलिए एक बार फिर सिटीजन जर्नलिज्म की जरूरत तेज हो गई है। वह सिटीजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रैटेजी से अलग है। इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं। कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटीजन जर्नलिज्म के एसेंस को जिंदा किए हुए हैं। उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है। जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है।

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी। आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं। गांधी ने एक बड़े अखबार के बारे में कहा, जिसमें खबर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है। गांधी ने कहा था कि यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की। आज अखबार डर गए हैं। वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं। गांधी ने कहा था- ‘आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ खबर सुननी हो, तो एक-दूसरे से पूछ लें। अगर पढ़ना ही चाहें  तो सोच-समझकर अखबार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों। भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है।‘ गांधी होते तो यही कहते जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं।

आज बड़े पैमाने पर सिटीजन जर्नलिस्ट की जरूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत है सिटीजन डेमोक्रेटिक की। (DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS CITIZEN DEMOCRATIC।)

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं। NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं। डॉ. प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है। मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे खूब प्यार दिया है। मैं सबका हूं। मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है। मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे। मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे। अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं। मेरा दोस्त अनुराग यहां है। मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी। मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं। काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए। अच्छा नागरिक बना कीजिए।

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प्रसारण क्षेत्र में बिजनेस को सरल बनाने की दिशा में TRAI ने बढ़ाए कदम, मांगे सुझाव

ट्राई ने दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र में कारोबार करने के लिए कई तरह की जरूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) की दिशा में एक कदम बढ़ाया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 09 December, 2021
TRAI

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण यानी कि ट्राई (TRAI) ने दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र में कारोबार करने के लिए कई तरह की जरूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) की दिशा में एक कदम बढ़ाया है। इसे लेकर ट्राई ने एक परामर्श पत्र जारी कर सार्वजनिक राय मांगी की है।

ट्राई का कहना है कि दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र में मौजूदा प्रक्रियाओं में विभिन्न चिंताओ की पहचान करने और भारत के अनुकूल कारोबारी माहौल बनाने हेतु दूरसंचार और प्रसारण क्षेत्र की विनियामक प्रक्रियाओं, नीतियों और प्रथाओं में आवश्यक सुधारों के लिए उपाय सुझाने के लिए स्वत: संज्ञान लेते हुए यह परामर्श पत्र जारी किया गया है।

ट्राई ने देश में दूरसंचार व प्रसारण क्षेत्रों में अपने कारोबार को शुरू करने और संचालन में उनके सामने आने वाली कठिनाइयों पर हितधारकों से टिप्पणी मांगी है, ताकि मौजूदा प्रक्रियाओं को सरल और बिजनेस के अनुकूल बनाया जा सके। साथ ही ट्राई ने हितधारकों से इन क्षेत्रों में अधिक से अधिक निवेश हो सके, इसके लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने जाए को लेकर सुझाव मांगा है।

स्वत: संज्ञान लेते हुए ट्राई ने बुधवार को दूरसंचार एवं प्रसारण क्षेत्र में कारोबारी सुगमता पर जारी अपने परामर्श पत्र में सभी तरह की मंजूरी को ऑनलाइन करने और एकल खिड़की से अनुमति देने की प्रणाली को स्थापित करने पर विचार आमंत्रित किए हैं।

इस परामर्श पत्र में एकल खिड़की मंजूरी की व्यवस्था को स्थापित करने पर जोर देते हुए कहा गया है कि निवेशक या उद्यमी को सभी लाइसेंसों के लिए आवेदन करने की अनुमति होनी चाहिए। इसके लिए आवेदन की भौतिक प्रतियां जमा करने या फिर किसी विभाग में जाने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए।

ट्राई ने दरअसल अनुमति की प्रक्रिया को पूरी तरह से एक जगह पर केंद्रित करने और ऑनलाइन बनाने का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल इस प्रक्रिया में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में आवेदन करने पड़ते हैं।

नियामक ने पांच जनवरी तक लोगों से विचार मांगे हैं तथा जवाबी टिप्पणी के लिए अंतिम तिथि 19 जनवरी तय की है।

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न्यूज नेशन लाया नया चुनावी शो, इस वजह से है खास

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ गई है। नेताओं की रैलियां व सम्मेलनों का दौर शुरू हो चुका है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 09 December, 2021
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उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ गई है। नेताओं की रैलियां व सम्मेलनों का दौर शुरू हो चुका है। ऐसे में न्यूज चैनलों ने भी कवरेज को लेकर अपनी कमर कस ली है। चुनावी माहौल को देखते हुए कई नए प्रोग्राम शुरू किए जा रहे हैं। इन सबके बीच नेशनल न्यूज चैनल ‘न्यूज नेशन’ ने भी उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल को देखते हुए एक विशेष कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसका नाम है 'बड़े मियां किधर चले'।

राजनीति मुद्दों पर आधारित इस कार्यक्रम को चैनल के डिप्टी एडिटर व एंकर नावेद कुरैशी होस्ट करेंगे। नावेद खुद ही ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए चुनावी माहौल का जायजा लेंगे। कार्यक्रम की शूटिंग मुस्लिम बहुल इलाके में की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आगामी चुनावों को लेकर मुस्लामानों के दिलों में क्या है और उन्हें लेकर जो छवि बनायी गई, इसके इतर वे कितने अलग हैं।  

बता दें कि यह कार्यक्रम सोमवार यानी 13 दिसंबर से दोपहर 12:30 बजे न्यूज नेशन चैनल पर प्रसारित किया जाएगा।

 

 

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शशि थरूर ने 'संसद टीवी' के शो को छोड़ने का लिया फैसला, बताई ये वजह

राज्यसभा से निलंबित विपक्ष के 12 सांसदों के समर्थन में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘संसद टीवी’ के अपने शो को छोड़ने का फैसला किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 07 December, 2021
Last Modified:
Tuesday, 07 December, 2021
shashitharoor45454

राज्यसभा से निलंबित विपक्ष के 12 सांसदों के समर्थन में कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘संसद टीवी’ के अपने शो को छोड़ने का फैसला किया है। सोमवार को एक बयान जारी कर थरूर ने निलंबित किए गए सांसदों के प्रदर्शन का समर्थन किया और कहा कि राज्यसभा के 12 सदस्यों का निलंबन रद्द होने तक वह 'संसद टीवी' पर कार्यक्रम 'टू द पॉइंट' (To the Point) की मेजबानी नहीं करेंगे। इससे पहले शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी रविवार को संसद टीवी के एंकर पद से इस्तीफा दिया था।

शशि थरूर ने अपने बयान में कहा, ‘मेरा मानना है कि ‘संसद टीवी’ पर कार्यक्रम को होस्ट करने के आमंत्रण को स्वीकार करना भारत के संसदीय लोकतंत्र की बेहतरीन परंपराओं में था, क्योंकि इससे यह सिद्धांत मजबूत होता है कि हमारे राजनीतिक मतभेद हमें अपने संसदीय संस्थानों में एक सांसद के रूप में हिस्सा लेने से नहीं रोकते हैं। हालांकि 12 राज्यसभा सांसदों के मनमाने ढंग से निलंबन ने संसद की द्विदलीय भावना पर सवाल खड़े किए हैं।’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने सोमवार को कहा कि जब तक विधायकों का निलंबन रद्द नहीं किया जाता है और द्विदलीयता के आचरण को बहाल नहीं किया जाता है, वह कार्यक्रम नहीं करेंगे। थरूर संसद टीवी पर टॉक शो 'टू द पॉइंट' की मेजबानी करते रहे हैं, जिसमें वह कार्यक्रम में शरीक होने वालों से सवाल करते हैं।

दो महीने पहले सितंबर में ही शशि थरूर और प्रियंका चतुर्वेदी को संसद टीवी के अलग-अलग कार्यक्रमों की मेजबानी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। प्रियंका को ‘मेरी कहानी’ नाम के कार्यक्रम की मेजबानी सौंपी गई थी, लेकिन उन्होंने सांसद टीवी से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया है कि जब वह राज्यसभा से निलंबित हैं तो संसद टीवी में रहने का क्या मतलब है।

बता दें कि अगस्त में संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में अमर्यादित व्यवहार करने के लिए विपक्ष के 12 सांसदों को सभापति वेंकैया नायडू ने निलंबित किया है। इनमें से छह कांग्रेस के, दो-दो शिवसेना व तृणमूल के और माकपा व भाकपा के एक-एक सदस्य शामिल हैं। यह कार्रवाई पिछले सोमवार को की गई थी। इन सभी सांसदों को पूरे चालू शीत सत्र के लिए निलंबित किया गया है। प्रियंका चतुर्वेदी भी उन 12 सांसदों में शामिल हैं जिन्हें सदन में ‘खराब आचरण’ के आरोपों के चलते राज्यसभा से निलंबित किया गया था। चतुर्वेदी ने अपने इसी निलंबन के खिलाफ यह इस्तीफा दिया है।

वहीं, विपक्ष ने इस निलंबन को अलोकतांत्रिक व उच्च सदन के नियमों व प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। फिलहाल, ये लोग संसद परिसर के अंदर महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने दिन भर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इन लोगों ने अपना निलंबन रद्द किए जाने तक हर दिन ऐसा करना जारी रखने का फैसला किया है।

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खबर की सच्चाई दिखाने पर Tv9 बांग्ला के रिपोर्टर-कैमरामैन पर हुआ हमला

पश्चिम बंगाल में ‘टीवी9 बांग्ला’ (Tv9 Bangla) के रिपोर्टर और कैमरामैन के साथ मारपीट का मामला सामने आया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 06 December, 2021
Last Modified:
Monday, 06 December, 2021
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पश्चिम बंगाल में ‘टीवी9 बांग्ला’ (Tv9 Bangla) के रिपोर्टर और कैमरामैन के साथ मारपीट का मामला सामने आया है। घटना मालदा जिले के इंग्लिशबाजार की बतायी जा रही है। बदमाशों ने ‘TV9 बांग्ला’ के रिपोर्टर और कैमरामैन के साथ न केवल मारपीट की, बल्कि उनके कैमरे भी तोड़ दिये।

टीवी9 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खबर के जरिए एक एंबुलेंस दलाल गिरोह का पर्दाफाश करने को लेकर यह मारपीट की गई है। शनिवार को चैनल पर एक खबर प्रसारित हुई थी कि मालदा एक निजी नर्सिंग होम ने दावा किया था कि एक पिता ने बेटी के जन्म होने के कारण अपनी पत्नी और बच्ची को अस्पताल में छोड़ दिया था, लेकिन 24 घंटे के अंदर यह घटना झूठी साबित हुई और चैनल ने लोगों के सामने सही तथ्य पेश किए गए।  

‘टीवी9 बांग्ला’ के प्रतिनिधि रूपक सरकार दिनाजपुर की उस आदिवासी महिला के घर पहुंचे, जहां महिला ने उन्हें बताया कि उनका पति बेटी जन्म होने के कारण नहीं बल्कि अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे की व्यवस्था करने के लिए अन्य जगह गये थे। महिला ने यह भी चैनल को बताया कि अस्पताल के नर्सों ने उन्हें सिखाया था कि उन्हें क्या बोलना है? पीड़ित महिला ने शिकायत की कि पहले तो वह अस्पताल नहीं जाना चाहती थी। वह सरकारी अस्पताल जाना चाहती थी, लेकिन उस वक्त एंबुलेंस चालक ने निजी अस्पताल के सामने गाड़ी खड़ी कर दी और कहा कि एंबुलेंस खराब हो गई है। इस निजी अस्पताल की सेवाएं अच्छी हैं। उन्हें यहीं भर्ती होना चाहिए। ड्राइवर के कहे अनुसार गरीब परिवार को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में जब महिला के पति को बिल भरने की बारी आई, तो उसने अपना सिर पकड़ लिया। निजी अस्पताल में 3 लाख 20 हजार रुपए का बिल आया था।

‘टीवी9’ की रिपोर्ट के मुताबिक, चैनल की टीम जब इसका जवाब खोजने निकली, तो सच सामने आ गया। पता चला कि सरकारी स्वास्थ्य परिसेवा में नर्सिंग होम चलाने वालों के कब्जे में है।

घटना में घायल हुए टीवी9 के प्रतिनिधि सुभोतोष भट्टाचार्य ने कहा, ‘ऐसे ही एंबुलेंस से मरीजों को निजी नर्सिंग होम ले जाया जाता है और फिर नर्सिंग होम में मनमाना बिल बनाया जाता है। इन सब बातों की जानकारी मिलने के बाद जब हम निजी अस्पताल पहुंचे तो अस्पताल के स्टॉफ का वेश बनाकर बदमाशों ने हम पर हमला कर दिया। हमारे कैमरामैन से उसके हाथ से कैमरा छीन लिया और उसे तोड़ दिया। जब मैंने खुद को बचाने की कोशिश की तो मुझ पर हमला किया गया। ये बदमाश विभिन्न असामाजिक गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल हैं।’

‘टीवी9 बांग्ला’ के मैनेजिंग एडिटर अमृतांशु भट्टाचार्य ने कहा, ‘इस तरह मीडिया पर हमेशा से हमले होते रहे हैं। आज फिर वही हुआ। यानी जब कोई मीडिया बिना किसी डर के निडर होकर जनता के साथ खड़ा होता है और भ्रष्टाचार को बेनकाब करने की कोशिश करता है। यह वास्तव में देश पर शासन करने की शैली है जिसका यहां भी उपयोग किया गया है।’

  

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प्रियंका चतुर्वेदी ने ‘संसद टीवी’ से दिया इस्तीफा, सभापति को पत्र लिखकर बताई वजह

शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने ‘संसद टीवी’ के एक शो के लिए एंकर के पद से इस्तीफा दे दिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 06 December, 2021
Last Modified:
Monday, 06 December, 2021
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शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने ‘संसद टीवी’ के एक शो के लिए एंकर के पद से इस्तीफा दे दिया है। दरअसल उन्होंने यह कदम, संसद के मानसून सत्र में 11 अन्य लोगों के साथ राज्यसभा से निलंबन के बाद उठाया है। प्रियंका चतुर्वेदी संसद टीवी के शो 'मेरी कहानी' की एंकर थीं। उन्होंने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को एक पत्र लिखकर इसका कारण भी बताया है।

राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा, 'यह बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं संसद टीवी के शो 'मेरी कहानी' के एंकर के रूप में पद छोड़ रही हूं। मैं ऐसी जगह पर किसी पद पर रहने के लिए तैयार नहीं हूं, जहां मेरे प्राथमिक अधिकार को ही छीना जा रहा है। यह हम 12 सांसदों के मनमाने निलंबन के कारण हुआ है। इसलिए, जितना मैं इस शो के करीब थी, उतना ही मुझे दूर जाना पड़ रहा है।'

उन्होंने लिखा, ‘यह कदम मेरी आवाज को दबाने के लिए, मेरी पार्टी की आवाज को चैंबर के अंदर रखने से रोकने के लिए उठाया गया। जब संविधान की मेरी प्राथमिक शपथ को पूरा करने से वंचित किया जा रहा है तो ऐसे में संसद टीवी में सेवाएं देने को तैयार नहीं हूं।'

उन्होंने आगे लिखा कि इस निलंबन से मेरा सांसद ट्रैक रिकॉर्ड भी खराब हुआ है। मुझे लगता है कि अन्याय हुआ है। 'मेरी कहानी' कार्यक्रम का परोक्ष जिक्र करते हुए उन्होंने कहा 'यह कदम महिला सांसदों को अपनी यात्रा साझा करने के लिए एक मंच प्रदान करने के मेरे योगदान का अपमान करने के लिए भी उठाया गया है, जबकि यह पहल मैंने अपने कर्तव्यों से परे जाकर की। मैं इसे अन्याय मानती हूं, लेकिन सभापति की नजर में यह जायज है तो मुझे इसका सम्मान करना होगा।' 

बता दें कि अगस्त में संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में अमर्यादित व्यवहार करने के लिए विपक्ष के 12 सांसदों को सभापति वेंकैया नायडू ने निलंबित किया है। इनमें से छह कांग्रेस के, दो-दो शिवसेना व तृणमूल के और माकपा व भाकपा के एक-एक सदस्य शामिल हैं। यह कार्रवाई पिछले सोमवार को की गई थी। इन सभी सांसदों को पूरे चालू शीत सत्र के लिए निलंबित किया गया है। विपक्ष ने इस निलंबन को अलोकतांत्रिक व उच्च सदन के नियमों व प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। फिलहाल, ये लोग संसद परिसर के अंदर महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने दिन भर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इन लोगों ने अपना निलंबन रद्द किए जाने तक हर दिन ऐसा करना जारी रखने का फैसला किया है।

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Mirror Now से अलग हुईं सीनियर एडिटर तन्वी शुक्ला, चैनल पर कही ये बात

‘मिरर नाउ’ से पहले तन्वी शुक्ला ‘टाइम्स नाउ’ में डिप्टी न्यूज एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
Tanvishukla64532

तन्वी शुक्ला ने ‘टाइम्स नेटवर्क’ (Times Network) के अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘मिरर नाउ’ (Mirror Now) से इस्तीफा दे दिया है। यहां पर वह सीनियर एडिटर (ब्रॉडकास्ट और डिजिटल) की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

अपने इस्तीफे के बारे में तन्वी शुक्ला ने ट्विटर पर खुद घोषणा की है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘मिरर नाउ से आपके लिए खबर देने से ज्यादा मुझे कहीं और खुशी नहीं मिली है। जो मैं यहां से ले जा रही हूं, उन अनुभवों और यादों को लेकर मैं एक किताब लिख सकती हूं। लेकिन फिलहाल के लिए अभी मैं सिर्फ धन्यवाद लिख रही हूं।’

बता दें कि शुक्ला को ब्रॉडकास्ट, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में काम करने का 15 साल से ज्यादा का अनुभव है। ‘मिरर नाउ’ से पहले तन्वी शुक्ला ‘टाइम्स नाउ’ में डिप्टी न्यूज एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।  इसके अलावा पूर्व में वह ‘CNBC TV 18’, ‘Bloomberg TV India’ और ‘DNA’ में भी अपनी जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं।

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टीवी पत्रकार चंदन दुबे ने अब इस न्यूज चैनल के साथ शुरू किया नया सफर

टीवी पत्रकार चंदन दुबे ने ‘एबीपी’ नेटवर्क को बाय बोल दिया है। यहां वह करीब दो साल से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 04 December, 2021
Chandan Dubey

टीवी पत्रकार चंदन दुबे ने ‘एबीपी’ नेटवर्क को बाय बोल दिया है। यहां वह करीब दो साल से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। चंदन दुबे ने अब ‘टाइम्स नेटवर्क’ (Times Network) के हिंदी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ (Times Now Navbharat) के साथ अपनी नई पारी शुरू की है। यहां उन्होंने आउटपुट डेस्क पर जॉइन किया है।  

मूल रूप से भागलपुर (बिहार) के रहने वाले चंदन दुबे को पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने का करीब 15 साल का अनुभव है। चंदन दुबे ने नोएडा में ‘जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड मास कम्युनिकेशन’ (JIMMC) से पत्रकारिता की पढ़ाई की है।

इसके बाद उन्होंने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत ‘एस1’ न्यूज चैनल से बतौर रिपोर्टर की थी। यहां करीब दो साल काम करने के बाद उन्होंने यहां से अलविदा बोलकर ‘आजाद न्यूज’ चैनल जॉइन कर लिया था। यहां करीब एक साल अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद उन्होंने ‘इंडिया न्यूज’  (India News) चैनल जॉइन कर लिया था।

 ‘इंडिया न्यूज’ में आउटपुट डेस्क पर करीब दस साल लंबी अपनी पारी को विराम देकर उन्होंने अपना नया सफर ‘न्यूज नेशन’ (News Nation) चैनल के साथ बतौर सीनियर प्रड्यूसर शुरू किया था। इसके बाद ‘एबीपी’ होते हुए अब वह ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ पहुंचे हैं।

समाचार4मीडिया की ओर से चंदन दुबे को उनकी नई पारी के लिए ढेरों शुभकामनाएं।

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लाइव रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकार से लोगों ने की बदसलूकी, एक ने जड़ा थप्पड़

लाइव रिपोर्टिंग के दौरान कई बार पत्रकारों के साथ बदसलूकी के मामले सामने आए हैं। ऐसा ही एक मामला इटली से सामने आया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 02 December, 2021
Last Modified:
Thursday, 02 December, 2021
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लाइव रिपोर्टिंग के दौरान कई बार पत्रकारों के साथ बदसलूकी के मामले सामने आए हैं। ऐसा ही एक मामला इटली से सामने आया है, जहां फुटबॉल स्टेडियम के बाहर खड़े होकर रिपोर्टिंग कर रही महिला टीवी रिपोर्टर के साथ बदसलूकी की गई।

दरअसल यह घटना तब हुई जब मैच देखकर बाहर निकल रहे एक दर्शक ने इतालवी टीवी रिपोर्टर को लाइव रिपोर्टिंग के दौरान पीछे से थप्पड़ जड़ दिया। इतना ही नहीं, एक अन्य दर्शक रिपोर्टर पर थूकता हुआ भी दिखाई दिया। यह पूरी घटना लाइव टीवी में कैद हो गई और उन असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई भी की गई है। आरोपियों को तीन साल के लिए स्टेडियम आने पर प्रतिबंधित कर दिया गया है।

जहां महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्लो कास्टेलानी स्टेडियम (Carlo Castellani Stadium)  में फुटबॉल मैच का आयोजन किया गया था। मैच के बाद दर्शकों का रिएक्शन जानने के लिए टोस्काना टीवी (Toscana TV) की खेल पत्रकार ग्रेटा बेकाग्लिया (Greta Beccaglia) स्टेडियम के बाहर से लाइव रिपोर्टिंग कर रही थीं। मैच जैसे ही खत्म हुआ और दर्शक बाहर निकलने लगे।

इस मैच में Fiorentina की टीम Serie से 2-1 से हार गई थी। रिपोर्टर बेकाग्लिया मैच के बाद निराश Fiorentina प्रशंसकों से बात कर रही थीं, तभी दो लोग पीछे से उसके पास आए और उन्हें थप्पड़ मार दिया। महिला रिपोर्टर को लाइव थप्पड़ मारने से पहले उनमें से एक व्यक्ति उनके हाथ में थूकता हुआ दिखाई दिया। वहीं, एक शख्स कैमरे के सामने आकर अश्लील इशारे करने लगा। इस दौरान बेकाग्लिया उससे हटने की अपील करती नजर आईं। कैमरामैन ने भी बीचबचाव किया। स्टूडियो में बैठे एंकर ने भी रिपोर्टर से गुस्सा ना करने की अपील की। फिलहाल बेकाग्लिया ने उस व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है, जिसने उसे थप्पड़ मारा था।

वहीं टोस्काना टीवी ने कहा कि वह अपनी रिपोर्टर के साथ है। जो हुआ वह अस्वीकार्य है और इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए।   

यह पूरी घटना कैमरे पर रिकॉर्ड हो गई। इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ है जिसे आप यहां देख सकते हैं-

 

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Zee ने स्पोर्ट्स की दुनिया में फिर बढ़ाए कदम, खरीदे इस लीग के प्रसारण अधिकार

वैसे यह प्रसारण अधिकार अधिग्रहण ऐसे समय पर हुआ है, जब Zee देश की सबसे बड़ी एंटरटेनमेंट कंपनी बनाने के लिए सोनी पिक्चर्स के साथ अपने कारोबार को मर्ज करने की प्रक्रिया में है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 30 November, 2021
Last Modified:
Tuesday, 30 November, 2021
Zee Entertainment

‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’  (Zee Entertainment Enterprises Ltd) ने अमीरात क्रिकेट बोर्ड (ECB) यूएई टी20 लीग (UAE T20 League) के प्रसारण अधिकार 10 साल के लिए हासिल कर लिए हैं। करीबी सूत्रों ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ को यह जानकारी दी।

सूत्रों ने आगे बताया कि ब्रॉडकास्टर को लीग के प्रसारण अधिकार शुल्क (broadcast rights fee) के तौर पर प्रति वर्ष 15 मिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा। इस प्रकार, इस डील का कुल मूल्य 10-वर्ष की अवधि के दौरान 150 मिलियन डॉलर होगा।

वैसे यह प्रसारण अधिकार अधिग्रहण ऐसे समय पर हुआ है, जब कंपनी 2 अरब डॉलर के संयुक्त राजस्व के साथ देश की सबसे बड़ी एंटरटेनमेंट कंपनी बनाने के लिए सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (Sony Pictures Networks India) के साथ अपने कारोबार को मर्ज करने की प्रक्रिया में है। ZEEL 2016 में ‘टेन स्पोर्ट्स’ (Ten Sports) को 385 मिलियन डॉलर में सोनी को बेचकर स्पोर्ट्स बिजनेस से बाहर हो गया था। जी-सोनी के मर्जर का मतलब होगा कि नई कंपनी में स्पोर्ट्स जॉनर की फिर से वापसी।

मीडिया इंडस्ट्री के एक दिग्गज ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘ZEEL ने यूएई टी20 लीग के प्रसारण अधिकार के लिए 15 मिलियन डॉलर के वार्षिक भुगतान के साथ 10 साल का करार किया है। इस तरह ब्रॉडकास्टर 10 साल की अवधि में 150 मिलियन डॉलर का भुगतान करेगा।’

हाल ही में हुई APOS India Summit में ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEEL) के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ पुनीत गोयनका ने कहा था कि ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ और ‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया’ के साथ प्रस्तावित मर्जर में सबकुछ ट्रैक पर है और यह प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा था कि मर्जर के बाद बनने वाली कंपनी में सोनी पिक्चर्स 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश करेगी, जिससे हमें स्पोर्ट्स समेत दूसरे प्रीमियम कंटेंट मिलेंगे और इसमें ज्यादा से ज्यादा निवेश करने का मौका भी मिलेगा।

यह पूछे जाने पर क्या मर्जर के बाद बनने वाली नई कंपनी इंडियन प्रीमियम लीग (IPL) के आगामी सीजन के राइट्स खरीदने के लिए भी बोली लगाएगी? तब गोयनका ने कहा था कि बोली लगाने का फैसला, नहीं लगाने का फैसला और किस कीमत पर बोली लगाना है, यह सारे फैसले मर्जर के बाद बनने वाली नई कंपनी का बोर्ड लेगा। मैं अकेले यह नहीं तय कर सकता।

गोएनका ने कहा था, ‘Zee और Sony के मर्जर से देश की सबसे बड़ी मीडिया व एंटरटेनमेंट कंपनी बनेगी। हमारा रेवेन्यू स्टैंडअलोन आधार पर करीब 2 अरब डॉलर का होगा। साथ ही मर्जर के बाद बनने वाली कंपनी में सोनी जो पूंजी लगाएगी, वह हमें स्पोर्ट्स सहित दूसरे प्रीमियम कंटेंट में अधिक निवेश का मौका देगा।

उन्होंने कहा था, ‘डिजिटल दुनिया ने पैसे कमाने के नए स्रोत बनाए हैं, जो लगभग 5 साल तक नहीं मौजूद था। सिर्फ इस सेक्टर में ही काफी कुछ नई चीजें हो रही हैं। ऐसे में निश्चित रूप से नई कंपनी के लिए स्पोर्ट्स भी एक नया फोकस एरिया होगा। भारत निकट भविष्य में TV और डिजिटल के लिए बड़ा बाजार बना रहेगा। एक कंपनी के रूप में Zee अपनी डिजिटल उपस्थिति को बढ़ाने और उसके साथ लिनियर टीवी में निवेश करना जारी रखेगी।’

उन्होंने यह भी कहा था कि Zee स्टैंडअलोन आधार पर खेल अधिकारों के लिए बोली नहीं लगाएगा क्योंकि उसने अभी-अभी खेल के क्षेत्र में सोनी के साथ गैर-प्रतिस्पर्धा समाप्त की है। उन्होंने कहा था कि हम स्टैंडअलोन आधार पर खेल पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन अभी मेरा पूरा ध्यान सोनी के साथ दोनों के बीच होने वाली डील पर है। उन्होंने कहा था कि स्पोर्ट्स से बाहर निकलने के बाद से बहुत कुछ बदल गया है और मजेदार बात यह है कि हमने इसे सोनी को था और अब सर्कल फिर से वापस घूम रहा है।

वैसे बता दें कि क्रिकेट, जिसके दुनियाभर में 2.5 बिलियन से अधिक खेलप्रेमी हैं। क्रिकेट संयुक्त अरब अमीरात में दूसरा सबसे अधिक देखा जाने वाला खेल है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे क्रिकेट के दीवाने देशों का एक बड़ा प्रवासी वर्ग भी रहता है। यही कारण है कि लीग में छह टीम मालिकों में से चार भारतीय कंपनियां हैं।

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न्यूज चैनल के संपादक को धमकी, पत्रकार संगठन ने की CM से संज्ञान लेने की मांग

गुवाहाटी स्थित एक न्यूज चैनल के संपादक को प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम’ (उल्फा) द्वारा धमकाने का मामले सामने आया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 25 November, 2021
Last Modified:
Thursday, 25 November, 2021
RajdeepBailungBaruah5454

गुवाहाटी स्थित एक न्यूज चैनल के संपादक को प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम’ (उल्फा) द्वारा धमकाने का मामले सामने आया है।

उल्फा (आई) ने ‘एनडी 24’ (न्यूज डेली 24) के संपादक राजदीप बैलुंग बरुआ पर निशाना साधा है। दरअसल, असम राइफल्स ने पिछले दिनों तीन युवकों को म्यांमार की सीमा से लगे नागालैंड के मोन जिले से हिरासत में लिया था। खबर है कि तीनों युवक उग्रवादी संगठन उल्फा (आई) के संपर्क में थे। इसी खबर को स्थानीय न्यूज चैनल के संपादक ने प्रमुखता से चलाया, जिससे उग्रवादी संगठन बौखला गया। संगठन के द्वारा पहले फोन के जरिए संपादक को धमकाया गया और फिर एक बयान जारी कर उल्फा (आई) ने इस खबर पर टिप्पणी करने के संपादक के अधिकार पर सवाल उठाते हुए ने उन्हें चेतावनी दी है।

संगठन ने सारी हदें पार करते हुए संपादक को भविष्य में ऐसी 'गलती' न करने का आदेश भी दिया। आदेश नहीं मानने पर उग्रवादी संगठन ने संपादक के खिलाफ किसी भी तरह का कदम उठाने की धमकी दी है।

वहीं, इस मामले में इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (आईजेयू) ने प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम’ द्वारा गुवाहाटी स्थित एक न्यूज चैनल के संपादक को धमकाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की और राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मामले में संज्ञान लेने की मांग की है।

उल्फा भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में सक्रिय एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन है। सशस्त्र संघर्ष के द्वारा असम को एक स्वतंत्र राज्य बनाना इसका लक्ष्य है। भारत सरकार ने इसे साल 1990 में प्रतिबंधित कर दिया और इसे एक 'आतंकवादी संगठन' के रूप में वर्गीकृत किया है। ये संगठन असम और उसके आसपास के इलाकों में कई अग्रवादी वारदातों को अंजाम दे चुका है। संगठन पर स्थानीय युवाओं को बरगलाकर अपने संगठन में शामिल कर लेने के आरोप लगते रहे हैं।

 

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