मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को लेकर क्या-क्या बोला, पढ़ें यहां

अवॉर्ड लेने के लिए मनीला पहुंचे रवीश कुमार ने पब्लिक लेक्चर में भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Ravish Kumar

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार इस साल का प्रतिष्ठित रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड (Ramon Magsaysay Awards) पाने के लिए फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे हुए हैं। रवीश कुमार को यह अवॉर्ड दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी, लेकिन अवॉर्ड लेने से पहले मनीला में शुक्रवार को उन्होंने मैगसायसाय के मंच से पब्लिक लेक्चर दिया। इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। बता दें कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रवीश कुमार को 9 सितंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे यह अवॉर्ड दिया जाएगा।

रैमन मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने लोगों के समक्ष जो बातें कहीं, उन्हें एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर पब्लिश किया है, जिसे हम आपके समक्ष हूबहू रख रहे हैं।

‘नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है। गौरव के इस क्षण में मेरी नजर चांद पर भी है और जमीन पर भी, जहां चांद से भी ज्यादा गहरे गड्ढे हैं। दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए। यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज से। सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा। देश सही सूचनाओं से बनता है। फेक न्यूज, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है। रैमन मैगसायसाय फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं कि क्या बोल रहा हूं। आपके पास अंग्रेजी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं।

दो महीने पहले जब मैं 'Prime Time' की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया। कॉलर आईडी पर फिलीपींस फ्लैश कर रहा था। मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है। यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है। अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं।

खैर, फिलीपींस के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं। मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेजी में एक महिला की आवाज थी, ‘May I please speak to Mr Ravish Kumar?’ हजारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी। मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया। उस तरफ से आ रही आवाज मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमन मैगसायसाय पुरस्कार दिया जा रहा है। मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिंदी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है। गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है। उसमें कोई दम नहीं है। अब मैं अपने विषय पर आता हूं।

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है। नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है। यह जानते हुए कि इस समय नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से खुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा। दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है। नफरत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है। रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है। मगर असंभव नहीं है।

नागरिकता के लिए जरूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो। आज स्टेट का मीडिया और उसके बिजनेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है। मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना। मीडिया अब सर्विलांस स्टेट का पार्ट है। वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है। प्राइवेट मीडिया और गवर्नमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है। इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है। ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है।

न्यूज चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है। इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है। मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं-एक, नेशनल और दूसरे, एंटी-नेशनल। एंटी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है। असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है। उस आत्मा पर रोज हमला होता है। जब नागरिकता खतरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी। नागरिक तो दोनों हैं। जो खुद को नेशनल कहता है, और जो एंटी-नेशनल कहा जाता है।

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है और लोगों के बीच लेजिटिमाइज हो चुका है। फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा। उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया। यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है। हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं। अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली। फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया। कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया। यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है। हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से खुद ही अलग हो गए।

कश्मीर में दूसरी कहानी है। वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। क्या आप बगैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटीजन की कल्पना कर सकते हैं? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे और वह उस सिटीजन के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है।

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत। नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं। पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है। कैसे रिपोर्टिंग करनी है। इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है। बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें। जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ, जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है। यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है। मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की। पीसीआई बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया। दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है। प्रोपेगंडा के जरिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा तो उधर से गुब्बारा मार दिया। वैसे, भारत के न्यूज चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं। बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं। आप हंसें नहीं। वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए। यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटीजन जर्नलिज्म' को गढ़ना शुरू किया था। इसके जरिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटीजन जर्नलिज्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटीजन जर्नलिज्म दोनों अलग चीजें हैं। लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया। न्यूजरूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे। आज भी कई सारे न्यूजरूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के जरिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते। यह सिटीजन जर्नलिज्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ।

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एंटी-नेशनल बताने लगेगा। मीडिया लगातार सिटीजन जर्नलिज्म के स्पेस को एंटी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज्म में नहीं है। जर्नलिज्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है। मेरे ख़्याल से सिटीजन जर्नलिज्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म सूचना के खिलाफ हो जाए। उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नजर आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे। असमहति की आवाज को गद्दार कहने लगे। इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है।

जब मीडिया ही सिटीजन के खिलाफ हो जाए तो फिर सिटीजन को मीडिया बनना ही पड़ेगा। यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटीजन और सिटीजन जर्नलिज्म दोनों के खतरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नजर आती है। उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया सिटीजन जर्नलिज्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है। सिटीजन जर्नलिज्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके।

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है। वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है। अगर आप इस मीडिया के जरिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है। यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है। कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज में एक ही प्रकार की सूचना है। एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके। इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है। (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे। इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है। एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है।

भारत में बहुत कुछ शानदार है, यह एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज्यादातर हिस्सा गटर हो गया है। भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है, लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर रात कुचलने आ जाता है। भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है।

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र खूब जिंदा है। हर दिन सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है। इनकी अब खबरें नहीं बनती। उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है। इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद विडियो बनाने लगे हैं। फोन से बनाए गए उस विडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के वॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है। इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाजी करे। इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए वॉट्सऐप ग्रुप के लिए विडियो बना रहा है। आंदोलन करने वाले सिटीजन जर्नलिज्म करने लगते हैं। अपना विडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं।

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटीजन को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है? सिटीजन बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है। अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है? नागरिक फिर भी लड़ रहा है।

मुझे हर दिन वॉट्सऐप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं। कभी-कभी यह संख्या ज्यादा भी होती है। हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए। जब भी मैं अपना वॉट्सऐप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता। मैं हजारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने वॉट्सऐप को पब्लिक न्यूजरूम कहता हूं। देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए। गालियां आईं, धमकियां भी आईं। आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए। अपनी और इलाके की खबरों को लेकर। ये वे खबरें हैं, जो न्यूज चैनलों की परिभाषा के हिसाब से खत्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब खुद परेशानी में पड़ते हैं तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है। उनके जहन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है।

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे। उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया। जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटीजन जर्नलिज्म के नाम पर जर्नलिज्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटीजन के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया। मीडिया का यही भविष्य होना है। उसके पत्रकारों को सिटीजन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटीजन बन सकें।

ठीक उसी समय में, जब न्यूज चैनलों से आम लोग गायब कर दिए गए और उन पर डिबेट शो के जरिये पॉलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे। गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे। मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा। क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया।

'Prime Time' का मिजाज (नेचर) बदल गया। हजारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं। जिन परीक्षाओं के रिजल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं। अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है। 'Prime Time' की 'जॉब सीरीज' का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिजल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला। जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था। बस मेरा वॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूजरूम में बदल गया। सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई।

'Prime Time' अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है। ये वॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था। एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली खबरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे। मेरा न्यूजरूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है। यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है। तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं। जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे। 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते। जर्नलिज्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटीजन एंड सिटीजनशिप। मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटीजन को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटीजन अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे। डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे।

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है। वह 'Prime Time' देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे। उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और 'Prime Time' देखा। वह भारत के लोकतंत्र की सिटीजन है। जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा। उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में खुद लिखकर मुझसे माफी मांगी। अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं। महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है। जब घर में वह मेरा शो चलाता है तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं। मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटीजन जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटीजन से भी जूझना होगा। चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं। सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं। उनका जोखिम बढ़ जाता है। आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है। आज का सिटीजन दोहरे दबाव में हैं। उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े। जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है।

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा। वर्ना उसकी आवाज वॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी। पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए जरूरी निर्भीकता का माहौल बनाए। स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो। इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है। उस इतिहास को छीना जा रहा है।

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस-अनगिनत नाम हैं। ये सब सिटीजन जर्नलिस्ट थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया। उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें। गांधी खुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे। चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूजरूम बनाकर बैठ गई। वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी। उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है।

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है। किसी भी देश को जिंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है। सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमजोर होगा। इसलिए एक बार फिर सिटीजन जर्नलिज्म की जरूरत तेज हो गई है। वह सिटीजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रैटेजी से अलग है। इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं। कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटीजन जर्नलिज्म के एसेंस को जिंदा किए हुए हैं। उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है। जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है।

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी। आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं। गांधी ने एक बड़े अखबार के बारे में कहा, जिसमें खबर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है। गांधी ने कहा था कि यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की। आज अखबार डर गए हैं। वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं। गांधी ने कहा था- ‘आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ खबर सुननी हो, तो एक-दूसरे से पूछ लें। अगर पढ़ना ही चाहें  तो सोच-समझकर अखबार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों। भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है।‘ गांधी होते तो यही कहते जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं।

आज बड़े पैमाने पर सिटीजन जर्नलिस्ट की जरूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत है सिटीजन डेमोक्रेटिक की। (DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS CITIZEN DEMOCRATIC।)

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं। NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं। डॉ. प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है। मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे खूब प्यार दिया है। मैं सबका हूं। मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है। मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे। मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे। अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं। मेरा दोस्त अनुराग यहां है। मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी। मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं। काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए। अच्छा नागरिक बना कीजिए।

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Thursday, 04 June, 2020
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कोविड-19 महामारी को रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन ने जहां देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, वहीं इससे मीडिया इंडस्ट्री भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ऐसे में वॉयकॉम18 मीडिया प्रा. लिमिटेड (Viacom18 Media Pvt. Ltd ) ने गुरुवार को एक अच्छी खबर दी है। दरअसल वॉयकॉम18 ने एक बार फिर अपने मूवी चैनल ‘रिश्ते सिनेप्लेक्स’ (Rishtey Cineplex) को रीलॉन्च करने की घोषणा की है, जोकि 5 जून से शुरू होगा।

‘रिश्ते सिनेप्लेक्स’ के रीलॉन्च के साथ ही वॉयकॉम18 अब हिंदी मूवी स्पेस में अपने मूवी पोर्टफोलियो का विस्तार करेगा। अपनी ब्रैंड टैगलाइन ‘फिल्में मस्त हैं’ के तहत ही चैनल रीजनल मार्केट से हिंदी में डब्ड की हुई मूवीज और अलग-अलग जॉनर की मूवीज टेलिकास्ट करेगा।

चैनल के पास 500 से अधिक बेहतरीन फिल्मों की लाइब्रेरी है और जल्द ही यह चैनल प्रमुख केबल और डीटीएच प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध होगा।

15 महीने बाद फिर से शुरू किए जा रहे इस चैनल ने अपने पूर्व अवतार में अपार लोकप्रियता हासिल की थी और हिंदी मूवीज चैनलों की सूची में नंबर-1 पर भी रहा था।

हिंदी भाषी क्षेत्रों के दर्शकों को टार्गेट करने वाले चैनल ‘रिश्ते सिनेप्लेक्स’ का उद्देश्य हिंदी में डब की गई तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी और भोजपुरी फिल्मों के मिश्रण के जरिए ही दर्शकों का मनोरंजन करना है। चैनल की लाइब्रेरी में 1500 से भी अधिक घंटे का कंटेंट है, जिसमें 500 से ज्यादा बेहतरीन फिल्में हैं। चैनल की हर महीने दो मूवी फेस्टिवल्स और एक प्रीमियर को होस्ट करने की योजना है।

 

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इस कंपनी ने खरीदे एशिया में सोनी पिक्चर्स के Pay TV Channels

‘सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट’ (Sony Pictures Entertainment) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है।

Last Modified:
Tuesday, 02 June, 2020
SONY

‘सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट’ (Sony Pictures Entertainment) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘केसी ग्लोबल मीडिया’ (KC Global Media Entertainment) ने एशिया में ‘सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट’ के पे टीवी चैनल्स (Pay TV Channels) का अधिग्रहण कर लिया है।  

बता दें कि ‘केसी ग्लोबल मीडिया’ के हेड एंडी कापलान (Andy Kaplan) और जॉर्ज चिएन (George Chien) पहले सोनी नेटवर्क से ही जुड़े हुए थे। दोनों ने पिछले साथ आपस में हाथ मिलाया था।

इसके साथ ही ‘केसी ग्लोबल मीडिया’ ने अवनि भांचावत (Avani Bhanchawat) को वाइस प्रेजिडेंट (Affiliates, Media and Sponsorship Sales) के पद पर प्रमोट किया है। वह सिंगापुर से अपना काम संभालेंगी।

भांचावत सोनी के साथ पिछले करीब पांच साल से जुड़ी हुई हैं। सोनी से पहले वह वायकॉम इंटरनेशनल मीडिया नेटवर्क्स (एशिया और अफ्रीका) में अपनी जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

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TV9 न्यूज नेटवर्क ने अपनी मैनेजमेंट टीम को कुछ यूं दी मजबूती

देश के बड़े मीडिया नेटवर्क्स में शुमार ‘टीवी9 न्यूज नेटवर्क’ (TV9 News Network) ने अपनी मैनेजमेंट टीम को मजबूती प्रदान करने के लिए कुछ फेरबदल किए हैं।

Last Modified:
Monday, 01 June, 2020
TV9-Network

देश के बड़े मीडिया नेटवर्क्स में शुमार ‘टीवी9 न्यूज नेटवर्क’ (TV9 News Network) ने अपनी मैनेजमेंट टीम को मजबूती प्रदान के लिए कुछ फेरबदल किए हैं। दरअसल, नेटवर्क ने प्रेजिडेंट विक्रम. के (Vikram K) को सीओओ (साउथ) के पद पर प्रमोट किया है। वह ग्रुप के फ्लैगशिप चैनल ‘टीवी9 तेलुगू’ (TV9 Telugu) और ‘टीवी9 कन्नड़’ (TV9 Kannada) की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके अलावा ‘नेटवर्क18’ (Network18) छोड़कर आए अमित त्रिपाठी ने यहां बतौर चीफ रेवेन्यू ऑफिसर जॉइन किया है। उनके पास पूरे नेटवर्क के रेवेन्यू को बढ़ाने की जिम्मेदारी होगी।  

‘टीवी9 नेटवर्क’ के सीईओ बरुण दास का कहना है, ‘मैं विक्रम को उनके प्रमोशन के लिए बधाई देता हूं। उन्हें मीडिया का काफी अनुभव है और अब उनके कंधों पर और बड़ी जिम्मेदारी है। वहीं अमित को भी मीडिया का काफी अनुभव है और वह दो दशक से ज्यादा समय से इंडस्ट्री में जाना-माना नाम हैं। मैं टीवी9 परिवार में अमित का स्वागत करता हूं।’

अपने प्रमोशन के बारे में विक्रम. के का कहना है, ‘टीवी9 के साथ मेरा सफर काफी अच्छा रहा है। मैं इस ग्रुप के साथ करीब 16 वर्षों से जुड़ा हुआ हूं। हम इस ग्रुप को और आगे ले जाना चाहते हैं। मुझे जो नई जिम्मेदारी दी गई है, उसे लेकर मैं काफी उत्साहित हूं और मुझे पूरा विश्वास है कि मैं सीईओ बरुण दास और ग्रुप की उम्मीदों पर खरा उतरूंगा।’

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अब नहीं दिखाई देंगे SONY के ये दो चैनल

सोनी पिक्चर्स नेटवर्क इंडिया की ओर से इस बारे में एक लेटर भी जारी किया गया है

Last Modified:
Monday, 01 June, 2020
Sony Picutres

‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क इंडिया’ (SPNI) ने अपने दो अंग्रेजी एंटरटेनमेंट चैनल्स ‘एएक्सएन’ (AXN) और ‘एएक्सएन एचडी’ (AXN HD) को बंद करने का निर्णय लिया है। बताया जाता है कि 30 जून की मध्यरात्रि से इन दोनों चैनल्स का संचालन (operation) बंद कर दिया जाएगा।   

नेटवर्क की ओर से जारी लेटर में कहा गया है, ‘हम अपने अंग्रेजी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल AXN और AXN HD’ का संचालन 30 जून 2020 की मध्यरात्रि से बंद कर देंगे।

इस लेटर में यह भी कहा गया है, ‘अपनी ग्रोथ स्ट्रैटेजी को ध्यान में रखते हुए हम अपने चैनल के पोर्टफोलियो में कुछ बदलाव कर रहे हैं। इस वजह से हमने इन दोनों चैनल्स का संचालन बंद करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय 30 जून 2020 से प्रभावी होगा।’ बता दें कि इस समय विभिन्न जॉनर्स (genres) में नेटवर्क के पास 18 एंटरटेनमेंट चैनल्स हैं।

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जल्द बंद होगा टीवी टुडे नेटवर्क का यह हिंदी न्यूज चैनल

नेटवर्क की ओर से कहा गया है कि 30 जून की मध्यरात्रि से इस चैनल के ऑपरेशंस और ट्रांसमिशन का काम बंद कर दिया जाएगा

Last Modified:
Monday, 01 June, 2020
TV-Today-Network

कोरोना के खौफ और लॉकडाउन के बीच ‘टीवी टुडे नेटवर्क’ (T.V. Today Network) की ओर से बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। दरअसल, नेटवर्क ने अपने हिंदी न्यूज चैनल ‘दिल्ली आजतक’ (Delhi AajTak) को बंद करने की घोषणा की है। इस बारे में नेटवर्क के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (डिस्ट्रीब्यूशन) केआर अरोड़ा ओर से एक लेटर भी जारी किया गया है।

इस लेटर में कहा गया है कि 30 जून की मध्यरात्रि से इस चैनल के ऑपरेशंस और ट्रांसमिशन का काम सभी प्लेटफॉर्म्स पर बंद कर दिया जाएगा। इस चैनल को ‘Dilli AajTak’ के नाम से भी जाना जाता है और यह ग्रुप का चौथा न्यूज चैनल है।

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Network18 से बड़ी खबर, अब यहां भी कटेगी एम्प्लॉयीज की सैलरी!

खबर है कि ‘नेटवर्क18’ के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी ने इस बारे में अपने एम्प्लॉयीज को एक मेल लिखा है।

Last Modified:
Thursday, 28 May, 2020
Network18

देश के प्रतिष्ठित मीडिया समूह ‘नेटवर्क18’ (Network 18) में एम्प्लॉयीज की सैलरी कटौती की खबर सामने आई है। सूत्रों के हवाले से मिली खबर के मुताबिक ‘नेटवर्क18’ के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी ने इस बारे में अपने एम्प्लॉयीज को एक मेल लिखा है। इस मेल में कहा गया है कि जिन एम्प्लॉयीज की सालान इनकम 7.5 लाख रुपए से ज्यादा है, उनकी सैलरी में 10 प्रतिशत की कटौती की जाएगी।   

इस मेल में कहा गया है कि यह समय असाधारण है और ऐसे समय में इस तरह के असाधारण उपाय करने पड़ते हैं। मेल के अनुसार, ‘हमारे जिन एम्प्लॉयीज की सालाना इनकम 7.5 लाख रुपए तक है, हम उनकी सैलरी में कोई कटौती नहीं कर रहे हैं। इसमें हमारे न्यूज बिजनेस के करीब 70 प्रतिशत साथी दायरे में हैं। लेकिन जिन एम्प्लॉयीज की सालाना इनकम 7.5 लाख रुपए से अधिक है, उनकी सैलरी में 10 प्रतिशत की कटौती की जाएगी।’   

मेल में बताया गया है कि कंपनी के शीर्ष प्रबंधन ने स्वेच्छा से अपनी सैलरी में काफी कटौती की है। राहुल जोशी की ओर से जारी इस मेल में यह भी कहा गया है, ‘जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि हमारे बिजनेस में सबसे ज्यादा खर्च मैनपावर यानी एम्प्लॉयीज पर होता है। ऐसे में बिजनेस को सुचारु रूप से चलाने के लिए मैं एक मई से सैलरी में कटौती करने के लिए बाध्य हूं।

मेल में यह भी कहा गया है कि संस्थान में अप्रैजल की प्रक्रिया जारी है और यह लगभग एक या दो हफ्ते में समाप्त हो जाएगी। राहुल जोशी ने एम्प्लॉयीज को आश्वासन दिया कि एक बार परफॉर्मेंस असेसमेंट के बाद वित्तीय वर्ष 2020 के लिए भुगतान कर दिया जाएगा और योजनानुसार पदोन्नति कर दी जाएगी। उन्होंने लिखा है, ‘उम्मीद है कि यह प्रक्रिया जुलाई तक पूरी हो जाएगी।’

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बाबा रामदेव संग मिल कुछ यूं योग का पाठ पढ़ा रहीं India TV की एंकर मीनाक्षी जोशी

रोजाना सुबह आठ बजे और शाम को पांच बजे टेलिकास्ट होता है मीनाक्षी जोशी का योग शो। मीनाक्षी ने तब सुर्खियां बटोरी थीं, जब उन्होंने बहुचर्चित शाहीन बाग धरने की ग्राउंड ज़ीरो से लाइव रिपोर्टिंग की थी।

Last Modified:
Wednesday, 27 May, 2020
Meenakshi Joshi

‘इंडिया टीवी’ की न्यूज एंकर मीनाक्षी जोशी इन दिनों योग गुरु की भूमिका में नजर आ रही हैं। जी हां, वह इन दिनों ‘इंडिया टीवी’ पर रोजाना योग गुरु बाबा रामदेव के साथ लोगों को योगासन सिखाती हुई नजर आती हैं। उनका यह शो रोजाना सुबह आठ बजे और शाम को पांच बजे टेलिकास्ट होता है।

यह भी पढ़ें: ACP बनते ही न्यूज एंकर ने इस तरह चलाया 'कानून का राज', देखें विडियो

बता दें कि मीनाक्षी जोशी को पिछले दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक दिन के लिए नोएडा का ACP भी बनाया था। हाल के दिनों में मीनाक्षी ने तब सुर्खियां बटोरी थीं, जब उन्होंने बहुचर्चित शाहीन बाग धरने की ग्राउंड ज़ीरो से लाइव रिपोर्टिंग की थी। तब उन्होंने खुलासा किया था कि कैसे शाहीन बाग का धरना प्रायोजित था और दम तोड़ने लगा था। हूटर बजाकर आसपड़ोस के लोगों को धरना स्थल पर बुलाने वाला खुलासा जब मीनाक्षी ने किया था तो उन्हें वहां धमकी भी मिली थी। बहुत डराने धमकाने की कोशिश हुई थी, लेकिन वो उन्मादी भीड़ के बीच डटी रहीं। मीनाक्षी की निडर रिपोर्टिंग की देश भर में काफी तारीफ भी हुई थी।

आजकल मीनाक्षी योग गर्ल बनकर कोरोना के संकट काल में दर्शकों को फिटनेस मंत्र दे रही हैं। वैसे तो स्वामी रामदेव के साथ कई शो लोगों ने देखे हैं, लेकिन पहली बार कोई न्यूज एंकर इतने परफेक्शन के साथ उनके साथ स्क्रीन पर यूं योग करता नजर आ रहा है। बाबा रामदेव और सुशांत के साथ मीनाक्षी का ये शो लॉकडाउन के दौरान काफी पसंद किया जा रहा है। बताया जाता है कि मॉर्निंग टाइम बैंड में इस शो की टीआरपी काफी ज्यादा है।

बता दें मीनाक्षी जोशी ट्रेंड क्लासिकल सिंगर और डांसर भी हैं। कई स्टूडेंट्स को वह भरतनाट्यम की ट्रेनिंग भी दे चुकी हैं। यही नहीं, सोशल मीडिया पर वह अपने गानों की वीडियो क्लिप भी शेयर करती रहती हैं। मीनाक्षी जोशी लोगों को किस तरह योग का पाठ पढ़ा रही हैं, वह आप इन वीडियोज में देख सकते हैं।

 

 

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न्यूज चैनल में कोरोना पॉजिटिव की संख्या बढ़ने पर प्रशासन ने उठाया ये कदम

प्रशासन का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किए जाने के बाद ही बिल्डिंग को दोबारा से खोला जाएगा

Last Modified:
Tuesday, 26 May, 2020
Corona Reporting

कोरोना का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। उत्तर प्रदेश के नोएडा में सोमवार को कोरोनावायरस (कोविड-19) के जिन 14 मामलों की जानकारी दी गई थी, उनमें नौ फिल्म सिटी स्थित एक न्यूज चैनल के थे। अब तक इस चैनल के 47 लोगों का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आ चुका है, जिनमें से 31 नोएडा से हैं।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट्स के अनुसार, चैनल में कोरोना के लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए पूरी बिल्डिंग के पांचों फ्लोर को सील कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किए जाने के बाद ही इसे दोबारा से खोला जाएगा। सभी एंप्लाईज की सघन जांच की गई है।

बताया जाता है कि प्रशासन की ओर पहले सिर्फ चौथे फ्लोर को सील किया गया था, क्योंकि सभी मामले उसी फ्लोर के एंप्लाईज के थे, लेकिन रविवार को अन्य फ्लोर के कुछ कर्मचारियों के भी कोरोना पॉजिटिव मिलने के बाद अब पूरी बिल्डिंग को सील कर दिया गया है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, नए मामले मिलने के बाद जिले में 24 कंटेंनमेंट जोन (containment zones) और शामिल किए गए हैं, जिसके बाद इनकी संख्या बढ़कर 87 हो गई है।

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iTV Network में पहुंचा कोरोना, कंपनी ने तुरंत उठाए ये एहतियाती कदम

हाल ही में कुछ मीडिया हाउस ने भी कोरोना पॉजिटिव मामलों की सूचना दी है और अब इस कड़ी में iTV नेटवर्क भी शामिल हो गया है, जहां उसके एक एम्प्लॉयी का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है

Last Modified:
Friday, 22 May, 2020
itv-network

देश-दुनिया में कोरोना से संक्रमित मरीजों के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। कोविड-19 के खिलाफ ‘जंग’ में अग्रिम मोर्चे पर तैनात मीडियाकर्मी भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। हाल ही में कुछ मीडिया हाउस ने भी कोरोना पॉजिटिव मामलों की सूचना दी है और अब इस कड़ी में iTV नेटवर्क भी शामिल हो गया है, जहां उसके एक एम्प्लॉयी का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है।

iTV नेटवर्क के प्रवक्ता ने एक मीडिया बयान में कहा कि हमारे एक मीडियाकर्मी में कोरोना टेस्ट पॉजिटिव मिलने के बाद परिसर को खाली कर दिया गया है और पूरा स्टॉफ दूसरी जगह से काम कर रहा है।

ये रहा पूरा स्टेटमेंट:

इंडिया न्यूज की आउटपुट टीम की एक सहकर्मी का कोरोना टेस्ट कल शाम पॉजिटिव आया। हमने दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में उनका दाखिला कराने में मदद की। यही नहीं, चैनल ने अपनी सहकर्मी का दिल्ली के दो बड़े डॉक्टरों से वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए एक सेशन भी करवाया। इन डॉक्टर्स में एक आईएमए के पूर्व अध्यक्ष थे। यह बड़ी राहत की बात है कि अस्पताल के डॉक्टर्स ने हमारी सहकर्मी के मामूली लक्षण के आधार पर लिखित रूप में घर पर सेल्फ क्वरंटाइन रहने की सलाह दी है।

हमने तय मानकों का पालन करते हुए फौरन सभी जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए। अपनी सहकर्मी की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के दो घंटे के अंदर, 21 मई, शाम 5 बजे तक ओखला स्थित ‘मीडिया हाउस’ परिसर, को खाली कर दिया, ताकि सैनिटाइजेशन का काम शुरू हो सके। हमने अपने उन साथियों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपर्क में हो सकते हैं। ऐसे कुल 40 लोग हैं और उन सबका कोविड-19 टेस्ट हो रहा है। इन सभी को सेल्फ क्वरंटाइन में जाने को कह दिया गया है। वैसे सहकर्मी, जो घर पर खुद को क्वरंटाइन करना नहीं चाहते, उनके लिए एक फाइव स्टार होटल में 20 कमरों का इंतजाम किया गया है।

रिपोर्ट आने के तुरंत बाद कंपनी की तरफ से डीएम तथा स्थानीय एसएचओ को पूरे मामले की जानकारी दे दी गई। ‘मीडिया हाउस’ दफ्तर को सील किया गया और एमसीडी को सूचित किया गया। निगम ने एक दौर का सैनिटाइजेशन कर दिया है और दूसरे राउंड के लिए एक निजी कंपनी को जिम्मा सौंपा गया है। इस दौरान चैनल रिकॉर्डेड मोड पर रहा और पहले से जो वैकल्पिक इंतजाम किया गया था, उसी के तहत नजदीक की एक बिल्डिंग में एकदम सीमित स्टाफ के साथ ‘इंडिया न्यूज’ और ‘न्यूजX’ का ऑपरेशन शुरू किया गया। दोनों चैनल और नेटवर्क के सभी प्रादेशिक चैनल आज दोपहर 12 बजे से ऑपरेशनल हो गए।

साथ ही स्टेटमेंट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से लॉकडाउन की घोषणा के पहले से ही आईटीवी नेटवर्क ने अपने कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था कर दी थी और दफ्तर में कम स्टाफ के साथ काम करना शुरू कर दिया था। जिस इमारत से सभी चैनल चलते हैं, ‘मीडिया हाउस’ वहां सैनिटाइजेश की पुख्ता व्यवस्था की गई, कर्मचारियों के मास्क लगाने, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने और टेम्परेचर स्क्रीनिंग को नियमित रुप से अनिवार्य किया गया। इसका वीडियो हर घंटे प्रबंधन को भेजा जाता रहा। कंपनी अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर काफी गंभीर है।

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इस वजह से जाकिर नाईक के टीवी नेटवर्क पर लगा करोड़ों का जुर्माना

इस्लामी धर्म प्रचारक जाकिर नाईक के पीस टीवी नेटवर्क पर 3,00,000 पाउंड (2.77 करोड़ रुपए) का जुर्माना लगाया गया है

Last Modified:
Monday, 18 May, 2020
zakir

इस्लामी धर्म प्रचारक जाकिर नाईक के पीस टीवी नेटवर्क पर 3,00,000 पाउंड (2.77 करोड़ रुपए) का जुर्माना लगाया गया है। उस पर यह जुर्माना अपने टीवी नेटवर्क के जरिए लोगों में नफरत फैलाने और भड़काऊ चीजों का प्रसारण करने के लिए लगाया है।

दरअसल लंदन स्थित सूचना प्रसारण सेवा नियामक ने नियमों को ताक पर रखकर उसका उल्लंघन करने के लिए लाइसेंसधारी ‘पीस टीवी उर्दू’ पर 2,00,000 पाउंड और ‘पीस टीवी’ पर 1,00,000 पाउंड का जुर्माना लगाया है।

नियामक ने कहा है कि उसे जांच में पता चला कि पीस टीवी उर्दू और पीस टीवी पर नफरत फैलाने वाली और आपत्तिजनक सामग्रियों का प्रसारण किया गया। इतना ही नहीं जिस तरह से इस पर प्रसारण किया जा रहा है, उससे कई बार लोगों के हिंसा फैलने का भी माहौल बना रहता है।

बता दें कि पीस टीवी गैरलाभकारी सेटेलाइट टीवी नेटवर्क ‘फ्री टू एयर’ है और इसका प्रसारण दुबई से अंग्रेजी, बांग्ला और उर्दू में किया जाता है। पीस टीवी का स्वामित्व लॉर्ड प्रॉडक्शन के पास है, जबकि क्लब टीवी के पास पीस टीवी उर्दू का लाइसेंस है। इन दोनों चैनलों का ऑनरशिप 54 साल का खुद जाकिर नाईक के पास है।  

गौरतलब है कि जाकिर नईक विवादित धर्म प्रचारक मनी लॉन्ड्रिंग के मसले में भारत का वांछित अपराधी है। अक्सर नाईक के दिए गए भाषण चरमपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा देने के लिए होता है। साल 2016 में ही वो भारत छुपकर मलेशिया रहने चला गया था। इसके बाद से वो कभी भारत वापस नहीं आया। मलेशिया में उसने स्थाई नागरिकता ले ली। पिछले हफ्ते ही भारत ने मलेशिया की सरकार से गुहार लगाई थी कि वो जाकिर नाईक को भारत प्रत्यर्पित कर दे। बता दें कि नाईक के ब्रिटेन में प्रवेश पर भी 2010 से रोक लगाई गई है।

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