मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को लेकर क्या-क्या बोला, पढ़ें यहां

अवॉर्ड लेने के लिए मनीला पहुंचे रवीश कुमार ने पब्लिक लेक्चर में भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Ravish Kumar

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार इस साल का प्रतिष्ठित रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड (Ramon Magsaysay Awards) पाने के लिए फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे हुए हैं। रवीश कुमार को यह अवॉर्ड दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी, लेकिन अवॉर्ड लेने से पहले मनीला में शुक्रवार को उन्होंने मैगसायसाय के मंच से पब्लिक लेक्चर दिया। इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। बता दें कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रवीश कुमार को 9 सितंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे यह अवॉर्ड दिया जाएगा।

रैमन मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने लोगों के समक्ष जो बातें कहीं, उन्हें एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर पब्लिश किया है, जिसे हम आपके समक्ष हूबहू रख रहे हैं।

‘नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है। गौरव के इस क्षण में मेरी नजर चांद पर भी है और जमीन पर भी, जहां चांद से भी ज्यादा गहरे गड्ढे हैं। दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए। यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज से। सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा। देश सही सूचनाओं से बनता है। फेक न्यूज, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है। रैमन मैगसायसाय फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं कि क्या बोल रहा हूं। आपके पास अंग्रेजी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं।

दो महीने पहले जब मैं 'Prime Time' की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया। कॉलर आईडी पर फिलीपींस फ्लैश कर रहा था। मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है। यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है। अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं।

खैर, फिलीपींस के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं। मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेजी में एक महिला की आवाज थी, ‘May I please speak to Mr Ravish Kumar?’ हजारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी। मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया। उस तरफ से आ रही आवाज मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमन मैगसायसाय पुरस्कार दिया जा रहा है। मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिंदी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है। गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है। उसमें कोई दम नहीं है। अब मैं अपने विषय पर आता हूं।

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है। नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है। यह जानते हुए कि इस समय नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से खुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा। दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है। नफरत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है। रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है। मगर असंभव नहीं है।

नागरिकता के लिए जरूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो। आज स्टेट का मीडिया और उसके बिजनेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है। मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना। मीडिया अब सर्विलांस स्टेट का पार्ट है। वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है। प्राइवेट मीडिया और गवर्नमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है। इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है। ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है।

न्यूज चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है। इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है। मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं-एक, नेशनल और दूसरे, एंटी-नेशनल। एंटी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है। असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है। उस आत्मा पर रोज हमला होता है। जब नागरिकता खतरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी। नागरिक तो दोनों हैं। जो खुद को नेशनल कहता है, और जो एंटी-नेशनल कहा जाता है।

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है और लोगों के बीच लेजिटिमाइज हो चुका है। फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा। उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया। यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है। हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं। अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली। फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया। कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया। यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है। हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से खुद ही अलग हो गए।

कश्मीर में दूसरी कहानी है। वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। क्या आप बगैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटीजन की कल्पना कर सकते हैं? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे और वह उस सिटीजन के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है।

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत। नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं। पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है। कैसे रिपोर्टिंग करनी है। इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है। बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें। जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ, जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है। यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है। मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की। पीसीआई बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया। दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है। प्रोपेगंडा के जरिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा तो उधर से गुब्बारा मार दिया। वैसे, भारत के न्यूज चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं। बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं। आप हंसें नहीं। वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए। यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटीजन जर्नलिज्म' को गढ़ना शुरू किया था। इसके जरिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटीजन जर्नलिज्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटीजन जर्नलिज्म दोनों अलग चीजें हैं। लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया। न्यूजरूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे। आज भी कई सारे न्यूजरूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के जरिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते। यह सिटीजन जर्नलिज्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ।

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एंटी-नेशनल बताने लगेगा। मीडिया लगातार सिटीजन जर्नलिज्म के स्पेस को एंटी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज्म में नहीं है। जर्नलिज्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है। मेरे ख़्याल से सिटीजन जर्नलिज्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म सूचना के खिलाफ हो जाए। उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नजर आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे। असमहति की आवाज को गद्दार कहने लगे। इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है।

जब मीडिया ही सिटीजन के खिलाफ हो जाए तो फिर सिटीजन को मीडिया बनना ही पड़ेगा। यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटीजन और सिटीजन जर्नलिज्म दोनों के खतरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नजर आती है। उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया सिटीजन जर्नलिज्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है। सिटीजन जर्नलिज्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके।

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है। वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है। अगर आप इस मीडिया के जरिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है। यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है। कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज में एक ही प्रकार की सूचना है। एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके। इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है। (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे। इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है। एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है।

भारत में बहुत कुछ शानदार है, यह एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज्यादातर हिस्सा गटर हो गया है। भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है, लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर रात कुचलने आ जाता है। भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है।

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र खूब जिंदा है। हर दिन सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है। इनकी अब खबरें नहीं बनती। उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है। इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद विडियो बनाने लगे हैं। फोन से बनाए गए उस विडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के वॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है। इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाजी करे। इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए वॉट्सऐप ग्रुप के लिए विडियो बना रहा है। आंदोलन करने वाले सिटीजन जर्नलिज्म करने लगते हैं। अपना विडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं।

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटीजन को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है? सिटीजन बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है। अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है? नागरिक फिर भी लड़ रहा है।

मुझे हर दिन वॉट्सऐप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं। कभी-कभी यह संख्या ज्यादा भी होती है। हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए। जब भी मैं अपना वॉट्सऐप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता। मैं हजारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने वॉट्सऐप को पब्लिक न्यूजरूम कहता हूं। देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए। गालियां आईं, धमकियां भी आईं। आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए। अपनी और इलाके की खबरों को लेकर। ये वे खबरें हैं, जो न्यूज चैनलों की परिभाषा के हिसाब से खत्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब खुद परेशानी में पड़ते हैं तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है। उनके जहन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है।

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे। उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया। जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटीजन जर्नलिज्म के नाम पर जर्नलिज्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटीजन के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया। मीडिया का यही भविष्य होना है। उसके पत्रकारों को सिटीजन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटीजन बन सकें।

ठीक उसी समय में, जब न्यूज चैनलों से आम लोग गायब कर दिए गए और उन पर डिबेट शो के जरिये पॉलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे। गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे। मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा। क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया।

'Prime Time' का मिजाज (नेचर) बदल गया। हजारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं। जिन परीक्षाओं के रिजल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं। अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है। 'Prime Time' की 'जॉब सीरीज' का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिजल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला। जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था। बस मेरा वॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूजरूम में बदल गया। सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई।

'Prime Time' अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है। ये वॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था। एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली खबरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे। मेरा न्यूजरूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है। यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है। तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं। जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे। 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते। जर्नलिज्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटीजन एंड सिटीजनशिप। मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटीजन को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटीजन अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे। डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे।

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है। वह 'Prime Time' देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे। उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और 'Prime Time' देखा। वह भारत के लोकतंत्र की सिटीजन है। जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा। उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में खुद लिखकर मुझसे माफी मांगी। अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं। महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है। जब घर में वह मेरा शो चलाता है तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं। मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटीजन जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटीजन से भी जूझना होगा। चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं। सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं। उनका जोखिम बढ़ जाता है। आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है। आज का सिटीजन दोहरे दबाव में हैं। उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े। जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है।

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा। वर्ना उसकी आवाज वॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी। पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए जरूरी निर्भीकता का माहौल बनाए। स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो। इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है। उस इतिहास को छीना जा रहा है।

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस-अनगिनत नाम हैं। ये सब सिटीजन जर्नलिस्ट थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया। उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें। गांधी खुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे। चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूजरूम बनाकर बैठ गई। वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी। उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है।

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है। किसी भी देश को जिंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है। सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमजोर होगा। इसलिए एक बार फिर सिटीजन जर्नलिज्म की जरूरत तेज हो गई है। वह सिटीजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रैटेजी से अलग है। इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं। कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटीजन जर्नलिज्म के एसेंस को जिंदा किए हुए हैं। उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है। जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है।

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी। आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं। गांधी ने एक बड़े अखबार के बारे में कहा, जिसमें खबर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है। गांधी ने कहा था कि यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की। आज अखबार डर गए हैं। वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं। गांधी ने कहा था- ‘आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ खबर सुननी हो, तो एक-दूसरे से पूछ लें। अगर पढ़ना ही चाहें  तो सोच-समझकर अखबार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों। भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है।‘ गांधी होते तो यही कहते जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं।

आज बड़े पैमाने पर सिटीजन जर्नलिस्ट की जरूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत है सिटीजन डेमोक्रेटिक की। (DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS CITIZEN DEMOCRATIC।)

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं। NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं। डॉ. प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है। मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे खूब प्यार दिया है। मैं सबका हूं। मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है। मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे। मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे। अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं। मेरा दोस्त अनुराग यहां है। मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी। मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं। काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए। अच्छा नागरिक बना कीजिए।

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चैनल का एमडी-एंकर कर रहे थे ऑक्सीजन की कालाबाजारी, पुलिस ने पहुंचाया हवालात

कुछ लोग कोरोना मरीजों की काम आने वाली दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी कर उन्हें ऊंचे दामों में बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

Last Modified:
Wednesday, 12 May, 2021
Arrest

देश में जितनी तेजी से कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं, उतनी ही तेजी से जीवन रक्षक दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों की मांग भी बढ़ी है। कुछ लोग कोरोना मरीजों की काम आने वाली दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी कर उन्हें ऊंचे दामों में बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। यूपी पुलिस ऐसे मुनाफाखोरों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें सजा दिला रही है। इस बीच कानपुर पुलिस ने ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी करने के आरोप में एक न्यूज चैनल के एमडी-एंकर को गिरफ्तार किया है।

हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ की वेबसाइट के मुताबिक, आरोपी की पहचान अश्विनी जैन के तौर पर हुई है, जोकि लोकल न्यूज चैनल ‘भारत ए टू जेड’ का एमडी भी है। 

कानपुर के डीसीपी (क्राइम) सलमान ताज पाटिल ने जानकारी देते हुए बताया कि पनकी इंडस्ट्रियल एरिया में क्राइम ब्रांच और पनकी पुलिस ने पत्रकारिता की आड़ में ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी करते 4 लोगों को रंगे हाथों पकड़ लिया है, जिसमें ‘भारत ए टू जेड’ न्यूज चैनल का एमडी और एंकर अश्विनी जैन भी शामिल है।

सलमान ताज ने बताया कि ये लोग मेरठ से 2 माह पहले 80-90 ऑक्सीजन सिलेंडर लाए थे। अब ये लोग बड़े सिलेंडर को 55000 रुपए और छोटे सिलेंडर को 35 से 40 हजार रुपए में बेच रहे थे।

डीसीपी के मुताबिक, ये लोग अब तक कुल 70-80 सिलेंडरों की कालाबाजारी कर चुके हैं। सारे सिलेंडर पनकी इंडस्ट्रियल एरिया में डम्प किए जाते थे। पुलिस इस मामले की सभी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है, लिहाजा जांच पड़ताल जारी है। इस मामले को लेकर थाना पनकी में अभियोग दर्ज किया गया है।

पुलिस ने पकड़े गए आरोपियों के पास से 4 बड़े और 6 छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ-साथ एक मारुति वैगनआर संख्या- यूपी78 एजी 8751 और पत्रकारों के आई-कार्ड बरामद किए हैं। आरोपियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा रही है।

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जल्द लॉन्च होगा ये एंटरटेनमेंट चैनल

एंटरटेनमेंट चैनलों के बीच जल्द ही एक और नया चैनल दस्तक देने वाला है।

Last Modified:
Tuesday, 11 May, 2021
TV Channel

एंटरटेनमेंट चैनलों के बीच जल्द ही एक और नया चैनल दस्तक देने वाला है। ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री के दिग्गज ‘भारत रंगा’ एक नया एंटरटेनमेंट चैनल ‘आजाद’ शुरू करने वाले हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चैनल के लिए शीर्ष क्रम निर्माता पहले प्रोग्रामिंग लाइन-अप पर काम कर रहे हैं, जिसे जल्द ही लॉन्च किया जाएगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरे महाराष्ट्र में लॉकडाउन की वजह से चैनल की लॉन्चिंग बहुत धीरे हो रही है।

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मतगणना की कवरेज नहीं करेंगे ये न्यूज चैनल्स, बताई यह बड़ी वजह

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब हर किसी को नतीजों का इंतजार है, जो दो मई को घोषित किए जाएंगे।

Last Modified:
Saturday, 01 May, 2021
Coverage

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब हर किसी को नतीजों का इंतजार है, जो दो मई को घोषित किए जाएंगे। इसी दिन उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के नतीजे भी आने हैं। इन सबके बीच ‘भारत समाचार’ (Bharat Samachar) न्यूज चैनल ने कोरोनावायस की कवरेज के मद्देनजर मतगणना की कवरेज नहीं करने का फैसला लिया है।

इस बारे में चैनल के एडिटर-इन-चीफ ब्रजेश मिश्रा ने एक ट्वीट भी किया है। अपने ट्वीट में ब्रजेश मिश्रा का कहना है, ‘भारत समाचार मे हम 2 मई की मतगणना की कवरेज नहीं करेंगे। इसी दिन यूपी मे पंचायत चुनाव के भी नतीजे आने हैं। लेकिन हम स्वयं को इससे अलग करते हैं। हमारी प्राथमिकता अपनों को बचाना है। उन्हें ऑक्सीजन, बेड और जीवन रक्षक दवाएं कैसे मिले ये खबर दिखाएंगे। मतगणना के अंतिम नतीजे बता दिए जायेंगे।’

खबर है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) भी यही करने जा रहा है। इस बारे में चैनल के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर जानकारी दी गई है। इस ट्वीट में चैनल का कहना है, ‘देश इस समय कोरोनावायरस जैसी महामारी से जूझ रहा है। ऐसे में चैनल ने कोविड-19 से जुड़ी खबरों को प्राथमिकता देने का फैसला लिया है। ऐसे में हमने दो मई को होने वाली मतगणना की कवरेज टाल दी है। इस दौरान हम कोविड-19 की स्थिति, वैक्सीनेशन अभियान और हेल्पलाइन आदि के बारे में कवरेज करेंगे। हमारे चैनल पर शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मौजूद रहेंगे जो लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सवालों का जवाब देंगे। हालांकि, हम पांच राज्यों में चुनाव से जुड़े अपडेट देते रहेंगे।’

 

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सहकर्मी की मौत की खबर पढ़ते समय खुद को रोक नहीं पाईं आजतक की एंकर्स, छलका दर्द

वरिष्ठ पत्रकार और आजतक के ऊर्जावान एंकर रोहित सरदाना के निधन की खबर ने हर किसी को हैरान-परेशान कर दिया है, जिसने भी यह खबर सुनी, वह सन्न रह गया।

Last Modified:
Friday, 30 April, 2021
Rohit Sardana Aajtak

वरिष्ठ पत्रकार और आजतक के ऊर्जावान एंकर रोहित सरदाना के निधन की खबर ने हर किसी को हैरान-परेशान कर दिया है, जिसने भी यह खबर सुनी, वह सन्न रह गया। शुक्रवार दोपहर उनका हार्ट अटैक के चलते निधन हो गया। 42 वर्षीय रोहित कुछ दिनों पहले ही कोरोनावायरस (कोविड-19) से संक्रमित हुए थे और होम आइसोलेशन में थे। लेकिन गुरुवार रात को तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें नोएडा के मेट्रो अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां शुक्रवार की दोपहर हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। 

जब यह खबर ‘आजतक’ की न्यूज एंकर नवजोत रंधावा देने के लिए स्क्रीन पर आईं, तो वह खुद को संभाल नहीं पायीं और फूट-फूटकर रो पड़ीं, क्योंकि बहुत ही मुश्किल होता है किसी अपने के चले जाने का गम संभाल पाना और फिर वही गम दुनिया को बता पाना। इसके बाद चित्रा त्रिपाठी ने इस खबर को आगे बढ़ाया और दुनिया को बताया कि कैसे उनके बीच काम करने वाले तेज-तर्रार एंकर अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन वह भी खुद को संभाल नहीं पायीं और उनकी आंखों से रोहित सरदाना के जाने का दर्द छलक उठा।

यह दर्द नीचे वीडियो में साफ देखा जा सकता है-

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कोरोना ने निगल ली अब न्यूज एंकर निकिता तोमर की जिंदगी

इस वक्त देश कोरोना महामारी की दूसरी प्रचंड लहर का सामना कर रहा है। तकरीबन सभी राज्यों में हर दिन बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 28 April, 2021
Last Modified:
Wednesday, 28 April, 2021
samay445

इस वक्त देश कोरोना महामारी की दूसरी प्रचंड लहर का सामना कर रहा है। तकरीबन सभी राज्यों में हर दिन बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। इस महामारी की चपेट में कई पत्रकारों ने भी अपनी जान खो दी है। इसी कड़ी में अब एक और महिला पत्रकार का नाम जुड़ गया है। सहारा समय न्यूज चैनल में कार्यरत एंकर निकिता तोमर का कोरोना वायरस के संक्रमण से निधन हो गया। वे भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मौत से जिंदगी की जंग लड़ रही थीं। लेकिन वह ये जंग हार गईं।     

2018 के माखनलाल चतुर्वेदी के भोपाल कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें नोएडा स्थित सहारा समय के कार्यालय में इंटर्नशिप करने का मौका मिला, जिसके बाद उन्होंने कड़ी मेहनत के बलबूते न्यूज एंकर तक का अपना सफर तय किया। कई लोगों ने उनकी मृत्यु के बाद ट्विटर पर अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है।

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डिज्नी से बड़ी खबर, बंद करेगी अपने 18 चैनल्स

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कंपनी कथित रूप से अपना फोकस डायरेक्ट टू कंज्यूमर (D2C) स्ट्रीमिंग बिजनेस पर शिफ्ट कर रही है।

Last Modified:
Tuesday, 27 April, 2021
Disney

एंटरटेनमेंट कंपनी ‘डिज्नी’ (Disney) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार कंपनी ने एक अक्टूबर 2021 से दक्षिणपूर्व एशिया और हॉन्ग कॉन्ग में अपने 18 चैनल्स को बंद करने की घोषणा की है।   

डिज्नी ने अपने कर्मियों को आज सुबह सिंगापुर के टाउन हॉल में अपने इस फैसले के बारे में जानकारी दी है। हालांकि कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि कितने लोग कंपनी से जुड़े रहेंगे और कितनों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अऩुसार, डिज्नी की ओर से कहा गया है, ‘D2Cfirst model की दिशा में  द वॉल्ट डिज्नी कंपनी के वैश्विक प्रयासों और अपनी स्ट्रीमिंग सर्विसेज को आगे बढ़ाने के क्रम में कंपनी ने मुख्य रूप से साउथईस्ट एशिया और हॉन्ग कॉन्ग में अपने मीडिया नेटवर्क बिजनेस के बारे में यह निर्णय लिया है। इन प्रयासों से हमें अपने संसाधनों को वर्तमान और भविष्य की व्यावसायिक जरूरतों के लिए अधिक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से संरेखित करने में मदद मिलेगी।’

बताया जाता है कि डायरेक्ट टू कस्टमर बिजनेस पर पड़ रहे प्रभाव को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। साउथईस्ट एशिया और हॉन्ग कॉन्ग में जिन चैनल्स को बंद करने का निर्णय लिया गया है, उनमें एंटरटेनमेंट चैनल्स-Fox, Fox Crime, Fox Life और FX, मूवी चैनल्स-Fox Action Movies, Fox Family Movies, Fox Movies & Star Movies China, स्पोर्ट्स चैनल्स– Fox Sports, Fox Sports 2, Fox Sports 3, Star Sports 1, Star Sports 2, किड्स चैनल्स – Disney Channel और Disney Junior, म्यूजिक चैनल– Channel V और तथ्यात्मक सेवाएं-Nat Geo People व SCM Legend के नाम शामिल हैं।

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किड्स जॉनर में होगी इनाडु टीवी नेटवर्क की एंट्री, इन 12 भाषाओं में लॉन्च करेगा चैनल्स

27 अप्रैल को इन लॉन्चिंग के बाद नेटवर्क के चैनल्स की संख्या बढ़कर हो जाएगी 24

Last Modified:
Monday, 26 April, 2021
ETV

हैदराबाद का इनाडु टेलिविजन नेटवर्क (ETV Network) जल्द ही अपने नेटवर्क का विस्तार करने की योजना बना रहा है। दरअसल, यह नेटवर्क किड्स जॉनर (kids genre) में एंट्री करने जा रहा है। खबर है कि 10 तेलुगू एंटरटेनमेंट और न्यूज चैनल्स के स्वामित्व वाला यह ब्रॉडकास्टर 27 अप्रैल को ‘ईटीवी बाल भारत’ (ETV Bal Bharat)  नाम से अंग्रेजी और 11 भारतीय भाषाओं में बच्चों के लिए टीवी चैनल्स लॉन्च करने जा रहा है। माना जा रहा है कि इस लॉन्चिंग के बाद किड्स जॉनर के मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

‘ईटीवी बाल भारत’ चैनल अंग्रेजी के अलावा असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, तमिल और तेलुगू भाषाओं में उपलब्ध होगा।  

यही नहीं, भारतीय़ भाषाओं के साथ-साथ यह चैनल स्टैंडर्ड डेफिनेशन (SD) और हाई डेफिनेशन (HD) फॉर्मेट्स में भी उपलब्ध होगा। सभी भाषाओं में एसडी चैनल्स का मूल्य सबस्क्राइबर्स के लिए 3.2 रुपये जबकि एचडी फॉर्मेट में 4.8 रुपये का होगा। इन चैनल्स पर अभिमन्यु, छोटू, लंबी और रोबी एनिमेशन सीरीज के अलावा रोजाना फिल्म और सप्ताहांत में स्पेशल प्रोग्रामिंग होगी।

ईटीवी नेटवर्क के पास इस समय 12 चैनल्स हैं। इनमें ईटीवी तेलंगाना और ईटीवी आंध्र प्रदेश न्यूज चैनल्स शामिल हैं। इसके अलावा एंटरटेनमेंट चैनल्स ETV, ETV Cinema, ETV Plus, ETV Abhiruchi, ETV HD, ETV Plus HD और ETV Cinema HD हैं। किड्स जॉनर में विभिन्न भाषाओं में 12 चैनल्स लॉन्च होने के बाद नेटवर्क के चैनल्स की संख्या बढ़कर 24 हो जाएगी।

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कोरोना की दूसरी लहर से मुकाबले के लिए न्यूज चैनल्स अपना रहे कुछ इस तरह की स्ट्रैटेजी

वर्क फ्रॉम होम, काम के घंटे कम करने से लेकर नियमित रूप से पूरे परिसर को सैनिटाइज करने जैसे कदम उठा रहे हैं अधिकांश मीडिया संस्थान

Last Modified:
Friday, 23 April, 2021
TV Channels

देश-दुनिया में कोरोनावायरस (कोविड-19) का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। इन सबके बीच मीडियाकर्मी अपनी जान को जोखिम में डालते हुए कोरोना के खिलाफ जंग में अग्रिम मोर्चे पर अपनी भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, फ्रंटलाइन मीडियाकर्मियों ने इस जानलेवा महामारी के संक्रमण से बचाव के लिए खुद को प्राथमिकता के तौर पर वैक्सीन लगाए जाने की मांग की है, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के आगे उनकी चिंता को एक तरह से किनारे पर रख दिया गया है।  

कोविड-19 की दूसरी लहर के खिलाफ सतर्कता की आवश्यकता को न्यूज रूम अच्छे से समझ चुके हैं। हालांकि, पिछले करीब एक साल से तमाम मीडिया संस्थानों के न्यूजरूम्स कड़े प्रोटोकॉल्स का पालन कर रहे हैं, लेकिन आइए जानते हैं कि कोविड-19 की दूसरी लहर का मुकाबला वे किस प्रकार कर रहे हैं।

सबसे पहले जानते हैं ‘जी मीडिया’ (Zee Media) का हाल, जहां पर तमाम तरह के सेफ्टी प्रोटोकॉल्स अपनाए जा रहे हैं। इसके तहत वर्क फ्रॉम होम किया जा रहा है। एम्प्लॉयीज शिफ्ट में काम कर रहे हैं। काम के घंटे कम कर दिए गए हैं और पूरे परिसर में नियमित रूप से सैनिटाइजेशन आदि उपाय किए जा रहे हैं।

इस बारे में ‘जी मीडिया’ के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ पुरुषोत्तम वैष्णव का कहना है, ‘पिछले साल इस महामारी ने अचानक से हमला बोला था, लेकिन इस बार हम बेहतर तरीके से तैयार हैं। हमने महामारी पीड़ितों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तुरंत उपाय अपनाए हैं। वर्क फ्रॉम होम, शिफ्टों में काम, काम के घंटे घटाना और नियमित रूप से परिसर को सैनिटाइज करने समेत तमाम कदम उठाए जा रहे हैं। हमने अपने एम्प्लॉयीज को घर से लाने और काम खत्म होने के बाद ऑफिस से घर छोड़ने की व्यवस्था की है, ताकि उन्हें सार्वजनिक परिवहन सेवा का सहारा न लेना पड़े। हमारे पास ऑन कॉल डॉक्टरों का पैनल है, ताकि एम्प्लॉयीज किसी भी तरह की जानकारी ले सकें। इसके अलावा हम अपने एम्प्लॉयीज के मानसिक स्वास्थ्य की ओर भी ध्यान देते हैं। कॉल पर किसी भी तरह की सलाह के लिए हमारे बोर्ड में एक जाने-माने मनोविशेषज्ञ भी हैं।’

इसके साथ ही पुरुषोत्तम वैष्णव का यह भी कहना है, ‘हमारी टीम जहां भी हैं, पूरे समर्पण से काम कर रही हैं। हम कम से कम यह तो सुनिश्चित कर सकते हैं कि अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए और जरूरत पड़ने पर उन्हें संस्थान से अधिकतम सपोर्ट मिल सके।’

देश में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच ‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) ने स्वास्थ्य और सुरक्षा को मजबूती देने वाले सभी उपायों पर एक बार फिर से अधिक फोकस शुरू कर दिया है। महामारी की दूसरी लहर से निपटने के लिए सभी एम्प्लॉयीज को पेड लीव यानी सवैतनिक अवकाश (paid leaves), स्वास्थ्य की देखभाल और कार्य को बेहतर तरीके से समायोजित करने पर जोर दिया जा रहा है।

इस बारे में ‘एबीपी नेटवर्क’ के एक प्रवक्ता का कहना है, ‘इस महामारी के जोखिम को कम करने के लिए हम अपनी प्रॉडक्शन और एडिटोरियल टीमों के बीच एक व्यवस्थित तरीके से न्यूजरूम का प्रबंधन कर रहे हैं। इस सिस्टम के तहत दो एक्सक्लूसिव ग्रुप्स तैयार किए गए हैं, जो वैकल्पिक सप्ताह (alternate week) के आधार पर ऑफिस में 12-12 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं। इसके अलावा हम अपनी कुछ टीमों जैसे-डिजिटल टीम और कॉरपोरेट टीमों को घर से काम करने के लिए तमाम तरीकों से प्रेरित कर रहे हैं। आगे भी हम यह आकलन करते रहेंगे कि अपने न्यूज रूम को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करते हुए अपनी टीमों का सर्वोत्तम सपोर्ट कैसे करें और इस कठिन समय में हर व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा के लिए समुचित उपाय करें।’

‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) की बात करें तो यहां पर तमाम एम्प्लॉयीज महामारी की दूसरी लहर की चपेट में आ चुके हैं और चुनौती से निपटने के लिए मीडिया संस्थान तमाम नई पहल अपना रहा है।इस बारे में ‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ भूपेंद्र चौबे का कहना है, ‘कोरोना की दूसरी लहर पहली वाली से भी खराब है। हमारे कई एम्प्लॉयीज इसकी चपेट में आए हैं। ऐसे में हम अपने डिजिटल प्लेटफार्म्स के माध्यम से सूचना के प्रसार पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। चूंकि तमाम एम्प्लॉयीज घरों से काम कर रहे हैं, ऐसे में स्टोरीटैलिंग के लिए विभिन्न टूल्स आज के समय की जरूरत हैं। यहां ऑडियो और टेक्स्ट पर आधारित स्टोरीटैलिंग फॉर्मेट काम कर रहा है।’

‘न्यूज24 ब्रॉडकास्ट इंडिया लिमिटेड’ (News 24 Broadcast India Ltd) की एमडी और चेयरपर्सन अनुराधा प्रसाद का कहना है, ‘यह काफी मुश्किल समय है, लेकिन हमें इसका सामना करना है। हमें इससे लड़ना होगा, मजबूत बनकर आगे आना होगा और एक-दूसरे की मदद करनी है। यही कारण है कि न्यूज24 ने एक कैंपेन साथी हाथ बढ़ाना (Saathihaath Badhana) शुरू किया है।’

मेनलाइन चैनल्स से रीजनल नेटवर्क की ओर से कदम बढ़ाने पर भी एक जैसी ही है। ‘पीटीसी नेटवर्क’ (PTC Network) ने शिफ्ट बढ़ा दी हैं और वहीं पर भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि बाहरी रिस्क को कम से कम किया जा सके। इस बारे में पीटीसी नेटवर्क के एमडी और प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण का कहना है, ‘प्रत्येक न्यूजरूम के लिए यह एक नई दुनिया है। जिन एंकर्स को कोरोना हो चुका है, वे स्टूडियो में हैं और जो एंकरिंग करते समय सावधानी बरतना चाहते हैं, वे घर से टेक्नोलॉजी के माध्यम से एंकरिंग कर कर रहे हैं। अधिकांश रिपोर्टर्स और कैमरामैन फील्ड में बहादुरी से काम कर रहे हैं। यह ऐसा समय है, जब वर्चुअल न्यूजरूम्स को तैयार करने और सुदूर क्षेत्रों से लाइव करने में टेक्नोलॉजी अहम भूमिका निभा रही है। हालांकि, हम कितने भी इनोवेशन कर लें, न्यूजरूम में कुछ लोगों की जरूरत होती है। ऐसे में इन्हें न्यूजरूम की जगह वॉर रूम कहना बेहतर है।’

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जानें, चुनावी माहौल में विज्ञापनों के लिहाज से कैसा रहा न्यूज चैनल्स का हाल

वित्तवर्ष 2021 की आखिरी तिमाही में राजनीतिक विज्ञापनों में महीना दर महीना वृद्धि देखी गई।

Last Modified:
Thursday, 22 April, 2021
News Channel

न्यूज चैनल्स द्वारा पश्चिम बंगाल और असम समेत कई राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों की कवरेज के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों के लिहाज से न्यूज जॉनर (News Genre) सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहा है। ऐसे में इस कैटेगरी में विज्ञापन खर्च (AdEx) को भी रफ्तार मिल रही है। राजनीतिक विज्ञापनों की बदौलत इस जॉनर में ऐड वॉल्यूम (विज्ञापनों की मात्रा) पहले ही चरम पर पहुंच चुकी है। अनुमान लगाया जा रहा है कि मतगणना वाले दिनों में नेशनल ब्रैंड्स की और ज्यादा मौजूदगी देखने को मिलेगी।

‘टैम एडेक्स’ (TAM AdEx) के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2020 से दिसंबर 2020 के बीच त्योहारी सीजन के दौरान तीन महीने की तुलना में जनवरी और मार्च के बीच न्यूज जॉनर के ओवरऑल ऐड वॉल्यूम (कुल विज्ञापनों) में छह प्रतिशत की गिरावट के बावजूद इस दौरान इस जॉनर पर राजनीतिक विज्ञापनों (political advertisements) में 46 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।

वित्तीय वर्ष 2020 (FY 2020) की आखिरी तिमाही में भी राजनीतिक विज्ञापनों में महीना दर महीना (month on month) वृद्धि देखी गई है। उदाहरण के लिए-फरवरी 2021 में नौ प्रतिशत की ग्रोथ देखी गई और मार्च 2021 के दौरान राजनीतिक विज्ञापनों में जनवरी 2021 और फरवरी 2021 की तुलना में तीन गुना से ज्यादा वृद्धि देखने को मिली। 

इस बारे में करात इंडिया (Carat India) की सीनियर डायरेक्टर (Planning and Strategy) ग्राशिमा साहनी (Grashima Sahni) का कहना है, ‘केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों की खबरों को लेकर ऑडियंस अपडेट रहना चाहते हैं। ऐसे में इन मार्केट में अधिकांश बड़े रीजनल न्यूज प्लेयर्स के ट्रैफिक में काफी वृदधि हुई है। हालांकि, इस दौरान हमें नेशनल प्लेयर्स के ट्रैफिक में भी बढ़ोतरी दिखाई दी है।’

आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल जनवरी से मार्च के दौरान इस जॉनर पर प्रमुख ऐडवर्टाइजर्स में भारतीय जनता पार्टी (21 प्रतिशत), एआईएडीएमके (20 प्रतिशत), डीएमके (17 प्रतिशत), कांग्रेस (10 प्रतिशत) और तमिलनाडु की रीजनल पॉलिटिकल पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (पांच प्रतिशत) शामिल रहे।

ओएमडी मुद्रामैक्स (OMD Mudramax) के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट और प्रिंसीपल पार्टनर नवीन कथूरिया का कहना है, ‘यदि हम अक्टूबर 2019 में हुए महाराष्ट्र के चुनावों को देखें तो चुनावों के दौरान और इसके बाद कुछ हफ्तों तक मराठी न्यूज चैनल्स की जीआरपी (GRP) में 40-50 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में हिंदी/अंग्रेजी न्यूज चैनल्स की व्युअरशिप में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं देखने को मिली थी। फरवरी 2020 में दिल्ली चुनावों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला था। हालांकि, इस बार पश्चिम बंगाल के चुनाव थोड़ा अलग हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को पश्चिम बंगाल में अच्छी बढ़त मिली थी। महामारी के एक साल के कड़े दौर से गुजरने के बाद यहां हो रहे चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं, ऐसे में पूर्व में हुए अन्य चुनावों अथवा केरल चुनाव के विपरीत यहां के चुनावों को लेकर व्युअर्स में काफी रुचि देखी जा रही है। ऐसे में नेशनल न्यूज चैनल्स को व्युअरशिप में बढ़ोतरी का फायदा मिल सकता है।’

वहीं, एक लोकप्रिय हिंदी न्यूज चैनल के प्रतिनिधि का कहना है, ‘वित्तीय वर्ष 2021 की आखिरी तिमाही में हमें राजनीतिक विज्ञापनों में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस समय चुनावों में लोगों की काफी रुचि है, ट्रैफिक भी बढ़ा है, जिससे हमें अपने विज्ञापनों की कीमतों को सामान्य से 10-15 प्रतिशत ज्यादा बढ़ाने में मदद मिली है। हमें आने वाले दिनों में भी यही ट्रेंड रहने की उम्मीद है।’

हालांकि, सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं हैं, जो इस दौरान न्यूज चैनल्स के ज्यादा ट्रैफिक को भुनाते हैं, ब्रैंड्स भी इस बढ़ी हुई व्युअरशिप में अपनी पहुंच बढ़ाने में लगे हुए हैं। चुनावी मौसम में इस साल जनवरी से मार्च के बीच न्यूज जॉनर में ज्यादा खर्च करने वालों में Reckitt Benckiser, Hindustan Unilever, SBS Biotech, Lalitha Jewellery और LIC of India जैसे एडवर्टाइजर्स शामिल हैं, जो इस दौरान टॉप-5 एडवर्टाइजर्स की लिस्ट में भी शामिल रहे हैं।

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अब नए अंदाज में दिखाई देगा Zee Rajasthan

चैनल के लुक में बदलाव करने के साथ ही प्रोग्रामिंग में शामिल किए जाएंगे कई नए शो

Last Modified:
Friday, 16 April, 2021
Zee Rajasthan

‘जी मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड’ (ZMCL) के चैनल ‘जी राजस्थान’ (Zee Rajasthan) ने अपने लुक को रीलॉन्च करने के अलावा कुछ नए शोज के साथ अपने कंटेंट को और मजबूती देने का फैसला लिया है। इस रीलॉन्चिंग का उद्देश्य न्यूज डिलीवरी में नए और ऊर्जावान दृष्टिकोण को अपनाना और सभी आयामों को कवर करने के लिए नए शो शामिल करना है।  

नए शो के तहत दोपहर 12 बजे का बुलेटिन ‘मेरा देश, मेरा प्रदेश’ शामिल है, जिसमें रीजनल और नेशनल न्यूज दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाएगा। सुबह नौ बजे के शो ‘खबर राजस्थान’ में राज्य की सभी प्रमुख खबरों को शामिल किया जाएगा। दोपहर दो बजे का शो ‘2 Ka Dum’ पूरी तरह से क्षेत्रीय महत्व के साथ राष्ट्रीय खबरों पर केंद्रित होगा। रात आठ बजे प्राइम टाइम डिबेट शो ‘8 Ka Attack’ होगा और रात नौ बजे ‘देश हमारा’ बुलेटिन होगा, जहां पर दो एंकर्स राज्य, देश और दुनिया की खबरें देंगे।

इस बारे में ‘जी मीडिया’ के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ पुरुषोत्तम वैष्णव ने कहा, ‘राजस्थान में घरों से लेकर सरकारी इमारतों में यानी सब जगह जी राजस्थान स्ट्रीम किया जाता है। ऐसा इसलिए है कि हम राज्य के लोगों को तथ्यात्मक और निष्पक्ष खबरें दिखाते हैं। राज्य के लोगों के इसी भरोसे की बदौलत हम काफी समय से नंबर वन बने हुए हैं। ‘इनबा 2020’ में जी राजस्थान को बेस्ट प्राइम टाइम शो का अवॉर्ड मिल चुका है। हमें लगता है कि यह हमारे लिए सही समय है कि जब हम अपने अंदर झांकें और बदलते समय के साथ खुद में कुछ आवश्यक बदलाव करें और अपने व्युअर्स को देश-दुनिया में होने वाली घटनाओं से अपडेट रखें।’  

वहीं, ‘जी मीडिया’ के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर मनोज जग्यासी का कहना है, ‘जी राजस्थान व्युअर्स की पहली पसंद बना हुआ है और इसने एक साल में एक तिहाई मार्केट शेयर पर अपना कब्जा जमा लिया है। इस दौरान एडवर्टाइजर्स की बदौलत मार्केट में हमारे सबसे ज्यादा क्लाइंट्स हैं। मैं अपने एडवर्टाइजर्स को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने हमारे ऊपर इतना भरोसा जताया।’

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