मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को लेकर क्या-क्या बोला, पढ़ें यहां

अवॉर्ड लेने के लिए मनीला पहुंचे रवीश कुमार ने पब्लिक लेक्चर में भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Ravish Kumar

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार इस साल का प्रतिष्ठित रैमन मैगसायसाय अवॉर्ड (Ramon Magsaysay Awards) पाने के लिए फिलीपींस की राजधानी मनीला पहुंचे हुए हैं। रवीश कुमार को यह अवॉर्ड दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी, लेकिन अवॉर्ड लेने से पहले मनीला में शुक्रवार को उन्होंने मैगसायसाय के मंच से पब्लिक लेक्चर दिया। इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी। बता दें कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए रवीश कुमार को 9 सितंबर को भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे यह अवॉर्ड दिया जाएगा।

रैमन मैगसायसाय के मंच से रवीश कुमार ने लोगों के समक्ष जो बातें कहीं, उन्हें एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर पब्लिश किया है, जिसे हम आपके समक्ष हूबहू रख रहे हैं।

‘नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है। गौरव के इस क्षण में मेरी नजर चांद पर भी है और जमीन पर भी, जहां चांद से भी ज्यादा गहरे गड्ढे हैं। दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए। यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज से। सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा। देश सही सूचनाओं से बनता है। फेक न्यूज, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है। रैमन मैगसायसाय फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं कि क्या बोल रहा हूं। आपके पास अंग्रेजी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं।

दो महीने पहले जब मैं 'Prime Time' की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया। कॉलर आईडी पर फिलीपींस फ्लैश कर रहा था। मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है। यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है। अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं।

खैर, फिलीपींस के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं। मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेजी में एक महिला की आवाज थी, ‘May I please speak to Mr Ravish Kumar?’ हजारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी। मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया। उस तरफ से आ रही आवाज मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमन मैगसायसाय पुरस्कार दिया जा रहा है। मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिंदी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है। गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है। उसमें कोई दम नहीं है। अब मैं अपने विषय पर आता हूं।

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है। नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है। यह जानते हुए कि इस समय नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से खुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा। दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है। नफरत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है। रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है। जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है। मगर असंभव नहीं है।

नागरिकता के लिए जरूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो। आज स्टेट का मीडिया और उसके बिजनेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है। मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना। मीडिया अब सर्विलांस स्टेट का पार्ट है। वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है। प्राइवेट मीडिया और गवर्नमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है। इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है। ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है।

न्यूज चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है। इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है। मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं-एक, नेशनल और दूसरे, एंटी-नेशनल। एंटी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है। असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है। उस आत्मा पर रोज हमला होता है। जब नागरिकता खतरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी। नागरिक तो दोनों हैं। जो खुद को नेशनल कहता है, और जो एंटी-नेशनल कहा जाता है।

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है और लोगों के बीच लेजिटिमाइज हो चुका है। फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा। उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया। यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है। हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं। अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली। फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया। कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया। यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है। हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से खुद ही अलग हो गए।

कश्मीर में दूसरी कहानी है। वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। क्या आप बगैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटीजन की कल्पना कर सकते हैं? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे और वह उस सिटीजन के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है।

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं। पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत। नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं। पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है। कैसे रिपोर्टिंग करनी है। इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है। बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें। जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ, जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है। यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है। मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की। पीसीआई बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया। दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए कि लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है। प्रोपेगंडा के जरिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा तो उधर से गुब्बारा मार दिया। वैसे, भारत के न्यूज चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं। बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं। आप हंसें नहीं। वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए। यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटीजन जर्नलिज्म' को गढ़ना शुरू किया था। इसके जरिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटीजन जर्नलिज्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटीजन जर्नलिज्म दोनों अलग चीजें हैं। लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया। न्यूजरूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे। आज भी कई सारे न्यूजरूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के जरिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते। यह सिटीजन जर्नलिज्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ।

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एंटी-नेशनल बताने लगेगा। मीडिया लगातार सिटीजन जर्नलिज्म के स्पेस को एंटी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज्म में नहीं है। जर्नलिज्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है। मेरे ख़्याल से सिटीजन जर्नलिज्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म सूचना के खिलाफ हो जाए। उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नजर आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे। असमहति की आवाज को गद्दार कहने लगे। इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है।

जब मीडिया ही सिटीजन के खिलाफ हो जाए तो फिर सिटीजन को मीडिया बनना ही पड़ेगा। यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटीजन और सिटीजन जर्नलिज्म दोनों के खतरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नजर आती है। उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया सिटीजन जर्नलिज्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है। सिटीजन जर्नलिज्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके।

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है। वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है। अगर आप इस मीडिया के जरिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है। यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है। कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज में एक ही प्रकार की सूचना है। एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके। इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है। (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे। इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है। एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है।

भारत में बहुत कुछ शानदार है, यह एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज्यादातर हिस्सा गटर हो गया है। भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है, लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर रात कुचलने आ जाता है। भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है।

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र खूब जिंदा है। हर दिन सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है। इनकी अब खबरें नहीं बनती। उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी, डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है। इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद विडियो बनाने लगे हैं। फोन से बनाए गए उस विडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के वॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है। इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाजी करे। इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए वॉट्सऐप ग्रुप के लिए विडियो बना रहा है। आंदोलन करने वाले सिटीजन जर्नलिज्म करने लगते हैं। अपना विडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं।

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटीजन को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटीजन जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है? सिटीजन बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है। अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है? नागरिक फिर भी लड़ रहा है।

मुझे हर दिन वॉट्सऐप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं। कभी-कभी यह संख्या ज्यादा भी होती है। हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं। मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए। जब भी मैं अपना वॉट्सऐप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता। मैं हजारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने वॉट्सऐप को पब्लिक न्यूजरूम कहता हूं। देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए। गालियां आईं, धमकियां भी आईं। आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए। अपनी और इलाके की खबरों को लेकर। ये वे खबरें हैं, जो न्यूज चैनलों की परिभाषा के हिसाब से खत्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब खुद परेशानी में पड़ते हैं तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है। उनके जहन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है।

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे। उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया। जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटीजन जर्नलिज्म के नाम पर जर्नलिज्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटीजन के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया। मीडिया का यही भविष्य होना है। उसके पत्रकारों को सिटीजन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटीजन बन सकें।

ठीक उसी समय में, जब न्यूज चैनलों से आम लोग गायब कर दिए गए और उन पर डिबेट शो के जरिये पॉलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे। गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे। मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा। क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया।

'Prime Time' का मिजाज (नेचर) बदल गया। हजारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं। जिन परीक्षाओं के रिजल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं। अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है। 'Prime Time' की 'जॉब सीरीज' का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिजल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला। जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था। बस मेरा वॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूजरूम में बदल गया। सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई।

'Prime Time' अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है। ये वॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था। एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली खबरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे। मेरा न्यूजरूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है। यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है। तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं। जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे। 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते। जर्नलिज्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटीजन एंड सिटीजनशिप। मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटीजन को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटीजन अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे। डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे।

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है। वह 'Prime Time' देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे। उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और 'Prime Time' देखा। वह भारत के लोकतंत्र की सिटीजन है। जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा। उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में खुद लिखकर मुझसे माफी मांगी। अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं। महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है। जब घर में वह मेरा शो चलाता है तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं। मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटीजन जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटीजन से भी जूझना होगा। चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं। सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं। उनका जोखिम बढ़ जाता है। आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है। आज का सिटीजन दोहरे दबाव में हैं। उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े। जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है।

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा। वर्ना उसकी आवाज वॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी। पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए जरूरी निर्भीकता का माहौल बनाए। स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो। इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है। उस इतिहास को छीना जा रहा है।

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था। बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस-अनगिनत नाम हैं। ये सब सिटीजन जर्नलिस्ट थे। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया। उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें। गांधी खुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे। चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूजरूम बनाकर बैठ गई। वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी। उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है।

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है। किसी भी देश को जिंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है। सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमजोर होगा। इसलिए एक बार फिर सिटीजन जर्नलिज्म की जरूरत तेज हो गई है। वह सिटीजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रैटेजी से अलग है। इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं। कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटीजन जर्नलिज्म के एसेंस को जिंदा किए हुए हैं। उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है। जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है।

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी। आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं। गांधी ने एक बड़े अखबार के बारे में कहा, जिसमें खबर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है। गांधी ने कहा था कि यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की। आज अखबार डर गए हैं। वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं। गांधी ने कहा था- ‘आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें। कुछ खबर सुननी हो, तो एक-दूसरे से पूछ लें। अगर पढ़ना ही चाहें  तो सोच-समझकर अखबार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों। जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों। भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है।‘ गांधी होते तो यही कहते जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं।

आज बड़े पैमाने पर सिटीजन जर्नलिस्ट की जरूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत है सिटीजन डेमोक्रेटिक की। (DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS CITIZEN DEMOCRATIC।)

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं। NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं। डॉ. प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है। मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे खूब प्यार दिया है। मैं सबका हूं। मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है। मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे। मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे। अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं। मेरा दोस्त अनुराग यहां है। मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी। मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं। काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए। अच्छा नागरिक बना कीजिए।

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रिपब्लिक मीडिया ने सवालों का दिया जवाब, बताया कौन है असली मालिक

प्रतिष्ठित टीवी न्यूज चैनल्स में शामिल ‘रिपब्लिक टीवी’ के स्वामित्व को लेकर जिस तरह से सवाल उठाए गए, कंपनी ने उन सभी सवालों का जवाब देकर उन पर विराम लगा दिया है।

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Published - Thursday, 20 February, 2020
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Thursday, 20 February, 2020
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प्रतिष्ठित टीवी न्यूज चैनल्स में शामिल ‘रिपब्लिक टीवी’ के स्वामित्व को लेकर जिस तरह से सवाल उठाए गए, कंपनी ने उन सभी सवालों का जवाब देकर उन पर विराम लगा दिया है। चैनल की परिचालक कंपनी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (The Republic Media Network) ने एक स्टेटमेंट जारी किया है, जिसमें कंपनी के प्रमोटर की हिस्सेदारी का विवरण दिया गया है।

कंपनी ने बुधवार को यह स्पष्ट किया कि चैनल में पत्रकार अरनब गोस्वामी की व्यक्तिगत रूप से हिस्सेदारी 82 प्रतिशत से अधिक है।

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने कहा कि कंपनी के स्वामित्व को लेकर भारत और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में फैलाई जा रही झूठी और दुर्भावनापूर्ण खबरों के मद्देनजर स्थिति साफ करने के लिये यह बयान जारी किया गया है।

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने अपने बयान में कहा कि ‘एआरजी आउटलायर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (ARG Outlier Media Pvt Ltd.) जोकि रिपब्लिक मीडिया की प्रमोटर है और अरनब गोस्वामी इसके मालिक हैं, इसके पास पहले कुल 84 फीसदी शेयर थे।

बयान में बताया गया कि 2017 में जब ‘रिपब्लिक टीवी’ की शुरुआत हुई थी तब अरनब गोस्वामी इसमें अपने व्यक्तिगत और परिवारिक निवेश के माध्यम से 84 प्रतिशत के हिस्सेदार थे। कंपनी के विस्तार के लिये उन्होंने फरवरी 2019 में कुछ शेयर बेचकर फंड इकट्ठा किया था, उसके बाद भी उनकी हिस्सेदारी 82 प्रतिशत से अधिक है।

वहीं, यदि डिजिटल मीडिया की बात की जाए तो www.republicworld.com में अरनब गोस्वामी की कंपनी के पास इसकी कुल 99 फीसदी हिस्सेदारी है। अरनब गोस्वामी की सभी तीन कंपनियां भारत में ही रजिस्टर हैं और 82 फीसदी से भी ज्यादा की हिस्सेदारी खुद अरनब गोस्वामी की है जोकि किसी भी भारतीय मीडिया हाउस में एक पत्रकार द्वारा सर्वाधिक हिस्सेदारी है।

बयान में आगे कहा गया है कि इसी वजह से ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के बोर्ड के चेयरमैन और एकमात्र प्रमोटर हैं। इससे यह पता चलता है कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क पूरी तरह पत्रकार के एक स्वामित्व वाला नेटवर्क है।

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जानिए, न्यूज चैनल्स के लिए कैसे फायदे का सौदा रहा आम बजट

टीवी चैनलों के लिए एक फरवरी को पेश किया गया केंद्रीय बजट काफी बेहतर साबित हुआ है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 19 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 19 February, 2020
channel

टीवी चैनलों के लिए एक फरवरी को पेश किया गया केंद्रीय बजट काफी बेहतर साबित हुआ है, क्योंकि एक फरवरी को हिंदी और अंग्रेजी के न्यूज चैनल्स के साथ ही बिजनेस न्यूज चैनल्स (हिंदी+अंग्रेजी) के दर्शकों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। दर्शकों की संख्या विशेष रूप से सुबह 11 बजे से दोपहर 1.43 के बीच तेजी से बढ़ी। इस बात की जानकारी ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) द्वारा शेयर किए गए आंकड़ों से मिली है।

BARC इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, न्यूज चैनल्स ने इस दिन 3 मिलियन इम्प्रेशंस दर्ज किए, जो कि सामान्य दिनों की तुलना में 61% ज्यादा हैं। वहीं पिछले चार हफ्तों की तुलना में बजट वाले दिन उपरोक्त समय के दौरान सामान्य न्यूज कैटेगरी के दर्शकों की संख्या में भी 33% का इजाफा देखा गया है। इस तरह से बजट के दिन 22 मिलियन दर्शकों की संख्या दर्ज की गई।

5वें हफ्ते में यदि अंग्रेजी न्यूज जॉनर की बात करें तो रिपब्लिक टीवी (Republic TV) की रेटिंग  654(000s) इम्प्रेशंस रही, जबकि ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) और ‘इंडिया टुडे’ (India Today Television) टेलिविजन की रेटिंग क्रमश: 534(000s) और 303(000s) इम्प्रेशंस दर्ज की गई।

इस बीच, अंग्रेजी बिजनेस न्यूज जॉनर में, ‘सीएनबीसी टीवी18’ (CNBC TV18) की रेटिंग 727 (000) इंप्रेशन दर्ज की गई। वहीं, ‘ईटी नाउ’ (ET Now) और ‘सीएनबीसी टीवी18 प्राइम एचडी’ (CNBC TV18 Prime HD) की रेटिंग क्रमश: 266 (000s) और 30 (000s) इम्प्रेशंस दर्ज की गई।

वहीं हिंदी न्यूज जॉनर की बात की जाए तो, ‘आजतक’ (Aaj Tak) ने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में 5वें हफ्ते में 117478 (000s) इम्प्रेशंस की रेटिंग दर्ज की, जबकि ‘जी न्यूज’ (Zee News) और ‘न्यूज18 इंडिया’ (New18 India) की रेटिंग क्रमशः 97562 (000s) और 95139 (000s) इम्प्रेशंस रही।

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Times Network ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार नविका कुमार को सौंपी अब ये बड़ी जिम्मेदारी

नविका कुमार उन पत्रकारों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में अपनी पहचान बनाने के साथ-साथ बिजनेस रिपोर्टिंग में भी अलग धाक बनाई है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 19 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 19 February, 2020
Navika Kumar Times Network.

देश के बड़े मीडिया ग्रुप्स में शुमार ‘टाइम्स नेटवर्क’ (Times Network) में वरिष्ठ टीवी पत्रकार नविका कुमार का प्रमोशन हुआ है। नेटवर्क ने अब उन्हें ग्रुप एडिटर (पॉलिटिक्स) की जिम्मेदारी सौंपी है। अपनी नई भूमिका में उनके पास नेटवर्क के न्यूज ब्रैंड्स ‘ईटी नाउ’ (ET NOW), ‘मिरर नाउ’ (MIRROR NOW) और ‘टाइम्स डॉट कॉम’ (Timesnownews.com) की पॉलिटिकल रिपोर्टिंग स्ट्रैटेजी तैयार करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी होगी। इसके साथ ही वह पहले की तरह नेटवर्क के अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘टाइम्स नाउ’ (TIMES NOW) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी।       

नविका कुमार ने इकनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है और वे उन पत्रकारों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में अपनी एक अलग पहचान बनाने के साथ-साथ बिजनेस रिपोर्टिंग में भी अपनी अलग धाक बनाई हुई है। उन्हें कई बड़ी स्टोरी ब्रेक करने और इंवेस्टिगेट करने का श्रेय दिया जाता है, जिनमें सोनिया गांधी का इस्तीफा, कॉमनवेल्थ घोटाले में फंसे सुरेश कलमाड़ी का इस्तीफा, अगस्ता हेलीकॉप्टर घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस डील जैसी कई खबरें शामिल हैं।

नविका कुमार को बड़ी जिम्मेदारी सौंपे जाने के बारे में ‘टाइम्स नेटवर्क’ के एमडी और सीईओ एमके आनंद का कहना है, ‘नविका कुमार हमारे फ्लैगशिप चैनल ‘टाइम्स नाउ’ से इसकी शुरुआत के साथ से ही जुड़ी हैं और चैनल के विकास में उन्होंने काफी अहम भूमिका निभाई है। राजनीतिक मामलों पर उनकी काफी मजबूत पकड़ है और चैनल को इस मुकाम तक लाने में उनका काफी योगदान है। नविका नेटवर्क के टॉप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण सदस्य हैं और हमें उनकी विशेषज्ञता का फायदा टाइम्स नाउ के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी मिलेगा।’ 

वहीं, नविका कुमार का कहना है, ‘टाइम्स नाउ के साथ मेरा 15 वर्षों का साथ काफी बेहतर रहा है। अपनी नई भूमिका में मैं नेटवर्क की विभिन्न टीमों के साथ मिलकर इसे और आगे ले जाने का प्रयास करूंगी।’

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नेशनल वॉयस चैनल से जुड़ीं ये न्यूज एंकर, शुरू हुए वॉक इन इंटरव्यू

रीजनल न्यूज चैनल ‘नेशनल वॉयस’ (NATIONAL VOICE) की रीलॉन्चिंग की तैयारियां जोरों पर हैं। चैनल कई बड़े नामों को अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
National Voce

रीजनल न्यूज चैनल ‘नेशनल वॉयस’ (NATIONAL VOICE) की रीलॉन्चिंग की तैयारियां जोरों पर हैं। चैनल कई बड़े नामों को अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है। खबर है कि ‘आजतक’ समूह की तेजतर्रार एंकर स्वाति चौरसिया अब ‘नेशनल वॉयस’ चैनल का हिस्सा बन चुकी हैं।

चैनल से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अभी बड़े पैमाने पर नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है। चैनल को विडियो एडिटर्स, आउटपुट डेस्क और कई अन्य डिपार्टमेंट के लिए योग्य लोगों की जरूरत है। ऐसे उम्मीदवार वॉक इन इंटरव्यू के लिए चैनल के नोएडा सेक्टर 65 स्थित दफ्तर B-128 में एचआर से संपर्क कर सकते हैं।

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मीडिया कारोबार को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने की ये बड़ी घोषणा

रिलायंस इंडस्ट्रीज अब अपने मीडिया कारोबार को रीस्ट्रक्चर करेगा। कंपनी ने इसके तहत मीडिया और डिस्ट्रिब्यूशन बिजनेस को ‘नेटवर्क18’ (Network 18) में मिलाने का फैसला किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 18 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 18 February, 2020
reliance

रिलायंस इंडस्ट्रीज अब अपने मीडिया कारोबार को रीस्ट्रक्चर करेगा। कंपनी ने इसके तहत मीडिया और डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस को ‘नेटवर्क18’ (Network 18) में मिलाने का फैसला किया है। इससे ‘नेटवर्क18’ मीडिया और एंटरटेनमेंट क्षेत्र में देश की अग्रणी कंपनी बन जाएगी। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा कर दी है।  

रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुताबिक, इसके बाद ‘नेटवर्क18’ का सालाना रेवेन्यू 8,000 करोड़ हो जाएगा। ‘टीवी18 ब्रॉडकास्ट’ (TV18 Broadcast), ‘हैथवे केबल’ (Hathway Cable), ‘डेन नेटवर्क’ (Den Networks) और ‘नेटवर्क18’ (Network 18) मीडिया और इन्वेस्टमेंट्स कंपनियों के बोर्ड की सोमवार को बैठक हुई और इसमें विलय को मंजूरी दी गई।  

इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक बयान जारी कर बताया कि समाचार से लेकर मनोरंजन (लीनियर और डिजिटल) के सभी कंटेंट और देश के सबसे बड़े केबल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को एक इकाई बनाने के बाद कंपनी की दक्षता और सिनर्जी बढ़ाने में मदद मिलेगी और सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए ये फायदेमंद होगा।

बता दें कि रीस्ट्रक्चरिंग के बाद नेटवर्क 18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट न्यूज और एंटरटेनमेंट के साथ-साथ इंटरनेट, आईएसपी और केबल बिजनेस के क्षेत्र में भी अपनी बेहतर पहुंच बना पाएगी।

वहीं, कंपनी के इस फैसले के बाद ‘टीवी18 ब्रॉडकास्ट’ के 100 शेयरों के बदले ‘नेटवर्क18’ के 92 शेयर मिलेंगे। ‘हैथवे केबल’ के 100 शेयरों के बदले ‘नेटवर्क18’ के 78 शेयर मिलेंगे। विलय के बाद ‘डेन नेटवर्क’ के 100 शेयरों के बदले ‘नेटवर्क18’ के 191 शेयर मिलेंगे।

कंपनी ने बताया कि एक फरवरी 2020 के बाद से ही रिलायंस इंडस्ट्रीज की सभी मीडिया और एंटरटेनमेंट की सारी कंपनियां ‘नेटवर्क18’ की सहायक कंपनियां होंगी। 

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कहा, इंटीग्रेटेड मीडिया नेटवर्क के जरिए कंपनी को बड़े स्तर पर ग्रुप की कंपनियों के ग्राहकों से जुड़ने का मौका मिलेगा। इसके अलावा इससे ग्राहकों द्वारा इस्तेमाल होने वाले कंटेंट के अधिकतर हिस्से तक पहुंच बन सकेगी।

ब्रॉडकास्ट बिजनेस अब नेटवर्क 18 और केबल एंड इंटरनेट ब्रॉडबैंक बिजनेस के अंतर्गत होगा। नेटवर्क 18 समेकित रूप से नेट डेट फ्री कंपनी होगी। इन सभी कंपनियों का नेटवर्क 18 में विलय होने के बाद रिलायंस ग्रुप की होल्डिंग 75 % से घटकर 64 % हो जाएगी। 

गौरतलब है कि नेटवर्क 18 ग्रुप के पास चैनल की लंबी लिस्ट है। इस ग्रुप के पास 55 डोमेस्टिक और 16 इंटरनैशनल चैनल्स की लिस्ट है।  

 

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enba 2019: इन दिग्गजों की जूरी कल करेगी विजेताओं का चुनाव

दिल्ली में 15 फरवरी को जूरी मीट में किया जाएगा विजेताओं का चयन, 22 फरवरी को नोएडा में दिए जाएंगे अवॉर्ड्स

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 14 February, 2020
Last Modified:
Friday, 14 February, 2020
enba

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को बहुप्रतिष्ठित ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) से सम्मानित किया जाएगा। ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ के 12वें एडिशन के तहत इस बार 22 फरवरी को नोएडा के रेडिसन ब्लू होटल में समारोह का आयोजन किया जाएगा। समारोह में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मुख्य अतिथि होंगे। अवॉर्ड्स पाने वालों के नाम तय किए जाने के लिए 15 फरवरी को दिल्ली के ताज पैलेस होटल में जूरी मीट का आयोजन किया जाएगा। इस जूरी में राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन हरिवंश नारायण सिंह चेयरपर्सन की भूमिका निभाएंगे।

राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन हरिवंश नारायण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में 15 फरवरी को होने वाली जूरी मीट में मीडिया, कॉरपोरेट और राजनीति के क्षेत्र से 38 अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों को जूरी सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। जूरी के अन्य सम्मानित सदस्यों में ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा, असम की कलियाबोर सीट से चुने गए सांसद गौरव गोगोई, पूर्व सांसद और बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव महेश गिरी, लोकसभा सांसद और कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्र‍ियल टेक्नोलॉजी (KIIT) व कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) के फाउंडर प्रोफेसर अच्युत सामंत, राज्यसभा सदस्य जीवीएल नरसिम्हा राव, पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी, लोकसभा सांसद अपराजिता सारंगी, पंजाब राज्य मानव अधिकार आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी, ‘इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड’ (IHCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत छटवाल, ‘ब्लू स्टार’ के मैनेजिंग डायरेक्टर बी. थियागराजन, ‘डब्‍ल्‍यूपीपी’ (WPP) इंडिया के कंट्री मैनेजर सीवीएल श्रीनिवास का नाम शामिल है।

इनके अलावा जूरी के अन्य सम्मानित सदस्यों में डालमिया ग्रुप के चेयरमैन गौरव डालमिया,  ‘पब्लिसिस ग्रुप साउथ एशिया’ (Publicis Groupe South Asia) की सीईओ अनुप्रिया आचार्य, ‘एडफैक्टर्स पीआर’ (Adfactors PR) के को-फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर मदन बहल, बीजेपी के प्रवक्ता सैयद जफर इस्लाम, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा, कांग्रेस प्रवक्ता और ‘Dale Carnegie Training India’ के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर संजय झा, बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट जॉय बसु, आम आदमी पार्टी के कोषाध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता राघव चड्ढा, ‘एमडीआई’ (MDI) गुरुग्राम के डायरेक्टर डॉ. पवन कुमार सिंह, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व प्रेजिडेंट पद्मश्री आलोक मेहता का नाम शामिल हैं।

वहीं, ‘स्कोप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (Scope India Pvt Ltd) के एमडी राकेश कुमार शुक्ला, ‘हवास ग्रुप’ (Havas Group) इंडिया के सीईओ राना बरुआ, ‘मेडिकाबाजार’ (Medikabazaar) के फाउंडर और सीईओ विवेक तिवारी,  ‘RightFOLIO’ के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. परकला प्रभाकर, ‘वोल्टास’ के पूर्व सीओओ और ‘सिंपा नेटवर्क्स’ के डायरेक्टर सलिल कपूर, ‘EMMAY Entertainment’ की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर मोनिषा अड्वानी (MONISHA ADVANI), ‘इंडियन डॉक्यूमेंट्री फाउंडेशन’ की फाउंडर और सीईओ सोफी विश्वरमन (SOPHY VSIVARAMAN) और ‘GoZoop’ के सीईओ और को-फाउंडर अहमद आफताब नकवी और ‘नेट वैल्यू मीडिया’ (Net Value Media) के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर जनार्दन पांडे को भी जूरी मेंबर्स में शामिल किया गया है। वहीं, खंडप्पा विधानसभा क्षेत्र के एमएलए और ‘ईस्टर्न मीडिया लिमिटेड’ (Eastern Media Limited) के चेयरमैन सौम्य आर पटनायक, राज्यसभा सदस्य डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य डॉ. धनेश्वर मनोहर मुले (Dnyaneshwar Manohar Mulay), जामिया मिलिया इस्लामिया की वाइस चांसलर प्रो. नज्मा अख्तर, ‘राधा टीएमटी’ (Radha TMT) के मैनेजिंग डायरेक्टर सुमन सराफ और ‘मंजीरा ग्रुप’ (Manjeera Group) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जी योगानंद को भी जूरी में शामिल किया गया है।

इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स के पैनल में जो स्पीकर्स हैं, उनमें ‘गोन्यूज’ (Gonews) के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी, ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ (Sahara News Network) के सीईओ व एडिटर उपेंद्र राय, ‘न्यूज18’ (News18) के मैनेजिंग एडिटर किशोर अजवाणी, ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) के वाइस प्रेजिडेंट (प्लानिंग और स्पेशल कवरेज) सुमित अवस्थी, ‘जी बिजनेस’ (Zee Business) के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी, ‘बीबीसी इंडिया’ (BBC India) के डिजिटल एडिटर मिलिंद खांडेकर, हैवलेट पैकर्ड (HP) के पूर्व मार्केटिंग हेड (एशिया-पैसिफिक) लॉयड मैथियास, ‘जी मध्य प्रदेश/ छत्तीसगढ़’, ‘जी यूपी/यूके’, ‘जी पंजाब/ हरियाणा/ हिमाचाल’ और  ‘जी सलाम’ (ZEE MPCG/ ZEE UP UK/ ZEE PHH/ ZEE Salaam) के सीईओ दिलीप तिवारी, शिवसेना की उपनेता प्रियंका चतुर्वेदी, दिल्ली महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शर्मिष्ठा मुखर्जी, ‘सहारा समय न्यूज नेटवर्क’ (Sahara Samay News Network) के ग्रुप एडिटर मनोज मनु, ‘साम टीवी’ (Saam TV) के चैनल हेड व एडिटर नीलेश खरे, Suvarnanews.com/ एशिया कन्नड़ डिजिटल के चीफ एडिटर एसके शाम सुंदर, ‘इंडिया टीवी’ (India TV) की न्यूज एंकर अर्चना सिंह, ‘हाफिंगटन पोस्ट’ (Huffington Post) की स्वतंत्र पत्रकार स्मिता शर्मा और ‘सहारा समय’ राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली एनसीआर (Sahara Samay NHR) की चैनल हेड व सीनियर एंकर गरिमा शर्मा शामिल हैं।

बता दें कि वर्ष 2008 में अपनी शुरुआत के बाद से ही यह अवॉर्ड मीडिया में कार्यरत उन शख्सियतों को दिया जाता है, जिन्‍होंने देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को एक नई दिशा दी है और इस इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

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जानिए, रूबिका लियाकत से क्यों बोले मनोज तिवारी ‘मेरी लड़ाई करवाओगी’?

दिल्ली की लड़ाई में भाजपा की करारी शिकस्त के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर पार्टी की नजर में हार की वजह क्या रही? क्या नेताओं के बड़बोलेपन ने उसे नुकसान पहुंचाया या

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 14 February, 2020
Last Modified:
Friday, 14 February, 2020
manoj

दिल्ली की लड़ाई में भाजपा की करारी शिकस्त के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर पार्टी की नजर में हार की वजह क्या रही? क्या नेताओं के बड़बोलेपन ने उसे नुकसान पहुंचाया या शाहीन बाग को पाकिस्तान करार देने की रणनीति गलत साबित हुई। ‘एबीपी न्यूज़’ ने मनोज तिवारी के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू से लोगों की इस जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है। चुनाव परिणामों के बाद पहली बार तिवारी किसी चैनल पर सवालों का जवाब देते नजर आए हैं। उनसे सवाल पूछने की जिम्मेदारी रूबिका लियाकत को सौंपी गई थी, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

रूबिका ने हर वह सवाल दागा, जिसका जवाब लोग जानना चाहते हैं। फिर चाहे वह तिवारी को बतौर सीएम प्रोजेक्ट न करना हो या प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं पर आलाकमान की सोच। आमतौर पर जब हार के बाद कोई नेता कैमरे का सामना करता है तो वह बेहद गंभीर हो जाता है और सवाल पूछने वाला पत्रकार भी गंभीरता से मुद्दों को उठाता है। सीधे शब्दों में कहें तो शिकस्त का गम कुछ और देर तक लाइव टीवी पर नजर आता है। लेकिन ‘एबीपी’ का यह इंटरव्यू बिलकुल अलग रहा। रूबिका ने अपने अंदाज से माहौल को इतना हल्का कर दिया कि कुछ देर के लिए तिवारी भी शायद हार का दुःख भूल गए होंगे।

हालांकि, इसका ये मतलब नहीं कि उन्होंने तीखे सवालों की चुभन से भाजपा नेता को बेचैन नहीं किया। उन्होंने चुभने वाले सवाल भी पूछे। मसलन, पिछले छह बार भाजपा चेहरे के साथ मैदान में उतरी थी, मगर इस बार नहीं, क्यों? क्या पार्टी को आप पर कॉन्फिडेंस था? इसके जवाब में पहले तो तिवारी सामूहिक निर्णय का हवाला देकर ज्यादा कुछ कहने से बचते रहे, लेकिन अंत में उन्होंने मान ही लिया कि चेहरे के साथ उतरना चाहिए था।

रूबिका ने भाजपा के बयानवीरों पर भी सवाल किया, लेकिन प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्रा की बात करते-करते हुए उन्होंने एक ऐसे शख्स का नाम भी ले डाला, जिससे तिवारी कुछ असहज हो गए। उन्होंने पहले पूछा, ‘क्या आपकी पार्टी के नेताओं के बड़बोलेपन ने आपको नुकसान पहुंचाया’? जिसका मनोज तिवारी ने चालाकी से जवाब दिया। उन्होंने प्रवेश कुमार या कपिल मिश्रा का जिक्र न करते हुए कहा कि आलाकमान की सोच ऐसी नहीं है। बस यहीं वो रूबिका को दमदार सवाल दागने का मौका दे बैठे और उन्होंने तपाक से पूछ लिया ‘आपके अमित शाह भी तो शाहीन बाग में करंट लगवा रहे थे, लेकिन करंट आपको और आपकी पार्टी को लग गया? इसका भी तिवारी कोई सीधा जवाब नहीं दे सके।

पूरे इंटरव्यू के दौरान रूबिका ने ऐसे-ऐसे सवाल भी पूछे जिनके जवाब में भाजपा नेता केवल हंसकर रह गए। हालांकि, जब उन्होंने भाजपा की आठ सीटों का हवाला दिया, तो मनोज तिवारी ‘एबीपी न्यूज’ के एग्जिट पोल का हवाला देकर गंभीर सवालों की चुभन से बचने का प्रयास करने लगे। उन्होंने कहा, आप लोग तो पहले ही दिखा चुके थे कि ‘आप’ को 63 और ‘भाजपा’ को 7 सीटें मिलेंगी। आगे से आप ही लोगों से पूछ लेंगे हम’।

चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद से ही सोशल मीडिया पर दिल्ली की जनता को मुफ्तखोर करार दिया जाने लगा है। यहां तक कि भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा भी कुछ ऐसी ही सोच रखते हैं। लिहाजा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से इस पर सवाल तो बनता था और रूबिका ने यह मुद्दा उठाया भी। उन्होंने कहा, ‘फोन लगाइए न अपने भाई प्रवेश वर्मा को और पूछिए दिल्ली की जनता क्या मुफ्तखोर है?’

इस पर तिवारी ने जवाब दिया, ‘नहीं, दिल्ली की जनता समझदार है और हम उसके जनादेश को स्वीकार करते हैं।’ प्रवेश कुमार को भाई कहने वाला वाकया इस सवाल से कुछ पहले हुआ। दरअसल, जब रूबिका लियाकत ने तिवारी से कहा कि आपने अपने क्षेत्र में तीन स्कूल बनवाये हैं तो उस पर ही चुनाव लड़ते न, वो (आप) स्कूल पर ही तो जीते हैं। तो भाजपा नेता ने कहा ‘हम उसी पर तो लड़े, तभी तो हमारे यहां जीते।’ इस जवाब पर एक और सवाल दागते हुए रूबिका ने कहा ‘मतलब प्रवेश वर्मा को आपसे सीख लेनी चाहिए’? इतना सुनकर मनोज तिवारी पहले हंसे फिर बोले ‘ऐसे झगड़ा मत लगवाओ, मेरा भाई है। इंटरव्यू में बुलाकर और मेरे चार ठो खोल दो।’     

मनोज तिवारी का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:

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Tata Sky पर दिखाई देंगे अब ये तीन नए न्यूज चैनल

डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर टाटा स्‍काई (Tata Sky) ने अपने प्लेटफॉर्म पर तीन नए न्यूज चैनल्स को शामिल किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 14 February, 2020
Last Modified:
Friday, 14 February, 2020
TATA SKY

डीटीएच सर्विस प्रोवाइडर टाटा स्‍काई (Tata Sky) ने अपने प्लेटफॉर्म पर तीन नए न्यूज चैनल्स को शामिल किया है। ये तीनों न्यूज चैनल फ्री-टू-एयर (FTA) कॉम्पलिमेंट्री पैक में लॉन्च किए गए हैं।

बता दें कि टाटा स्काई ने जिन तीन नए चैनल्स को अपने पैक में शामिल किया है, उनमें ‘आर9 टीवी’ (R9 TV), ‘सहारा समय’ (Sahara Samay) और ‘नंदीघोष टीवी’ (Nandighosa TV) हैं। पहला चैनल R9 TV टाटा स्काई पर चैनल नंबर 586 पर उपलब्ध है, जोकि हिंदी न्यूज चैनल है। दूसरा चैनल Sahara Samay है। सहारा समय दूसरा हिंदी न्यूज चैनल है जो राजनीति, क्षेत्रीय, विश्व, खेल और दूसरे न्यूज ब्रॉडकास्ट करता है। सहारा समय चैनल टाटा स्काई पर 1157 नंबर पर उपलब्ध है। तीसरा चैनल Nandighosa TV है यह ओडिया न्यूज चैनल है। यह चैनल टाटा स्काई पर 1776 नंबर पर मौजूद है।

गौरतलब है कि टाटा स्काई ने हाल में ही अपने टैरिफ प्लान और सेट-टॉप बॉक्स की कीमतों में कई तरह के बदलाव किए हैं। ऐसे में नए चैनल्स को जोड़ना कंपनी के लिए अच्छा माना जा रहा है।    

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नए अवतार में फिर दस्तक देने को तैयार ये न्यूज चैनल

यह चैनल अब नोएडा के सेक्टर 65 से संचालित होगा और इससे जुड़े पत्रकार यहीं से देश-दुनिया की खबरों और उसकी बारीकियों को दर्शकों तक पहुंचाएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 12 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 12 February, 2020
Channel

रीजनल न्यूज चैनल ‘नेशनल वॉयस’ नए तेवर और कलेवर के साथ एक बार फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मार्केट में दस्तक दे रहा है। यह चैनल अब नोएडा के सेक्टर 65 से संचालित होगा और इससे जुड़े पत्रकार यहीं से देश-दुनिया की खबरों और उसकी बारीकियों को दर्शकों तक पहुंचाएंगे।

चैनल के कार्यालय में मंगलवार को भूमि पूजन भी किया गया। चैनल की मानें तो उसका मुख्य उद्देश्य जनता की दबी हुई आवाज को सामने लाना, जनता के मुद्दों को असरदार तरीके से सरकार तक पहुंचाना और सरकार की वे नीतियां जिनके बारे में आम जनता को पता नहीं है, उसे लोगों के बीच लेकर जाना है। इसके लिए वह जल्द ही सभी डीटीएच प्लेटफार्म और केबल टीवी पर भी नजर आएगा।

‘नेशनल वॉयस’ की जिम्मेदारी फिलहाल प्रवीण पाठक, दीपक शर्मा, राहुल एंडलॉ और वकास वारसी के कंधों पर है। नेशनल वॉयस के निदेशक प्रवीण पाठक ‘आर9 टीवी’ (R9 TV) में ग्रुप एडिटर की भूमिका निभा चुके हैं। इसके पहले वे ‘साधना प्राइम न्यूज’ में एग्जिक्यूटिव एडिटर और ‘एफएम न्यूज’ में उत्तराखंड के ब्यूरो हेड रह चुके हैं। साथ ही वे ‘दैनिक जागरण’ और ‘आजतक’ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ भी काम कर चुके हैं। फिलहाल वे यहां अब अपनी पूरी ताकत के साथ नेशनल वॉयस के नए प्रयोग को कामयाब बनाने में जुट गए हैं।

वहीं, नेशनल वॉयस के युवा निदेशकों में शुमार दीपक शर्मा ने बेहद कम उम्र में कामयाबी हासिल की है। उनका मानना है कि नेशनल वॉयस रीजनल चैनलों की दुनिया में नेशनल आउटलुक वाला पहला चैनल होगा, जिसका फोकस खासतौर से यूपी और उत्तराखंड पर होगा।

चैनल की रीलॉन्चिंग को लेकर निदेशक राहुल एंडलॉ का कहना है कि नेशनल वॉयस प्रयोगों से नहीं घबराएगा, हम हर वो जोखिम उठाने को तैयार हैं जिससे दर्शकों को फायदा हो।

नेशनल वॉयस के निदेशक वकास वासिक वारसी टीवी की दुनिया के साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में अच्छी पकड़ रखते हैं। उनका कहना है कि वह चुनौती स्वीकार करने में यकीन रखते हैं और नेशनल वॉयस को पहचान की जरूरत नही है, लेकिन चैनल का नया अवतार ऐसा बहुत कुछ समेटे होगा जो न्यूज टीवी की दुनिया में जल्द अपनी अलग पहचान बनाएगा।

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अब इस न्यूज चैनल पर नजर आएंगे युवा पत्रकार सूर्या त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश में महोबा के रहने वाले सूर्या त्रिपाठी ने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बीएससी की पढ़ाई की है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 12 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 12 February, 2020
Surya Tripathi

युवा पत्रकार सूर्या त्रिपाठी ने ‘सहारा समय’ (मप्र/छत्तीसगढ़) के साथ अपनी नई पारी की शुरुआत की है। उन्होंने यहां बतौर एंकर कम प्रड्यूसर जॉइन किया है।  

उत्तर प्रदेश में महोबा के रहने वाले सूर्या त्रिपाठी ने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बीएससी की पढ़ाई की है। ‘सहारा समय’ को जॉइन करने से पहले वह ‘हिंदी खबर’ (यूपी/उत्तराखंड) में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। यहां रहते हुए उन्होंने ‘हिंदी खबर’ (मप्र/छत्तीसगढ़) की लॉन्चिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसके अलावा वह गुरुग्राम के एक मीडिया हाउस में कंटेंट क्रिएटर के साथ ही ‘स्वराज एक्सप्रेस’(मप्र/छत्तीसगढ़) में बुलेटिन प्रड्यूसर के तौर पर भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं। यही नहीं, भोपाल में ‘बंसल न्यूज’ के साथ ही वह ‘न्यूज एक्सप्रेस’ (मप्र/छत्तीसगढ़) में प्रोडक्शन एग्जिक्यूटिव (अउटपुट) के रूप में भी काम कर चुके हैं।

राज्य स्तर पर कई वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में शामिल होने के साथ ही सूर्या त्रिपाठी शॉर्ट फिल्म ‘स्वच्छ भारत अभियान’ (swachh bharat abhiyan) भी कर चुके हैं। इस समय वह ‘बुंदेली रत्न’ (bundeli ratn) के नाम से बुंदेलखंड पर एक किताब भी लिख रहे हैं।

समाचार4मीडिया की ओर से सूर्या त्रिपाठी को उनकी नई पारी के लिए शुभकामनाएं।

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