अनुरंजन झा बोले, अजीब द्वंद्व है एसपी के शिष्यों और एसपी के चेलों के बीच

‘राजधानी की सड़कों पर आज फिर हत्यारिन रेडलाइन ने दो नौजवानों की जान ले ली।’ देश के

Last Modified:
Thursday, 27 June, 2019
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अनुरंजन झा

वरिष्ठ पत्रकार ।।

‘राजधानी की सड़कों पर आज फिर हत्यारिन रेडलाइन ने दो नौजवानों की जान ले ली।’ देश के पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग चैनल पर रात को इस अंदाज में खबर पढ़ने का असर यह हुआ अगले दिन दिल्ली की सरकार को एक बैठक बुलानी पड़ी थी और अगर आपको ठीक से याद हो तो उसके चंद दिनों के बाद ही प्राइवेट बसों के उस जखीरे का रंग बदल कर ब्लू कर दिया गया। उसके बाद एसपी ने कहा कि सरकार रंग बदलने की बजाय अगर ढंग बदले तो लोगों की जान बचाई जा सकती है। यह एक बानगी है हिंदी न्यूज टेलिविजन के उस पुरोधा के खबरों के पेश करने और उसके चयन के तरीके की।

हिंदी न्यूज टेलिविजन को एक नया आयाम देने के मामले में निस्संदेह सुरेंद्र प्रताप सिंह का नाम सबसे पहले लिया जाना चाहिए। एसपी की 22वीं पुण्यतिथि पर सबसे पहले उन्हें नमन और श्रद्धांजलि। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि जिस तरह मेरे पत्रकारिता में आने के पीछे वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन प्रेरणा रहे हैं उसी तरह टेलिविजन न्यूज को अपने जीवन का हिस्सा बनाने के पीछे कहीं न कहीं एसपी की भूमिका रही है। हालांकि हमने उनके साथ कभी काम नहीं किया लेकिन दूरदर्शन पर उनके बीस मिनट के खबरों को पेश करने के तरीके ने दिलो-दिमाग पर काफी असर डाला।

अखबारों में लिखने के दौरान भी हमने टीवी में इस्तेमाल की जानी वाली भाषा का इस्तेमाल किया, मसलन छोटे वाक्य और बिना लाग-लपेट के अपनी बात कह जाना। यह सुरेंद्र प्रताप सिंह का तरीका था। हालांकि कई मामलों में उनसे मतभेद के तमाम कारण हैं लेकिन आज टीवी पत्रकारिता का जो बोलबाला है उसके पुरोधा होने का श्रेय तो एसपी सिंह को जाना ही चाहिए।

हमारी उनकी पहली मुलाकात काफी दिलचस्प है, दिल्ली विश्वविद्यालय के आखिरी दिनों में किसी राजनीतिक विवाद में हमारी तस्वीर दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कुछ अखबारों में छप गई। दिल्ली के हमारे एक अभिभावक ने बुलावा भेजा और जमकर डांट लगाई। जिस दिन हमारी पेशी हुई उस दिन उनके मित्र एसपी सिंह वहां मौजूद थे। एसपी ने कहा कि कुछ रचनात्मक करो और फिर छपो तो बात बने।

हालांकि उन दिनों तक मैंने अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू कर दिया था। फिर बोले, कल मेरे पास आओ, कुछ वक्त पहले ही उनका कार्यक्रम 'आजतक' दूरदर्शन पर आना शुरू हुआ था। मैं उनसे मिलने गया। कुछ रिसर्च का काम भी किया लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं होने की वजह से मैं लगातार नहीं जा सका और उनके साथ काम करने का योग नहीं बन पाया। हां उनसे मुलाकात जरूर होती रही। कुछ इसी तरह से उनके साथ काफी लोग जुड़े।

टीवी न्यूज के उस दौर में एसपी ने काफी लोगों को तराशने का काम किया। लेकिन कई सारे ऐसे रहे जो उनके बेवक्त चले जाने से संवर नहीं पाए। उसमें से ज्यादातर बाद के दिनों में एसपी के साथ काम करने का ढोल पीटकर उनके चेले बन गए। कुछ उनके सच्चे शिष्य भी थे। यहां नाम लेना मैं उचित नहीं समझता लेकिन उस जनरेशन को मैं दो हिस्सों में बांटता हूं एक एसपी के शिष्य और दूसरे उनके चेले। उनकी बरसी पर याद करते हुए उनकी कुछ बातें आप लोगों को याद दिलाना चाहता हूं।

जरा सोचिएगा कि आज अगर एसपी जिंदा होते तो अपने इन तथाकथित चेलों को देखकर उन पर क्या बीत रही होती। किसी न किसी दल और विचारधारा से जुड़कर न्यूज परोसने वाले संपादकों में कई उनके चेले रहे हैं। एसपी अक्सर कहा करते थे कि पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने वालों की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं हूं मैं। उनको आभास था कि उनके करीब कुछ ऐसे लोग हैं जो बाद में उनके चेले का चोला धारण कर अपनी दुकान चलाएंगे और अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल भी पीटेंगे।

एक साक्षात्कार में एसपी सिंह ने कहा था कि जूता बनाने वाली कंपनी और डालडा बनाने वाली कंपनी का प्रबंधन एक जैसा नहीं हो सकता। अखबार (अब टेलिविजन) को उत्पाद के तौर पर देखना ही होगा लेकिन उसका उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं हो सकता। उनके शिष्यों ने उत्पाद के तौर पर देखा तब तक उनके चेलों ने बेच डाला। एक वक्त एसपी ने कहा था कि टेलिविजन में वे ज्यादा संतुष्ट पाते हैं अपने आपको क्योंकि यहां लफ्फाजी और छल नहीं है, आज एसपी जिंदा होते तो वो अपनी बात बेलाग तरीके से वापस लेते उनको लगता कि वो गलत थे आज तो टेलिविजन पत्रकारिता में सबसे ज्यादा और कारगर लफ्फाजी और छल का बाजार है।

बीस सालों में समाज बदला है, तकनीक बदली है, पत्रकारिता के मानदंड भी बदल गए हैं। अपने जीवन में एसपी ने जमकर लिखा, जमकर पत्रकारिता की, जमकर आलोचना की, अपनी बातों पर जमे रहे। खबरों और बाजार के बीच सामंजस्य बिठाया और बाजार यानी प्रबंधन को कभी खबरों पर हावी नहीं होने दिया। उनके साथ टेलिविजन की पीढ़ी जवान हुई, उनके बेवक्त चले जाने से नुकसान हुआ। आज उनकी कमी खलती है जब सामंजस्य का तरीका नजर नहीं आता। जब हर खबर पर बाजार हावी होता है। उनके शिष्यों के सीने में हूक उठती है और चेले बिंदास हैं। काश आप आ पाते। नमन

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