तरुण तेजपाल ने वकीलों का यूं जताया आभार, कहा- अब टूटी जिंदगी को ठीक करूंगा

गोवा की जिला अदालत ने शुक्रवार 21 मई को 8 साल पुराने रेप मामले में तहलका मैगजीन के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को बरी कर दिया है।

Last Modified:
Friday, 21 May, 2021
Tejpal5454

गोवा की जिला अदालत ने शुक्रवार 21 मई को 8 साल पुराने रेप मामले में तहलका मैगजीन के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को बरी कर दिया है। तहलका के पूर्व एडिटर-इन-चीफ पर 2013 में गोवा के एक लग्जरी होटल की लिफ्ट में अपनी महिला सहयोगी का शारीरिक शोषण करने का आरोप था। तरुण तेजपाल की बेटी ने पिता के बरी होने के बाद उनका बयान जारी किया।

बरी होने के बाद तरुण तेजपाल ने अपने एक बयान में पहले अपने एक वकील राजीव गोम्स की कोरोना से हुई मौत पर दुख जताया और उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि गोम्स एक शानदार वकील थे, जिनका राष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त करियर रहा। तेजपाल ने गोम्स की तारीफ करते हुए कहा, ‘मेरी जिंदगी और सम्मान को वापस दिलाने में किसी ने इतनी मुश्किल लड़ाई नहीं लड़ी, जितनी राजीव ने अपने बेहतरीन अनुभव से लड़ी।’

तेजपाल ने बताया, ‘राजीव मुझसे कहते थे कि वे सिर्फ पैसे का मजा लेते हैं, वे इसके लिए काम नहीं करते। वे हमेशा कहते थे कि उन्हें भगवान ने बेकसूरों की लड़ाई लड़ने के लिए भेजा है।’ उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि एक परिवार के तौर पर हम हमेशा राजीव के कर्जदार रहेंगे। हम उनकी पत्नी शेरिल और बेटे शॉन के प्रति भी संवेदनाएं प्रकट करते हैं। कोई भी क्लाइंट अपने लिए राजीव से बेहतर वकील की उम्मीद नहीं कर सकता।

तेजपाल ने अपने बयान में कहा, ‘नवंबर 2013 में मेरी एक सहयोगी ने शारीरिक शोषण करने का मुझपर गलत आरोप लगाए थे। आज गोवा के ट्रायल कोर्ट के एडिशनल सेशल जज क्षमा जोशी ने मुझे बाइज्जत बरी कर दिया है। ऐसे मुश्किल समय में जब लोगों में साहस नहीं है उन्होंने सच का साथ दिया, इसके लिए मैं उनका धन्यवाद करता हूं।’

तेजपाल ने बताया कि उन पर लगे झूठे आरोपों की वजह से पिछले साढ़े सात साल उनके परिवार के लिए दर्दनाक रहे। इन झूठें आरोपों की वजह से उनके निजी, पेशेवर और सार्वजनिक जीवन के हर पहलू पर असर पड़ा। इसके बावजूद हमने गोवा पुलिस के साथ पूरी तरह सहयोग किया और सैकड़ों सुनवाई के बाद हमने कानून के हर सिद्धांत का पालन किया।

तेजपाल ने पिछले 8 साल में अपनी सहायता के लिए आगे आने वाले वकीलों का भी शुक्रिया जताया। उन्होंने बताया कि कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, प्रमोद दुबे समेत कई वकीलों ने उनकी मदद की। तरुण तेजपाल ने आगे अपील करते हुए कहा कि उनके परिवार की निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। इस दौरान वे अपनी टूटी जिंदगियों को ठीक करने की कोशिश करेंगे।

आप उनके बयान को अंग्रेजी भाषा में नीचे पढ़ सकते हैं- 

Seldom does a long-fought for vindication arrive hand-in-hand with profound heartbreak. Last week my trial lawyer, Rajeev Gomes, died of Covid. Dynamic and brilliant,  at 47 he was on the brink of a scintillating career as a criminal lawyer at the national level.

No person fought harder, and with greater skill, to reclaim my life and reputation.  Rajeev used to say to me, 'I enjoy money but I don't work for it. I believe god put me on earth to fight for the innocent.' As a family we owe Rajeev Gomes a profound and permanent debt. And we grieve alongside his wife Cheryl and his young son Sean. No client can ever hope for a better lawyer than Rajeev. The ever-struggling wheel of justice has lost a solid spoke. 

In November 2013 I was falsely accused of sexual assault by a colleague. Today the Hon’ble Trial Court of  Additional Sessions Judge Kshama Joshi, in Goa, has honourably acquitted me. In an awfully vitiated age, where ordinary courage has become rare, I thank her for standing by the truth. 

The past seven-and-a-half  years have been traumatic for my family as we have dealt with the catastrophic fallout of these false allegations on every aspect of our personal, professional and public lives. We have felt the boot of the state, but through it all we have co-operated fully with the Goa police and the legal system,  through hundreds of court proceedings. We have unwaveringly followed every mandate of due procedure and abided by every principle of law as laid down in the Constitution. We have also endeavoured to uphold every norm of decency expected in a case like this. 

It is with profound respect that I thank this court for its rigorous, impartial and fair trial and for its thorough examination of the CCTV footage and other empirical material on record.

In these 8 years a host of outstanding lawyers came to our aid, and we owe them all a deep debt, prime among them Pramod Dubey, Aamir Khan, Ankur Chawla, Amit Desai, Kapil Sibal, Salman Khurshid, Aman Lekhi, Sandeep Kapoor, Raian Karanjewala, and Shrikant Shivade. 

I also thank scores of family members and friends who kept the faith and stood by us through these dark years. 

I wish to make no further statement at this time and request my family's privacy be respected, as we try and reclaim our broken lives. I will make a comprehensive statement at an appropriate time in the future.

Tarun J Tejpal 

   

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‘अमर उजाला’ को बाय बोलकर अब इस अखबार से जुड़े पत्रकार गिरीश उपाध्याय

पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने ‘अमर उजाला’ (Amar Ujala) में करीब डेढ़ दशक पुरानी अपनी पारी को विराम दे दिया है।

Last Modified:
Monday, 16 May, 2022
Girish Upadhyay

पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने ‘अमर उजाला’ (Amar Ujala) में करीब डेढ़ दशक पुरानी अपनी पारी को विराम दे दिया है। वह 15 साल से अधिक समय से नोएडा ऑफिस में अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे। गिरीश उपाध्याय ने पत्रकारिता में अपने सफर की शुरुआत अब ‘दैनिक जागरण’ नोएडा से की है।

मूल रूप से जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले गिरीश उपाध्याय ने पत्रकारिता में अपना करियर प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में ‘यूनाइटेड भारत’ अखबार से  शुरू किया था। यहां कुछ समय काम करने के बाद वह ‘‘आज’ अखबार से जुड़ गए।

हालांकि, यहां भी उनका सफर महज कुछ महीने ही रहा और वह यहां से अलविदा कहकर ‘अमर उजाला’ आ गए और तब से यहीं थे। इसके बाद अब वह ‘दैनिक जागरण‘ में आए हैं।

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो गिरीश उपाध्याय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। समाचार4मीडिया की ओर से गिरीश उपाध्याय को उनके नए सफर के लिए ढेरों शुभकामनाएं।

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यहां की राज्य सरकार लायी अपना अखबार, गृह मंत्री अमित शाह ने किया उद्घाटन

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को ‘असम बार्ता’ अखबार के पहले अंक का उद्घाटन किया

Last Modified:
Wednesday, 11 May, 2022
AssamBorta45454

असम सरकार को 10 मई को एक साल पूरा हो गया है। ऐसे में असम सरकार ने अपना अखबार 'असम बार्ता' (असम की आवाज) लॉन्च किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को ‘असम बार्ता’ अखबार के पहले अंक का उद्घाटन किया, जो राज्य के लोगों को सरकारी नीतियों और उनके कार्यान्वयन से अवगत कराएगा।

यह लॉन्च मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की पहली वर्षगांठ समारोह के साथ हुआ।

इस अखबार के पहले अंक का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘असम बार्ता चार भाषाओं, असमिया, अंग्रेजी, हिंदी और बंगाली (आने वाले महीनों में) में प्रकाशित की जाएगी और विभिन्न पारंपरिक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करके व्यापक रूप से वितरित की जाएगी।’

उन्होंने आगे कहा, ‘असम में आज के युवा हथियार नहीं उठा रहे हैं बल्कि अपने भले के लिए काम कर रहे हैं। जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा, तो असम के युवाओं को इसका लाभ मिलेगा। वह दिन दूर नहीं जब पूर्वोत्तर की सभी राजधानियां रेलवे के माध्यम से जुड़ेंगे। वह दिन दूर नहीं जब असम बाढ़ मुक्त हो जाएगा।’

केंद्रीय मंत्री ने कहा भारत तभी महान बन सकता है जब असम महान बन जाए। सीएम हेमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सीमाओं के पार मवेशियों की तस्करी को सफलतापूर्वक रोक दिया है। हमने देश में 60% से अधिक क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम (AFSPA) को हटा दिया है। असम न केवल पूर्वोत्तर का बल्कि हमारे पूरे देश का स्वास्थ्य केंद्र बनेगा। ’  

इस दौरान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, 'असम सरकार ने नागरिकों से सीधे जुड़ने और लोगों को असम की विकास यात्रा के बारे में जानने का मौका देने के लिए अपना खुद का न्यूजलेटर शुरू करने का फैसला किया है।'

नागरिकों, बुद्धिजीवियों और स्वतंत्र पत्रकारों को न्यूजलेटर के माध्यम से असम सरकार को रचनात्मक सुझाव देने का अवसर मिलेगा। असम सरकार असम बरता की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। पहले चरण में, विभिन्न आधुनिक तकनीकों जैसे वॉट्सऐप, टेलीग्राम, ई-मेल, एसएमएस और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक करोड़ पाठकों तक पहुंचने का लक्ष्य सरकार ने रखा है।

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दैनिक भास्कर ने बताया, अखबार छापना क्यों हुआ और महंगा

प्रिंट कंपनियों के सामने इन दिनों अखबारी कागज की कम उपलब्धता और ऊंचे दाम का संकट तो बना हुआ है

Last Modified:
Monday, 09 May, 2022
newspaper

प्रिंट कंपनियों के सामने इन दिनों अखबारी कागज की कम उपलब्धता और ऊंचे दाम का संकट तो बना हुआ है, साथ ही अब छपाई में इस्तेमाल होने वाली इंक, प्लेट और डिस्ट्रीब्यूशन के दामों में भी काफी ज्यादा इजाफा हो गया है।

दैनिक भास्कर की हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते दो सालों में समुद्री मालभाड़ा की दरें भी चार गुना तक बढ़ गई हैं। नेचुरल गैस-कोयले की कीमतों में उछाल से भी अखबारी कागज मिलों पर दबाव बढ़ा है। इस सबके बावजूद, देश में आज भी अखबारों की कीमत दुनिया के प्रमुख देशों से बेहद कम है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका में जहां अखबार करीब 7800 रुपए महीने की कीमत पर मिल रहे हैं, वहीं भारत में आज भी अखबारों की औसत कीमत लगभग 150 से 250 रुपए महीना है।

गौरतलब है कि आयातित अखबारी कागज के दाम 16 महीनों में 175% तक बढ़ चुके हैं। भारतीय कागज भी 110% तक महंगा हुआ है। जहां अखबार की लागत में 50 से 55% मूल्य कागज़ का होता है। वहीं छपाई में इस्तेमाल होने वाली इंक-प्लेट और डिस्ट्रीब्यूशन की वजह से लागत 10 से 15% और बढ़ जाती है। वहीं कोविड में अखबारों की विज्ञापनों से होने वाली आय भी कमजोर हुई है।

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'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे' पर दैनिक भास्कर समूह ने शुरू कीं ये तीन नई पहल

3 मई को हर साल 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे' के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन पर पत्रकारिता में और ऊंचाई हासिल करने के लिए दैनिक भास्कर समूह ने 3 नई पहल की शुरुआत की है।

Last Modified:
Wednesday, 04 May, 2022
Dainik Bhaskar

3 मई को हर साल 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे' के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन पर पत्रकारिता में और ऊंचाई हासिल करने के लिए दैनिक भास्कर समूह ने 3 नई पहल की शुरुआत की है। पहले ये कि दैनिक भास्कर समूह अपने पत्रकार साथियों के लिए अगले साल से 'रमेश अग्रवाल जर्नलिज्म अवॉर्ड' शुरू करने जा रहा है।

भास्कर समूह के मुताबिक, उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं उसके पत्रकार जो पूरी जानकारी व विश्लेषण पाठकों तक पहुंचाते हैं। भास्कर के साथियों को यह अवॉर्ड हर साल दिया जाएगा। इसके तहत जूरी ऐसी स्टोरीज चुनेगी, जो प्रेस की स्वतंत्रता दर्शाने वाली होंगी।

दैनिक भास्कर समूह ने दूसरी बड़ी पहल ये की है कि वह अगले एक साल में प्रिंट व डिजिटल में 50 महिला पत्रकारों की नियुक्त करेगा।

वहीं समूह की तीसरी पहल ये है कि वह ‘रमेश अग्रवाल जर्नलिज्म फेलोशिप प्रोग्राम’ शुरू कर रहा है। ग्रुप ने इस वार्षिक पत्रकारिता फेलोशिप की शुरुआत इसी साल से की है।

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पत्रकार सुशील कुमार सुधांशु ने अब इस अखबार के साथ शुरू किया नया सफर

पिछले दिनों 'दैनिक जागरण' से इस्तीफा देने वाले पत्रकार सुशील कुमार सुधांशु ने अपनी नई पारी 'अमर उजाला' अखबार के साथ शुरू की है।

Last Modified:
Sunday, 01 May, 2022
Sushil Kumar Sudhanshu

पिछले दिनों 'दैनिक जागरण' से इस्तीफा देने वाले पत्रकार सुशील कुमार सुधांशु ने अपनी नई पारी 'अमर उजाला' अखबार के साथ शुरू की है। उन्हें अखबार के नेशनल डेस्क पर वरिष्ठ उपसंपादक की भूमिका मिली है।

बता दें कि सुशील कुमार सुधांशु लगभग 16 साल से मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत हैं। उन्होंने 2005 में IIMM, दिल्ली से रेडियो और टीवी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा करने के बाद हरियाणा के हिसार स्थित 'गुरु जम्भेश्वर यूनिवर्सिटी' से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। उसके बाद 'श्री अधिकारी ब्रदर्स' के चैनल 'जनमत टीवी' से 2006 में पत्रकारिता की शुरुआत की।

सुशील कुमार सुधांशु ने उसके बाद 'लाइव इंडिया टीवी' में प्रोडक्शन में, 'श्री न्यूज' और 'समाचार प्लस' न्यूज चैनल में इनपुट (असाइनमेंट) डेस्क पर प्रोड्यूसर के पद पर अपनी सेवा दी। वर्ष 2017 में उन्होंने ‘दैनिक जागरण‘ से प्रिंट में अपना कदम रखा और वहां हरियाणा डेस्क पर सहप्रभारी के तौर पर करीब पांच साल तक कार्य किया। साथ ही वर्ष 2008 से 2019 तक वह आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में असाइनमेंट बेस पर समाचार संपादक के तौर पर भी कार्यरत रहे हैं।

समाचार4मीडिया की ओर से सुशील कुमार सुधांशु को नए सफर के लिए ढेरों शुभकामनाएं।

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पत्रकार सुशील कुमार सुधांशु ने 'दैनिक जागरण' को कहा अलविदा

वह ‘दैनिक जागरण‘ नोएडा में करीब पांच साल से कार्यरत थे और हरियाणा डेस्क पर सह प्रभारी की भूमिका निभा रहे थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 20 April, 2022
Last Modified:
Wednesday, 20 April, 2022
Sushil Kumar Sudhanshu

‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ के चैनल ‘जनमत टीवी’ से वर्ष 2006 में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले सुशील कुमार सुधांशु ने ‘दैनिक जागरण‘ में लगभग पांच साल काम करने के बाद इस संस्थान को अलविदा कह दिया है। वह ‘दैनिक जागरण‘ नोएडा में हरियाणा डेस्क पर सह प्रभारी की भूमिका निभा रहे थे।

उन्होंने 2005 में IIMM, दिल्ली से रेडियो और टीवी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा करने के बाद हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। ‘जनमत‘ से पहले उन्होंने ‘पंजाब केसरी‘ और ‘जनसत्ता‘ अखबार में ट्रेनिंग भी ली थी।

सुशील कुमार ‘दैनिक जागरण‘ से पहले ‘लाइव इंडिया‘ में प्रोडक्शन में, ‘श्री न्यूज‘ और ‘समाचार प्लस‘ न्यूज चैनल में इनपुट (असाइनमेंट) डेस्क पर प्रोड्यूसर के पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। साथ ही 2008 से 2019 तक उन्होंने आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में असाइनमेंट बेस पर समाचार संपादक के तौर पर भी कार्य किया है। जल्द ही वह एक बड़े संस्थान के साथ अपनी नई पारी की शुरुआत करेंगे।

समाचार4मीडिया की ओर से सुशील सुधांशु को उनके नए सफर के लिए अग्रिम शुभकामनाएं।

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‘रफ्तार’ नहीं पकड़ पा रही प्रिंट इंडस्ट्री, अब सामने आया नया रोड़ा

मिलों के कामकाज पर महामारी के दुष्प्रभाव के कारण अखबारी कागज की लागत अब बढ़कर 1000 डॉलर प्रति टन हो गई है और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण आयात में बाधा आ रही है।

Last Modified:
Tuesday, 19 April, 2022
Newsprint

‘कोविड-19’ (Covid-19) के दौरान थमी प्रिंट इंडस्ट्री की रफ्तार गति नहीं पकड़ पा रही है। हालांकि, महामारी के चरम के दौरान सबसे खराब हालात देखने के बाद अब थोड़ी स्थिति सुधरने पर लगने लगा था कि प्रिंट इंडस्ट्री के अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन अखबारी कागज (newsprint) की आपूर्ति में बाधा और कीमतों में भारी वृद्धि के कारण प्रिंट इंडस्ट्री के सामने नई चुनौतियां आ गई हैं।

दिसंबर 2021 में न्यूजप्रिंट की कीमत 700 से 750 डॉलर प्रति टन थी, वह अब बढ़कर लगभग 1000 डॉलर प्रति टन पर पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। एक तो मिलों के कामकाज पर महामारी के दुष्प्रभाव के कारण अखबारी कागज की लागत बढ़ी है, वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण न्यूजप्रिंट के आयात में बाधा आ रही है। दरअसल, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, कोरिया और रूस सहित कई देशों द्वारा अखबारी कागज का उत्पादन किया जाता है, लेकिन युद्ध ने अखबारी कागज की आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

इस बारे में ‘पंजाब केसरी’ के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अमित चोपड़ा का कहना है, ‘महामारी ने पूरी दुनिया में बेकार कागज (waste paper) के संग्रह को प्रभावित किया। ऐसे में रीसाइकिल (recycled) कागज का इस्तेमाल करने वाली अखबारी कागज मिलों को कच्चे माल की कमी के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा, कोविड के दौरान कम मांग के कारण कई न्यूजप्रिंट मिलों को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। कई मिलों ने परिचालन फिर से शुरू नहीं किया। कई मामलों में, आपूर्ति इस मांग को पूरा नहीं कर सकी।’

इसके साथ ही चोपड़ा का कहना है कि महामारी के दौर में शिपिंग की लागत बेहद महंगी हो गई है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने समस्याओं को और बढ़ा दिया है, क्योंकि रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। चोपड़ा के अनुसार, ‘भारत में पेपर मिलों के पास पर्याप्त बेकार कागज उपलब्ध नहीं है और शिपमेंट ऑर्डर आने में कम से कम पांच महीने लग रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप आपूर्ति और मांग में अंतर है।’

इस बारे में ‘मलयाला मनोरमा’ (Malayala Manorama) के वाइस प्रेजिडेंट (मार्केटिंग और एडवर्टाइजिंग सेल्स) वर्गीस चांडी का कहना है कि न्यूजप्रिंट 100 प्रतिशत आयातित वस्तु है क्योंकि भारतीय निर्माता देश में इसकी मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अखबारी कागज की गुणवत्ता भी भारतीय अखबारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हाई स्पीड प्रिंटिंग मशीनों के लिए पर्याप्त नहीं है।

वर्गीस चांडी के अनुसार, ‘हालांकि अखबारी कागज की कीमतों में अचानक से गिरावट की संभावना नहीं है, लेकिन हमें उम्मीद है कि युद्ध समाप्त होने पर स्थिति में सुधार होगा। सभी समाचार पत्रों के लिए यह कठिन समय है, वे इस संकट का सामना करने की कोशिश कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब इंडस्ट्री में इस तरह की चुनौतियां आई हैं। अतीत में इसी तरह की घटनाएं हुई हैं। हम इस स्थिति का सामना करेंगे और इस परेशानी से उबरेंगे।’ इस संकट ने कई छोटे पब्लिकेशंस को बंद होने के लिए मजबूर कर दिया है, वहीं कुछ बड़े नामों ने पृष्ठों की संख्या में कटौती की है।

चोपड़ा के अनुसार कुछ अखबारों ने इस संकट की आशंका जताई थी और पहले से अखबारी कागज का स्टॉक कर लिया था। उन्होंने कहा, ‘समस्या यह है कि अगर कागज का स्टॉक कर भी लिया है, तो भी कोई कितना स्टॉक कर सकता है? हालांकि, उम्मीद है कि स्थिति जल्द ही स्थिर हो जाएगी। हम उम्मीद करते हैं कि इस संकट में छपाई उद्योग की मदद के लिए सभी साथ आएंगे। अप्रैल और मई में चीजें खराब होंगी, लेकिन जून और जुलाई तक स्थिति बेहतर होनी चाहिए। हमें उम्मीद है कि बेकार कागज और अखबारी कागज की शिपमेंट शुरू हो जाएगी और जल्दी ही यह पहुंचना शुरू हो जाएगा।’

वहीं, ‘इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी’ (Indian Newspaper Society)  के प्रेजिडेंट मोहित जैन का कहना है कि घरेलू मिलें अधिक धन की मांग कर रही हैं, जो आयात की लागत से अधिक है। भारत में कुल क्षमता केवल 0.7 मिलियन टन है, लेकिन खपत 1.4 मिलियन टन है। मोहित जैन के अनुसार, ‘अखबारी कागज की घरेलू क्षमता पूरी तरह से अपर्याप्त है। इसलिए, पब्लिशर्स आयात करने के लिए मजबूर हैं और घरेलू मिलों की गुणवत्ता भी कम है। आज पब्लिशर्स के पास माल की कमी है और कीमत इतनी बढ़ गई है कि कई छोटे और मंझोले समाचार पत्रों के बंद होने या घाटे में जाने की आशंका है।’

उन्होंने कहा कि घरेलू मिलें आवश्यकता को पूरा करने में असमर्थ हैं और इस बीच ये अपनी क्षमता को छपाई में इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं, क्योंकि इससे उन्हें बेहतर मार्जिन मिलता है। मोहित जैन के अनुसार, ‘आईएनएस ने भारत सरकार से पांच फीसदी कस्टम ड्यूटी हटाने की अपील की है।  

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सूचना-प्रसारण मंत्री ने बताया, देश में दर्ज पंजीकृत प्रकाशनों की संख्या

‘प्रेस इन इंडिया’ (2020-21) में प्रकाशित 31 मार्च 2021 तक पंजीकृत प्रकाशनों का राज्य-वार ब्यौरा देश के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) के कार्यालय की वेबसाइट (www.rni.nic.in) पर उपलब्ध है।

Last Modified:
Friday, 08 April, 2022
Anurag Thakur

भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) के कार्यालय में 31 मार्च 2021 तक 1,44,520 कुल प्रकाशन पंजीकृत है। सूचना-प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इसकी जानकारी लोकसभा में दी। उन्होंने आगे कहा कि ‘प्रेस इन इंडिया’ (2020-21) में प्रकाशित 31 मार्च 2021 तक पंजीकृत प्रकाशनों का राज्य-वार ब्यौरा देश के समाचार पत्रों के पंजीयक (RNI) के कार्यालय की वेबसाइट (www.rni.nic.in) पर उपलब्ध है।

प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम, 1867 की धारा 19 (डी) के अनुसार, सभी पंजीकृत प्रकाशकों को हर साल आरएनआई के साथ एक वार्षिक विवरण दाखिल करना होता है, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ वर्ष के दौरान किए गए प्रकाशनों का विवरण शामिल होता है। ठाकुर ने कहा, ‘आरएनआई के संज्ञान में आया है कि कई पंजीकृत समाचार पत्रों ने पिछले कई वर्षों से अपना वार्षिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया है।’

मान्यता प्राप्त पत्रकारों के विवरण के बारे में पूछे जाने पर, ठाकुर ने कहा कि पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) भारत सरकार के मुख्यालय के श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य श्रेणियों के व्यक्तियों को मान्यता प्रदान करने के लिए जो गाइडलाइंस है, उसके अनुसार ही मान्यता प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि मीडियाकर्मियों की मान्यता से संबंधित राज्य सरकारों के पास अपने स्वयं के मानदंड और दिशानिर्देश हैं।

देश में मीडिया के लोगों पर हो रहे हमलों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर ठाकुर ने जवाब दिया कि 'पुलिस' और 'लोक व्यवस्था' भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य के विषय हैं और इसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं। राज्य सरकारें अपनी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के माध्यम से अपराध की रोकथाम, पता लगाने, पंजीकरण व जांच करने और अपराधियों पर मुकदमा चलाने के लिए उत्तरदायी हैं।

उन्होंने कहा, ‘केंद्र सरकार पत्रकारों सहित देश के प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा और संरक्षा को सर्वोच्च महत्व देती है। विशेष रूप से पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर 20 अक्टूबर 2017 को राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को एक एडवाइजरी जारी की गई थी, जिसमें उनसे मीडियाकर्मियों की सुरक्षा व संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून को सख्ती से लागू करने का अनुरोध किया गया था।’

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प्रिंट मीडिया के लिए गुड न्यूज, अगले वित्त वर्ष में 20% हो सकती है बढ़त: CRISIL

प्रिंट मीडिया क्षेत्र का कारोबार अगले वित्त वर्ष में 20 प्रतिशत की बढ़त हासिल करने का अनुमान है

Last Modified:
Friday, 01 April, 2022
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प्रिंट मीडिया क्षेत्र का कारोबार अगले वित्त वर्ष (FY23) में 20 प्रतिशत की बढ़त हासिल करने का अनुमान है, जिसके साथ ही यह 27,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा। लेकिन बताया जा रहा है कि यह महामारी से पूर्व के 32,000 करोड़ रुपए के आंकड़े को फिलहाल नहीं छू पाएगा। एक रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। बीते वर्ष (FY22) में प्रिंट मीडिया का कारोबार 22,500 करोड़ दर्ज किया गया था।

गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) ने बताया कि प्रिंट इंडस्ट्री की आय वित्त वर्ष 2020-21 के 18,600 करोड़ रुपए के मुकाबले बढ़कर अगले वित्त वर्ष में 27,000 करोड़ रुपए होने की संभावना है। रिपोर्ट की मानें तो निचले आधार प्रभाव और बढ़ते विज्ञापनों के बीच सदस्यता आमदनी बढ़ने से क्षेत्र के कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। हालांकि, अखबारी कागज की बढ़ती कीमतें इस क्षेत्र के लिए परिचालन मुनाफे में तीन से साढ़े तीन प्रतिशत की कमी ला सकती हैं।

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुताबिक, आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ विज्ञापन से होने वाली आय में सुधार होगा। कार्यालयों को फिर से खोलने और कार्यालयों वापस लौटने वाले लोगों के साथ व्यापक सहसंबंध के कारण सदस्यता आय भी बढ़ेगी।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इसके अतिरिक्त अखबारी कागज की बढ़ती कीमतों से परिचालन आय में तीन से साढ़े तीन प्रतिशत की कमी हो सकती है। यह रिपोर्ट उन कंपनियों से मिली सूचना के आधार पर तैयार की गई हो जिनका इंडस्ट्री की 40 प्रतिशत आय पर नियंत्रण है।

प्रिंट मीडिया संस्थानों की परिचालन लागत का 30-35 प्रतिशत हिस्सा अखबारी कागज का होता है।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पढ़ने के तरीके में आए बदलाव के तहत डिजिटल मीडिया को वरीयता मिलने की वजह से अखबारों की सदस्यता महामारी-पूर्व के स्तर से कम रहेगी।

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'न्यू एरा ऑफ इंडियननेस' से परिचय कराती है प्रो. संजय द्विवेदी की ये पुस्तक: उदय महुरकर

’भारतीय जनसंचार संस्थान’ के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक 'भारतबोध का नया समय' का लोकार्पण गुरुवार को नई दिल्ली में किया गया।

Last Modified:
Thursday, 31 March, 2022
Book Launching

प्रख्यात पत्रकार एवं ‘भारतीय जनसंचार संस्थान’ (IIMC) नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक 'भारतबोध का नया समय' का लोकार्पण गुरुवार को नई दिल्ली में किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारत सरकार के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर थे। समारोह की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वरिष्ठ आचार्य प्रो. कुमुद शर्मा मुख्य वक्ता के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुईं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नागेश्वर राव और वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनंत विजय ने विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह में हिस्सा लिया।

'भारतबोध का नया समय' को 'न्यू एरा ऑफ इंडियननेस' बताते हुए भारत सरकार के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने कहा कि आजादी के तुरंत बाद भारतबोध की जो बात हमें करनी चाहिए थी, वो हमें 70 साल बाद करनी पड़ रही है। इस पुस्तक के माध्यम से राष्ट्रीयता की अलख जगाने की कोशिश की गई है। यह पुस्तक नए भारत से हमारा परिचय कराती है। एक ऐसा भारत, जिसका सपना स्वामी विवेकानंद जैसे राष्ट्रनायकों ने देखा था। माहुरकर के अनुसार, ‘मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीय विचारों को कुचलने का प्रयास किया। अपनी संस्कृति को लेकर लोगों में जो हीनताबोध उन्होंने भरा, इस पुस्तक के माध्यम से उसे दूर करने का प्रयास किया गया है। भारतीयता को हीनभावना से प्रस्तुत करने का प्रयास समाज के एक विशेष वर्ग द्वारा लगातार किया जा रहा है। यह पुस्तक ऐसे लोगों को भारतीयता और भारतबोध का सही अर्थ समझाने का प्रयास करती है।‘

भारत के नए रूप से कराया परिचय: कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि इस पुस्तक के लेखक प्रो. संजय द्विवेदी पत्रकार, प्राध्यापक और प्रशासक का अद्भुत संगम हैं। 'भारतबोध का नया समय' में जहां पत्रकार का सटीक विवेचन और प्राध्यापक की सूझबूझ और समझदारी है, वहीं प्रशासक का चैतन्य भी इस पुस्तक में दिखाई देता है। भारत के उस रूप से पाठकों का परिचय लेखक ने करवाया है, जिसकी अभी तक हम सिर्फ कल्पना ही करते थे।

डॉ. जोशी ने कहा कि भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतबोध के दर्शन होते हैं। वर्ष 2047 में जब भारत आजादी के 100वें वर्ष में प्रवेश करेगा, तो यह पुस्तक बौद्धिक रसद के रूप में युवाओं के हाथ में होगी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार चिंतन करते हुए लिखना और उस लिखे हुए पर अमल करना बुद्धिजीवी समाज का दायित्व है।

आत्मचैतन्य से युक्त हो रहा भारत: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वरिष्ठ आचार्य प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि प्रो. संजय द्विवेदी जब लिखते हैं, तो समय की नब्ज पर पूरी पकड़ रखते हैं। सामयिक युग की चिंताएं उनके लेखन को गति देती हैं। अपनी इस पुस्तक के माध्यम से देश की अस्मिता से वे हमारा परिचय कराते हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जब भारत पर राज किया, तो हमारे सांस्कृतिक ढांचे को तोड़ने का प्रयास किया। उस दौर में यूरोप के संदर्भों में भारतीयता को परिभाषित किया जाता था। इस कारण जहां एक तरफ हम सांस्कृतिक विरासत से दूर होते चले, वहीं दूसरी तरफ अज्ञान का अंधकार बढ़ने लगा। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने जड़ों से जुड़ी भारतीय चेतना को नया आकाश देने का कार्य किया है।

प्रो. शर्मा ने कहा कि आत्मचैतन्य से युक्त भारत में आज नए युग की शुरुआत हो रही है। हम भारतबोध के साथ नए भारत को गढ़ने की प्रकिया में हैं। सनातन सरोकारों को जोड़कर आज भारत का नेतृत्व हो रहा है। यह प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने कहा कि प्रो. द्विवेदी ने इस पुस्तक के द्वारा युवाओं को आसान और सरल शब्दों में भारतबोध का समझाया है।

संस्कृति और ज्ञान परंपरा को समझेंगे युवा: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नागेश्वर राव ने कहा कि प्रो. संजय द्विवेदी की इस पुस्तक को मैंने तीन घंटे में पूरा पढ़ लिया। आज के जमाने में किसी पुस्तक को एक बार में बैठकर पूरा पढ़ जाना असंभव सा लगता है, लेकिन प्रो. द्विवेदी की पुस्तक आपको भारत की यात्रा पर ले जाती है। इस पुस्तक का विषय, भाषा शैली और प्रस्तुतीकरण अद्भुत है। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि इस पुस्तक के माध्यम से युवा अपनी संस्कृति और ज्ञान परंपरा को जानेंगे। भारत को जाने बिना हम भारत के नहीं बन सकते। इस किताब में प्रस्तुत लेखों से भारत के गौरव की अनुभूति पूरे देश को हो रही है।

'राष्ट्र सर्वप्रथम' का चिंतन है पुस्तक: वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनंत विजय ने कहा कि इस पुस्तक में संजय द्विवेदी ने वर्तमान को साथ रखा है, लेकिन वे अपने अतीत को भूलते नहीं है। अतीत को साथ रखकर ही उत्कृष्ट रचना की जा सकती है। उन्होंने कहा कि हमारे सभी मनीषियों की चिंतनधारा में 'राष्ट्र सर्वप्रथम' रहा है। प्रो. द्विवेदी ने आम बोलचाल के शब्दों में उस चिंतनधारा को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।

अनंत विजय ने कहा कि किसी भी पुस्तक की पैकेजिंग से कुछ नहीं होता। आज जमाना कंटेंट का है। अगर पुस्तक पाठकों के साथ संबध स्थापित कर पाती है, तो उस किताब को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। प्रो. संजय द्विवेदी की इस पुस्तक ने पाठकों के साथ रागात्मक संबंध स्थापित किया है, जो इसकी सफलता का प्रमाण है।

भारतीयता का एहसास होना जरूरी: इस अवसर पर पुस्तक के लेखक एवं भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि कोई भी किताब खुद अपना परिचय देती है। ये किताब आम आदमी के लिए लिखी गई है, जो भारत को जानना चाहता है। इस पुस्तक के माध्यम से हमारा प्रयास है कि लोगों को भारतीयता का एहसास हो। उन्होंने कहा कि भारत को जानने के लिए हमें कुछ प्रयास अवश्य करने चाहिए। जब आप भारत को जान जाते हैं, तो आप भारत से दूरी नहीं बना सकते।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि सही मायनों में आज भारत जाग रहा है और नए रास्तों की तरफ देख रहा है। आज भारत एक नेतृत्वकारी भूमिका के लिए आतुर है और उसका लक्ष्य विश्व मानवता को सुखी करना है। आज के भारत का संकट यह है कि उसे अपने पुरा वैभव पर गर्व तो है, पर वह उसे जानता नहीं हैं। इसलिए भारत की नई पीढ़ी को भारतबोध को समझने की जरूरत है। कार्यक्रम में स्वागत भाषण इंदिरा गांधी कला केंद्र के डीन एवं विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने दिया एवं संचालन कला केंद्र की सहायक सूचना अधिकारी सुश्री यति शर्मा ने किया।

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