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अखबार छपना नहीं होंगे बंद, कोर्ट ने खारिज किए ये तर्क

मद्रास हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें ये मांग की गई थी कि  राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान अखबारों के प्रकाशन पर रोक लगा दी जाए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

मद्रास हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें ये मांग की गई थी कि  राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान अखबारों के प्रकाशन पर रोक लगा दी जाए। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में ये तर्क दिया था कि समाचार पत्रों से कोरोना वायरस फैल सकता है।

लिहाजा, कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जीवंत मीडिया की बहुत अहमियत है। इसलिए मात्र आशंका के आधार पर  कि अखबारों से कोरोना वायरस फैल सकता है, नागरिकों के लिए इस सूचना के अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया जाए, ऐसा नहीं हो सकता।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एन.किरुबाकरन और जस्टिस आर. हेमलता की पीठ ने कहा कि केवल आशंका या संभावना के आधार पर अखबारों के प्रकाशन पर रोक नहीं लगाई जा सकती है और यदि ऐसा किया जाता है तो यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत न केवल प्रकाशक, संपादक बल्कि पाठक के भी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के समान होगा। पीठ ने कहा कि एक जीवंत मीडिया भारत जैसे किसी भी लोकतांत्रिक देश की थाती है।

याचिकाकर्ता टी. गणेश कुमार ने यह भी दावा किया था कि यदि समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं और कोई संक्रमित पेपर डिलीवरी ब्वाय इसे लोगों के घरों तक पहुंचाता है, तो अखबारों के जरिये और लोगों को भी संक्रमण हो सकता है। अपने दावों को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता ने ‘द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में प्रकाशित ‘SARS-CoV-1 की तुलना में SARS-CoV-2 की एरोसोल और सरफेस स्टेबिलिटी’ नामक एक अध्ययन का जिक्र किया, जिसमें यह दावा किया गया है कि वायरस अखबार पर 4-5 दिनों के लिए जीवित रह सकता है।

इस तरह की सभी धारणाओं को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि ये सब शुरुआती स्तर पर किए गए शोध के नतीजे थे। ये सिर्फ अनुमान हैं और इनकी पुष्टि नहीं की गई है।

तमिलनाडु सरकार के महाधिवक्ता पीएच अरविंद पांडियन के तर्को से सहमति जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड व मीडिया रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि समाचार पत्रों के माध्यम से या कागज की सतह से कोरोना बहुत व्यापक तरीके से फैल रहा है, यह सही नहीं है। इस विषय में अभी बहुत सीमित शोध हुआ है। केवल आशंका या मामूली संभावना के आधार पर समाचार पत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाना उचित नहीं है।

 


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