'इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी' ने गुजरात CM को कहा- थैंक्स, पीएम से फिर की ये अपील

इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) ने गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी की सराहना की और उन्हें धन्यवाद भी दिया

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2020
INS

इस मुश्किल घड़ी में संकटों से जूझ रहे प्रिंट मीडिया की बकाया राशि स्वीकृत कर मदद में आगे आने के लिए इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) ने गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी की सराहना की और उन्हें धन्यवाद भी दिया।

इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी के प्रेजिडेंट शैलेष गुप्ता ने कहा, ‘गुजरात सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है और प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए बहुत ही ज्यादा राहत प्रदान करने वाला है, क्योंकि इस इंडस्ट्री को मार्च और अप्रैल के दौरान लगभग 4,500 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है।’

शैलेष गुप्ता ने कहा कि गुजरात सरकार ने उल्लेखनीय कदम उठाया है। मुख्यमंत्री रूपानी ने प्रिंट मीडिया के प्रयासों की सराहना भी की है और इस संकट काल में अखबार को सच्ची, सटीक और विश्वसनीय जानकारी का सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ स्रोत बताया है। यह समाज के फेक न्यूज से बचाता है। रूपानी ने यह भी आश्वासन दिया है कि उनकी सरकार अप्रैल 2020 तक प्रकाशित हो चुके सरकारी विज्ञापनों के लिए लंबित पड़े सभी भुगतानों को मंजूरी देकर प्रिंट मीडिया का समर्थन कर रही है।

इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी के अध्यक्ष शैलेष गुप्ता ने गुजरात सरकार की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी सहायता की उम्मीद की हैं, क्योंकि पिछले दिनों आईएनएस ने विशेष पैकेज के लिए प्रधानमंत्री से आग्रह किया था। इसके अलावा सभी राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार से संबद्ध विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों से भी अप्रैल 2020 तक की बकाया राशि भुगतान का आग्रह किया है।

आईएनएस की ओर से जारी बयान में शैलेष गुप्ता ने गुजरात सरकार के कदम की प्रशंसा करते हुए प्रधानमंत्री को बताया कि प्रिंट मीडिया अब तक के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। यह उद्योग लगभग 30 लाख लोगों को रोजगार देता है। भारी वित्तीय संकट और बढ़ते बोझ और कोई कमाई न होने के बावजूद यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि अखबार हर सुबह पूरे देश में लोगों तक पहुंचे और उन्हें जानकार बनाए। ऐसे में सरकार से मदद की जरूरत है। लिहाजा प्रिंट मीडिया को हुए लगभग 4500 करोड़ के नुकसान की जानकारी देते हुए एक बार फिर पीएम मोदी से विशेष पैकेज और बकाया राशि के भुगतान का आग्रह किया गया है।

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इस अखबार के फ्रंट पेज पर न तो कोई खबर, न तस्वीर और न ही विज्ञापन, फिर भी आया चर्चाओं में

पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रहा कोरोना वायरस से संक्रमित होने के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका से हैं, जहां अभी तक करीब 16 लाख लोग इस वायरस की चपेट में चुके हैं

Last Modified:
Monday, 25 May, 2020
Newspaper

पूरी दुनिया में अपना कहर बरपा रहा कोरोना वायरस से संक्रमित होने के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका से हैं, जहां अभी तक करीब 16 लाख लोग इस वायरस की चपेट में चुके हैं, जबकि मरने वालों की संख्या करीब एक लाख तक पहुंच गई है। इस महामारी की गंभीरता को समझाने और जागरूक करने के लिए एक अखबार की अनूठी पहले दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है।

दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स के फ्रंट पेज पर न तो कोई खबर छपी है, न तस्वीर और न विज्ञापन। अखबार का फ्रंट पेज पूरी तरह से इस महामारी से जान गवाने वाले अमेरिकियों को समर्पित कर दिया गया है। पृष्ठ पर कोरोना से मरने वाले लोगों के नाम छापे गए हैं, लिहाजा यह देखकर हर कोई हैरान रह गया।

अखबार ने फ्रंट पेज पर एक लाख मृतकों के नाम छापते हुए सिर्फ एक लाइन का संदेश लिखा है, करीब एक लाख मौतें, बेहिसाब क्षति। इसके बाद नीचे उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा गया है सूची में वो सिर्फ नाम नहीं थे, वो हम थे। 

अखबार ने फ्रंट पेज पर मृतकों के नाम क्यों प्रकाशित किए, इसपर उसने 'टाइम्स इनसाइडर' में एक लेख भी प्रकाशित किया है। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकों ने इस भयावह स्थिति को दर्शाने का फैसला किया। ग्राफिक्स डेस्क की असिस्टेंट एडिटर सिमोन लैंडन संख्याओं को इस रूप में रखना चाहती थीं जो यह तो दिखाए ही कि कितनी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है और यह भी किस वर्ग के लोगों की मौत हुई है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के सभी विभाग के पत्रकार इस महामारी को कवर कर रहे हैं। सिमोन लैंडन कहती हैं, हमें पता था कि हम माइल स्टोन खड़ा करने जा रहे हैं। हमें पता था कि उन संख्याओं को रखने का कुछ तरीका होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक लाख डॉट या स्टिक फिगर पेज पर लगाने से आपको कुछ पता नहीं चलता कि वे कौन लोग थे और वे हमारे लिए क्या मायने रखते थे।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अखबार के पहले पन्ने पर जिन एक हजार लोगों के नाम छापे गए हैं, वे कुल मौतों का सिर्फ एक फीसदी हैं। अखबार का कहना है कि मृतकों की लिस्ट इतनी लंबी है कि यदि इसे छापा जाए तो अखबार के 12वें पेज तक सिर्फ मृतकों के नाम ही लिखे जा सकते हैं। अखबार ने इन लोगों का नाम, उम्र और पता लिखने के बाद उनके बारे में एक लाइन लिखकर उन्हें याद किया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि इस वायरस से मरने वालों की संख्या के आधार पर अमेरिका पर इसके असर को नहीं समझा जा सकता। इस वायरस की अमेरिका को भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

अखबार ने शनिवार की देर रात जैसे ही अपने फ्रंट पेज का स्क्रीनशॉट जारी किया, वह दुनिया भर में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। फेसबुक और ट्विटर पर काफी संख्या में लोगों ने इसे शेयर किया। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने मृतकों को याद करने के लिए इस अनूठे अंदाज पर अखबार को धन्यवाद ज्ञापित किया।  

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IRS: इन बड़ी वजहों से लगातार सफलता की इबारत लिख रहा दैनिक जागरण

पिछले दिनों 'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019’ की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के डाटा जारी किए गए हैं।

Last Modified:
Friday, 22 May, 2020
Dainik Jagran

पिछले दिनों 'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019’ की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के डाटा जारी किए गए हैं। यह रिपोर्ट इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पिछली तिमाही यानी पहली (Q1), दूसरी (Q2) और तीसरी तिमाही (Q3) के जारी किए गए डाटा पर आधारित है, जिसकी औसतन रिपोर्ट के बाद चौथी तिमाही के नतीजे तैयार किए गए हैं।

आइआरएस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देशभर के छह करोड़ 87 लाख पाठकों, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश के ही 3.9 करोड़ पाठक शामिल हैं, ने दैनिक जागरण को अपना पसंदीदा अखबार बताया है। सर्वे में दैनिक जागरण लगातार पूरे देश के समाचार पत्रों में शीर्ष पर बना हुआ है। देश में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों की लिस्ट में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से दैनिक जागरण की कुल रीडरशिप (total readership) 30 प्रतिशत ज्यादा बनी हुई है।  

‘आईपीजी मीडियाब्रैंड्स इंडिया’ (IPG Mediabrands India) के सीईओ शशि सिन्हा के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी मार्केट में दैनिक जागरण की काफी ग्रोथ हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे मार्केट में जहां साक्षरता दर बढ़ी है और इसलिए वहां अखबार की रीडरशिप में भी इजाफा हुआ है।

सिन्हा का कहना है, ‘जागरण ने भी नए पाठकों पर काफी निवेश किया है। देश में अखबारों का कवर मूल्य इतना कम है कि कई बार अखबार सर्कुलेशन बंद हो जाता है, क्योंकि जब तक आपके पास स्थिर विज्ञापन रेवेन्यू नहीं होता है, तब आप जितनी बिक्री करते हैं, उतना ही आपको नुकसान होता है। दूसरों के विपरीत जागरण का सर्कुलेशन सिर्फ बढ़ा है,इसकी वजह से रीडरशिप भी बढ़ी है और उन्हें अपनी टॉप पोजीशन पर रहने में मदद मिली है।’

इस बारे में ‘जागरण प्रकाशन’ के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (स्ट्रैटेजी, ब्रैंड और बिजनेस डेवलपमेंट) बसंत राठौड़ का कहना है, ‘पाठकों के लिए क्वालिटी कंटेंट तैयार करने पर किए गए मजबूत फोकस ने रीडरशिप की लिस्ट में नंबर वन रहने में मदद की है।’  उनका कहना है, ‘दैनिक जागरण के सात सरोकार इसकी एडिटोरियल पॉलिसी का हिस्सा है। ये सात सरोकार गरीबी उन्मूलन, स्वस्थ समाज, सुशिक्षित समाज, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और जनसंख्या नियोजन हैं। इन सरोकारों पर काम करने से लोगों से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है।’

आईआरएस की चौथी तिमाही के आंकड़ों के अनुसार, दैनिक जागरण न सिर्फ टोटल रीडरशिप (Total Readership) बल्कि एवरेज इश्यू रीडरशिप (average issue readership) में भी नंबर वन है। चौथी तिमाही में इस अखबार की एवरेज इश्यू रीडरशिप 16872000 पर पहुंच गई है। पिछले दो सर्वे (IRSs of 2017 और 2019) के दौरान अखबार की रीडरशिप लगातार 6.8 करोड़ और सात करोड़ रही है।

राठौड़ का कहना है, ‘दैनिक जागरण अपने सात सरकारों के साथ काफी बेहतर कंटेंट पाठकों को उपलब्ध कराता है। इसमें स्वास्थ्य से जुडे कॉलम के अलावा युवाओं पर केंद्रित सप्लीमेंट भी शामिल हैं, जिसमें रोजगार के अवसरों के बारे में भी बताया जाता है, इसके अलावा महिला पाठकों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भी कंटेंट उपलब्ध कराया जाता है।’ विशेषज्ञों का कहना है कि अखबार की इतनी ज्यादा पाठक संख्या के कारण ही एडवर्टाइजर्स के लिए इसे नजरअंदाज करना काफी मुश्किल होता है। इसके अलावा कई अन्य कारक भी इसके पक्ष में काम करते हैं।

‘पीएचडी मुंबई’ (PHD Mumbai) के वाइस प्रेजिडेंट दिनेश व्यास के अनुसार, ‘दैनिक जागरण की रीडरशिप में लगातार वृद्धि इस तथ्य को दर्शती है कि लोकल कंटेंट ही किंग है, खासकर हिंदी भाषी मार्केट में। 11 राज्यों में 37 एडिशंस इसकी टोटल रीडरशिप में योगदान दे रहे हैं। इसके अलावा यह उचित मूल्य पर उलब्ध है, जिसका लाभ भी पाठकों को मिल रहा है। दैनिक जागरण डिस्ट्रीब्यूटर्स के द्वारा अपने ग्राहकों के आवास या कार्यालयों से पुराने अखबारों को रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करने के लिए इकट्ठा करने का काम भी करता है, जिसमें मासिक सब्सक्रिप्शन पर छूट मिलती है।’

व्यास का कहना है, ‘यह अखबार कई सालों से चल रहा है और पाठकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए यह सप्लीमेंट्स दे रहा है। पुरुष हो अथवा महिला, यह परिवार के सभी सदस्यों के लिए उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहतर कंटेंट उपलब्ध करा रहा है।’ विज्ञापन के मुद्दे पर व्यास ने कहा कि अखबार स्थानीय विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करता है, जिसमें छोटे एंटरप्रिन्योर्स से लेकर स्थानीय दुकानदार शामिल है, जो स्थानीय सप्लीमेंट्स में अपना विज्ञापन प्रकाशित करवाना चाहते हैं। इसके अलावा हिंदी भाषी मार्केट में इसकी ज्यादा रीडरशिप को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर के एडवर्टाइजर्स भी अपने विज्ञापन देते हैं।

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अखबारों की डोर-टू-डोर डिलीवरी के मामले में सरकार जल्द ले सकती है ये फैसला

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि अखबारों को घर-घर पहुंचाने पर रोक लगाने का फैसला कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लिया गया था।

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
Newspapers

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बुधवार को कहा कि मुंबई में अखबारों की घर-घर जाकर (डोर टू डोर) डिलीवरी पर लगाए गए प्रतिबंध को जल्द ही हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि घर-घर अखबार पहुंचाने पर लगी रोक अस्थायी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में मौजूदा स्थिति का आकलन कर जल्द फैसला लिया जाएगा।

अखबार वितरकों के साथ विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई बैठक के बाद उद्धव ठाकरे ने कहा कि अखबारों को घर-घर पहुंचाने पर रोक लगाने का फैसला कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लिया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य में कई उद्योग, व्यवसाय, दुकानें और अन्य चीजें शुरू की गई हैं। अखबार हमारी दैनिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के चौथे चरण में रेड जोन तथा कोविड-19 कंटेनमेंट जोन पर ध्यान केंद्रित है। ठाकरे ने कहा कि महामारी को देखते हुए अखबार वितरण पर रोक है, लेकिन जल्द ही समाधान निकाला जाएगा।

बैठक में अखबार वितरकों का कहना था कि आवासीय सोसायटियां अखबारों के घर पर वितरण की इजाजत नहीं दे रही हैं और सामाजिक दूरी का पालन करते हुए दुकानों पर अखबारों की बिक्री की जा रही है। इस पर ठाकरे ने कहा कि कोरोना स्वास्थ्य के लिए आपातकाल है। इसलिए अखबारों के वितरण पर प्रतिबंध लगाया है, फिर भी इसका जल्द से जल्द मार्ग निकाला जाएगा।

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समाचार पत्रों के प्रतिनिधिमंडल ने CM से की मुलाकात, रखी ये मांग

अंग्रेजी और तमिल के पांच प्रमुख पब्लिशर्स ने सोमवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई के पलानीस्वामी से कैंप ऑफिस में मुलाकात की।

Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
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अंग्रेजी और तमिल के पांच प्रमुख पब्लिशर्स ने सोमवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई के पलानीस्वामी से कैंप ऑफिस में मुलाकात की। अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि इस दौरान सभी पब्लिशर्स ने सीएम की पार्टी एआईडीएमके के सांसदों से आग्रह किया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से न्यूजपेपर इंडस्ट्री को राहत पहुंचाने के लिए उनकी मांगों का समर्थन करें। दरअसल, COVID-19 महामारी के कारण न्यूजपेपर इंडस्ट्री को काफी नुकसान पहुंचा है।

बता दें कि पब्लिशर्स की ओर से, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने पीएम से अखबारी कागज (न्यूज प्रिंट) पर सीमा शुल्क हटाने, बकाया विज्ञापन बिलों का तुरंत निपटान करने और विज्ञापन दरों में 100% की वृद्धि करने का आग्रह किया है। 

‘द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप’ के डायरेक्टर एन. राम, ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप’ चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज कुमार सोंथालिया, ‘दिनमलार- कोयम्बटूर’ के पब्लिशर्स एल. आदिमूलम,  ‘डेली थांथी’ के डायरेक्टर एस. बालासुब्रमण्यम आदित्यन और ‘काल पब्लिकेशंस’ (दिनाकरन) के मैनेजिंग डायरेक्टर  आर.एम.आर. रमेश ने सीएम को एक मांग पत्र सौंपा। 

इस दौरान, समाचार पत्र के प्रतिनिधि मंडल ने कहा कि न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने ऐड रेवन्यू न होने की वजह से पिछले दो महीनों के दौरान लगभग 5,000 करोड़ का नुकसान उठाया है। उस इंडस्ट्री का, जो सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी के दरमियान आम जनता तक सही खबरें पहुंचा रहा है, उसका  कोविड-19 के प्रसार की वजह से दुनियाभर में भारी नुकसान हो रहा है।

समाचार पत्र के प्रतिनिधित्व मंडल ने चिंता जताते हुए कहा कि भविष्य में न्यूजपेपर इंडस्ट्री के लिए इसे संचालन जारी रख पाना एक बड़ी चुनौती होगी। 

सोशल मीडिया के युग में, जहां गलत सूचनाओं का तेजी से प्रसार हो रहा है, वहां समाचार पत्रों ने विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों की सेवा की है। उन्होंने कहा कि अदालतों में केवल समाचार पत्रों की ही रिपोर्ट्स को सबूत के तौर पर लिया जा सकता है।

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अब मुफ्त में पढ़ने को नहीं मिलेगा टाइम्स ऑफ इंडिया का e-paper, चुकानी होगी यह कीमत

शुक्रवार से यह नई व्यवस्था लागू की गई है और कुछ ही घंटों में सैकड़ों लोगों ने इस सर्विस के लिए साइनअप (signing up) भी कर लिया

Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
TOI

अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ (The Times of India) से एक बड़ी खबर है। खबर ये है कि अब इस अखबार का ई-पेपर पढ़ने के लिए पाठकों को इसे सबस्क्राइब करना होगा, जिसके लिए शुल्क भी चुकाना होगा। यानी बिना सबस्क्राइब किए आप इसे नहीं पढ़ सकेंगे। 15 मई से यह नई व्यवस्था लागू की गई है और कुछ ही घंटों में सैकड़ों लोगों ने इस सर्विस के लिए साइनअप (signing up) भी कर लिया।   

न्यूज रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अखबार का ई-पेपर अभी तक देश में पाठकों के लिए मुफ्त में उपलब्ध था, जिसके लिए अब हर महीने 199 रुपए (जीएसटी अलग से) चुकाने होंगे। इसके साथ ही ‘टाइम्स प्राइम’, जिसमें एक्सक्लूसिव स्टोरी होती हैं, वह भी सबस्क्राइबर्स के लिए उपलब्ध होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ का ई-पेपर तीन डॉलर प्रतिमाह अथवा 30 डॉलर सालाना के शुल्क पर सबस्क्राइब किया जा सकता है। बता दें कि हाल ही में इंडियन रीडरशिप सर्वे की चौथी तिमाही (IRS Q4 2019) के आंकड़ों के अनुसार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की कुल रीडरशिप 1.73 करोड़ है।

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न्यूजपेपर इंडस्ट्री की चुनौतियों पर HT Media की चेयरपर्सन शोभना भरतिया ने कही ये बात

कोरोनावायरस (कोविड-19) दुनियाभर में तमाम लोगों को अपनी चपेट में ले चुका है। कोरोनावायरस (कोविड-19) का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया हुआ है।

Last Modified:
Friday, 15 May, 2020
Shobhana Bhartia

कोरोनावायरस (कोविड-19) दुनियाभर में तमाम लोगों को अपनी चपेट में ले चुका है। कोरोनावायरस (कोविड-19) का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन किया हुआ है। इस लॉकडाउन को तकरीबन दो महीने होने जा रहे हैं। देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से तमाम उद्योग धंधे बंद पड़े हुए हैं। मीडिया इंडस्ट्री भी इससे काफी प्रभावित हो रही है। हालांकि इस दौरान न्यूज कंटेंट की खपत (consumption) में काफी इजाफा देखने को मिला है, लेकिन अखबारों के रेवेन्यू में नाटकीय रूप से गिरावट आई है।

कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से कई स्थानों खासकर दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख मार्केट्स में सर्कुलेशन बाधित हो गया है और विज्ञापन लगभग गायब हो गए हैं। हालांकि, स्थिति को सामान्य करने के लिए कुछ कदम उठाए भी गए हैं, लेकिन न्यूज पेपर बिजनेस को वापस ट्रैक पर आने में कुछ समय लगेगा।

वरिष्ठ पत्रकार और सीएनबीसी-टीवी18 (CNBC-TV18) की एंकर अनुराधा सेनगुप्ता ने ‘THE MEDIA DIALOGUES-VISION 2020’ के तहत ‘एचटी मीडिया’ (HT Media) की चेयरपर्सन और एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतिया से अखबार के बिजनेस पर कोविड-19 के प्रभाव और इस अखबारी बिजनेस के भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की।

 इस बातचीत के दौरान शोभना भरतिया का कहना था कि इस दौरान कंटेंट का इस्तेमाल (Consumption) काफी बढ़ा है, लेकिन अखबारों के रेवेन्यू का मुख्य आधार विज्ञापन काफी कम हो गया है। इस दौरान अखबार तमाम चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस दौरान शोभना भरतिया का कहना था कि भारत में अखबार पूरी तरह से एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू पर निर्भर रहते हैं।

कार्यक्रम का पूरा विडियो आप यहां देख सकते हैं।

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सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व समझाने के लिए अखबार ने प्रकाशित किया ये अनूठा विज्ञापन

एक अखबार ने सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को समझाने के लिए एक अलग तरह का विज्ञापन प्रकाशित किया है

Last Modified:
Thursday, 14 May, 2020
newspaper

दुनियाभर में कोरोना वायरस महामारी का कहर जारी है। इस वायरस के कारण लाखों लोगों की जान जा चुकी है। वायरस के फैलने से रोकने के लिए जहां एक ओर लॉकडाउन लागू किया गया है, वहीं सोशल डिस्टेंसिंग का भी कड़ाई से पालन करवाया जा रहा है। वहीं इस बीच, यूरोपीय देश फिनलैंड के एक अखबार ने सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को समझाने के लिए एक अलग तरह का विज्ञापन प्रकाशित किया है, जिसे सही ढंग से तभी पढ़ा जा सकता है जब इसे पढ़ने वाला इससे कम से कम 6 फीट की दूरी पर हो।

बता दें कि फिनलैंड (Finland) के अखबार ‘हेलसिंगिन सनोमैट’ (Helsingin Sanomat) ने एक अनोखा विज्ञापन प्रकाशित किया है, जिसे करीब से पढ़ना असंभव है। यानी इस विज्ञापन को प्रकाशित करने में अखबार प्रशासन ने ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया कि कोई भी इस पास से इसे नहीं पढ़ सकता है। हालांकि इसे 6 फीट की दूरी से ही पढ़ा जा सकता है, जिससे इसके शब्द स्पष्ट दिखाई देते हैं।

डिजिटल विज्ञापन एजेंसी 'द स्टेबल' के अनुसार फिनलैंड के अखबार ने पूरे पन्‍ने पर सोशल डिस्‍टेंसिंग के महत्‍व को समझाने के मकसद से इसे प्रकाशित किया है, जिसमें लोगों को एक-दूसरे से दूर रहने के लिए कहा गया है और बताया गया है कि एक-दूसरे से दूर रहने से ही सभी सुरक्षित रहेंगे।

वहीं, अमेरिकी कंपनी नेमन लैब ने भी अखबार की इस अनोखी पहल पर ट्वीट किया कि एक फिनलैंड के अखबार ने एक ऐसा प्रिंट ऐड प्रकाशित किया, जिसे केवल 6 फीट की दूरी से ही पढ़ जा सकता है।

इस पर अखबार के मैनेजमेंट टीम ने कहा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सोशल डिस्‍टेंसिंग का पालन करने की बात लगातार कह रहे हैं, जिसका पाललन फिनलैंड के अधिकांश लोग कर भी रहे हैं, लेकिन अब भी कई लोग ऐसे हैं, जो इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। लिहाजा ऐसे लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए ही यह अनोखी पहल की गई है। फिलहाल अखबार के इस अनोखे तरीके को काफी सराहा जा रहा है। 

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हिन्दुस्तान से केके उपाध्याय का इस्तीफा, अब इनके हाथों में होगी बिहार की कमान

हिंदी अखबार ‘हिन्दुस्तान’ (Hindustan) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर ये है कि बिहार के स्टेट हेड केके उपाध्याय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

Last Modified:
Tuesday, 12 May, 2020
Hindustan

हिंदी अखबार ‘हिन्दुस्तान’ (Hindustan) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर ये है कि बिहार के स्टेट हेड केके उपाध्याय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। फिलहाल वे नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं। रेजिडेंट एडिटर के पद पर कार्यरत विनोद बंधु को अब यह जिम्मेदारी दी गई है। प्रिंट लाइन में भी स्थानीय संपादक के रूप में विनोद बंधु का नाम जा रहा है।

समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में केके उपाध्याय ने बताया कि उन्होंने पारिवारिक कारणों से अपना इस्तीफा दिया है। हालांकि, उन्होंने अपने अगले कदम के बारे में फिलहाल खुलासा नहीं किया है।

बता दें कि बिहार से पहले केके उपाध्याय हिन्दुस्तान, उत्तर प्रदेश के हेड थे। करीब एक साल पहले उनका तबादला यहां किया गया था। वे पटना से अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

वहीं, विनोद बंधु की बात करें तो उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने का करीब 35 साल का अनुभव है। मूलरूप से बिहार में मधुबनी के रहने वाले विनोद बंधु की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुई है। उन्होंने एक स्थानीय अखबार से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। यहां करीब एक साल तक काम करने के बाद उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ जॉइन कर लिया। इसके बाद तमाम जगह अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद उन्होंने वर्ष 2010 में हिन्दुस्तान अखबार का दामन थामा था।

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IRS: प्रिंट मीडिया के लिए वाकई राहत देने वाले हैं इस तरह के आंकड़े

कुछ रीजनल अखबारों की कुल रीडरशिप व कुछ की एवरेज इश्यू रीडरशिप बढ़ी है तो कई अखबारों ने इन दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की है।

Last Modified:
Tuesday, 12 May, 2020
Newspaper

प्रिंट मीडिया के लिए यह समय काफी मुश्किलों भरा चल रहा है। इन सबके बीच इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) के आंकड़े नॉन मेट्रो सिटीज से इंडस्ट्री के लिए थोड़ी राहत भरी खबर जरूर लाए हैं। वैसे तो अंत में आशा की किरण रीजनल एरिया से ही सामने आती दिखाई दे रही है, क्योंकि वे ही पब्लिशर्स की ग्रोथ लगातार जारी रखे हुए हैं।

बता दें कि पिछले दिनों 'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की चौथी तिमाही (IRS 2019 Q4) के डाटा जारी किए गए हैं। यह रिपोर्ट इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पिछली तिमाही यानी पहली (Q1), दूसरी (Q2) और तीसरी तिमाही (Q3) के जारी किए गए डेटा पर आधारित है, जिसकी औसतन रिपोर्ट के बाद चौथी तिमाही के नतीजे तैयार किए गए हैं। इन आकड़ों को देखने से पता चलता है कि विभिन्न केंद्रों पर प्रिंट मीडिया की रीडरशिप में कमी आई है, लेकिन मेट्रो शहरों से बाहर जरूर इसमें ग्रोथ दिखाई दे रही है।

एक तरफ कुछ रीजनल अखबारों की ‘कुल रीडरशिप’ (total readership) में बढ़ोतरी देखने को मिली है, जबकि कुछ रीजनल अखबारों की ‘एवरेज इश्यू रीडरशिप’ (average issue readership) बढ़ी है। संयोग से, देश के कुछ लोकप्रिय ब्रैंड्स जैसे- ‘अमर उजाला’ (Amar Ujala), ‘लोकमत’ (Lokmat),  ‘डेली थांथी’ (Daily Thanthi) और ‘बर्तमान’ (Bartaman) की टोटल रीडरशिप और एवरेज इश्यू रीडरशिप दोनों में इजाफा देखने को मिला है।

उत्तर प्रदेश में हिंदी अखबारों से शुरुआत करें तो ‘आज’ (Aj) अखबार की कुल रीडरशिप चौथी तिमाही (Q4) में 4095 हो गई है, जबकि तीसरी तिमाही (Q3) में यह 4053 थी। ‘नवभारत टाइम्स’ (Navbharat Times) की एवरेज इश्यू रीडरशिप का पिछली चार तिमाहियों का आंकड़ा देखें तो यह 488 से 521 और फिर 490 होकर 550 के आंकड़े पर पहुंच गई है।

बिहार में, ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar)  ने भी पिछली चार तिमाहियों में लगातार कुल रीडरशिप में बढ़ोतरी दर्ज की है और यह क्रमश: 4970, 5877 और 6263 से बढ़कर चौथी तिमाही में 6706 तक पहुंच गई है। दैनिक भास्कर को हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में इसी तरह का ट्रेंड देखने को मिला है। वहीं, पंजाब में ‘दैनिक सवेरा’ और ‘अमर उजाला’ की भी कुल रीडरशिप लगातार बढ़ी है।

हरियाणा में वर्ष 2019 की चारों तिमाहियों में दो अखबारों की कुल रीडरशिप और एवरेज इश्यू रीडरशिप दोनों में ग्रोथ देखने को मिली है। इनमें ‘अमर उजाला’ भी शामिल है। पहली तिमाही में अखबार की कुल रीडरशिप 1925 थी जो दूसरी तिमाही में बढ़कर 1952 हो गई थी, लेकिन तीसरी तिमाही में इसमें गिरावट दर्ज की गई थी और यह 1872 रह गई थी, लेकिन चौथी तिमाही में तेजी से आगे बढ़ते हुए यह 2027 हो गई है। चारों तिमाहियों में अखबार की एवरेज रीडरशिप इश्यू में लगातार इजाफा हुआ है और यह 391 से 401 और फिर 411 होकर चौथी तिमाही में 474 हो गई है।    

माना जा रहा है कि ब्रैंड द्वारा स्ट्रैटेजी में किया गया बदलाव ही इस ग्रोथ का राज है। इस बारे में ‘अमर उजाला लिमिटेड’ के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल का कहना है, ‘हरियाणा में, शुरू में रोहतक से सिर्फ एक संस्करण छपता था। हालांकि, हमने हाल ही में दो और संस्करण एक करनाल और दूसरा हिसार शुरू किया, इन दोनों केंद्रों में प्रिंट की सुविधा है। चूंकि सेंटर पर ही अखबार छपता है, ऐसे में यह सुबह बिना किसी परेशानी के पाठकों तक जल्दी पहुंच जाता है। इन दो एडिशन के और शामिल हो जाने से हम ज्यादा से ज्यादा लोकल खबरें और देर रात तक की खबरें भी शामिल करने लगे हैं। ज्यादा से ज्यादा स्थानीय खबरें शामिल करने से स्थानीय लोगों से जुड़ने में मदद मिल रही है।’

हरियाणा की तरह, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में भी दैनिक भास्कर और अमर उजाला जैसे लोकप्रिय अखबारों की रीडरशिप में वृद्धि देखी गई है। हालांकि, इंडस्ट्री के लिए पिछला समय ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। न्यूज प्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी और विज्ञापन की कमी के कारण इंडस्ट्री के सामने तमाम आर्थिक कठिनाई आई। न्यूजप्रिंट की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के कारण वर्ष 2017 से 2019 के आखिर तक अखबारों की प्रॉडक्शन कॉस्ट काफी बढ़ गई। न्यूजप्रिंट की कीमतें 60 प्रतिशत तक बढ़ गईं। कई अखबारों ने अपने एडिशन कम कर दिए। हालांकि कुछ अखबारों ने हार नहीं मानी और बहादुरी के साथ डटे रहे। कुछ ने अपने कंटेंट की मजबूती पर काम किया तो कुछ ने सोशल मीडिया के जरिये पाठकों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया। इन्हीं अखबारों की रीडरशिप में यह बढ़ोतरी देखने को मिली।

इस बारे में ‘एबीपी प्राइवेट लिमिटेड’ (ABP PVT LTD) के एमडी और सीईओ डीडी पुरकायस्थ का कहना है, ‘पिछले साल लगभग प्रत्येक ब्रैंड को तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, हमने हमेशा अपने पाठकों को क्वालिटी कंटेंट और क्रेडिबल न्यूज के द्वारा अपने साथ जोड़े रखने का भरसक प्रयास किया। सोशल मार्केटिंग पर भी हमने काफी जोर दिया और तमाम कैंपेन व पहल शुरू कीं। इसके पीछे हमारी सोच हमेशा लोगों को ज्यादा सशक्त और जागरूक बनाने की है।’

वास्तव में कुछ राज्यों में रीजनल अखबारों की ग्रोथ काफी बेहतर रही है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में सभी प्रमुख रीजनल अखबारों की ग्रोथ देखने को मिली है। यहां ‘लोकमत’ की कुल रीडरशिप पहली से चौथी तिमाही तक क्रमश: 19469, 20169, 21457 और 22012 हो गई है। वहीं ‘डेली सकाल’ (Daily Sakal) की कुल रीडरशिप एक से चौथी तिमाही तक क्रमश: 11668, 12771, 13960 और 14661 रही है। ‘पुधारी’ (Pudhari) और ‘पुण्य नगरी’ (Punya Nagari) की कुल रीडरशिप में भी वर्ष 2019 की चारों तिमाहियों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

केरल की बात करें तो ‘देशाभिमानी’ (Deshabhimani) और ‘केरल कौमुदी’ (Kerala Kaumudi), कर्नाटक में ‘विजय कर्नाटक’ (Vijay Karnataka), ‘विजयवाणी’ (Vijayavani), ‘प्रजावाणी’ (Prajavani) और  ‘उदयवाणी’ (Udayavani), तमिलनाडु में ‘डेली थांथी’ (Daily Thanthi), ‘दिनामलार’ (Dinamalar) और गुजरात में ‘दिव्य भास्कर’ (Divya Bhaskar) की कुल रीडरशिप में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

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अखबारों की प्रिटिंग-डिस्ट्रीब्यूशन का काम यहां फिर हुआ शुरू

पुणे समाचार पत्र विक्रेता संघ ने कहा कि वैज्ञानिक रिसर्च से ये साबित हुआ है कि वायरस छिद्रयुक्त सतहों पर कोरोनावायरस बहुत लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकता है।

Last Modified:
Tuesday, 12 May, 2020
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पुणे में दो सप्ताह बाद, सोमवार को अखबारों की प्रिटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का काम एक बार फिर शुरू हो गया है। दरअसल, इन अफवाहों के बाद यहां अखबार की प्रिटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का काम रोक दिया गया था कि अखबारों को छूने से कोरोना वायरस फैलता है।

अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू’ की एक खबर के मुताबिक, पुणे समाचार पत्र विक्रेता संघ ने कहा कि वैज्ञानिक रिसर्च से ये साबित हुआ है कि वायरस छिद्रयुक्त (porous) सतहों पर कोरोनावायरस बहुत लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकता है। लिहाजा संघ ने सभी हाउसिंग सोसायटीज से अपील की है कि वे न्यूजपेप के डिलिवरी एग्जिक्यूटिव्स और वेंडर्स को अपने यहां आने की परमिशन दें।  

पुणे समाचार पत्र विक्रेता संघ के अध्यक्ष विजय परगे ने कहा कि डिस्ट्रीब्यूशन अब तब तक जारी रहेगा, जब तक कि राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं कर दिया जाता है। अप्रैल और मई में कम से कम चार सप्ताह तक अखबारों का डिस्ट्रीब्यूशन बाधित रहा है। परगे ने कहा, ‘सोमवार को सर्कुलेशन में 12,500 डिलीवरी पर्सन और 2,500 वेंडर्स शामिल थे। हमें पता नहीं है कि लॉकडाउन कब तक जारी रहेगा, इसलिए हमने डिस्ट्रीब्यूशन को फिर से शुरू किया। हमें कुछ मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली है, क्योंकि कुछ हाउसिंग सोसायटीज ने विक्रेताओं को प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी है।

परगे के अनुसार, संघ पूरे शहर में 70 अलग-अलग प्रकाशनों से संबंधित कम से कम 15 लाख अखबारों की प्रतियां डिस्ट्रीब्यूट करता है।

गौरतलब है कि कोविड-19 के प्रसार के डर से मार्च के अंतिम सप्ताह में वेंडर्स ने डिस्ट्रीब्यूशन बंद कर दिया गया था। कई हाउसिंग सोसायटीज ने भी अपने परिसर में वेंडर्स को आने की अनुमति नहीं दी थी। डिस्ट्रीब्यूशन न हो पाने के चलते अखबार मालिकों ने भी प्रकाशन बंद कर दिया था। मालिकों और डिस्ट्रीब्यूटर्स के बीच एक समन्वय बैठक के बाद, अखबार डिस्ट्रीब्यूशन के लिए सुरक्षा उपायों का फैसला किया गया था और डिस्ट्रीब्यूशन 1 अप्रैल से फिर से शुरू हो गया था। हालांकि, इसे फिर से रोक दिया गया था, जिसे एक बार फिर चालू किया गया है।

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