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अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी
इस कविता के माध्यम से लेखिका ने शिकायत व मनुहार भरे लहजे में मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास किया है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
डॉ. कामिनी कामायनी।।
इस मसर्रत का सबब नजरे इनायत आपकी,
कितने मुद्दत से मिले, खातिर करूं क्या आपकी।
क्या मुनासिब ये नहीं कि पहलूनशीं हम भी बनें,
इंतहा अब और न लें, तो करम है आपकी।
आपका कुर्ब रश्क खुद बन गया मेरे लिए,
आपने हमको तलब की, मेहरबानी आपकी।
बदगुमां हमसे हुआ, तकरार तल्खी से भरा,
जज्ब करना था खलिश को, दरियादिली भी आपकी।
दोस्त! तुझसे गुफ्तगू करने का अब मकसद ही क्या,
सब हुकुम सिर आंखों पर अब, हुक्मरां भी आपकी।
अर्ज हमने ही किया था, दानिशों के सामने,
अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी।
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