वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने लिखी कविता, टीवी गोबर का पहाड़ है...

एनडीटीवी के जाने-माने सीनियर न्यूज एंकर रवीश कुमार ने हाल ही में अपने फेसबुक वॉल पर...

Last Modified:
Friday, 09 March, 2018
Samachar4media

एनडीटीवी के जाने-माने सीनियर न्यूज एंकर रवीश कुमार ने हाल ही में अपने फेसबुक वॉल पर साल 2009 की अपनी एक कविता साझा की है, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं-

जब भी कोई अच्छा गाना सुनता हूं या अच्छी कविता पढ़ लेता हूं तो एक बार हूक उठती है कि अरे यार यही वाली मैंने लिखी होती। मगर दोनों में फेल। आज आप लोग टीवी को लेकर नकली रोना रो रहे हैं। 2009 के साल में भी रो रहे थे। तब मैं भी रोता था अब नहीं रोता क्योंकि टीवी नहीं देखता। न्यूज़ चैनल महीने में आधा घंटा देख लेता हूं। बाकी सोशल मीडिया से पता चल जाता है कि टीवी में क्या चल रहा है। ख़ैर मई 2009 की लिखी मेरी तुकबंदी रहित कविता पढ़ सकते हैं। उन्वान है-

टीवी गोबर का पहाड़ है

आठ विचारक और एक एंकर 
भन्न भन्न भन्नाते हैं 
कौन बनेगा पीएम अबकी 
बक बक बक जाते हैं 
ज़रा ज़रा करते करते 
जब सारे थक जाते हैं 
वक्त ब्रेक का आ जाता है 
साबुन तेल बिक जाते हैं 
घंटा खाक नहीं मालूम इनको 
बीच बीच में चिल्लाते हैं 
हर चुनाव में वही चर्चा 
चर्चा के पीछे लाखों खर्चा 
कौन बनेगा प्रधानमंत्री सनम 
क्या कर लोगों जान कर 
कहते हैं सब बिन मुद्दे की मारामारी 
इस चुनाव में पीएम की तैयारी 
भन्न भन्न भन्नाते हैं 
माइक लिए तनिक सनम जी 
गांव गांव घूम आते हैं 
पूछ पूछ कर सब सवाल 
दे दे कर सब निहाल 
अपने जवाबों पर इतराते हैं
फटीचर फटीचर फटीचर है 
टीवी साला फटीचर है 
अंग्रेजी हो या हिंदी हो या फिर गुजराती 
घंटा खाक नहीं मालूम 
झाड़े चले जाते हैं बोकराती 
बंद करो अब टीवी को 
टीवी साला खटाल है 
दूध जितना का न बिकता 
उससे बेसी गोबर का पहाड़ है
(
कृपया मुझसे न कहें कि मैं क्या कर रहा हूं। मैं गोबर पाथूं या गोइठा ठोकूं, आप बस कविता पढ़िये)

(फेसबुक वॉल और कस्बा ब्लॉग से साभार)


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‘इतनी तेज चलेगी आंधी, हमको ये मालूम न था’

इस गजल के द्वारा कवयित्री ने यह बताने की कोशिश की है कि दुनिया व जिंदगी में काफी कुछ घटित होने के बावजूद किस तरह इनसे अनभिज्ञता बनी रहती है

Last Modified:
Saturday, 12 October, 2019
Dr Kamini

डॉ. कामिनी कामायनी।।

बरकरार थी दिल की तमन्ना, हमको ये मालूम न था
खुद से ही कोई बात कही क्या? हमको ये मालूम न था।

बरस पड़ी थी गरज गरज कर, मौसम देख बहारों का
इतनी तेज चलेगी आंधी, हमको ये मालूम न था।

तोड़ दिया था दरो दीवारें, हसरत के इमारत की
फिर से ये अंगड़ाई लेगी, हमको ये मालूम न था।

मस्त कलंदर समझ के खुद को, दुनिया में खुश रहते थे
दिल के भी कई दरवाजे थे, हमको ये मालूम न था।

बंद पड़े जो मृदंग तबले, उछल उछल सब गाने लगे
सरगम ने क्या शोर मचाया, हमको ये मालूम न था।

हम तो खड़े खड़े उलझे थे, रहबर के मयखाने में
महफिल ने क्यों हमें पुकारा, हमको ये मालूम न था।

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‘और बर्फ में उग रही तनी हुई मुट्ठियां’

अपनी कविता के माध्यम से कवि ने वर्तमान दौर में कश्मीर के हालात को बयां करने का प्रयास किया है

Last Modified:
Saturday, 05 October, 2019
Gunanand Jakhmola

गुणानंद जखमोला, वरिष्ठ पत्रकार।।

बधाई हो मोदी जी, ऐसे लोकतंत्र के लिए जहां
80 लाख लोग 60 दिन से खुली जेल में बंद हैं।
हम खुश हैं कि हमने कश्मीर को जीत लिया।
हम खुश हैं कि वो जो देशद्रोही थे, अब बंद हैं।
और वो भी जो कश्मीर में हमारे साथ खड़े थे।

वो छोटे-छोटे बच्चे जो स्कूल जाते थे कभी
गर्मियों की छुट्टियों का सा आनंद ले रहे सभी।
मां डरी हुई कि बच्चे गली में खेल रहे हैं
पता नहीं कहां से सनसनी हुई मौत आ जाएं।
वो नहीं जाने देती बच्चों को खेलने बाहर
क्योंकि जिंदगी संगीनों के साये में गुजर रही है।

वो गुलमर्ग की खुली वादियां जो बुलाती थीं प्रेमियों को कभी
अब सहमी सी हैं, क्योंकि स्वर्ग अब जमीं पर उतर आया है।
हां, डर के साये में कट रही है जिंदगी
और बर्फ में उग रही तनी हुई मुट्ठियां।

एक बाबा खटखटता है डरे हुए लोगों का द्वार।
हौले से एक सुंदर गोरा मुखड़ा झांकता है अधखुले दरवाजे से
बाबा पूछता है बिटिया, कहां मिलेगी जन्नत।
वह हौले से डरी आवाज में कहती है
गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त
हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त।।

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‘नौ दिन के उपासन में रमजान की खुशबू हो’

इस कविता में कवि एक ऐसे दौर की बात कर रहा, जिसमें शांति व सद्भाव का माहौल हो

Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Aalok Shrivastav

आलोक श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार व कवि।।

वो दौर दिखा जिसमें इन्सान की खुशबू हो
इन्सान की आखों में ईमान की खुशबू हो

पाकीजा अजाओं में मीरा के भजन गूंजें
नौ दिन के उपासन में रमजान की खुशबू हो

मैं उसमें नजर आऊं वो मुझमें नजर आये
इस जान की खुशबू में उस जान की खुशबू हो

मस्जिद की फिजाओं में महकार हो चन्दन की
मंदिर की फिजाओं में लोबान की खुशबू हो

हम लोग भी फिर ऐसे बेनाम कहां होंगे
हममें भी अगर तेरी पहचान की खुशबू हो

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‘मैं फिर इंसान होना चाहता हूं’

इस कविता के माध्यम से कवि ने अपनी इच्छाओं के बारे में बताया है कि आखिर वे जिंदगी से क्या चाहते हैं

Last Modified:
Monday, 30 September, 2019
Dr Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

ये बंदिशें, ये वर्जनाएं और बड़प्पन बेपनाह।
बहुत हुआ अब खत्म कर देना चाहता हूं।
वो बेपरवाह वक्त, बेहिसाब भूख मुझे वापस दे दो,
उड़ने की वो ख्वाहिशें, तूफान सा जज्बा और सच्ची चाहतें,
हर शै को जान लेने की तड़फ
वो उन्मुक्त आसमान और अनथक पंख
सब वापस चाहता हूं....
मैं फिर बच्चा होना चाहता हूं।

ये घड़ी में कैद जिंदगी, जज्बातों के जंजाल में जकड़ी जिंदगी
रवायतों की भारी और बोझिल होती जंजीरें
उतार फेंकना चाहता हूं।
नकल के इस दौर में,
रंग बदलने की इस दौड़ में,
मतलबपरस्ती की बेतहाशा भीड़ में,
भेड़ियों की खाल के इस निर्मम बाजार में
बहुत हुआ, अब मुक्त होना चाहता हूं...
मैं फिर इंसान होना चाहता हूं।

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अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी

इस कविता के माध्यम से लेखिका ने शिकायत व मनुहार भरे लहजे में मन के भावों को व्यक्त करने का प्रयास किया है

Last Modified:
Tuesday, 01 October, 2019
Kamini Kamayani

डॉ. कामिनी कामायनी।।

इस मसर्रत का सबब नजरे इनायत आपकी,
कितने मुद्दत से मिले, खातिर करूं क्या आपकी।

क्या मुनासिब ये नहीं कि पहलूनशीं हम भी बनें,
इंतहा अब और न लें, तो करम है आपकी।

आपका कुर्ब रश्क खुद बन गया मेरे लिए,
आपने हमको तलब की, मेहरबानी आपकी।

बदगुमां हमसे हुआ, तकरार तल्खी से भरा,
जज्ब करना था खलिश को, दरियादिली भी आपकी।

दोस्त! तुझसे गुफ्तगू करने का अब मकसद ही क्या,
सब हुकुम सिर आंखों पर अब, हुक्मरां भी आपकी।

अर्ज हमने ही किया था, दानिशों के सामने,
अब कतारों में खड़े हैं, लेने झलक बस आपकी।

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उस चौखट को जा खूब सजातीं, जिस घर से होती अनजान हैं ये

लेखक ने इस कविता में बताया है कि बेटियां किस तरह पूरे घर की आन-बान-शान होती हैं और घर में किस तरह रौनक बिखेरती रहती हैं

Last Modified:
Monday, 23 September, 2019
Vikas Gaur

विकास गौड़

खिलती कलियों का क्या कहना!
मिश्री डलियों का क्या कहना!!
पल भर में मूड बदल जाये!
मीठे नखरों का क्या कहना!!

माना घर की मेहमान हैं ये!
पर घर की होती जान हैं ये!!
उस चौखट को जा खूब सजातीं!
जिस घर से होती अनजान हैं ये!!

रिश्ते-नातों का मोल सिखातीं!
घर भर में फिरती इठलाती!!
जिस देहरी पर ये दीप जलायें!
उस घर की रौनक का क्या कहना!!

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दो हजार की चपत, खा गई थोड़ी गलती

इस कविता के माध्यम से कवि ने बताया है कि कार में सीट बेल्ट न लगाने का किस तरह खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

Last Modified:
Saturday, 21 September, 2019
Rajendra Milan

डॉ. राजेन्द्र मिलन, वरिष्ठ साहित्यकार और कवि।।

गलती पर गलती हुई, कल परसों की बात।
भरतदीप के साथ हम, होन लगी बरसात।

होन लगी बरसात, समय पर हमें पहुंचना।
बैठ चला दी कार, बेल्ट का भूले कसने।

चार कदम न चले, रोक ली गाड़ी चलती।
दो हजार की चपत, खा गई थोड़ी गलती।  

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फिर मैं गंगा जल क्यों रखूं मां?

इस कविता के माध्यम से कवि ने मां के महत्व का वर्णन किया है

Last Modified:
Tuesday, 17 September, 2019
Arjun Nirala

अर्जुन निराला, पत्रकार और कवि।।

वो जो तुम
लेकर आई
थीं ना
गंगा जल

मैंने उसे
आज
बहा दिया
नाले में...

जब मेरे
घर में
रहती है...
गंगा, यमुना
कावेरी सी जीवनदायिनी

फिर मैं
गंगा जल
क्यों रखूं
मां।।

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‘अक्सर मैं, कांच की तरह टूटकर बिखर जाता हूं’

कविता के माध्यम से वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कांच के टूटने का उदाहरण देते हुए उसके टुकड़ों में दिखते जिंदगी के हर अक्स के बारे में बताया है

Last Modified:
Tuesday, 17 September, 2019
Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

अक्सर मैं, कांच की तरह टूटकर
बिखर जाता हूं....
कमरे में फैल जाते हैं चेहरे ही चेहरे..अनगिनत चेहरे
सबकी अपनी दुनिया
सबकी अपनी कहानी।

कोई हंसता-मुस्कराता
कोई बेहद उदास,
कहीं प्रेमी-अनुरागी
तो कहीं विरह के गीत,

शांत, स्तब्ध, निश्छल
तो कहीं भारी हलचल,
वो कोने की किरच में
बेतरतीब-बेढब अक्स

कहीं नाक ही नहीं
कहीं टूटकर लटकी सी,
वो तो सिर्फ कान है
देखो कितना संतुष्ट है।

वहां मुंह ही नहीं है
आंखों में गहरा मौन है।
वो वहां अलमारी के नीचे
देखो एक शतुरमुर्गी चेहरा
जिम्मेदारियों के तबादले
करता हुआ बिलकुल एकाकी।

वो खिलखिलाता बचपन है
आगे तूफान सी जवानी है।
चमक के पीछे उस माथे पर जिम्मेदारी की सलवटें
एक ही पल, एक ही जगह 
पूरी जिंदगी का कोलाज।

दरवाजा बंद और रोशनी गुम
फिर से बटोर लेता हूं वो
बिखरे चेहरे, उम्मीद-नाउम्मीद

कई कहानियां, कई दुनिया।
चक्कर लगाने लगती है
मेरे भीतर फिर अलग दुनिया
नया आकाश,नया सूरज-धरती

सारे ग्रह फिर अपने ऑर्बिट में
निकल पड़ते हैं चक्कर लगाने
सन्नाटा टूटता है, होता है बिग बैंग
...और मैं, मैं हो जाता हूं।

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क्यों हताश है, निराश है क्यों?

कवि ने इस कविता के द्वारा निराशा के भंवर से निकलकर आगे बढ़ने और जीवन में सफलता पाने के लिए प्रेरित किया है

Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Udhav Krishna

उधव कृष्ण, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक।।

क्यों हताश है, निराश है क्यों?

चिन्ता क्यों तुझे घेरे है?

निराश जीवन में अंधियारा क्यों बिखेरे है?

चिंता को चिता पर रख दे, निराशा को रख जूते की नोंक पर!

जाग....! काम, क्रोध, मोह, त्याग!

ज्ञान का सूर्य उदय कर,

निराशा और चिन्ता को विजय कर।

खिल कर प्रकाश दे, जीवन को सदमार्ग दे!

बना रास्ता खुद का और चल उस पर

पथिक अविचल, अडिग, निर्भय होकर!

सारा अंधियारा छट जाएगा,

जीवन सरस बन जायेगा।

निराशा चिन्ता का जब क्षय होगा,

जीवन मे विजय ही विजय होगा..

मार्ग में जब तू चलेगा दुश्मन देख तुझे डरेगा!

ऐसा कुछ कमाल कर जीवन को इंकलाब कर!

आग में तप कर खुद को रौशन अपने आप कर।

गिरने से क्यों डरता है! उठ कर फिर प्रयास कर,

दीपक बन, प्रकाश कर,

दीपक बन,प्रकाश कर!

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