‘अक्सर मैं, कांच की तरह टूटकर बिखर जाता हूं’

कविता के माध्यम से वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कांच के टूटने का उदाहरण देते हुए उसके टुकड़ों में दिखते जिंदगी के हर अक्स के बारे में बताया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 17 September, 2019
Last Modified:
Tuesday, 17 September, 2019
Vinod Purohit


डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक अमर उजाला, आगरा संस्करण।। अक्सर मैं, कांच की तरह टूटकर बिखर जाता हूं.... कमरे में फैल जाते हैं चेहरे ही चेहरे..अनगिनत च...
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