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जागरण फोरम: राजीव सचान की लिखी इस रिपोर्ट पर हुई खूब चर्चा...

पिछले हफ्ते दिल्ली के ताज पैलेस में जागरण प्रकाशन की ओर से जागरण फोरम का...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

पिछले हफ्ते दिल्ली के ताज पैलेस में जागरण प्रकाशन की ओर से जागरण फोरम का मंच सजा, जिस पर देश के कई बड़े सितारे नजर आए। इस दौरान कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे में दैनिक जागरण के असोसिएट एडिटर राजीव सचान ने एक पैनल चर्चा की रिपोर्ट लिखी है, जो दैनिक जागरण में प्रकाशित भी हुई है। 'धर्म और राजनीति का बेजा इस्तेमाल समस्या की जड़' शीर्षक से छपी इस रिपोर्ट के बारे में पाठकों के कई कमेंट भी मिले हैं। मसलन, इस रिपोर्ट को सीमित शब्दों में किस तरह धारदार और दमदार रिपोर्टिंग की जा सकती है, इसका अनुपम उदाहण बताया गया है।

दैनिक जागरण में प्रकाशित ये रिपोर्ट हम आपके साथ ज्यों की त्यों शेयर कर रहे हैं...

राजीव सचान, नई दिल्ली: जागरण फोरम के पहले दिन के तीसरे सत्र में चर्चा का विषय था-धर्म, संस्कार और राजनीति। इस गूढ़ और व्यापक विषय पर जब चर्चा छिड़ी तो वह सरस एवं सरल ही नहीं, सहमति से ओतप्रोत भी दिखी। मंच पर उपस्थित वक्ता पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी, स्वामी चिदानंद सरस्वती और संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने सत्र संचालक एवं दिल्ली विवि के प्राध्यापक अभिनव प्रकाश के विभिन्न सवालों का जवाब देते हुए इस पर एक तरह से एकमत होकर जोर दिया कि कम से कम इस देश में तो धर्म को राजनीति से अलग नहीं ही किया जा सकता। अलग-अलग संदर्भ वाले सवालों के बीच वक्ताओं में इस पर भी मतैक्य दिखा कि मूल समस्या धर्म और राजनीति के संकुचित इस्तेमाल और उनके दुरुपयोग की है।

चर्चा की शुरुआत सदा पूछे जाने वाले इस सवाल से हुई कि क्या धर्म को राजनीति से अलग किया जा सकता है? आरिफ मोहम्मद खान ने महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि जो इस देश के इतिहास से परिचित है, वह तो यह प्रश्न खड़ा ही नहीं कर सकता, क्योंकि राजनीति तो राजधर्म है। उन्होंने दीन को धर्म का समानार्थक शब्द बताते हुए कहा कि धर्म असंख्य है। जैसे पिता का धर्म, पति का धर्म या पुत्र का धर्म। उन्होंने अंत:करण को भी धर्म बताते हुए कहा कि वह अधिकार नहीं, कर्तव्य की बात करता है और इसीलिए धर्म का मूलतत्व है-दूसरों का भला करना, बु्द्धिमत्ता के साथ औरों के प्रति करुणा भाव रखना।

जनार्दन द्विवेदी ने सत्य, नीति और न्याय को धर्म का पर्याय बताते हुए कहा कि इसे राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता और इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण हैं गांधी जी। वह धार्मिक भी थे और राजनीतिक भी। धार्मिक होते हुए भी उन्होंने देश की राजनीति बदल दी। उनके अनुसार, धर्म का स्वरूप जब सांप्रदायिक हो जाता है, तब उसमें दोष आ जाता है। उन्होंने धर्म और राजनीति के लक्ष्य को एक ही बताते हुए यह भी कहा कि संस्कारों का भी समय के साथ संस्कार होता है। उन्होंने नई पीढ़ी पर भरोसा जताते हुए कहा कि उन्हें भारत के बेहतर भविष्य को लेकर कोई संदेह नहीं।

कृष्ण गोपाल ने भी गांधी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, शास्त्रीजी और दीनदयाल उपाध्याय के सादगी भरे जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य संस्कार देना है। राजनीतिक दलों से उदाहरण पेश करने के लिए आगे आने की वकालत करते हुए उन्होंने धर्म एवं रिलीजन को अलग-अलग बताया। यह सवाल भी खड़ा किया कि आखिर संविधान में यह कैसे लिखा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य तो कहता है कि जहां धर्म है, वहां जय है। इस कठिन समय में निराश न होने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि बिना धर्म के समाज मूल्यहीन हो जाएगा।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने समस्या के सूत्र को पकड़ते हुए कहा, ‘मुश्किल यह है कि धर्म को हमने पीआर बना दिया है। पीआर से व्यापार तो बढ़ सकता है, प्यार नहीं। उन्होंने कहा कि यंग इंडिया तंग इंडिया न बने, क्योंकि हम तो समस्त वसुधा को कुटुंब मानने वाले देश हैं। संस्कार निर्माण में घर-परिवार और परंपरा की भूमिका रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सही और सतत विकास साफ नीयत से होगा और बेहतर बदलाव के लिए मेरे लिए क्या, मेरे को क्या के बजाय, इस भाव से लैस होना होगा कि मेरे द्वारा क्या?’

सत्र के अंत में आबादी नियंत्रण के लिए कानून बनाने संबंधी एक सवाल के जवाब में भी सहमति के स्वर उभरे। जनार्दन द्विवेदी ने चिदानंद सरस्वती और आरिफ मोहम्मद खान से सहमति जताते हुए कहा कि पहली जरूरत एक समझ विकसित करने के साथ ही लोगों को शिक्षित करने की है।

इस पूरी चर्चा से अगर किसी की ओर से बिना कहे कोई साझा स्वर ध्वनित हुआ तो यही कि राजनीति और खराब राजनीति के बीच विभाजन रेखा न होने से भी समस्या बढ़ी है और धर्म को पूजा-पाठ का पर्याय समझ लेने से भी।


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