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विक्रम छाछी ने पीजी मथाई को किया याद, यूं दी भावभीनी श्रद्धांजलि‍

पलाकुन्नाथु जी मथाई (Palakunnathu G Mathai) के साथ मेरी काफी यादें जुड़ी हुई हैं। वह एक बेहतरीन इंसान थे। वह हमेशा मृदुभाषी, अच्छे व्यवहार वाले लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि वाले थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 1 year ago

पलाकुन्नाथु जी मथाई (Palakunnathu G Mathai) के साथ मेरी काफी यादें जुड़ी हुई हैं। अपनी मैगजीन के उस प्रिय दिवंगत संपादक के बारे में लिखना जीवन के उन तमाम अहसासों में से एक है, जिसने एक पत्रकार (मुझे) को बिजनेसवर्ल्ड में अपने नेतृत्व में काफी कुछ सीखने का मौका दिया।  

मैं जुलाई 1993 में पीजी मथाई से पहली बार मिला था, जो हमारे जीवन का एक ऐतिहासिक वर्ष था। हमारी शादी उसी साल अप्रैल में हुई थी। वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों का फल मिलना शुरू हो गया था। फरवरी 1993 में ‘इंफोसिस’ सार्वजनिक (Public) कंपनी हो गई (आजादी के बाद किसी भारतीय कंपनी द्वारा की गई पहली कंपनी में से एक) और भारतीय आसमान को निजी एयरलाइंस के लिए खोल दिया गया। यही वह वर्ष था, जब व्यावसायिक पत्रकारिता में मेरी यात्रा बिजनेसवर्ल्ड मैगजीन के साथ शुरू हुई थी।

मिस्टर मथाई (या जॉर्ज/मथाई जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) उस समय ‘आनंद बाजार पत्रिका’ समूह के स्वामित्व वाली मैगजीन ‘बिजनेसवर्ल्ड’ में एग्जिक्यूटिव एडिटर थे। इस समूह के पास प्रसिद्ध बिजनेस अखबार ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ भी था। उनकी पहली छवि आज भी मेरी यादों में जीवित है। ‘बिजनेसवर्ल्ड’ और ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के तत्कालीन एडिटर-इन-चीफ टी.एन निनान ने संसद मार्ग पर पीटीआई बिल्डिंग में जब मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया तो मैंने मथाई को मैगजीन के कॉमन एडिट रूम के प्रवेश द्वार पर उनकी मेज के ठीक बगल में खड़ा पाया। वह छोटी आस्तीन वाली शर्ट, ग्रे रंग की पेंट और कोल्हापुरी सैंडल्स पहने हुए थे। उनका एक हाथ शीशे के दरवाजे पर टिका हुआ था, जिस पर स्याही से लगभग रंगी हुई एक कॉपी थी, जिस पर उन्होंने संपादन किया था और अपने हाथ से कुछ टिप्पणी लिखी हुई थी। उनके दूसरे हाथ में सिगरेट थी। उसके बाद उन्होंने थोड़ी मुस्कान दी और फिर हल्की सी हंसी। इसके बाद मैं जब भी उनसे मिला, उनका यह अंदाज कभी नहीं बदला।   

मथाई के कुशल मार्गदर्शन और संरक्षण में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। इस दौरान की कुछ ऐसी स्टोरीज भी हैं, जो आज भी मुझे अच्छी तरह याद हैं। उनसे जुड़ी ऐसी ही एक कहानी मुझे याद है। यह मेरी पहली कॉर्पोरेट स्टोरीज में से एक थी, जो मैं कर रहा था (यह करीब 800 शब्दों की थी), यह फार्मास्यूटिकल्स जॉइंट वेंचर का विश्लेषण था, जिसमें स्थानीय राज्य सरकार एक भागीदार थी। इसमें मेरे पास सरकार का पक्ष अथवा टिप्पणी नहीं थी। जाहिर था कि इसे मथाई को स्वीकार नहीं करना था, उन्होंने इस रिपोर्ट को जारी करने से पहले मैगजीन के दो अंकों (issues) का इंतजार किया। उनका कहना था, ‘इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप किसके बारे में लिख रहे हैं और विश्लेषण कर रहे हैं। हर किसी का दृष्टिकोण, उसका पक्ष अथवा खंडन स्टोरी में होना चाहिए। हमें हर किसी का पक्ष रखना होगा, रिपोर्ट देनी होगी और पाठक को उसके निष्कर्षों पर निर्णय लेने देना होगा।‘ यह आज भी सच है और हमेशा रहेगा।

उनसे जुड़ी ऐसी और भी कई कहानियां हैं, जिनमें टेलीकॉम इंडस्ट्री को नियंत्रण मुक्त करने से जुड़ी एक स्टोरी भी शामिल है। यह एक बड़ी परियोजना थी, जिसमें बिजनेसवर्ल्ड के हम पत्रकारों का एक समूह शामिल था, क्योंकि हमें इस क्षेत्र में प्रवेश करने के इच्छुक कई निजी व्यवसायियों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ ही केंद्र सरकार और नौकरशाहों को कवर करने की आवश्यकता थी। बतौर रिपोर्टर मेरे लिए संबंधित सचिव से बात करना आसान काम था, क्योंकि वह काफी मिलनसार और हमेशा उपलब्ध रहने वाला था। केंद्रीय मंत्री से बात करना काफी मुश्किल रहा, क्योंकि हर प्रयास विफल रहा। ऐसे में दृढ़ निश्चयी मथाई आगे आए और कहा कि चलो, मंत्री के यहां चलते हैं। हम मंत्री के आवास पर गए। हमें घंटों तक अंदर नहीं जाने दिया गया, लेकिन देर शाम में मंत्री के OSD हमें अपने बॉस के साथ 10 मिनट की मुलाकात के लिए अंदर ले गए। हमारा मानना ​​है कि हमारा पब्लिकेशन ही एकमात्र ऐसा था, जिसे उन्होंने समय दिया था। यह मिस्टर मथाई का दूसरी पक्ष था। बहुत से लोग मानते थे कि उनकी प्रमुख भूमिका मैगजीन के इश्यू को संपादित करना और उसे प्रकाशित करना होती थी। लेकिन यह सिर्फ कहानी का एक हिस्सा था। वह जमीनी स्तर के संवाददाता और रिपोर्टर भी थे, लेकिन इन सबसे पहले वह एक बेहतरीन इंसान थे।

वह हमेशा मृदुभाषी, अच्छे व्यवहार वाले लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि वाले थे। मैं अब तक जितने लोगों से मिला हूं, उनमें वह काफी अपनापन वाले और उत्साही लोगों में से थे। वह हमेशा हर इश्यू के बाद मैगजीन की क्वालिटी का श्रेय लेने से हिचकिचाते थे और जब उनके खर्च पर चर्चा होती तो हंसते थे। एक बार स्टाफ के सभी लोग गोवा गए, लेकिन डाबोलिम की मेरी फ्लाइट छूट गई और मैंने अगले दिन फ्लाइट पकड़ी। लेकिन उस समय मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब मैंने वहां अपने लिए कार और ड्राइवर को प्रतीक्षा करते हुए पाया। यह सब मथाई के सौजन्य से था। उस शाम जब हम अरब सागर के तट पर घूम रहे थे, मैंने पीछे से एक परिचित आवाज सुनी, जिसमें वह कह रहे थे, तुम बिल्कुल मेरे बेटे की तरह हो। उसे भी समुद्र से प्यार है और वह उसके किनारे खड़ा होकर उसे निहारता है। मैं आपके बेटे के लिहाज से बहुत बड़ा होता मिस्टर मथाई, लेकिन मैं आपके छोटे भाई के रूप में होने को बहुत पसंद करता। अलविदा, मिस्टर मथाई। हम फिर मिलेंगे.... 

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डीएचआर ग्लोबल (DHR Global) में मैनेजिंग पार्टनर (Managing Partner) के रूप में कार्यरत हैं, जहां वह भारत और एशिया प्रशांत क्षेत्र में उपभोक्ता और रिटेल प्रैक्टिस की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं।)


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