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ये मुकाम पाने वाला दुनिया का पहला डिजिटल फर्स्ट न्यूज ब्रैंड बना 'द लल्लनटॉप'
पिछले 22 महीनों में तेजी से बढ़े सबस्क्राइबर्स, इस न्यूज पोर्टल के प्रोग्राम टीवी पर भी आते हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
अपने अनूठे कंटेंट के लिए पहचाने जाने वाले डिजिटल फर्स्ट न्यूज ब्रैंड 'द लल्लनटॉप' ने एक खास मुकाम हासिल कर लिया है। जारी प्रेस रिलीज के अनुसार 'द लल्लनटॉप' के यूट्यूब पर एक करोड़ सबस्क्राइबर्स हो गए हैं। बताया जाता है कि यह दुनिया का पहला डिजिटल फर्स्ट न्यूज ब्रैंड है, जिसके 10 मिलियन सबस्क्राइबर्स हो गए हैं (सोर्स: विडूली रिपोर्ट, टॉप 10 डिजिटल फर्स्ट ऑरिजिनल न्यूज चैनल्स ऑन यूट्यूब)। चार जनवरी 2018 को इसके 10 लाख सबस्क्राइबर्स थे और इसके बाद महज 22 महीनों में कई बड़े नामों को पीछे छोड़ते हुए इसने यह आंकड़ा छू लिया है।
'द लल्लनटॉप' के बारे में कहा जाता है कि इसकी सबसे बड़ी यूएसपी इसका यूज़र कनेक्ट है। यह बेहद ही आसान भाषा में यूजर्स को जटिल से जटिल विषय समझाने में माहिर है, जिसे दर्शक काफी पसंद करते हैं। फरवरी 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार 'द लल्लनटॉप' ने ग्राउंड रिपोर्टिंग की। इसके तरह दर्शकों को बिना कांट-छांट के लाइव रिपोर्टिंग के जरिये समस्त सामग्री परोसी गई। यूपी के बाद हुए गुजरात और हिमाचल के चुनावों में 'द लल्लनटॉप' ने चुनावी रिपोर्टिंग की। लोकसभा चुनावों में 'द लल्लनटॉप' ने आधे से ज्यादा भारत कवर किया।
यह देश का इकलौता न्यूज पोर्टल है, जिसके प्रोग्राम टीवी पर भी आते हैं। ‘तेज’ चैनल पर 'द लल्लनटॉप' के दो प्रोग्राम आते हैं। इनमें सोमवार से शुक्रवार रात नौ बजे ‘द लल्लनटॉप शो’ और शनिवार की रात नौ बजे ‘द लल्लनटॉप क्विज शो’ आता है। 'द लल्लनटॉप' के हर विडियो को यूट्यूब पर औसतन 2.2 लाख व्यूज मिलते हैं। लगभग हर हफ्ते इसका कोई न कोई विडियो इंडिया में ट्रेंड कर रहा होता है।
'द लल्लनटॉप' में 'पॉलिटिकल किस्से' के द्वारा इतिहास के दिलचस्प किस्सों को रोचक अंदाज में बयां किया जाता है, वहीं अफवाहों, फर्जी और भ्रामक खबरों के लिए 'द लल्लनटॉप' के 'पड़ताल' में तमाम वायरल कंटेंट का फैक्ट चेक होता है। 'किताब वाला' शो में लेखकों से गुप्तगू की जाती है, वहीं 'साइंसकारी' में विज्ञान को आसान शब्दों में समझाया जाता है। हर हफ्ते आने वाले 'नेता नगरी' शो में वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ हफ्ते भर की तमाम राजनीतिक उठापटक का विश्लेषण किया जाता है। 'अर्थात' में जहां इकनॉमी को लेकर चर्चा की जाती है, वहीं 'आसान भाषा में' के तहत बहुत सी कठिन चीजों को सरल भाषा में समझाया जाता है। फिर चाहे सेंसेक्स की एबीसीडी हो या क्रिकेट में बॉल स्पिन होने का गणित।
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