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जब महात्मा गांधी बोले- अगर एक दिन के लिए तानाशाह बना, तो करूंगा ये काम
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में किया गया कार्यक्रम का आयोजन, जुटे पत्रकारिता व साहित्य जगत के कई दिग्गज
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर दैनिक जागरण द्वारा हिंदी को समृद्ध और मजबूत बनाने की मुहिम 'हिंदी हैं हम' के तहत सानिध्य का आयोजन दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय थे। उन्होंने दैनिक जागरण के 75 वर्ष की प्रगतिशील यात्रा पर एक विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इसके बाद विभिन्न सत्रों में प्रसून जोशी, प्रो.सुधीश पचौरी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, राम बहादुर राय, प्रो. आनंद कुमार, जैनेद्र सिंह, सच्चिदानंद जोशी एवं रेडियो जॉकी दिव्या आदि वक्ता शामिल हुए।
‘गांधी और हिंदी’ सत्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने कहा, ‘महात्मा गांधी ने हिंदी के लिये जो किया, वह आज लोगों की नजरों से ओझल हो गया है। हमें आज यह जानने की आवश्यकता है कि गांधी जी ने हिंदी के लिये प्रचंड आन्दोलन किए। गांधी जी कहा था कि अगर मुझे एक दिन के लिये तानाशाह बना दिया जाए तो मैं हिंदी को राष्ट्रभाषा बना दूंगा। महात्मा गांधी ने दक्षिणी एवं पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये कई कार्य किए।’
वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा, ‘गांधी जी ने हिंदी के लिये क्या-क्या किया, हिंदी उनकी आत्मा के कितने करीब थी, आज ये बातें बहुत कम होती हैं।’ समाजशात्री प्रो. आनन्द कुमार ने कहा, ’भाषा की अपनी राजनीति और राजनीति की अपनी एक भाषा होती है। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत आए तो उनका एक सपना था कि भारत की एक राष्ट्रभाषा होनी चहिए। उन्होंने कहा था कि भारतीय संस्कृति के हिसाब से हिंदी भाषा भारत की एकता बनाए रखेगी।’ इसके बाद हुए सत्र ‘हिंदी,समाज और धर्म’ में प्रसिद्ध उपन्यासकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा, ’भाषा किसी जाति,धर्म अथवा देश की नहीं होती है। हिंदी हिंदू की भाषा और उर्दू मुस्लिम की भाषा का खेल अंग्रेजों द्वारा खेला गया था। कैसे अंग्रेजों ने सर सयद और भारतेंदु हरीश चंद्र के बीच इस भाषा का खेल खेला, वह जगजाहिर है।
’हिंदी साहित्यकार, आलोचक एवं विश्लेषक सुधीश पचौरी ने कहा, ’भाषा पहले आयी और धर्म बहुत बाद में और भाषा का किसी धर्म विशेष कोई संबंध नहीं है। हिंदी की आज अपने ही क्षेत्र में बड़ी दयनीय दशा है। हिंदी के पीछे कोई नहीं खड़ा है। हिंदी केवल बाजार के रूप में रह गई है। हिंदी कवि और लेखक भी आज उन्हें हिंदी कवि और लेखक कहने पर शर्म महसूस करते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? आपको किसी सत्ता और व्यक्ति विशेष से नफरत है तो क्या उसके लिये आप अपनी मातृभाषा से नफरत करने लगोगे? हिंदी जैसी भी है, हमारी मातृभाषा है, हां हिंदी मिलावटी है। भाषा और संस्कृति दोनों ही मिलावट के बिना नहीं चल सकते हैं।’ हंसराज कॉलेज की प्राचार्य डॉ. रमा ने कहा, ‘आज हिंदी के पीछे खड़े होने की नहीं, हमें हिंदी के साथ चलने की जरूरत है। हर धर्म एक ही बात सिखाता है कि हम सब में एकता होनी चहिए।’
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