अमर उजाला फाउंडेशन की इस पहल में आप भी हो सकते हैं शामिल

14 जून से शुरू होकर विभिन्न राज्यों में कई दिनों तक चलाया जाएगा अभियान

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Amar Ujala

अमर उजाला, फाउंडेशन की ओर से 14 जून 2019 को विश्व रक्तदाता दिवस पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़ और पंजाब में विभिन्न स्थानों पर स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है।

यह आयोजन 14 जून से शुरू होकर कई दिनों तक जारी रहेगा। इस बारे में अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से गुजारिश की गई है कि आप इन दिनों इन राज्यों में कहीं भी हों, स्वैच्छिक रक्तदान करके किसी की जान बचा सकते हैं और पुण्य के भागी बन सकते हैं।

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राष्ट्रवाद और मीडिया के संबंधों को बखूबी दर्शाती है ये किताब

भोपाल स्थित गांधी भवन में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेंद्र सिंह की इस किताब का किया गया विमोचन

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 12 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 12 February, 2020
Book Launching

मीडिया विमर्श की ओर से आयोजित पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक सम्मान समारोह में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर पीएचडी करने वाले डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह की किताब ‘राष्ट्रवाद और मीडिया’ का विमोचन किया गया। भोपाल स्थित गांधी भवन में आयोजित कार्यक्रम में समाजवादी विचारक एवं लेखक रघु ठाकुर ने कहा, ‘एक सच्चा राष्ट्रवाद वही होगा जो सच्चा विश्ववादी होगा। अगर सभी देश अपनी सीमाओं को छोड़ने के लिए तैयार हो जाएं, तभी असली राष्ट्रवाद की नींव रखी जा सकती है।’ उन्होंने कहा कि मीडिया और राष्ट्रवाद के बीच किसी भी तरह के संघर्ष की स्थिति नहीं होनी चाहिए।

प्रख्यात साहित्यकार एवं व्यंग्यकार गिरीश पंकज का कहना था, ‘आज के दौर में जब सभी तरफ राष्ट्रवाद की चर्चा है और कुछ मीडिया घरानों पर भी राष्ट्रवादी होने के ठप्पे लगाये जा रहे हैं, तब इस पुस्तक का आना काफी प्रासंगिक हो जाता है। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उमेश कुमार सिंह का कहना था कि कोई एक वाद इस राष्ट्र का पर्याय नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि लेखकों ने पुस्तक में भारतीय राष्ट्रवाद को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयास किया है। उन्होंने राष्ट्रवाद की जगह ‘राष्ट्रत्व’ या ‘राष्ट्रीय विचार’ शब्द का उपयोग करने पर जोर दिया।

यश प्रकाशन, नई दिल्ली की ओर से प्रकाशित इस किताब में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद एवं मीडिया के संबंध, मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर मीडिया विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तम्भकारों के महत्वपूर्ण आलेख शामिल किये गए हैं। इस किताब में प्रो. संजय द्विवेदी, संतोष कुमार पाण्डेय, डॉ. मयंक चतुर्वेदी, डॉ. शशि प्रकाश राय, डॉ.साधना श्रीवास्तव, डॉ. मंजरी शुक्ला, डॉ. मनोज कुमार तिवारी, डॉ. मीता उज्जैन, डॉ. सीमा वर्मा, उमेश चतुर्वेदी, अमरेंद्र आर्य, अनिल पांडेय आदि के लेख शामिल हैं।

किताब विमोचन के लिए मंच पर प्रख्यात समाजवादी चिन्तक रघु ठाकुर, वरिष्ठ संपादक प्रो. कमल दीक्षित, सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. उमेश कुमार सिंह, व्यंग्यकार गिरीश पंकज, संपादक कमलनयन पाण्डेय, मीडिया आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी, डॉ. बीके रीना और साहित्यकार पूनम माटिया आदि उपस्थित रहे।

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जानें, दिल्ली के बारे में क्या कहता है ABP News-CVoter का एग्जिट पोल

दिल्ली में आठ फरवरी को डाले गए हैं वोट, 11 फरवरी को मतों की गिनती का काम होगा

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 10 February, 2020
Last Modified:
Monday, 10 February, 2020
ABP News

दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आठ फरवरी को हुई वोटिंग के बाद अब सभी की नजरें 11 फरवरी को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। सभी इस बात को लेकर काफी उत्सुक हैं कि आखिर दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी। तमाम मीडिया संस्थान भी एग्जिट पोल के जरिये अनुमान लगा रहे हैं कि दिल्ली का ताज किसके सिर सजने वाला है।

इन सबके बीच एग्जिट पोल के हवाले से ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) ने खबर दी है कि दिल्ली में एक बार फिर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बन सकती है। एबीपी न्यूज-सी वोटर (ABP News-Centre for Voting Opinion & Trends in Election Research) के एग्जिट पोल के मुताबिक, आप को 50.4 प्रतिशत, बीजेपी को 36 प्रतिशत, कांग्रेस को नौ प्रतिशत और अन्य पॉलिटिकल पार्टियों को 4.7 वोट प्रतिशत मिलने की संभावना है।

इस एग्जिट पोल के अनुसार, दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 49 से 63 सीट मिल सकती हैं। बीजेपी को पांच से 19 सीटों पर जीत मिल सकती है और यह दूसरे स्थान पर रह सकती है, वहीं कांग्रेस को शून्य से चार सीट मिलने की संभावना जताई गई है।

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नहीं रहे जाने-माने क्रिकेट पत्रकार राजू भारतान

साप्ताहिक मैगजीन ‘the Illustrated Weekly of India’ से करीब 42 साल तक जुड़े रहे थे राजू भारतान

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 07 February, 2020
Last Modified:
Friday, 07 February, 2020
Raju Bharatan

जाने-माने फिल्म इतिहासकार और क्रिकेट पत्रकार राजू भारतान (Raju Bharatan) का लंबी बीमारी के बाद शुक्रवार को निधन हो गया। वह 86 साल के थे। राजू भारतान साप्ताहिक मैगजीन ‘the Illustrated Weekly of India’ से करीब 42 साल तक जुड़े रहे थे। खुशवंत सिंह, एमवी कामत, प्रीतिश नंदी और अनिल धारकर जैसे दिग्गज पत्रकारों के साथ काम कर चुके राजू भारतान असिस्टेंट एडिटर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

इस मैगजीन में अपनी काफी लंबी पारी के दौरान उन्होंने दो क्रिकेट स्पेशल इश्यू भी निकाले थे, जिन्होंने 4.05 लाख और 3.8 लाख सर्कुलेशन का आंकड़ा भी छुआ था। इसके अलावा वह क्रिकेट पर कॉलम भी लिखते थे। उन्होंने वर्ष 1974 में क्रिकेट पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘The Victory Story’ का निर्देशन भी किया था।

‘पीटीआई’ के पहले जनरल मैनेजर ए.एस भारतान के बेटे राजू भारतान ने ‘Rivals in the Sun’(1952) और ‘Indian Cricket-The Vital Phase’ (1977) समेत छह किताबें भी लिखी थीं।

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वरिष्ठ पत्रकार रवि सुबैय्या ने दुनिया को कहा अलविदा

पोलियो से ग्रस्त रवि सुबैय्या कर्मठता व जीवटता की साक्षात मिसाल थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 06 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 06 February, 2020
Ravi Subbaiah

स्वतंत्र पत्रकार रवि सुबैय्या का निधन हो गया है। नवी मुंबई के रहने वाले 51 वर्षीय सुबैय्या ने यहां वाशी इलाके में स्थित अपने आवास पर रविवार को अंतिम सांस ली।

पोलियो से ग्रस्त होने के बावजूद रवि ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और ‘एनएमटीवी’ (NMTV) नाम से केबल टीवी इंफॉर्मेशन सर्विस शुरू की। वह कई एनजीओ से जुड़े हुए थे और प्रेरणादायक भाषण देने के लिए जाने जाते थे। रवि के परिवार में पत्नी और दो बेटियां हैं।

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पत्रकार ने कुछ यूं पेश की ईमानदारी की मिसाल  

वे लोग जो कहते हैं कि अब दुनिया में बेईमानों का राज है। हर तरफ धोखेबाज हैं, लुटेरे बैठें हैं। तो बता दें कि ऐसे लोगों की सोच को बदल देने वाला काम आगरा के रहने वाले पत्रकार समीर क़ुरैशी ने किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 05 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 05 February, 2020
agra

वे लोग जो कहते हैं कि अब दुनिया में बेईमानों का राज है। हर तरफ धोखेबाज हैं, लुटेरे बैठें हैं। तो बता दें कि ऐसे लोगों की सोच को बदल देने वाला काम आगरा के रहने वाले पत्रकार समीर क़ुरैशी ने किया है। इस पत्रकार ने ईमानदारी की वो मिसाल पेश की है, जिसे सुनकर हर कोई उसकी प्रशंसा कर रहा है। उल्लेखनीय है कि मंगलवार को थाना न्यू आगरा के अंतर्गत बल्केश्वर कालोनी निवासी धर्मेंद्र कुमार पुत्र देवकी नंदन जूते बनाने का कारखाना चलाते हैं। मंगलवार की दोपहर को धर्मेंद्र कारखाने के लिए दस हजार रुपए का सामान लेने सदर भट्टी गए थे। तभी उन पैसों में से 2500 रुपए रास्ते मे गिर गए, जिसकी वजह से युवक काफी परेशान था।

उसी दौरान रास्ते से गुजर रहे पत्रकार समीर क़ुरैशी की नजर सड़क पर पड़े हुए 2500 रुपयों पर पड़ी, तो वह रुपयों को लेकर थाना मंटोला की डिवीजन चौकी पर पहुंच गए। चौकी में मौजूद प्रभारी वीर सिंह को वह पैसे दे दिए। वहीं कुछ देर बाद युवक भी पैसे गिरने की जानकारी देने के लिए पुलिस चौकी पहुंचा। जहां मौजूद पत्रकार समीर क़ुरैशी और चौकी प्रभारी वीर सिंह ने वह पैसे युवक के सुपुर्द कर दिए।

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वीजा नियमों के उल्लंघन में फंसा पत्रकार, अधिकारियों ने यूं दी बड़ी राहत

बता दें कि आव्रजन कानूनों के उल्लंघन के आरोप में पत्रकार को पांच साल की कैद के साथ ही 36,500 डॉलर जुर्माने का भुगतान करना पड़ सकता था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 03 February, 2020
Last Modified:
Monday, 03 February, 2020
Philip Jacobson

छह हफ्ते तक हिरासत में रखने के बाद एक अमेरिकी पत्रकार को इंडोनेशियाई अधिकारियों ने वापस उसके देश भेज दिया है। इस बात की जानकारी देते हुए पत्रकार के वकील ने कहा कि बोर्नियो द्वीप पर देश के अधिकार कार्यकर्ताओं से मिलने के बाद उन्हें रिहा किया गया है। दरअसल, पत्रकार फिलिप माइरर जैकबसन के पास वीजा नही था, जिसके चलते उन पर आव्रजन कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगा था।

उनके वकील अर्यो नुग्रोहो ने बताया कि आव्रजन कार्यालय की तरफ से आरोपों को वापस ले लेने के बाद पत्रकार जैकबसन को जकार्ता अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से वापस अमेरिका भेज दिया गया।

बता दें कि आव्रजन कानूनों के उल्लंघन के आरोप में उन्हें पांच साल की कैद के साथ ही 36,500 डॉलर जुर्माने का भुगतान करना पड़ सकता था।

कैलिफोर्निया के फिलिप माइरर जैकबसन को 21 जनवरी को पलंगकराया शहर में हिरासत में लिया गया था। जैकबसन पर्यावरणीय विज्ञान समाचार वेबसाइट मोंगाबेय के संपादक हैं। यह वेबसाइट उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों की सूचना उपलब्ध कराती है।

 

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नए जमाने की नई विसंगतियों का आईना है वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पांडे का ये व्यंग्य संग्रह

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 03 February, 2020
Last Modified:
Monday, 03 February, 2020
PIYUSH PANDEY

प्रभात रंजन, वरिष्ठ लेखक।।

पिछले पांच-एक साल में एक नई बात हुई है। अपन लोग बात-बात पर आहत होने लगे हैं। आहत हैं इसलिए आक्रामक भी हो गए हैं। इस चक्कर में दूसरों को आहत करना अपना शगल हो गया है। लेकिन जब आहत होने और आहत करने का अहम काम सामान्य लोग करने लगे हैं तो व्यंग्य लेखक क्या करेगा? जवाब इतना आसान नहीं है, फिर भी कुछ और करे या ना करे अपनी ऐसी-तैसी करने का हक तो उसे है। ये अलग बात है कि किसी समझदार और संवेदनशील आदमी (जो लेखक भी है) की दुर्गति कराते हुए लेखक, पाठक और समाज को वहां लाकर खड़ा कर देता है, जहां से वह अपना पतन साफ-साफ देख सके।

इस हिसाब से ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ हमारी मौजूदा सामूहिक सोच का आख्यान है। लगे हाथ, इस सोच का व्याकरण समझने की कोशिश है। ये इत्तेफाक भर है कि पीयूष पांडे ने अपने समाज की मानसिक हालत समझने-समझाने के लिए टीवी की पृष्ठभूमि चुनी है। हालांकि ये सच है कि जो कुछ टीवी की बहस में घटित हो रहा है, कमोबेश वहीं सड़क, संसद और घर के ड्राइंग रूम में भी हो रहा है। हां, ये जरूर है कि पीयूष पांडे ने कई वर्षों तक टेलिविजन में काम करते हुए उसकी कार्य पद्धति और ज्ञान तंत्र को करीब से देखा है। इसलिए जब वो टीवी और उसकी बहस की असंगति को सामने लाते हैं तो सब कुछ प्रमाणिक लगता है।

किताब के पहले ही व्यंग्य ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक जगह वह लिखते हैं, “‘समझदार’ पैनलिस्ट खोजना गूंगे की आवाज खोजने जैसा मुश्किल है। अव्वल तो न्यूज चैनल पर भद्द पिटवाने समझदार आते नहीं। यदा-कदा घेर घारकर उन्हें स्टूडियो लाया भी जाए तो दस मिनट बाद वो समझदार नहीं रहते। सर्वज्ञानी एंकर उन्हें मूर्ख साबित कर दूसरे समझदार के शिकार के लिए बढ़ जाता है।”

हालांकि, लेखक का उद्देश्य ये बताना नहीं है कि सच दिखाने का दावा करने वाले टीवी चैनलों में सचमुच कितना मानसिक दिवालियापन व्याप्त है। उसका मकसद तो अपनी या अपने जैसे हर संवेदनशील और समझदार आदमी की मौजूदा समाज में हैसियत बताना है। इसलिए वो हिंदी भाषा के सबसे बड़े व्यंग्यकार कबीर को टीवी की बहस में ठेल देते हैं। कबीर के साथ टीवी की बहस शुरू होती है, और इससे गुजरता हुआ पाठक लोटपोट हो जाता है।

टीवी के महाज्ञानी एंकर के सामने कबीर की एक नहीं चलती। अनुभव और ज्ञान का कवच काम नहीं आता। अगर कोई कसर बाकी है तो गेस्ट के तौर पर आए पंडित और मुल्ला पूरी कर देते हैं। डिबेट शो में बैठे दर्शक भी कबीर पर हमला करने के लिए तैयार हो जाते हैं। कबीर से आहत लोगों को बड़े संजोग से मौका मिला और सबने अपनी भड़ास निकाल ली। कबीर का जो होना था सो हुआ। साथ में दो बातें और हुईं। पहला ये कि शो जम गया। साबित हुआ कि मूर्खता का अपना अर्थशास्त्र है, इसलिए इस दौर में उसकी जबरदस्त मांग है। दूसरी ये कि मूर्खता के आगे समझदारी आज कमजोर और बेबस है।

कबीर की दुर्गति पर हंसते-हंसते ये सवाल जरूर दिमाग में आता है कि हम कहां से चले थे और कहां आ गए हैं। इस निष्कर्ष पर लाकर लेखक एक दुख के साथ पाठक को छोड़ देता है। हालांकि बात कबीर से आगे भी जाती है और हमारे नए किस्म के समाज की नई असंगतियों तक जाती है। ये समाज न सिर्फ आहत है, बल्कि इस पर एक अलग तरह की बदहवासी छाई हुई है। दिलचस्प बात ये है कि इस बदहवासी को न्यू नॉर्मल साबित करने की कोशिश हो रही है।

पीयूष पांडे की नजर स्कूल के पीटीएम में गए मां-बाप पर भी है और थोड़ी तोंद निकलने से परेशान हो रहे आदमी पर भी। सभी के पास अपनी महत्वकांक्षाएं हैं और अजब-गजब तर्क। लेखक बारीकी से उस समाज को देख रहा है, जिसके पास ज्ञान का असीम भंडार जमा हो गया है, लेकिन उसने बुनियादी सोच-समझ से तौबा कर लिया है। इसके बाद तुर्रा ये कि वो बात-बात पर आहत हो जाता है। फिर, मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। यकीनन लेखक जिस समाज का चित्र खींचता है वहां एक दुर्घटना हो रही है, लेकिन पीयूष पांडे के व्यंग्य की खूबसूरती ये है कि वहां सब कुछ सामान्य तरीके से सामने आता है। किताब पढ़ते हुए पहले हंसी आती है फिर कोफ्त होती है। आखिर में एक टीस रह जाती है।

पीयूष के पास विषयों की कमी नहीं है और कहने का अपना अंदाज है। जंगलश्री के इंतजार में नाम से लिखे व्यंग्य में एक जगह वो लिखते हैं-‘शेर को यूं चुनाव-वुनाव की जरूरत नहीं है। शेर शेर होता है। वो जहां खड़ा हो जाए, वहीं से जंगलराज शुरू होता है। लेकिन, बीते दिनों डेमोक्रेसी के हल्ले में शेर ने जंगल में भी डेमोक्रेसी की स्थापना कर दी थी। शेर यूं तो झपट्टा मारकर सब छीन सकता है, लेकिन जंगल में अब डेमोक्रेसी थी तो शेर नहीं चाहता था कि ऐसा कोई भी काम किया जाए, जो डेमोक्रेसी के खिलाफ हो।’

मिलावट का स्वर्ण काल व्यंग्य की शुरुआत ही दिलचस्प सच्चाई के साथ होती है। वो लिखते हैं, ‘ये मिलावट का स्वर्णकाल है। जित देखिए तित मिलावट। लोग आधुनिकता और विकास का नारा लगाते हुए मिलावट के स्वर्णकाल को एंजॉय कर रहे हैं। मिलावट ही सत्य है। कभी सौभाग्य से शुद्ध माल के दर्शन हो जाएं तो लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि फैशन के इस युग में 100 फीसदी टंच माल कहां से आ गया? हाल यह है कि दिल्ली के ज्यादातर लोगों को अगर पूरी तरह शुद्ध हवा मिल जाए तो उनकी तबीयत खराब हो सकती है।’ आदत ही नहीं है।

व्यंग्य लेखन की दुनिया में इन दिनों जो सन्नाटा पसरा है, उसे देखते हुए ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ एक उपलब्धि की तरह है। पहले की अपनी दो किताबों ‘छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन’ और ‘धंधे मातरम्’ से जो प्रतिमान उन्होंने बनाया है, अब उससे आगे निकल गए हैं। इस मुश्किल समय में व्यंग्य लिखने के लिए भी पीयूष पांडे अलग से बधाई के पात्र हैं।

‘कबीरा बैठा डिबेट में’

लेखक: पीयूष पांडे

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन

मूल्य: 250/

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दुनिया को अलविदा कह गए लाइव इंडिया के पूर्व CEO राजेश शर्मा

‘लाइव इंडिया’ (Live India) चैनल के पूर्व सीईओ राजेश शर्मा के बारे में एक दुखद खबर सामने आई है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 30 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 30 January, 2020
rajesh sharma

‘लाइव इंडिया’ (Live India) चैनल के पूर्व सीईओ राजेश शर्मा के बारे में एक दुखद खबर सामने आई है। खबर ये है कि मल्टीपल ऑर्गन्स फैल्योर की वजह से गुरुवार को उनका निधन हो गया है। वे देहरादून के एक अस्पताल में भर्ती थे, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली। राजेश शर्मा के परिवार में पत्नी, बेटा और बेटी हैं। उनकी पत्नी देहरादून में जबकि बेटा-बेटी विदेश में रहते हैं।

मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले राजेश शर्मा परिवार के साथ देहरादून में शिफ्ट हो गए थे। बताया जाता है कि करीब साठ साल के राजेश शर्मा का इसी महीने की आठ तारीख को दिल्ली के मैक्स अस्पताल में दिल का ऑपरेशन हुआ था। हार्ट में ब्लॉकेज की वजह से उन्हें स्टेंट डाले गए थे। इसके बाद वे देहरादून चले गए थे। यहां उन्हें इंफेक्शन के चलते निमोनिया हो गया था, जिसको लेकर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां करीब दस दिनों से वे डायलिसिस पर थे।

इस बारे में ‘सहारा समय’ के डिजिटल सिनर्जी मैनेजर डॉ. प्रवीण तिवारी ने बताया कि राजेश शर्मा करीब छह महीने तक ‘लाइव इंडिया’ के सीईओ रहे थे। चैनल के बंद होने के बाद वे डिजिटल मीडिया पर काम कर रहे थे। तमाम चुनौतियों के बीच वे वेबसाइट शुरू करना चाह रहे थे, लेकिन आर्थिक अड़चनों के चलते इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हो पाया।

‘लाइव इंडिया’ चैनल में बतौर सीईओ अपनी जिम्मेदारी संभालने से पहले वह तमाम बड़ी कंपनियों में बतौर कंसल्टेंट अपनी भूमिका निभा चुके थे। वह ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ (NHAI) में भी बतौर कंसल्टेंट काम कर चुके थे।

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HT मीडिया से जुड़े शरद सक्सेना के बारे में आई ये बुरी खबर

HT मीडिया के साथ शरद सक्सेना करीब 15 साल से जुड़े हुए थे और ह्यूमन रिसोर्सेज, प्रॉडक्शन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 28 January, 2020
Last Modified:
Tuesday, 28 January, 2020
Sharad Saxena

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (एचआर और ऑपरेशंस) शरद सक्सेना का सोमवार को निधन हो गया है। बताया जाता है कि वह कैंसर से जूझ रहे थे। एचटी मीडिया के साथ शरद सक्सेना करीब 15 साल से जुड़े हुए थे और ह्यूमन रिसोर्सेज, प्रॉडक्शन और सप्लाई चेन मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

एचटी मीडिया को जॉइन करने से पूर्व सक्सेना ‘ऑयशर’ (Eicher), ‘पेप्सिको’ (Pepsico) और ‘परफेटी’ (Perfetti) जैसी कंपनियों में बड़ी जिम्मेदारी संभाल चुके थे। उन्होंने बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी।

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नई पीढ़ी के जज्बातों का 'आईना' है वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन का यह उपन्यास

पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में लेखिका व वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन के नए उपन्यास का लोकार्पण किया गया

Last Modified:
Friday, 24 January, 2020
Jayanti Ranganathan

पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में लेखिका व वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन के नए उपन्यास 'एफ.ओ.जिंदगी’ (F.O. Zindagi) का लोकार्पण किया गया। इस उपन्यास का प्रकाशन वाणी प्रकाशन के उपक्रम नाइन बुक्स ने किया है। जयंती रंगनाथन का यह उपन्यास नई पीढ़ी के प्रेम, गेम और जिंदगी पर आधारित है। उपन्यास के लोकार्पण के मौके पर एफ.ओ. जिंदगी से मिलेनियल्स और जेनरेशन स्कॉवयर जेड का संबंध बताते हुए जयंती रंगनाथन का कहना था कि उनकी पीढ़ी और नई पीढ़ी की सोच अलग है।

लोकार्पण समारोह में प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर, लेखिका क्षमा शर्मा और एंकर व मीडियाकर्मी रितुल जोशी मौजूद थीं। क्षमा शर्मा ने उपन्यास के शीर्षक में शामिल एफओ शब्द को नई पीढ़ी के जीवन से जुड़ा बताया। वहीं, अशोक चक्रधर ने पुस्तक से संबंधित ‘फालतू ओवरसेंसिटव’ शब्द का महत्व बताया। रितुल जोशी का कहना था कि लेखिका ने बड़ी ही चतुराई से नई पीढ़ी के जज्बातों का वर्णन किया है। वाणी प्रकाशन की निर्देशक अदिति माहेश्वरी गोयल ने बताया कि नई पीढ़ी की जरूरतें और समझ कितनी तेजी से बदलती जा रही हैं।

प्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया का कहना था, ‘उपन्यास एफओ जिंदगी पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे किसी सुपर फास्ट गाड़ी में सफर पूरा किया है। इसकी कहानी थोड़े से किरदारों में गुंथी हुई है।पात्र नजदीक आने में देर नहीं लगाते तो दूर जाने में भी रफ्तार बनाये रहते हैं।इरा और गौरव का प्यार,विवाह और संघर्ष आज के प्रेमियों का जीवन चक्र लगता है।‘

उनका यह भी कहना था, ‘उपन्यास की त्वरा और ऊर्जा काबिले तारीफ है। हम आसानी से इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि अब वह समय आ गया है, जब हम साफ-साफ कह सकें कि हिंदी में कहानी लिखने वाले तो बहुत होंगे किंतु कहानी कहने वाले,जयंती रंगनाथन की तरह बिरले हैं।’ पाठकों ने भी इस उपन्यास के काफी बेहतरीन बताया।

ऐसी ही एक युवा पाठक अंजलि ने फेसबुक पर टिप्पणी करते हुए लिखा, ‘तेज भागती, भगाती एक बढ़िया किताब। कहीं दुनिया को भाड़ में झोंकते हीरो हीरोइन हैं, तो कहीं कई भाड़ से गुजरने के बाद अपना संतुलन तलाश करती जिंदगी। बिलकुल आज के युवाओं की तरह। किताब। ना फालतू इमोशनल करती है, ना लापरवाह होने देती है। ना अटकाती है, न अटकने देती है। ना टिककर रोने का समय देती है, ना खुलकर हंसने का। एक के बाद एक कुछ न कुछ होता चला जाता है, बिल्कुल जिंदगी की तरह। ये किताब फास्ट ट्रैक पर भागते कुछ युवाओं की दौड़ है, जिसमें कुछ उनके अपने कंट्रोल में है तो बहुत कुछ आउट ऑफ कंट्रोल। बेहद आसान भाषा में युवा मन को भी खूब पकड़ा है, जो इस किताब की यूएसपी है। समझदारों को इति, श्रुति या गौरव, तीनों ही मूर्ख लगे।लगते रहें, उन्हें किसकी परवाह। यही उनकी क्रांति है, जो देर सवेर अपना संतुलन भी ढूंढ़ लेती है।

इस उपन्यास की कीमत 299 रुपए है। अमेजॉन पर किंडल और पेपर बैक संस्करण दोनों उपलब्ध हैं। अमेजॉन पर इस उपन्यास को ऑर्डर करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं।

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