हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष: पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का खास लेख

हिंदी अखबार के 190 साल पूरे हो गए। हर साल हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाकर रस्म अदा करते हैं...

Last Modified:
Tuesday, 30 May, 2017
Samachar4media

प्रमोद जोशी 

वरिष्ठ पत्रकार  ।। 

हिंदी अखबार के 191 साल पूरे हो गए। हर साल हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाकर रस्म अदा करते हैं। हमें पता है कि कानपुर से कोलकाता गए किन्हीं पं. जुगल किशोर शुक्ल ने उदंत मार्तंड’ अखबार शुरू किया था। यह अखबार बंद क्यों हुआउसके बाद के अखबार किस तरह निकलेइन अखबारों की और पत्रकारों की भूमिका जीवन और समाज में क्या थीइस बातों पर अध्ययन नहीं हुए। आजादी के पहले और आजादी के बाद उनकी भूमिका में क्या बदलाव आयाइस पर भी रोशनी नहीं पड़ी। आज ऐसे शोधों की जरूरत हैक्योंकि पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण दौर खत्म होने के बाद एक और महत्वपूर्ण दौर शुरू हो रहा है।

अखबारों से अवकाश लेने के कुछ साल पहले और उसके बाद हुए अनुभवों ने मेरी कुछ अवधारणाओं को बुनियादी तौर पर बदला है। सत्तर का दशक शुरू होते वक्त जब मैंने इसमें प्रवेश किया थातब मन रुमानियत से भरा था। जेब में पैसा नहीं थेपर लगता था कि दुनिया की नब्ज पर मेरा हाथ है। रात के दो बजे साइकिल उठाकर घर जाते समय ऐसा लगता था कि जो जानकारी मुझे है वह हरेक के पास नहीं है। हम दुनिया को शिखर पर बैठकर देख रहे थे। हमसे जो भी मिलता उसे जब पता लगता कि मैं पत्रकार हूं तो वह प्रशंसा-भाव से देखता था। उस दौर में पत्रकार होते ही काफी कम थे। बहुत कम शहरों से अखबार निकलते थे। टीवी था ही नहीं। सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले या इंटरवल में फिल्म्स डिवीजन के समाचार वृत्त दिखाए जाते थेजिनमें महीनों पुरानी घटनाओं की कवरेज होती थी।

विजुअल मीडिया का मतलब तब कुछ नहीं था। पर हम शहरों तक सीमित थे। कस्बों में कुछ अंशकालिक संवाददाता होते थेजो अक्सर शहर के प्रतिष्ठित वकीलअध्यापकसमाज-सेवी होते थे। आज उनकी जगह पूर्णकालिक लोग आ गए हैं। रॉबिन जेफ्री की किताब इंडियाज न्यूजपेपर रिवॉल्यूशन’ सन 2000 में प्रकाशित हुई थी।

इक्कीसवीं सदी के प्रवेश द्वार पर आकर किसी ने संजीदगी के साथ भारतीय भाषाओं के अखबारों की खैर-खबर ली। पिछले दो दशक में हिंदी पत्रकारिता ने काफी तेजी से कदम बढ़ाए। मीडिया हाउसों की सम्पदा बढ़ी और पत्रकारों का रसूख। इंडियन एक्सप्रेस की पावरलिस्ट में मीडिया से जुड़े नाम कुछ साल पहले आने लगे थे। शुरुआती नाम मालिकों के थे। फिर एंकरों के नाम जुड़े। अब हिंदी एंकरों को भी जगह मिलने लगी है। पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि पत्रकारों को लेकर जिस प्रशंसा-भाव’ का जिक्र मैंने पहले किया हैवह कम होने लगा है।

रॉबिन जेफ्री ने किताब की शुरुआत करते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि अखबारी क्रांति ने एक नए किस्म के लोकतंत्र को जन्म दिया है। उन्होंने 1993 में मद्रास एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश की अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है। उनका एक सहयात्री एक पुलिस इंस्पेक्टर था। बातों-बातों में अखबारों की जिक्र हुआ तो पुलिस वाले ने कहाअखबारों ने हमारा काम मुश्किल कर दिया है। पहले गांव में पुलिस जाती थी तो गांव वाले डरते थे। पर अब नहीं डरते। बीस साल पहले वह बात नहीं थी। तब सबसे नजदीकी तेलुगु अखबार तकरीबन 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा से आता था। सन 1973 में ईनाडु का जन्म भी नहीं हुआ थापर 1993 में उस इंस्पेक्टर के हल्के में तिरुपति और अनंतपुर से अखबार के संस्करण निकलते थे।

सेवंती नायनन ने हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड’ में ग्रामीण क्षेत्रों के संवाद संकलन का रोचक वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्र में अखबार से जुड़े कई काम एक जगह पर जुड़ गए। सेल्सविज्ञापनसमाचार संकलन और रिसर्च सब कोई एक व्यक्ति या परिवार कर रहा है। खबर लिखी नहीं एकत्र की जा रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कांकेर-जगदलपुर हाइवे पर पड़ने वाले गांव बानपुरी की दुकान में लगे साइनबोर्ड का जिक्र किया हैजिसमें लिखा है- आइए अपनी खबरें यहां जमा कराइए।’ यह विवरण करीब पन्द्रह साल पहले का है। आज की स्थितियां और ज्यादा बदल चुकी हैं। कवरेज में टीवी का हिस्सा बढ़ा है। और उसमें कुछ नई प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ है।

दो साल मुझे आगरा में एक समारोह में जाने का मौका मिलाजहां इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े ऐसे पत्रकार मिलेजिन्हें उनका संस्थान वेतन नहीं देताबल्कि कमाकर लाने का वचन लेता है और बदले में कमीशन देता है। इनसे जुड़े पत्रकार किसी संस्थान से पत्रकारिता की डिग्री लेकर आते हैं। वे अफसोस के साथ पूछते हैं कि हमारे पास विकल्प क्या हैखबरों के कारोबार की कहानियां बड़ी रोचक और अंतर्विरोधों से भरी हैं। इनके साथ लोग अलग-अलग वजह से जुड़े हैं। इनमें ऐसे लोग हैंजो तपस्या की तरह कष्ट सहते हुए खबरों को एकत्र करके भेजते हैं। नक्सली खौफसामंतों की नाराजगीऔर पुलिस की हिकारत जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार हैं। और ऐसे भी हैंजो टैक्सी चलाते हैंरास्ते में कोई सरकारी मुलाजिम परेशान न करे इसलिए प्रेस का कार्ड जेब में रखते हैं। ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की आड़ में वसूलीब्लैकमेलिंग और दूसरे अपराधों को चलाते हैं।

अखबारों ने गांवों तक प्रवेश करके लोगों को ताकतवर बनाया। पाठकों के साथ पत्रकार भी ताकतवर बने। पत्रकारों का रसूख बढ़ा हैपर सम्मान कम हुआ है। वह प्रशंसा-भाव’ बढ़ने के बजाय कम क्यों हुआरॉबिन जेफ्री की ट्रेन यात्रा के 23 साल बाद आज कहानी और भी बदली है। मोरल पुलिसिंगखाप पंचायतोंजातीय भेदभावों और साम्प्रदायिक विद्वेष के किस्से बदस्तूर हैं। इनकी प्रतिरोधी ताकतें भी खड़ी हुई हैंजो नई पत्रकारिता की देन हैं। लोगों ने मीडिया की ताकत को पहचाना और अपनी ताकत को भी। मीडिया और राजनीति के लिहाज से पिछले सात साल गर्द-गुबार से भरे गुजरे हैं। इस दौरान तमाम नए चैनल खुले और बंद हुए।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए। खासतौर से अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान यह बात भी कही गई कि भ्रष्ट-व्यवस्था में मीडिया की भूमिका भी है। लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा। पर मीडिया व्यवस्था का हिस्सा है और कारोबार भी। पत्रकारिता औद्योगिक क्रांति की देन है।

मार्शल मैकलुहान इसे पहला व्यावसायिक औद्योगिक उत्पाद मानते हैं। अखबार नबीसी के वजूद में आने की दूसरी वजह है लोकतंत्र। वह भी औद्योगिक क्रांति की देन है। यह औद्योगिक क्रांति अगली छलांग भरने जा रही हैवह भी हमारे इलाके में। पर हम इसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को पढ़ नहीं पा रहे हैं। अखबार हमारे पाठक का विश्वकोश है। वह पाठक जमीन से आसमान तक की बातों को जानना चाहता हैहम उसे फैशन परेड की तस्वीरेंपार्टियांमस्ती वगैरह पेश कर रहे हैं। वह भी उसे चाहिएपर उससे ज्यादा की उसे जरूरत है।

एक जमाना था जब पाठकों के लिए अखबार में छपा पत्थर की लकीर होता था। पाठक का गहरा भरोसा उस पर था। भरोसे का टूटना खराब खबर है। पाठकदर्शक या श्रोता का इतिहास-बोधसांस्कृतिक समझ और जीवन दर्शन गढ़ने में हमारी भूमिका है। यह भूमिका जारी रहेगीक्योंकि लोकतंत्र खत्म नहीं होगा।  


 

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हिंदी अखबारों के सामने जनसरोकार की पत्रकारिता बड़ी चुनौती है: वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी

एक तो हिंदी अखबारों ने जनसरोकार की पत्रकारिता करना बंद कर दिया है, लोगों से जुड़े मुद्दे उठाना बंद कर दिया है...

Last Modified:
Tuesday, 30 May, 2017
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आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधान संपादक

प्रभात खबर ।।

एक तो हिंदी अखबारों ने जनसरोकार की पत्रकारिता करना बंद कर दिया है, लोगों से जुड़े मुद्दे उठाना बंद कर दिया है। दूसरी बड़ी चुनौती है कि हिंदी अखबारों में विषयों की विविधता का अभाव है।

दो उदाहरण देना चाहूंगा। चीन ने हाल में वन रोड, वन बेल्ट जैसा सम्मेलन आयोजित किया। इसे इस सदी की सबसे बड़ी आर्थिक कूटनीतिक पहल माना जा रहा है। 2.5 खरब डॉलर की यह योजना यदि सिरे चढ़ गई तो इससे एशिया, यूरोप और अफ्रीका की 4.4 अरब आबादी प्रभावित होगी। भारत ने इसमें हिस्सा नहीं लिया, उसके अपने कारण हैं। लेकिन हिंदी अखबारों में इस विषय पर कोई बहस नहीं हो रही, पाठकों को कोई विशेष सामग्री नहीं दी जा रही। यह हम सबसे जुड़ी खबर है।

रैनसमवेयर वायरस का दुनिया भर के कंप्यूटर पर हमला हुआ। यह अब तक का सबसे बड़ा वायरस हमला माना गया। लगभग 150 देश इस वायरस से प्रभावित हुए। इससे कुछ देशों की स्वास्थ्य सेवाएं, तो कुछ की रेल व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। भारत में तकनीक का इस्तेमाल कितना बढ़ गया है, हम सब इससे परिचित हैं। हमारी बैंकिंग और रेल प्रणाली पूरी तरह से नेटवर्क पर आधारित है। इनमें से कोई भी व्यवस्था यदि थोड़ी सी भी प्रभावित हो जाए तो पूरे देश में हाहाकार मच जाए। हिंदी अखबार इस पर विशेष चर्चा नहीं करते।

यह सच है कि हिंदी पत्रकारों की राजनीति समझ कहीं अधिक है। इसका प्रभाव यह रहता है कि हिंदी अखबारों में राजनीतिक टिप्पणियों की भरमार रहती है, लेकिन नए विषयों पर सामग्री की भारी कमी रहती है।


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हिंदी अखबारों के लिए विश्वसनीयता बचाना ही चुनौती है: राजीव सचान, एसोसिएट एडिटर, दैनिक जागरण

आज भी देश की बड़ी आबादी हिंदी भाषा ही समझती है, ऐसे में हिंदी मीडिया विशेषकर हिंदी अखबार ही उनके लिए सूचना पाने का जरिया होते हैं...

Last Modified:
Tuesday, 30 May, 2017
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अभिषेक मेहरोत्रा ।।

आज भी देश की बड़ी आबादी हिंदी भाषा ही समझती है, ऐसे में हिंदी मीडिया विशेषकर हिंदी अखबार ही उनके लिए सूचना पाने का जरिया होते हैं। ऐसे में आज के टीवी और सोशल मीडिया के दौर में हिंदी अखबार ही अपनी विश्वसनीयता के चलते अभी भी समाज में अपनी अहम जगह बनाए हुए हैं। दिल्ली, मुंबई जैसे कुछ शहरों में अंग्रेजी अखबारों को महत्व मिलता है पर आज भी नब्बे फीसदी देश भाषाई मीडिया पर ही निर्भर रहता है।

छपे हुए शब्दों पर लोगों का विश्वास हमेशा ही रहा है और रहेगा। आज भी कई सूचनाओं के लिए लोग अखबार की कटिंग सहेजकर रखते हैं। ये दर्शाता है कितनी विश्वसनीयता के साथ पाठक आप पर भरोसा करते हैं।

आज गांव, कस्बों में जिस तरह हिंदी अखबारों का चलन बढ़ रहा है, वो दर्शाता है कि टीवी, ऑनलाइन मीडिया या अन्य साधन उसे कोई चुनौती नहीं दे पा रहे हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में कई अपुष्ट खबरें जिस तरह मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा बन रही हैं, ऐसे में हिंदी अखबारों को उनसे बचके रहना होगा। क्योंकि हिंदी अखबारों का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। इसलिए इस दौर में हिंदी अखबारों के लिए अपनी विश्वसनीयता को हर कीमत पर बचाना ही एक चुनौती है।


 

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हिंदी पत्रकारों को इस समय का फायदा उठाना चाहिए, बोले हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक(हिंदी)

मेरा मानना है कि हिंदी पत्रकारिता मजबूत तौर पर खड़ी है और कहीं भी इसके सर्वाइवल पर कोई सवाल नहीं है

Last Modified:
Tuesday, 30 May, 2017
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अभिषेक मेहरोत्रा ।।

मेरा मानना है कि हिंदी पत्रकारिता मजबूत तौर पर खड़ी है और कहीं भी इसके सर्वाइवल पर कोई सवाल नहीं है। पर महत्वपूर्ण ये है कि आप कितने फोकस के साथ काम करते हैं। कंटेंट पर ध्यान हमेशा ही देना होगा क्योंकि भाषा एक माध्यम है पर असल मसला पाठकों को लिए बढ़िया कंटेंट उपलब्ध कराने का है। साथ ही कंटेंट की प्रजेंटेशन पर भी काम करना होगा क्योंकि सबसे अहम है कि आप कितने सरल तरीके से अपनी बात पाठकों तक पहुंचा पाते हैं।

हिंदी पत्रकारों को कंटेंट के चयन पर ध्यान देते हुए ये भी देखना होगा कि उनकी किसी खबर या सूचना से आम पाठक के जीवन पर किस तरह प्रभाव पड़ता है। आज पत्रकारों को पाठक के सशक्तिकरण पर भी ध्यान देना होगा चाहे वे आर्थिक हो या सामाजिक।

आज भी देश में सबसे ज्यादा बोली, लिखी और समझी जाने वाली भाषा है हिंदी। लगातार उसकी ग्रोथ भी बढ़ रही है। ये दौर डिजिटल ट्रांसफोर्मेशन का है और आज टेक्नॉलजी ने हिंदी पत्रकारों को भी खूब सशक्त कर दिया है, ऐसे में हिंदी पत्रकारों को तकनीक के इस समय का फायदा उठाते हुए हिंदी पत्रकारिता को निरंतर प्रगति के पथ पर ले जाना होगा।

साथ ही हिंदी मीडिया को आर्थिक तौर पर सशक्त होना ही होगा। अच्छा कंटेंट आज भी आपको मार्केट से अच्छा रेवेन्यु दिलाने में सहायक होता है। इसलिए कंटेंट इज किंग, ये मूलमंत्र है।


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'अखबार आज पाठक की जरूरत नहीं बल्कि आदत की वजह से खरीदा जाता है’

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। आज हिंदी का ह्रास और पत्रकारिता का अवमूल्यन हो रहा है। अखबार आज पाठक की जरूरत नहीं बल्कि आदत की वजह से खरीदा जाता है। ये बात हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए जाने-माने टिप्पणीकार, पद्मश्री प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कही। संगोष्ठी में मुख्य वक

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Wednesday, 01 June, 2016
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। आज हिंदी का ह्रास और पत्रकारिता का अवमूल्यन हो रहा है। अखबार आज पाठक की जरूरत नहीं बल्कि आदत की वजह से खरीदा जाता है। ये बात हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए जाने-माने टिप्पणीकार, पद्मश्री प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कही। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के तौर पर जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कहा कि वर्तमान में मीडिया की विश्वसनीयता घट रही है, जो कि चिन्तनीय है। यह लड़ाई अकेले पत्रकार की नही है बल्कि इसके लिए पूरे समाज को बदलना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदी अखबारों में धीरे-धीरे पाठ्य सामग्री भी कम हो रही है, इससे हिंदी पत्रकारिता को नुकसान हो रहा है। प्रो.पंत ने हिंदी अखबारों में अंग्रेजी के लेखकों के अनुदित कॉलम पर भी सवाल उठाए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर नागेश्वर राव ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता को पाठकों को भी ध्यान में रखकर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो समाचार पत्र पाठकों के अनुरूप नही ढल पाए वह सफल नही हो सके, इसलिए समाचार पत्र को पाठकों के अनुरूप चलना चाहिए। प्रो. राव ने कहा कि दूरस्थ्य शिक्षा ने हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में काफी सहयोग दिया है। दूरस्थ्य शिक्षा कम पैसे में बेहतर शिक्षा देने का प्रयास कर रही है। पत्रकारिता विभाग के निदेशक प्रो. गोविन्द सिंह ने हिंदी पत्रकारिता दिवस के महत्व के बारे बताया। उन्होंने कहा कि आज समाचार पत्रों का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन उस विस्तार को संभाल पाने की हमारी तैयारी नही है। साथ ही चुनौतिया भी कहीं अधिक बढ़ी हैं और व्यावसायीकरण हावी हो गया है। कार्यक्रम में ‘हिन्दुस्तान’ अखबार के स्थानीय संपादक योगेश राणा ने कहा कि आज हिंदी भाषी राज्यों में पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ रही है, जो कि चिन्ताजनक है। उन्होंने कहा कि अखबारों का स्वरूप बदल रहा है अखबार से साहित्य संस्कृति खत्म हो रही है। हमें न्यू मीडिया के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए। संगोष्ठी के दौरान ‘अमर उजाला’ के संपादक अनूप वाजपेयी ने कहा कि इस दिवस को उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। नई चुनौतियों के साथ नया एजेंडा तय करना चाहिए। उन्होंने कहा पत्रकारिता एक कठिन विधा है इसमें पककर जो तैयार होते है, वह ही सफल पत्रकार बन पाते है। वहीं ‘आधारशिला’ पत्रिका के संपादक दिवाकर भट्ट ने कहा कि आज की पत्रकारिता की व्यवसायिक चुनौतियां है, हमें लोगों का विश्वास कायम रखना है तो निष्पक्ष पत्रकारिता करनी होगी। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में अध्यापक और पत्रकारगण मौजूद थे।   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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न रुकी, न रुकेगी हिंदी पत्रकारिता: शशि शेखर, प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान

‘लोकतंत्र के लिए जितनी जरूरी स्वस्थ राजनीति है, उतनी ही जरूरत स्वतंत्र पत्रकारिता की है। अपनी इस आजादी के लिए हम जूझते आए हैं, आगे भी जूझते रहेंगे। कुछ दिक्कतें जरूर हैं, पर रास्ते की दुश्वारियों की न हमारे पुरखों ने परवाह की, न हम करेंगे।’ हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान अखबार के समूह सं

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Monday, 30 May, 2016
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‘लोकतंत्र के लिए जितनी जरूरी स्वस्थ राजनीति है, उतनी ही जरूरत स्वतंत्र पत्रकारिता की है। अपनी इस आजादी के लिए हम जूझते आए हैं, आगे भी जूझते रहेंगे। कुछ दिक्कतें जरूर हैं, पर रास्ते की दुश्वारियों की न हमारे पुरखों ने परवाह की, न हम करेंगे।’ हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान अखबार के समूह संपादक शशि शेखर का। हिंदी पत्रकारिता पर उनका ये आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं: न रुकी, न रुकेगी हिंदी पत्रकारिता shashi-shekharआज ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ है, अत: ये चंद पंक्तियां राजदेव रंजन और उन जैसे जुझारू पत्रकारों के नाम, जिनकी वजह से हिंदी पत्रकारिता की मशाल आज तक रोशन है। इसे बुझाने की हजारों बार कोशिशें हुईं, पर जिस तरह सूरज उगना बंद नहीं हुआ, जिस तरह अंधेरे से लड़ने की जरूरत खत्म नहीं हुई, जिस तरह बेईमानी के घटाटोप में ईमानदारी चमकती है, जिस तरह अवश्यंभावी मौत के बावजूद इंसानियत अपने रास्ते चलती रहती है, उसी तरह हिंदी पत्रकारिता भी अपना सफर तय करती आई है, आगे भी करती रहेगी। पिछले 15 दिनों में हिन्दुस्तान के साथियों ने कठिन दिन-रात देखे। हर सहयोगी ऐसा महसूस कर रहा था, जैसे उसके घर से कोई अपना चला गया हो। मीडिया की बिरादरी में भी ऐसी एकजुटता कभी नहीं देखी गई। इस दौरान व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता की दीवारें ढह गईं। भाषाई विभेद खत्म हो गए। राष्ट्रीयता की गहरी लकीरें तक हल्की पड़ गईं। विदेशी मीडिया ने न केवल इसे ‘कवर’ किया, बल्कि हर तरह से अपनी गहरी संवेदना जाहिर की। बिहार के जागृत लोगों ने इन दिनों लगातार हमें ढाढ़स बंधाया। जगह-जगह प्रदर्शन हुए। लोगों ने हमारे दफ्तरों में इकट्ठा होकर सहयोग का आश्वासन दिया। दर्जनों संवेदनशील लोग राजदेव के गांव पहुंचे। उनके परिवार की जो क्षति हुई है, उसे जस-का-तस तो नहीं भरा जा सकता, पर हर तबके ने जिस तरह उन्हें संबल दिया, वह अपने आप में मिसाल है। कौन कहता है कि पत्रकारिता और पत्रकारों के प्रति लोगों की आस्था खत्म हो गई है? इस तरह की आशंकाओं की आड़ में दुकानदारी करने वाले जरा बीते पखवाड़े की हलचल पर गौर फरमाएं। उन्हें पता चल जाएगा कि वे कितनी गैर-जिम्मेदाराना बातें करते आए हैं! बिहार पुलिस ने इसी बीच पांच लोगों को गिरफ्तार कर दावा किया कि हत्यारे, उनके सहभागी और वारदात में प्रयुक्त हथियार बरामद कर लिया गया है। हत्याकांड का सूत्रधार लड्डन मियां इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पकड़ से बाहर है। पटना में प्रेस कांफ्रेंस करने वाले पुलिस के आला अधिकारी यह नहीं बता सके कि लड्डन मियां ने राजदेव का खून क्यों करवाया? इस हत्या का मकसद क्या था? जाहिर है, अभी काम अधूरा है। उसे बिहार पुलिस पूरा करेगी या सीबीआई? लाखों लोग इस सवाल के जवाब के लिए सत्ता सदन का मुंह जोह रहे हैं। उम्मीद है, इन प्रश्नों के उत्तर तर्कों की कसौटी पर इतने खरे होंगे कि उन्हें जनता और अदालत, दोनों की स्वीकृति हासिल होगी। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अब तक जो हत्याकांड जनचर्चा का विषय बने, वे कुतर्कों के अंधियारे में गुम हो गए। आज तक तय नहीं हो पाया कि आरुषि तलवार को किसने मारा? नेपाल के राजघराने का हत्याकांड किसने और क्यों रचा? अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी को मारने वाला ली. हार्वे ओसवाल्ड वाकई हत्यारा था या नहीं? मैं आपको यह सब इसलिए याद दिला रहा हूं, क्योंकि पूरी दुनिया की जांच एजेंसियां भटकने और भटकाने की अभ्यस्त हैं। इस दौरान सहिष्णु बनाम असहिष्णु की बहस करने वाले वे सूरमा बहुत याद आए, जो बात-बेबात फैन्सी कपड़ों में ‘कैंडल मार्च’ निकालने के अभ्यस्त हैं। बिहार के एक कस्बाई शहर के हिंदी पत्रकार का खून उनकी नजर में पानी है, क्योंकि वह भदेस है! ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे। अब हिंदी पत्रकारिता की दशा-दिशा पर आते हैं। मैं उन लोगों में शामिल हूं, जिन्होंने तकनीकी को बड़ी तेजी से बदलते हुए देखा है। 1980 के दशक में खबरें कभी-कभी तीन दिन पुरानी छपा करती थीं। वजह? वे बस, ट्रेन या टैक्सी से आती थीं। जिलों के संवाददाता आमतौर पर पत्रकारिता के अलावा जीवन-यापन के लिए कुछ और भी करते थे। इसीलिए एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पत्रकार और पत्रकारिता, दोनों अंशकालिक गति को प्राप्त थे। यह वह नामुराद जमाना था,  जब फैक्स, कंप्यूटर, मोबाइल किसी के सपने में भी नहीं आते। एसटीडी की सुविधा हासिल हो तो गई थी, पर दूसरे शहर में ‘कनेक्ट’ करने में घंटों लग जाते। मुगलकालीन कबूतरों से तब तक के संसाधनों का सफर शताब्दियों में तय हुआ था- खरामा, खरामा! उन दिनों अगर आपको विदेश से खबर भेजनी हो, तो बस रब राखा। मैंने खुद परदेस से पहली रिपोर्ट ‘टेलेक्स’ से भेजी थी। काउंटर के दूसरी तरफ बैठा ‘गोरा’ नंबर मिलाते-मिलाते झुंझला गया था। मेरी परवाह किए बिना वह बड़बड़ाया था- ‘उफ्फ, ये इंडिया!’ उसकी बेकली और मेरी बेबसी मुझे शर्मसार कर गई थी। ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ विकसित देशों से पिछड़े हुए थे। दक्षिणी राज्य भी हिंदीभाषी प्रदेशों से आगे थे। 1980 के दशक में वहां कंप्यूटर क्रांति हो रही थी, जबकि उत्तर के लोग ‘एसटीडी युग’ में जी रहे थे। मोबाइल फोन की आमद ने हमें यकायक अपने दक्षिण भारतीय दोस्तों के बराबर ला खड़ा किया। पिछली दो सदियों में अगर रेल, हवाई जहाज और बिजली ने मानवता के लिए नए द्वार खोले, दुनिया एक-दूसरे के पास आई, तो इंटरनेट अब सारे विभेद समाप्त कर रहा है। इसने ज्ञान पाने और बांटने के तमाम खिड़की-दरवाजों को खोल दिया है। अब यह आपके ऊपर है कि आप इसकी गति से कितना तारतम्य बैठा पाते हैं? सुखद बात यह है कि संसार के सर्वाधिक उन्नत देश भारतीय भाषा-भाषियों को कई मायनों में अपने से बेहतर पा रहे हैं। कुछ महीने पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल  के मुख्यालय में मैंने एक हफ्ता गुजारा था। वहां हर प्रशिक्षण सत्र के बाद अनौपचारिक इम्तिहान लिया जाता। उसमें सर्वाधिक तालियां भारतीय और चीनी प्रतिनिधि को मिलीं। संयोगवश वहां अकेला हिन्दुस्तानी मैं था। उस दौरान हर शाम हम अमेरिका व यूरोप के पत्रकारों के साथ बैठते और सुनकर खुशी होती कि तकनीकी से तारतम्य के मामले में आप भारतीयों का जवाब नहीं। चीन से आई एक महिला संपादक की भी यही राय थी। हमने सदियों की इस विपन्नता को सिर्फ तीन दशकों में पाटा है। प्रिंट मीडिया के अवसान की चर्चाओं के बीच यह शुभ संकेत है। कुछ खत्म हो या कुछ नया आ जाए, हिंदी और हिन्दुस्तानी भाषाओं के पत्रकार उसके लिए तत्पर हैं। खबरें पाठकों तक पहुंचाने के साधन बदल सकते हैं, पर इससे पत्रकारिता खत्म नहीं होने जा रही। कैसे? बताता हूं। हिन्दुस्तान टाइम्स में मेरे एक सहयोगी हैं- निकोलस डावेस। वह दक्षिण अफ्रीकी ‘अंग्रेज’ हैं और ‘न्यूज मीडिया’ के बारे में गहरी समझ रखते हैं। मैं उन्हें बिहार के शहरों और गांवों में ले गया। वह यह देखकर हैरान थे कि हमारे साथी किस तरह संपादकीय सामग्री भेजने के लिए खस्ताहाल नेटवर्क के बावजूद मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। निक ने लौटते समय कहा कि आपके लोग ‘प्रोग्रेस हंगरी’ यानी गजब के प्रगतिकामी हैं। हिंदी पत्रकारिता को अब वैश्विक होने से कोई नहीं रोक सकता। 4-जी के प्रसार और ‘डिजिटल हाइवेज’ की आमद हमारे लिए नए अवसर खोलने जा रही है। यहां एक यक्ष प्रश्न सिर उठाता है। क्या हमारे हुक्मरां इस सच को समझते हैं? हिंदी पत्रकारों के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने की बजाय वे उनका रास्ता रोकने में लगे हैं। लोकतंत्र के लिए जितनी जरूरी स्वस्थ राजनीति है, उतनी ही जरूरत स्वतंत्र पत्रकारिता की है। अपनी इस आजादी के लिए हम जूझते आए हैं, आगे भी जूझते रहेंगे। कुछ दिक्कतें जरूर हैं, पर रास्ते की दुश्वारियों की न हमारे पुरखों ने परवाह की, न हम करेंगे। (साभार: हिन्दुस्तान)   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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क्या यही हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ है?

आनंद प्रधान ।। क्या 188 साल की भरी-पूरी उम्र में कई उतार-चढ़ाव देख चुकी हिंदी पत्रकारिता का यह ‘स्वर्ण युग’ है? जाने-माने संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने बहुत पहले 8

Last Modified:
Monday, 30 May, 2016
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आनंद प्रधान ।। anand_pradhanक्या 188 साल की भरी-पूरी उम्र में कई उतार-चढ़ाव देख चुकी हिंदी पत्रकारिता का यह ‘स्वर्ण युग’ है? जाने-माने संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने बहुत पहले 80-90 के दशक में ही यह ऐलान कर दिया था कि यह हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्ण युग’ है। बहुतेरे और भी संपादक और विश्लेषक इससे सहमत हैं। उनका तर्क है कि आज की हिंदी पत्रकारिता हिंदी न्यूज मीडिया उद्योग के विकास और विस्तार के साथ पहले से ज्यादा समृद्ध हुई है। उसके प्रभाव में वृद्धि हुई है। वह ज्यादा प्रोफेशनल हुई है, पत्रकारों के विषय और तकनीकी ज्ञान में वृद्धि हुई है, विशेषज्ञता के साथ उनके वेतन और सेवाशर्तों में उल्लेखनीय सुधार आया है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ के पक्षधरों के मुताबिक, न्यूज चैनलों की लोकप्रियता, विस्तार और प्रभाव ने बची-खुची कसर भी पूरी कर दी है क्योंकि वहां हिंदी न्यूज चैनलों का ही बोलबाला है। हिंदी न्यूज चैनलों और कुछ बड़े हिंदी अखबारों के संपादक/एंकर आज मीडिया जगत के बड़े स्टार हैं। उनकी लाखों-करोड़ों में सैलरी है। इसके अलावा हिंदी न्यूज चैनलों के आने से पत्रकारों के वेतन बेहतर हुए हैं। उनका यह भी कहना है कि दीन-हीन और खासकर आजादी के बाद सत्ता की चाटुकारिता करनेवाली हिंदी पत्रकारिता के तेवर और धार में भी तेजी आई है। आज वह ज्यादा बेलाग और सत्ता को आईना दिखानेवाली पत्रकारिता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इनमें से कई दावे और तथ्य सही हैं लेकिन उन्हें एक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की जरूरत है। इनमें से कई दावे और तथ्य 1977 से पहले की हिंदी पत्रकारिता की तुलना में बेहतर दिखते हैं लेकिन वे तुलनात्मक हैं। दूसरे, इनमें से अधिकतर दावे और तथ्य हिंदी मीडिया उद्योग के ‘स्वर्णकाल’ की पुष्टि करते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि वे हिंदी पत्रकारिता के बारे में भी उतने ही सच हों। क्या हिंदी अखबारों का रंगीन होना, ग्लासी पेपर, बेहतर छपाई और उनका बढ़ता सर्कुलेशन या हिंदी चैनलों के प्रभाव और ग्लैमर को हिंदी पत्रकारिता के बेहतर होने का प्रमाण माना जा सकता है? हिंदी पत्रकारिता को पहचान देनेवाले बाबूराव विष्णुराव पराडकर के आजादी के पहले दिए गए ‘आछे दिन, पाछे गए’ वाले मशहूर भाषण को याद कीजिए जिसमें उन्होंने आज से कोई 75 साल पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि भविष्य के अखबार ज्यादा रंगीन, बेहतर कागज और छपाई वाले होंगे लेकिन उनमें आत्मा नहीं होगी। सवाल यह है कि जिसे पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ बताया जाता है, उसके कई उल्लेखनीय और सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करने के बावजूद क्या यह सही नहीं है कि उसमें आत्मा नहीं है? अंग्रेजी के मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने कभी एक अच्छे अखबार की परिभाषा करते हुए कहा था कि, ‘अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता है।’ सवाल यह है कि क्या हमारे आकर्षक-रंगीन-प्रोफेशनल अखबारों और न्यूज चैनलों में देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है? क्या आज की हिंदी पत्रकारिता में पूरा देश, उसकी चिंताएं, उसके सरोकार, उसके मुद्दे और विचार दिखाई या सुनाई देते हैं? कितने हिंदी के अखबार/चैनल या उनके पत्रकार पूर्वोत्तर भारत, कश्मीर, उड़ीसा, दक्षिण भारत और पश्चिम भारत से रिपोर्टिंग कर रहे हैं? उसमें देश की सांस्कृतिक, एथनिक, भाषाई, जाति-वर्ग, धार्मिक विविधता और विचारों, मुद्दों, सरोकारों की बहुलता किस हद तक दिखती है? मुख्यधारा की यह हिंदी पत्रकारिता कितनी समावेशी और लोकतांत्रिक है? तात्पर्य यह कि उसमें भारतीय समाज के विभिन्न हिस्सों खासकर दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की कितनी भागीदारी है? क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का ऐलान करते हुए यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि हिंदी क्षेत्र के कितने जिला मुख्यालयों पर पूर्णकालिक महिला पत्रकार काम कर रही हैं? कितने हिंदी अखबारों और चैनलों की संपादक महिला या फिर दलित या अल्पसंख्यक हैं? क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का मतलब सिर्फ पुरुष और वह भी समाज के अगड़े वर्गों से आनेवाले पत्रकार हैं? यही नहीं, हिंदी अखबारों और चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों के वेतन और सेवाशर्तों में सुधार का ‘स्वर्णयुग’ सिर्फ चुनिंदा अखबारों/चैनलों और उनके मुठ्ठी भर पत्रकारों तक सीमित है। कड़वी सच्चाई यह है कि छोटे-मंझोले से लेकर देश के सबसे ज्यादा पढ़े/देखे जानेवाले अखबारों/चैनलों के हजारों स्ट्रिंगरों के वेतन और सेवाशर्तों में कोई सुधार नहीं आया है। वह अभी भी अंधकार युग में हैं जहां बिना नियुक्ति पत्र, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के वे काम करने को मजबूर हैं। उन्हें सांस्थानिक तौर पर भ्रष्ट होने और दलाली करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनकी बदहाल हालत देखकर आप कह नहीं सकते हैं कि हिंदी अखबारों और चैनलों में बड़ी कॉरपोरेट पूंजी आई है, वे शेयर बाजार में लिस्टेड कम्पनियां हैं, उनके मुनाफे में हर साल वृद्धि हो रही है और वे ‘स्वर्णयुग’ में पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए हिंदी के बड़े अखबारों की मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में आनाकानी को ही लीजिए। उनका तर्क है कि इस वेतन आयोग के मुताबिक तनख्वाहें दी गईं तो अखबार चलाना मुश्किल हो जाएगा। अखबार बंद हो जाएंगे। सवाल यह है कि अखबार या चैनल स्ट्रिंगरों की छोड़िए, अपने अधिकांश पूर्णकालिक पत्रकारों को भी बेहतर और सम्मानजनक वेतन देने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? क्या यह एक बड़ा कारण नहीं है कि हिंदी अखबारों/चैनलों में बेहतरीन युवा प्रतिभाएं आने के लिए तैयार नहीं हैं? आप मानें या न मानें लेकिन यह सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता के कथित ‘स्वर्णयुग’ के बावजूद हिंदी क्षेत्र के कॉलेजों/विश्वविद्यालयों के सबसे प्रतिभाशाली और टॉपर छात्र-छात्राएं इसमें आने के लिए तैयार नहीं हैं या उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं है। दूसरी ओर, हिंदी अखबारों और चैनलों में बेहतर और सरोकारी पत्रकारिता करने की जगह भी दिन पर दिन संकुचित और सीमित होती जा रही है। आश्चर्य नहीं कि आज हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा संकट उसके पत्रकारों की वह प्रोफेशल असंतुष्टि है जो उन्हें सृजनात्मक और सरोकारी पत्रकारिता करने का मौका न मिलने या सत्ता और कॉरपोरेट के सामने धार और तेवर के साथ खड़े न होने की वजह से पैदा हुई है। हैरानी की बात नहीं है कि हिंदी पत्रकारिता के इस ‘स्वर्णयुग’ में पत्रकारों की घुटन बढ़ी है, उनपर कॉरपोरेट दबाव बढ़े हैं और पेड न्यूज जैसे सांस्थानिक भ्रष्ट तरीकों के कारण ईमानदार रहने के विकल्प में घटे हैं। यही नहीं, हिंदी पत्रकारिता की अपनी मूल पहचान भी खतरे में है। वह न सिर्फ अंग्रेजी के अंधानुकरण में लगी हुई है बल्कि उसकी दिलचस्पी केवल अपमार्केट उपभोक्ताओं में है। उसे उस विशाल हिंदी समाज की चिंताओं की कोई परवाह नहीं है जो गरीब हैं, हाशिए पर हैं, बेहतर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं चाहते हैं। लेकिन मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता को उसकी कोई चिंता नहीं है। (लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान में एसोशिएट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं। उनका एक ब्लॉग भी है: http://teesraraasta।blogspot।in/ )   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।
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