पत्रकार के लिए दिखने, बिकने और लिखने से भी ज्यादा जरूरी है ये बात: दीपक चौरसिया

बहुप्रतिष्ठित ‘एक्स1चेंज4मीडिया न्यूतज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को दिए...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 February, 2019
Last Modified:
Tuesday, 19 February, 2019
Deepak Chaurasia

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

बहुप्रतिष्ठित ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को दिए गए। इनबा के 11वां एडिशन के तहत नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में एक समारोह में ये अवॉर्ड्स दिए गए। कार्यक्रम से पहले आयोजित NewsNextConference के अंतगर्त कई पैनल डिस्कशन भी हुए, जिसके द्वारा लोगों को मीडिया के दिग्गजों के विचारों को सुनने का मौका मिला।

‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन’ के पूर्व जनरल सेक्रेटरी और फिल्म प्रड्यूसर भुवन लाल ने बतौर सेशन चेयर ‘Ratings, Propaganda& Perspective in front of editors while telling compelling stories’ विषय पर हुए एक पैनल डिस्कशन को मॉडरेट किया, इस पैनल डिस्कशन ‘इंडिया न्यूज’ के एडिटर-इन-चीफ दीपक चौरसिया, बीबीसी (इंडिया) के डिजिटल एडिटर मिलिंद खांडेकर, जी बिजनेस के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी और न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर दीप उपाध्याय शामिल हुए।

पैनल डिस्कशन की शुरुआत में दीपक चौरसिया  का कहना था कि जो घटना कश्मीर में घटी, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने कहा, ‘अभी भी जब मैं पैनल डिस्कशन के लिए आ रहा था, तब भी लोग सड़कों पर निकले हुए थे। उन लोगों ने हाथों में तिरंगा ले रखा था और वे इंसाफ के लिए नारे लगा रहे थे। सवाल ये है कि आप तटस्थ रहना चाहते हैं, लेकिन आपका दिल आपको तटस्थ नहीं रहने देता है। दिल ये कहता है कि आपको भी इस खबर के साथ इनवॉल्व होना है। लेकिन एक एडिटर के तौर पर एक ठीक खबर देना, उसके तमाम पक्षों को समझाना और प्रोपेगेंडा में न पड़ना मेरी नजर में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।’

दीपक चौरसिया ने कहा, ‘बतौर एडिटर मैं ये कहना चाहूंगा कि पुलवामा हमले के बाद हमारे न्यूज रूम में इस बात को लेकर चर्चा हुई कि कश्मीर के लोगों को हमें अपने पैनल में जगह देनी चाहिए या नहीं और मुझे ये जानकर बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ कि देश के ज्यादातर टीवी चैनलों ने पाकिस्तान के लोगों को बतौर एक्सपर्ट उस दिन अपने यहां जगह नहीं दी। क्योंकि हमें लगा कि वे जो भी बात कहेंगे, वो प्रोपेगेंडा के तहत होगी। हमने पाकिस्तान वालों की टोन हमेशा देखी है कि जब भी हिन्दुस्तान के अंदर कुछ ऐसा होता है और पाकिस्तान पर आरोप लगाए जाते हैं तो वे इसी बात से शुरुआत करते हैं कि आपने ही ऐसा करवा दिया होगा और आपके कारण ही ऐसा हुआ है, क्योंकि आपका काम ही पाकिस्तान पर बार-बार आरोप लगाना है। आपके पास कोई ऐसी छड़ी है जो सीधे पाकिस्तान को लगती है।’

दीपक चौरसिया का कहना था कि उस दिन तय किया गया कि किसी भी पाकिस्तानी पत्रकार को जगह नहीं दी जाएगी। जिन लोगों ने ऐसा किया भी था, उन्होंने भी अपने कदम वापस खींच लिए और किसी भी पाकिस्तानी पत्रकार अथवा पैनलिस्ट को जगह नहीं दी गई, क्योंकि हमें ये लगता था कि ये हमारा खुद का मामला है और चूंकि इतनी बड़ी शहादत हुई है और फोर्स पर इतना बड़ा हमला हुआ है, तो हमें किसी भी प्रोपेगेंडा में नहीं पड़ना है। हमें अपनी क्रेडिबिलिटी बनाकर रखनी है। किसी भी पत्रकार के लिए दिखना, बिकना और लिखना तो जरूरी है ही, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी उसकी क्रेडिबिलिटी मायने रखती है। ऐसे में अपनी क्रेडिबिलिटी को बचाए रखने के लिए हम सभी को समय-समय पर उसी के अनुसार निर्णय लेने होंगे।’

उनका कहना था कि दर्शक काफी समझदार हैं और वे चैनल खोलते ही पता लगा लेते हैं कि चैनल किस बात का प्रोपेगेंडा कर रहा है। हम जब भी जनता के बीच जाते हैं तो हमें बताया जाता है कि फलां चैनल तो सरकार के पक्ष में है और फलां चैनल उसका विरोधी है। दीपक चौरसिया का कहना था, ‘जनता के पास विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स के द्वारा इंफॉर्मेशन का फ्लो बहुत ज्यादा है और यदि कोई चैनल ये सोचकर चलता है कि उसके प्रोपेगेंडा को दर्शक समझ नहीं पाएंगे और दर्शक उनके प्रोपेगेंडा पर चलकर काम करने लगेंगे तो यह बिल्कुल गलत है। हां, ये चैनल अपने ख्याली पुलावों में तो रह सकते हैं, लेकिन दर्शकों को मूर्ख समझने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए। क्योंकि दर्शकों को सब कुछ पता है। दर्शक बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि कब आप खबर चला रहे हैं और कब प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। कई चैनलों के बारे में तो दर्शक साफ बोलने लगे हैं कि अमुक चैनल उस पार्टी का तो दूसरा अमुक पार्टी का है। यह देखकर मुझे लगता है कि इस बारे में जनता बहुत अच्छी तरह जानती है।’

दीपक चौरसिया का यह भी कहना था, ‘हो सकता है कि किसी चैनल ने किसी पार्टी की विचारधारा अपना रखी हो, लेकिन आजकल के जर्नलिज्म की बात करें तो खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया है। आज आप सामने वाले आदमी को देखते हैं, उसका चेहरा पढ़ते हैं और ये समझ लेते हैं कि अगला वाक्य उसके मुंह से क्या निकलेगा। मुझे लगता है कि हम पत्रकारों को इस तरह की स्थिति से भी बचना चाहिए। हालांकि मैं किसी को राय देना नहीं चाहता, लेकिन मैं ये जानता हूं कि ये हकीकत है और इसे हम चाहें तो भी नहीं बदल सकते हैं। आइडियलिज्म से हम बहुत आगे निकल चुके हैं।’  

भुवन लाला द्वारा यह पूछे जाने पर कि पत्रकारिता में उनके करियर का सबसे गौरवपूर्ण क्षण कौन सा था?, दीपक चौरसिया ने कहा,’मुझे लगता है कि ऐसा क्षण मेरी जिंदगी में आना अभी बाकी है, जिसके बारे में मैं ये कह सकूं कि ये मेरा गौरवमयी पल था। लेकिन 2004-05 में आई सुनामी का एक किस्सा मुझे याद है, जब हमने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से छह साल की एक बच्ची को बचाया था। उसके लिए हमने एक कैंपेन भी चलाया, जो सफल रहा था। उसके बाद जब मैं बच्ची से मिला तो माता-पिता और भाई को खोने के बावजूद वह छह साल की बच्ची कैमरे के सामने बोलना चाहती थी। उसने टूटी-फूटी हिंदी में मुझे एक लाइन भी बोली थी, उसने कहा था कि हिम्मत मत हारना। मुझे लगता है कि वह सीख मुझे आज भी याद है और जब आप अपनी पत्रकारिता के जरिये वाकई किसी की मदद करते हैं, तो वह क्षण काफी गौरवशाली लगता है कि हम जो कहते हैं, करते हैं अथवा लोगों को दिखाते हैं, उसका एक सार्थक परिणाम हमारे सामने आया है।’

उनका कहना था, ‘मुंबई में हुए आतंकी हमले से लेकर अब तक देश का मीडिया काफी मैच्योर हो चुका है। मैंने मुंबई में हुए उस हमले को कवर किया था, वहां से जो-जो रिपोर्ट हुआ है और जो-जो गलतियां हुई हैं, उसके बाद कई तरह के कमिटमेंट किए गए। सबसे बड़ा कमिटमेंट तो ये था कि यदि कहीं आतंकी हमला हुआ है और उसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है तो उससे जुड़े किसी भी दृश्य का लाइव प्रसारण नहीं होगा। उसके ऊपर फाइल फुटेज लिखा जाएगा और यह बताया जाएगा कि इसका लाइव प्रसारण नहीं हो रहा है। किसी भी तरह से इस तरह की बातें नहीं होंगी, जिससे समाज में किसी भी तरह का वैननस्य बढ़े। किसी भी तरह से ऐसी बातें नहीं होंगी, जिससे सुरक्षा बलों अथवा शहीद हुए लोगों की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठे। इसके साथ ही मैं ये भी कहना चाहूंगा कि मीडिया ने अपने लिए कई बेंचमार्क तय किए हैं और कई लक्ष्मणरेखाएं भी खींची हैं। और मैं ऐसी कई लक्ष्मणरेखाएं बता सकता हूं। ऐश्वर्या राय बच्चन के यहां जब बेटी हुई थी, तो हम लोगों ने बैठकर तय किया था कि इस तरह की कवरेज को अब टीवी से दूर रखना होगा। कहने का मतलब है कि समय के साथ मैच्योरिटी का लेवल बढ़ा है। 1995 में हमारा पहला न्यूज बुलेटिन आया था, उसके बाद 1996-97 में हमारा 24 घंटे का चैनल आया और आज मैं आपको कह सकता हूं कि ये पूरी तरह से बालिग हो चुका है। हां, इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी, क्योंकि अगर किसी सिस्टम में कुछ पॉजिटिव होते हैं तो कुछ निगेटिव भी होते हैं।’

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

सुधीर चौधरी ने बताया, लोगों का न्यूज चैनल्स से भरोसा क्यों हो रहा है कम

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 20 February, 2020
Sudhir Chaudhary

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है। डिजिटाइजेशन ने इंडस्ट्री को एक नई रफ्तार दी है। इससे टेक्नोलॉजी में विकास के साथ न्यूज इस्तेमाल करने के नए रास्ते भी खुले हैं। टेलिविजन पत्रकारिता कई बदलावों से गुजरी है और अब दर्शकों की राय को एक आकार देने में भी सहायक बनी है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने खबरें प्राप्त करने के पैटर्न में आए बदलावों, खबरों के डिजिटलीकरण आदि तमाम मुद्दों पर ‘जी न्यूज’ (Zee News) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

2019 बहुत ही रोमांचक साल रहा। जहां तक खबरों की बात करें तो कई ऐसी खबरें रहीं, जो हफ्तों तक ही नहीं बल्कि महीनों तक चर्चा में बनी रहीं। बालाकोट, आम चुनाव, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाया जाना जैसी कई अन्य खबरें रहीं, जिसकी वजह से 2019 न केवल रोमांचक साल रहा, बल्कि यह खबरों से भरा हुआ रहा।

न्यूज रूम में सबसे बड़ी चुनौती थी कि फेक न्यूज का मुकाबला कैसे किया जाए। अब कौन सी खबर या खबर को किस तरह से पेश किया जाए यही सबसे बड़ी चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि खबरों को सत्यापित करना भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए, एक बड़ा अंतर यह है कि अब हमारे पास खबरों के कई स्रोत हैं। खबरें अब हर जगह से आ रही हैं और हमारे पास बहुत अधिक असत्यापित स्रोत और असत्यापित खबरें हैं। इसलिए अब कम्पटीशन और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। अब कई लोग हर तरह की खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करना चाहते हैं, फिर चाहे वह सत्यापित हों या न हो। हर खबर को फिल्टर करना अब बहुत मुश्किल हो रहा है, क्योंकि खबरें बहुत ही ज्यादा हैं। न्यूज के डिजिटाइजेशन के कारण भी चीजें काफी बदली हैं। अब न्यूज के लिए लोगों के पास तमाम विकल्प हैं। टेक्नोलॉजी का बेहतर और व्यापक इस्तेमाल करना भी काफी महत्वपूर्ण है। रोजाना नई-नई टेक्नोलॉजी आ रही हैं, इससे न्यूज इस्तेमाल करने के तरीके भी बदल रहे हैं।   

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

मेरा मानना है कि डिजिटल मीडिया से टीवी न्यूज चैनल्स को कोई खतरा नहीं है। न्यूज प्रसार के सभी रूप बने रहेंगे और इससे लोगों के पास तमाम विकल्प होंगे। न्यूज के इस्तेमाल को और आसान बनाने में डिजिटल भी एक अन्य माध्यम बन गया है।  

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछले साल ‘जी न्यूज’ ने तमाम महत्वपूर्ण खबरें चलाईं, लेकिन मेरी नजर में कठुवा बलात्कार कांड की इन्वेस्टीगेटिव न्यूज काफी बड़ी खबर थी, जिसे ‘जी’ ने पिछले साल कवर किया था। इस मामले में हमने एक युवा को झूठा फंसने से बचाया था। इसके अलावा जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने और सीएए-एनआरसी को लेकर की गई कवरेज भी हमारी बड़ी न्यूज कवरेज में शामिल रही।   

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

‘जी’ में हमने न्यूजरूम के वर्कफ्लो को बदलने के लिए ‘Integrated Multimedia Newsroom’ (IMN) जैसी पहल शुरू की है। दरअसल, यह एक कॉमन किचन की तरह काम करता है, जहां पर हम हर तरह का कंटेंट तैयार कर रहे हैं, जो टीवी, डिजिटल, सोशल मीडिया, लॉन्ग फॉर्मेट, शॉर्ट फॉर्मेट, रेडियो, प्रिंट सबके लिए है। एक ही टीम व्युअर्स के अनुसार, डिजिटल से लेकर प्रिंट और टीवी समेत अन्य प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट तैयार कर रही है। दूसरी बात ये है कि हमने अपने इंटरनेशनल चैनल ‘विऑन’ (WION) के द्वारा देश से बाहर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। इसके द्वारा हम दुनिया के लगभग हर हिस्से से जुड़े हुए हैं। इसलिए, आजकल न्यूज ज्यादा से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर आधारित होती जा रही है। लगभग सभी मोजो किट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और हम भी कर रहे हैं। पहले के बड़े-बड़े और भारी उपकरणों की तुलना में अब हल्के और आसानी से कहीं भी ले जाने वाले उपकरण आ गए हैं, जिससे काम काफी आसान और तेज हो गया है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से कैसा रहेगा। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा हो सकता है?

जी हां, मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में खबरों के लिहाज से यह साल ज्यादा बड़ा और रोमांचक होगा। पहले के मुकाबले न्यूज और ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रही हैं। अब लोग सिर्फ न्यूज और ब्रेकिंग न्यूज देखना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें इसमें ओपिनियन भी चाहते हैं। मेरा मानना है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोग न्यूज चैनल्स को देखेंगे। न्यूज की संख्या भी पहले के मुकाबले दिनोंदिन बढ़ रही है और बड़ी खबरें आ रही हैं। इसलिए मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है और कई बड़ी न्यूज मिलेंगी।  

मुझे यह भी लगता है कि जैसे-जैसे हम समय के साथ आगे बढ़ रहे हैं, खबरों की विश्वसनीयता घट रही है। लोगों का न्यूज चैनल्स पर भरोसा कम हो रहा है। मेरी नजर में ऐसा होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला ये कि तमाम चैनल्स द्वारा टीआरपी की दौड़ में आगे बढ़ने के चक्कर में न्यूज की क्रेडिबिलिटी कम हो रही है और दूसरा यह कि आज के दौर में कई चैनल्स एजेंडा पर आधारित पत्रकारिता कर रहे हैं। स्वस्थ पत्रकारिता करने और लोकतंत्र में समाज को चौथे स्तंभ के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए न्यूज चैनल्स को इन दो चुनौतियों से मुकाबला करना होगा।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

कार्तिकेय शर्मा ने बताया, मीडिया के लिए क्यों बेहतर रहेगा यह साल

'ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी ‘आईटीवी नेटवर्क’ के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है

Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Kartikeya Sharma

‘आईटीवी नेटवर्क’ (iTV Network) के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा का मानना है कि वर्ष 2019 की तरह मीडिया को इस साल भी तमाम बड़ी घटनाएं कवर करने को मिलेंगी। साल के शुरु में ही ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (सीएए) को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। इसके साथ ही दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर भी न्यूज रूम इन दिनों काफी व्यस्त हो गए हैं।

रीजनल चैनल्स पर भी अपनी मजबूत स्थिति के साथ नेटवर्क ने कम समय में ही अच्छी-खासी व्युअरशिप हासिल कर ली है। ‘ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में कार्तिकेय शर्मा ने न्यूज रूम में तकनीकी व्यवधानों से लेकर, टीवी पत्रकारिता और वर्ष 2020 के बारे में अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

न्यूज में बदलाव होना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मेरे अनुसार, सोशल मीडिया ने न्यूज रूम को काफी प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने न्यूज रूम की गतिविधियों को बदलकर रख दिया है, इसलिए इस बारे में बात होना लाजिमी है। सोशल मीडिया के विकास के साथ इसे लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। यही कारण है कि ट्रेडिशनल मीडिया इतना महत्वपूर्ण है। मेरी नजर में न्यूज इंडस्ट्री के लिए यह साल काफी अच्छा रहेगा। रही बात नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) की तो इससे न्यूज चैनल्स को कम मूल्यों पर न्यूज और कंटेंट उपलब्ध कराने में बड़ी सहूलियत होगी। इसके साथ ही आने वाले समय में डिजिटल कंटेंट और ताकतवर हो जाएगा।

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि टीवी न्यूज चैनल्स के लिए डिजिटल किसी तरह का खतरा है। यह तो एंप्लीफायर है। यह न्यूज के विभिन्न पहलुओं को और स्पष्ट करता है। न्यूज के विभिन्न जॉनर्स (genres) अपने-अपने टार्गेट ऑडियंस के हिसाब से डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी के डिजिटल कंटेंट की ज्यादा खपत है और अंग्रेजी न्यूज चैनल्स के लिए यह जानने का सबसे अच्छा तरीका डिजिटल कंटेंट है कि किस प्रकार का कंटेंट काम कर रहा है। मेरा मानना है कि डिजिटल इस सफर का हिस्सा तो हो सकता है लेकिन टेलिविजन जर्नलिज्म को रिप्लेस नहीं कर सकता यानी उसकी जगह नहीं ले सकता है।     

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछला साल खबरों के लिहाज से काफी अच्छा था। इस दौरान तमाम बड़ी घटनाएं हुईं। चूंकि वर्ष 2019 में चुनाव भी था, इसलिए हमने अपने सभी प्लेटफॉर्म्स चाहे वो हिंदी हो, अंग्रेजी हो अथवा रीजनल, चुनाव को लेकर काफी व्यापक कवरेज की। हमारे यूट्यूब प्रोग्राम ‘तीखी मिर्ची’ (Tikhi Mirchi) को 35 मिलियन व्यूज मिले और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ (Art of Living) के साथ मिलकर शुरू की गई हमारी पहल ‘सेव वाटर’ (Save Water) अन्य सभी न्यूज चैनल्स में सबसे बड़ी पहल है।  

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

मेरा मानना है कि न्यूज इंडस्ट्री कोई पहली बार टेक्नोलॉजी को नहीं अपना रही है। टेक्नोलॉजी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है और इसने काम को काफी आसान और सुविधाजनक बना दिया है, लेकिन यही टेक्नोलॉजी ट्रेडिशनल मीडिया के लिए वास्तविक खतरा भी है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में न्यूज के लिहाज से वर्ष 2020 कैसा रहेगा, इस बारे में थोड़ा बताएं। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा व्यवधान आ सकता है?

मुझे लगता है कि न्यूज के लिहाज से वर्ष 2019 की तुलना में इस साल ज्यादा घटनाएं होंगी। इस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ ही अन्य राज्यों में चुनाव भी पाइप लाइन में हैं। ऐसे में न्यूज चैनल्स के लिए काफी कंटेंट होगा। पॉलिटिक्स, क्रिकेट और एंटरटेनमेंट के क्षेत्र से काफी बड़ी खबरें निकलेंगी।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

इस साल कैसे नई ऊंचाइयां छुएगा ABP न्यूज नेटवर्क, CEO ने बताई स्ट्रैटेजी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में अविनाश पांडे ने कहा- इस साल ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में रीजनल और डिजिटल अहम भूमिका निभाएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
Avinash

दर्शकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी और नए साल पर मजबूत रोडमैप के साथ ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ ने वर्ष 2020 में नई ऊंचाइयां छूने की पूरी तैयारी कर ली है। इस बारे में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ANN) के सीईओ अविनाश पांडे का कहना है कि आने वाला समय डिजिटल और रीजनल का होगा और वर्ष 2020 में यह दोनों ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ग्रुप का फोकस भी इन्हीं पर है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान अविनाश पांडे ने इस साल ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर में पिछले साल के साथ ही इस साल होने वाले संभावित प्रमुख बदलावों के बारे में विस्तार से बताया। डिजिटल माध्यम में नेटवर्क की ग्रोथ से उत्साहित अविनाश पांडे ने इस माध्यम की पहुंच के साथ ही इस बात पर भी चर्चा की कि इस साल सबसे बड़े ट्रेंडसैटर्स में किसकी अहम भूमिका होगी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

चाहे नए टैरिफ ऑर्डर की बात हो, लैंडिंग पेज को लेकर ट्राई के रेगुलेशंस का मुद्दा हो अथवा बार्क की नई लीडरशिप की बात ही क्यों न हो, पिछला साल ब्रॉडकास्टर्स के लिए कई घटनाओं का गवाह रहा है। ऐसे में आपकी नजर में इंडस्ट्री में क्या अहम बदलाव हुए हैं?    

देश में टेलिविजन के लिए पिछले साल लागू हुआ न्यू टैरिफ ऑर्डर सबसे बड़े बदलावों में से एक रहा है। ‘ट्राई’ (TRAI) और उसके नियमों ने ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ (DPO) और ब्रॉडकास्टर्स के बीच काम करने के तरीके को परिभाषित करने के साथ ही कॉल नेटवर्क कैपेसिटी फीस और फ्री टू एयर चैनल्स की संख्या को लेकर 2019 में ब्रॉडकास्टिंग का परिदृश्य पूरी तरह से बदल दिया है। हालांकि शुरुआती स्तर पर कुछ कंज्यूमर्स को कुछ असुविधा हुई, लेकिन इससे सभी को फायदा होता भी देखा गया। ट्राई द्वारा कैरिज फीस तय करने और क्षेत्रों को परिभाषित करने से ब्रॉडकास्टर्स और डीपीओ के बीच पारदर्शिता बनी है। लैंडिंग पेज को लेकर जो चिंता थी, उसे बार्क और इंडस्ट्री से जुड़ी इकाइयों ने सुलझा लिया।

कई ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि न्यूज चैनल्स को फ्री टू एयर नहीं होना चाहिए, इस बारे में आपका क्या मानना है?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं ब्रॉडकास्टिंग की तरफ से किसी फ्री टू एयर चैनल के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि केबल चैनल्स के लिए कंज्यूमर 130 रुपए और टैक्स का भुगतान तो कर ही रहा है। ऐसे में कंज्यूमर के लिए तो कुछ भी फ्री नहीं है। यह तो ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए है कि चैनल फ्री हो जाता है  और जो फ्री टू एयर चैनल के लिए भी कैरिज फीस ले रहे हैं। ऐसे में यह पूरा सिस्टम ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए एकतरफा रूप से फायदेमंद होता है। इसलिए, भुगतान करना न्यूज इंडस्ट्री के हित में है। हालांकि, अभी इंडस्ट्री में काम करने का जो तरीका है, उसमें किसी एक चैनल अथवा छोटे नेटवर्क के लिए भुगतान करना काफी मुश्किल अथवा लगभग असंभव ही है। इसलिए न्यूज इंडस्टी को आपस में मिलकर इस तरह के रास्ते तलाशने चाहिए, जिससे कंज्यूमर को डिलीवर किए जाने वाले कंटेंट के लिए उचित फीस ली जा सके।

पिछले कुछ महीनों में ‘एबीपी’ के रेटिंग में काफी सुधार देखने को मिला है। व्युअरशिप में हुई इस ग्रोथ का श्रेय आप किसे देते हैं? क्या बार्क की लीडरशिप में बदलाव की मांग ब्रॉडकास्टर्स की ओर से की गई थी? इससे कितनी मदद मिली?

एबीपी न्यूज नेटवर्क की बात करें तो हम ज्यादा नाटकीयता में भरोसा नहीं रखते हैं। हम हमेशा रोचक अंदाज में आपको सच्चाई बताएंगे। हम कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेंगे। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कौन है और क्या है। किसी भी मामले में हम हमेशा सिर्फ तथ्यों की बात करेंगे। पिछला साल खबरों से भरपूर रहा, जिसकी शुरुआत लोकसभा चुनाव के साथ ही हो गई थी। निष्पक्ष कवरेज और अवॉर्ड विजेता रिपोर्टर्स के कारण हमारे नेटवर्क को इसका काफी फायदा मिला। यही नहीं, खबर जुटाने के काम में हमारी डिजिटल टीम भी पूरी तरह से जुटी हुई है, इसका परिणाम ही रहा कि पूरे नेटवर्क की व्युअरशिप में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। बार्क के नेतृत्व में हुए परिवर्तन से इसका कोई लेना-देना नहीं है। एक्सक्लूसिव कंटेंट से व्युअरशिप आती है। बदलते ट्रेंड्स और व्युअर्स की पसंद का अनुमान लगाने में दूरदर्शिता और सक्रियता दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इसी के अनुसार, चैनल को अपना कंटेंट उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए हम जमीन से जुड़े रहते हैं।

आजकल सभी ब्रॉडकास्टर विभिन्न भाषाओं के चैनल्स पर पैसा लगा रहे हैं। रीजनल न्यूज के मोर्चे पर आपका नेटवर्क ज्यादा मजबूत है। नए साल को लेकर इस सेगमेंट में आपका क्या प्लान है? आप इस ग्रोथ को आर्थिक रूप से कैसे भुनाएंगे? क्या आप हिंदी और अंग्रेजी की तुलना में विज्ञापन से रीजनल में ज्यादा कमाई देखते हैं?

मैं दूसरे ब्रॉडकास्टर्स के बारे में नहीं बता सकता हूं, लेकिन एबीपी न्यूज नेटवर्क में हमने रीजनल चैनल के मॉडल को रीजनल स्वायत्ता के साथ हमेशा बिजनेस मॉडल के रूप में देखा है। कहने का मतलब है कि बेशक हमारे पास कॉरपोरेट ऑफिस है, लेकिन हमारे सभी रीजनल चैनल्स निष्पक्ष खबरें दिखाने के हमारे मूल सिद्धांत पर चलते हुए सभी मायनों में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। इसलिए, हमारे रीजनल न्यूज चैनल्स जैसे-‘एबीपी आनंदा’ (ABP Ananda), ‘एबीपी माझा’ (ABP Majha), ‘एबीपी अस्मिता’ (ABP Asmita) और ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। वास्तव में ‘एबीपी सांझा’ (ABP Sanjha) पंजाबी दर्शकों के लिए काफी अच्छा कर रहा है। वर्तमान की बात करें तो हमारे पूरे रेवेन्यू में रीजनल चैनल्स का योगदान 40 प्रतिशत से ज्यादा है और जल्द ही यह बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। मेरा मानना है कि रीजनल्स निश्चित रूप से सभी प्लेटफॉर्म्स से बेहतर करेंगे और किसी भी हिंदी अथवा अंग्रेजी न्यूज चैनल से बेहतर होंगे।  

डिजिटल की ग्रोथ के बारे में कुछ बताएं। क्या डिजिटल से आ रहा एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू अभी भी शुरुआती दौर में है? एबीपी में इसकी ग्रोथ को आप किस तरह से देखते हैं?

डिजिटल की बात करें तो एबीपी नेटवर्क काफी अच्छा कर रहा है। हमारे 250 मिलियन से ज्यादा पेज व्यूज हैं और 58 मिलियन से ज्यादा यूजर्स हैं। विडियो की बात करें तो 60 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ हम तीसरे नंबर पर हैं। डिजिटल के मोर्चे पर हमारे रेवेन्यू में 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है। हम विडियो फर्स्ट फॉर्मेट पर काम कर रहहे हैं और जल्द ही आपको ‘एबीपी लाइव’ (ABP Live) एक नए रूप में दिखाई देगा, जहां से आप अपनी पसंद के अनुसार किसी भी भाषा में कोई भी न्यूज चुन सकते हैं। हमने इस पर काफी निवेश किया है और आने वाले दो वर्षों में हम इसमें 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी देख रहे हैं।  

वर्ष 2019 खबरों से भरपूर रहा है। लोकसभा चुनाव के साथ ही इसकी शुरुआत हो गई थी, इसके बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप भी था। ऐसे में एडवर्टाइजर्स ने विज्ञापनों पर काफी खर्च किया। दूसरी तरफ इस वित्तीय वर्ष में आर्थिक मंदी का सामना भी करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि पहली दो तिमाही के मुकाबले आखिरी की दो तिमाही की चाल काफी सुस्त रही है? इस बारे में आपका क्या मानना है?  

आमतौर पर एक के बाद एक चुनाव से व्युअरशिप बढ़ती है। ऐसे में चुनाव के दौरान एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। 2019 भी इससे अलग नहीं था, सिवाय इसके कि मौद्रिक स्थिति को देखते हुए कुछ एडवर्टाइजर्स ने अपने बजट घटा दिए। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर विपरीत परिस्थितियों और मार्केट में अनिश्चितता के कारण उम्मीद है कि पिछले वर्षों की तुलना में अब यह खर्च कम होगा।

साल की शुरुआत नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) से हुई है। आपकी नजर में ब्रॉडकास्टर्स के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं?  

न्यूज जॉनर में हम फ्री टू एयर ब्रॉडकास्टर हैं और नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) ने डीपीओ के साथ हमारी बिजनेस डीलिंग को और स्पष्ट किया है। हमारे लिए, यह सही दिशा में उठाया गया बेहतर कदम है।   

वर्ष 2020 में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में आपकी नजर में तीन कौन से बड़े बदलाव हो सकते हैं?

मेरी नजर में 2020 में डिजिटल और रीजनल इस इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जिन चैनलों के पास काफी साधन हैं और पूरे देश में जिन्होंने अपने पैर पसार रखे हैं, उन्हें काफी फायदा होगा। हालांकि, डिजिटल की ओर से चुनौती मिलेगी, लेकिन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूज और एंटरटेनमेंट के द्वारा ब्रॉडकास्टर इसकी बढ़त को बरकरार रखेंगे। कुल मिलाकर रीजनल न्यूज और हिंदी न्यूज की ग्रोथ में काफी इजाफा होगा। 2020 में लाइव अथवा विडियो ऑन डिमांड (VOD) की स्थिति भी मजबूत होगी। जहां तक मुझे लगता है कि वर्ष 2020 की आखिरी छमाही में टीवी और डिजिटल टीवी (ऐप, वेबसाइट और यूट्यूब) की ग्रोथ दोहरे अंकों में होगी। पहली छमाही में अभी भी आर्थिक मंदी, जीएसटी और इंडस्ट्री से जुड़े अन्य मुद्दों का प्रभाव देखने को मिलेगा।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'हमारे अखबार में नहीं लगा है कॉरपोरेट का पैसा, इसलिए करते हैं जनसरोकारी पत्रकारिता'

‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज को रोकने के लिए जनजागरूकता फैलाने पर दिया जोर

अभिषेक मेहरोत्रा by
Published - Sunday, 15 December, 2019
Last Modified:
Sunday, 15 December, 2019
Rajeev Ranjan Srivastava

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दिल्ली का प्रमुख अखबार ‘देशबंधु’ (Deshbandhu) अपने साठ साल पूरे करने जा रहा है। अपनी दमदार और जनसरोकार वाली पत्रकारिता के दम पर यह अखबार न सिर्फ नए आयाम छू रहा है, बल्कि समय के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भी आगे बढ़ रहा है। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अखबार के कलेवर पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है। मीडिया के लिए मुश्किल माने जा रहे इस दौर में टिके रहने के लिए अखबार कौन सी स्ट्रैटेजी अपना रहा है और इतने सालों तक किस तरह पाठकों के मन में अपनी जगह बनाए हुए है, इन्हीं सब के बारे में ‘समाचार4मीडिया डॉट कॉम’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपका अखबार 60 साल का हो रहा है, पर तेवर और कलेवर बिल्कुल नए होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर में अखबार को आगे ले जाने की आपकी क्या स्ट्रैटेजी है? 

देशबंधु के 60 साल हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। इस पूंजी को मेरे पूर्वजों ने मेरे हवाले किया है और मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने जो मुझे दिया है, उसे मैं आगे बढ़ाकर उसमें आने वाली पीढ़ी (पाठक) के लिए कुछ और जोड़ दूं। हमारी पूरी ताकत हमारे पाठक हैं। क्योंकि अगर हम कुछ गलती करते हैं तो वह पाठक ही बताते हैं और यदि हम कुछ अच्छा करते हैं तो सराहना भी उन्हीं के द्वारा मिलती है। पाठक ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक हैं। ये दोनों ही चीजें हमारे लिए बहुत बड़ा तमगा हैं। मेरी इच्छा है कि हम सब मिलकर 'देशबंधु' को उस मुकाम तक ले जाएं कि आज तक जो यह पाठकों को देता आया है, आने वाले समय में उससे ज्यादा दे। वर्तमान में मीडिया इंडस्ट्री खासकर अखबारों की आज जो स्थिति है, उनमें अपनी साख को बचाए रखना भी एक चुनौती है। उस चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ने की हमारी कोशिश चल रही है। इस दिशा में हम लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि हमारी साख हमेशा बनी रहे।

माना जा रहा है कि प्रिंट अब खत्म हो रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था भी बिगड़ रही है। ऐसे में अखबार की साख और अर्थव्यवस्था में सामंजस्य बिठाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

वर्तमान समय में कहा जा रहा है कि प्रिंट मीडिया खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और आने वाला समय डिजिटल व टेलिविजन समेत तमाम अन्य चीजों का होगा और प्रिंट मीडिया नहीं बचेगा, लेकिन मेरा मानना है कि एक दस्तावेज के रूप में आप हमेशा प्रिंट को ही इस्तेमाल करेंगे और वह कभी खत्म नहीं होगा। ये हो सकता है कि प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो जाए और मैं मान रहा हूं कि वह दौर आ गया है।

कहने का मतलब है कि चुनौतियां सर्कुलेशन के स्तर पर हैं, क्योंकि आज के दौर में अधिकांश लोगों के हाथ में मोबाइल है, वहीं कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल भी बढ़ा है। ई-पेपर के रूप में भी अधिकांश अखबार लोगों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन कुछ चीजें है जो आज भी लोगों को पढ़ने के लिए छपी-छपाई चाहिए। इन चीजों को यदि आप ई-पेपर के रूप में भी लोगों तक पहुंचाते हैं, तब भी कहीं न कहीं दस्तावेज चाहिए। ऐसे में मुझे लगता है कि प्रिंट मीडिया कभी खत्म होने वाला नहीं है। रही बात चुनौतियों की तो प्रिंट मीडिया के साथ चुनौतियां नई नहीं हैं। यदि हम गुजरे जमाने की बात करें तो रेडियो के दौर में भी प्रिंट मीडिया के सामने चुनौतियां थीं। इसके बाद टेलिविजन का दौर आया, तब भी चुनौतियां थीं और अब भी बनी हुई हैं। अब सोशल मीडिया के दौर में जब लगभग हर हाथ में मोबाइल है और इंटरनेट की सुविधा है, तब भी यह चुनौतियां बनी हुई हैं। लेकिन अखबार तब भी जिंदा थे और आज भी जिंदा हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज से 20 साल बाद भी अखबार इसी तरह चलते या यूं कहें कि दौड़ते रहेंगे।

आज के डिजिटल युग के दौर में ‘देशबंधु’ किस तरह अपने पाठकों तक अपनी पहुंच बनाएगा?

प्रिंट के साथ-साथ ‘देशबंधु’ हमेशा नए माध्यमों पर भी फोकस करता रहा है। यही कारण है कि करीब 20 साल पहले जब अन्य अखबारों के वेब पोर्टल शुरू हुए थे, तभी ‘देशबंधु’ भी इंटरनेट पर आ गया था और deshbandhu.co.in के नाम से हमने भी अपना वेब पोर्टल शुरू कर दिया था, जो पिछले 20 साल से लगातार चल रहा है। इसे विडियो प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए हमने करीब पांच साल पहले 2015 में तैयारी शुरू की थी और 2017 में हमने पूरी तरह इसे dblive के नाम से विडियो फॉर्मेट में लॉन्च कर दिया। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि आज हमारे विडियो प्लेटफॉर्म पर 10 लाख से ज्यादा सबस्क्राइबर्स हैं और यह संख्या रोजाना हजारों की संख्या में बढ़ती जा रही है। प्रिंट के अलावा वेब पोर्टल और विडियो प्लेटफॉर्म के द्वारा हम लोगों को एक पैकेज देने की कोशिश कर रहे हैं कि जिस भी रूप में लोग हमसे जुड़ना चाहते हैं, वे हमसे जुड़ सकते हैं। कह सकते हैं कि हम आज की तारीख में हर प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं।‘

पत्रकारिता को जनसरोकार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया इसमें चूक कर रहा है। ऐसे में देशबंधु किस तरह से आज भी जनसरोकार की पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है?

‘देशबंधु’ की बैकबोन यानी रीढ़ जनसरोकार की पत्रकारिता ही है। हम हमेशा मूल्यपरक और जनभागीदारी के रूप में पत्रकारिता करते रहे हैं और यही कारण है कि आज 60 सालों बाद भी हमारा अखबार इस बाजार में टिका हुआ है। बाजार शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं कि आज कई मीडिया संस्थानों में बाजार का पैसा लगा हुआ है, कॉरपोरेट घरानों का पैसा लगा हुआ है। ऐसे में बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के 60 साल से हमारा अखबार चल रहा है और मार्केट में लोग पसंद कर रहे हैं, तो इसका मतलब है हम जनसरोकार की पत्रकारिता कर रहे हैं। बिना जनसरोकार की पत्रकारिता के यह संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जहां से हमारा उदय हुआ है, वहां हमारे अखबार का सर्कुलेशन बहुत ज्यादा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 17 अप्रैल 1959 में हमारे अखबार की शुरुआत हुई थी। पहले छत्तीगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश हुआ करता था, लेकिन अब यह अलग राज्य है। आप देखेंगे कि हर गांव में हमारे संवाददाता और पाठक मिल जाएंगे। कई गांवों में तो लोग चौपाल लगाकर ‘देशबंधु’ पढ़ते हैं। इसका कारण यही है कि हम उनसे जुड़े हुए हैं। यदि जनसरोकारों नहीं होगा तो लोग हमसे नहीं जुड़ेंगे और हमें पसंद नहीं करेंगे। पत्रकारिता में आज जब हम जनसरोकार की कमी की बात कर रहे हैं तो दिल्ली में बैठकर आज जब पत्रकारिता की बात की जाती है तो यहां कहीं न कहीं ग्रामीण पत्रकारिता की कमी दिखती है। लेकिन जैसे ही दिल्ली से बाहर निकलें तो देखेंगे कि सिर्फ ‘देशबंधु’ ही नहीं, कई ऐसे अखबार हैं जो ग्रामीण स्तर पर निकल रहे हैं और जनसरोकार का काम कर रहे हैं। जनभागीदारी के साथ चल रहे हैं औऱ वहां के लोगों की समस्याओं को उठा रहे हैं। ऐसे अखबार आज भी किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।

ऐसे कई अखबार हैं, जो बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के आज भी चल रहे हैं और टिके हुए हैं। ऐसी स्थिति में ‘देशबंधु’ के लिए बहुत अच्छी बात ये रही है कि 1978 से लेकर अभी तक 13 बार ग्रामीण पत्रकारिता में इस अखबार को ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है। यह अवॉर्ड ‘स्टेट्समैन’ अखबार द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया है। 

‘देशबंधु’ ऐसा पहला अखबार है, जिसे ग्रामीण पत्रकारिता में सबसे ज्यादा बार ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है, यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। ऐसा इसलिए है कि हमने ग्रामीण पत्रकारिता पर शुरू से जोर दिया है। इसके साथ ही ‘देशबंधु’ ही ऐसा अखबार है, जिसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद अन्य अखबारों ने इस बारे में हमसे काफी कुछ सीखा और आगे बढ़े। आप देखें कि आज तो हमारे पास मोबाइल फोन है, इंटरनेट है और खबर हम लोगों तक तत्काल पहुंच जाती है, लेकिन वो जमाना भी था जब लोग टेलिग्राम के द्वारा समाचार भेजते थे। हमारे संवाददाता गांवों में जाते थे और वहां दो-तीन दिन लगाकर समस्याओं को देखते थे और फिर आकर खबर लिखते थे। इसके बाद अखबार वहां तक पहुंचता था।

सिर्फ गांवों में ही नहीं, इन खबरों की गूंज दिल्ली तक होती थी। ’देशबंधु’ के साथ कई ऐसी चीजें हुई हैं कि अखबार में हमने जो रिपोर्ट छापी है, उसकी खबर दिल्ली तक आई है। यही नहीं, दिल्ली के जिम्मेदार लोगों जैसे-तत्कालीन प्रधानमंत्री, मंत्री और संबंधित अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को संज्ञान में लिया और इन मामलों में कार्रवाई भी हुई है। हमारा प्रयास यही रहता है कि जनसरोकार से संबंधित जो खबरें हैं, वो जनता तक पहुंचाई जाएं।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में आपके अखबार का काफी प्रभाव रहता है। दिल्ली में भी इसका एडिशन है। दिल्ली में पिछले दिनों अखबार की एडिटोरियल लीडरशिप में भी बदलाव हुआ है। दिल्ली में अखबार को और प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी है?

 ये बहुत बड़ा सवाल है। जहां तक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की बात है तो पिछले 60 साल से हम वहां टिके हुए हैं और वहां पर पहले से पूरा नेटवर्क है। वहां समाचार जुटाने से लेकर सर्कुलेशन तक पहले से एक प्रभावशाली सिस्टम बना हुआ है। रही बात दिल्ली को तो यहां हम करीब 12 साल पहले आए थे। हमने वर्ष 2008 में दिल्ली में लॉन्चिंग की थी और हमारी कोशिश यही रही थी कि दिल्ली से एक ऐसा अखबार निकाला जाए जो पूरे देश का अखबार हो और जो राष्ट्रीय संस्करण के रूप में हो। यानी यह नेशनल एडिशन के तौर पर यहां से निकले और हर राज्य के लिए एक भूमिका निभाए। हमारी यही कोशिश थी कि हम यहां से एक ही एडिशन निकालेंगे, अलग-अलग एडिशन नहीं निकालेंगे, लेकिन जितने भी हिंदी भाषी प्रदेश हैं, उनकी खबरें दिल्ली में छापेंगे। होता क्या है कि जैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री दिल्ली आ रहे हैं या बिहार के मुख्यमंत्री अथवा कोई मंत्री दिल्ली आ रहे हैं और यदि यह खबर दिल्ली के अखबारों में छप जाती है तो उनके लिए यह काफी गर्व की बात होती है। उन्हें लगता है कि दिल्ली में भी उन्हें अहमियत मिली। दिल्ली से अखबार शुरू करने की जब बात चली थी तो एक सर्वे के दौरान मुझे इस तरह की कमी दिखाई दी। इन बातों को ध्यान में रखकर ही हमने अखबार की तैयारी की। इसके लिए हमने हिंदी भाषी प्रदेशों के लिए अलग-अलग पेज की शुरुआत की। हालांकि हम पेजों पर राज्य का नाम नहीं देते हैं, लेकिन प्रादेशिक के नाम से निकलने वाले पेजों पर हम अलग-अलग प्रदेशों की खबरों को कवर करते हैं। इसके लिए हमने पिछले 10-12 साल में एक तरह से पूरा नेटवर्क तैयार कर लिया है, जिससे हमें इन राज्यों की खबरें मिलती रहती हैं। रही बात आगे की प्लानिंग की तो बता दूं कि हम अपनी टीम को बढ़ा रहे हैं। कुछ नए चेहरे टीम में शामिल भी किए गए हैं और आने वाले समय में और भी नए चेहरे शामिल किए जाएंगे।

हम चाहते हैं कि दिल्ली के मार्केट में हमारा अखबार अच्छी तरह से पहुंचे। यदि अखबार की कॉपी किसी कारण से कहीं नहीं भी पहुंच पाती है तो हम चाहते हैं कि ई-पेपर अथवा अन्य माध्यमों से पाठकों तक हम अपनी पहुंच बनाने में सफल रहें। रही बात आर्थिक पक्ष की तो इसके लिए विज्ञापन जरूरी है। विज्ञापनों के लिए भी पूरी टीम काम कर रही है। मेरा मानना है कि यदि आपका कंटेंट अच्छा है और सर्कुलेशन बेहतर है तो विज्ञापन वालों के लिए काफी सहूलियत हो जाती है। हम कंटेंट और सर्कुलेशन पर लगातार बहुत ध्यान दे रहे हैं। हमारी पूरी योजना है कि दिल्ली-एनसीआर के साथ ही अन्य हिंदीभाषी क्षेत्रों की आवाज को ‘देशबंधु’ दिल्ली में बुलंद करे। हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

 आर्थिक मोर्चे पर तो मीडिया संघर्ष कर ही रहा है, सबसे बड़ा सवाल मीडिया की क्रेडिबिलिटी का है। पिछले एक दशक की बात करें तो मीडिया की क्रेडिबिलिटी में काफी कमी आई है। इस क्रेडिबिलिटी को कैसे वापस लाया जा सकता है, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

 देखा जाए तो आज की तारीख में ये बहुत ही गंभीर सवाल है। गंभीर इसलिए क्योंकि लोग अब क्रेडिबिलिटी को लेकर मीडिया पर सीधा आरोप लगाने लगे हैं। हालांकि पहले ये आरोप सीधे-सीधे नहीं लगाए जाते थे। मीडिया पर अब उंगली उठने लगी है। इस बारे में मेरा कहना है कि हमें हमेशा इस तरह का काम करना चाहिए, जिससे लोग हमारे ऊपर उंगली न उठाएं। इसके बाद भी यदि उंगली उठ रही है तो उससे कैसे बचा जाए और यदि उंगली उठ गई है तो कैसे अपने आप को पाक साफ करके निकला जाए, यह एक बड़ा सवाल है। यदि मैं ‘देशबंधु’ की बात करूं तो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत यानी पक्ष-विपक्ष की बात खने के साथ ही जो आईना दिखाने का काम मीडिया का होना चाहिए, वह हम करते हैं। इसमें कई बार ऐसा होता है कि लोग हमसे नाराज भी हो जाते हैं। यदि आप मीडिया लाइन में हैं और सही बात कर रहे हैं तो ये मानकर चलिए कि लोग आपसे नाराज होंगे और आपको परेशान करेंगे। मीडिया के साथियों से मेरा यही कहना है कि उनमें इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वे उन परेशानियों का सामना कर पाएं। यदि वे इन परेशानियों का सामना नहीं कर पाते हैं तो वे मीडिया के लायक नहीं बने हैं। मैं तो यही कहूंगा कि ऐसे लोगों को मीडिया को छोड़कर कोई दूसरा धंधा कर लेना चाहिए। इन लोगों से मेरा यही कहना है कि यदि आपको अपनी क्रेडिबिलिटी कायम करनी है तो आपको उस लाइन पर चलना पड़गा, जिस लाइन के ऊपर लोग आपके ऊपर उंगली न उठा पाएं। ऐसा आपको रोजाना देखने-सुनने में मिल सकता है। किसी खबर की बात आपको करनी है, अथवा किसी मुद्दे की बात करनी है। किसी खबर अथवा किसी मुद्दे को उजागर करने की बात हो, हर मामले पर आप देखेंगे कि तात्कालिक निर्णय काफी महत्वपूर्ण होता है, वही आपकी क्रेडिबिलिटी को बनाता है और बचाता है। यदि आपकी क्रेडिबिलिटी बनी हुई है तो बचाकर चलनी है और यदि नहीं बनी हुई है तो बनानी है।

ऐसे पत्रकार साथियों के लिए मैं यही कहूंगा कि यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप अपने अखबार के साथ अथवा अपने मीडिया हाउस के साथ क्या निर्णय कर रहे हैं, लेकिन मैं ये कहूंगा कि पत्रकारिता में करने के लिए बहुत कुछ है और ऐसे समय में जब मीडिया की क्रेडिबिलिटी खत्म हो रही है, तो अपने अंदर झांकना होगा कि आखिर हम कर क्या रहे हैं?  अगर आपको लगता है कि आप सही कर रहे हैं तो सही दिशा में जाइए, लेकिन यदि आप गलत कर रहे हैं तो मुझे पता है कि आपकी अंतर्रात्मा जरूर कहीं न कहीं कहेगी कि आप गलत कर रहे हैं और आपने रास्त गलत चुन लिया है। ऐसे में आप उस रास्ते से अलग हटिए और सही रास्ते पर जाइए। मेरा विश्वास है कि आपकी क्रेडिबिलिटी आपके पास लौट आएगी।

 सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज की समस्या तेजी से उभरी है। आपके अनुसार फेक न्यूज को कैसे रोका जाए और कैसे इससे निजात पाई जा सकती है?

सोशल मीडिया काफी बड़ा प्लेटफॉर्म है। यह ऐसा प्लेटफॉर्म है जो आज की तारीख में सही मायने में बेलगाम है। सोशल मीडिया पर कोई लगाम नहीं है। ऐसे में फेक न्यूज को रोकने के लिए जागरूक होने की जरूरत है। हालांकि, कुछ लोग जागरूक होकर जागरूकता फैला भी रहे हैं। आपको याद होगा कि पहले अखबारों के जरिये हम लोग ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन’ यानी लोगों को जागरूक करने का काम करते थे। मैंने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार और बाकी जगह भी तमाम ऐसी समितियां देखी हैं, जो लोगों को जागरूक करने का काम करती हैं। जैसे-कई बार इस तरह की खबरें उड़ा दी जाती हैं कि फलां व्यक्ति आग पर चल लेता है या कोई कहता है कि वह आग को अपने मुंह में रख लेता है तो कोई इसी तरह कुछ और कहता है। इन चीजों के बारे में हम अखबारों के द्वारा लोगों को जागरूक करते रहे हैं, ऐसी ही जनजागरूकता आज फेक न्यूज को लेकर करने की जरूरत है। अभी हो यह रहा है कि जैसे ही कोई जानकारी आती है, हम (मीडियाकर्मी) बिना जांचे-परखे उसे फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। अखबारों की बात करें तो पहले की तरह कोई भी खबर आने पर हम आज भी कई बार उसकी पुष्टि करते हैं कि वह सही है अथवा नहीं। कंफर्म होने पर ही उसे अखबार में पब्लिश किया जाता है, लेकिन हम जब सोशल मीडिया पर किसी चीज को फॉरवर्ड करते हैं तो हम उसकी कोई तहकीकात नहीं करते।

एक पत्रकार होने के बावजूद अखबार के लिए जो काम किया जा रहा है, वो काम सोशल मीडिया पर नहीं हो रहा है। यही कारण है कि पिछले दो-तीन सालों में फेक न्यूज का अंबार लग गया है। लेकिन कुछ लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। इसमें मैं ‘अल्ट न्यूज’ (Alt News) का नाम लेना चाहूंगा, यह काफी अच्छा काम कर रहा है। ‘बीबीसी’ समेत कई और भी हैं जो फेक न्यूज को रोकने के लिए काफी अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन मैं यहां हर मीडिया घराने के लिए कहना चाहूंगा कि सभी का ये कर्तव्य है कि फेक न्यूज को फैलने से रोकने में अपनी भागीदारी निभाएं, क्योंकि यह रोकना सरकार का काम नहीं है। मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि फेक न्यूज को फैलने से रोकना मीडिया संस्थानों का काम है।

मेरा सभी से यही कहना है कि यदि आपके पास फेक न्यूज आती है तो उसे फॉरवर्ड होने से बचाइए। यदि आपको पता है कि यह न्यूज गलत है तो आप इस बात की जानकारी दीजिए। इसके लिए सिर्फ चार लाइन ही तो लिखनी हैं। यदि तहकीकात कर सकते हैं तो इसके लिए टीम बनाइए। कई जगह तो फैक्ट चेक टीम बनाना शुरू भी कर दिया गया है। हम लोग भी इस पर काम कर रहे हैं। हालांकि, हम अभी इस पर वीकली काम कर रहे हैं, हमारी कोशिश है कि धीरे-धीरे इस टीम को बढ़ाया जाए।

गूगल और बाकी जगहों पर ऐसे टूल्स उपलब्ध हैं, जहां से फेक न्यूज अथवा फेक विडियो की तहकीकात की जा सकती है। इसके लिए जनजागरूकता फैलाने की जरूरत है। यदि हम लोग अलर्ट नहीं रहेंगे और लोगों को अलर्ट नहीं करेंगे तो आने वाले समय में पता नहीं क्या हो जाए। लेकिन इस दिशा में अन्य लोगों के साथ हम भी काम कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में अन्य मीडिया संस्थान भी फेक न्यूज की पहचान के लिए फैक्ट चेक टीम बनाएंगे और इस तरह की फेक न्यूज को बाहर आने से पहले उसकी तहकीकात करेंगे, जैसा कि प्रिंट में होता है।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अमिश देवगन के सवालों पर अमित शाह ने यूं खोले मन के ‘राज’

सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 02 December, 2019
Last Modified:
Monday, 02 December, 2019
Amish Devgan Amit shah

महाराष्ट्र के सियासी संग्राम के बाद हर कोई यह जानना चाह रहा है कि भाजपा के दिल में 30 साल पुराना रिश्ता तोड़ने वाली शिवसेना के लिए आखिर क्या है? क्या पार्टी भविष्य में शिवसेना के साथ चुनाव लड़ेगी या फिर दोस्ती अब पूरी तरह से दुश्मनी में तब्दील हो चुकी है? लोगों की इस जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है ‘न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिश देवगन ने।

झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर चैनल के शो ‘एजेंडा झारखंड’ में बतौर अतिथि उपस्थित गृहमंत्री अमित शाह से अमिश देवगन ने कई सवाल पूछे, जिनमें महाराष्ट्र की बात भी शामिल है। सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया। मौजूदा वक्त में इस विषय से जुड़े सवालों के बिना कोई इंटरव्यू पूरा नहीं हो सकता। हालांकि, ये बात अलग है कि भाजपा नेता इस पर ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहते।

जब अमिश देवगन ने शाह से पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि शिवसेना ने यह तय कर लिया था कि वो चुनाव के बाद भाजपा के साथ सरकार नहीं बनाएगी?’ तो शाह ने शिवसेना पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए बस इतना कहा, ‘जो तय नहीं था उसकी मांग की गई। इसलिए हमें कदम वापस खींचने पड़े।‘

महाराष्ट्र के संदर्भ में अजित पवार एपिसोड भी भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है। क्योंकि कल तक भाजपा अजित पर निशाना लगाती रहती थी और सत्ता की आस में उन्हीं से हाथ मिला लिया। जायज है कि इससे जुड़े सवाल पार्टी नेताओं को विचलित कर सकते हैं, लेकिन इसकी परवाह किये बिना अमिश ने अमित शाह पर सवाल दागे। उन्होंने पूछा, ‘अजित पवार पर आपने और देवेन्द्र फडणवीस ने चुनावी रैलियों के दौरान जमकर आरोप लगाये थे, मगर आपने ही उन्हें उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया? ’ इसका शाह ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए इतना जरूर कहा कि यदि सरकार कायम रहती तो आरोपों की जांच में कोई समझौता नहीं किया जाता।

इस इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे मौके भी आये, जब अमित शाह के चेहरे पर सवालों की चुभन का दर्द साफ नजर आया। मसलन, अमिश ने राज्यों का हवाला देते हुए पूछना चाहा कि मई 2017 से नवंबर 2019 तक काफी बदलाव आया है। पहले 70 प्रतिशत देश की आबादी पर भाजपा का शासन था, अब 40 प्रतिशत राज्यों पर शासन है...लेकिन शाह ने पूरा सवाल सुने बिना ही अपनी बात शुरू कर दी। उन्होंने उल्टा अमिश को गलत ठहराते हुए कहा, ‘ठहर जाओ, मध्यप्रदेश और राजस्थान हारने के साथ ही यह चित्र बदल चुका है। इसके बाद 2019 का जनादेश आया, आप थोड़ा डाटा सही रखो, किसी के वॉट्सऐप पर मत चले जाओ। कोई वॉट्सऐप करता है उसे तुरंत उठा देते हो।’ अमिश सवाल समझाते रहे, लेकिन शाह को जो कुछ समझ आया उसी पर कायम रहे।     

इसी तरह जब देवगन ने महाराष्ट्र के संदर्भ में एक और सवाल दागा तो भी अमित शाह सीधा जवाब देने से बचते रहे। अमिश देवगन का सवाल था, ‘30 साल पुराना गठबंधन टूटने का आपको दुःख है? ’ तो भाजपा नेता से जवाब मिला, ‘आप गलत सवाल पूछ रहे हो। मैंने गठबंधन नहीं तोड़ा है, उन्होंने तोड़ा है।’ इसके अलावा राम मंदिर सहित कई विषयों पर सवाल-जवाब हुए। 

बता दें कि अमिश के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में 16 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘जी मीडिया’ जैसे जाने-माने मीडिया समूहों में काम कर चुके हैं। मई 2014 से नवंबर 2015 तक वे ‘जी बिजनेस’ चैनल के चीफ एडिटर रहे। इससे पहले ‘जी बिजनेस’ में बतौर डिप्टी एडिटर, एडिटर (आउटपुट0 और एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के तौर पर काम किया। ‘जी बिजनेस’ में रहते हुए बिजनेस चैनल के नंबर-1 डिबेट शो ‘बिग स्टोरी बिग डिबेट’ को नए मुकाम तक पहुंचाया। इसके अलावा ‘बिग एनकाउंटर’ नाम के इंटरव्यू शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई शीर्ष हस्तियों का इंटरव्यू किया। अमिश अपने अब तक के करियर में कोयला घोटाला, ओडिशा का खनन घोटाला और हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी से जुड़े कई बड़े खुलासे कर चुके हैं।

आप पूरा इंटरव्यू यहां देख सकते हैः

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मीडिया घरानों की फंडिंग पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बोली ये बड़ी बात

‘टाइम्स नाउ’ की मैनेजिंग एडिटर नविका कुमार के साथ एक इंटरव्यू के दौरान तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 November, 2019
Last Modified:
Tuesday, 19 November, 2019
Ravi Shankar

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को गुस्सा क्यों आता है? यदि आप इस सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो आपको ‘टाइम्स नाउ’ देखना होगा। दरअसल, वरिष्ठ पत्रकार और चैनल की मैनेजिंग एडिटर नविका कुमार ने हाल ही में रविशंकर प्रसाद का इंटरव्यू लिया था, जिसमें कई मौकों पर वह नाराज हो गए और आखिरकार नविका को खुद ही यह पूछना पड़ा कि रविशंकर प्रसाद को गुस्सा क्यों आता है? वैसे, मंत्री महोदय के गुस्से की वजह कुछ और नहीं, बल्कि तीखे सवाल थे। नविका ने उनसे मीडिया रेगुलेशन, दम तोड़ते टेलिकॉम सेक्टर से लेकर राम मंदिर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सवाल पूछे। रविशंकर आमतौर पर शांत मंत्रियों में गिने जाते हैं, लेकिन नविका के सवालों की तपिश इतनी ज्यादा था कि ‘शांत’ रविशंकर भी क्रोधित हो उठे। इतने क्रोधित कि उन्होंने मीडिया घरानों की फंडिंग को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दे डाली। 

मीडिया को रेगुलेट करने को लेकर सरकार अक्सर सवालों में उलझती रहती है। ऐसे में जब कानून मंत्री से सवाल दागने का मौका मिला तो नविका कुमार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से जानना चाहा कि मीडिया पर उंगली उठानी वालीं सियासी पार्टियां अपने चंदे की जानकारी सावर्जनिक करने में कतराती क्यों हैं? इस विषय पर नविका और रविशंकर के बीच कुछ देर तक नोकझोंक भी हुई। नविका का सवाल प्रसाद को पसंद नहीं आया और उनके जवाब से नविका संतुष्ट नहीं हुईं। मंत्री महोदय ने तो एक तरह से मीडिया को ही आरटीआई के दायरे में लाने की चेतावनी दे डाली।

दरअसल, नविका ने पूछा, ‘आरटीआई का मुद्दा बेहद सीधा है, लोग यह जानना चाहते हैं कि सियासी पार्टियों को चंदा कहां से आता है और कौन देता है’? इस पर प्रसाद ने कहा, ‘जब आप चुनाव लड़ते हैं तो आपको अपने बारे में पूरी जानकारी देनी होती है।’ जायज है यह सवाल का जवाब नहीं था, लिहाजा नविका ने कहा, ‘मैं किसी व्यक्ति की नहीं पार्टी की बात कर रही हूं, मोटी बात तो यही है कि पैसा का मामला आप शेयर नहीं करना चाहते।’ इस पर रविशंकर का मिजाज एकदम बदल गया। उन्होंने बेहद शांत, लेकिन तीखे स्वभाव में जवाब देते हुए कहा, ‘मैं सहमति की बात कर रहा हूं। शायद ये भी समय आएगा कि बड़े मीडिया हाउस की फंडिंग कैसे होती है, इसे भी आरटीआई के दायरे में लाया जाए, आप भी पब्लिक अथॉरिटी हैं।’

गौरतलब है कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार के रडार पर हैं, इनकी फंडिंग को लेकर पहले भी कई बार सवाल खड़े किये जा चुके हैं। लिहाजा, कानून मंत्री की इस अप्रत्यक्ष चेतावनी को संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि सरकार आने वाले वक्त में मीडिया से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसले ले सकती है। 

इस इंटरव्यू में वॉट्सऐप जासूसी कांड पर भी बात हुई। मामला उजागर होने के बाद संभवत: यह पहला मौका है, जब किसी ने सरकार से इस विषय पर सवाल जवाब किये हैं। हालांकि, ये अलग बात है कि इस विषय पर बात करना रविशंकर को पसंद नहीं आया। जैसे ही नविका ने अपना सवाल रखा, मंत्री महोदय उखड़ गए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि हमारी सरकार आजादी में विश्वास रखती है, इस तरह के सवाल न पूछे जाएं, यह सही नहीं है। नविका, प्रसाद के जवाबों में सवाल खोजकर पूछती रहीं और प्रसाद कुछ भी कहने से इनकार करते रहे और आखिरकार नविका को अपना सिर पकड़ते हुए कहना पड़ा, ‘रविशंकर प्रसाद को आखिर गुस्सा क्यों आता है’?

प्रसाद अयोध्या मसले पर भी नविका कुमार के सवालों से नाराज दिखे। नविका ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर मुस्लिम पक्ष की प्रतिक्रिया की बात करते हुए कहा, ‘उन्हें उस 67 एकड़ में ही पांच एकड़ चाहिए।’ जिसका जवाब था, ‘ऐसा है ये चर्चा सरकार से होगी, टाइम्स नाउ के चैनल पर नविका कुमार से नहीं होगी’। जब नविका ने मीडिया की जिम्मेदारी का जिक्र किया तो प्रसाद ने अपने शब्दों को कुछ नरम करते हुए अलग अंदाज में अपनी बात कही।

इसके अलावा, नविका कुमार ने एक ऐसा सवाल भी केंद्रीय मंत्री से पूछा, जिसका जवाब शायद सभी कांग्रेसी या कांग्रेस समर्थक सुनना चाहेंगे। उन्होंने पूछा कि राहुल गांधी पर प्रहार करना भाजपा का सबसे अच्छा टाइम पास लगता है? हालांकि, ये सवाल भी रविशंकर प्रसाद को पसंद नहीं आया और उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरे इंटरव्यू के दौरान रविशंकर प्रसाद असहज दिखाई दिए। नविका कुमार के तीखे सवालों ने सहज होने नहीं दिया।

इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:     

              

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अरनब गोस्वामी का पंजा नहीं झुका पाए बाबा रामदेव

अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए। आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अरनब गोस्वामी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Arnab goswami Baba Ramdev

हिंदी के न्यूज चैनल्स ने सालों तक टीआरपी के लिए बाबा रामदेव के प्रोग्राम्स, उनके इंटरव्यूज और बाद में उनके विज्ञापनों से खूब लाभ कमाया है, लेकिन अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए और वह भी तब, जब राम मंदिर पर फैसले के बाद एक डिबेट में बाबा रामदेव के बयान की क्लिप का जादू यूट्यूब पर अरनब गोस्वामी ने देखा। बाबा रामदेव ने भी अरनब गोस्वामी की ताकत का उस वक्त लोहा मान लिया, जब स्टूडियो में उनका पंजा नहीं गिरा पाए।

दरअसल, ओवैसी के बयान के बाद ‘रिपब्लिक भारत’ पर अरनब गोस्वामी ने एक डिबेट आयोजित की। उसमें थोड़ी देर के लिए बाबा रामदेव को भी लाइव लिया गया। फिर बाबा रामदेव के बयान की वह क्लिप अलग से ‘रिपब्लिक भारत’ के यूट्यूब चैनल पर डाली गई। 24 घंटों के अंदर उस पर 3.5 मिलियन व्यूज‌ आ गए। उसको देख कर पहली बार अरनब गोस्वामी को बाबा रामदेव की ताकत का अहसास हुआ। गोस्वामी ने अगले दिन ही बाबा रामदेव को फोन किया और इंटरव्यू के लिए अपने स्टूडियो में इनवाइट किया। फिर आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अर्नब गोस्वामी।

बाबा रामदेव को स्टूडियो में बुलाने की वजह यानी 3.5 मिलियन व्यूज वाला वाकया खुद अरनब गोस्वामी ने शो के शुरू में बताया। बाबा रामदेव ने भी स्टूडियो में आकर, स्टूडियो को देखकर अरनब गोस्वामी की जमकर तारीफ की। बाबा रामदेव ने कहा कि उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के तमाम स्टूडियोज देखे हैं, बीबीसी के कई देशों के स्टूडियो में वह गए हैं, ‘रिपब्लिक भारत’ का यह स्टूडियो भी इंटरनेशनल लेवल का है। बाबा रामदेव का यह भी कहना था, ‘जिस तरह से मैं किसान का बेटा होकर इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच गया हूं, उसी तरह कभी आम पत्रकार की तरह करियर शुरू करने वाले अरनब गोस्वामी इतने बड़े मीडिया ग्रुप के मालिक बन गए।’अरनब गोस्वामी ने बताया कि कैसे वह (बाबा रामदेव) रिपब्लिक की समिट में मुंबई आए थे और जब हमने यह बताया था कि हिंदी चैनल भी ला रहे हैं तो बाबा रामदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था और उसी आशीर्वाद की बदौलत यह चैनल खुल पाया है। इसके बाद इंटरव्यू शुरू हुआ। बाबा रामदेव ने राम मंदिर से जुड़ीं अपनी यादों को शेयर किया। इस दौरान तमाम राजनीतिक मुद्दों के साथ बाबा रामदेव के कामों पर चर्चा हुई, योगा पर चर्चा हुई।

आखिर में बाबा रामदेव की तारीफ करते हुए अरनब गोस्वामी ने कहा, ‘सुना है कि आपकी बॉडी काफी फ्लैक्सिबल है, जो आप कर सकते हैं, वह कोई नहीं कर सकता तो आप कुछ करके हमें दिखाइए, कुछ योगा के पोज। तब बाबा रामदेव ने पहले हाथों पर चलकर दिखाया, फिर शीर्षासन करके दिखाया। बाबा रामदेव का फोकस था कि अरनब गोस्वामी भी उनके साथ योगा के कुछ आसन करें, लेकिन गोस्वामी भी लगातार बचने की कोशिश में लगे रहे। उनका फोकस था कि ऑडियो पूरा आना चाहिए, इसलिए खुद माइक हाथ उठाकर बाबा रामदेव के पास लगा दिया। इधर बाबा की कोशिश रही कि अरनब गोस्वामी एक-दो आसन कर लें। फाइनली बाबा रामदेव ने अरनब को पहले सूर्य नमस्कार करवाया।

उसके बाद बाबा रामदेव ने अरनब को अपने साथ दंड कसरत करवाने की कोशिश की, एक दंड लगाने के बाद अरनब गोस्वामी उठ गए। उसके बाद बाबा ने अपनी ताकत दिखाई और अरनब गोस्वामी को लाइव कैमरों के सामने अपनी गोद में उठा लिया। सबसे आखिर में बाबा ने अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया।

अब ये पंजा लड़ाने का ‘मैच’ फिक्स था या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन बाबा रामदेव ने जैसे ही अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया, फौरन बोले कि अरनब के हाथों में बहुत ताकत है। दोबारा बोले कि बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। यह भी बोले की अरनब गोस्वामी से कोई पंगा लेने की कोशिश मत करना। इधर, गोस्वामी ने भी कहा कि बाबा चीटिंग मत करिए, लेकिन बाबा रामदेव उनका पंजा नहीं गिरा पाए। लेकिन जितने भी दर्शक अब तक अरनब गोस्वामी को चीखते चिल्लाते, गुस्सा करते टीवी पर देखते आए हैं, उनके लिए ये शो इसलिए अलग होगा, क्यों वह पहली बार आपको इतना हंसते हुए दिखेंगे, वह भी ठहाके मारकर। आप यह पूरा शो यहां देख सकते हैं।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

PTI एम्पलॉइज से की सूचना प्रसारण मंत्री ने मुलाकात, कहीं ये बातें

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ के मुख्यालय में पत्रकारों के साथ चर्चा के दौरान मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Friday, 04 October, 2019
Prakash Javadekar

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि पेड न्यूज (Paid News) के मुकाबले फेक न्यूज (Fake News) ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने कहा कि सरकार और मीडिया को मिलकर इससे लड़ने की जरूरत है। देश की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) के मुख्यालय में गुरुवार को एजेंसी के पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान जावड़ेकर ने कहा कि सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी, जिससे मीडिया की आजादी कम हो।

उन्होंने कहा कि जिस तरह से प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिल्मों के बारे में कुछ रेगुलेशंस हैं, उसी तरह ‘ओवर द टॉप’ (over-the-top) प्लेटफॉर्म्स के लिए भी कुछ रेगुलेशंस होने चाहिए। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स में न्यूज पोर्टल्स के साथ ही ‘वेबस्ट्रीमिंग साइट’ जैसे हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स और अमेजॉन प्राइम विडियो आते हैं।

जावड़ेकर का कहना था,‘मैंने इस बारे में सुझाव मांगे है कि कैसे इस तरह की स्थिति से निपटा जा सकता है, क्योंकि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर नियमित रूप से फिल्में आ रही हैं, इनमें अच्छी-बुरी सभी तरह की फिल्में शामिल हैं। इसलिए हमें देखना होगा कि इससे कैसे निपटा जाए, कौन मॉनिटरिंग करेंगा और कौन इसे रेगुलेट करेगा।’ सूचना-प्रसारण मंत्री का कहना था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए कोई प्रामाणिक संस्था नहीं है और न्यूज पोर्टल्स के साथ भी यही स्थिति है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। प्रिंट मीडिया पर नजर रखने के लिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ है। ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (NBA) न्यूज चैनल्स की मॉनिटरिंग करती है। इसी तरह ‘एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ ( Advertising Standards Council of India) के पास विज्ञापनों की और ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ (CBFC) के पास फिल्मों की जवाबदेही है। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। देश में न्यूज पोर्ट्ल्स की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनमें से कई के ऑनलाइन सबस्क्राइबर्स की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस दौरान फेक न्यूज का मुद्दा उठने पर उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यह पेड न्यूज से ज्यादा खतरनाक है। जावड़ेकर ने कहा, ‘फेक न्यूज को हमें मिलकर रोकना होगा। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है, बल्कि सभी को मिलकर फेक न्यूज को रोकना होगा। जो लोग न्यूज के बिजनेस में हैं, उन्हें फेक न्यूज से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।’ 

उन्होंने कहा, ‘कई मीडिया चैनल वायरल सच जैसे कार्यक्रमों के जरिये इस खतरे से निपट रहे हैं और सच को दिखा रहे हैं। प्रिंट मीडिया को भी कुछ इसी तरह के कॉलम्स शुरू करने चाहिए अथवा कुछ इसी तरह के कदम उठाने चाहिए, जिससे फेक न्यूज के बारे में सच को सामने लाया जा सके।’ सरकार ने भी कश्मीर के बारे में फेक न्यूज से निपटने के लिए दूरदर्शन न्यूज पर कश्मीर का सच नाम से कार्यक्रम चलाया है।’

जावड़ेकर का यह भी कहना था, पिछले कुछ महीनों में हमने देखा है कि बच्चे उठाने को लेकर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज अथवा अफवाहों के चलते मॉब लिंचिंग में 20-30 लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा, कि हम राज्य सरकारों से भी फेक न्यूज से निपटने के लिए कह रहे हैं। वहीं, पेड न्यूज को लेकर उन्होंने कहा कि यह अनैतिक है और मीडिया को इस पर लगाम लगानी होगी।   

‘न्यूज प्रिंट’ यानी अखबारी कागज के आयात पर लगी 10 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी को वापस लेने की प्रिंट मीडिया की मांग के बारे में जावड़ेकर ने कहा कि सभी पक्षों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और इसे जल्दी सुलझा लिया जाएगा।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी से खास बातचीत

डिवाइस और प्लेटफॉर्म कोई भी हो, जब भी न्यूज की बात आती है, लोग ‘आजतक’ पर भरोसा करते हैं

Last Modified:
Tuesday, 20 August, 2019
Kalli Purie

आज के दौर में जहां एक तरफ अधिकांश कंटेंट प्लेयर्स नंबरों की दौड़ में आगे निकलने के प्रयास में लगे हैं, आजतक ने डिजिटल की पहुंच के मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है। इसके साथ ही यह यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राइबर्स वाला पहला न्यूज चैनल बन गया है। ‘इंडिया टुडे’ (India Today) समूह की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी (Kalli Purie) ने आजतक की इस उपलब्धि और डिजिटल मीडियम पर ग्रुप के फोकस के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

‘आजतक’ ने यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राबर्स का आंकड़ा पार कर लिया है। डिजिटल मीडियम में यह संख्या बहुत बड़ी है। आखिर आपने कैसे ये सब किया?

यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राबर्स के आंकड़े को पार करना लगातार इस दिशा में प्रयास करने का नतीजा है। इसके साथ ही ‘आजतक’ के लिए हमने जो फ्यूचर स्ट्रैटजी बनाई है, यह उसका परिणाम है। यूट्यूब पर दमदार प्रदर्शन के अलावा ‘आजतक’ सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे-फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर भी आगे बना हुआ है। यही नहीं, डेस्कटॉप के साथ ही इंटरनेट और ऐप्स पर भी यह देश का सबसे बड़ा न्यूज ब्रैंड बना हुआ है। इससे साफ पता चलता है कि डिवाइस और प्लेटफॉर्म कोई भी हो, जब भी न्यूज की बात आती है, लोग ‘आजतक’ पर भरोसा करते हैं। पिछले 11 महीनों में ही आजतक ने 10 मिलियन से बढ़कर 20 मिलियन सबस्क्राइबर्स का आंकड़ा पार कर लिया है।

आप अपने डिजिटल फोकस के बारे में बताएं। डिजिटल पर आप किस तरह की न्यूज ले रहे हैं? इंटरनेट पर आपके विडियो क्या आपकी टीवी क्लिप से लिए जाते हैं या आप अपने विडियो सबस्क्राबर्स के लिए इनका निर्माण अलग से करते हैं? 

इंटरनेट पर हमारे सभी प्रमुख ब्रैंड्स और हमारे 20 मोबाइल फर्स्ट विडियो चैनल्स पर विश्वसनीय न्यूज के चलते हम लोगों की पसंद बने हुए हैं। यही कारण है कि नेशनल न्यूज, इंटरनेशनल न्यूज, रीजनल न्यूज, स्पोर्ट्स न्यूज, एंटरटेनमेंट, टेक्नोलॉजी, क्राइम न्यूज समेत विभिन्न जॉनर में हमें प्राथमिकता दी जाती है। जब तक आपका कंटेंट ऑरिजनल नहीं होगा, तब तक यह संभव नहीं है। हमने ऐसे एक्सक्लूसिव डिजिटल स्टूडियो बनाए हैं, जहां पर हमारे एंकर, ऑडियंस के साथ लाइव चैट करते हैं। हमारे पास कई माइक्रो स्टूडियो भी हैं। इनकी बदौलत हम डिजिटल कंटेंट को मजबूती प्रदान करते हैं।

आजकल युवा वर्ग (खासकर 22 से 37 साल की उम्र के लोग ) अपने स्मार्टफोन पर ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए आप क्या कर रहे हैं ?

‘आजतक’ ऐसा ब्रैंड है, जो सभी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। हम ऐसे लोगों को सभी जगह अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं, फिर चाहे वो स्मार्टफोन हो अथवा स्मार्ट टीवी, हम इसके लिए तैयार हैं। ऐसे आयु वर्ग के लोगों के लिए ब्रैंड ने सोशल मीडिया पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है, क्योंकि इन दिनों यह उनका पसंदीदा माध्यम बना हुआ है। लेकिन एक चुनौती ये है कि इस आयु वर्ग के लोग हमेशा विभिन्न डिवाइस और प्लेटफॉर्म्स के बीच घूमते रहते हैं। ऐसे लोगों को अपने साथ बनाए रखने के लिए हमें उनके अनुसार चलना होगा। मेरा मानना है कि नंबर वन होना ही काफी नहीं है। लगातार नए प्राडक्ट्स और नए फॉर्मेट्स के बारे में सोचना पड़ता है। एक साल पहले युवा और कामकाजी वर्ग को न्यूज उपलब्ध कराने के लिए हम (तक वाले यू-ट्यूब चैनल्स) ‘Tak ecosystem’ लेकर आए थे। आज हम इस दिशा में काफी आगे हैं।

इंटरनेट के फ्यूचर की बात करें तो आने वाला समय निःसंदेह विडियो ऑन डिमांड का है। इस बारे में आप क्या कर रहे हैं?

हम देश के नंबर वन विडियो पब्लिशर हैं। हमारे मोबाइल फर्स्ट विडियो प्रॉडक्स्ट्स भी काफी ग्रोथ कर रहे हैं। टॉप 20 न्यू ऐज यूट्यूब चैनल्स में हमारे छह चैनल पहले ही अपना कब्जा जमाए हुए हैं।  

आज के समय में इंटरनेट पर काफी उथलपुथल है और छोटे से लेकर बड़े प्लेयर्स तक न्यूज उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में आप दूसरों से किस तरह अलग हैं?

न्यूज इंडस्ट्री में आज सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट की रफ्तार के बीच विश्वसनीयता को बनाए रखना है। हम अपने ऑडियंस को दोनों का समावेश देते हैं। हमारे पास इंटरनेशनल एक्सपर्ट से प्रशिक्षित फैक्ट चेकिंग डिपार्टमेंट है और यह गलत सूचना अथवा फेक न्यूज को प्रसारित होने से रोकने के लिए पूरी मुस्तैदी से जुटा हुआ है। इसके अलावा हम ‘ready for air’ जैसी कठोर प्रक्रिया का पालन भी करते हैं, जहां पर विभिन्न सोर्सेज से किसी भी न्यूज की सत्यता की पुष्टि की जाती है। इसमें हमें देशभर मैं फैले अपने रिपोर्टर्स से भी काफी फायदा मिलता है, जिनसे हमें घटना के बारे में सटीक जानकारी मिलती है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

कंटेंट क्रिएटर्स के सामने हमेशा रहता है ये बड़ा मुद्दा, बोले अभिजीत सरकार

पॉलिटिकल कंटेंट में दोहराव और नीरसता ज्यादा होती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने फ्रेश कंटेंट तलाशना शुरू कर दिया

Last Modified:
Friday, 09 August, 2019
Abhijit Sarkar

तेजी से बदलते दौर में सूचनाओं का प्रवाह इतना ज्यादा हो गया है कि इसमें से अच्छा और अपने मतलब का कंटेंट तलाशना काफी कठिन काम होता जा रहा है। फेक न्यूज के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिसने लोगों की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। इन सबके बीच मीडिया दिग्गज अभिजीत सरकार ने अपना कंटेंट प्लेटफॉर्म ‘सरकारनामा’ (Sarkarnama) लॉन्च किया है। यह एक ऐसा विडियो फॉर्मेट है, जिसका उद्देश्य कला से लेकर सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से प्रकाश डालना है।  

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchnage4media) के साथ अभिजीत सरकार ने आज के समय में इस तरह के प्लेटफॉर्म्स की जरूरत और ‘सरकारनामा’ को लेकर अपने विजन के बारे में विस्तार से चर्चा की, पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सरकारनामा की लॉन्चिंग के पीछे क्या वजह है और इसकी प्रेरणा कहां से मिली?

मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही थियेटर, रेडियो और टेलिविजन से जुड़ा रहा हूं। मैं एक रेडियो जॉकी, टीवी एंकर भी रहा हूं। लेकिन कॉरपोरेट और स्पोर्ट्स सेक्टर्स में अपनी पेशेगत प्रतिबद्धता के कारण मुझे वह काम करने का समय नहीं मिल पा रहा था, जो मेरे दिल के काफी करीब है। ये चीजें हमेशा मेरे दिल और दिमाग में चलती रहती थीं। इसलिए वर्ष 2017 में मैंने इस बारे में आखिरी फैसला कर लिया और इस क्षेत्र में उतर गया। हमने अपनी शुरुआत कुछ एनिमेशंस के साथ की, इसके बाद हमने इसे स्टोरीटेलिंग के बड़े फॉर्मेट में बदल दिया, जिसे लोगों का काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिलना शुरू हो गया।

आपने इसके लिए डिजिटल-ऑनली मीडियम को ही क्यों चुना, जबकि इसमें काफी भीड़ और शोरशराबा है?

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शोरशराबे व अव्यवस्था के कारण ही हमनें कुछ ऐसा करने का निश्चय किया, जो बिल्कुल अलग और पॉजीटिव था। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगेटिविटी, नग्नता और फेक कंटेंट से मुझे सख्त नफरत है, इसलिए मैंने सोचा कि इस क्षेत्र में यदि लोगों को अच्छा और पॉजीटिव कंटेंट मिलेगा तो वे इसे काफी पसंद करेंगे। इसके लिए हमने एक गाना और स्टोरीटैलिंग एपिसोड तैयार किया, जिसमें हमने लोगों को काफी अच्छे और मजेदार तरीके से अपने मकसद के बारे में बता सकें। इसके अलावा, हमने रिसर्च पर भी काफी फोकस किया, जिससे हम अपने व्युअर्स को कुछ नया पेश करने में सफल रहे।

अब तक लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही है?

हमें लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिलनी शुरू हो गई है। हालांकि शुरुआत में इसकी रफ्तार थोड़ी सुस्त थी। धीरे-धीरे लोगों ने हमारी खासियत को नोटिस करना शुरू कर दिया। अब तो हमें अपने व्युअर्स से यह सुझाव मिलने भी शुरू हो गए हैं कि वे ‘सरकारनामा’ के अगले एपिसोड में क्या देखना चाहते हैं। हालांकि, व्युअर्स हमारी आलोचना भी करते हैं, लेकिन यह सकारात्मक तरीके से होती है। अब लोगों की हमसे अपेक्षाएं बढ़ गई हैं और हमें हर बार अपनी अच्छी परफॉर्मेंस देनी होगी। यानी हम कह सकते हैं कि सही मायने में सफर की शुरुआत अब हुई है।

आज के समय में कंटेंट क्रिएटर्स के सामने तीन बड़ी चुनौतियां कौन सी हैं?

आज के समय में कंटेंट क्रिएटर्स के सामने सबसे बड़ा मुद्दा फंड का है। फंड की उचित व्यवस्था के बिना आप क्वालिटी प्रॉडक्ट देने की स्थिति में नहीं होते हैं। मैं हमेशा भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे ऐसे दोस्त मिले हैं, जिन्होंने किसी तरह की परेशानी मुझ पर नहीं आने दी। वे हमेशा मुझे सुझाव देते रहते हैं कि अगले एपिसोड को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। इससे मुझे स्क्रिप्ट को तैयार करने के साथ ही प्रॉडक्शन में भी काफी मदद मिलती है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती कंटेंट की है। आपको अपने कंटेंट को लेकर सोच बिल्कुल स्पष्ट रखनी होगी। तुच्छ (Frivolous) कंटेंट आपको अच्छी शुरुआत तो दे सकता है, लेकिन इसे लेकर आप लंबे समय तक नहीं चल सकते हैं। लंबी दौड़ में बने रहने के लिए आपको ऐसा कंटेंट देना होगा, जिसमें गहराई और रिसर्च शामिल हो। यहां मेरे कॉलेज के दिनों का अनुभव मुझे काम आता है। 

क्या सरकारनामा सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही रहेगा या आप इसे ट्रेडिशनल मीडिया फॉर्मेट्स में लाने की योजना भी बना रहे हैं?

कुछ न्यूज चैनल्स ने मेरे कई एपिसोड्स अपने यहां दिखाए हैं। ये वो चैनल्स थे, जिन्होंने ये एपिसोड्स चलाने को मंजूरी के लिए मुझसे संपर्क किया था। हमारा मानना है कि हमारी प्रॉडक्शन वैल्यू काफी बेहतर होती है, इसलिए हमारे एपिसोड्स ब्रॉडकास्ट क्वालिटी के होते हैं। हम इस आयडिया को ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर लाने की भी सोच रहे हैं। यदि कोई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स इसके लिए हमसे संपर्क करेगा तो हमें अपना प्रॉडक्ट उसके साथ शेयर करने को लेकर काफी खुशी होगी।      

आपके विडियोज में करीब 26 विभिन्न सब्जेक्ट दिखाई दिए हैं। ऐसे में क्या ‘सरकारनामा को जानकारी देने और जागरूकता फैलाने वाला प्लेटफॉर्म कहना उचित होगा’?

हम कोई भी सब्जेक्ट चुनें, लेकिन मेरा सबसे पहला उद्देश्य अपने व्युअर्स को अच्छा और ऑरिजिनल कंटेंट देना रहता है। हमारे द्वारा चुने गए सब्जेक्ट में बहुत सारे विचारों को शामिल किया जाता है। शुरुआत में हमने उन इश्यू को लिया जो पहले से ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध थे। इसके बाद हमने काफी गहराई से रिसर्च की। उसमें कई अन्य चीजें शामिल कीं और विभिन्न मौके के लिए उसमें ऑरिजिनल गाने (जैसे-दुर्गा पूजा, स्वतंत्रता दिवस, फ्रेडशिप डे, वैलेंटाइन डे, होली आदि) शामिल किए। इसके बाद हमने रिलेशनशिप पर नए एपिसोड बनाए। ये सब्जेक्ट समाज से जुड़े हुए थे। (जैसे-पति-पत्नी का रिश्ता, आर्ट ऑफ लव, हंसी-मजाक)। हमने म्यूजिक जॉनर में भी कई नए प्रयोग करने का पयास किया। स्टोरटैलिंग के अपने स्टाइल को और बढ़ाने के लिए हमने मूल गीतों और कंपोजीशन का इस्तेमाल किया।  

आने वाले दो साल में कंटेंट उपभोग करने का ट्रेंड कैसा होगा, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

मौटे तौर पर हम कंटेंट के उपभोग को दो भागों (पॉलिटिकल और नॉन पॉलिटिकल) में बांट सकते हैं। पिछले पांच सालों में पॉलिटिकल कंटेंट का उपभोग ज्यादा रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं। इसका कारण यह है कि पॉलिटिकल कंटेंट में दोहराव और नीरसता ज्यादा होती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने फ्रेश कंटेंट तलाशना शुरू कर दिया। इसलिए अगले पांच सालों में हमें बेहतर और नया कंटेंट देखने को मिलेगा। हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में क्लासिकल कंटेंट में भी बदलाव दिखाई देगा।

‘सरकारनामा’ को लेकर आपका अगले पांच साल के लिए क्या विजन है?

हमने पहले ही लंबे और छोटे एपिसोड को मिलाना शुरू कर दिया है। आने वाले समय में हम मानवीय संबंधों और समाज से जुड़े अन्य विषयों पर काम करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन इनका अंदाज बिल्कुल ही अलग होगा। हम लोक संगीत और लोक रंगमंच का इस्तेमाल करेंगे, क्योंकि हम उन आर्ट फॉर्म्स को भी पुर्जीवित करने की योजना बना रहे हैं, जो या तो खत्म हो चुके हैं अथवा खत्म होने की कगार पर हैं। हम अपने एपिसोड में नाटकों के साथ भी प्रयोग कर सकते हैं। देखते हैं कि यह कैसा रूप लेता है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हम इसमें बदलाव भी कर रहे हैं।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए