डिजिटल पर 'पेड' या 'फ्री' IPL के प्रसारण का TV व्युअरशिप पर असर नहीं: अजीत वर्गीज

‘डिज्नी स्टार’ (Disney Star) में नेटवर्क की ऐडवरटाइजिंग सेल्स के हेड अजीत वर्गीज ने एक्सचेंज4मीडिया की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत में तमाम पहलुओं पर रखी अपनी राय

Last Modified:
Thursday, 13 April, 2023
Ajit Varghese

‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (IPL) 2023 अब तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। दर्शकों और विज्ञापन के पैसे के लिए ‘डिज्नी स्टार’ (Disney Star) और ‘रिलायंस जियो’ (Reliance Jio) के बीच टक्कर ने टीवी बनाम डिजिटल के बीच की बहस को और तेज कर दिया है। इस साल पहली बार इस लीग के लिए मीडिया अधिकार दो नेटवर्क्स के बीच बंट गए हैं। ऐसे में मार्केट दोनों माध्यमों पर दर्शकों की संख्या (व्युअरशिप) को लेकर दावों और प्रतिदावों से भरा हुआ है।

इस बारे में ‘डिज्नी स्टार’ (Disney Star) में नेटवर्क की ऐडवरटाइजिंग सेल्स के हेड अजीत वर्गीज को आईपीएल के मामले में डिजिटल के मुकाबले टीवी के दर्शकों की ज्यादा संख्या को लेकर कोई संदेह नहीं है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत में वर्गीज ने जोर देकर कहा कि डिजिटल माध्यम पर आईपीएल फ्री है अथवा पेड है, इस बात का टीवी व्युअरशिप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वर्गीज के अनुसार, चूंकि इस लीग को बड़ा दर्शक वर्ग और परिवार देखते हैं, ऐसे में करीब 75 प्रतिशत रेवेन्यू टीवी को मिलेगा।   

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

हमारे सूत्रों का कहना है कि आप पिछले वर्षों के विपरीत इस बार अपनी इन्वेंट्री रोक रहे हैं। जबकि पूर्व में आप सीजन की शुरुआत में पूरी तरह से इन्वेंट्री लगा देते थे। क्या यह जानबूझकर किया जा रहा है या यह मार्केट की स्थितियों के कारण हो रहा है? आपके लिए अब तक का आईपीएल कैसा रहा है?

इंडस्ट्री पिछले करीब छह महीनों से प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजर रही है और इसका आईपीएल से कोई लेना-देना नहीं है। आप किसी भी क्षेत्र या बिजनेस को देख सकते हैं, चाहे वह स्टार्ट-अप हो या ई-कॉमर्स। यह विभिन्न माध्यमों और बिजनेस में आपको दिखाई देगा। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर प्रतिकूल परिस्थितियों से आर्थिक दबाव बढ़ता है। इसके अलावा व्यापक तौर पर फैले मार्केट का भी असर पड़ता है और यह उस तरह के पूर्व निर्धारित नहीं है, जिस तरीके से कोई चाहता है। जैसे- जैसे हम आगे बढ़ते हैं और कुछ कहते हैं, तमाम निर्णय हो रहे हैं। मार्केटर्स भी इस दिशा में सोच रहे हैं और निवेश फैला रहे हैं। इसका किसी मीडियम यानी माध्यम से कोई लेना-देना नहीं है। यहां खास बात यह है कि जब डिजिटल बनाम टीवी की बात आती है तो हमने खर्च के मामले में मार्केट में कोई बदलाव नहीं देखा है।

इस बार के आईपीएल को लेकर मार्केट में काफी निगेटिव बातें भी चल रही हैं। इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इससे मार्केटर्स भ्रमित हो गए हैं। ऐसे में उनमें से कुछ ने प्रतीक्षा करें और देखें (wait & watch policy) की पॉलिसी अपनाई हुई है। क्या आप इस बात से सहमत हैं?

हमारी ओर से नकारात्मक टिप्पणी कभी नहीं आई है। हमने केवल अपनी उपलब्धियों और अपनी मजबूती (strength) के बारे में बात की है। हम किसी तरह की नकारात्मक बात नहीं फैलाते हैं। हमारा मानना है कि कि प्रत्येक प्लेटफॉर्म का अपना महत्व होता है। हम ऐसे ईकोसिस्टम में भी काम कर रहे हैं जहां हम डिजिटल पर स्पोर्ट्स देते हैं। रही बात बाजार में कंफ्यूजन की तो यह बहुत सारे भ्रामक डाटा के कारण हो सकती है। हम मानते हैं कि किसी भी कंफ्यूजन को दूर करने के लिए उसकी पुष्टि की जरूरत है। मुझे लगता है कि क्लाइंट्स स्पष्टता चाहते हैं। हम यहां अपनी टीवी स्टोरी को बेचने के लिए हैं, न कि किसी और की स्टोरी को झुठलाने अथवा नकारने के लिए।  

पिछले महीने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि स्टार इंडिया इस आईपीएल में अपना आधार खो सकता है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया था कि विज्ञापन राजस्व (ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू) का बड़ा हिस्सा (60% तक) डिजिटल में जाने की उम्मीद है और आपको सिर्फ 40% ही मिल सकता है। आपका इस बारे में क्या कहना है?

हम आईपीएल को तीन एंगल्स से देखते हैं। पहला है- कंज्यूमर का अनुभव, दूसरा आईपीएल शुरू होने के बाद आने वाले आंकड़े और तीसरा विज्ञापनदाताओं का सपोर्ट। अगर मैं कंज्यूमर के अनुभव की बात डिजिटल बनाम डिजिटल ही करता हूं, तो हमने देखा है कि डिजिटल के मुफ्त होने का टीवी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है और मैं आपको तीनों दावों को लेकर डेटा दे सकता हूं। हमने टीवी बनाम डिजिटल में कोई बदलाव नहीं देखा है और न ही बजट में कोई बदलाव हुआ है। हमेशा कुछ क्लाइंट्स ऐसे होते हैं जो डिजिटल अधिक करते हैं और कुछ ऐसे क्लाइंट होते हैं जो टीवी अधिक करते हैं और यह मिश्रण समान रहा है। आप जिस रिपोर्ट के बारे में बात कर रही हैं, वह मुझे पूरी तरह से बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई लगती है और उनके द्वारा जो दावे किए गए हैं, संभवत: उन पर पर्याप्त रिसर्च नहीं किया गया है।

टीवी और डिजिटल के बीच ऐड रेवेन्यू के विभाजन को लेकर आपका क्या अनुमान है?

हमारे वर्तमान विश्लेषण के अनुसार, यह रेंज लगभग 75% टीवी और 25% डिजिटल है। हमने यह विश्लेषण पिछले वर्षों के अपने डेटा के आधार पर और अपने एजेंसी पार्टनर्स और क्लाइंट्स से बात करने के बाद किया है, जो दोनों के साथ बिजनेस कर रहे हैं। हमने इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा है। अगर आप ‘बार्क’ (BARC) के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल की तुलना में पहले दिन ही टीवी की रेटिंग में 31% की बढ़ोतरी हुई है और टीवी देखने का समय 50% बढ़ गया है। टीवी देखने के समय में वृद्धि कंज्यूमर के बेहतर अनुभव का स्पष्ट संकेत है। यह उस माध्यम की ताकत को दर्शाता है, जहां लोग परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताते हैं और इस खेल को बड़ी स्क्रीन पर देखते हैं। हमने यह भी देखा है कि पहुंच दो अंकों में बढ़ रही है। ये आंकड़े हमारे विश्वास की पुष्टि करते हैं कि डिजिटल माध्यम पर आईपीएल के पेड या मुफ्त होने का टीवी दर्शकों की संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

आपके प्रतियोगी ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनकी टक्कर में आपने एक मेलर में अपने 2019 के आंकड़ों रखे हैं, जब आईपीएल को हॉटस्टार पर भी मुफ्त में स्ट्रीम किया गया था। क्या आप मानते हैं कि इस तरह की बातों से मार्केटर्स और एजेंसियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है?

ऐप के डाउनलोड की संख्या के बारे में मार्केट में बहुत सारे दावे (claims) और प्रतिदावे (counterclaims) हैं। मैं यहां कुछ बातें स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमें यह देखने की जरूरत है कि इन नंबरों की तुलना पिछले वर्ष के डेटा और वास्तविकता से कहां की गई है। यदि हम प्लेटफॉर्म रीच के बारे में बात करें तो भले ही मैं पहले सप्ताहांत में 10 करोड़ का दावा करने वाले सार्वजनिक डेटा को मानूं तो  यह वास्तव में हॉटस्टार के 2019 के नंबरों की तुलना में 26% कम है, जब हम इसे मुफ्त में दिखा रहे थे।

कुल मिलाकर देखा जाए तो दुनिया भर में डिजिटल तेजी से बढ़ रहा है। यह आईपीएल के लिए गिरावट कैसे दिखा सकता है?

हम डिजिटल के समग्र विकास पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। मैं जिस बिंदु के बारे में बात कर रहा हूं वह वर्तमान आईपीएल के बारे में है। मुझे इस बात का सटीक उत्तर नहीं पता लेकिन यह ऐप के बदलाव के कारण हो सकता है। हमने देखा है कि कंज्यूमर्स अभी भी हॉटस्टार पर आ रहे हैं। पहले दिन हमने हॉटस्टार ऐप के बड़ी संख्या में डाउनलोड देखे हैं, क्योंकि यह पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान आईपीएल देखने के लिए पसंदीदा स्थान रहा है। हम टीवी देखने के समय के दावों की बात करें तो यह पिछले साल SVOD में हॉटस्टार की तुलना में 25-26% कम हैं।

इस बीच, डिजिटल का अनुभव सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है। इसमें ऐप क्रैश होने, बफ़रिंग और लॉगिंग समस्याओं की बात कही गई है। संभवत: पिछले वर्ष की संख्या की तुलना में इसकी संख्या में कमी आई है। इसके अलावा इसे फिर से एक नया ऐप मानते हुए, बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। लोग हॉटस्टार पर आईपीएल देखने के आदी हैं। तीसरा, इंस्टॉल और डाउनलोड होने वाले ऐप की संख्या में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ है। यह दावा किया गया है कि 25 करोड़ लोगों ने ऐप (शुरुआती दिन) और सप्ताहांत में 50 करोड़ लोगों ने डाउनलोड किया।

लेकिन हमने प्रकाशित स्रोतों और तीसरे पक्ष के डेटा को देखा है,। ये आंकड़े उन दावों के आस-पास भी नहीं हैं। यह सच हो सकता है कि बहुत सी चीजें रहीं, जिनके लिए उन्होंने योजना बनाई थी और जो नहीं हुई हैं।

डिज्नी स्टार ने आईपीएल के टीवी अधिकारों के लिए 23,575 करोड़ रुपये का भुगतान किया है, जिसका मतलब है कि आप प्रत्येक मैच के लिए 57.5 करोड़ रुपये का भुगतान करेंगे, आप इस पैसे को कैसे वसूलने की योजना बना रहे हैं?

मार्केट में परिवर्तन होता रहता है। दिन के अंत में हम यह तय नहीं करते हैं कि मंदी कब होगी, कब उछाल आएगा और उसके क्या निहितार्थ होंगे। यह पांच साल की प्रॉपर्टी है, जिसमें हमने निवेश किया है। हमें विश्वास है कि टीवी पर खर्च जारी रहेगा और यही कारण है कि हम इतने आशान्वित हैं। जब तक हम मार्केटर्स को टीवी की ताकत के बारे में समझा सकते हैं, मुझे भविष्य में भी चिंता करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता है। हमारे लिए यह सबसे महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि कंज्यूमर्स को हमारे मीडियम पर आईपीएल का शानदार अनुभव मिले। इसी पर हमारा ध्यान केंद्रित है और पैसा इसके पीछे आएगा।

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सुधीर चौधरी का बेबाक इंटरव्यू, बोले-झूठी FIR का हुआ शिकार

‘न्यूज नेक्स्ट’ (News Next) 2023 के दौरान ‘बिजनेसवर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के तमाम सवालों का वरिष्ठ टीवी पत्रकार सुधीर चौधरी ने दिया बेबाकी से जवाब

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 05 September, 2023
Last Modified:
Tuesday, 05 September, 2023
Interview

‘एक्सचेंज4मीडिया’ (e4m) समूह की ओर से एक बार फिर अपनी वार्षिक मीडिया समिट ‘न्यूजनेक्स्ट’ (NEWSNEXT) का आयोजन किया गया। नोएडा स्थित होटल रैडिसन ब्लू में 27 अगस्त को सुबह नौ बजे से इसका आयोजन किया गया। यह ‘न्यूजनेक्स्ट’ का 12वां एडिशन था। इस कार्यक्रम के तहत न्यूज टीवी के दिग्गज, मीडिया एक्सपर्ट्स, एडवर्टाइजर्स, ब्रैंड मार्केटर्स, शिक्षाविद् और ग्लोबल मीडिया से जुड़े लीडर्स एक मंच पर जुटे और टीवी न्यूज के भविष्य समेत इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। ‘न्यूज नेक्स्ट’ (News Next) 2023  में एक सेशन के दौरान ‘बिजनेसवर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और ‘आजतक’ के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर चौधरी के बीच लंबा वार्तालाप हुआ और विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इस बातचीत के दौरान डॉ. अनुराग बत्रा द्वारा पूछे गए तमाम सवालों का सुधीर चौधरी ने बेबाकी से जवाब दिया।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आप 28 साल से ज्यादा समय से पत्रकारिता की दुनिया में हैं। आपने अभी जिक्र किया कि गोदी मीडिया शब्द को लेकर किस तरह ट्रोलिंग की जाती है और किस तरह का माहौल तैयार किया जाता है, आखिर यह कौन कर रहा है और जो लोग (कुछ पत्रकार) ऐसा करने में जुटे हैं, उससे उन्हें क्या फायदा होता है?

मुझे लगता है कि यह एक पॉलिटिकल ईको सिस्टम है, जो यह सब कर रहा होगा। जैसा मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा। ये फेसबुक पर नहीं है, इंस्टाग्राम पर नहीं है। यह सबसे ज्यादा ट्विटर पर है, जिसका कि सबसे छोटा बेस है। लगभग ढाई-पौने तीन करोड़ का बेस है। 2014 से पहले भी जब मैं देखता हूं तो ऐसा नहीं है कि लोग उस समय की सरकारों के पक्ष में गीत नहीं गाते थे। शायरी नहीं लिखते थे और हर तरह से उनको समर्थन नहीं करते थे। बिल्कुल करते थे। लेकिन तब तक वह ठीक था। वह असली (genuine) पत्रकारिता मानी जाती थी। मैं इसे किसी पार्टी से जोड़ना नहीं चाहता। मैं इसे नेशनलिज्म से पहले का दौर जोड़ना चाहता हूं। पिछले दस वर्षों में हमारे देश में कुछ बड़े बदलाव आए हैं।

एक तो हमारे मेनस्ट्रीम मीडिया में राष्ट्रवाद की जगह आ गई। इससे पहले नेशनलिज्म अथवा राष्ट्रवाद की कोई बात नहीं करता था। दूसरा, अचानक से ब्रैंड इंडिया को लेकर तेजी देखने को मिली। तीसरी बात मुझे यह लगती है कि देश में बहुसंख्यक आबादी (हिंदुओं) में जागृति आई है। मुझे लगता है कि ये तीन चीजें हुईं और एक ईकोसिस्टम जो पहले काफी कंफर्टेबल था, वह अचानक से एक्टिव हो गया। इस पूरे नैरेटिव के शिकार कुछ खास लोग होते हैं। यदि आप मुझे देखेंगे, मेरी पैकेजिंग देखेंगे तो उससे आपको अंदाजा लग जाएगा कि खास तरह के लोग ही ट्रोलिंग का निशाना बन रहे हैं, जबकि दूसरी तरह के लोग इसका निशाना नहीं बन रहे हैं। उनकी आज भी तारीफ होती है।

इसलिए मुझे लगता है कि ऐसा कुछ नहीं है, सिर्फ पॉलिटिकल टूल की तरह इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे देश में सोशल मीडिया भी चुनाव जीतने का एक तरीका हो गया है। आज के दौर में नेता और खाकी वर्दी अपनी विश्वनसीयता खो चुके हैं। अगली बारी मीडिया की है और आपने देखा होगा कि न्यायपालिका के साथ भी यही हो रहा है। आज से कुछ साल पहले न्यायपालिका कोई फैसला सुनाती थी तो इस तरह से ट्रोलिंग नहीं होती था। लेकिन आज, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की ट्रोलिंग हो जाती है। यह कितना बड़ा बदलाव है।

आपने एक पत्रकार के तौर पर अपना करियर शुरू किया। फिर आप एक एंकर बने, एडिटर बने। फिर सीईओ बने और एक शो होस्ट बने। आपका यह सफर कैसा रहा और आप अपने शो को लेकर किस तरह तैयारी करते हैं?

काफी समय पहले टीवी18 (अब नेटवर्क18) एक छोटा सा प्रॉडक्शन हाउस हुआ करती थी। वह प्रोडक्शन हाउस एक बिजनेस शो ‘इंडिया बिजनेस रिपोर्ट’ बीबीसी के लिए और दूसरा शो ‘अमूल इंडिया शो’ स्टार टीवी के लिए करता था। मैं बतौर रिपोर्टर इन दोनों शो के लिए काम करता था। इसके बाद धीरे-धीरे मैं आगे बढ़ता गया और आज यहां तक पहुंचा हूं। जब मैंने टीवी की दुनिया में अपनी शुरुआत की थी, उस दौर में टीवी के तमाम लोग अखबार की खबरें पढ़कर खबरें तय करते थे।

अब ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर जो चल रहा है अथवा ट्रोल हो रहा है, उसके आधार पर अपना कंटेंट तय करते हैं। इस दौरान तमाम पत्रकारों ने बाहर निकलना बंद कर दिया। बाहर यदि निकले भी तो लोगों से बात करना बंद कर दिया। लेकिन मैं यदि कहीं जाता हूं और लोगों से बात करता हूं तो इस बातचीत के दौरान ही कोई न कोई स्टोरी आइडिया आ जाता है। मैं अपनी बात करूं तो यह मेरा सौभाग्य है कि बहुत बड़ी संख्या में लोग मुझे मेल लिखते हैं, मुझे वॉट्सऐप करते हैं। बड़ी संख्या में लोग मुझे स्टोरी को लेकर सोशल मीडिया पर संदेश भेजते हैं और कहते हैं कि आप इसे करिए। तो सोशल मीडिया पर जो ट्रोलिंग हो रही है और अखबार में जो छप रहा है।

उसके अलावा तीसरी बड़ी बात यह है कि जो आम जनता है, उसके मुद्दे कैसे आपको पता चलेंगे, क्योंकि न तो वह अखबार में आ रहे हैं और न ही सोशल मीडिया पर। मुझे लगता है कि ट्विटर तो अब सिर्फ एक पॉलिटिकल टूल बन गया है, जिसे तमाम राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रही हैं। इसलिए मुझे लगता है कि स्टोरी के लिए हमें स्टूडियो से बाहर निकलकर जनता के बीच जाने की जरूरत है। यदि आप वहां से इनपुट और फीडबैक लेंगे तो आप फिर बिल्कुल अलग नजर आएंगे।

आप पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में हैं। आपके बारे में सोशल मीडिया पर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। क्या जो कहा जा रहा था और जिस संदर्भ में कहा जा रहा था, वह ठीक था? आपने इस बारे में न कभी सोशल मीडिया पर टिप्पणी की और न ही उस मुद्दे पर कभी चर्चा की। आज इस मंच पर इस बारे में आपका क्या कहना है?

मेरा मानना है कि एक प्रोफेशनल पत्रकार और एक प्रोफेशनल एंकर के तौर पर आपकी ट्रेनिंग इस तरह होनी चाहिए कि यदि आपका गेस्ट कुछ इस तरह का व्यवहार करता है जो आपको सकते में डाल दे अथवा सरप्राइज कर दे तो आपको पता होना चाहिए कि उस समय आपको क्या करना है। उस समय आपको वहां एक कुश्ती का मैदान नहीं बना देना चाहिए। वो मेरा मंच नहीं था बल्कि वो एक बहुत बड़े चैनल का मंच था और उसका एक मकसद था। उसका मकसद मेरी निजी बातें करने का नहीं था। मैं भी चाहता तो वहां अपनी कुछ निजी बातें कर सकता था, लेकिन वह मंच उस चीज के लिए था ही नहीं। उस जैसी स्थिति में एक प्रोफेशनल एंकर यही सोचेगा कि यह पूरी बातचीत मुद्दे से हटे नहीं और मैंने भी वही किया। मैंने उस माहौल को और आगे बिगड़ने नहीं दिया।

मुझे लगता है कि सारा देश उस क्लिप को देख चुका है। देखने वालों को यह तय करना चाहिए कि इस बारे में उनकी राय क्या बनती है। किसने क्या कहा, सवाल होने चाहिए या नहीं होने चाहिए। लेकिन, मैं फिर से आपको यह कहता हूं कि ऐसा माहौल जरूर बन रहा है, कि एक पत्रकार के ऊपर पहले से ही ऐसा दबाव बना दिया जाए कि वो अगली बार यह सवाल पूछे ही नहीं। उसे अपना पुराना समय अथवा ट्रोलिंग याद आ जाए। मैंने भी देखा कि उस दिन के बाद से एक खास वर्ग के लोग मेरे लिए ट्रोलिंग करने लगे। मैं तो यही कहूंगा कि मैंने उस मंच की पवित्रता को भंग नहीं होने दिया। शालीनता मेरा शुरू से आभूषण रहा है। मेरे 28 साल के करियर के दौरान आपको एक बार भी ऐसा कभी नहीं मिला होगा, जब मैंने किसी का अपमान किया हो। अथवा अपने मेहमान का जिसका मैंने इंटरव्यू किया हो, उससे कुछ ऐसा सवाल पूछ लिया हो, जिससे वह परेशानी में पड़ जाए। क्योंकि वो हमारा मेहमान है। अगर आप खुद को कुछ हजार लाइक्स, ट्वीट आदि देने के लिए किसी का अपमान कर करते हैं तो मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ी कीमत है। मैंने ऐसा कभी नहीं किया। मैं बहुत खुशी से आपको बता सकता हूं कि मैंने अपना वो ट्रैक रिकॉर्ड आज भी बरकरार रखा है। 

दूसरी बात यह कि मुझसे कई लोगों ने यह पूछा है कि उस इंटरव्यू में मुझसे एक सवाल पूछा गया था कि जब आप जेल में थे तो क्या हुआ। ये ऐसी बात है, जिस बारे में मैं पहले बार किसी सार्वजनिक मंच पर बोल रहा हूं। मुझे लगता है कि आज के बाद यह सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 2012 में राजनीतिक रूप से एक झूठा और गलत केस मेरे ऊपर दायर किया गया। उस समय तत्कालीन सरकार की पूरी कोशिश यही थी कि पूरे के पूरे मीडिया हाउस को मिटा दिया जाए। वह मीडिया हाउस जो उनके साथ जुड़ा हुआ नहीं था। उस मामले में एक एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें मेरा नाम था, 'जी बिजनेस' के एडिटर और मेरे सहयोगी समीर अहलूवालिया का नाम भी उस एफआईआर में था। ‘जी’ ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा और उनके भाई जवाहर गोयल का नाम भी उस एफआईआर में था। इसके साथ ही एफआईआर में सुभाष चंद्रा के बेटे पुनीत गोयनका का नाम भी था। यानी इन पांचों लोगों का नाम उस एफआईआर में था। इस बात से आसानी से समझा जा सकता है कि एफआईआर दर्ज कराने वालों की मंशा क्या रही होगी। उसके बाद अगले दो महीने मेरे ऊपर एक-एक करके लगातार पांच और एफआईआर होती गईं।

आप याद कीजिए कि निर्भया केस में मैंने निर्भया के दोस्त का इंटरव्यू किया था, उस पर भी मेरे खिलाफ एफआईआर हो गई। इसी मामले में उन्होंने मुझे गिरफ्तार किया और मैं करीब 20 दिन जेल में रहा। जब मैं वापस आया तो उसी मामले में एक एफआईआर और दर्ज हो गई। उसके बाद एक और हो गई और ये सब गैरजमानती धाराओं में थीं। कानून के जानकार इस बात को भलीभांति जानते हैं कि यदि आपको किसी को गिरफ्तार करना है तो शुरू में एक बार उस पर गैरजमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज करवा दीजिए। बाद में अदालत के चक्कर लगाते रहिए। उस समय उन लोगों की पूरी मंशा यही थी कि हमारे चैनल को बंद कर दिया जाए। सूचना प्रसारण मंत्रालय भी हरकत में आ गया और कारण बताओ नोटिस भेज दिया।

यानी जितने भी मंच उस समय हो सकते थे, सब के सब पीछे पड़ गए। इसके बाद हम लोग सुप्रीम कोर्ट गए और वहां वही कहा, जो आज मैं आपसे कह रहा हूं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से हमें राहत मिली, वरना उस समय वह चैनल ही बंद हो जाता। हैरानी की बात है कि किसी ने उस समय हमारा ज्यादा साथ नहीं दिया और मैं भी उस दौरान ज्यादातर चुप रहा। मैंने सोच लिया कि मैं अदालत में साबित करूंगा कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। उस केस को बंद होने में दस साल लग गए।

वर्ष 2012 में वह केस दर्ज हुआ था, उस समय मुझे ‘जी न्यूज’ में आए हुए महज दो महीने ही हुए थे। उस समय मैं समझ ही रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए, तब तक ये झूठे केस मेरे खिलाफ दर्ज हो गए। वर्ष 2022 में यह केस कोर्ट में बंद हो गया, जब पुलिस ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और बताया कि उन्हें इस तरह का कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित कर सकें कि ये आरोप सही हैं। इसलिए हम इसमें क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करना चाहते हैं। जिसने हमारे ऊपर ये आरोप लगाए थे, उन्होंने 2017-18 में अपनी शिकायत को भी वापस ले लिया और कहा कि ये मामला कंफ्यूजन में हुआ और उस समय कुछ और हित साधने के लिए हमने ये एफआईआर करा दी थी। इसके बाद ही उस केस को बंद होने में पांच साल लग गए। उस समय कोई भी होता तो बताता कि देखिए हम सही थे, इसलिए जीत गए, लेकिन मैं तब भी चुप रहा, क्योंकि मैं दस साल तक इस मामले में पहले भी कुछ नहीं बोला था। लेकिन अब मैं आपको बताना चाहता हूं कि वह केस बंद हो चुका है। मैं उस बारे में बोलना नहीं चाहता था, लेकिन आज मैंने आपके सामने सार्वजनिक तौर पर सब कुछ स्पष्ट कर दिया है। उस केस में मैं दोषी नहीं पाया गया।    

डॉ. अनुराग बत्रा और सुधीर चौधरी के बीच हुई इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं। 

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टीवी न्यूज की दुनिया में भारत विश्व मंच का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुका है: भूपेन्द्र चौबे

वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेन्द्र चौबे ने साझा किया कि उन्हें भी 2018 में उद्यमशीलता (entrepreneurial) के कीड़े ने काट लिया था और वह अपना खुद का वेंचर शुरू करना चाहते थे

Last Modified:
Tuesday, 29 August, 2023
BhupendraChaubey78451

पहले समय न्यूज रिपोर्टिंग दो लोगों का काम होता था। एक जिसके हाथ में भारी भरकम वीडियो कैमरा रहता था और दूसरा, एक रिपोर्टर जिसके हाथ में माइक रहता था। इसके अलावा, खबरों को प्रसारित करना कठिन था, क्योंकि दूरदर्शन ही इसके लिए एकमात्र स्थान था। यह कहना है कि लेखक व उद्यमी डॉ. भुवन लाल का।

डॉ. भुवन लाल ने 'न्यूजनेक्स्ट समिट 2022' (NewsNext Summit 2022) के दौरान वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेन्द्र चौबे के साथ गहन बातचीत में यह बात कही। उन्होंने भूपेन्द्र चौबे के साथ चर्चा की कि आज भारत में टीवी समाचारों की क्या समस्या है।

चर्चा के दौरान डॉ. भुवन लाल ने कहा कि आज चीजें कैसे बदल गई हैं और मीडिया बिरादरी में हर कोई एक लंबा सफर तय कर चुका है। इस पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने कहा कि टीवी न्यूज विभिन्न चरणों से गुजरा है और अब यह तेजी से विकसित हो रहा है। यह अब एक ऐसी स्थिति में है कि भारत विश्व मंच पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन गया है। उन्होंने कहा, जो कुछ भारतीय टीवी न्यूज पर देखा जाता है उसे विश्व स्तर पर भी देखा जाता है।

उन्होंने कहा कि 1.4 अरब लोगों की आबादी वाले देश को, जिसकी आबादी 2047 तक 1.73 अरब होने की संभावना है, पत्रकारिता के दो तत्वों - 'क्रेडिबिलिटी' (Credibility ) और 'कंट्री' (Country) की सख्त जरूरत है।"

इसके बाद वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेन्द्र चौबे ने कहा कि वह पिछले सात-आठ साल से शिखर सम्मेलन में आ रहे हैं और लगभग सभी टॉप मीडिया प्रोफेशनल के साथ पत्रकारिता के संकट पर चर्चा करते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि सभी पत्रकार ढोंगी (hypocrites) हैं, जिसमें मैं भी शामिल हूं।

चौबे ने साझा किया कि उन्हें भी 2018 में उद्यमशीलता (entrepreneurial) के कीड़े ने काट लिया था और वह अपना खुद का वेंचर शुरू करना चाहते थे, क्योंकि न्यूज मीडिया टूट चुका था।  

लेकिन फिर समस्या खड़ी हुई- पैसा कहां से आएगा? दुर्भाग्य से टीवी न्यूजरूम पर न्यूज मैनेजर्स ने कब्जा कर लिया है। इन न्यूज मैनेजर्स का पर्सनल, प्रोफेशनल या पॉलिटिकल चाहे जो भी कारण रहा हो, पत्रकारिता के मानकों को ऊपर उठाने के बजाय इसे नीचे गिराते गए। 

उन्होंने आगे कहा कि अब यह निचले स्तर पर पहुंच गया है, कि जहां आपके पास अपनी पहचान बनाने के लिए नए रास्ते खोजने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई पत्रकार पैसा चाहता है, तो एक निश्चित व्यवसाय मॉडल मौजूद है। और अगर वे उस बिजनेस मॉडल को चुनौती देने के लिए तैयार हैं, तो उन्हें पैसे के मोर्चे पर समझौता करने के लिए तैयार रहना होगा”, चौबे ने हस्ताक्षर करते हुए कहा।

जैसा न्यूज टीवी पर कंटेंट को लेकर कुछ दशक पहले कल्पना की गई थी, गुण और परिभाषा के अनुसार बदल गई है। आज सभी चीजें  कॉमर्स और टेक्नोलॉजी के इर्द-गिर्द घूमती है। उन्होंने तर्क दिया कि मैं यह बिल्कुल भी नहीं मानता कि पत्रकारों का कॉमर्स से कोई संबंध नहीं है। पत्रकारिता की सभी अपेक्षाएं  कॉमर्स से ही पूरी होंगी।

इसलिए यदि कोई पत्रकार पैसा चाहता है, तो उसके लिए एक बिजनेस मॉडल पहले से ही मौजूद है और यदि वे उस बिजनेस मॉडल को चुनौती देने के लिए तैयार हैं, तो उन्हें पैसे के मोर्चे पर समझौता करने के लिए तैयार रहना होगा। निश्चित तौर जैसे-जैसे कई नए रास्ते खुल रहे हैं, इसके साथ ही बड़े पैमाने पर अपॉर्चुनिटीज भी मौजूद हैं। टेक्नोलॉजी ही मीडिया बिरादरी में सभी को सही राह दिखाएगी।

चर्चा के अंत में, चौबे ने इस बात पर प्रकाश डाला कि उन्होंने ‘whataboutery’ नाम से एक नया शब्द देखा है, जो पत्रकारिता में विश्वसनीयता की वर्तमान स्थिति के साथ बिल्कुल फिट बैठता है।

उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है और मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि दशकों से अधिक अनुभव वाला कोई भी पत्रकार नहीं है, जिसे किसी न किसी स्तर पर दबाव में झुकना नहीं पड़ा हो और न ही विशेष पक्ष लेना पड़ा हो।'

इसलिए, भुपेंद्र चौबे का मानना है कि उनके पास अन्य पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है। यहां तक कि 99 प्रतिशत पत्रकारों के पास भी वह अधिकार नहीं है।

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मनगढ़ंत और झूठी सूचनाओं से निपटना पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती: सुधीर चौधरी

जाने-माने न्यूज एंकर और हिंदी न्यूज चैनल 'आजतक' के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर चौधरी का कहना है कि मीडिया में समय के साथ तकनीकी दृष्टिकोण से काफी बड़ा बदलाव आया है।

Last Modified:
Monday, 14 August, 2023
Sudhir Chaudhary

‘एक्सचेंज4मीडिया’ द्वारा शुरू की गई सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ (HEADLINE MAKERS) के तहत जाने-माने न्यूज एंकर और हिंदी न्यूज चैनल 'आजतक' (AajTak) के कंसल्टिंग एडिटर सुधीर चौधरी से ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने मीडिया से जुड़े तमाम अहम मुद्दों पर बात की है। इस दौरान सुधीर चौधरी ने टीवी पत्रकारिता में अपने तीन दशक लंबे करियर, ट्रोल्स और आलोचकों को लेकर अपनी राय और टीवी न्यूज के भविष्य समेत तमाम अहम पहलुओं पर बेबाकी से बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

'आजतक' पर आपके प्राइम टाइम शो 'ब्लैक&व्हाइट' को एक साल पूरा हो गया है। यह सफर कैसा रहा?

यह बहुत ही सुखद और संतोषजनक सफर रहा है। जब मैं ‘आजतक’ जैसे देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित प्लेटफॉर्म पर आया तो मैं यह सोचकर थोड़ा नर्वस था कि मेरे दर्शक इस नए शो को कितना पसंद करेंगे। उस समय मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं अपना सफर दोबारा से शुरू कर रहा हूं। यह एक तरह से ‘शोले2’ को बनाने और यह सुनिश्चित करने जैसा था कि यह वैसी ही सफल हो। अब, जब मैं लोगों के बीच जाता हूं तो वे मुझे बताते हैं कि उन्हें यह शो कितना पसंद है। मुझे ख़ुशी है कि दर्शकों ने इसे बहुत जल्दी स्वीकार कर लिया और अपना प्यार बरसाया।

‘सीधी बात’ को लेकर क्या कहेंगे?

मैं दोनों शो की मेजबानी का आनंद ले रहा हूं और मुझे उम्मीद है कि दर्शक मुझे इस नए फॉर्मेट में देखकर काफी खुश होंगे।

आप लगभग तीन दशक से न्यूजरूम का हिस्सा रहे हैं। इस दौरान आपकी नजर में न्यूजरूम में किस तरह के बदलाव आए हैं?

मुझे लगता है कि इस दौरान सबसे बड़ा अंतर टेक्नोलॉजी का है। करीब तीस साल पहले जब मैंने अपना करियर शुरू किया था,  उस समय वह बिल्कुल अलग दौर था।  वर्ष 1999 में जब मैं कारगिल युद्ध कवर कर रहा था तो उस समय सबसे बड़ी चुनौती थी कि कारगिल से दिल्ली तक फुटेज कैसे प्राप्त करें?

मैंने उस समय कैप्टन विक्रम बत्रा का एक इंटरव्यू किया था और जब वह इंटरव्यू प्रसारित हुआ, तब तक कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। यानी तकनीकी दृष्टिकोण से काफी बड़ा बदलाव आया है। आज हमारे पास एक स्थान पर एक पीसीआर और दूसरे स्थान पर रिपोर्टर और एंकर हो सकता है, इसलिए टेक्नोलॉजी ने हमारे बिजनेस में सब कुछ आसान बना दिया है।

न्यूज रूम के इस तकनीकी सशक्तिकरण के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपको एक ही बार में कई जेनरेशंस को अपनी सेवाएं देनी होंगी। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी सिर्फ हमारे पास ही नहीं आई है, बल्कि इसने व्युअर्स को भी सशक्त बनाया है। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि आज अगर मैं यहां से सीधा प्रसारण कर सकता हूं तो हमारे दर्शक भी अपने घर से सीधा प्रसारण कर सकते हैं।

आज के दौर में न्यूज सबसे पहले न्यूज चैनल्स पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर दिखाई देती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सूचना का समानांतर स्रोत बन गए हैं और इसने हमारे काम को बहुत चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह वह समय है, जब आपको अपने फॉर्मेट्स में लगातार नए पहल और नए प्रयोग करने होंगे।

ऐसा कहा जाता है कि आजकल टीवी पर न्यूज (खबरें) कम और व्यूज (विचार) ज्यादा होते हैं। आपका इस बारे में क्या कहना है?

मेरा मानना है कि टीवी न्यूज में आप जो भी बदलाव देखते हैं, वह दर्शकों की पसंद और नापसंद से आते हैं। रात नौ बजे का प्राइमटाइम शो टीवी चैनल का संपादकीय पेज होता है। यह लोगों को गहराई से उस न्यूज का अर्थ बताने के साथ-साथ यह भी बताता है कि यह न्यूज उन्हें कैसे प्रभावित करती है। अगर आप बिना किसी विश्लेषण के न्यूज दिखाएंगे तो वह अधूरी होगी, क्योंकि वह न्यूज तो पहले से ही सबके पास है। अब, जो बताना बाकी है वह यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

आज तमाम टेक कंपनियां, चाहे वह एक्स (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि हों, आपको अपनी बात कहने के लिए प्लेटफॉर्म दे रही हैं। आप वीडियो और ट्वीट आदि के माध्यम से तमाम फॉर्मेट्स में लोगों के साथ अपने व्यूज शेयर कर सकते हैं। आप इन टेक कंपनियों से अपने व्यूज शेयर करने की स्वतंत्रता खरीद रहे हैं। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे दर्शक व्यूज सुनने के लिए कितने उत्सुक हैं। यदि व्यूज हटा दिए जाएं तो आपको 24 घंटे केवल स्पीड न्यूज ही देखने को मिलेंगी। जैसे पांच मिनट में 100 न्यूज और ऐसे में आप उन न्यूज का संदर्भ कभी नहीं समझ पाएंगे।

ऐसा कहा जाता है कि आज की टीवी पत्रकारिता में हम (पत्रकार) सत्ता में बैठे लोगों से कठिन सवाल पूछना भूल गए हैं, खबरें सिर्फ प्रचार का माध्यम बन गई हैं और कुछ नहीं। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

ऐसा नहीं है। आप प्रधानमंत्री के साथ मेरे इंटरव्यूज देखें। कई लोग कहते हैं कि आप प्रधानमंत्री से कठिन प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं, लेकिन यदि आप इन सभी इंटरव्यूज को देखें तो आपको पता चलेगा कि एक भी प्रश्न ऐसा नहीं है, जो मैंने उनसे नहीं पूछा हो। प्रधानमंत्री के साथ पिछले चुनाव से ठीक पहले मेरे आखिरी इंटरव्यू में मैंने उनसे बेरोजगारी और अन्य मुद्दों के बारे में पूछा था।

इसी तरह, लोग कहते हैं कि हम अमित शाह जैसे शीर्ष मंत्रियों से कठिन सवाल नहीं पूछते हैं। आप अमित शाह के साथ मेरे सभी इंटरव्यूज देख सकते हैं और फिर मुझे बताएं कि उनमें से कौन से प्रश्न कठिन नहीं हैं।

समस्या यह है कि इस तरह की बातें फैलाने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी राजनीतिक दल के लिए काम कर रहे हैं। वे ऐसा नैरेटिव बनाते हैं कि कठिन सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है।

अगर मैं विपक्ष की बात करूं तो जो लोग कहते हैं कि सत्ता में लोग बोलते नहीं हैं, वे बताएं कि राहुल गांधी ने अपना आखिरी इंटरव्यू कब दिया था? सोनिया गांधी ने अपना आखिरी इंटरव्यू कब दिया था? आपने नीतीश कुमार का आखिरी इंटरव्यू कब देखा था?

निजी तौर पर मैं असम्मानजनक इंटरव्यू करने में विश्वास नहीं रखता। यदि कोई व्यक्ति मेरे पास गेस्ट बनकर आता है तो उसे यह अधिकार है कि वह जो कहना चाहता है, कहे। उसे स्पेस मिलना चाहिए ताकि वह अपनी बात खुलकर रख सके।

आजकल होता यह है कि जब आप एक घंटे किसी का इंटरव्यू करते हैं, तो उसका सिर्फ एक हिस्सा सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है। कतिपय लोगों द्वारा पत्रकार को बदनाम करने के लिए अथवा निहित स्वार्थों के चलते इस तरह की गलत सूचना फैलाई जाती है। मेरा मानना है कि झूठी और मनगढ़ंत सूचनाओं से निपटना आज पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

सुधीर चौधरी के साथ इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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एंकरिंग के साथ-साथ Stories से जुड़े तमाम पहलुओं पर देती हूं विशेष ध्यान: शीरीन भान

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ के तहत सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने सीएनबीसी-टीवी18 की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान से तमाम मुद्दों पर खास बात की है।

Last Modified:
Tuesday, 01 August, 2023
Shereen Bhan

बिजनेस न्यूज चैनल ‘सीएनबीसी-टीवी18’ (CNBC-TV18) की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान दो दशकों से अधिक समय से बिजनेस न्यूज का जाना-माना चेहरा हैं। देश के प्रमुख बिजनेस न्यूजरूम और 24x7 प्रोग्रामिंग को प्रसारित करने वाली बड़ी टीमों को संभालने की जटिलता के बावजूद यह उनकी काबिलियत और सब्जेक्ट पर मजबूत पकड़ ही है कि आप जब भी उनसे मिलेंगे तो आपको कभी भी उनके चेहरे पर चिंता या तनाव का कोई संकेत नहीं दिखेगा।

‘एक्सचेंज4मीडिया’ द्वारा शुरू की गई सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ (HEADLINE MAKERS) के तहत ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने शीरीन भान से तमाम मुद्दों पर बात की है। इस बातचीत के दौरान शीरीन भान ने मीडिया में अपनी अब तक की यात्रा समेत टीवी पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर खुलकर अपने विचार रखे हैं।

एक प्रड्यूसर से लेकर एंकर और अब चैनल का चेहरा बनने तक का सफर कैसा रहा?

पत्रकारिता में मेरी यात्रा काफी दिलचस्प रही है। देश को बदलते हुए और मीडिया जिस परिदृश्य में काम कर रहा है, उसे बदलते हुए देखना वास्तव में शानदार अनुभव रहा है। मैंने अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2000 में पत्रकारिता में अपने सफर की शुरुआत की। आपको बता दूं कि जब मैं पोस्टग्रेजुएशन कर रही थी, तभी मैंने ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में आने का फैसला कर लिया था। मैं एक कार्यक्रम कर रही थी, जिसे सिद्धार्थ बसु प्रड्यूस कर रहे थे और वीर सांघवी एंकरिंग कर रहे थे और मेरा काम वहां ऑडियंस को एकजुट करना और उनसे तालमेल स्थापित करना था। यह एक करंट अफेयर्स कार्यक्रम था, जिसमें लाइव ऑडियंस थे और मुझे ऑडियंस को डिबेट के बारे में बताते हुए इस बारे में उन्हें बोलने के लिए प्रेरित करना था। इसके साथ ही उन्हें इसके फायदे-नुकसान आदि के बारे में बताना था। मैंने वास्तव में इस काम का भरपूर आनंद लिया।

जब सिद्धार्थ और वीर सांघवी ने मुझे ऐसा करते हुए देखा तो उन्होंने मुझे ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में आने के लिए प्रेरित किया और कहा कि आपको इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि आप न्यूज को काफी अच्छे से समझती हैं। वास्तव में वहां से मेरी शुरुआत हुई और उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तब से लेकर अब काफी कुछ बदल गया है। जब हमने ‘सीएनबीसी टीवी18’ शुरू किया था, तब हमारे पास ओबी वैन नहीं थीं। उस समय हम वस्तुतः वीएसएनएल का उपयोग करके टेप आगे बढ़ाते थे। लेकिन आज आप अपने मोबाइल फोन का उपयोग करके दुनिया में कहीं भी प्रसारण करने में सक्षम हैं। कहने का तात्पर्य है कि तब से लेकर अब टेक्नोलॉजी के दृष्टिकोण से और डिस्ट्रीब्यूशन के दृष्टिकोण से बहुत बदलाव आ गया है।

खास बात यह भी है कि इस यात्रा में मैंने कई तरह के काम किए हैं। इसलिए मैंने सिर्फ एक एंकर के रूप में शुरुआत नहीं की और मैं सिर्फ एक एंकर नहीं रही हूं। मैंने अपने शो को प्रड्यूस भी किया है और उसे लिखा भी है। अभी भी मैं अपने शो को प्रड्यूस करना और लिखना जारी रखे हुए हूं। मैं रिपोर्टर्स के साथ उनकी स्टोरीज पर काम करती हूं और अपनी स्टोरी पर भी काम करती हूं। यानी मैं सिर्फ एंकरिंग नहीं करती बल्कि स्टोरीज से जुड़े तमाम पहलुओं पर काम करती हूं और मेरा मानना है कि इसी वजह से मुझे आज एक कुशल टीवी न्यूज प्रोफेशनलस बनने में मदद मिली है।

पिछले 22 वर्षों से आप किस तरह से लगातार शीर्ष पर बनी हुई हैं, इस सफलता के पीछे क्या राज है?

जो चीज मुझे प्रेरित करती है वह यह है कि हम अपनी मार्केट लीडरशिप को हल्के में नहीं लेते। चूंकि मार्केट में हमारी हिस्सेदारी 95 से अधिक है, ऐसे में हमारे ऊपर काफी बड़ी जिम्मेदारी है कि हम कुछ न कुछ नया और बेहतर करते रहें और अपने दर्शकों के लिए खुद को प्रासंगिक बनाए रखें। 

इसके साथ ही हमें इस बात पर भी गौर करना होगा कि हम ऑडियंस को बिजनेस न्यूज को अलग ढंग से देखने के लिए कैसे प्रेरित करते हैं। जब मैंने सीएनबीसी टीवी18 में शुरुआत की तो हमारे इस सफर के पहले 10-15 वर्षों तक तो लोग इसे केवल एक स्टॉक मार्केट चैनल के रूप में देखते थे। आज, हम उससे कहीं अधिक हैं। आज, हम एक ऐसा चैनल हैं जो आपको ऐसी विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है, जिसका उपयोग आप अपने जीवन को और बेहतर बनाने की दिशा में कर सकते हैं, चाहे वह एजुकेशन, हेल्थकेयर, इंश्योरेंस और स्टॉक मार्केट हो। हम जो करते हैं उसका यह मूल है, लेकिन हम इससे कहीं अधिक हैं। हम कॉर्पोरेट भारत के बारे में हैं, हम बिजनेस के बारे में हैं, हम बैलेंस शीट के बारे में हैं और हम एंटरप्रिन्योरशिप के बारे में हैं।

हमने बिजनेस न्यूज जॉनर (genre) का विस्तार किया है और मार्केट लीडर्स के रूप में ऐसा करना हमारा कर्तव्य था। तमाम लोग अब इसका अनुसरण कर रहे हैं और बिजनेस न्यूज को अलग ढंग से देख रहे हैं। ऐसे में मेरे लिए चुनौती यह है कि मैं रोजाना इसे न्यूजरूम में कैसे ले जाऊं और अपनी टीम को उत्साहित करूं और उन्हें काम करने के नए तरीकों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करूं।

मैं सदैव उत्कृष्टता में विश्वास रखती हूं, लेकिन उत्कृष्टता का रास्ता संयोग से नहीं बनता। इसके लिए रोजाना सुधार करना होता है और यह मुझे प्रेरित रखता है। मैं भाग्यशाली हूं कि मैं जो करती हूं, उसके प्रति जुनूनी हूं। हमारा लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है, कि हम एक उद्देश्यपूर्ण ब्रैंड बनना चाहते हैं। हम उन ऑडियंस के लिए प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं जिन तक हम पहुंचते हैं। और यही हमें प्रेरित करता है और मुझे आगे बढ़ने में मदद करता है।

आप टीमों को संभाल रही हैं और खुद भी एंकरिंग कर रही हैं। आप कैसे इतना सब संभाल लेती हैं और चीजों को किस तरह से हैंडल करती हैं?

मेरा मानना है कि यदि आपके पास ब्रेकिंग स्टोरीज वाले पत्रकार नहीं हैं। यदि आपके पास अच्छी स्क्रिप्ट लिखने में सक्षम प्रड्यूसर्स नहीं हैं तो आपके पास बहुत कुछ नहीं बचेगा। इसलिए आपको इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि यह एक जन-केंद्रित बिजनेस है। ऐसे में एक लीडर के रूप में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके पास अच्छी टीम हो। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आप एक ऐसा संगठन बनाएं जो ऑडियंस की सुनता हो, जो फीडबैक लेता हो और उस पर काम करता हो। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप एक ऐसा न्यूजरूम बनाएं जो लोगों को आवाज उठाने और अपनी राय व्यक्त करने की जगह दे। मुझे इस तथ्य पर विशेष रूप से गर्व है कि हम एक ऐसा संगठन बनाने में सक्षम हुए हैं।

आज हमारे कई स्टार कलाकार जिन्होंने अपने करियर में ऊंची छलांग लगाई है, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में ऐसा किया है। हो सकता है कि उन्होंने एक साल पहले शुरूआत की हो और आज आप उन्हें शो की एंकरिंग करते हुए देखते हैं, आप उन्हें इवेंट करते हुए देखते हैं, विशेष प्रोग्रामिंग करते हुए देखते हैं वगैरह वगैरह। मेरा मानना ​​है कि आपको एक ऐसा स्थान और संस्कृति बनानी होगी जो योग्यता पर आधारित हो। यदि आप योग्यता तंत्र को पनपने देते हैं, तो आप केवल एक संगठन संरचना पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बेस्ट आइडियाज प्राप्त करने में सक्षम होंगे।

मेरा हमेशा से मानना ​​रहा है कि संरचना कार्य को परिभाषित नहीं कर सकती है और इसने मुझे हमेशा उन लोगों को स्थान देने के लिए प्रेरित किया है जो मेरे अनुसार उस विशेष कार्य के लिए सबसे अच्छे लोग हैं। मुझे लगता है कि आपको लोगों को उनके कौशल (स्किल) के आधार पर देखना और स्थान देना होगा कि उन्हें कौन सा कार्य करना है। इसलिए मुझे लगता है कि लीडर के रूप में यह वास्तव में बड़ी चुनौती है।

एक लीडर के रूप में तमाम ऐसे प्रश्न भी होते हैं कि आप चुस्त कैसे रहते हैं? आप कैसे गतिशील रहते हैं? आप जानते हैं, दुनिया हर दिन, हर मिनट नहीं बल्कि हर सेकंड बदल रही है। ऐसे में आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि आप शीर्ष पर हैं? आप कैसे फुर्तीले रहते हैं? आप भी विनम्र कैसे रहें? आप जानते हैं मार्केट लीडर्स के रूप में मुझे लगता है कि आप कभी-कभी अपने स्वयं के मिथक पर विश्वास करते हैं। मैं इस बारे में बहुत स्पष्ट हूं कि मुझे ऐसा नहीं है कि मैं हर शो में दिखना चाहती हूं और हर शो में अपनी आवाज सुनना चाहती हूं।

आपको एक ऐसा स्थान बनाना होगा जो आपकी टीम के लोगों के लिए सुलभ हो ताकि लोगों को लगे कि वे ब्रैंड के समान संरक्षक हैं और यह एक समान अवसर वाला कार्यक्षेत्र बन जाए। साथ ही, आपको लोगों को सशक्त बनाना होगा। आपको लोगों को निर्णय लेने की छूट देनी होगी। हो सकता है कि कुछ निर्णय उम्मीद के अनुरूप न हों, लेकिन कोई बात नहीं। एक लीडर के रूप में आपका काम बाहर आकर यह कहना नहीं है, देखो, मैंने तुमसे ऐसा कहा था। आपका काम यह कहना है कि हम इससे क्या सीख सकते हैं? हम इसे बेहतर कैसे बना सकते हैं? आपको अपने लोगों के साथ खड़ा होना होगा। आप अपने लोगों को परेशानी में नहीं डाल सकते, मैं इसके बारे में बहुत स्पष्ट हूं।

आपकी नजर में समय के साथ बिजनेस न्यूज में कितना बदलाव आया है?

मैं इन बदलावों के बारे में सिर्फ सीएनबीसी टीवी18 के नजरिये से बता सकती हूं। जैसे कि मैंने अभी कहा था कि शुरुआत में हमें सिर्फ स्टॉक मार्केट चैनल के रूप में देखा जाता था, क्योंकि प्रोग्रामिंग का बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित रहता था कि मार्केट में क्या हो रहा है।

लेकिन, आज ऐसा नहीं है। हम उससे बहुत आगे बढ़ गए हैं। आप अब इसे दो हिस्सों में बांट सकते हैं। सुबह सात बजे से अपराह्न चार बजे तक जब मार्केट्स ट्रेडिंग कर रहे होते हैं, हम पूरी तरह से और तेजी से मार्केट्स पर ध्यान केंद्रित करते हैं क्योंकि उस विशेष समय में हमारे ऑडियंस के लिए यही प्रासंगिक होता है। इसलिए हम आपको घरेलू और ग्लोबल दोनों मार्केट्स में क्या हो रहा है, इसका सबसे अच्छा विश्लेषण दिखाते हैं और हमने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की हैं। दूसरा पहलू जो हमने बनाया है वह है कंपनी प्रबंधन का हर तिमाही में उनके परिणामों के बारे में बात करना। इसे सीएनबीसी टीवी18 ने तैयार किया है। इसके तहत कंपनी के बोर्डरूम को आपके और मेरे लिए, खुदरा निवेशक यानी रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए या सिर्फ एक नियमित दर्शक के लिए सुलभ बनाना है। मुझे लगता है कि यह कुछ ऐसा है, जिसने वास्तव में बिजनेस रिपोर्टिंग के तरीके को बदल दिया है।

इसके बाद दूसरा पहलू चार बजे के बाद शुरू होता है। जैसा कि मैंने कहा कि यह चैनल का दूसरा पहलू है और इसकी अपनी अलग पहचान है। इस दौरान हम हर उस चीज के बारे में बात करते हैं जो देश के रूप में हमारे लिए मायने रखती है। इसलिए यदि सुबह कंपनियों की बैलेंस शीट और मार्केट्स के लाभ-हानि के बारे में है, तो शाम देश की बैलेंस शीट के बारे में है। इसलिए इस दौरान हम देखते हैं कि कंज्यूमर्स के लिए क्या मायने रखता है। कौन-कौन से सुधार काम कर रहे हैं और कौन से सुधार काम नहीं कर रहे हैं। पूंजी की प्राथमिकता के संदर्भ में क्या करने की जरूरत है इत्यादि। ऐसे में चैनल पर शाम का समय पॉलिसी के बारे में है, पॉलिटिक्स के बारे में है। लाइफस्टाइल के बारे में है और एंटरप्रिन्योरशिप के बारे में है। यानी इस दौरान मार्केट्स से अलग देश से जुड़े तमाम पहलुओं पर बात होती है। हमने अपनी ऊर्जा को फिर से दो हिस्सों में बांट दिया है, जो हमारे ऑडियंस के लिए प्रासंगिक है।

कई बार मेरे सामने यह सवाल आता है कि आप क्यों टमाटर की कीमतों पर स्टोरी कर रहे हैं, क्योंकि आपका जो ऑडियंस है, उसे इस बात की परवाह नहीं है। आप कैसे कह सकते हैं कि हमारा ऑडियंस इस बात की परवाह नहीं करता। क्या हिंदुस्तान यूनिलीवर का मैनेजमेंट नहीं जानना चाहता है कि टमाटर की कीमतों पर क्या हो रहा है। आखिर हमें क्यों नहीं टमाटर की कीमतों पर बात करनी चाहिए? हमें क्यों नहीं मणिपुर मामले पर बात करनी चाहिए? आखिर ये सब जनता से जुड़े मुद्दे हैं। ये सभी मुद्दे देश की ‘बैलेंस शीट’ पर प्रभाव डालते हैं। ऐसे में हमें राष्ट्रीय महत्व से जुड़ी स्टोरी पर क्यों चुप रहना चाहिए?

ये वे चीजें हैं जो वास्तव में उन निर्णयों को संचालित करती हैं जो हम न्यूजरूम में प्राथमिकता के संदर्भ में लेते हैं, हम किस बारे में बात करते हैं, हम क्या करते हैं, हम किस पर रिपोर्ट करते हैं। जैसा कि मैंने कहा कि हमारी स्पष्ट सीमाएं हैं, जो ब्रैंड ने हमें दी हैं। इसलिए जब हम राजनीति को देखते हैं, तब भी हम इसे एक अलग नजरिये से देखते हैं। जब हम सुधारों को देखते हैं, तो हम इसे एक अलग नजरिये से देखते हैं। हम केवल इसलिए इन मुद्दों को नहीं छोड़ सकते क्योंकि हमें एक बिजनेस न्यूज चैनल के रूप में देखा जाता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम उन मुद्दों को अपना बना लें और अपने लेंस का उपयोग करके वहां स्टोरीज बताएं।

मैं आपको ऐसे कई उदाहरण दूंगी, जिन्हें मैं सीएनबीसी टीवी18 ब्रैंड के लिए महत्वपूर्ण योगदान मानूंगी। दरअसल, 21 साल पहले, हमने ‘यंग तुर्क’ (Young Turks) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया था। ’यंग तुर्क’ को युवा एंटरप्रिन्योर्स, नए आइडिया और उभरते भारतीय ब्रैंड्स पर फोकस करने के लिए बतौर एक प्रयोग शुरू किया गया था। हमने सोचा था कि यह एक सीरीज होगी, जो 13 हफ्ते में खत्म हो जाएगी, लेकिन इसने अपना सफर खुद जारी रखा। आज यह न सिर्फ स्टार्टअप्स को समर्पित देश का पहला शो है, बल्कि शायद स्टार्टअप्स और एंटरप्रिन्योरशिप पर दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला शो है।

यह अलग बात है कि मुझे इसके 21 साल तक चलने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन हमने वह जगह बनाई, हमने वह मंच प्रदान किया, हमने नियमित रूप से बच्चों को बड़े सपने देखने की क्षमता दी। हमने यह देखने के लिए अपनी अंतरात्मा को निखारना भी सीखा है कि वे अगले बड़े दांव क्या हैं जो हम वास्तव में दर्शकों से जोड़ सकते हैं, जो हमारे दर्शकों से जुड़ते हैं और ब्रैंड को बाजार में प्रासंगिक बनाए रखते हैं।

अपने अब तक के करियर में टीवी पर आपके सबसे यादगार पल कौन से हैं?

पिछले दो दशकों के दौरान ऐसे तमाम मौके आए हैं, जिन्हें आप यादगार कह सकते हैं। ऐसे में इनमें से कुछ को छांटना मुश्किल है। लेकिन मैं हर साक्षात्कार, हर शो को कुछ ऐसा मानती हूं, जिससे मुझे कुछ न कुछ सीखने की उम्मीद होती है। मैं इस बारे में बहुत स्पष्ट हूं, यही कारण है कि मैं अपने साक्षात्कारकर्ता के समय को हल्के में नहीं लेती।

मुझे याद है जो मेरे पहले बॉस करण थापर ने मुझे काफी सिखाया था और आप जानते हैं, वह रिसर्च और अन्य चीजों को काफी बारीकी से देखते हैं। और यही वो चीजें हैं, जिन्हें मैं बहुत करीब रखती हूं। सिद्धांतों के रूप में वे हमारे न्यूजरूम को भी चलाती हैं। और इसलिए मेरे लिए मैं कभी किसी इंटरव्यू के लिए यह कहते हुए नहीं जाती कि ‘कुछ निकाल के लेके आएंगे।‘ मैं वहां सवालों का सेट लेकर नहीं जाती, लेकिन मैं वहां यह सोचकर जाती हूं कि वे कौन से मुद्दे हैं जिनके बारे में मैं बात कर सकती हूं जो दिलचस्प हो सकते हैं। मैं उस बातचीत को कहां ले जा सकती हूं।

मैं किसी भी इंटरव्यू के लिए पूरी तैयारी के साथ जाती हूं। मैं साक्षात्कार देने वाले के समय को और अपने दर्शकों के समय को हल्के में नहीं लेना चाहती। मेरा मानना है कि यदि वे अपने जीवन के 5, 10, 15, 20 या 30 मिनट आपका शो देखने या आपके साथ बैठकर बातचीत करने में बिता रहे हैं, तो जैसा कि मैंने कहा, उन्हें यह महसूस करने की जरूरत है कि उन्हें उस अनुभव से कुछ मिला है और उनका समय बेकार नहीं गया।

मुझे यह महसूस करने की जरूरत है कि मैंने उस अनुभव से कुछ सीखा है और ऑडियंस को भी यह महसूस करने की जरूरत है कि उस कार्यक्रम को देखने से उन्हें किसी न किसी रूप में फायदा हुआ है। मैंने इस तरह बहुत कुछ सीखा है। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि 20 साल की उम्र में अपने करियर के शुरुआती दौर में ही मैं बिल गेट्स या बेनजीर भुट्टो जैसी शख्सियतों के साथ बैठूंगी और बातचीत करूंगी।

मुझे लगता है कि ये वे अनुभव अभी भी मेरी स्मृति में ताजा हैं, क्योंकि मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो पूछती हूं कि आखिर किस चीज ने इतना आत्मविश्वास दिया और मैंने ऐसा कैसे कर लिया। मुझे एन.आर. नारायण मूर्ति और नंदन नीलेकणि के साथ इंफोसिस परिसर में जाना भी याद है। यह शो उन्होंने पहली बार एक साथ किया था। मैं कह सकती हूं कि देश-विदेश में तमाम लोगों के साथ इतने शानदार अनुभव हैं कि उन्हें संक्षेप में प्रस्तुत करना कठिन है।

जब बिजनेस जर्नलिज्म की बात आती है तो वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति क्या है और इस दिशा में क्या बेहतर हो सकता है?

जहां तक ​​वैश्विक मानचित्र का सवाल है, भारत बड़ी भूमिका निभा रहा है। चाहे आप अर्थव्यवस्था के विकास के बारे में बात करें या आप क्षेत्रीय साझेदारी, द्विपक्षीय साझेदारी आदि के बारे में बात करें।पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से कोविड के बाद, जहां हम वैश्विक अर्थव्यवस्था को फिर से तैयार करने की दिशा में वैश्विक कदमों को देख रहे हैं। जिस तरह से लोग आपूर्ति श्रृंखलाओं को देख रहे हैं और इसी तरह के बदलाव भारत को फिर से महत्व में लाते है। बेशक, यह दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, इसलिए कंपनियां यहां रहना चाहती हैं।

यह हम पर भी है कि हम इसे कैसे आगे बढ़ा सकते हैं? उदाहरण के लिए मैं ‘ग्लोबल डायलॉग्स’ (Global Dialogues) नामक एक कार्यक्रम चलाती हूं, जहां हम वैश्विक सीईओ से बात करते हैं। वास्तव में प्रयास यह समझने का है कि एक वैश्विक कंपनी भारत के अवसर को कैसे देख रही है। उन्होंने यहां क्या बदलाव देखे हैं और वे किस प्रकार के निवेश करने जा रहे हैं, इससे वैश्विक दर्शकों को भारत की स्टोरी समझने में भी मदद मिलेगी।

मेरा मानना ​​है कि हमें ऐसे कंटेंट पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो भारत को वैश्विक दर्शकों के लिए सुलभ बनाएगी और लोग भारत में हो रहे बदलावों के बारे में जान पाएंगे और इन्हें समझ पाएंगे। उदाहरण के लिए, हमने बड़े बुनियादी ढांचे में हो रहे बदलाव और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर एक पूरी श्रृंखला शुरू की है। हम तकनीकी पक्ष और पॉलिसी को लेकर क्या हो रहा है, इसकी स्टोरी पर भी नजर रख रहे हैं। इसलिए मुझे लगता है कि ये सभी चीजें हैं जिनसे वैश्विक दर्शकों को भारत के बारे में काफी कुछ जानने-समझने को मिलेगा।

डिजिटल के बढ़ते दौर में आपकी नजर में न्यूज टीवी किस तरह अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है?

हम अब खुद को एक टीवी ब्रैंड के रूप में नहीं देखते। हम खुद को 360 ब्रैंड के रूप में यानी एक न्यूज प्रोवाइडर और एक कंटेंट प्रोवाइडर के रूप में देखते हैं। डिस्ट्रीब्यूशन कंज्यूमर पर निर्भर है कि वे हमें टीवी पर, अपने मोबाइल फोन पर, ट्विटर पर या यूट्यूब पर देखना चाहते हैं। यह एक विकल्प है, जिसे उपभोक्ता को चुनना होगा।

मुझे यह सुनिश्चित करना है कि आप जो भी चुनाव करें, आप मुझे वहां पाएं, यही हमारा काम है। दुनिया बदल रही है, जरूरी नहीं कि लोग टेलीविजन स्क्रीन के सामने बैठे हों। तो क्या इसका मतलब यह है कि हमारा ब्रैंड अब प्रासंगिक नहीं रहेगा? हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दर्शक जहां भी न्यूज देख रहा हो, हमें वहां मौजूद रहना होगा।

हमारे लिए चुनौती कंटेंट तैयार करने की नहीं है बल्कि डिस्ट्रीब्यूशन की है। हम कंटेंट तैयार करते रहते हैं, लेकिन चुनौती उस कंटेंट को कस्टमाइज करने की है। टेलीविजन पर जो काम करता है, जरूरी नहीं कि वह ट्विटर या इंस्टाग्राम पर भी बिल्कुल उसी तरह काम करे। हमारे पास एक बेहतरीन टीम है जो हमारे टेलीविजन कंटेंट को कस्टमाइज करने और इसे विभिन्न प्लेटफार्म्स पर होस्ट करने पर ध्यान देती है। हम अब डिजिटल फर्स्ट कंटेंट पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, इसलिए जो चीजें विशेष रूप से यूट्यूब के लिए बनाई गई हैं, इंस्टाग्राम के लिए बनाई गई हैं, ट्विटर के लिए बनाई गई हैं, आपके लिए बनाई गई हैं, उसके लिए CNBCTV18.com है।

मुझे लगता है कि हमारे लिए और आम तौर पर ब्रैंड्स के लिए चुनौती यह है कि आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि आप उन क्षेत्रों में प्रासंगिक हैं, जहां यूजर जा रहा है। इसलिए यह कंटेंट संबंधी कम समस्या है। जैसा कि मैंने कहा, यह डिस्ट्रीब्यूशन का अधिक मुद्दा है। और इसलिए यह कुछ ऐसा है जिस पर हम पिछले दो या तीन वर्षों से सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

मुझे नहीं लगता कि भारत में या विश्व स्तर पर किसी के पास इस तरह की समस्या से निपटने के लिए कोई सटीक रणनीति है। इसलिए मुझे लगता है कि इस समय वास्तव में यही भविष्य है। मुझे लगता है कि यह मिश्रित होने वाला है, यह हाइब्रिड होने वाला है। टीवी अन्य माध्यमों और अन्य प्लेटफार्म्स के साथ सह-अस्तित्व में है। आपको दर्शकों के साथ वहीं जुड़ना होगा, जहां दर्शक जा रहे हैं। आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि दर्शक वहां आएंगे, जहां आप हैं।

जब आप न्यूजरूम में नहीं होती हैं, उस समय को आप कैसे व्यतीत करती हैं यानी उस समय क्या करती हैं?

वास्तव में मेरे पास ऐसी चीजों की कोई लंबी सूची नहीं है। मैं खाने का काफी शौक है। इसलिए मैं अपना समय घूमने और खाने के लिए नई जगहें ढूंढने में बिताती हूं।  इसके साथ ही दोस्तों व अपने परिवार के साथ समय बिताना और योग करना मुझे लगता है।

आपकी गिनती काफी विनम्र, मिलनसार और जमीन से जुड़ी शख्सियत के रूप में होती है। इतनी प्रसिद्धि मिलने और न्यूज रूम के दबाव के बावजूद आप कैसे ये सब मैनेज कर पाती हैं?

मैं प्रसिद्धि को सीरियसली नहीं लेती। मैं सफलता के दिखावे और इससे जुड़ी चीजों को गंभीरता से नहीं लेती। बेशक, मैं इसका सम्मान करती हूं। मैं इसे महत्व देती हूं। मुझे अच्छा लगता है, लेकिन मैं इन चीजों को कभी खुद पर हावी नहीं होने देती और ये चीजें मुझे परिभाषित नहीं करतीं।

यह परिभाषित नहीं करता कि मैं कौन हूं। मैं इस बात को बहुत अच्छे से जानती हूं कि यह सब क्षणिक है। प्रसिद्धि और प्रशंसा, यह सब इस तथ्य से आता है कि आप टीवी पर दिखाई देते हैं। कल को अगर मैं टीवी पर नहीं दिखूंगी तो कहानी कुछ अलग होगी।

मैं हमेशा इस बात को मानती हूं कि मैं जॉब कर रही हूं। इस जॉब के तहत मुझे माइक्रोफोन पहनने को मिलता है और मुझे कैमरे के सामने बैठने व दुनिया से बात करने का मौका मिलता है, लेकिन यह मेरा जॉब है, मैं वह नहीं हूं। कल को अगर यह नौकरी नहीं रहेगी तो यह मेरे लिए आत्मविश्वास का संकट होगा अगर मैं अपनी पहचान से जुड़ी हर चीज को इसमें समाहित कर दूंगी। इसलिए मैं इस तथ्य के प्रति सचेत रहती हूं कि यह प्रसिद्धि क्षणिक है। यह आपके पास मौजूद नौकरी का एक विशेषाधिकार और लाभ है। इस चीज़ को इतनी गंभीरता से लेने के लिए जीवन बहुत छोटा है।

आपकी प्रेरणा कौन है, आप अपने पेशे में किसे मानते हैं और अपडेट रहने के लिए क्या करती हैं?

मेरा मानना है कि ज्यादा से ज्यादा पढ़ना जरूरी है। पढ़ना इसलिए है क्योंकि आप जानते हैं, इसमें से अधिकांश उन साक्षात्कारों से जुड़ा हुआ है जो आप कर रहे हैं या जो शो आप कर रहे हैं। मुझे गैर-कार्य संबंधी पढ़ने के लिए समय निकालने में कठिनाई होती है। मैं अब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूं, लेकिन यह कम होता जा रहा है। मुझे करण थापर, सिद्धार्थ बसु, राघव बहल, सेंथिल चेंगलवरायण, नारायण मूर्ति जैसे लोगों से काफी प्रेरणा मिलती है। मेरा मतलब है कि इन सभी लोगों ने मुझे अपने पेशेवर जीवन में बहुत कुछ सिखाया है।

मैं विचारों के प्रति खुला रहने और उनसे सीखने में दृढ़ विश्वास रखती हूं। मुझे हर व्यक्ति से बातचीत से प्रेरणा मिलती है, फिर चाहे मैं पांच साल के बच्चे से बात कर रही हूं या 90 साल के व्यक्ति से। मुझे लगता है कि यही चीज मुझे जीवंत रहने और आगे बढ़ने में मदद करती है।

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नाविका कुमार ने बताया, तमाम व्यस्तता के बावजूद किस तरह डेली न्यूज से खुद को रखती हैं अपडेट

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ के तहत सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने ‘टाइम्स नेटवर्क’ की ग्रुप एडिटर और ‘टाइम्स नाउ नवभारत‘ की एडिटर-इन-चीफ नाविका कुमार से तमाम मुद्दों पर खास बात की है।

Last Modified:
Monday, 17 July, 2023
Navika Kumar

‘टाइम्स नेटवर्क’ की ग्रुप एडिटर और ‘टाइम्स नाउ’ व ‘टाइम्स नाउ नवभारत‘ की एडिटर-इन-चीफ नाविका कुमार ने पत्रकारिता में अपने तीन दशक पूरे कर लिए हैं। उन्होंने अपना करियर प्रिंट मीडिया से शुरू किया था और वर्ष 2005 में टीवी न्यूज की दुनिया में आ गईं और तब से वह लगातार यहां अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

‘एक्सचेंज4मीडिया’ द्वारा शुरू की गई सीरीज ‘हेडलाइन मेकर्स’ (HEADLINE MAKERS) के तहत ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन ने नाविका कुमार से तमाम मुद्दों पर बात की है।इस बातचीत के दौरान नाविका कुमार ने मीडिया में अपनी तीन दशक लंबी यात्रा, प्रिंट से टीवी में आने और टीवी पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर खुलकर अपने विचार रखे हैं।

जब आप अपने न्यूज टीवी करियर के पिछले दो दशकों पर नजर डालती हैं, तो न्यूज रूम कल्चर में आपको कौन से बड़े बदलाव दिखाई देते हैं?

वर्ष 2005 में मैं प्रिंट मीडिया से टीवी न्यूज की दुनिया में आई। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जो प्रिंट से टीवी में आया हो, यह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। यहां मैंने लोगों को काफी युवा, ऊर्जावान, बातूनी और लगातार सक्रिय पाया, क्योंकि यहां काम की गति काफी तेज थी। आज भी इसकी स्थिति यही है। तमाम युवा लोग लगातार टीवी न्यूज की दुनिया में आ रहे हैं। इन युवाओं की आंखों में काफी सपने और सितारे होते हैं। उन्हें लगता है कि यह एक गुलाबी दुनिया है, लेकिन तमाम युवा अक्सर यह नहीं देखते हैं कि इसमें बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है और पसीना बहाना पड़ता है। यानी न्यूज रूम की भावना अभी भी वही है और बिल्कुल भी नहीं बदली है। मैं जो बदलाव देखती हूं, वह यह है कि युवाओं के पास आज अधिक आइडियाज हैं। कभी-कभी वे ऐसी जगह पहुंचने की जल्दी में होते हैं जहां पहुंचने में हमें अधिक समय लगता है। साथ ही, मुझे लगता है कि आज के दौर में एनर्जी लगातार बेहतर होती जा रही है।

देखा जा रहा है कि टीवी पर न्यूज की जगह व्यूज ने ले ली है। आपकी नजर में इसके पीछे क्या कारण है?

टेक्नोलॉजी ने हमारी जिंदगी काफी बदल दी है। पहले बहुत सी खबरें जो लोगों को टीवी चैनल्स से मिलती थीं, उनमें से बहुत सी खबरें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कवर हो जाती हैं और आपके हाथ में मौजूद फोन पर आपको समय-समय पर लगातार हेडलाइंस मिलती रहती हैं। हम भी ऐसा करते हैं। हां, आज के दौर में टीवी चैनल्स पर न्यूज से ज्यादा व्यूज ने जगह ले ली है।  

हमें यह याद रखना होगा कि जब लोगों को मोबाइल फोन पर तुरंत खबरें मिल जाती हैं, ऐसे में जब वे अपना टेलीविजन चालू करते हैं तो इसमें उन्हें कुछ वैल्यू एडिशन मिलना चाहिए। टीवी न्यूज अब ओपिनियन वाले दौर से आगे बढ़ रही है, जहां सिर्फ हेडलाइन नहीं बल्कि अब अतिरिक्त जानकारी भी होती है। इसलिए ऐसा नहीं है कि अब टीवी पर न्यूज नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि आपने हेडलाइन ब्रेक की और आगे बढ़ गए, बल्कि हम आपको एक ऐसा आयाम देते हैं, जिसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हेडलाइन में लाना संभव नहीं है। इसलिए, न्यूज में इंफॉर्मेशन शामिल करना और वैल्यू एडिशन करना न्यूज की कवरेज का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। हां, ओपिनियन जरूर केंद्र बिंदु पर  आ गया है।

काफी चीजें बदली हैं लेकिन लोगों को यह समझने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ है। अब वैल्यू ऐड, ओपिनियन, विभिन्न लोगों के विचारों को समझने के लिए उस परिप्रेक्ष्य में उन्हें प्लेटफॉर्म प्रदान करने पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। क्योंकि सामान्य समाचार भले ही उनके पास हों, लेकिन गहराई और परिप्रेक्ष्य को समझना महत्वपूर्ण है और टेलीविजन उन्हें यही प्रदान करता है।

एक न्यूज एंकर की तटस्थता के बारे में आप क्या कहेंगी, जिसके बारे में हम पत्रकारिता स्कूलों में इतनी बात करते हैं। हालांकि, व्यवहार में हमें ऐसा दिखाई नहीं देता है?

आज आप किसी भी युवा से मिलेंगे तो उसके पास अपना एक नजरिया होगा। समग्र रूप से ओपिनियन यानी राय ऐसी चीज है जो पीढ़ी को बदल रही है। टीवी न्यूज दर्शकों के लिए है और दर्शकों के अपने विचार व अपनी राय हैं। उनके लिए समाचार वह है जो उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिला है, अब उन्हें परिप्रेक्ष्य अथवा विस्तार की आवश्यकता है।  इसलिए हम जो करने का प्रयास करते हैं, वह केवल तटस्थता नहीं बल्कि संतुलन है। हम आपको पक्ष ‘ए’ और पक्ष ‘बी’ यानी दोनों पक्षों की बात देते हैं। ऐसे में आपके पास पूरी जानकारी रहती है और इसके आधार पर आप अपने निष्कर्ष खुद निकाल सकते हैं, क्योंकि टीवी अब 'इडियट बॉक्स' (Idiot Box) नहीं है। हम जानते हैं कि हमारे दर्शक बेहद बुद्धिमान हैं और वे जानते हैं कि उन्हें अपना निष्कर्ष कैसे निकालना है।

सोशल मीडिया के इस दौर में आपके पास सूचनाओं का अथाह भंडार है और तमाम तरह की सूचनाएं आपके इर्द-गिर्द घूम रही हैं। ऐसे में जब आप ‘टाइम्स नाउ’ अथवा ‘टाइम्स नेटवर्क’ जैसे ब्रैंड में आते हैं तो आपको पता चलता है कि यह एक मीडिया इंस्टीट्यूटशन है न कि सिर्फ मीडिया आर्गनाइजेशन। हमारा 182 साल पुराना इतिहास है। हमारी काफी विश्वसनीयता है। हालांकि, हम भी गलती कर सकते हैं, लेकिन हमारे पास इसे स्वीकार करने, इसे सुधारने और अपने दर्शकों को सूचित करने का साहस है।

किसी भी न्यूज ऑर्गनाइजेशन अथवा इंस्टीट्यूशन में विश्वसनीयता वाले पत्रकार काफी महत्वपूर्ण होते हैं। होता क्या है कि समाचार आपके चारों ओर तैर रहे हैं, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि आप समाचार और अफवाह के बीच अंतर कैसे करते हैं? यह केवल तभी हो सकता है जब आपका पत्रकार प्रकाश की गति से काम करे, विश्वसनीय प्रत्यक्ष स्रोतों के साथ क्रॉस-चेक करे और निर्णय ले सके कि वे जो सामने रख रहा है, वह तथ्य है या कल्पना है। यही काम हम करते हैं।

टीवी पर प्राइम टाइम एंकर चिल्लाते क्यों हैं। इस तरह की हाई-वॉल्यूम पत्रकारिता के प्रति यह आकर्षण कैसा है? क्या यह वास्तव में मदद करता है?

अधिकांश लोग कुछ शब्दों को कुछ ब्रैंड्स या संगठनों से जोड़ते हैं। इसलिए यह शोरगुल कुछ ब्रैंड्स के साथ जुड़ा हुआ है और वे कौन से ब्रैंड्स हैं, मुझे दर्शकों को बताने की जरूरत नहीं है। यदि कोई एक शब्द है जो टाइम्स ब्रैंड्स के साथ जुड़ता है, तो वह है विश्वसनीयता। पहले यह एक फार्मूला था। पहले टीवी पर बहुत शोरगुल था और मुझे लगता है कि इसकी उपयोगिता समाप्त हो गई है और अब किसी का इस तरह के शोरशराबे से कोई लेना-देना नहीं है। अब लोग मुद्दों पर विचार और राय सुनना चाहते हैं। शोरशराबे के स्थान पर लोग पूरी जानकारी सुनना चाहते हैं। जैसा कि मैंने कहा, परिप्रेक्ष्य के कारण ही लोग न्यूज चैनल्स पर आना चाहते हैं। हमारा मानना है कि टीवी देखना आनंददायक होना चाहिए। यह कोई तनावपूर्ण स्थिति नहीं होनी चाहिए, जहां आधे समय आप यह सुनने के लिए तनाव में रहते हैं कि दूसरे लोग क्या कह रहे हैं।

अब हम कनेक्टेड टीवी की बात करते हैं। कनेक्टेड टीवी के लिए न्यूज तैयार करना लीनियर टीवी से किस प्रकार अलग है?

न्यूज के नए तरीकों को अपनाने के बावजूद मैं अभी भी पुराने समय की रिपोर्टर/पत्रकार/संपादक हूं, फिर आप जो भी कहें। मैं अब भी पूरी तरह से व्यावहारिक होने के लिए मूल स्रोतों की जांच करने और उन तक पहुंचने में विश्वास करती हूं। नवीनतम जानकारी प्राप्त करने के लिए लोगों से मिलती हूं। यही हमारे ब्रैंड की स्टोरीज की खासियत है, जिसके लिए हम जाने जाते हैं। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि जिस तरह की स्टोरीज नाविका कुमार टाइम्स नाउ पर करती है, कोई व्यक्ति उसकी डुप्लीकेसी नहीं कर सकता है। अगर मुझे कुछ स्टोरी दिखाई देती है तो ऐसा नहीं है कि मैं उसे उठाऊंगी और ऑन एयर कर दूंगी। पहले मैं पुराने स्टाइल में पीछे जाऊंगी, उसे अच्छे से चेक और क्रॉस चेक करूंगी, तब लोगों के सामने रखूंगी।

आलोचकों और ट्रोलर्स से आप कैसे निपटती हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें कैसे हैंडल करती हैं?

आलोचकों अथवा ट्रोलर्स से निपटना मैंने अच्छे से सीख लिया है। शुरुआत में, जब मैं सोशल मीडिया पर आई, तो सभी ट्रोल्स से मैं हैरान रह गई। लेकिन अब यदि कोई सीख होती है तो मैं उसे सीख लेती हूं लेकिन अब मैं वास्तव में इसकी चिंता नहीं करती हूं।

प्राइम टाइम के एंकर कठिन सवाल नहीं पूछते। वे महत्वपूर्ण मुद्दों पर नरम रुख अपनाते हैं। आपकी नजर में क्या यह सच नहीं है?

यह इस पर निर्भर करता है कि क्या आप कठिन प्रश्न पूछना चाहते हैं? आप भावशून्य चेहरे अथवा हल्की व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ भी कठिन और दृढ़ प्रश्न पूछ सकते हैं। हर व्यक्ति की अपनी अलग स्टाइल होती है। मैं लोगों से सामान्य रूप से बात करती हूं और अपने इंटरव्यूज में भी इसी तरह से बात करती हूं। मुझे लगता है कि कभी-कभी फॉर्म महत्वपूर्ण होती है। आप असभ्य नहीं हो सकते। आप दृढ़ और विनम्र हो सकते हैं और फिर भी आप कठिन सवाल पूछ सकते हैं। यही मेरी शैली है।

हर व्यक्ति की अपनी शैली होती है। मेरी ज्यादा उग्र शैली नहीं है।  मेरा मानना है कि यदि आप उग्र शैली में बात करते हैं, तो आपको तैयार रहना चाहिए कि आपके सामने वाला व्यक्ति भी उसी शैली में बात कर सकता है और फिर माहौल गर्म होने के साथ असहज स्थिति बन सकती है। मैं इस तरह के हालात पैदा करने वालों में से नहीं हूं।

न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स को लेकर आपका क्या मानना है। क्या आप भी नबंरों की दौड़ में यकीन रखती हैं। आप इसे किस रूप में देखती हैं?

मेरी मानना है कि हमें हर हफ्ते होने वाली किसी अंधी प्रतिस्पर्धा (blind competition) से प्रेरित नहीं होना चाहिए और न ही इसके पीछे भागना चाहिए। मेरी नजर में इन नंबरों से ज्यादा क्रेडिबिलिटी ज्यादा महत्वपूर्ण है। आप जिस नंबरों की दौड़ की बात कर रहे हैं तो ऐसा भी होता है कि कुछ चैनल्स द्वारा खुद को नंबरों की दौड़ में आगे तो बता दिया जाता है, लेकिन उसके नीचे काफी छोटा-छोटा डिस्क्लेमर भी दे दिया जाता है कि हम फलां कैटेगरी में या फलां सेंगमेंट की बात कर रहे हैं।

मुझे लगता है कि हमें दिखावे का यह खेल बंद कर देना चाहिए जो हम हर गुरुवार सुबह इसे दिखाकर करते हैं। हमारा दृष्टिकोण उससे भी व्यापक होना चाहिए। हम नंबरों की इस साप्ताहिक ‘चूहा दौड़’ (rate race) से बाहर निकल गए हैं और वास्तव में यह हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

मुझे पता है कि वास्तविक दुनिया में बेंचमार्क बनाने के लिए कुछ रेटिंग होनी चाहिए और उन बेंचमार्क को कैसे सुधारा जाए, इस पर लगातार काम होना चाहिए। एक इंडस्ट्री के रूप में, पत्रकारों के रूप में और विभिन्न कंपनियों में प्रबंधन के रूप में हमें ऐसा करना जारी रखना चाहिए और मार्केट में वास्तविक नंबर वन को मापने का एक फुलप्रूफ तरीका लाना चाहिए। लेकिन कहीं न कहीं, नकल करने और दौड़ने, बड़े-बड़े दावे करने आदि की इस दौड़ में हर हफ्ते होने वाले इस तरह की चीजों को व्यवस्थित करने का कोई न कोई तरीका तो होना ही चाहिए। मैं नहीं मानती कि यह एक जॉनर के रूप में, एक इंडस्ट्री के रूप में हमारी विश्वसनीयता बढ़ा रहा है और अंत में यह हममें से किसी की भी मदद नहीं करने वाला है। हमें नंबरों के पीछे दौडने के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

आप हिंदी और अंग्रेजी दोनों न्यूजरूम्स को एक साथ किस तरह संभालती हैं?

मेरा मानना ​​है कि मैं अभी भी प्रशिक्षु हूं। मैं कभी भी सीखना बंद नहीं करना चाहती। जब मैंने प्रिंट मीडिया में लगभग 13-14 साल पूरे कर लिए और फिर टेलीविजन में काम करने का मौका आया तो मुझे लगा कि मेरे करियर के बीच में मुझे एक नया माध्यम सीखने का मौका मिल रहा है और मुझे इसमें जाना चाहिए और इस तरह मैं टीवी न्यूज की दुनिया में आ गई।

टीवी में, मैं एक रिपोर्टर और एडिटर बनने से लेकर प्राइम टाइम चेहरा बनने तक पहुंच गई हूं, जिसके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा बन पाऊंगी, लेकिन मैंने सीखा और मैं अभी भी सीख रही हूं। ये अवसर मेरे पास आए हैं, इसलिए मुझे लगता है कि हर अवसर जो आपके सामने आता है, वह सीखने, आगे बढ़ने, अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाने और जहां आप काम करते हैं, उस स्थान की सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए नए रास्ते खोलता है, वह ईश्वर द्वारा भेजा गया है और मैं ऐसा करना जारी रखूंगी। आज भी मैं ऐसा ही जुनून रखती हूं, जैसा मैंने अपने करियर के पहले दिन दिखाया था।

मुझे यह उतनी बड़ी चुनौती नहीं लगती, क्योंकि मैं असफलता से नहीं डरती। बहुत से लोग मुझसे पूछते रहते हैं कि आपने हिंदी कैसे सीखी? यह बिल्कुल अलग दुनिया है और मैं इसे केवल इसलिए सीख पाई क्योंकि मेरा मानना है कि इसमें रॉकेट साइंस जैसा कुछ नहीं है। मैं इंतजार करती हूं, देखती हूं और सीखती हूं। इसी तरह मैंने हमेशा अपना दिमाग खुला रखा है। मैं अपने सहयोगियों से सीखती हूं, अपने जूनियर्स से सीखती हूं, क्योंकि मेरे मन में इस तरह की कोई बात नहीं है कि मैं सब कुछ जानती हूं।

मैं पूछती रहता हूं- क्या मेरी हिंदी ठीक है, क्या मेरी अभिव्यक्ति ठीक है, ऐसा नहीं है कि मुझे हिंदी नहीं आती, लेकिन मेरी बोलचाल की भाषा ठीक है। मैं अपना रास्ता निकालने में कामयाब रहती हूं और हर दिन नई चीजें सीखती रहती हूं और यही वह हिस्सा है जिसका मैं वास्तव में आनंद लेती हूं। जो कोई भी मुझे निर्देशित कर रहा है, जो भी मेरा प्रड्यूसर है, मैं उनसे बिना किसी रोक-टोक के बातचीत करती हूं और मैं उनसे सीखती हूं। मेरी बिना किसी रोक-टोक के उनके साथ बातचीत होती है और मैं उनसे सीखती हूं। मैं अपने काम से बहुत प्यार करती हूं।  

जब आप न्यूजरूम में नहीं होती हैं, उस समय को आप कैसे व्यतीत करती हैं यानी उस समय क्या करती हैं?

मुझे रात में ओटीटी देखना, क्राइम थ्रिलर, ड्रामा ये सब पसंद है। रात में प्राइम टाइम के बाद मैं घर जाती हूं और आराम से बैठकर यही सब देखती हूं। मैं बॉलीवुड की शौकीन हूं। मैं शाहरुख, सलमान, अक्षय और रणबीर की प्रशंसक हूं, लेकिन अमिताभ बच्चन मेरे फेवरेट हैं और मैंने उनकी सभी फिल्में देखी हैं। मुझे मुजफ्फर अली, इम्तियाज अली और करण जौहर की फिल्में देखना भी पसंद है और एक सच्चे पंजाबी की तरह मुझे भव्य सेट, फिल्मों में भव्यता, अच्छे आभूषण और लहंगे पसंद हैं। मुझे संगीत में बहुत रुचि है। मैंने शास्त्रीय संगीत में कुछ प्रशिक्षण भी लिया है। इसके अलावा मुझे परिवार के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है।

दो न्यूजरूम्स की रोजाना की आपाधापी के बीच आप खुद को कैसे अपडेट रखती हैं?

मेरी ट्रेनिंग बहुत अच्छी रही। मैंने मुंबई में इकोनॉमिक टाइम्स में एक बिजनेस जर्नलिस्ट के रूप में शुरुआत की। मैं इकनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट हूं, इसलिए मैं बजट और व्यापार तथा वित्त संबंधी चीजों को समझती हूं। इसके बाद मैंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की ओर रुख किया और मैंने खोजी पत्रकारिता ज्यादातर वहीं से सीखी। मैं अखबार पढ़ती हूं और हमेशा सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करती रहती हूं, ताकि यह पता लगा सकूं कि कौन सी चीजें ट्रेंड में हैं और लोग किस बारे में बात कर रहे हैं। मैं रोजाना नौकरशाहों, राजनेताओं और न्यूज की दुनिया से जुड़े लोगों से मिलती हूं। इससे मुझे अपडेट रहने में भी मदद मिलती है। यहां तक ​​कि जब मुझे दो न्यूजरूम्स पर नजर रखनी होती है, तब भी मैं लोगों से मिलने और खबरें प्राप्त करने के इस नियम को बनाए रखती हूं।

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हमारे समूह की कंपनी नहीं है ‘डिश टीवी’: डॉ. सुभाष चंद्रा- चेयरमैन, एस्सेल ग्रुप

एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन  डॉ. सुभाष चंद्रा ने 'जी बिजनेस' (Zee Business) को दिए इंटरव्यू में साफ किया ‘डिश टीवी’ (Dish TV) हमारे ग्रुप की कंपनी नहीं है

Last Modified:
Friday, 02 June, 2023
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एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन  डॉ. सुभाष चंद्रा ने 'जी बिजनेस' (Zee Business) को दिए इंटरव्यू में साफ किया ‘डिश टीवी’ (Dish TV) हमारे ग्रुप की कंपनी नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘डिश टीवी’ मेरे छोटे भाई जवाहर गोयल की कंपनी है और आज की तारीख में यह पूरी तरह से कर्ज मुक्त कंपनी है।

उन्होंने कहा कि यस बैंक से डिश टीवी को लेकर कुछ विवाद है, मामला कोर्ट में है। एस्सेल ग्रुप की हर कंपनी में निवेश करके लोगों ने पैसा बनाया है। डिश टीवी के लेंडर्स बिना प्रोमोटर के कंपनी चलाना चाहते हैं, तो चलाएं!

इंटरव्यू के दौरान डॉ. सुभाष चंद्रा ने न केवल अपने फ्यूचर प्लान बताएं, बल्कि यह भी बताया कि कब तक कंपनी कर्ज मुक्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि इस विषय पर हमेशा खुलकर बात की है। पिछले साल एक ओपन लेटर में हमने बताया था कि 92 फीसदी से ज्यादा कर्ज चुका दिया गया है। उसके बाद भी कर्ज चुकाया गया है और अब थोड़ा ही बचा है। उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश थी कि कि 31 मार्च 2023 तक हम सारे कर्ज चुका ले, लेकिन कुछ परिस्थितियों की वजह से देरी हुई है। कुछ एसेट्स की बिक्री नहीं हुई है, लेकिन जैसे ही कुछ फाइनल होता है,  पूरी तरह से कर्ज मुक्त हो जाएंगे।

डॉ. सुभाष चंद्रा ने कहा लेनदारों ने एस्सेल ग्रुप को बहुत ज्यादा सपोर्ट किया है। लेनदार जानते हैं कि एस्सेल ग्रुप ने अपने कीमती एसेट्स बेचकर कर्ज चुकाया है। एस्सेल ग्रुप ने लेनदारों के 40,000  करोड़ रुपए चुकाए हैं। ग्रुप ने अब तक 40,000-50,000 करोड़ रुपए का सिर्फ ब्याज चुकाया है। 1967 से लेकर 2019 तक एस्सेल ग्रुप ने कभी डिफॉल्ट नहीं किया।

इस दौरान डॉ. सुभाष चंद्रा ने जी एंटरटेनमेंट-सोनी मर्जर को लेकर कहा कि इस प्रक्रिया में मेरा कोई बड़ा योगदान नहीं है। जी एंटरटेनमेंट-सोनी पर मेरा कुछ बोलना ठीक नहीं रहेगा। इसके लिए कंपनी के CEO ज्यादा बेहतर बता पाएंगे, लेकिन जितना मेरी जानकारी है जी एंटरटेनमेंट-सोनी मर्जर जल्द पूरा होने की उम्मीद है।

 

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बदलाव समय की मांग है, आजादी के समय की पत्रकारिता आज के दौर में मुश्किल: डॉ. विजय दर्डा

‘लोकमत मीडिया ग्रुप’ के चेयरमैन डॉ. विजय दर्डा ने समाचार4मीडिया से बातचीत में अपनी नई किताब-रिंगसाइड: अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड समेत मीडिया से जुड़े अहम पहलुओं पर अपनी राय रखी है।

पंकज शर्मा by
Published - Wednesday, 31 May, 2023
Last Modified:
Wednesday, 31 May, 2023
Dr Vijay Darda

‘लोकमत मीडिया ग्रुप’ के चेयरमैन व राज्यसभा के पूर्व सदस्य डॉ. विजय दर्डा की किताब 'रिंगसाइड: अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड' (RINGSIDE: Up, Close and Personal on India and Beyond) ने मार्केट में दस्तक दे दी है। ‘दिल्ली स्थित कॉन्स्टीयूशन क्लब ऑफ इंडिया’ में तमाम राजनेताओं, नौकरशाहों और वरिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी में 30 मई को इस किताब की लॉन्चिंग हुई। इस मौके पर विजय दर्डा ने अपनी किताब के साथ-साथ मीडिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सबसे पहले अपनी इस नई किताब ‘रिंगसाइड-अप, क्लोज एंड पर्सनल ऑन इंडिया एंड बियॉन्ड’ के बारे में हमें बताएं कि आखिर इसमें क्या खास है और यह किस बारे में है। पाठकों को यह किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी?

यह किताब मेरे साप्ताहिक लेखों का एक संकलन है, जो वर्ष 2011 और 2016 के बीच लोकमत मीडिया समूह के समाचार पत्रों और देश के अन्य प्रमुख राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दैनिक अखबारों में प्रकाशित हुए थे। इसमें विज्ञान, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, सामाजिक विकास, खेल, कला, संस्कृति, विदेश नीति और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े शोधपूर्ण आलेख शामिल हैं। इसके अलावा इस किताब में प्रख्यात व्यक्तित्वों के बारे में टिप्पणियां भी शामिल हैं, जिन्होंने भारत और दुनिया में सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रही बात इस किताब की उपलब्धता की तो यह हमसे प्राप्त की जा सकती है, अथवा इसे एमेजॉन पर भी ऑर्डर किया जा सकता है।

आप मीडिया में लंबे समय से हैं। इतने लंबे कार्यकाल के दौरान आपने पत्रकारिता को काफी बारीकी से देखा है। वर्तमान दौर में मीडिया की दशा और दिशा को लेकर क्या कहेंगे?

देखिए, बदलाव समय की मांग है। समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं। आजादी की पत्रकारिता आज के दौर में नहीं हो सकती है। आज के दौर की पत्रकारिता यदि आजादी के समय में होती तो उसे जस्टिस नहीं दे पाती। कहने का मतलब है कि समय के साथ बदलाव होते रहते हैं और समय के साथ में लोग भी बदलते रहते हैं।  

आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। या यूं कहें कि डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम माध्यमों से लोगों को जरूरी सूचनाएं तुरंत ही मिल जाती है, जबकि अखबार अगले दिन आता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया खासकर अखबारों के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

आज भी लोगों की सबसे ज्यादा विश्वसनीयता अखबार पर है। डिजिटल अथवा अन्य तमाम मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।  

लंबे समय से इस तरह की तमाम खबरें सुनने को मिलती हैं कि टीवी और अब डिजिटल के तेजी से बढ़ने के बाद प्रिंट का दौर जल्द ही खत्म हो जाएगा। लेकिन कुछ समय पहले जब दिल्ली में ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आयोजन हुआ था, उसमें इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे कि पांव रखने तक की जगह नहीं थी। इसे किस रूप में देखते हैं और इस बारे में क्या कहेंगे?

प्रिंट कभी खत्म नहीं होगा। मैं यही कहूंगा कि यदि आपके संस्कार पक्के हैं तो कुछ खत्म नहीं होता। इसलिए यह कहना बेमानी है कि प्रिंट का दौर खत्म हो जाएगा। मेरे हिसाब से ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।  

आजकल एक और शब्द फेक न्यूज की काफी चर्चा होती है। पीआईबी समेत तमाम संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेक टीम बना रखी है। क्या फेक न्यूज पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में उठाए जा रहे कदम पूरी तरह कारगर हैं। आपकी नजर में इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?

बिलकुल, फेक न्यूज पर लगाम लगाने का सीधा सा फंडा यही है कि अगर आप (मीडिया) ईमानदारी से काम करेंगे तो फेक न्यूज नहीं आएगी। 

तमाम अखबारों ने अब सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है, यानी बिना सबस्क्राइब किए पाठक अब उन अखबारों को इंटरनेट पर नहीं पढ़ सकते हैं। इस मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको नहीं लगता कि इससे रीडरशिप प्रभावित होती है। क्योंकि डिजिटल रूप से समृद्ध पाठकों के पास आज सूचना प्राप्त करने के तमाम स्रोत हैं। ऐसे में वे पैसा देकर ऑनलाइन अखबार क्यों पढ़ना चाहेंगे? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?

इस बारे में मैं यही कहूंगा कि यदि मान लीजिए कि आपकी कोई दुकान है और मुझे उसमें से सामान लेना है तो मुझे पैसा तो देना पड़ेगा। जो लोग पैसा देकर अखबार नहीं पढ़ना चाहते हैं, वो लाइब्रेरी अथवा संग्रहालय में जाकर इसे पढ़ सकते हैं। रही बात ऑनलाइन अखबार पढ़ने की तो यदि कुछ संस्थानों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है यानी सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है तो आपको उसे पढ़ने के लिए सबस्क्राइब तो करना ही पड़ेगा।   

देश में टीवी न्यूज की दुनिया में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एंकर्स की एंट्री भी हो चुकी है। एक मीडिया संस्थान ने तो बाकायदा इनसे खबरें पढ़वाना भी शुरू कर दिया है। इसे आप चुनौती अथवा अवसर किस रूप में देखते हैं?  

इसे मैं किसी तरह की चुनौती के रूप में नहीं देखता हूं। जीवन के अंदर कोई चुनौती नहीं है, सवाल यह है कि आपका लक्ष्य क्या है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया है, लेकिन दुनिया में सबसे पहले लोकमत ग्रुप ने ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो अपनी खबरों का दर्जा बताता है कि वह एक स्टार है, दो स्टार है, तीन स्टार है अथवा पांच स्टार है। तमाम टॉप कंपनियां हमसे उसे मांग रही हैं। मेरा मानना है कि आपको पाठकों को अच्छा और विश्वसनीय कंटेंट उपलब्ध कराना होगा।

इतनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आप काफी व्यस्त रहते हैं। ऐसे में परिवार के लिए किस तरह समय निकाल पाते हैं?

ऐसा करना कुछ मुश्किल काम नहीं है। बस, टाइम मैनेजमेंट से सारी चीजें बैलेंस हो जाती हैं।

खाली समय में आपको क्या करना पसंद है?

दिक्कत यही है कि मेरे पास बिल्कुल भी खाली समय नहीं है। मैं देर रात तक काम करता हूं। मेरी कई कविताएं इधर-उधर हो रखी हैं, मुझे उन्हें समेटना है और किताब की शक्ल देनी है, लेकिन इसके लिए भी समय नहीं मिल पा रहा है।

आप अभी तक कई किताबें लिख चुके हैं। हाल ही में आपकी यह किताब आई है। क्या आप निकट भविष्य में कोई नई किताब लिखने की योजना बना रहे हैं।

बिलकुल, मेरी नई किताब अगले महीने आने वाली है। ‘The Churn’ नाम से यह किताब पार्लियामेंट के बारे में है। 

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रेडियो के शौकीनों के लिए काफी अच्छा है सरकार का ये कदम: राहुल नामजोशी

‘माय एफएम’(MY FM) में चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर राहुल नामजोशी ने रेडियो इंडस्ट्री से जुड़े तमाम अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है।

Last Modified:
Monday, 15 May, 2023
Rahul Namjoshi

देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में शुमार ‘डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (D. B. Corp Ltd) की रेडियो डिविजन ‘माय एफएम’(MY FM) में चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (CEO) राहुल नामजोशी का मानना है कि रेडियो इंडस्ट्री क्या चाहती है और सरकार क्या फैसला करती है, इसके बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए। राहुल नामजोशी के अनुसार, मार्केट में तमाम अवसर मौजूद हैं। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से बातचीत में राहुल नामजोशी ने रेडियो इंडस्ट्री से जुड़े ऐसे ही तमाम प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से अपनी बेबाक राय रखी है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

उत्तर-पश्चिम भारत के छह से ज्यादा राज्यों में ‘माय एफएम’ के स्टेशन हैं। क्या दक्षिण के मार्केट में इसके विस्तार की कोई योजना है?

हम अपना पूरा फोकस उत्तर और पश्चिम पर केंद्रित करना चाहते हैं। हम जनसांख्यिकी (demography) और भाषाओं के मामले में दक्षिण भारत के मार्केट्स से अच्छी तरह वाकिफ नहीं हैं, इसलिए हम दक्षिण में निवेश करने से हिचकते हैं। हालांकि, हम उत्तर और पश्चिम भारत में अपने मार्केट्स का विस्तार करना जारी रखेंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार किस तरह का आधार मूल्य (base price) तय करती है।

इस वित्तीय वर्ष को आप किस तरह देख रहे हैं। कुछ शुरुआती ट्रेंड्स नजर आ रहे हैं?

हमारे बिजनेस की यही खासियत है कि हम बिजनेस के आने का इंतजार नहीं करते हैं, बल्कि हम उसे बनाने पर काम करते हैं और यह सृजन हमारे रेवेन्यू का लगभग 25% से 30% है। हमारे प्राइमरी मार्केट टियर II और III मार्केट्स हैं, जहां देश का विकास निहित है। आज लगभग सभी कैटेगरी इन मार्केट्स पर फोकस कर रही हैं। इसके अलावा, हम ज्यादा वॉल्यूम (highest volume) हासिल करने की दौड़ में नहीं हैं, लेकिन वैल्यू की तलाश करते हैं। हमें पूरा विश्वास है कि यह वित्तीय वर्ष हमारे लिए सबसे अच्छा होगा।

केंद्र सरकार एफएम ब्रॉडकास्ट की नीलामी की योजना बना रही है। आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

हमें अभी तक सरकार से इस बारे में कोई सूचना नहीं मिली है। हालांकि, रेडियो इंडस्ट्री क्या चाहती है और सरकार क्या निर्णय लेती है, इसके बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए। हमने हाल ही में सरकार के साथ सकारात्मक बैठक की है और देश में निजी एफएम के विकास को बढ़ावा देने के लिए उनसे अपनी अपेक्षाएं शेयर की हैं। तीसरे चरण के लिए रेडियो इंडस्ट्री के बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते हैं। तीसरे बैच की नीलामी सही मूल्य पर निर्भर है। पिछले साल तीसरे चरण के बैचों ने ज्यादा ध्यान आकर्षित नहीं किया था, क्योंकि आधार मूल्य यानी बेस प्राइस बहुत ज्यादा था। इसके अलावा, रेडियो बिजनेस एक कमाऊ बिजनेस है इसलिए हम प्रॉफिटेबल बिजनेस बने रहने के लिए अपने खर्चों पर नजर रखते हैं।

रेडियो स्टेशनों में निवेश को लेकर आपकी क्या प्लानिंग है?

हम एक आशावादी ब्रैंड हैं और इस वित्तीय वर्ष को लेकर बहुत उत्साहित हैं, हमारे पास आगामी वर्ष के लिए कई प्रमुख योजनाएं हैं। हम अभी इस बारे में ज्यादा कुछ शेयर नहीं कर सकते हैं, लेकिन जल्द ही आपको कई नए शो की लॉन्चिंग और अन्य घोषणाएं सुनने को मिलेंगी। मानव संसाधनों (ह्यूमन रिसोर्स) में निवेश के अलावा हम टेक्नोलॉजी में निवेश करेंगे।

‘टैम’ (TAM) की रिपोर्ट्स के अनुसार, कोविड और उसके बाद रेडियो पर विज्ञापनों की मात्रा (radio ad volume) काफी बढ़ गई। अब विज्ञापन बिजनेस कैसा चल रहा है और अगले वर्ष कौन से ब्रैंड ‘माय एफएम’ में निवेश कर रहे हैं?

एफएमसीजी, शिक्षा, रियल एस्टेट और हेल्थकेयर श्रेणी के अलावा, ज्वेलरी ब्रैंड्स रीजनल मार्केट्स में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अलावा, नेशनल ब्रैंड्स धीरे-धीरे रीजनल मार्केट्स की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि इनका ROI (Return on Investment) अपेक्षित अधिक है और स्थानीय ब्रैंड्स को कड़ी टक्कर देने के लिए तमाम नेशनल ब्रैंड्स रेडियो जैसे हाइपर लोकल माध्यमों में भारी निवेश कर रहे हैं।

वर्तमान में रेडियो किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है?

रेडियो ब्रॉडकास्टर्स को न्यूज प्रसारित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। अधिकांश निजी एफएम चैनल्स प्रतिष्ठित मीडिया समूहों के स्वामित्व में हैं और हमें ‘प्रसार भारती’ से न्यूज लेने के बजाय खुद न्यूज जुटाने और उसे अपनी शैली में प्रसारित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। रेडियो पर न्यूज गेमचेंजर साबित होगी।

सरकार ने पिछले दिनों एक एडवाइजरी जारी की है कि सभी मोबाइल फोन में एफएम रेडियो की सुविधा होनी चाहिए। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

यह काफी अच्छी बात है और इससे रेडियो श्रोताओं की संख्या में और बढ़ोतरी होगी। हम इस एडवाइजरी के लिए सरकार के आभारी हैं और हमें उम्मीद है कि लोगों के हित में सभी मोबाइल निर्माता सभी मोबाइल फोन में रेडियो एफएम की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे। 

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जो पत्रकार यह बात छिपाते हैं, वह अपने अलावा समाज के संग भी अपराध करते हैं: विष्णु त्रिपाठी

मीडिया से जुड़े तमाम अहम सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार और ‘दैनिक जागरण’ (Dainik Jagran) समूह में एग्जिक्यूटिव एडिटर विष्णु त्रिपाठी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

पंकज शर्मा by
Published - Wednesday, 10 May, 2023
Last Modified:
Wednesday, 10 May, 2023
Vishnu Tripathi

मीडिया की वर्तमान दशा व दिशा क्या है, टीवी व डिजिटल के तेजी से बढ़ते कदमों के बीच प्रिंट मीडिया का भविष्य कैसा है और आखिर मीडिया की विश्वसनीयता पर क्यों सवाल उठ रहे हैं? मीडिया से जुड़े ऐसे ही तमाम अहम सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार और ‘दैनिक जागरण’ (Dainik Jagran) समूह में एग्जिक्यूटिव एडिटर विष्णु त्रिपाठी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

सबसे पहले अपने बारे में बताएं। आपने किस तरह और कहां से पत्रकारिता की शुरुआत की। इस मुकाम तक पहुंचने का आपका सफर कैसा रहा?

वर्ष 1982 में मैंने कानपुर से मीडिया में कदम रखा था। जैसा कि आम परिवारों में होता है। ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने नौकरी की तलाश शुरू कर दी। उस समय मैं संपादक के नाम पत्र (Letter to Editor) लिखता था। तमाम अखबारों में आर्टिकल लिखता था। उन दिनों कानपुर से एक सांध्य दैनिक ‘लोक जनसमाचार’ निकलता था। मैं उससे जुड़ गया। वहां काफी काम किया और मुझे काफी सीखने को मिला। इसके बाद दिसंबर 1985 से अखबार की वास्तविक नौकरी में आया। सबसे पहले हिंदी दैनिक ‘आज’ को कानपुर में जॉइन किया। इसके बाद आगरा में ‘दैनिक जागरण’ और फिर ‘आज’ दोनों की लॉन्चिंग टीम में शामिल रहा।  आगरा से जून 1988 में दैनिक जागरण, लखनऊ जॉइन किया और तब से इस अखबार में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं।

मीडिया में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान आपने पत्रकारिता को काफी बारीकी से देखा है। आपकी नजर में पहले के मुकाबले वर्तमान दौर की पत्रकारिता में क्या बदलाव आया है। क्या यह सकारात्मक है अथवा नकारात्मक। इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?

मेरा मानना है कि पहले के मुकाबले पत्रकारिता की दुनिया में काफी बेहतरी आई है। समय के अनुकूल काफी चीजें बदली हैं। तकनीकी रूप से भी काफी समृद्धि हुई है। हमने जब अखबार की दुनिया में शुरुआत की थी, उस समय हैंड कंपोजिंग होती थी। सिलेंडर पर छपाई होती थी। उसके बाद कंप्यूटर का दौर आया। कहने का मतलब है कि समय के साथ तकनीकी तौर पर मजबूती अधिक आई है।

कंटेंट की क्वालिटी को लेकर एकबारगी चर्चा और बहस हो सकती है, लेकिन तकनीकी और प्रस्तुतिकरण के स्तर पर काफी समृद्धि आई है। लेआउट और डिजाइन की समझ भी काफी बेहतर हुई है। जहां तक कंटेंट क्रिएशन की बात है, तो इसमें प्रोफेशनलिज्म और फॉर्मेलिटी बहुत आई है। हालांकि, इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हैं, लेकिन औपचारिकता आने से प्रोसेस और लेखन, दोनों में परिपक्वता आई है।

आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। या यूं कहें कि डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम माध्यमों से लोगों को जरूरी सूचनाएं तुरंत ही मिल जाती है, जबकि अखबार अगले दिन आता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया खासकर अखबारों के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?

इंटरनेट मीडिया और वेबसाइट्स आने के बाद से मैं वर्ष 1999-2000 से इस बात को सुन रहा हूं कि अखबारों का भविष्य अंधकारमय है। अब अखबार कम छपेंगे। अखबार कम पढ़े जाएंगे और लोग वेबसाइट्स पर तुरंत खबर पढ़ लेंगे, जैसी तमाम बातें होती थी। ‘दूरदर्शन’ के बाद जब निजी न्यूज चैनल्स आए तो उस समय इस तरह की काफी बहस छिड़ी थी। उस समय पूरे दैनिक जागरण समूह की एक वर्कशॉप भी इसे लेकर हुई थी।

उस समय यह बहस शुरू हुई थी कि अब टीवी के आने के बाद जब लोग अपने घरों में बैठकर रात को सारी खबरें देख लेंगे तो सुबह अखबार कौन पढ़ेगा? लेकिन, उसके बाद भी न सिर्फ अखबारों की संख्या बढ़ी है, बल्कि रीडरशिप भी बढ़ी है। इसके बाद तमाम वेबसाइट्स के आने से भी इस तरह की बहस आए दिन छिड़ती रहती है। मेरा मानना है कि जो तत्काल मिलती है, वह सूचना होती है। वह समाचार नहीं होता है। सूचना के बाद समाचार का नंबर आता है। सूचना और समाचार दोनों में अंतर होता है। यानी जो ब्रेकिंग के तौर पर तुरंत मिली, उसे हम सिर्फ सूचना यानी इंफॉर्मेशन कह सकते हैं। उसकी डिटेलिंग समाचार कहलाती है। न्यूज के बाद की जो डिटेलिंग होती है, उसे स्टोरी कहते हैं। स्टोरी के बाद फिर लगातार उसके फॉलोअप्स होते हैं।

यानी, समाचार की जो प्रक्रिया होती है, उसमें हमें ये चार चरण (इंफॉर्मेशन, न्यूज, स्टोरी और फॉलोअप्स) सिखाए गए हैं। इसमें अखबार का कोई सानी नहीं है। छपे हुए को पढ़ने का जो अभ्यास, संतुष्टि और आनंद है, वह अलग ही होता है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि कुछ समय पहले जब दिल्ली में ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आयोजन हुआ था, उसमें इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे कि पांव रखने तक की जगह नहीं थी। आप ये देखिए कि यदि लोगों में पढ़ने का अभ्यास कम हो रहा है अथवा नई पीढ़ी यदि पढ़ने के अभ्यास से विमुख हो रही है तो तमाम बड़े-बड़े लेखक जो एडवांस में रॉयल्टी लेकर लिखते हैं या  विदेश जाकर बड़े-बड़े होटलों में कमरे लेकर लेखन कर रहे हैं तो वो ऐसा कैसे कर पा रहे हैं, अंततः यह सब पाठकों के बढ़ते समूह के सौजन्य से ही हो पा रहा है। यानी लोगों में पढ़ने का क्रेज या अभ्यास बढ़ रहा है।

इसलिए मेरा मानना है कि अखबारों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। हां, अखबारों का भविष्य समाचार माध्यमों की किसी दूसरी विधा के हाथों में सुरक्षित अथवा असुरक्षित नहीं है। चाहे वह टीवी मीडिया हो, डिजिटल मीडिया हो अथवा इंटरनेट मीडिया हो। अखबार यदि सुरक्षित हैं तो वह अखबारों में काम करने वाले गंभीर और कुशल लोगों के हाथों में सुरक्षित हैं। कल को यदि प्रिंट मीडिया को किसी तरह का कोई क्षरण अथवा नुकसान होता है तो वह अखबारों में काम करने वाले लोगों की गंभीरता में अथवा कुशलता में कमी की वजह से होगा, अन्य किसी बाहरी माध्यमों से नहीं।

अब बात करते हैं फेक न्यूज की, जिसकी आजकल काफी चर्चा हो रही है। फेक न्यूज को लेकर आपका क्या कहना है, आखिर यह क्यों इतनी बढ़ रही है?

देखिए, फेक न्यूज दो प्रकार की होती है। फेक न्यूज यानी गलत खबरें हमेशा से छपती रही हैं। यदि किसी दुर्घटना की वजह, किसी गलतफहमी की वजह से, कम सतर्कता की वजह से अथवा असावधानी की वजह से अगर कोई गलत खबर अथवा गलत सूचना प्रकाशित होती है तो उसका शुद्धिकरण/परिमार्जन किया जाना चाहिए। लेकिन, यदि योजनाबद्ध तरीके से अथवा नियोजित तरीके से किसी गलत, अनुचित या निराधार सूचना/समाचार का प्रकाशन होता है तो उसे संगीन अपराध की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। उसे संज्ञेय अपराध माना जाना चाहिए और ऐसा करने वालों को समाजद्रोही और राष्ट्रद्रोही के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए।

क्या आपको लगता है कि फेक न्यूज पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में उठाए जा रहे कदम कारगर हैं। जैसे-पीआईबी समेत तमाम संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेक टीम बना रखी है। आपकी नजर में इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?

यहां सवाल सिर्फ नैतिकता का है। तमाम ऐसी संस्थाएं हैं, जो अपने स्तर पर फैक्ट चेक करती हैं। वे लोगों को जागरूक कर रही हैं, सतर्क कर रही हैं। हम इसका स्वागत करते हैं। बस देखने वाली बात यह है कि जो लोग योजनाबद्ध तरीके से और अपने हिसाब से चीजों को सही साबित करने के लिए गलत सूचना प्रसारित/प्रकाशित करते हैं, उन पर इन एजेंसियों की सक्रियता का कितना असर पड़ रहा है?

उनके लिए तो इन एजेंसियों की सक्रियता ठीक है जो कभी असावधानी अथवा प्रक्रिया में किसी कमी या किसी का वर्जन न लेने के चक्कर में गलत सूचना को प्रसारित कर बैठते है, क्योंकि वे इससे सबक लेते हैं। लेकिन, जो लोग अपने हित के लिए और अपनी वैचारिकता के आधार पर गलत चीजों को फैलाने अथवा किसी को आक्षेपित करने के लिए, किसी की छवि बिगाड़ने के लिए जानते-बूझते हुए योजनाबद्ध तरीके से गलत तथ्यों और गलत विजुअल्स का प्रकाशन/प्रसारण करते हैं, वह खतरनाक है। ऐसे लोग इन एजेंसियों की सक्रियता से कितना सबक लेते होंगे और कितना सीखते होंगे, यह सोचने का विषय है।

अब कोविड लगभग खत्म हो चुका है। हालांकि, कुछ केस अभी भी आ रहे हैं, लेकिन अब पहले वाली स्थिति नहीं है। ऐसे में अखबारों के नजरिये से वर्तमान दौर को आप किस रूप में देखते हैं। क्या अखबार कोविड से पहले के दौर की तरह अपनी पहुंच फिर बनाने में कामयाब हो रहे हैं?

बिलकुल, कई अखबार काफी तेजी से कोविड से पहले वाली स्थिति की तरफ लौट रहे हैं। यहां विशेषकर मैं अपने अखबार की और दिल्ली-एनसीआर की बात करूं तो रिकवरी काफी अच्छी हो रही है। कोविड के दौरान जब तमाम अखबारों का सर्कुलेशन थोड़ा प्रभावित हुआ था, तो दो तरह की बातें थीं। कुछ लोगों ने संक्रामकता के संदेह में अखबार न पढ़ने का फैसला कर लिया था। हालांकि, तमाम ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अपने स्तर पर इस धारणा को गलत माना था।

ऐसे लोगों का मानना था कि अखबार से किसी तरह का वायरस नहीं फैलता है और उन्होंने तभी से अखबार पढ़ना शुरू कर दिया था। कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने अपने जीवन में अखबार की कमी महसूस की। जब तमाम अन्य माध्यमों से इन लोगों की समाचार की और बौद्धिकता की भूख शांत नहीं हुई तो उन्होंने दोबारा से अखबार मंगाना शुरू कर दिया। ऐसे में मैं अपने अखबार के आधार पर कह सकता हूं कि प्रिंट इंडस्ट्री फिर से आगे बढ़ रही है।

तमाम अखबारों ने अब सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है, यानी बिना सबस्क्राइब किए पाठक अब उन अखबारों को इंटरनेट पर नहीं पढ़ सकते हैं। इस मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको नहीं लगता कि इससे रीडरशिप प्रभावित होती है। क्योंकि डिजिटल रूप से समृद्ध पाठकों के पास आज सूचना प्राप्त करने के तमाम स्रोत हैं। ऐसे में वे पैसा देकर ऑनलाइन अखबार क्यों पढ़ना चाहेंगे? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?

ऐसा नहीं है। इस बारे में मैं कहूंगा कि यह क्वालिटी की बात है। जो व्यक्ति किसी भी प्रॉडक्ट को खरीदना, पढ़ना या सुनना यानी किसी भी तरह से इस्तेमाल करना चाहता है, अंतत: उस व्यक्ति की ख्वाहिश उस प्रॉडक्ट की क्वालिटी को लेकर ही होती है। मैं आपको इसे कुछ उदाहरणों से समझाता है कि जैसे पहले एक साबुन आया था, उसके बारे में विज्ञापन किया गया कि यदि आप इस साबुन को इस्तेमाल करेंगे तो इसके अंदर से सोने का सिक्का निकल सकता है, लेकिन वह साबुन मार्केट से गायब हो गया। इसका कारण यही रहा कि पहले तो उसमें से सोने का सिक्का निकलने की गारंटी नहीं थी, दूसरा यदि कोई व्यक्ति साबुन खरीदता है तो वह साफ-सफाई के लिए खरीदता है न कि सोने के सिक्के के लिए।

ऐसे ही एक ब्लेड का विज्ञापन था कि आपको चार ब्लेड के पैक में पांच ब्लेड मिलेंगे। लेकिन, यदि कोई भी व्यक्ति यदि ब्लेड खरीदेगा तो उसकी क्वालिटी पहले देखेगा और जरा भी खराब होने पर वह उसे पसंद नहीं करेगा, फिर चाहे उसे कितने ही ब्लेड और फ्री में क्यों न दिए जाएं। यही बात खबर और मीडिया माध्यमों पर लागू होती है। अब लोगों की क्रय शक्ति बढ़ रही है, ऐसे में यदि लोगों को अच्छी खबर पढ़ने की चाहत होगी और मीडिया इंडस्ट्री यदि अच्छा कंटेंट देगी तो उसका पैसा भी लेगी और लोग देंगे भी। यह बाजार का सिद्धांत है।

तमाम अखबारों में एडिटोरियल पर मार्केटिंग व विज्ञापन का काफी दबाव रहता है। आपकी नजर में एक संपादक इस तरह के दबावों से किस तरह मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से संपादकीय कार्यों का निर्वहन कर सकता है?

हमारे अखबार में एडिटोरियल पर इस तरह का कोई दबाव नहीं है। मार्केटिंग या विज्ञापन विभाग के लोग अपना काम कर रहे हैं, उन्हें अपना काम करने देना चाहिए, लेकिन यह संपादक की अपनी इच्छाशक्ति, उसकी दृढ़ता और वैचारिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है  कि वह कितना दबाव महसूस करता है। मेरा मानना है कि न्यूज के लिहाज से जितनी जरूरत होगी, उतना ही कंटेंट छपेगा। फिर चाहे वह कम हो अथवा ज्यादा। मैंने न तो इस तरह का कोई दबाव महसूस किया है और न ही करूंगा।

आज के दौर में मीडिया दो खेमों में बंट गई लगती है। आपकी नजर में यह पत्रकारिता का कौन सा दौर है, जहां पर खेमों में बंटकर पत्रकारिता होती है?

देखिए, पत्रकारिता हमेशा से दो खेमों में बंटी रही है। मैंने जब से होश संभाला है और अखबार पढ़ रहा हूं, तब से मैंने यही देखा है कि भारत की पत्रकारिता में हमेशा से एक वामपंथी और एक दक्षिणपंथी विचारधारा रही है। मेरी नजर में यह कोई गलत बात नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की बहुत बड़ी विशेषता है और मैं इसे बहुत अच्छा मानता हूं कि पत्रकार अपने बारे में कहें कि वह वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी। जो पत्रकार यह बात छिपाते हैं, वह अपने साथ भी अपराध करते हैं और समाज के साथ भी।

पहले भी इस तरह की बातें हम सुनते थे कि फलां पत्रकार वामपंथी और फलां पत्रकार दक्षिणपंथी है। उस समय जो सेंट्रलिस्ट यानी जो वामपंथी या दक्षिणपंथी दोनों में से कोई नहीं होते थे, उनके बारे में कहा जाता था कि वे तो सुविधाभोगी हैं। मेरा मानना है कि पत्रकार कभी निष्पक्ष हो ही नहीं सकता। पत्रकार यदि वैचारिक रूप से दृढ़ है और वैचारिकता के आधार पर संपन्न है तो वह कभी निष्पक्ष हो ही नहीं सकता है। वह सपक्ष ही होगा। वह तटस्थ कैसे हो सकता है। यदि आप उद्देश्यपूर्ण तरीके से काम कर रहे हैं तो निष्पक्ष अथवा तटस्थ कैसे हो सकते हैं? आपको सपक्ष होना ही पड़ेगा। निष्पक्ष तो वे लोग होते हैं, जिनका विवेक नहीं होता है। जो लोग कहते हैं कि हमने निष्पक्ष रूप से पत्रकारिता की अथवा कर रहे हैं तो मेरा मानना है कि वे वैचारिक रूप से शून्य हैं।

मीडिया में इन दिनों क्रेडिबिलिटी की चर्चा है। सभी चाहते हैं कि उन्हें भरोसेमंद सूचनाएं अथवा जानकारी मिले, लेकिन आज के दौर में वे असमंजस में रहते हैं कि किस माध्यम पर वह सबसे ज्यादा भरोसा करें, क्योंकि एक मीडिया संस्थान कुछ कह रहा होता है, जबकि उसी बारे में दूसरा मीडिया संस्थान कुछ और कह रहा होता है?

देखिए, किसी भी अखबार पर ‘हॉलमार्क’ नहीं लगाया जा सकता है। अखबार कोई पदार्थ नहीं है। यह तो पाठक के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसी भी सूचना को किस तरह से लेता है। जो भी आपके लिए ग्रहणीय है, उसमें निश्चित तौर पर आप एक उपभोक्ता, ग्राहक अथवा पाठक होने के नाते आप अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं। इसे हम एक सामान्य से उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे-जब आप चाय पीते हैं और उसका एक घूंट (सिप) लेने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल कर यह अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं कि वह कितनी गर्म होगी। उसके बाद उस हिसाब से आप यह तय करते हैं कितना सिप लेना है।

पहले के मुकाबले अब पाठक बहुत सजग हो गया है। पाठक प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा है। मेरा मानना है कि आज के दौर में तमाम समाचार माध्यमों के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है। मैं फिर यही कहूंगा कि यदि किसी समाचार माध्यम या ब्रैंड विशेष अथवा प्रॉडक्ट विशेष के प्रति कोई विश्वास घटा है तो उसकी वजह कोई दूसरा कारण नहीं है, बल्कि वहां पर बैठे जो जिम्मेदार अथवा कर्तव्यशील लोग हैं, उनके आचरण में कहीं न कहीं कोई कमी आई है।

इस फील्ड में कार्यरत अथवा नवागत पत्रकारों के लिए आप क्या संदेश या यूं कहें कि सफलता का क्या ‘मूलमंत्र’ देना चाहेंगे?

जैसा कि मैंने अभी कहा कि अब इस पेशे में प्रोफेशलिज्म आया है। पत्रकार फॉर्मेट में काम करने के अभ्यस्त हो रहे हैं। जीवनशैली के प्रति अनुशासन बढ़ा है। नई पीढ़ी से मैं सिर्फ गुजारिश कर सकता हूं कि पढ़ने का अभ्यास डालिए। पढ़ने का अभ्यास न होने से शब्द संपदा संकुचित हो रही है। शब्द कम हो रहे हैं। आप जितना पढ़ते हैं, उतना आपका शब्द सामर्थ्य बढ़ता है। आपकी शब्द संपदा बढ़ती है। यह पढ़ने का अभ्यास न होने का कारण ही है कि तमाम जो कॉपियां लिखी जाती हैं, उनमें वैसा अलंकरण नहीं दिखता है, जो पहले की कॉपियों में अपेक्षाकृत दिखता था। मेरे कहने का आशय यही है कि आप ज्यादा से ज्यादा पढ़िए। जितना ज्यादा से ज्यादा पढ़ेंगे, शब्द संपदा उतनी बढ़ेगी और वह आपकी लेखनशैली में भी परिलक्षित होगी। 

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मैं किसी भी मुद्दे को बातचीत से सुलझाने में विश्वास रखती हूं: शोभना जैन

महिला पत्रकारों के प्रमुख संगठन 'Indian women's Press Corps' (IWPC) की लगातार दूसरी बार प्रेजिडेंट चुनी गईं शोभना जैन ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

पंकज शर्मा by
Published - Wednesday, 03 May, 2023
Last Modified:
Wednesday, 03 May, 2023
Shobhna Jain

वरिष्ठ पत्रकार और महिला पत्रकारों के प्रमुख संगठन 'Indian women's Press Corps' (IWPC) की लगातार दूसरी बार निर्वाचित प्रेजिडेंट शोभना जैन से हाल ही में एक मुलाकात के दौरान IWPC चुनाव में उनके द्वारा पेश किए गए घोषणापत्र समेत मीडिया से जुड़े तमाम प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सबसे पहले तो आप हमारे पाठकों को अपने बारे में बताएं। आपका अब तक का सफर क्या और कैसा रहा है?

मैंने अंग्रेजी साहित्य से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। इसके अलावा जर्मन भाषा का कोर्स भी किया है। मीडिया में अपने करियर की शुरुआत मैंने न्यूज एजेंसी ‘यूनिवार्ता’ (Univarta) से बतौर इंटर्न की थी। इसके बाद मैं वहां ब्यूरो चीफ के पद तक पहुंची। यहां मैंने पीएमओ समेत तमाम प्रमुख बीट कवर कीं। इसके अलावा मैं सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लिखती भी हूं। इन दिनों मैं एक कॉलमिस्ट के तौर पर अंतरराष्ट्रीय विषयों पर लिखती हूं और एक न्यूज सर्विस का संचालन कर रही हूं। मुझे सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दे उठाना भी अच्छा लगता है।    

'इंडियन वुमेंस प्रेस कॉर्प्स' के गठन का उद्देश्य, इसकी वर्तमान सदस्य संख्या और इसकी कार्यप्रणाली अथवा किस तरह के मुद्दों को यहां प्राथमिकता दी जाती है, इस बारे में कुछ बताएं?

वर्तमान में 'इंडियन वुमेंस प्रेस कॉर्प्स' के सदस्यों की संख्या 800 से अधिक है। यहां आम महिलाओं से जुड़े सरोकारों के साथ-साथ महिला पत्रकारों से जुड़े तमाम मुद्दे जैसे उनकी फ्रीडम और उनके कल्याण से जुड़े जैसे मुद्दों को हम प्राथमिकता देते हैं। इसके अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े तमाम मुद्दों को भी हम उठाते हैं।    

आप पहले भी आईडब्यूपीसी की प्रेजिडेंट रही हैं। आईडब्ल्यूपीसी प्रेजिडेंट के तौर पर आपका यह कौन सा कार्यकाल है। क्या आपको लगता है कि आपके अभी तक बतौर प्रेजिडेंट जो कार्यकाल रहे हैं, उनमें यह अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रहा है?

लगातार आईडब्यूपीसी की प्रेजिडेंट के तौर पर यह मेरा दूसरा और वैसे तीसरा कार्यकाल है। मैं वर्ष 2017-18 में भी यहां प्रेजिडेंट रही हूं। मुझे इस बात की संतुष्टि है कि अपने कार्यकाल के दौरान जितना भी संभव हो सका है, मैं अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में सफल रही हूं। हमारी पूरी टीम की खासियत है कि हम अधिकतम जितना कर सकते हैं, वह करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद हम अपने स्टाफ के साथ मिलकर पूरी तन्मयता से अपने काम में जुटे रहते हैं। मेरा प्रयास रहता है कि सभी लोग मिल-जुलकर रहें और आपस में एक दूसरे के सहयोग से अच्छे ढंग से काम करें। 

आपके कार्यकाल में कोई ऐसी बड़ी घटना रही हो, जिसमें आईडब्ल्यूपीसी ने दखल दिया हो और उसे सफलता मिली हो। यानी प्रेजिडेंट के तौर पर आपकी बड़ी उपलब्धि क्या रही है? इस राह में किस तरह की चुनौतियां आई हैं, अथवा आ रही हैं, इस बारे में भी कुछ बताएं।

इस तरह की तमाम बड़ी घटनाएं होती रहती हैं, जिन्हें हम उठाते रहते हैं और उनमें से कई में ठोस कार्रवाई भी होती है। फिर चाहे वह महिलाओं के पर्सनल इश्यूज हों, महिलाओं के उत्पीड़न की बात हो अथवा घरेलू हिंसा जैसे मामले। हमारा मानना है कि महिलाओं की जिंदगी ऐसी हो, जिसमें वह घर-परिवार के साथ-साथ बाहर निकलकर भी सही और सुरक्षित ढंग से अच्छे माहौल में काम कर सकें। हालांकि, इस राह में तमाम चुनौतियां भी आती रहती हैं, लेकिन हम अपनी टीम के सहयोग से उन चुनौतियों का सामना करते रहते हैं।   

Indian Women Press Corps  की बिल्डिंग को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस बारे में काफी खबरें पढ़ने-सुनने को मिल रही हैं। आखिर ये पूरा मसला क्या है और दिक्कत कहां आ रही है। इस बारे में क्या कहना चाहेंगी?

अभी मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी। हां, यह जरूर कहूंगी कि हमारे प्रयासों में कोई कमी नहीं है। कभी लगता है कि रास्ता काफी साफ है, तो कभी लगता है कि काफी कठिन रास्ता है। हम किसी भी मुद्दे को बातचीत से सुलझाने में विश्वास रखते हैं और मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा है कि यह मुद्दा भी बातचीत से जल्द ही हल हो जाएगा।  

इस बार के चुनाव में आपने अपने पैनल का जो मैनिफेस्टो घोषित किया था, क्या आपको लगता है कि आप उन सभी दावों पर खरी उतरेंगी? इसके लिए आपने किस तरह का रोडमैप तैयार किया है?

हमारा प्लान ऑफ एक्शन तो यही है कि सबसे पहले इस इमारत की लीज बढ़वाई जाए। हमें उम्मीद है कि अपने प्रयासों में सफल होंगे। इसके अलावा जैसा कि मैंने बताया कि हम तमाम समसामयिक मुद्दे उठाते ही रहते हैं।

इस बार इस चुनाव में काफी आंतरिक उथल-पुथल जैसे- व्यक्तिगत आक्षेप और ध्रुवीकरण भी देखने को मिला। IWPC की एक मेंबर ने हाई कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया था। क्या था वह मामला। इस बारे में क्या कहेंगी? 

हालांकि, अब इस तरह की बातें करने का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन वह सब कुछ गलतफहमियों के चलते हुआ। हालांकि, अब इस तरह का कोई मुद्दा नहीं है। मेरा मानना है कि आपस में किसी तरह की तल्खी नहीं होनी चाहिए।

जब आप किसी बड़ी भूमिका में होते हैं, तो आपके काम से अंसतुष्ट होने वाले लोगों की संख्या भी कई बार बड़ी होती है, ऐसे में आप उनकी अपेक्षाओं पर कैसे खरी उतरेंगी, ताकि ऐसे लोगों की नाराजगी दूर की जा सके?

हम इन अपेक्षाओं को पूरा करने की हरसंभव कोशिश करते हैं। मैं सभी लोगों को साथ लेकर चलने वालों में से हूं। मैं हर मुद्दे को बहुत ही शांतिपूर्ण ढंग से हैंडल करती हूं और चाहती हूं कि सभी लोग मिल-जुलकर आपस में शांति से काम करें। मेरा मानना है कि नाराजगी यदि है भी उसे आपस में बैठकर दूर किया जा सकता है।

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