PTI एम्पलॉइज से की सूचना प्रसारण मंत्री ने मुलाकात, कहीं ये बातें

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ के मुख्यालय में पत्रकारों के साथ चर्चा के दौरान मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Friday, 04 October, 2019
Prakash Javadekar

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि पेड न्यूज (Paid News) के मुकाबले फेक न्यूज (Fake News) ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने कहा कि सरकार और मीडिया को मिलकर इससे लड़ने की जरूरत है। देश की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) के मुख्यालय में गुरुवार को एजेंसी के पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान जावड़ेकर ने कहा कि सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी, जिससे मीडिया की आजादी कम हो।

उन्होंने कहा कि जिस तरह से प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिल्मों के बारे में कुछ रेगुलेशंस हैं, उसी तरह ‘ओवर द टॉप’ (over-the-top) प्लेटफॉर्म्स के लिए भी कुछ रेगुलेशंस होने चाहिए। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स में न्यूज पोर्टल्स के साथ ही ‘वेबस्ट्रीमिंग साइट’ जैसे हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स और अमेजॉन प्राइम विडियो आते हैं।

जावड़ेकर का कहना था,‘मैंने इस बारे में सुझाव मांगे है कि कैसे इस तरह की स्थिति से निपटा जा सकता है, क्योंकि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर नियमित रूप से फिल्में आ रही हैं, इनमें अच्छी-बुरी सभी तरह की फिल्में शामिल हैं। इसलिए हमें देखना होगा कि इससे कैसे निपटा जाए, कौन मॉनिटरिंग करेंगा और कौन इसे रेगुलेट करेगा।’ सूचना-प्रसारण मंत्री का कहना था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए कोई प्रामाणिक संस्था नहीं है और न्यूज पोर्टल्स के साथ भी यही स्थिति है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। प्रिंट मीडिया पर नजर रखने के लिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ है। ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (NBA) न्यूज चैनल्स की मॉनिटरिंग करती है। इसी तरह ‘एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ ( Advertising Standards Council of India) के पास विज्ञापनों की और ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ (CBFC) के पास फिल्मों की जवाबदेही है। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। देश में न्यूज पोर्ट्ल्स की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनमें से कई के ऑनलाइन सबस्क्राइबर्स की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस दौरान फेक न्यूज का मुद्दा उठने पर उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यह पेड न्यूज से ज्यादा खतरनाक है। जावड़ेकर ने कहा, ‘फेक न्यूज को हमें मिलकर रोकना होगा। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है, बल्कि सभी को मिलकर फेक न्यूज को रोकना होगा। जो लोग न्यूज के बिजनेस में हैं, उन्हें फेक न्यूज से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।’ 

उन्होंने कहा, ‘कई मीडिया चैनल वायरल सच जैसे कार्यक्रमों के जरिये इस खतरे से निपट रहे हैं और सच को दिखा रहे हैं। प्रिंट मीडिया को भी कुछ इसी तरह के कॉलम्स शुरू करने चाहिए अथवा कुछ इसी तरह के कदम उठाने चाहिए, जिससे फेक न्यूज के बारे में सच को सामने लाया जा सके।’ सरकार ने भी कश्मीर के बारे में फेक न्यूज से निपटने के लिए दूरदर्शन न्यूज पर कश्मीर का सच नाम से कार्यक्रम चलाया है।’

जावड़ेकर का यह भी कहना था, पिछले कुछ महीनों में हमने देखा है कि बच्चे उठाने को लेकर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज अथवा अफवाहों के चलते मॉब लिंचिंग में 20-30 लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा, कि हम राज्य सरकारों से भी फेक न्यूज से निपटने के लिए कह रहे हैं। वहीं, पेड न्यूज को लेकर उन्होंने कहा कि यह अनैतिक है और मीडिया को इस पर लगाम लगानी होगी।   

‘न्यूज प्रिंट’ यानी अखबारी कागज के आयात पर लगी 10 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी को वापस लेने की प्रिंट मीडिया की मांग के बारे में जावड़ेकर ने कहा कि सभी पक्षों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और इसे जल्दी सुलझा लिया जाएगा।

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TRP और रेवेन्यू नहीं, सिर्फ एक ही चैलेंज पर है हमारा फोकस: डॉ. जगदीश चंद्रा

नेशनल हिंदी न्यूज चैनल ‘भारत24’ (Bharat24) ने मार्केट में दस्तक दे दी है। 15 अगस्त से इसका प्रसारण शुरू हो गया है।

Last Modified:
Tuesday, 16 August, 2022
Jagdish Chandra

नेशनल हिंदी न्यूज चैनल ‘भारत24’ (Bharat24) ने मार्केट में 'दस्तक' दे दी है। 15 अगस्त से इसका प्रसारण शुरू हो गया है। जाने-माने पत्रकार और ‘ईटीवी न्यूज नेटवर्क’ (ETV News Network) व ‘जी मीडिया’ (Zee Media) के रीजनल क्लस्टर के पूर्व सीईओ जगदीश चंद्रा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित सेक्टर-62 से लॉन्च हुए इस चैनल की टैगलाइन ‘विजन ऑफ न्यू इंडिया’ (Vision of new India) रखी गई है। नए चैनल के उद्देश्य और इसकी खासियत समेत तमाम मुद्दों पर ‘समाचार4मीडिया’ ने ‘भारत24’ के सीईओ व एडिटर-इन-चीफ डॉ. जगदीश चंद्रा से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

नए चैनल की प्लानिंग कब और कैसे बनी, वहीं इसका नाम ‘भारत24’ क्यों रखा गया, सबसे पहले इस बारे में कुछ बताएं?

इसकी प्लानिंग की बात करूं तो एक कहावत है कि अगर तमन्ना अधूरी रहे और सांस खत्म हो जाए तो अधूरी मौत है, लेकिन तमन्ना पूरी हो जाए और सांस भी बाकी रहे तो मोक्ष कहलाता है। तो कह सकते हैं कि मैं इसी तरह के ‘मोक्ष’ की ओर बढ़ना चाहता हूं। मैंने सोचा कि कौन सी तमन्ना बाकी रही है जीवन में तो ध्यान आया कि हमने एक नेशनल चैनल ‘जी हिन्दुस्तान’ लॉन्च किया था। वहां करीब 14 महीने ही अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद मैं जयपुर आ गया था, तो नेशनल चैनल चलाने की तमन्ना अधूरी रह गई थी। इसी तमन्ना को पूरा करने के लिए नए चैनल की प्लानिंग की गई और अब इसकी लॉन्चिंग होने जा रही है। कह सकते हैं कि इस चैनल के पीछे पैशन का कॉन्सेप्ट है।

रही बात इस चैनल का नाम ‘भारत24’ रखे जाने की तो समय, काल, देश और परिस्थिति के अनुसार जो नाम अनुकूल होता है, वही नाम लेकर आदमी चलता है। काफी सोच विचार और मित्रों की राय के बाद इस चैनल का नाम ‘भारत24’ रखा गया। चूंकि इस नाम को काफी पसंद किया जा रहा है तो अब लग रहा है कि इस बारे में हमारा फैसला सही था।   

नए चैनल का प्रसारण 15 अगस्त से ही किए जाने के पीछे क्या कोई खास वजह है?

नहीं, इसके पीछे कोई खास वजह नहीं है। पहले हम इसे जुलाई के आखिरी हफ्ते में लॉन्च करने वाले थे। लेकिन कुछ काम बाकी रह गए थे। फिर इसे छह-सात अगस्त को लॉन्च करने की तैयारी थी, लेकिन फिर तभी मन में विचार आया कि क्यों न इसे 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस वाले दिन लॉन्च किया जाए। जैसा कि चैनल का नाम है ’भारत24 ’ तो इस हिसाब से लगा कि 15 अगस्त को लॉन्च करना ज्यादा सही रहेगा।

मार्केट में पहले से कई स्थापित चैनल हैं, ऐसे में नए चैनल को उनके बीच में स्थापित करने के लिए किस तरह की स्ट्रैटेजी पर फोकस करेंगे? यह दूसरे चैनल्स के मुकाबले किस तरह अलग होगा?

देखिए, एक स्थिति होती है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट (Survival of the fittest) यानी हम संघर्ष करेंगे और अपना स्थान बनाएंगे। जीवन में चैनल लॉन्च करने और उन्हें चलाने का काफी अनुभव रहा है, ऐसे में हमारे पास काफी आत्मविश्वास है। किसी भी चैनल की सफलता उसकी टीम पर निर्भर करती है। हमें अपनी टीम पर पूरा भरोसा है और अपनी टीम के साथ मिलकर हम इसे सफलता की ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।

यदि आर्थिक पक्ष की बात करें तो इसकी फंडिंग का क्या सोर्स है? यानी इसमें निवेशक कौन है, इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल और रेवेन्यू मॉडल के बारे में भी कुछ बताएं?

मैं आपको बता दूं कि इसमें निवेशक के तौर पर गुजरात के एक बड़े कॉरपोरेट हाउस का पैसा लगा है। हम अभी उनके नाम के बारे में नहीं बता सकते हैं। हो सकता है कि वे खुद ही अपना सार्वजनिक करें। मैं आभारी हूं उन लोगों का कि उन्होंने हम पर भरोसा जताया और सोचा कि जगदीश चंद्रा पर यदि पैसा लगाएंगे तो पैसा बढ़ेगा ही। ऐसे में हमें फंडिंग की कोई समस्या नहीं है। अभी ये छोटा चैनल है। आप इसे स्टार्टअप चैनल भी मान सकते हैं। पूरे देश में मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े लोग इस बात को जानते हैं कि हम रेवेन्यू के मामले में हमेशा नंबर वन पर रहते हैं। हमारी टीम में शामिल मनोज जिज्ञासी एक तरह से देश के बेस्ट सेल्स हेड हैं। वो हमारे स्ट्रैटेजिक एडवाइजर भी हैं। हमने पहले भी साथ काम किया है और मैं जानता हूं कि वो जहां भी रहे हैं, रेवेन्यू को आगे बढ़ाया है।

रेवेन्यू हमारे लिए किसी तरह से चुनौती नहीं है। इसके दो पार्ट हैं। एक तो निवेश और दूसरा आगे चैनल को चलाना। निवेश के लिए हम उनका आभार मानते हैं, जिन्होंने हमारे ऊपर भरोसा जताया और हमें प्रोत्साहन देते हुए आगे बढ़ाया। रही बात आगे चैनल को चलाने की तो मनोज जिज्ञासी के नेतृत्व में सेल्स टीम और अजय कुमार के नेतृत्व में एडिटोरियल टीम के साथ मिलकर हम सभी इसे आगे ले जाएंगे। मेरा मानना है कि रेवेन्यू को लेकर हमारे सामने कभी कोई इश्यू नहीं आएगा। हम यहां सिर्फ बिजनेस करने नहीं बल्कि अच्छा चैनल चलाने के लिए आए हैं। बिजनेस अच्छा होता है तो बहुत अच्छी बात है। हम अपने स्टाफ का भी काफी ध्यान रखते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि हम सभी मिलकर काम करेंगे और बिना रेवेन्यू की चिंता किए लोगों के बीच अच्छा चैनल लेकर जाएंगे।

रही बात डिस्ट्रीब्यूशन की तो हमने सेलेक्टिव डिस्ट्रीब्यूशन पर फोकस किया है। इसके अलावा मेरा तो यह मानना है कि आखिर में आपकी खबरें ही काम आती है। खबरें ही जीवन है। यदि आपकी खबरों में दम है तो चैनल अपने आप दमदार होगा और यदि खबरों में दम नहीं है तो कितनी ही ब्रैंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन कर लें, उससे कुछ होना नहीं है। देश भर में हमारी दमदार मौजूदगी दिखाई देगी। डिस्ट्रीब्यूशन और रेवेन्यू हमारे लिए किसी तरह की चुनौती नहीं है।

आजकल तमाम चैनल्स हैं और लगभग सभी एक जैसे दिख रहे हैं। ऐसे में आपका एडिटोरियल स्टैंड कैसा रहेगा। टीवी पर आजकल जो हंगामा दिखाई देता है, आप इसे किस रूप में देखते हैं और कैसे चैनल को नई पहचान दिलाएंगे?

हमारी एक ही स्ट्रैटेजी है कि ‘States make the Nation’ यानी राज्यों से ही राष्ट्र का निर्माण होता है। यह पहला ऐसा चैनल होगा, जिसमें देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवरेज मिलेगी। आजकल तमाम चैनल्स का फोकस दिल्ली-एनसीआर पर रह गया है। आज के दौर में न्यूज पिछड़ गई है। अगर न्यूज हैं भी तो तमाम चैनल्स दिन भर चुनिंदा चार-पांच खबरों को ही दिखाते रहते हैं, लेकिन हमारे चैनल पर ऐसा नहीं होगा और कश्मीर से कन्याकुमारी तक यानी देशभर की खबरों को हम अपने चैनल पर कवर करेंगे। रोजाना किसी न किसी राज्य का बेहतर कवरेज आपको हमारे चैनल पर मिलेगा। देश के 4000 विधानसभा क्षेत्रों में से अधिकतर क्षेत्रों में हमारे इनफॉर्मर/स्ट्रिंगर/रिपोर्टर होंगे जो देश के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को पूरी कवरेज देंगे। इसलिए हमने कहा भी है कि ‘भारत24‘ वहां तक होगा, जहां तक भारत है।

लगभग सभी चैनल्स डिजिटल पर फोकस कर रहे हैं, उनकी अपनी न्यूज वेबसाइट्स भी हैं। इस बारे में आपकी क्या प्लानिंग है? क्या चैनल की वेबसाइट भी शुरू करेंगे? क्या उसका कंटेंट अलग से क्रिएट करेंगे या चैनल के कंटेंट को ही उस पर चलाएंगे?

मेरा मानना है कि वेबसाइट को चलाने के लिए चैनल का भी कंटेंट दिया जाना चाहिए। सोशल मीडिया वैसे तो काफी लोकप्रिय है, लेकिन रेवेन्यू के मामले में जीरो है या लॉस मेकिंग है। हम चैनल का कंटेंट भी चलाएंगे और अन्य एजेंसियों से भी वेबसाइट के लिए कंटेंट हासिल करेंगे। हमारा फोकस जितना टीवी पर है, उतना ही डिजिटल पर भी है।

आपका ‘द जेसी शो’ (The JC Show) काफी लोकप्रिय रहा है। क्या उस शो को दोबारा शुरू करेंगे अथवा अपना कोई और शो लेकर आएंगे?

लगभग हर तीन महीने में मैं एक ‘द जेसी शो‘ करता हूं, यह कई मायनों में देश का सबसे बड़ा शो रहा है। क्योंकि हम 18 चैनल चलाते थे और यह शो सबमें चलता था। पिछली बार भी जब मैंने यह शो किया था, तो उसे करीब एक करोड़ लोगों ने देखा था। यहां भी ‘द जेसी शो‘ करेंगे। यह चैनल को चलाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ पैशन के लिए होगा। चैनल को चलाने वाले शो हमारे एडिटोरियल के लोग करेंगे। 

चैनल की मार्केटिंग को लेकर किस तरह की स्ट्रैटेजी बनाई गई है?

मेरा मानना है कि मीडिया में मार्केटिंग एक लग्जरी है। लोगों को चैनल के बारे में जानकारी देने के लिए मार्केटिंग जरूरी है लेकिन असली मार्केटिंग तो खबर से होती है। खबर में यदि दम है तो उसे लोग पाताल से ढूंढ लाएंगे।

ज्यादातर चैनल्स टीआरपी के पीछे भागते हैं, जिसे लेकर कई बार विवाद भी होता है और आरोप-प्रत्यारोप भी लगते हैं। क्या आप भी टीआरपी में यकीन करते हैं और आप भी नंबरों की इस दौड़ में शामिल होंगे?

टीआरपी में मेरी कभी भी मान्यता नहीं रही। हमारा चैनल देश का पहला टीआरपी फ्री चैनल होगा। यानी हमारे न्यूज रूम में टीआरपी को लेकर कोई दबाव नहीं होगा। टीआरपी यदि आती है तो अच्छी बात है उसका स्वागत है, लेकिन यदि नहीं आती है तो भी हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हम तो ये चाहते हैं कि हमारा कंटेंट अच्छा हो और हमारी टीम पूरे मन से अपना बेस्ट काम करे। हमारी खबरों में पूरी ताकत है रेवेन्यू लाने की और एडवर्टाइजर्स भी जानते हैं कि हमारी क्या वैल्यू है। मेरा मानना है कि अब टीआरपी वाली क्रेडिबिलिटी खत्म हो गई है, बस एक सिस्टम है जो चल रहा है। लेकिन एक दिक्कत ये है कि नेशनल चैनल का सारा बिजनेस टीआरपी से आता है, लेकिन रीजनल चैनल में टीआरपी का कोई रोल नहीं है। मैं आपको बता दूं कि लॉन्चिंग के पहले साल में ही मैं बिना टीआरपी के 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का रेवेन्यू लेकर आऊंगा। हालांकि, टीआरपी आ जाए तो बहुत अच्छी बात है, उसका स्वागत है, पर हम टीआरपी के मोहताज नहीं हैं। मैं फिर कहता हूं कि हमारी खबर हमारी ब्रैंडिंग करेगी और हमारा शो हमारी ब्रैंडिंग करेगा। हमारे लिए रेवेन्यू, ब्रैंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का कोई चैलेंज नहीं है। हमारे लिए एक ही चैलेंज है कि हमारे रिपोर्टर्स खबर कहां से लाएंगे।

आपने पत्रकारिता में लंबा वक्त बिताया है और इसके तमाम चरण देखे हैं। आजकल पहले के मुकाबले पत्रकारिता थोड़ी बदल गई है और तमाम चैनल्स पर हल्ला-गुल्ला ज्यादा होता है। ऐसे में आप समय के साथ किस तरह इस चैनल को प्रासंगिक रखेंगे?

यह मैंने अभी कहा कि आदमी समय, काल, देश और परिस्थिति के अनुसार फैसले लेता है। एडिटोरियल पॉलिसी भी उसी से बनती है। हम भी शोरगुल करेंगे लेकिन दूसरों के मुकाबले थोड़ा कम करेंगे। हम कोशिश करेंगे कि आज के माहौल में यह चैनल मार्केट में ताजा हवा के झोंके की तरह आए। लोगों को सुकून मिले। उन्हें पता चले कि इस चैनल पर 24 घंटे लड़ाई-झगड़ा और शोरगुल वाले कार्यक्रम ही नहीं दिखाए जाते हैं। हमारे डिबेट शो अन्य चैनल्स के मुकाबले शालीन होंगे और कम हंगामेदार रहेंगे, इसके लिए हमारी पूरी कोशिश रहेगी। बाकी समय आने पर पता चलेगा कि हम कितना इस दिशा में कर पाते हैं और कितना नहीं। लेकिन मैं विश्वास दिलाता हूं कि यह चैनल अन्य चैनल्स से अलग होगा।

कोई भी चीज जब हम शुरू करते हैं तो उसके भविष्य के बारे में भी सोचते हैं। ऐसे में आपने अगले पांच साल के लिए इस चैनल का क्या रोडमैप तैयार किया है? अगले पांच साल के सफर में इस चैनल को आप कहां व किस रूप में देखते हैं?

इसे हम इस रूप में देखते हैं कि आने वाले समय में कोई भी राजनीतिक पार्टी इस चैनल को ध्यान में रखे बिना अपनी रणनीति नहीं बना पाएगी। ईटीवी में हम ऐसा कर चुके हैं, जब बिना ईटीवी को ध्यान में रखे हुए कोई भी पॉलिटिकल पार्टी अपनी रणनीति नहीं बनाती थी। हमारा पूरा विश्वास है कि यह चैनल अपनी मजबूत पकड़ बनाएगा। हम कॉरपोरेट के लोग नहीं हैं, जो टार्गेट के पीछे भागें। मेरा मानना है कि टार्गेट इस तरह का होना चाहिए, जिसे अपने बेहतर प्रयासों से हासिल किया जा सके। टार्गेट काल्पनिक नहीं होना चाहिए। हम पहले यह देखते हैं कि टार्गेट ऐसा है कि नहीं, जिसे प्राप्त किया जा सके।

कई चैनल्स अपनी सेल्स टीम के सामने इतना टार्गेट रख देते हैं कि उसे सामान्य तौर पर हासिल करना नामुमकिन होता है, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हैं। हम उतना ही टार्गेट रखते हैं, जो वास्तविक हो न कि इतना काल्पनिक कि उसे हासिल करना नामुमकिन हो। हम रेवेन्यू के लिए अपने पूरे प्रयास करते हैं, लेकिन हमारा फोकस टार्गेट हासिल करने पर नहीं होता है। हालांकि, अपने प्रयासों की बदौलत आमतौर पर आखिर में हमें बहुत अच्छा रेवेन्यू हासिल होता है। मैं सिर्फ इस बात को जानता हूं कि हमारा चैनल आज के दौर में सभी के लिए प्रासंगिक होगा और लोग इसे देखेंगे व पसंद करेंगे।

आपका चैनल किन बड़े प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध होगा?

हमारा यह चैनल सभी प्रमुख डीटीएच प्लेटफॉर्म्स जैसे- टाटा स्काई, एयरटेल, डिश टीवी और वीडियोकॉन आदि पर उपलब्ध होगा।

हाल ही में चीफ जस्टिस एनवी रमना ने टीवी मीडिया की विश्वसनीयता पर कटाक्ष करते हुए इसे कंगारू कोर्ट तक की संज्ञा दी थी। आपका इस बारे में क्या कहना है?

उनकी राय अपनी जगह सही हो सकती है, मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, लेकिन इस बारे में मैं चीफ जस्टिस को लिखूंगा कि आप ‘भारत24’ देखना शुरू कीजिए, फिर मैं आपसे इस बारे में आपकी राय जानूंगा।  

तमाम लोग सफल होने के बाद लाइफ को एंज्वॉय करते हैं, लेकिन आप इतनी सफलता मिलने के बाद और इस उम्र में एक नया चैनल लेकर आ रहे हैं। ऐसे में इस चैनल को लेकर मार्केट में काफी हलचल है। इस बारे में आपका क्या कहना है?

इसे मैं सिर्फ पैशन ही कहूंगा। मैं इस समय 72 साल का हूं, लेकिन मैं अपनी सेहत को लेकर काफी सजग हूं और मुझे अभी काफी काम करना है। बाकी तो सब ईश्वर के हाथों में है। मेरा मानना है कि दो ही चीज जीवन हैं। पहला खबर और दूसरा स्वाद। मैं इन दोनों चीजों पर पूरा ध्यान देता हूं और वर्कआउट भी करता हूं, ताकि लंबे समय तक हम खाने का स्वाद ले सकें और फिट रहकर काम कर सकें। मेरा मानना है कि लाइफ में एंज्वॉय करने के लिए आपको पॉवर में होना चाहिए, तभी आपकी पूछ होगी। मैं आज भी रोजाना 11 किलोमीटर चलता हूं और देश-विदेश के कई अखबार पढ़ता हूं।

आजकल के पत्रकारों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?

उनसे मेरा यही कहना है कि खबर लेकर आओ बस। आजकल तमाम पत्रकार सिर्फ इवेंट में सिमटकर रह गए हैं और खबर करना भूल गए हैं। उन्हें एक्सक्लूसिव कंटेंट पर फोकस करना चाहिए और खबर के अंदर की खबर निकालकर लानी चाहिए।

आप अपनी टीम किस तरह तैयार कर रहे हैं। इसमें किस तरह के लोग आपके साथ जुड़ रहे हैं। उनकी भर्ती में आप किन बातों पर फोकस रखते हैं, इस बारे में कुछ बताएं?

हमारे यहां भर्ती से पहले तमाम तरह की औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं और आवेदकों को तमाम मानकों पर परखने के बाद ही नियुक्ति दी जाती है। ऐसा नहीं है कि आज किसी को भर्ती कर लिया, कुछ दिनों बाद उसे जाने के लिए कह दिया। भर्ती ही तय मानकों के हिसाब से होती है तो उनकी परफॉर्मेंस पर हमें पूरा भरोसा होता है।

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हमेशा छाया रहेगा बड़े पर्दे का प्यार और सिनेमा का जादू: रवीना टंडन

हिंदी सिनेमा में 'मस्त मस्त गर्ल' का तमगा पाने वाली अभिनेत्री रवीना टंडन ने पहले बड़े पर्दे पर और अब ओटीटी की दुनिया में खुद को साबित किया है।

Last Modified:
Thursday, 12 May, 2022
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हिंदी सिनेमा में 'मस्त मस्त गर्ल' का तमगा पाने वाली अभिनेत्री रवीना टंडन ने पहले बड़े पर्दे पर और अब ओटीटी की दुनिया में खुद को साबित किया है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी वेब सीरीज ‘अरण्यक’ से रवीना टंडन ने ओटीटी की दुनिया में कदम रखा और यहां भी अपने अभिनय के झंडे गाड़े। ‘ई4एम प्ले स्ट्रीमिंग समिट 2022’ (e4m Play Streaming Summit 2022) में उन्होंने सिनेमा से लेकर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म तक अपने सफर के बारे में, 90 के दशक से फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलाव के साथ-साथ कई अन्य मुद्दों पर चर्चा की।  

ट्रेडिशनल सिनेमा से ओटीटी तक अपनी पारी के बारे में बात करते हुए रवीना टंडन ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि एक अभिनेता या कलाकार को बड़े पर्दे से छोटे पर्दे की ओर या स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट होना मुश्किल है। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरा लगाव कैमरे से है (खुद के लिए बोल रही हूं)। इसलिए जब भी मेरे सामने कैमरा आता है और कोई किरदार मुझे दिया जाता है, तो एक्शन बोलने के साथ ही मैं उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूं। मेरे लिए, यह मायने रखता है कि मैं खुद को ऑडियंस के साथ कैसे जोड़ पाउं। एक कलाकार के तौर पर, मैं हर उस किरदार में अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूं, जो मुझे दिया गया है। लिहाजा, मुझे पता है कि मेरे लिए अपने ऑडियंस तक पहुंचने का रास्ता उसी कैमरे के जरिए ही होकर जाता है।

यह भी पढ़ें: देश में OTT कंटेंट के विस्तार पर बोले शैलेश लोढ़ा, प्रड्यूसर्स को दी ये सलाह

1990 से 2022 तक फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलावों को लेकर रवीना टंडन ने कहा, ‘90 के दशक से अब 2022 तक, निश्चित रूप से एक बड़ा बदलाव आया है और मुझे लगता है कि यह केवल अच्छे के लिए हुआ है। हमेशा ही सिनेमा के लिए एक खास तरह की प्रतिस्पर्धा रही है, चाहे वह डीवीडी, वीसीडी के रूप में आयी हो, या टेलीविजन पर खुलने वाले विभिन्न चैनल्स के रूप रही हो या फिर विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर हर दिन खुलने वाली स्ट्रीमिंग सर्विसेज के रूप में रही हों। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि बड़े पर्दे का प्यार और सिनेमा का जादू हमेशा छाया रहेगा। इसका फायदा यह है कि कुछ हद तक टेलीविजन सहित तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने हमें विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों, विभिन्न देशों से आने वाले शोज और उनके पारम्परिक तौर तरीकों और उनकी कहानियों से और यहां तक उनके कहानी कहने के तरीके से भी रूबरू कराया है।

उन्होंने आगे कहा, ‘ऐसा जरूरी नहीं है कि निश्चित तौर पर कोई बड़े नाम की वजह से फिल्म या शो हिटा होगा।  यह कंटेंट पर भी निर्भर करता है। कई बार बड़े नामों को शो में लिया जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश शो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पता है, या उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता है। हालांकि इसके कई कारण हो सकते हैं। फिल्म मेकर्स, जो एक ऐसा शो बना रहे हों, जिसमें उन्हें लगता है कि फलां बड़े अभिनेता की वजह से उन्हें क्रेडिट मिलेगा, या वह करेक्टर में घुस जाएगा और उन्हें वह देने में सक्षम हो जाएगा, जो वह चाहते हैं, तो मुझे लगता है कि यह सिर्फ है एक अतिरिक्त बोनस है। इसलिए, इसमें आप निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कह सकते हैं।’

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टाइम्स नेटवर्क के राहुल शिवशंकर ने बताया, TRP की ‘दौड़’ में क्यों आते हैं आगे

गोवाफेस्ट 2022 में ‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) के एडिटोरियल डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ राहुल शिवशंकर ने एक्सचेंज4मीडिया से तमाम मुद्दों पर की बातचीत

Last Modified:
Monday, 09 May, 2022
Rahul Shivshankar.

‘टाइम्स नाउ’ (Times Now) के एडिटोरियल डायरेक्टर और एडिटर-इन-चीफ राहुल शिवशंकर ने हाल ही में गोवा में आयोजित ‘गोवाफेस्ट 2022’ (Goafest 2022) में बतौर स्पीकर शिरकत की। इस दौरान हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने डेनियल मैकएडम्स (Daniel McAdams) वाली वाकये समेत तमाम मुद्दों पर उनसे विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

जब आपने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, तब क्या न्यूज कुछ अलग थी? इतने वर्षों में चीजें कैसे बदल गई हैं?

उन दिनों न्यूज काफी कम हुआ करती थी और उनका ज्यादा फोकस क्रिकेट, राजनीति और एंटरटेनमेंट पर होता था। उस समय अखबार, दूरदर्शन और राज्यों द्वारा नियंत्रित रेडियो होते थे। इसके बाद निजी टीवी चैनल्स आए। उस समय हमारे पास विज्ञान, पर्यावरण, यूनिवर्स और टेक्नोलॉजी जैसी आला दर्जे की पत्रकारिता नहीं थी। चीजें अब बिल्कुल अलग हैं।

एक टीवी पत्रकार के रूप में आप किस चीज को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं?

इसमें मैं ईमानदारी और विश्वसनीयत कहूंगा। मैं न्यूज में किसी भी तरह का समझौता नहीं करता और इसके अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है।

न्यूज रेटिंग्स की बात करें तो टाइम्स नाउ टॉप चैनल्स में से एक है। आपको क्या लगता है, वो कौन सी चीज है जो इसे दूसरों से आगे रखती है?

टीआरपी के मामले में हम हमेशा दूसरों से आगे रहे हैं। अभी जो ताजा रेटिंग आई है उसमें हम सभी कैटेगरी में टॉप पर हैं। आप तमाम शहरों को देखें, हमने हर आयु वर्ग और अन्य श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल किया है। यह सब कुशल नेतृत्व और दृढ़ विश्वास के कारण है। हम दृढ़ निर्णय लेते हैं। उदाहरण के लिए, हमने महामारी के दौरान चुनावों का बहिष्कार किया था। ऐसा इसलिए नहीं था कि हम कुछ और करना चाहते थे, बल्कि हमने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उस समय लोग गैर-राजनीतिक कंटेंट चाहते थे। यही कारण है कि हम टीआरपी में आगे रहते हैं।

कोविड-19 और लॉकडाउन के कारण तमाम मीडिया संस्थानों के लिए पिछले दो साल काफी मुश्किलों भरे रहे। एडिटोरियल लीडर के रूप में आपके लिए यह समय कितना चुनौतीपूर्ण था? इसके अलावा पिछले दिनों चर्चा का विषय बने मैकएडम्स वाकये के बारे में भी कुछ बताएं?

महामारी के चरम पर लोगों को ऑफिस में काम पर आने के लिए कहना काफी मुश्किल था। हमने अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन और दवाओं की उपलब्धता पर व्यापक कवरेज के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। हमने इसके लिए काफी प्रयास किया।

मैकएडम्स वाकये की बात करें तो यह अचानक हुआ। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा नहीं किया गया। मैं किसी भी तरह की पब्लिसिटी नहीं चाहता हूं। किसी का नाम गलत लेने के लिए मुझे इस तरह नहीं घसीटा जाना चाहिए था। लोगों ने मुझे अपशब्द कहे और यहां तक ​​कि अन्य तमाम मीडियाकर्मियों ने भी सोशल मीडिया पर हमले शुरू कर दिए।

एक चैनल के रूप में हमने सोचा कि यह बताने की कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है कि यह घटना कभी नहीं हुई, जबकि हमारा ब्रैंड कितना बड़ा है। हमने अपनी गलती पर चर्चा करने के लिए एक और शो चलाया। दूसरा शो भी हिट रहा, हालांकि इसे पहले वाले जितने व्यूज नहीं मिले, जिसे 20 मिलियन लोगों ने देखा। अन्य मीडिया संस्थानों ने इसे लेकर खबरें चलाईं।

न्यूज चैनल्स पर अक्सर आरोप लगते हैं कि टीआरपी के लिए डिबेट शो पर गरमागरम बहस की जाती हैं, जबकि समाज के वास्तविक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया जाता है, जबकि उन पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। इस तरह के आरोपों पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

क्या हमें टीवी डिबेट्स बंद कर देनी चाहिए? क्या विभिन्न सत्रों के दौरान हो रहे हंगामे के कारण देश की संसद को बंद कर देना चाहिए? कुछ ऐसे एंकर्स और चैनल्स हैं जो डिबेट में एक दर्जन मेहमानों को आमंत्रित कर लेते हैं। हम ऐसा कभी नहीं करते। कुछ ऐसे लोग हैं जो चैनल्स पर आते हैं और डिबेट को बाधित करते हैं। वे अपनी आवाज ऊंची रखने के लिए डिबेट शो में चिल्लाते हैं और यदि आप उन्हें म्यूट करते हैं तो वे आप पर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का आरोप लगाते हैं। जहां तक समाज के वास्तविक मुद्दों की बात है तो मैं यह बताना चाहता हूं कि टाइम्स नाउ बेरोजगारी और ईंधन की बढ़ती कीमतों के बारे में बात करता है।

वैसे न्यूज चैनल्स पर ये आरोप कौन लगा रहा है? जो अभी मार्केट में आए हैं। मीडिया स्टार्ट-अप मुख्यधारा के मीडिया को बदनाम करना चाहते हैं, ताकि वे आगे बढ़ सकें। वैकल्पिक मीडिया खुद को बढ़ावा देने के लिए मुख्यधारा को बदनाम करना चाहता है। मैं कहना चाहता हूं कि वे ध्यान आकर्षित करने के लिए न्यूज चैनल्स के खिलाफ नकारात्मकता फैलाने के बजाय अच्छी पत्रकारिता कर सकते हैं।

कई न्यूज चैनल्स ने खुद को राजनीतिक स्पेक्ट्रम के बायें अथवा दायें पक्ष की ओर कर लिया है। आप अपने चैनल की स्थिति कैसे देखते हैं?

अमेरिका में, कई बड़े मीडिया घराने राष्ट्रपति पद की दौड़ में राजनीतिक पक्ष लेते हैं। जैसे कि वे जो बाइडेन या डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन करते हैं। हम कभी भी चुनाव में उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करते हैं। हर पत्रकार को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है, जब तक कि वे किसी राजनीतिक पार्टी के पीछे नहीं भाग रहे हैं। मैं खुद को एक प्रगतिशील रूढ़िवादी पत्रकार के रूप में वर्णित करता हूं। मेरा अपना एक दृष्टिकोण है और मैं तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखता हूं। 

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आज के दौर में लंबे समय तक न्यूज रेटिंग्स की अनुपलब्धता की कल्पना करना मुश्किल: हर्ष भंडारी

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के ग्रुप सीओओ (ब्रॉडकास्टिंग डिवीजन) ने एक्सचेंज4मीडिया के साथ खास बातचीत में अपनी प्राथमिकताओं, टीवी रेटिंग्स की वापसी समेत कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

Last Modified:
Thursday, 03 March, 2022
Hersh Bhandari

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) ने करीब 15 दिन पहले हर्ष भंडारी को प्रमोशन का तोहफा देते हुए ग्रुप सीओओ (ब्रॉडकास्टिंग डिवीजन) की जिम्मेदारी सौंपी है। उनकी प्रोन्नति ऐसे समय पर हुई है, जब ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल‘ (BARC) इंडिया दोबारा से न्यूज चैनल्स की रेटिंग्स को शुरू करने जा रहा है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में, बड़ी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए भंडारी ने पूरी तरह से कमर कस ली है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) के साथ खास बातचीत में भंडारी ने अपनी प्राथमिकताओं और टीवी रेटिंग्स की वापसी समेत कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

नई भूमिका में आपकी बड़ी प्राथमिकताएं क्या होंगी?

मेरी बड़ी प्राथमिकताएं वही हैं, जो संस्थान और यहां की लीडरशिप टीम की हैं। यानी हमारा मूल उद्देश्य कोर बिजनेस को मजबूत करना और भविष्य के लिए इसे और बेहतर तरीके से तैयार करना है। कहने की जरूरत नहीं है कि उपरोक्त उद्देश्यों के लिए हमारी रणनीतिक आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ने के लिए बेहतर प्रदर्शन, टीम निर्माण और संस्थान में उत्साह को और बढ़ाना शामिल है।

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क में आप विकास के अगले चरण को किस तरह से देखते हैं?

पांच साल पुराने संस्थान के रूप में, विकास की हमारी भूख को शांत होने में समय लगेगा। न्यूज बिजनेस में और जिन भाषाओं में हम काम कर रहे हैं, उनमें अभी भी विकास की बहुत गुंजाइश है। एक मार्केट लीडर और तेजी से बढ़ते न्यूज ऑर्गनाइजेशन के रूप में, अंग्रेजी, हिंदी और बंगाली मार्केट्स में और बढ़ोतरी की गुंजाइश है। हमारे बिजनेस पार्टनर्स की सेवा के लिए मार्केट के विस्तार और इनोवेशन (नवाचार) की भी काफी गुंजाइश है। हमारी सांगठनिक संस्कृति के हिस्से के रूप में हम अपनी प्रतिष्ठा से किसी तरह का कोई समझौता करने में विश्वास नहीं करते हैं। इसी का परिणाम है कि हम हमेशा कंटेंट पक्ष और मार्केट मुद्रीकरण दोनों पहलुओं पर अपने विजन को नवीनीकृत करते रहे हैं।

हमें अपनी टीवी प्लस रणनीति (TV Plus strategy) के बारे में बताएं। आप उस दिशा में क्या और कैसे कर रहे हैं?

किसी भी बिजनेस के लिए डिजिटल में बदलाव एक बड़ी व महत्वपूर्ण गतिविधि बन चुका है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने दो साल पहले ही इस क्षमता को विकसित करना शुरू कर दिया था। मुझे यह स्वीकार करना होगा कि हमें अपने यूजर्स से महत्वपूर्ण खिंचाव (traction) मिल रहा है। वास्तव में यह हमारे रैखिक टेलिविजन (linear television) से जुड़ाव की दिशा में है। हमारे व्युअर्स किसी भी प्लेटफॉर्म पर हमारे कंटेंट को काफी पसंद करते हैं। यह ट्रेंड हमें अपने ऑडियंस की बदलते रुचि और प्राथमिकताओं को गतिशील तरीके से पेश करने की प्रेरणा देता है।

स्ट्रैटेजी बिजनेस पार्टनरशिप को अब अलग-अलग बिजनेस डिवीजन में विभाजित किया जाएगा, प्रत्येक का अपना नेतृत्व और लक्ष्य होगा। यह रणनीतिक ढांचा (strategic architecture) किस तरह काम करेगा?

सभी बिजनेस संस्थानों में स्ट्रैटेजिक बिजनेस यूनिट्स (SBU) होती है जो लाभ को केंद्र में रखकर काम करती हैं। इस बिजनेस सिद्धांत को किसी आधार की आवश्यकता नहीं है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क की बात करें तो हम काफी तेजी से विकास की राह पर हैं, हमें ऐसा ढांचा तैयार करने की जरूरत है जो हमारे स्ट्रैटेजिक ढांचे को सपोर्ट करे। यह हमें प्रत्येक SBU की प्राथमिकता पर ध्यान केंद्रित करने और संस्थान के विकास की गति पर सहक्रियात्मक और गुणक प्रभाव उत्पन्न करने में भी सक्षम होना चाहिए।

न्यूज रेटिंग्स की वापसी को लेकर आपका क्या कहना है? तमाम ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि BARC को अभी भी अधिक मजबूत और समावेशी मीट्रिक प्रणाली बनाने की जरूरत है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

न्यूज रेटिंग्स की वापसी हमारे कानों में मधुर संगीत की तरह है। ऐसे दौर में जब डेटा को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, ऐसे में लंबे समय तक बिना डेटा की कल्पना नहीं की जा सकती है, खासकर न्यूज जॉनर के लिए। बार्क डेटा न केवल हमारे बिजनेस पार्टनर्स के लिए काफी महत्वपूर्ण है, बल्कि व्युअर्स की प्राथमिकताओं को भी प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है। जहां तक ​​डेटा की मजबूती पर आपके प्रश्न का संबंध है, मुझे लगता है, डोमेन विशेषज्ञ अपने मूल्यवान इनपुट के साथ BARC के साथ जुड़े हुए हैं और मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता हूं।

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मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता: अमिताभ अग्निहोत्री

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है।

Last Modified:
Monday, 31 January, 2022
Amitabh Agnihotri

पत्रकारिता में लंबे समय से सक्रि‍य अमिताभ अग्निहोत्री ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। अमिताभ ने वर्ष 1989 में ‘आईआईएमसी’, दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद करियर की शुरुआत ‘दैनिक जागरण’ से की थी। अमिताभ अग्निहोत्री की जीवन यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

पत्रकारिता में आपका तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। मीडिया में कैसे आए? प्रारंभिक जीवन के बारे में बताएं?

मेरा जन्म यूपी के फर्रुखाबाद में हुआ है। जब बड़ा हुआ तो सामाजिक कार्यों में मन लगने लगा। मुझसे बड़े दो भाई-बहन काफी मेधावी थे लेकिन मेरा मन उतना पढ़ाई में लगता नहीं था। मेरी एक बहन है, जो आज आगरा में खुद का अस्पताल संचालित कर रही हैं।

कुल मिलाकर भाई-बहन विद्वान थे लेकिन मैं अपने आप को सदैव समाज से जोड़कर चलता था। मां को मेरी बहुत चिंता होती थी तो उनके कहने से बीकॉम करने चला गया, लेकिन वहां भी मन तो बस डिबेट में ही लगता था।

वो मेरी यात्रा ऐसी थी, जहां मैं छात्र जीवन के साथ-साथ एक सामाजिक जीवन भी जीने लगा था। उसी दौरान मैंने जिले के एसएसपी को चिट्ठी लिखी और जिले के हालात के बारे में बताया। कुछ दिन बाद कुछ लोग घर आए और मेरे बारे में पूछने लगे। मैं उनके साथ गया और बाद में एसएसपी से मित्रवत संबंध हो गए।

इसके बाद सामाजिक दायरा बढ़ा। मुझे आज भी याद है, जब इंदिराजी की हत्या हुई तो मैंने उनकी स्मृति में एक कार्य्रकम का आयोजन करवाया था और उस समय की राज्यमंत्री शीला दीक्षित जी भी उसमें शामिल हुई थीं।

उसके बाद मैंने एमकॉम किया और एमबीए के लिए लखनऊ से बुलावा भी आया, लेकिन मां को अपने मन की पीड़ा बताई और कहा कि मुझे तो मीडिया में जाना है। मां का आशीर्वाद मिला और आखिरकार जो बचपन से मेरी आत्मा मुझसे कह रही थी, मैंने उसकी आवाज सुनी। इसके बाद मैं आईआईएमसी दिल्ली गया और मेहनत का फल ऐसा हुआ कि मैंने वहां टॉप किया।

उसके बाद ऐसा लगा कि जैसे जीवन में कुछ अच्छा होगा और नौकरी की तलाश शुरू की। उसी दौरान ‘दैनिक जागरण‘ दिल्ली से भी शुरू हो रहा था और मुझे सबसे पहले वहां नौकरी मिली।

पहली नौकरी हमेशा से खास होती है। पहली नौकरी के कुछ अनुभव बताएं।

बिल्कुल, आपने सही कहा है। वो यादें खास हैं। वहां मैंने खूब मन लगाकर काम किया और एक महीने के बाद तो मेरा लिखा हुआ छपने भी लगा। ये आज भी मेरे लिए गर्व की बात है।

इसके बाद मुझे रिपोर्टिंग करने का भी मौका दिया गया। बाद में मुझे ब्यूरो भेजा गया और मेरी ग्राउंड रिपोर्टिंग की यात्रा शुरू हुई। ‘दैनिक जागरण‘ जैसे संस्थान के लिए ग्राउंड वर्क करना और वो भी उस दौर में जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, वो समय मेरे लिए स्वर्णिम था।

इसके बाद मुझे बीजेपी और आरएसएस को कवर करने का जिम्मा मिला और साधु संत भी उसी में शामिल हो गए तो इस तरह से मेरी पहली नौकरी के अनुभव बड़े अच्छे रहे।

आपने प्रिंट और टीवी दोनों में काम किया है। आपकी टीवी में यात्रा कैसे शुरू हुई?

सच कहूं तो प्रिंट में काम करने का अपना एक अलग जलवा होता है। एक जगह बैठने का झंझट भी नहीं होता है। ‘दैनिक भास्कर‘ के समय में टीवी वालों से बढ़िया पहचान होने लगी। कई बार तो लोग मुझे टीवी का पत्रकार समझने लग जाते थे। वो एक ऐसा दौर था, जब टीवी आकार ले रहा था। कुछ बड़े चैनल्स में बात हुई, लेकिन मामला जमा नहीं।

जब मैं ‘देशबंधु‘ का संपादक था तो उसी समय ‘टोटल टीवी‘ से ऑफर आया और उनके मालिक से मेरी अच्छी मित्रता भी थी तो मना नहीं कर पाया और जुड़ गया। उसके बाद ‘समाचार प्लस‘ की शुरुआत हुई और सफलता के झंडे गाढ़े। करीब एक साल ‘के न्यूज‘ में भी रहा और एक बार उसे भी नंबर एक पर पहुंचा दिया। बाद में मैंने ‘एटीवी‘ और ‘नेटवर्क 18‘ के UP/UK चैनल्स का भी काम देखा।

कोरोना के कालखंड में एक छोटी सी पारी ‘R9‘ के साथ भी रही और मुझे संतोष इस बात का है कि हमने उस चैनल को एक पहचान दिलाई। इसके बाद ‘टीवी9‘ (डिजिटल) के साथ नई पारी शुरू की और आज आपके सामने हूं।

अगर आपसे ये पूछा जाए कि टीवी और प्रिंट दोनों में से किसमें अधिक मजा आया तो क्या कहेंगे? भविष्य में रीजनल चैनल्स की चुनौती क्या दिखाई देती है?

देखिए, मजा तो दोनों में है लेकिन आपने प्रश्न ऐसा किया है तो मैं कहूंगा कि टीवी में अधिक मजा है, क्योंकि उसमें गति है। कोई भी घटना जब हो रही है तो टीवी के माध्यम से आप उसमें ‘हस्तक्षेप‘ कर सकते हैं, लेकिन अखबार में पूरा एक दिन उसमें लग जाएगा।

प्रभावी माध्यम दोनों हैं, लेकिन टीवी की गति उसे अधिक आकर्षक बना देती है। मुझे कई बार लोग पूछते हैं कि आप किस तरफ हैं तो मैं एक ही बात कहता हूं कि मैं इस तरफ या उस तरफ का होता तो पत्रकार नहीं होता।

पहले लोग नेताओं के बारे में कहते थे कि ये फलां पार्टी का है, लेकिन अब मीडिया वालों के लिए कह रहे हैं कि देखिए वो उस पार्टी का पत्रकार है। अगर बात करें रीजनल चैनल्स की तो उनका भविष्य अच्छा है पर उन्हें नेशनल चैनल्स को कॉपी करने से बचना होगा। कॉपी करने से पैसा कमाया जा सकता है लेकिन लंबे समय तक चैनल नहीं टिक सकता।

मैं तो आम आदमी का पत्रकार हूं और उनसे जुड़ी ही खबरें दिखाता हूं। अगर आप अखबार को देखें तो हर जिले का अलग अखबार निकलता है और इसलिए वो टॉप पर है। उसी तरह से रीजनल चैनल्स को भी हर गांव, कस्बे की खबर दिखानी होगी, तब जाकर वो आपसे जुड़ेगा। अगर आप उसे अफगानिस्तान की खबर दिखाएंगे तो वो आपको क्यों देखेगा? रीजनल चैनल्स का मतलब यही होता है कि दर्शक के गांव की खबर कुछ ही घंटों में टीवी पर आ जाए।

वर्तमान में आपके पास डिजिटल की जिम्मेदारी है। फेक न्यूज की चुनौती को कैसे देख रहे हैं?

टीवी और अखबार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन डिजिटल का कोई दायरा नहीं है। इसे आप एक समुद्र कह सकते हैं, जिसका अपना एक अलग आनंद है। मुझे ऐसा लगता है कि नियम कानून ठीक हैं, लेकिन पूरी तरह से इसे सरकारी नियंत्रण में लाने से इसका ‘सौंदर्य‘ नष्ट हो जाएगा।

इस मसले पर मुझे स्वर्गीय अटल जी की याद आती है, जिनकी मैंने एक बार आलोचना की थी और जब वो मुझसे मिले तो भरपूर स्नेह दिया। इसलिए मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए और मैं अधिक प्रतिबंधों के पक्ष में नहीं हूं। अब जहां तक बात है फेक न्यूज की तो कोई आम आदमी इन्हें तैयार नहीं करता। ये सब एजेंडे से प्रभावित होती हैं और एक आम आदमी तो बस फंस जाता है, इसलिए जागरूकता के पक्ष में हमेशा रहना चाहिए।

क्या आपने कभी किसी से प्रभावित होकर, भय में या लालच में कभी एजेंडा चलाया है?

ये आपने अच्छा सवाल किया। वर्तमान समय में तमाम आरोप मीडिया पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक मेरी बात है तो मेरी सिर्फ एक विचारधारा है और वो है गरीब। लोग मुझे कहते हैं कि आप बहुत बोलते हो, लेकिन उसके बाद भी मुझे खतरा महसूस नहीं हुआ है। मुझे तो केंद्र सरकार तक से सुरक्षा लेने का ऑफर आया, लेकिन मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मुझे कौन मारेगा?

अब पत्रकार सुरक्षा मांगे तो बचकाना लगता है। मैं आपसे ईमानदारी से कहूंगा कि एक बार नहीं, कई बार ऐसे मौके आए जब सत्ता के सर्वोच्च व्यक्ति और मेरे बीच सीधा संवाद हुआ, लेकिन मैंने हमेशा एक बात कही है कि मैं आम आदमी का पत्रकार हूं और उसी की बात करूंगा।

मेरे मंच पर सबका स्वागत है और आपको जो कहना है, जनता से कहिए, मुझसे मत कहिए। मुझे ऐसा लगता है कि इस पेशे में किसी से लाभ नहीं लेना चाहिए और अगर ऐसा किया है तो फिर भगत सिंह बनने का ‘स्टंट’ मत कीजिए, वो हानिकारक हो जाएगा।

समाचार4मीडिया के साथ अमिताभ अग्निहोत्री की बातचीत के वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए: कमर वहीद नकवी

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 25 December, 2021
Last Modified:
Saturday, 25 December, 2021
Qamar Waheed Naqvi

वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी ने मीडिया में अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस बातचीत में उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई यादों को साझा किया है। पेश हैं इस वार्ता के प्रमुख अंश-

अपने बचपन के बारे में कुछ बताएं, पत्रकार कैसे बनना हुआ?

मैं बनारस में पैदा हुआ हूं और पढ़ाई वहीं से की है। मेरे चचेरे नाना उर्दू का अखबार निकालते थे और सगे नाना शायर थे तो पढ़ने-लिखने का माहौल बचपन से ही मिला। दस साल की उम्र तक आते-आते मैं पत्रिका और उर्दू अखबार पढ़ने-समझने लगा था। इसके बाद बाल पत्रिका में भी रुचि होने लगी और बनारस के अखबारों में जो बच्चों का पेज होता था, उसमें मेरी कविताएं छपने लगीं। इसके बाद मेरी रुचि लेखन में होने लगी और 15 साल का जब हुआ तो संपादक के नाम पत्र छपने लगे। साल 1971 में जब बांग्लादेश की मुक्ति का आंदोलन हुआ तो मेरी कविता ‘आज‘ अखबार में छापी गई। इसके बाद एक और अखबार ‘सन्मार्ग‘ में स्पोर्ट्स पर मेरे लेख आने लगे।

इसके बाद एक जानकार वकील ने अपना अखबार शुरू किया और मैं उस जगह काम करने लगा। एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वहां के संपादक ने काम छोड़ दिया, उसके बाद मैंने उस जिम्मेदारी को निभाया और सिर्फ 19 साल की उम्र में तीन साल तक संपादक की हैसियत से उस अखबार को निकालता रहा। जहां तक बात पत्रकार बनने की है तो मैं साफ इस बात को कहता हूं कि मुझसे सरकारी अफसरी नहीं हो सकती थी, इसलिए या तो मैं शिक्षक बनता या मैं पत्रकार बनता। उन दिनों मैं अखबारों में नौकरी भी ढूंढ रहा था और बच्चों को पढ़ाता भी था। एक दिन मेरे एक शिष्य विजय ने जो होजरी की दुकान करता था, मुझे एक विज्ञापन के बारे में बताया जो टाइम्स ग्रुप का था। उसके बाद 30 पैसे के एक लिफाफे के अंदर मैंने 1000 शब्दों का एक लेख भेज दिया। इसके बाद मुझे दिल्ली बुलाया गया और मैं पहली बार उसी सिलसिले में दिल्ली आया। फाइनल इंटरव्यू मुंबई में हुआ और इस तरह मेरी ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ यात्रा शुरू हुई और इसका पूरा श्रेय उस होजरी वाले मेरे शिष्य विजय को देता हूं।

नौकरी के दौरान आपके अनुभव कैसे रहे? ‘चौथी दुनिया‘ की नींव कैसे पड़ी?

आज जिस तरह मीडिया संस्थान मोटी फीस लेते हैं, वैसा ‘टाइम्स ग्रुप‘ का नहीं था। मुझे साल 1980 में पहली नौकरी ट्रेनी के तौर पर मिली और उस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा। मैंने अपने दस साल उन्हें दिए। अगर वो प्रोग्राम नहीं होता तो मेरे जैसा बनारस के साधारण परिवार का लड़का आज यहां नहीं पहुंच सकता था। ‘चौथी दुनिया‘ की भूमिका ‘रविवार‘  में काम करते हुए बनी थी। उस समय मैं ‘रविवार‘ में था तो संतोष भारतीय जी भी वहीं विशेष संवाददाता की भूमिका में थे। उसी समय उन्होंने मुझे और राम कृपाल जी को इस अखबार की योजना के बारे में बताया। दरअसल, उस समय तक मेरी और राम कृपाल की जोड़ी प्रसिद्ध हो चुकी थी। राजेंद्र माथुर जी ने भी मुझे और रामकृपाल को साथ ही लखनऊ ‘एनबीटी‘ का काम देखने भेजा था। एसपी सिंह ने जब ‘रविवार‘ छोड़ दिया, तब उदयन जी को उसकी जिम्मेदारी दी गई थी। उसी दौरान संतोष जी ने हम दोनों को उदयन जी से मिलवाया। हम साथ काम करने लगे। उसी दौरान ‘चौथी दुनिया‘ की नींव पड़ी और हमने उसे सफलतापूर्वक लॉन्च किया। राम कृपाल जी न्यूज एडिटर थे और मैं अखबार की डिजाइन देख रहा था। बहुत कम समय में ही ‘चौथी दुनिया‘ लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गया।

आपको एक बार फिर लखनऊ और फिर जयपुर भेजा गया। उसके बारे में कुछ बताइए। 

जैसा कि मैंने आपको बताया कि ‘चौथी दुनिया‘ हमने लॉन्च किया और करीब तीन साल तक मैं वहां जुड़ा रहा। उसी समय लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स‘ में कुछ दिक्कत आ रही थी। अखबार ठीक से चल नहीं रहा था वहीं प्रतियां बिकनी भी कम हो गई थीं। संस्थान उस अखबार को बंद करने की तैयारी में था और उसी कारण माथुर जी ने मुझे और राम कृपाल दोनों को लखनऊ भेजा। जब मैंने उनसे कहा कि आप हम दोनों को कैसे न्यूज एडिटर बनाएंगे तो उन्होंने कहा कि मैं राम कृपाल और नकवी को अलग मानता ही नहीं हूं। मेरे लिए आप दोनों एक हैं और आप दोनों साथ ही काम करेंगे। उसके बाद हम दोनों ने मिलकर वहां अखबार की गुणवत्ता सुधारी और इसके बाद मैं डेढ़ साल के करीब जयपुर रहा और राम कृपाल जी दिल्ली आ गए।

आपने ‘आजतक‘  के साथ भी काम किया है। अरुण पुरी जी से पहली मुलाकात के बारे में कुछ बताएं।

दरअसल, उस समय ‘डीडी मेट्रो‘ ने ये विचार किया था कि कुछ निजी समाचार एजेंसियों को समाचार प्रसारण का मौका दिया जाए। उस समय तक प्रणव राय ‘दूरदर्शन‘ के लिए एक कार्यक्रम कर चुके थे और चुनावी कवरेज भी वो अच्छी करते थे। विनोद दुआ जी उस समय ‘परख‘ निकाल रहे थे और उसी दिशा में हिंदी में न्यूज बुलेटिन की बात निकलकर सामने आई। उसी समय ‘टीवी टुडे‘ को हिंदी का बुलेटिन मिला और अरुण पुरी जी को हिंदी की चिंता था कि वो कैसी हिंदी हो जो दर्शकों को पसंद आए! वो सहज और सरल हिंदी चाहते थे और उसी दौरान एसपी सिंह का मुझे कॉल आया, जब मैं जयपुर था। फिर मैं अरुण जी से मिला और उन्होंने शेखर गुप्ता जी से कहकर मुझसे एक अंग्रेजी पैराग्राफ का अनुवाद करवाया। उस समय शेखर जी ‘इंडिया टुडे‘ हिंदी के संपादक थे। शेखर जी ने मेरे अनुवाद को पसंद किया और इस तरह मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला और मुझे उस बुलेटिन की भाषा की जिम्मेदारी दी गई। उसी समय बुलेटिन के नाम को लेकर काफी विमर्श हुआ और जयपुर जाते समय बस में मुझे ‘आजतक‘ नाम सूझा और मैंने उसी समय नामकरण कर दिया।

आपने ‘आजतक‘ को आगे बढ़ते हुए देखा है। कुछ यादें हैं, जो आपके जहन में आती हैं?

देखिए, आज के समय में अगर ‘आजतक‘ नंबर वन बना है तो उसकी नींव एसपी सिंह ने रखी थी। उनके असमय निधन ने हम सबको घोर पीड़ा दी लेकिन जैसा कि वो कहते थे कि काम करते रहो। बाद में राहुल देव जी और उसके बाद मैं संपादक हुआ। एसपी सिंह ने ‘आजतक‘ को लोकप्रिय किया। बाद में कई लोगों ने उन्हें कॉपी करने की कोशिश की है। वो एक दिन में 17 से अधिक अखबार पढ़ लेते थे। छोटी से छोटी खबर उनको पता रहती थी। चुनावों को लेकर जो उनकी समझ थी, वो अच्छे-अच्छे बुद्धिमान लोगों को चकित कर देती थी। वो जो भी खबर पढ़ते थे, उनको पूरी समझ रहती थी कि मैं क्या पढ़ रहा हूं! उन्होंने हमे सिखाया कि व्यक्ति को समाज के हर पहलू की समझ होनी चाहिए। उसी नक्शेकदम पर चलते हुए जब मैं न्यूज डायरेक्टर बना तो मैंने वर्कशॉप का आयोजन करना शुरू किया। पत्रकार से लेकर कॉपी राइटर तक को हमने ट्रेनिंग देने का काम किया। मेरा मानना है कि इंसान को हमेशा सीखते रहना चाहिए। आज मैं डिजिटल को समझ रहा हूं और अपना काम कर रहा हूं। फोटोग्राफी सीखने का फायदा भी मुझे अखबार में मिला।

आपने एसपी सिंह और राहुल देव जैसे लोगों के साथ काम किया है। क्या आपको वर्तमान में भाषा की समृद्धि को लेकर कोई शिकायत है?

भाषा को लेकर मेरे विचार थोड़े अलग हैं। शुद्ध बोलने वालों की बजाय अशुद्ध बोलने वाले भाषा का विस्तार अधिक करते हैं। अगर शुद्धता पर अटके होते तो आज 100 साल पहले की हिंदी हम बोल रहे होते। जैसे कि ‘खुलासा‘,  इस शब्द का अर्थ एक्सपोज करना नहीं है, बल्कि किसी चीज का निचोड़ है लेकिन आज इस शब्द का अर्थ बदला चुका है। इसी तरह से भाषा बढ़ती भी है और बदलती है। हम किसी भी भाषा को खूंटा बांधकर नहीं रख सकते हैं। हिंदी आज जो है, वो कल नहीं रहेगी। जहां तक बात टीवी की है तो सोशल मीडिया ने थोड़ा उसका आकर्षण कम कर दिया है। टीवी डिबेट में जो हो रहा है, वो समय की मांग है लेकिन आज नहीं तो कल ये चीज बदल जाएगी। आपको टीवी को जीवित रखने के लिए कुछ अच्छा करना पड़ेगा।

आपकी रुचि क्या है? भविष्य में क्या योजनाएं हैं?

मेरी रुचि तो आती-जाती रहती है। पढ़ना, लिखना और फोटोग्राफी तो हमेशा से शौक रहा है। इसके अलावा ज्योतिष में भी रुचि जागी है। स्टॉक मार्केट की भी समझ आ गई है। डिजिटल मीडिया की कई चीजें आजकल मैं सीख रहा हूं। भविष्य का कुछ सोचना नहीं है, बस जो करना है अच्छा करना है और पहले से बेहतर करना है।

समाचार4मीडिया के साथ कमर वहीद नकवी की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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यह स्थिति सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि संविधान के लिए भी सही नहीं है: सतीश के. सिंह

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 15 November, 2021
Last Modified:
Monday, 15 November, 2021
Satish K Singh

वरिष्ठ पत्रकार सतीश के. सिंह ने मीडिया जगत की अपनी यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। इस इंटरव्यू में उन्होंने अपने जीवन के कई अनुसने किस्सों को साझा किया है। पेश है इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताएं। मीडिया में कैसे आना हुआ?

बचपन में जब मैं पटना में रहता था तो अखबार पढ़ने की आदत लग गई थी। उन दिनों बचपन में ऐसा लगता था कि अखबार बहुत बड़ी चीज है। धीरे-धीरे मेरी रुचि अन्य भाषाओं के अखबारों और पत्रिकाओं में भी होने लगी और साल 1977 आते-आते राजनीति जैसे विषयों की समझ विकसित होनी शुरू हो गई थी। हालांकि मेरी रुचि मीडिया में आने की नहीं थी, दरअसल मुझे खेल का मैदान रोमांचित किया करता था। उस दौरान मैं लगभग सभी बड़ी खेल पत्रिकाओं का अध्ययन किया करता था। मैं बड़ा खिलाड़ी तो नहीं बन पाया, लेकिन मैं एथलीट जरूर था। साल 1982 में पटना के एक अखबार में मेरा फोटो आया था और वो याद आज भी मेरे जहन में जिंदा है। इसके बाद मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आ गया। उसी दौरान मेरी समझ को देखकर मेरे एक मित्र ने मुझे पत्रकारिता में आने की सलाह दी। मैंने एक पत्रिका को जॉइन किया और बाद में नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम के साथ जुड़ गया।

जैसा कि आपने कहा कि बचपन से राजनीति में रुचि थी तो किसी पार्टी से क्यों नहीं जुड़े?

देखिए, अगर मैं चाहता तो बड़ी आसानी से किसी भी राजनीतिक पार्टी से मैं जुड़ सकता था। मुझे पांच बड़े नेताओं ने ऑफर दिया था, जिसमें से चार तो आज जीवित भी नहीं हैं। देखा जाए तो फैक्ट्स आधारित पत्रकारिता करने में मुझे मजा आ रहा था और आज भी मैं उसी को एन्जॉय करता हूं। राजनीति मुझे लगता है कि मेरे बस की नहीं है। मुझे तो इस नाम से ही समस्या है। आप राजनीति क्यों कहते हैं? राष्ट्रनीति कहिए न! ये राज्य करने की नीति क्यों हो? आप इसे लोगों की सेवा करने की नीति कहिए। मीडिया की अगर बात करें तो वहां भी जनता के मुद्दे उठें, लेकिन आज आप देखिए की डिबेट में बॉक्सिंग हो रही है, लोग लड़ रहे हैं और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। मेरा मानना है कि चुनाव तो ठीक है, लेकिन असली लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव के बाद ही शुरू होती है।

अपने रिपोर्टिंग के अनुभव के बारे में बताएं। उस दौर में रिपोर्टिंग करना कितना चुनौतीपूर्ण था?

नलिनी सिंह जी के कार्यक्रम ‘हेलो जिंदगी‘ में काम करने के दौरान मुझे हिमाचल, पंजाब और बिहार जैसे राज्यों में जाने का मौका मिला और काफी कुछ मैंने सीखा। उसके बाद मैं ‘फर्स्ट एडिशन‘ से जुड़ गया, जहां मुझे रिसर्च का काम दिया जाता था जो मेरे लिए अच्छा भी रहा। उसके बाद साल 1996 में मुझे ‘जी टीवी‘ से जुड़ने का मौका मिला। उसी दौरान ओलंपिक हुए और मैंने डेस्क पर रहते हुए उसकी पूरी रिपोर्ट बनाई। उसके बाद मुझे चुनाव कवर करने के लिए पटना (बिहार) भेजा गया। टीवी के लिए वह मेरी पहली चुनावी रिपोर्टिंग थी। मैंने लालू यादव जी का इंटरव्यू भी किया था और उस चुनाव के बाद मुझे लगता है कि मैं एक अच्छा रिपोर्टर बन गया था। देवगौड़ा जी का इस्तीफा, गुजराल जी का पीएम बनना, कारगिल घुसपैठ जैसी खबरें मैंने ही ब्रेक की थीं। इसके अलावा कंधार विमान अपहरण और उसके समाधान की न्यूज भी मैंने ही ब्रेक की थी। इसके अलावा वाजपेयी जी के विश्वासमत हारने की खबर मैंने पहले ही बता दी थी। इसके अलावा मुझे कई बार भारत सरकार की ओर से विदेश जाने का भी मौका मिला। वहीं काम के सिलसिले में करीब 28 देशों की यात्रा करने का मौका मिला। एक और खास बात ये है कि साल 2004 से मैं चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करीब-करीब सही करता आ रहा हूं।

अगर हम 90 के दशक की बात करें तो वो देश के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण दशक था। कई बड़ी घटनाएं उस दौर में हुईं। आप उस समय और आज की पत्रकारिता में क्या बड़ा अंतर पाते हैं?

मुझे ऐसा लगता है कि आज मुख्यधारा का पत्रकार काफी वजह से कमजोर है। आप उसे दबाब कह लें, महत्वकांक्षा कह लें या उसकी विचारधारा को कारण मान लें, लेकिन सच यही है कि आज उस दौर की तरह पत्रकारिता नहीं हो रही है। वैसे एक दौर में हमने सांप-बिच्छू वाली खबरें भी देखीं और उससे मीडिया की इमेज प्रभावित भी हुई, आज कम से कम न्यूज की शक्ल में कुछ तो लोगों को देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर आज डिजिटल मीडिया का जमाना है, जहां कमोबेश हर व्यक्ति पत्रकार बन गया है। आज आपकी एक उंगली पर दुनिया है और खबरें बड़ी तेजी से लोगों तक जा रही हैं तो उनका फैक्ट चेक भी बहुत जरूरी है। जहां तक उस दौर की बात है तो अच्छे-बुरे लोग तो हर समय में होते हैं। आज भी ऐसे कई पत्रकार हैं जो मीडिया में काफी अच्छा प्रयोग कर रहे हैं। उस समय भी तमाम नेता अपना झुंड बनाकर चलते थे, जो हर जगह उनकी बात को सही साबित करे और ये आज भी होता है। एक और चीज जो मुझे दिखाई पड़ती है, वो ये है कि आज के समय में स्टडी उतनी नहीं हो रही है। पहले पढ़ाई-लिखाई पर बड़ा जोर रहता था। इसके अलावा मैं विचारधारा के अतिरेक को भी गलत मानता हूं। चाहे कोई भी विचारधारा हो, अगर वो मीडिया पर हावी होने की कोशिश करेगी तो आप ये मानकर चलिए कि ये सिर्फ मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि देश के संविधान के लिए भी सही नहीं है।

आज देश के ऊपर ‘फेक न्यूज‘ नाम का संकट आ खड़ा हुआ है। कई बार तो पत्रकार भी ऐसे एजेंडे में शामिल हो जाते हैं। आपका क्या मत है?

आज भले ही कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं, लेकिन आप ये भी जान लीजिए कि सिस्टम इतना मजबूत है कि आज किसी को भी कहीं से दबोचा जा सकता है। आज सरकार ने प्रसारण से जुड़े कानून बनाए हैं, लेकिन उनका पालन सख्ती से होना चाहिए। फेक न्यूज तो पहले भी थी, लेकिन आज सोशल मीडिया के कारण असर अधिक दिखाई दे रहा है, इसलिए सरकार को ऐसे लोगों से निपटने के लिए इंतजाम करना चाहिए। मेरा मत यह भी है कि ये सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। ऐसा नहीं कि कोई गलत काम करने के बाद जेल जाए और कोई बच जाए। देश के नेताओं को आज ये बात समझने की जरूरत है कि एक समय उनके खिलाफ भी अगर लिखा जाता था तो पत्रकार का कोई अपमान नहीं करता था, लेकिन आज समय बदल गया है। आज के नेताओं को सहिष्णु होना होगा।

आपकी रुचि क्या है? खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?

समय की तो मेरे पास कभी कमी हुई नहीं है और मैं अपने आप को किसी न किसी काम में व्यस्त रखता हूं। मैं बहुत पढ़ाई करता हूं और डिजिटल मीडिया को समझने की कोशिश करता हूं। इसके अलावा आज भी खेल पत्रिकाओं को पढ़ता हूं और रोज बाजार में लोगों से मिलने जाता हूं। लोगों से मिलना और उनसे बातें करना मुझे पसंद है, इससे समाज को समझने में मेरी काफी मदद हो जाती है। इसके अलावा कैसे देश का विकास हो,  कैसे आम आदमी की कमाई बढ़े और कैसे सबको समान अवसर मिलें, इसी पर सोचता रहता हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास खेल को लेकर एक पूरी नीति तैयार है, लेकिन कोई पूछे तो हम कहें और कोई न पूछे तो भी क्या? हम तो अपनी मस्ती में मस्त हैं।

समाचार4मीडिया के साथ सतीश के. सिंह की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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मीडिया की दुनिया में तमाम रिश्ते तो ऑफिस तक ही खत्म हो जाते हैं: नवीन कुमार

नवीन कुमार को मीडिया जगत में तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रमुख पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Sunday, 07 November, 2021
Last Modified:
Sunday, 07 November, 2021
Naveen Kumar

नवीन कुमार को मीडिया जगत में तीन दशक से भी अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रमुख पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। समाचार4मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपनी इस जीवन यात्रा पर विस्तार से चर्चा की है। पेश हैं इस इंटरव्यू के प्रमुख अंश-

आपने तीन दशक से अधिक मीडिया में काम किया और अब आप राजनीति में हैं। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरा जन्म मेरठ में हुआ है और शिक्षा दिल्ली में हुई। मेरे पिताजी फार्मासिस्ट थे और परिवार के बाकी लोग भी यही चाहते थे कि मैं सरकारी अधिकारी बनकर देश की सेवा करूं। मीडिया में आने का मेरा भी कोई प्लान नहीं था।

पढ़ाई के दिनों के दौरान ही मैं ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ से जुड़ गया था और डिबेट में भाग लेने के कारण मेरी सामाजिक समझ विकसित हो रही थी। उस दौरान कई बड़े पत्रकारों से मिलना होता था और मुझे धीरे-धीरे समझ आया कि मेरी समझ के हिसाब से मुझे पत्रकारिता में जाना चाहिए और मैं पत्रकार बन गया।

शुरू के कुछ वर्ष बेहद कष्टदायक थे, लेकिन धीरे-धीरे मैं काम सीखता गया और आगे बढ़ता गया। साल 1990 में जब ‘दैनिक जागरण‘ दिल्ली से शुरू हुआ तो मुझे जुड़ने का मौका मिला और मैंने काफी कुछ उस संस्थान से सीखा। इसके बाद मुझे ‘राष्ट्रीय सहारा‘ में काम करने का मौका मिला लेकिन मेरे साथ वहां एक समस्या खड़ी हो गई।

दरअसल मैंने राजनीतिक रिपोर्टिंग की और वहां मुझे अपराध की खबरें कवर करने के लिए कहा गया। इसके अलावा मुझे यह भी कह दिया गया कि या तो आप चार महीने के अंदर क्राइम रिपोर्टर बन जाइए या फिर आप इस्तीफा सौंप दें, वरना आपको निकाल दिया जाएगा। मेरे पास कुछ महीनों का समय था और धीरे-धीरे मैंने काम करना और समझना शुरू किया।

एक दिन मैंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर का इंटरव्यू फिक्स किया और दोपहर के तय समय से पहले ही मैं पहुंच गया और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। तय समय से ढाई घंटा अधिक हो चुका था, लेकिन मुझे समय नहीं मिला था लेकिन उसी दौरान वहां एक बड़े अखबार के संपादक आए और उन्हें तुरंत समय मिल गया।

उस दिन मुझे अहसास हुआ कि बड़े पत्रकार का क्या रौब होता है और उस घटना ने मेरे जीवन को बदल दिया। इसके बाद मैं जी-जान से अपने काम में लग गया और उस घटना के एक महीने के अंदर मैं हमारे मुख्य क्राइम रिपोर्टर का भी बॉस बन गया। इसके अलावा मैं क्राइम चीफ रिपोर्टर भी बन गया।

उसके बाद मैंने पब्लिसिटी वाले इंटरव्यू करने बंद कर दिए और वास्तविक मुद्दों पर फोकस शुरू किया। ऐसे कई मामले थे जो आत्महत्या में दर्ज हुए, लेकिन मेरी तहकीकात के कारण उन्हें हत्या मानकर जांच की गई।

आपने प्रिंट में काफी अच्छा काम किया और उसके बाद आप टीवी से जुड़ गए। उस यात्रा के बारे में कुछ बताइए।

वर्ष 1997 में मुझे ‘जी‘ में काम करने का मौका मिला। उस समय वह ‘जी न्यूज‘ नहीं हुआ करता था और सिर्फ एक बुलेटिन आया करता था। अब टीवी से हम परिचित नहीं थे और न ही कुछ समझ में आ रहा था।

दरअसल, उत्साह में मैंने ‘सहारा‘ छोड़ दिया और कुछ लोगों की बातों में आकर गलत निर्णय ले डाले। जब मैं कुछ समय के लिए रोजगार विहीन हुआ तब मुझे समझ आ गया कि लोग आपको नहीं, आपकी कुर्सी को सलाम करते हैं।

मीडिया की दुनिया भी ऐसी ही दुनिया है। जब तक आपके संबंध हैं, तब तक आपको लोग प्रेम करते हैं, वरना बाकी रिश्ते तो ऑफिस तक ही खत्म हो जाते हैं। ‘सहारा‘ में मुझे तमाम सुविधाएं मिलीं, उस समय सिर्फ मैं अकेला क्राइम रिपोर्टर था, जिसके पास जिप्सी होती थी लेकिन एक गलत निर्णय से मुझे जीवन की सच्चाई समझ आई।

अब मेरा ‘जी‘ में सलेक्शन हो तो गया थे, लेकिन मन मेरा प्रिंट में ही था तो मैंने ‘जी‘ में काम करते हुए भी नौकरी खोजनी शुरू कर दी थी। जब मैं टीवी में काम कर रहा था तो दिन भर राजनीतिक खबरें करते थे और सोचते थे कि रात को न्यूज चलेगी, लेकिन जब रात को बुलेटिन आता था तो हमारी न्यूज कुछ सेकंड भर तक सिमट कर रह जाती थी।

उसके बाद आखिर मुझे ‘दैनिक हिंदुस्तान‘ में काम मिल गया। उसके बाद मैंने अपने बॉस को कहा कि ये टीवी अपने बस का तो है नहीं, हम प्रिंट में ही सही हैं, लेकिन उन्होंने मेरे इस निर्णय पर ऐसा कटाक्ष किया कि मैं अंदर तक हिल गया। इसके बाद मैंने ये निर्णय ले लिया कि अब टीवी में ही काम करना है और शानदार काम करना है।

उसी समय ‘जी‘ का ही एक एंटरटेनमेंट लिमिटेड नाम से चैनल आता था और सूर्यकान्त बाली जी वहां के संपादक थे और वो भी प्रिंट से ही आए थे तो मैंने उनसे कहा कि एक करंट अफेयर्स पर और एक विश्लेषण को लेकर कार्यक्रम किया जाए और हमने वो कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे वो हिट होने लगा और हमने एक से एक अच्छे प्रोजेक्ट किए। उसके बाद हमने सुबह का बुलेटिन भी करना शुरू कर दिया। उसी समय मेरी एक मुलाकात विजय जिंदल जी से हुई, जो कि उस समय ग्रुप सीईओ थे और उनके सहयोग से उस चैनल का नाम ‘जी इंडिया‘ हो गया और उसके बाद वही ‘जी न्यूज‘ हुआ।

उस दौरान टीवी पर क्राइम फिक्शन की शुरुआत करने वाला मैं एकलौता मीडियाकर्मी था। संसद हमले पर जो मैंने डॉक्यूमेंट्री बनाई, उसको तो आडवाणी जी ने सभी सांसदों को न्यौता देकर दिखाई और मुझे कई राज्यों से अवार्ड मिले।

टीवी पर क्राइम शो को शुरू करने वाली मेरी टीम थी। मेरे शो के कुछ महीनों बाद देश के बड़े न्यूज चैनल्स ने फिर अपने शो लांच किए।

आपने पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर के आतंक को भी कवर किया है। कई आतंकियों के इंटरव्यू लिए हैं। उन अनुभवों के बारे में बताएं।

जी, मैंने पंजाब के आतंक को काफी नजदीक से कवर किया है। एक बार मैं एक आतंकी से मिलकर आया और ‘सहारा‘ में जब खबर छपी तो बाद में मुझे पता चला कि केपीएस गिल साहब की टीम ने सात आतंकी मारे हैं और उनमें एक आतंकी वो भी था।

मुझ पर आतंकी हमला तक हुआ। गनीमत रही कि मेरी जान बच गई, लेकिन मैंने अपना काम नहीं छोड़ा। मैंने कश्मीर में भी बहुत काम किया है। माजिद डार जो हिजबुल का कमांडर हुआ करता था, उसका इंटरव्यू मैंने किया। बाद में उसका भी एनकाउंटर हो गया।

इसके अलावा गाजीबाबा, डॉक्टर नईम जैसे कई आतंकी हैं, जिनको मेरे इंटरव्यू करने के बाद मार दिया गया था। अफजल गुरु का भी मैंने इंटरव्यू किया था। पूर्वोत्तर की बात करें तो कई आतंकियों के मैंने स्टिंग किए और सेना ने मेरी सराहना भी की।

बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी का भी मैंने जेल में स्टिंग किया था और उसे अपनी ही सुपारी दे दी थी। बबलू श्रीवास्तव नाम का दाऊद का आदमी नेपाल में वहीं के एक अधिकारी के साथ रहता था और उसका खुलासा मैंने ही किया था। मैंने जर्मनी जाकर बब्बर खालसा के लोगों का स्टिंग किया था।

आप जब मीडिया में इतना अच्छा काम कर रहे थे तो राजनीति में कैसे आ गए? बीजेपी से जुड़ाव कैसे हुआ?

दरअसल, मीडिया में रहते हुए ही मुझ पर आतंकी हमला हुआ था और उसके बाद काफी लंबे समय तक मुझे जेड सुरक्षा दी गई थी। उस सुरक्षा घेरे के कारण मैं कई जगह नहीं जा पाता था।

जब मैं ‘जी‘ में था तब साल 2003 में मैंने बीजेपी से दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा था। उसके बाद भी मैंने मीडिया में काम किया, लेकिन मेरी छवि बीजेपी नेता की हो गई थी और साल 2013 के बाद मैं पूर्णकालिक रूप से बीजेपी में ही शामिल हो गया।

पहले मुझे पार्टी ने प्रवक्ता की जिम्मेदारी थी और अब मुझे मीडिया प्रमुख की जिम्मेदारी दी गई है। मैं दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल को एक्सपोज करने में लगा हुआ हूं और मुझे इस कार्य में लोगों का सहयोग भी मिल रहा है। दिल्ली के जल बोर्ड में 57 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है, कहीं अस्पताल नहीं बने और कोई बाइक एम्बुलेंस नहीं है।

आपको सोशल मीडिया पर लोगों का अच्छा समर्थन मिल रहा है। क्या भविष्य में केजरीवाल के सामने खड़ा होने की या पार्टी का चेहरा बनने की योजना है?

देखिए, चेहरा तो कमल का फूल है। हम सब उसके तने और शाखाएं हैं, लेकिन जड़ वही है। चेहरा कोई भी हो, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैंने तो हमेशा कहा है कि मेरी चुनाव लड़ने की कोई इच्छा नहीं है।

मैं तो बस हमेशा पार्टी के संगठन में काम करना चाहता हूं और पार्टी को मजबूत करने की इच्छा है। हर कार्यकर्ता की तरह मेरी भी यही कामना है कि दिल्ली में बीजेपी की सरकार बने और दिल्ली का विकास हो।

समाचार4मीडिया के साथ नवीन कुमार की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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आज तमाम अखबार या टीवी मीडिया के संपादक डिजिटल को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं: प्रभाष झा

‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 01 November, 2021
Last Modified:
Monday, 01 November, 2021
Prabhash Jha

‘हिन्दुस्तान’ की न्यूज वेबसाइट (livehindustan.com) में एडिटर प्रभाष झा को मीडिया के क्षेत्र में काम करने का करीब 20 साल का अनुभव है। मूलरूप से मधुबनी (बिहार) के रहने वाले प्रभाष झा ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2000 में बतौर इंटर्न ‘जैन टीवी’ (Jain TV) से की थी। उन्होंने पत्रकारिता में अपने सफर समेत तमाम बिंदुओं पर समाचार4मीडिया के साथ खास बातचीत की है। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए और आप मीडिया में कैसे आए?

मेरा जन्म मधुबनी (बिहार) में हुआ और बचपन की शिक्षा वहीं हुई। मेरे पिताजी टाटा स्टील, जमशेदपुर में काम करते थे। जब मैं पांचवी कक्षा में था तो पिताजी को लगा कि ये पढ़ने-लिखने में अच्छा है तो उन्होंने मुझे अपने पास ही बुला लिया और बाद में दसवीं तक मैं वहीं पढ़ा।

उसके बाद इंदौर, नागपुर में आगे की पढ़ाई की। इसके अलावा मैंने ‘आईआईएमसी’ से भी लगभग एक साल का कोर्स किया है। जब मैं नागपुर में था तो उसी समय मीडिया और खबरों से नाता जुड़ने लगा था तो कहीं न कहीं ऐसा लगता था कि शायद मीडिया में ही मेरा भविष्य है और वही हुआ।

आप बिहार से हैं और वहां तो अधिकांश युवा सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं तो आपने जब मीडिया में जाने का सोचा तो घर वालों का रिएक्शन कैसा था? 

देखिए, बिहार के अधिकांश बच्चे जब स्कूल में होते हैं तो वो आईआईटी का सपना देखते हैं और जब वो कॉलेज में होते हैं तो सरकारी अधिकारी बनने का सपना देखते हैं, लेकिन इन दोनों के बीच हकीकत का भी अपना एक महत्व है।

मुझे ऐसा लगता है कि मेरे घर की स्थिति ऐसी थी कि मेरे पास इतना समय नहीं था और मुझे जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना था वरना बिहार के हर बच्चे की तरह सपना तो मेरा भी सरकारी अधिकारी बनने का ही था।

आपको पहली नौकरी कैसे मिली? उस अनुभव और यात्रा के बारे में बताइए।

जब मैं ‘आईआईएमसी’ पढ़ने आया था तो ऐसा लगता था कि अब आप इधर आ गए हैं तो नौकरी आसानी से मिल ही जाएगी, लेकिन जब आप पढ़कर बाहर निकलते हैं तो आपको समझ आता है कि नौकरी करना इतना भी आसान नहीं है।

उस समय ‘जी न्यूज‘ और ‘आजतक‘ के सिवा कोई था नहीं और डिजिटल का उदय नहीं हुआ था। दीपावली के बाद जब हम छुट्टियों से वापस आए तो मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने कई जगह अपना सीवी देना शुरु किया।

हमें बस किसी जगह दो-तीन महीने अगर इंटर्न का भी काम मिल जाता तो वो आने वाले समय में नौकरी के लिए काम आ सकता था। उस समय ही मुझे ‘जैन टीवी‘ में काम करने का मौका मिला, जिसमें कमाई उतनी नहीं थी। जब अच्छा पैसा मिलने की उम्मीद जगी तो उस समय उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई।

उसके बाद या तो पैसे बहुत लेट मिलते थे या मिलते ही नहीं थे। हालांकि बाहर के कुछ अखबार थे, जहां मुझे नौकरी मिल रही थी लेकिन वो एक सोच ऐसी थी कि दिल्ली में रहोगे, तभी बड़ा पत्रकार बन पाओगे। हालांकि, समय कुछ अच्छा न होता देख मैंने भोपाल जाने का निर्णय किया और वहां ‘नवभारत‘ अखबार में मुझे नौकरी मिल गई।

उस समय रहता भोपाल में था, लेकिन मन मेरा दिल्ली में था। उसी दौरान मेरे कुछ मित्रों से जानकारी मिली कि ‘दैनिक जागरण‘ मेरठ में नौकरी है। मुझे खेल पत्रकार के तौर पर उस अखबार में नौकरी मिल गई।

अब मेरे इस काम में सबसे बड़ी समस्या यह आई कि स्पोर्ट्स डेस्क का कोई पत्रकार उस समय संपादक बन जाए, ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी और मुझे संपादक बनना था, इसलिए ये बेहद जरूरी था कि मैं जनरल डेस्क पर काम करूं।

उसी दौरान ‘अमर उजाला‘ में बात हुई और मैं देहरादून चला गया। वहां करीब आठ-नौ महीने काम करने के बाद वापस ‘दैनिक जागरण‘ नोएडा में मेरा आना हुआ। इसके बाद मैंने ‘बीबीसी‘ की हिंदी सर्विस में भी काम किया।

वर्ष 2007 में ‘नवभारत टाइम्स‘ अपने डिजिटल की योजनाओं को विस्तार देने में लगा हुआ था और उसी दौरान इसके अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए मैंने वहां नौकरी की और उसके बाद संपादक के पद तक पहुंचा। साल 2019 में लगभग 12 साल अपनी सेवाएं देने के बाद मैंने फिर ‘हिंदुस्तान‘ डिजिटल को संपादक के तौर पर जॉइन किया।

आपने शुरू में सिर्फ टीवी में इंटर्नशिप की और उसके बाद कभी टीवी के साथ काम नहीं किया! कोई खास कारण?

जहां तक बात टीवी की है तो मैं ये समझता हूं कि उस समय में टीवी में इतना लिखने का काम था नहीं और दूसरी ओर मेरा शुरुआती अनुभव ही इस प्रकार का रहा कि फिर मैंने कभी टीवी में जाना उचित नहीं समझा।

हालांकि साल 2007 में जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ को जॉइन कर रहा था उसी समय एक 24 घंटे का चैनल लॉन्च हो रहा था और मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी वहां थे तो उन्होंने मुझे याद किया, लेकिन मैंने जाना उचित नहीं समझा। दूसरी बात ये कि आप किसी भी माध्यम में हों, मूल काम तो लिखना है।

अगर टीवी के शुरुआती दौर को देखें तो उस समय सिर्फ प्रिंट और रेडियो जर्नलिज्म था और जितने भी लोग टीवी में गए थे, वो यहीं से गए थे। उन लोगों को सिखाने के लिए विदेशी मीडिया के सहयोग से वर्कशॉप भी होती थीं। इसलिए मैंने प्रिंट में काम किया और बाद में डिजिटल में काम किया और मुझे इसमें बड़ी खुशी मिलती है।

‘टाइम्स ग्रुप‘ एक शो तैयार करता है, जिसका नाम ‘फेक इट इंडिया‘ है। आपको दर्शक उस शो में अभिनय करते हुए भी देखते हैं, उसके बारे में बताइए।

दरअसल, वर्ष 2015 के बाद हमने देखा कि ह्यूमर पर आधारित वीडियो काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उसी कड़ी में नीरज बधवार और हमारी टीम ने एक ऐसे ही शो की योजना बनाई। अगर आप इस शो को देखें तो इसके किरदार आपके जीवन के आस पास के वो ही लोग हैं, जो परेशान हैं।

जब एक आम आदमी की समस्या पर शो करते हैं तो वो सफल भी होता है और लोगों को पसंद भी आता है। आपने देखा होगा कि मेरा किरदार ‘पत्थर दिल बॉस‘ लोगों को पसंद आता है। ऐसे और भी कई किरदार हैं, जो लोगों को बेहद लुभाते हैं।

इस शो की पूरी स्क्रिप्टिंग नीरज बधवार करते हैं और आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस शो के कई एपिसोड का आइडिया तो हमें फिल्म सिटी में चाय की दुकान पर बैठकर आता था।

डिजिटल को आप किस तरह से देखते हैं! क्या टीवी की न्यूज को सोशल मीडिया पर डाल देना ही डिजिटल है या वहां कुछ अलग कंटेंट देना चाहिए?

टीवी में तो अक्सर ऐसा होता है कि वो हर प्रकार के कंटेंट को डिजिटल पर डालते हैं, लेकिन वर्तमान में आप देखिए कि कई मीडिया हाउस ऐसे हैं, जो अब डिजिटल पर आधारित शो बना रहे हैं। जहां तक बात नियमावली की है तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ डिजिटल के लिए सोचा जा सकता है। आज हम सोशल मीडिया के जमाने में जी रहे हैं, जहां एक मिनट में वीडियो वायरल हो जाता है।

हालांकि आज सिर्फ प्रिंट की न्यूज को डिजिटल पर अपलोड करने की प्रवृति बदल गई है। आज तमाम जितने भी बड़े अखबार हैं या टीवी मीडिया के संपादक हैं, वो डिजिटल को ध्यान में रखते हुए ही काम कर रहे हैं।

आज डिजिटल में बड़ी प्रतिस्पर्धा है। कई छोटी-छोटी वेबसाइट्स हैं, जो फालतू और फेक न्यूज बनाकर अच्छे व्यूज ले रही हैं। इस पर आपका क्या विचार है?

पिछले दो साल में जितनी तेजी से कोरोना संक्रमण फैला, उतनी ही तेजी से डिजिटल का काम बढ़ा है। आज ‘फेसबुक‘ और ‘ट्विटर‘ पर जिसका अकाउंट है, वो एक संभावित प्रकाशक है। करोड़ों की आबादी वाले देश में अगर किसी पोर्टल ने लाखों दर्शकों तक कोई गलत सूचना प्रकाशित भी कर दी तो आप उसे किसी भी तरह से रेगुलेट नहीं कर सकते हैं।

हालांकि मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में ये अच्छा काम कर सकता है। आज आप देखेंगे कि आज से तीन चार साल पहले जो फेक न्यूज थी, वो आज कम हो गई है। आज का जो पाठक है, वो भी थोड़ा समझदार हो गया है और वो अब हर चीज को सोच समझकर शेयर करता है। हर चीज को स्थापित होने में समय लगता है और सबको मिलकर इसके लिए कोशिश करनी होगी।

आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम धन राशि में काफी अच्छा काम किया है। ऐसी कई अच्छी वेबसाइट्स हैं, जो सामाजिक मुद्दों पर बेहद अच्छा काम कर रही हैं।मुझे अंत में बस यही कहना है कि किसी माध्यम में अगर लाख अच्छाई है तो बुराई भी होगी, बस हमें उसे मिलकर दूर करना है।

समाचार4मीडिया के साथ प्रभाष झा की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत बोले, मैं हमेशा इन दो चीजों को देता हूं प्राथमिकता

‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत से बातचीत की

Last Modified:
Friday, 22 October, 2021
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भारत का एक ऐसा राज्य, जिसकी सुंदरता देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक प्रसिद्ध है। इस छोटे से राज्य का नाम सुनते ही पर्यटक रोमांचित होने लगते हैं। जी हां, यहां बात हो रही है गोवा की। गोवा में हर साल 19 दिसंबर को गोवा मुक्ति दिवस मनाया जाता है और इस वर्ष दिसंबर में वह अपनी आजादी के 61वें साल में प्रवेश करेगा। इसी के मद्देनजर ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के को-फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत से बातचीत की और जाना कि कैसे यह राज्य स्टार्ट-अप स्पेस में बड़े पैमाने पर प्रगति कर रहा है और कैसे आत्म निर्भरता की ओर आगे बढ़ रहा है।

डॉ. बत्रा- सुबह से लेकर देर रात तक काम को लेकर आपकी क्या दिनचर्या रहती है यानी आप लगातार किस तरह काम करते रहते हैं? 

प्रमोद सावंत- मैं जो भी काम करता हूं, वह अपने राज्य और देश के लिए करता हूं और मुझे सुबह से लेकर शाम तक काम करने में कोई दिक्कत नहीं है। मैं रोजाना 16 से 18 घंटे काम करता हूं और यह काम मै स्वेच्छा से करता हूं।

डॉ. बत्रा- गोवा की आजादी का 60वां साल चल रहा है। अब आगे राज्य के लिए आपकी क्या योजना है? 

प्रमोद सावंत- जिस तरह देश में ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ (Azadi ka Amrut Mahotsav) मना रहे हैं, उसी तरह  हम गोवा की आजादी की 60वीं वर्षगांठ यानी 19 दिसंबर 2020 से उत्सव मना रहे हैं। उस कार्यक्रम के उद्घाटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। हमने राज्य में और राज्य से बाहर के लिए तमाम योजनाएं तैयार की थीं, हालांकि महामारी के चलते हम उन योजनाओं का पूरी तरह से क्रियान्वन नहीं कर सके। हालांकि, अगले दो महीनों के लिए हमारे पास कई कार्यक्रम हैं। राज्य में ही कम से कम 60 कार्यक्रम होंगे, इसके अलावा देशभर में भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। हम पहले ही सरकार आपके द्वार यानी ‘Government at Your Doorstep’ (Sarkar Tumchya Dari) कार्यक्रम शुरू कर चुके हैं। इसके तहत सभी सरकारी सेवाएं लोगों को उनके घरों पर उपलब्ध होंगी।

डॉ. बत्रा- बेंगलुरु और देश के अन्य स्थानों की तरह गोवा इस तरह नवाचार का केंद्र (Innovation Hub) बनने जा रहा है? 

प्रमोद सावंत- हमने हाल ही में गोवा की कैबिनेट में स्टार्ट-अप नीति में संशोधन किया है। इस नीति को निवेशकों के लिए और यहां स्टार्ट-अप शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए पहले की अपेक्षा अधिक आकर्षक बनाया गया है। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए हमने गोवा के टेक्निकल कॉलेजों में प्रतिभा तलाशने के लिए कॉन्क्लेव आयोजित किया था। गोवा को नॉलेज हब के रूप में और बढ़ावा देने के लिए हमने राज्य में निजी विश्वविद्यालय विधेयक पारित किया है। हमने गृह मंत्रालय के परामर्श से राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय शुरू किया है। गोवा में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ लॉ शुरू हो रहा है, जो नॉलेज हब के रूप में राज्य के विकास को और गति देगा।

डॉ. बत्रा- गोवा में 500 से ज्यादा आईटी कंपनियां होने के बावजूद इसे आईटी हब बनाने की दिशा में रफ्तार थोड़ी धीमी है। इस रफ्तार को तेज करने के लिए आपके पास क्या प्लान है? 

प्रमोद सावंत- हमने नीति आयोग के इनक्यूबेशन सेंटर्स (incubation centres) विकसित किए हैं। इसे और सुविधाजनक बनाने के लिए हमारे पास डीजे-गिफ्ट (DJ-GIFT) योजना है, जिससे फीस में 50 प्रतिशत तक की कमी आएगी। इससे तकनीकी क्षेत्र में प्रतिभाओं को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।

डॉ. बत्रा- कोविड की दूसरी लहर ने पूरे देश को चौंका दिया था और अब तीसरी लहर आने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में कोविड की तीसरी लहर से निपटने के लिए और इसके साथ ही स्वास्थ्य टूरिज्म, टेलिमेडिसिन और इसी तरह की चीजों को प्रमोट करने के लिए आपके पास क्या योजनाएं हैं? 

प्रमोद सावंत- कोविड की दूसरी लहर के दौरान हमने राज्य के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास किया था। हमने अपनी दीन दयाल स्वास्थ्य सेवा योजना के माध्यम से निजी अस्पतालों में भी मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया और ऐसा करने वाला गोवा एकमात्र राज्य है। चाहे एलएमओ (लिक्विड मेडिकल टैंक) हो या ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट, हमारे पास सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों या जिला अस्पतालों में यह उपलब्ध है। हम जल्द ही टेलिमेडिसिन शुरू करेंगे, जिससे राज्य भर के लोगों को फायदा होगा। हम गोवा के लोगों को सर्वोत्तम सुविधाएं प्रदान करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

डॉ. बत्रा- लोग आपको शिक्षित, प्रगतिशील, विनम्र और कुशल राजनेता के रूप में देखते हैं। लोगों को आपसे बहुत उम्मीदें हैं। अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए आप किस तरह प्राथमिकता सूची तैयार करेंगे?

प्रमोद सावंत- मैं बुनियादी ढांचा और मानव विकास, इन दो चीजों को प्राथमिकता देता हूं। मैं समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए काम करता हूं, फिर चाहे वह मामूली बुनियादी ढांचे या प्रमुख बुनियादी ढांचे से जुड़ा हो। जिस तरह से केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना शुरू की है, उसी तरह से गोवा सरकार ने भी स्वयंपूर्ण गोवा (Swayampurna Goa) या आत्मनिर्भर गोवा (self-reliant Goa) योजना शुरू की है। इसके तहत गोवा के हर गांव में प्रत्येक शनिवार को एक सरकारी कर्मचारी जा रहा है और लोगों के लिए काम कर रहा है।

डॉ. बत्रा- यह देखते हुए कि गोवा में बुनियादी ढांचा तेजी से विकसित हो रहा है, आप इसका उपयोग गोवा के लोगों को आगे बढ़ाने, अधिक रोजगार और अधिक अवसर पैदा करने के लिए किस तरह करेंगे?

प्रमोद सावंत- चाहे मोपा इंटरनेशनल एयरपोर्ट हो, या नॉर्थ गोवा से साउथ गोवा तक कनेक्टिविटी हो, इन सभी सुविधाओं से पर्यटन उद्योग को फलने-फूलने में मदद मिलेगी। हम सभी के लिए सर्वोत्तम बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। इससे न केवल पर्यटन, बल्कि राज्य में निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा।

डॉ. बत्रा- पिछले कुछ वर्षों से खनन का काम नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने के साथ ही पुराने खनन पट्टे समाप्त हो चुके हैं अथवा निलंबित हो चुके हैं। यदि आपकी सरकार वापस आती है तो क्या खनन प्रतिबंध का कोई समाधान निकाला जाएगा? 

प्रमोद सावंत- जब से मेरी सरकार सत्ता में आई है, हम पहले ही खनन निगम बना चुके हैं। हम यहां के लोगों को आर्थिक विकास प्रदान करते हुए राज्य में खनन गतिविधियों में तेजी लाने के कई तरीकों का पता लगाने के साथ-साथ इस कार्यकाल में ही लीज की गतिविधियों की शुरुआत कर रहे हैं। मैं खुद खनन क्षेत्र से आता हूं और महसूस करता हूं कि लोगों के लिए खनन शुरू करना कितना महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हम इन तीन महीनों में खनन गतिविधियां शुरू करेंगे। इसके तहत हम विभिन्न गतिविधियों को शुरू और प्रोत्साहित कर रहे हैं।

डॉ. बत्रा- चुनाव के बाद यदि आप गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में वापस आएंगे तो गोवा के लिए आपका क्या विजन है?

प्रमोद सावंत- मैं ये नहीं कह सकता हूं कि 2022 के चुनाव में कौन जीतेगा और कौन मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि 2022 में हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार आएगी। आत्मनिर्भर भारत के तहत हम पर्यटन उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं, जो हमारा प्राथमिक उद्योग है। चाहे वह नीली क्रांति हो, हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति हो, हम इसे राज्य में बढ़ावा दे रहे हैं। हम भारत सरकार के सहयोग से मछली पालन को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें निर्यात भी शामिल है। जब मैं हरित क्रांति की बात करता हूं, तो इसमें हम घरेलू स्तर पर उन कृषि उत्पादों का उत्पादन कर रहे हैं, जिनका हम पहले आयात कर रहे थे। हम पहले दूसरे राज्यों से दूध आयात कर रहे थे, लेकिन घरेलू उत्पादन के लिए इसे प्रोत्साहित किया जा रहा है। चाहे वह कोई भी उद्योग हो, कृषि हो, युवा हो या महिलाएं, हम सभी के विकास को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।

इसके अलावा हम आईटी, शिक्षा और समुद्री उद्योग को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। मेरा विजन गैर प्रदूषणकारी उद्योगों को बढ़ावा देना है, और गोवा के लोग जानते हैं कि गोवा में 60 में पहली बार हमने आत्मनिर्भर/स्वयंपूर्ण गोवा को बढ़ावा दिया है।

डॉ. बत्रा- गोवा के लोगों, विशेषकर उद्यमियों और व्यापारियों से आपकी क्या अपेक्षा है? कोविड की दूसरी लहर में लघु और मध्यम उद्योगों (SMEs) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था, इसे देखते हुए गोवा के संपन्न व्यवसाइयों से आप क्या चाहते हैं? 

प्रमोद सावंत- कोविड के दौरान भी हमने लघु और मध्यम उद्योगों (SMEs) की हर तरह से मदद की थी। मैं राज्य के संपन्न उद्योगपतियों से केवल यही अनुरोध करूंगा कि वे गोवा के लोगों को अपने उद्यमों में रोजगार दें। आत्मनिर्भर भारत के तहत लघु और मध्यम उद्योगों के लिए जो भी लाभ थे, हमने उसे स्थानीय बैंकरों के सहयोग से स्थानीय उद्यमों को दिया। आत्मनिर्भर भारत की तरह ही मेक इन इंडिया की अवधारणा को भी केंद्र सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह आवश्यक है कि गोवा में कुशल जनशक्ति (skilled manpower) का उपयोग किया जाए, जिसके लिए हम अप्रेंटिसशिप (apprenticeship) के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों की मदद कर सकते हैं। यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इस महामारी के दौरान हमने MSMEs को राहत के रूप में 500 करोड़ का वितरण किया है। हम आरएसएल प्लेटफॉर्म (RSL platform) का उपयोग करने वाले और राज्य में छूट प्रणाली (discounting system) तैयार करने वाले पहले राज्य हैं, ताकि गोवा राज्य में अर्थव्यवस्था का प्रवाह निर्बाध रूप से हो।

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