Exclusive: वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल का बेबाक इंटरव्‍यू...

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं...

Last Modified:
Monday, 30 July, 2018
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

जाने-माने वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल इन दिनों पत्रकारिता के साथ समाजसेवा के कामों में जुटे हुए हैं। वे दिल्ली, आगरा, भोपाल समेत देश के कई भागों में कार्य कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों के गुरु हैं।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी ब्रज खंडेलवाल आगरा में यमुना की सफाई से लेकर बढ़‍ते प्रदूषण के प्रति भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उनकी पहचान न सिर्फ पत्रकार, बल्कि एक शिक्षक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी है। इनके अलावा और भी कई विशेषताएं उनमें, हैं जो उनके कार्यों और आचरण में दिखाई देती हैं। ब्रज खंडेलवाल हिंदी और अंग्रेजी भाषा, दोनों में समान रूप से मजबूत पकड़ रखते हैं और उनकी धारदार कलम हर विषय पर चलती रहती है।

'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ब्रज खंडेलवाल से उनके परिवार से लेकर करियर के शुरुआती दिनों के अलावा विभिन्‍न विषयों पर बेबाकी से चर्चा की... 

न्‍यूज को लेकर ब्रज खंडेलवाल का मानना है कि आजकल तो ये हो गया है कि न्‍यूज खुद चलकर आपके पास आ रही है। आपको उसमें से छांटना है कि कौन सी न्‍यूज लेनी है अथवा कौन सी नहीं।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

आपने अपने करियर की शुरुआत दिल्‍ली में रिपोर्टिंग से की है और काफी समय तक वहां पत्रकारिता की। इसके बाद आप आगरा शिफ्ट हो गए। आमतौर पर तो लोग छोटे से बड़े शहर की ओर जाते हैं लेकिन आप बड़े से छोटे शहर की ओर आए हैं। क्‍या आपको इस पर कभी अफसोस होता है कि जो निर्णय लिया वो समय के हिसाब से सही था?

ब्रज खंडेलवाल: यह सवाल काफी लोग मुझसे पूछा करते हैं, क्‍योंकि ट्रेंड यही है कि छोटे शहर से बड़े की तरफ जाना। इसका जवाब यही है कि पत्रकारिता को मैंने एक प्रफेशन के रूप में कभी नहीं लिया है। शुरुआत में यह मेरे लिए लड़ाई का एक हथियार थी। समाज को सुधारना, बदलना, कुछ नया करना, समाजवाद लाना आदि काफी बड़े-बड़े सपने थे। उसमें पत्रकारिता को एक हथियार के रूप में इस्‍तेमाल किया। यह काम दिल्‍ली में बैठकर हो नहीं सकता था।

इसके लिए पूरे देश में, गांव में, छोटी जगह में घूमना और वहां के लोगों से बातचीत करना, पढ़ना-लिखना, कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनना आदि करना होता था तो छोटा-बड़ा शहर आदि मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं था। वैसे दिल्‍ली की लाइफ स्‍टाइल भी मेरे मुताबिक नहीं थी और न ही में वहां के कल्‍चर को आत्‍मसात कर पाया। इसलिए काफी महत्‍वाकांक्षाएं लेकर वापस आए और अपना अखबार शुरू किया। मुझे न तो इसमें कुछ गलत लगा और न ही शिकायत है। अपने जीवन का भरपूर आनंद उठाया है।

दिल्‍ली में आपका सफर कैसा रहा। आपने पत्रकारिता को क्‍यों चुना? दिल्‍ली में कितने साल रहे और क्‍या किया। दिल्‍ली में आपके शुरुआती दिन कैसे रहे, इस बारे में कुछ बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: मुझे स्‍कूल के दिनों से ही लिखने का शौक था। इसके बाद आगरा के सेंट जॉन्‍स कॉलेज में दाखिला लिया। यहां भी लिखते रहे और 'द विंक' (The Wink)  नाम से एक पत्रिका भी लॉन्‍च की, जो काफी लोकप्रिय रही। इसके बाद हमें लगा कि शायद यही हमारी मंजिल है। आज भी उस पत्रिका का प्रकाशन कर रहा हूं।

अभी आपने सेंट जॉन्‍स कॉलेज की पत्रिका 'द विंक' के बारे में बात की। इसके बारे में थोड़ा और विस्‍तार से बताएं ?

ब्रज खंडेलवाल: कॉलेज के दिनों से ही पत्रकारिता में रुचि जागृत हो चुकी थी। अखबार में लिखना, कार्यक्रम-रैलियों की कवरेज करना शुरू कर दिया था और उसके बाद 'द विंक' नाम से 1969-70 में पत्रिका निकाली जो शुरू से ही कैंपस में काफी लोकप्रिय रही। उसके बाद अंग्रेजी से एमए कर लिया। इसके बाद लोगों ने कहा कि पत्रकारिता की भी कुछ पढ़ाई कर लो। हालांकि उन दिनों पत्रकारिता का डिप्‍लोमा या कोर्स आदि कोई करता नहीं था। उस समय मान्‍यता थी कि साहित्‍यकार की तरह पत्रकार भी जन्‍मजात होते हैं और इसमें सीखने की कोई बात नहीं होती है।लेकिन मैंने सोचा कि इसकी पढ़ाई जरूर करनी चाहिए और इसकी गहराई में जाना चाहिए और पूरी तैयारी के साथ इस प्रफेशन में उतरना चाहिए। उन दिनों दिल्‍ली के आईआईएमसी में पढ़ाई करना काफी मुश्किल था क्‍योंकि ज्‍यादातर विदेशी छात्र ही वहां प्रवेश लेते थे। सिर्फ दो-तीन लोग ही हिन्‍दुस्‍तानी होते थे। शुक्र था कि वहां दाखिला मिल गया। साल भर वहां पढ़ाई-लिखाई की और कम्‍युनिकेशन वगैहरा समझा।

उन दिनों हमें 'यूएनआई' के हेड ट्रेवर ट्यूबक एडिटिंग पढ़ाते थे, जिन्‍होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहली बायोग्राफी लिखी थी। उनकी कॉ‍पी एडिटिंग काफी कमाल की थी। बड़े-बड़े लोगों की किताबें उन्‍होंने एडिट की थीं। उन्‍होंने हमारी भी काफी ग्रूमिंग की और एडिटिंग की काफी बारीकियां सिखाईं। सबसे बड़ी बात थी कि बड़ी बातें सरल शब्‍दों में कैसे लिखीं जाए। छोटे-छोटे वाक्‍य बनाए जाएं और उसमें कम्‍युनिकेशन एंगल रहना चाहिए ताकि लोगों को समझ आए। वो बहुत अच्‍छी ट्रेनिंग थी। इसके बाद फिर 1972 में एशिया कप हुआ। उस दौरान एक दैनिक अखबार निकलता था, वहां से काम शुरू किया। उसके बाद तो यूएनआई समेत काफी लंबी लिस्‍ट है एजेंसी-अखबारों की। जब देश में आपातकाल लग गया तो उस समय भी कई अखबारों में काम करते रहे। उस समय अंडरग्राउंड रहकर उदयन शर्मा के साथ काफी लिखा। उसे बांटने के लिए काफी भागदौड़ करते थे। कभी वॉरंट निकल गए तो कभी इधर-उधर भागते रहे। कह सकते हैं कि काफी एडवेंचर था उस समय। आपातकाल जब समाप्‍त हुआ तो राजनारायण का वीकली 'जनसाप्‍ताहिक' के नाम से निकला, जिसके प्रॉडक्‍शन का काम मैंने लिया था। ढाई-तीन साल वह चला। एडिटिंग और छपाई आदि मेरे जिम्‍मे ही थी। वह काफी बेहतरीन व उपयोगी अनुभव था। एक तो हिंदी पत्रकारिता के तौर पर हिंदी को समझने के लिए और डॉक्‍टर लोहिया के विचारों को कायदे से पढ़कर जानने-समझने के लिए बहुत उपयोगी रहा। इसके बाद तो इधर से उधर और उधर से इधर आने-जाने का क्रम चलता रहा। कभी 'पॉय‍नियर', कभी 'दैनिक भास्‍कर', 'स्‍वतंत्र भारत', 'इंडिया टुडे' कभी हिंदी तो कभी अंग्रेजी। कहने का मतलब बहुत लंबी लिस्‍ट है। इतना सफर तय करने के बाद लगा कि वापस अपने शहर में चलना चाहिए। तब तक शादी भी हो गई थी। इसके बाद हमने सोचा कि आगरा वापस चलते हैं और अपना अखबार शुरू करेंगे। इसके बाद अपना प्रिंटिंग प्रेस लगाया। हम दोनों मिलकर रात में छपाई करते थे और सुबह बांटने जाते थे। करीब ढाई-तीन साल तक ऐसा ही चलता रहा। पहले यह 'समीक्षा भारती' नाम से हिंदी में था, फिर इसे अंग्रेजी में किया। इसके बाद अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार 'न्यूजप्रेस' (NewsPress) का प्रकाशन किया, जो अच्छा खासा चला हालांकि बाद में बंद हो गया।

आप अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ बताएं, जैसे आपने दक्षिण भारतीय परिवार में शादी की। इसके बाद आप पत्नी को दिल्‍ली से आगरा ले आए, कैसा रहा ये सफर? 

ब्रज खंडेलवाल: मैं और मेरी पत्नी पद्मिनी हम दोनों एक ही एजेंसी 'नेशनल प्रेस एजेंसी' (NPA) में काम करते थे। उन दिनों भारद्वाज जी उसके मालिक थे। वह 'पीआईबी' से रिटायर हुए थे। वह इंदिरा गांधी के काफी करीब थे। वहां लंबे समय तक काम किया। उस समय दो ही बड़ी एजेंसी 'इन्‍फा' और 'एनपीए' चला करती थीं। एनपीए में काफी बड़े-बड़े लोग जैसे कुलदीप नायर आदि लिखा करते थे। इनके लिखे हुए आर्टिकल्‍स वगैरह की एडिटिंग हम ही किया करते थे। इसके बाद कॉमनवेल्‍थ लंदन की 'जेमिनी न्‍यूज सर्विस' (Gemini news service) के साथ मैं काफी समय तक जुड़ा रहा। मैं उनके लिए फीचर्स आदि लिखा करता था और वह मुझे पूरे भारत में घुमाते रहते थे।


आईआईएमसी को लेकर दिल्‍ली में आपका सफर कितने साल रहा, उसके बाद आप आगरा कब आए?

ब्रज खंडेलवाल : करीब 12-14 साल हम दिल्‍ली में रहे। इसके बाद आगरा आए और फिर दिल्‍ली चले गए और फिर आगरा आ गए। ऐसा काफी समय तक चलता रहा। इसके बाद फाइनली 1990 के आसपास आगरा आ गए। 

आगरा लौटने के बाद किस तरह पत्रकारिता की शुरुआत की?

ब्रज खंडेलवाल: आगरा लौटकर हमने 'समीक्षा भारती' के नाम से जो अखबार लॉन्‍च किया था, वह तो फेल हो गया। कंपोजीटर्स ने हड़ताल कर दी, उस समय पैसे थे नहीं और ये प्रयोग फेल हो गया। अंग्रेजी अखबार शुरू करने का वह समय भी नहीं था और उसका मार्केट भी नहीं था। पहले वह अखबार हिंदी में था लेकिन बाद में उसी नाम से अखबार को अंग्रेजी में कर दिया गया था। हिंदी अखबार साप्‍ताहिक कर दिया था और अंग्रेजी में इसे दैनिक कर दिया था। अब इसे उस समय की मूर्खता कहें या एडवेंचर कि रोजाना चार पेज का अंग्रेजी का अखबार निकालना शुरू किया। उस समय अंग्रेजी का इतना पाठक वर्ग भी यहां नहीं था। हमें लगा था कि अपने शहर में कुछ नया करेंगे। हमें लगा था कि टूरिज्‍म इंडस्‍ट्री इसे सपोर्ट करेगी। हालांकि उन्‍होंने सपोर्ट भी किया। काफी कॉपी खरीदी भी जाती थीं। हर होटल कॉपी खरीदता था क्‍योंकि उसमें डेली इवेंट्स की कवरेज होती थी। उस समय ऑफसेट मशीन गिनती की थीं और यह अखबार लेटरप्रेस पर छपता था। छोटी मशीन थी, उसी पर छापा करते थे कंपोज कराके। दिन भर कंपोजिंग चलती थी। 10-12 लोग रखे गए थे कंपोजिंग के लिए। हालां‍कि नुकसान तो हुआ लेकिन उसका अपना मजा था। इसके बाद 'पॉयनियर' अखबार जॉइन कर लिया। कुछ दिन डेस्‍क पर काम किया फिर लखनऊ से अटैच्‍ड हो गए और वहां चले गए। फिर आगरा आकर ब्‍यूरो संभाला। पहले यह जयपुरिया समूह का था, फिर थापर्स ने खरीद लिया। उस समय विनोद मेहता एडिटर हुआ करते थे। फिर ए.के.भट्टाचार्य आए और उसके बाद चंदन मित्रा ने उसे खरीद लिया। इसके बाद हम दैनिक भास्‍कर में काम करते रहे। फिर तीन-चार साल यहां से 'हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स' में काम किया। इस तरह कभी ये और कभी वो का क्रम लगातार चलता रहा। 1995 में यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया था। उसी साल अंग्रेजी वीकली 'न्‍यूजप्रेस' जो उस समय काफी लोकप्रिय था, में जुड़ गए। हालांकि अखबार काफी छोटा था लेकिन टीम बहुत एक्टिव थी।

उस अखबार पर आरोप था कि वह शहर की ब‍ड़ी-बड़ी शख्सियतों का काफी मजाक उड़ाया करता था?

ब्रज खंडेलवाल: वह अखबार टैब्‍लॉयड रूप में था और टैब्‍लॉयड का जो स्‍वरूप होता है, वो उसी स्टाइल में होता था। उसमें काफी खोजपरक रिपोर्ट्स रहती थीं। उस अखबार ने अपनी रिपोर्ट्स से कई लोगों को मुश्किल में भी डाल दिया था। आगरा के बड़े पत्रकार जैसे रामकुमार शर्मा, जमशेद खान व प्रवीण तालान वगैरह जो आज काफी बड़ा नाम हो गए हैं, सब उसी में काम करते थे। हालांकि उस अखबार में मिलता कुछ नहीं था पर पैशन था सभी में। मैं तो उसमें मुफ्त काम करता था। वह अखबार लगभग पांच-छह साल चला और काफी अच्‍छा चला। फिर कुछ गलतफहमी हो गईं और अखबार बंद ही हो गया। हालांकि उसे दोबारा शुरू करने की कोशिश भी की गई लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। लेकिन वह काफी मजेदार और कामयाब प्रयोग था। 'डीएवीपी' से उसे मान्‍यता भी मिल गई थी और विज्ञापन आदि भी मिलने शुरू हो गए थे। उस समय अखबार का सर्कुलेशन दस हजार था। यह 1995 की बात है। यह अखबार मथुरा से छपकर आता था क्‍योंकि वहां की प्रिंटिंग सस्‍ती और अच्‍छी थी। उस दौरान ऑफसेट की ज्‍यादातर मशीनें मथुरा में ही थीं। मथुरा प्रिंटिंग की बहुत बड़ी मंडी है। इस बीच 2002 और 2003 के बीच में देश की बड़ी न्यूज एजेंसी 'आईएएनएस' (IANS) के लिए काम करने लगा। हालांकि आईएएनएस से मैं इमरजेंसी के दिनों से ही जुड़ा हुआ था। उन दिनों गोपाल राजू का साप्‍ताहिक अखबार 'इंडिया एब्रोड' न्‍यूयॉर्क से निकलता था, बाद में उन्‍होंने इसे 'रेडिफ' को बेच दिया। उसके बाद किसी और ने ले लिया। इसके बाद 'इंडिया एब्रोड न्‍यूज सर्विस' बदलकर 'इंडो-एशियन न्‍यूज सर्विस' हो गई। तब से मैं आईएएनएस से जुड़कर पश्चिमी यूपी को कवर करता हूं।

आज यदि आप देखते हैं कि क्‍या खोया और क्‍या पाया। हालांकि लोग कहते हैं कि आपने क्‍या खोया और क्‍या पाया ये समझना मुश्किल है क्‍योंकि न आपने अपना मकान बनाया और न गाड़ी खरीदी। हालांकि ये सही बात है कि आपने सम्‍मान बहुत पाया है लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखें तो उतनी कामयाबी नहीं मिली। आने वाली पीढ़ी यदि आपको देखे तो वह तो कंफ्यूज रहती है कि सम्‍मान तो ठीक है लेकिन पैसा भी बहुत जरूरी है क्‍योंकि संत जीवन जीना बहुत मुश्किल होता है, इस बारे में क्‍या कहेंगे ?

ब्रज खंडेलवाल: मैंने कभी यह सोचकर काम ही नहीं किया कि क्‍या खोना है और क्‍या पाना है। मैं तो बस इसमें खुश रहता हूं कि चलो एक अच्‍छी स्‍टोरी हो गई। बस मेरे लिए बहुत है और यही मेरा पुरस्‍कार है। क्‍या होगा और क्‍या नहीं होगा, मैं इस बारे में ज्‍यादा नहीं सोचता क्‍योंकि मैंने पत्रकारिता को इस रूप में कभी देखा ही नहीं है कि पैसा कमाना है या गलत काम करना है। मैंने जैसा शुरू में कहा था कि यह तो लड़ाई का हथियार है। एक अच्‍छी स्‍टोरी करना समाज को बदलने के यज्ञ में आहुति देने जैसा है। इस यज्ञ में हम जो कर सकते हैं, वह यह है कि अच्‍छे विचार फेंकें। अच्‍छे लोगों से मिलें अैर उन्‍हें हाईलाइट करें। जो चीजें हाईलाइट करने के लिए जरूरी हैं, उन्‍हें उठाएं। इस हिसाब से देखें तो काफी संतोष है और इतना तो मिल ही जाता है, जिससे दाल-रोटी चल रही है। बिना बात के क्‍यों अपने सिद्धांतों से समझौता करें।   


आपने पिछले पांच दशकों से सक्रिय पत्रकारिता की है और देखी है। वर्तमान में पत्रकारिता के सामने क्रेडिबिलिटी की समस्या है, हालांकि यह हर बार रहता है लेकिन पिछले पांच-सात साल से इस पर सवाल ज्‍यादा उठ रहे हैं और तो और सोशल मीडिया को आए हुए अभी कुछ ही समय हुआ है लेकिन उसकी क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में एक पत्रकार के रूप में मीडिया की क्रेडिबिलिटी को आप किस रूप में देखते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल: पहली बात तो यह है कि प्रकृति को बदलाव चाहिए। चीजें अपनी जगह रुकी नहीं रहेंगी। समय और परि‍स्थिति बदलती रहती हैं। लोगों की पसंद-नापसंद बदलती है, उनका नजरिया बदलता है। हमें यह स्‍वीकार करना पड़ेगा। बदलाव हमेशा पॉजीटिव हो, ये भी जरूरी नहीं है। टेक्‍नोलॉजी के कारण पत्रकारिता में तमाम तरह के तत्‍व घुस आए हैं, जिनके संस्‍कार नहीं थे पत्रकारिता के, जिनकी पृष्‍ठभूमि पत्रकारिता की नहीं थी और जिनकी पढ़ाई-लिखाई पत्रकारिता की नहीं हुई, वे भी इसमें आ गए। जिन्‍हें सिर्फ कैमरा पकड़ना आता है, वे भी मैदान में कूद गए। ऐसे लोगों के अंदर पत्रकारिता की बुनियादी बातें भी नहीं हैं। पुराने जमाने में होता था कि पत्रकारिता के लिए कम से कम लिखना तो आना चाहिए लेकिन आज के समय में ये जरूरी नहीं है कि आपको लिखना आता है या नहीं। आजकल कई सारे फ्री प्‍लेटफॉर्म उपलब्‍ध हैं। बस कैमरा घुमाइए और कोई भी चीज हाईलाइट कर लीजिए। यदि आपका आइडिया हिट हो गया तो आपको पहचान मिलेगी और यदि फेल हो गया तो आप उसे दूसरे तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं। यदि आजकल की और पुराने समय की पत्रकारिता में बुनियादी अंतर की बात करें तो खास बात ये है कि आजकल के लोग रीडिंग नहीं कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई नहीं कर रहे हैं। हमें याद है कि हम काफी पढ़ते थे। काफी साहित्‍य और राजनीति विज्ञान पढ़ते थे। तमाम तरह की किताबें पढ़ते थे और फिर पत्रकारिता की भाषा में कहें कि अखबार को चाटते यानी गहराई से पढ़ते ही थे।

क्‍या आपको लगता है कि आज में समय में कोई ऐसा अखबार बचा है कि जिसे इतनी गहराई से पढ़ा जा सके ?

ब्रज खंडेलवाल : आजकल सभी तरह के अखबार हैं। ऐसा भी नहीं हैं कि सारे अखबार खराब ही हैं। बहुत अच्‍छे अखबार भी हैं। आजकल के दैनिक अखबारों की बात करें तो ज्‍यादातर अच्‍छे ही हैं। प्रजेंटेशन भले ही अलग और आधुनिक हो लेकिन कंटेंट तो ठीक है। संपादकीय पेज भी सभी के बढ़िया ही हैं। भाषा भी अच्‍छी है। दैनिक 'हिन्‍दुस्‍तान' भी काफी अच्‍छे एडिटोरियल दे रहा है। पिछले दिनों नदियों पर उनके संपादक शशि शेखर ने बहुत अच्छा लिखा था। मुझे नहीं लगता कि अखबारों की इतनी गिरावट हुई है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में फर्क दिखाई दे सकता है क्‍योंकि वो शायद बाजार से जुड़ा हुआ है। वो टेक्‍नोलॉजी अलग तरह की है। ये भी कह सकते हैं कि वो मेनस्‍ट्रीम मीडिया का हिस्‍सा माना जाए या न भी माना जाए क्‍योंकि वे सामान्‍यत: एजेंडा आधारित सिद्धांत पर चलते हैं। सुबह ही एक मुद्दा पकड़ लिया और दिन भर उसे खींचते रहो। अब वो समय आ गया है जब प्रिंट का कैरेक्‍टर अलग है, इलेक्‍ट्रॉनिक का अलग है। दोनों में कोई समानता ही नहीं दिखाई दे रही है।  

आप वर्तमान के अखबारों की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ा इश्‍यू भी है कि पहले अखबारों के मुखपृष्‍ठ को काफी महत्‍वपूर्ण माना जाता था। पहली हेडलाइन भी बहुत खास मानी जाती थी। कहा जाता था कि उसे देखकर अखबार भी बिकता था। लेकिन अब जैकेट का कल्‍चर आ गया है। इसमें न तो पहला पेज और न ही हेडलाइन का पता चलता है। कई बार तीन पेज के  जैकेट विज्ञापन होते हैं और उसके बाद चौथा पेज पहला पेज होता है। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : ये एक इश्‍यू तो है लेकिन इस ट्रेंड को सही साबित करने के लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका तर्क है कि पहले के पत्रकारों को आखिर मिलता ही क्‍या था। आजकल के पत्रकारों को अच्‍छे अखबारों में अच्‍छी सैलरी समेत कई सुविधाएं मिलती हैं। यानी पहले की तुलना में पत्रकारों के लिए चीजें काफी बेहतर हुई हैं। पहले तनख्‍वाह वगैरह तो कुछ मिलती नहीं थी। ज्‍यादातर लोग तो पैशन के लिए मुफ्त में काम करते थे। उनका हुलिया देखकर ही लग जाता था कि बिल्‍कुल फटेहाल हैं। आज का पत्रकार टेक्‍नोलॉजी में भी काफी आगे है। उसके कपड़े और रहन-सहन भी पहले से बेहतर है। ऐसे में अर्थशास्‍त्र के हिसाब से उसकी जरूरतें कुछ अलग हो गई हैं। इन्‍हीं सब को पूरा करने के लिए इस तरह करना पड़ता है। 

ऐसे में यह सवाल जरूर उठता है कि ये सब करते-करते पाठकों के साथ तो अन्‍याय नहीं हो जाता है, जब चौथा पन्‍ना पहला पेज बन जाता है ?

ब्रज खंडेलवाल : अब इसका कोई कानून तो है नहीं। ये एक परंपरा है। परंपराएं टूट भी सकती हैं, बदल भी सकती हैं और मॉडीफाई भी हो सकती हैं। अभी हमें अटपटा लग रहा है, कुछ दिनों में शायद आदत पड़ जाएगी। दूसरी वजह यह है कि अखबार वालों को भी पता है कि मुखपृष्‍ठ पर जो छप रहा है, वह पहले से ही बासी यानी पुराना हो चुका है और पाठक उस पर निर्भर नहीं है। 


कुल मिलाकर क्या अखबारों से निराश हैंखासकर उनके कंटेंट से। क्‍योंकि अमूमन एक धारणा भी लोगों के बीच बनी हुई है कि अखबार में जो  कुछ अब छप रहा है, वह टीवी सेट करता है या अखबार अब टीवी को फॉलो करते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : मैं निराश नहीं हूं, बस इस बदलाव को स्‍वीकार कर रहा हूं। ये तो ट्रेंड है जो बदलते रहते हैं और समय के साथ बदलना ही चाहिए। पुरानी मान्‍यताएं टूटती या बदलती हैं तो कुछ मिनट झटका लग सकता है लेकिन हमें इन्‍हें स्‍वीकार कर आगे बढ़ना होगा। आप कैसे इस बात को नजरअंदाज कर सकते हैं कि आज का पत्रकार कितने पैसे कमा रहा है। हिंदी अखबारों में काम कर रहे पत्रकारों की सैलरी देख लीजिए, पुराने वालों से तुलना कर लीजिए। मेरे ख्‍याल से इसका तो हमें स्‍वागत करना चाहिए। पहले एक स्‍टोरी का क्‍या मिलता था, महज पांच रुपए। पहले पांच-दस रुपए का मनीऑर्डर आता था, जिस पर हम हंसते थे। मेरा जो विदेशी मीडिया हाउस से पेमेंट आता था वह सामान्‍यत: 50 पाउंड का होता था, जो हजार-1500 रुपए होते थे एक आर्टिकल के, लोग चौंकते थे कि यार हमारी तो एक महीने की सैलरी के बराबर तेरे एक आर्टिकल से ही कमाई हो गई।

हमारे देश में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में अंतर रहा है। इकनॉमिक्स के मामले में अंग्रेजी हमेशा हिंदी से बेहतर मानी गई है। आप भी कह रहे हैं कि अंग्रेजी अच्‍छे पैसे भी देती थी। क्‍या आपको लग रहा है कि समय के साथ बदलाव आया है या आज भी अंग्रेजी पत्रकारिता ही देश की पॉलिसी तय करती है और अंग्रेजी में ही पत्रकारिता करने वाले इस देश के बड़े पत्रकार माने जाते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : हां, ये एक कड़वी सच्‍चाई है कि हम दोहरी मानसिकता से जूझ रहे हैं। हम हिंदी के गुणगान गाते हैं लेकिन इंडस्‍ट्री की भाषा और कॉमर्स की भाषा, जहां से पैसा आता है, वह अंग्रेजी ही है। आईटी के आने के बाद तो अंग्रेजी और तेजी से बढ़ी है। हालांकि अब ट्रांसलेशन वगैरह मौजूद हैं, लेकिन मानसिकता तो अंग्रेजी की ही बनी हुई है। एक इंडिया है और एक भारत है। इसमें पत्रकारिता ही क्या करे, यह तो पूरे समाज की समस्‍या है। आजकल कौन अपने बच्‍चों को हिंदी स्‍कूल में पढ़ाना चाहता है। हिंदी के पत्रकार हों अथवा संपादक, उनके बच्‍चे भी अंग्रेजी स्‍कूलों के ही पढ़े हुए हैं और पढ़ते भी हैं।

इंडस्‍ट्री इस देश में सबसे ज्‍यादा पैसा देती है, टैक्‍स देती है। बॉलिवुड इंडस्‍ट्री पूरी हिंदी में चलती है लेकिन जब स्क्रिप्‍ट पढ़ते हैं तो अंग्रेजी में पढ़ते हैं। टीवी इंडस्‍ट्री भी पूरी हिंदी बेस है लेकिन इंटरव्‍यू वगैरह सब अंग्रेजी में देते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ?

ब्रज खंडेलवाल : हमारे लिए तो न अंग्रेजी विदेशी भाषा है और न हिंदी। हमारे लिए दोनों भाषाएं बराबर हैं। हिंदी ही कौन सी ज्‍यादा पुरानी भाषा है। आज के समय में दोनों भाषाओं का ज्ञान होना बहुत जरूरी है और हर पढ़े-लिखे व्‍यक्ति को द्विभाषी होना ही चाहिए। जितनी ज्‍यादा भाषाएं सीखेंगे, उतना अच्‍छा है। कभी लगता है कि हमें तमिल आदि भाषाएं भी सीख लेनी चाहिए थीं। हालांकि इसकी जरूरत नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि यदि सीख जाते तो अच्‍छा लगता।


आप वर्तमान में एक पत्रकार भी हैं, आंदोलनकारी भी हैं, समाजशास्त्री भी हैं और पर्यावरणविद् भी हैं। राजनीति में भी आपका दखल रहता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि जब एक पत्रकार ये सब बन जाता है तो वह निष्‍पक्ष नहीं रह पाता है ?  

ब्रज खंडेलवाल : निष्‍पक्षता की बात तो यह है कि जिसके लिए हम काम करते हैं वह अपनी शर्तें रखता है। जो हमें सैलरी देता है वह हमारी स्‍वतंत्रता की सीमाएं तय करता है। हमें कितनी आजादी मिलेगी, हमारी कलम को कितनी आजादी मिलेगी, यह वो तय करेगा जो पैसा देता है। हमारा इसमें व्‍यक्तिगत कुछ नहीं होता है क्‍योंकि न तो हम कॉलम लिखते हैं और न ही एडिटोरियल लिखते हैं। हम तो सिर्फ रिपोर्टर हैं। जीरो ग्राउंड से रिपोर्ट करते हैं और जो आंखों देखा हाल है, वह लिखते हैं। लेकिन यह आपके ऊपर है कि आप किस चीज को हाईलाइट करते हैं। ये भी हो सकता है कि आप रीडर्स के हिसाब से काम करें, क्‍योंकि हिंदी के रीडर्स अलग हैं और अंग्रेजी के अलग, तो उस हिसाब से भी स्‍टोरी हो जाती है।          

जब कोई पत्रकार पत्रकारिता के साथ अन्‍य तमाम चीजें करता है तो कहीं न कहीं उसकी विचारधारा उस तरह की हो जाती है। फिर चाहे वह राजनीति में ही क्यों न हो, कहीं न कहीं उसका प्रभाव पत्रकार की खबरों पर दिखता है। क्‍या एक पत्रकार को ये सब करना चाहिए या सिर्फ पत्रकारिता करनी चाहिए ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो पत्रकार की पसंद की बात है और परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। जिस तरह से एक पत्रकार को निचोड़कर रख दिया जाता है, उसके बाद न तो उसमें शक्ति बचती है और न इतना दिमाग बचता है कि वह कुछ और कर पाए। वो अपने घर का ही ख्‍याल रख ले, यही बहुत है। पहली बात तो यह है कि हम इस मामले में इसलिए भाग्‍यशाली हैं कि हमारे पास समय ज्‍यादा है। दूसरी बात ये है कि हम शुरू से ही अन्‍य गतिविधियों में भी शामिल रहे हैं। जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि मेरे एजेंडे में पत्रकारिता एक हथियार है अपने विचारों को फैलाने का। मेरे आदर्श, मेरे सपने आदि जो भी हैं, उनको प्रचारित करने के लिए यह मेरा एक हथियार है। तो मैं इस तरह की बातों का बचाव नहीं करता और पत्रकारिता में अपनी बात कहने का मुझे जो भी अवसर मिलेगा, फिर चाहे वह यमुना का मामला हो, पर्यावरण का हो अथवा अत्‍याचार का हो, मैं पत्रकारिता का पूरा इस्‍तेमाल करता हूं। यानी जब भी इंसानियत के खिलाफ कुछ गलत होगा, मैं उसे नमक-मिर्च लगाकर पूरा बवाल खड़ा करूंगा। यानी यूं कह सकते हैं कि पूरा मसाला बनाकर पेश करूंगा। मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है, क्‍योंकि मैं एक पेशेवर पत्रकार नहीं हूं, इसलिए मुझे इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह मेरा पैशन है और इसके लिए कई विकल्‍पों का त्‍याग भी किया है कि मुझे गलत काम नहीं करना है या इस पर स्‍टोरी नहीं करनी है। मुझे कोई आदेशित नहीं कर पाया कि इसे हाईलाइट करना है, जबकि बाकियों के साथ ऐसा नहीं है। इस बात से मुझे नुकसान भी हुआ और मैंने झेल लिया। ऐसी परिस्थितियों में मैं चुपचाप रहा और बीच का रास्‍ता निकाल लिया लेकिन अपने मन के विपरीत जाकर नहीं किया। ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार होता है।

 देश के कई बड़े संपादकों और पत्रकारों का कहना है कि सोशल मीडिया ही ऐसा मीडिया है जिसका प्रिंट और टेलिविजन मीडिया पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। कहा जाता है कि यह उसी तरह से है जिस तरह से बंदर के हाथ में उस्‍तरा है, जिसकी कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। ऐसे में यह स्‍थापित मीडिया संस्‍थानों के लिए कोई चुनौती भी नहीं हैं। लेकिन आप एक ऐसे पत्रकार हैं जो लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं। कहा जाता है कि सोशल मीडिया पर हर आदमी संपादक और पत्रकार है। ऐसे में सोशल मीडिया और इसकी क्रेडिबिलिटी के बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : मैंने अपने विचारों के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्‍तेमाल किया है। आजकल तो प्रत्‍येक मीडिया की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया के आने से बहुत सी चीजें बदली हैं। पहले नियंत्रण मालिकों के हाथ में रहता था। वनवे ट्रैफिक रहता था। एक एडिटर ने जो परोस दिया वह आपको स्‍वीकार करना है। रीडर को न कोई सुविधा थी और न अधिकार कि वह उस पर प्रतिक्रिया दे लेकिन अब सब एक ही मैदान में है। सामने से कुछ आता है तो हम भी अपनी तरह से शुरू हो जाते हैं, यानी चीजें बराबर कर देते हैं। किसी ने गलत खबर लिख दी है तो उसे बैलेंस करने का यह अच्‍छा तरीका है। सोशल मीडिया पर स्‍टोरी भी ब्रेक हो रही हैं। अब सारा नियंत्रण पाठकों के हाथों में है। ऐसे में जो एकाधिकार बना हुआ था और मठाधीशी थी, वह खत्‍म हो रही है, जो मेरी नजर में अच्‍छी बात है यह जरूरी भी था।

वामपंथी होने के बावजूद आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी करते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसा नहीं हैं। मै मोदी की तारीफ नहीं बल्कि नीतियों की तारीफ करता हूं और देशहित में नीतियों की तारीफ करनी भी चाहिए। कभी-कभी इन नीतियों का लाभ किसी व्‍यक्ति को भी मिल जाता है, इसलिए मोदी को इनका लाभ मिलता है। जहां पर जरूरी है तो मैं मोदी की खिंचाई भी करता हूं।

सुना है एक बार आप चुनाव भी लड़े हैं?

ब्रज खंडेलवाल : यह सही बात है। वर्ष 1993 में मैंने विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। हालंकि मैं उसमें हार गया था, मुझे सिर्फ तीन-चार सौ वोट मिले थे। 

क्‍या आपको लग रहा था कि यदि आप चुनाव जीत जाते हैं तो राजनेता हो जाएंगे?

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। दरअसल मुझे एक प्रोजेक्‍ट करना था भारतीय निर्वाचन प्रणाली के बारे में। मैंने सोचा कि जगह-जगह जाकर पूछूं कि क्‍या होता है और कैसे होता है, इससे अच्‍छा तो यह है कि खुद ही चुनाव लड़ लो। पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कि कागजात कैसे तैयार होते हैं और जमा होते हैं। कैसे शपथ ली जाती है आदि के बारे में जानने के लिए ही मैंने चुनाव लड़ा और काफी अच्‍छी समझ हो गई।

आपने काफी सहजता से स्‍वीकार किया है कि आप वामपंथी हैं लेकिन आप देख रहे हैं कि देश में वामपंथ खत्‍म होता जा रहा है। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि ऐसा क्‍यों होता जा रहा है?

ब्रज खंडेलवाल : लेफ्ट यानी वामपंथ काफी व्‍यापक है। लोगों के दिमाग में सिर्फ कम्‍युनिस्‍टों के बारे में सोच है। पार्टी अथवा संगठन भले ही खत्‍म हो जाएं लेकिन विचारधारा के स्‍तर पर वैचारिक स्‍वतंत्रता और समानता की जो मूल भावना है, वह बुनियादी है। यानी कोई बड़ा-छोटा नहीं है, कोई अमीर-गरीब नहीं है और सब बराबर हैं। ये सब मुद्दे खत्‍म होने वाले नहीं हैं।  

आप जिन मुद्दों की बात कर रहे हैं, वे तो दक्षिणपंथी भी उठाते हैं?

ब्रज खंडेलवाल : मेरी नजर में दक्षिणपंथी (राइट) का मतलब पूंजीवादी प्रक्रिया है। वे बोलते क्‍या हैं, ये सब छोड़ो। वे लोग यथास्थितिवादी के पुजारी हैं। वे बदलाव के विरोधी हैं और किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते हैं। वे तो जातिवाद के भी हिमायती हैं, भले ही वे कुछ भी बोल लें। उनमें सामंतवाद विचारधारा भी है, भेदभाव भी है और छुआछूत भी है। लेकिन हम इन सबके खिलाफ हैं। शायद यही कारण रहा कि मैंने अपनी जाति बिरादरी में शादी भी नहीं की। वामपंथ से प्रभावित होने के कारण हमने समाज में फैली कई रुढि़वादियों का विरोध किया। 

प्रिंट मीडिया की बात करें तो कई वर्षों से सिर्फ आठ या दस बड़े अखबार ही हैं और वे ही चलते हैं। अब हर एक-दो साल में अखबार शुरू होते हैं और थोड़े समय बाद ही बंद हो जाते हैं। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि देश में यही गिने चुने आठ-दस अखबार ही हैं और बाकियों के लिए कोई स्‍कोप नहीं?   

ब्रज खंडेलवाल : सिर्फ अपने देश की बात ही नहीं है, यह तो पश्चिमी देशों में भी हुआ है। तमाम पत्रिकाएं बंद हो गईं और अखबारों का सर्कुलेशन कम हो गया। अखबारों का सर्कुलेशन कम हो जाए या बंद हो जाए, यह कोई चिंता की बात नहीं है।

कहने का मतलब यह है कि हमारे यहां प्रतिष्ठित अखबार बंद नहीं होते बल्कि जो नया वेंचर आता है, वह थोड़े समय में बंद हो जाता है। पिछले दस साल की बात करें तो शहर में आठ-दस नए वेंचर शुरू हुए लेकिन सब बंद हो गए। इसके बारे में आपका क्‍या सोचते हैं ?

ब्रज खंडेलवाल : यह तो एक प्रक्रिया है कि अखबार खुलते हैं और बंद होते हैं। पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत ही क्‍या है।  

ऐसे में सवाल उठता है कि जब पांच-छह अखबारों से ज्‍यादा की जरूरत नहीं है तो आजकल प्रदेश में 400 से ज्‍यादा जर्नलिज्‍म इंस्‍टीट्यूट खुल गए हैं, जिनसे पढ़कर हजारों छात्र-छात्राएं बाहर निकलते हैं तो फिर वे कहां जाएंगे और उन्‍हें कहां नौकरी मिलेगी?

ब्रज खंडेलवाल : बाकी मीडिया को आप क्‍यों भूल जाते हैं, जो काफी आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम चैनल भी तो हैं।  

लेकिन इतने चैनल भी कहां हैं। दस साल पहले मुख्‍य तौर पर जो चैनल थे, वही आठ-दस चैनल आज भी सही चल रहे हैं जबकि बाकी खुलते हैं और कुछ समय बाद ही बंद हो जाते हैं। बाकी जो चल भी रहे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां पता ही नहीं रहता है कि सैलरी मिलेगी भी अथवा नहीं। जबकि आईटी और मैनेजमेंट के साथ ऐसा नहीं हैं। इनकी हजारों कंपनियां हैं, जिनमें पता है कि नए छात्र-छात्राएं पढ़ाई पूरी कर खप जाएंगे। आप तो मीडिया को काफी समय से देख रहे हैं। इस दौरान मीडिया उस तेजी से आगे नहीं बढ़ा है, जितना बढ़ना चाहिए था? 

ब्रज खंडेलवाल : ऐसी बात नहीं है। इतने वर्षों में मीडिया काफी बढ़ा है। कई नए प्‍लेटफॉर्म्‍स आ गए हैं। सूचना का प्रवाह भी काफी बढ़ा है। आजकल स्‍मार्टफोन के रूप में मीडिया में एक बड़ा हथियार आ गया है। न्‍यूज का इस्‍तेमाल ओर उसका प्रवाह काफी तेजी से बढ़ा है। रही बात छात्रों की संख्‍या और रोजगार के अवसरों की तो इसमें पढ़ाई-लिखाई करना काफी आसान है। आप साधारण तरीके से एक डिप्‍लोमा या डिग्री पूरी कर लेते हैं और अखबार में लग जाते हैं जबकि अन्‍य कोर्सों जैसे वकालत की ही बात करें तो वहां कितनी ज्‍यादा पढ़ाई करनी होती है। डॉक्‍टर की ही बात करें तो पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप में भी कितनी कड़ी मेहनत लगती है लेकिन अखबारों में तो इस तरह का कुछ होता नहीं है। करेसपॉडेंस कोर्स करके भी आप इसमें आ सकते हैं। इसमें सबसे ज्‍यादा मुश्किल पढ़ाई लिखाई यानी सेल्‍फ स्‍टडी बहुत मायने रखती है, जो आजकल अधिकार छात्र-छात्राएं करते नहीं हैं। जो इस प्रफेशन के प्रति बहुत ज्‍यादा गंभीर होते हैं, वे वास्‍तव में पढ़ाई-लिखाई बहुत करते हैं। उनका सामान्‍य ज्ञान भी बहुत बेहतर होता है। इन लोगों की भाषा भी काफी अच्‍छी होती है। हालांकि ऐसे लोग चुनिंदा होते हैं और देर-सवेर वे कहीं न कहीं नौकरी पा ही जाते हैं। बाकी जो भीड़ बचती है, वह कैमरा लेकर घूम रही है। आजकल तो काफी यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। पहले जिस तरह ग‍ली-मोहल्‍लों में कुकरमुत्‍तों की तरह अखबार खुले होते थे, आज उनकी जगह यूट्यूब चैनल खुल गए हैं। ऐसे कई लोग खुद को पत्रकार कहते तो हैं, लेकिन इनमें पत्रकारिता के कितने गुण हैं, यह देखने की बात है।  

आजकल डिजिटल मीडिया का दौर है और इस नई सरकार में डिजिटल मीडिया पर काफी कुछ हुआ है लेकिन हम डिजिटल मीडिया के रेगुलेशन की बात करें तो कई नई वेबसाइट खुलीं लेकिन तमाम बंद हो रहीं हैं क्‍योंकि इसमें रेवेन्‍यू का कोई मॉडल तय नहीं है। आज भी उस हिसाब से पैसा नहीं आ रहा है, जिस हिसाब से आना चाहिए। 'एनडीटीवी' को छोड़ दें तो कोई भी बड़ा ऑर्गनाइजेशन डिजिटल से उतना रेवेन्‍यू नहीं जुटा पाता है, जितना जुटना चाहिए। हालांकि एनडीटीवी का प्रॉफिट टीवी के मुकाबले डिजिटल से ज्‍यादा रहता है क्‍योंकि उसका टीवी नुकसान में रहता है। ऐसे में आपको क्‍या दिखता है यह बुलबुला टाइप है जो एक दिन फूट जाएगा। क्‍योंकि अभी इसमें सिर्फ इंवेस्‍टर है, जबकि इसमें आ क्‍या रहा है यह अभी तय नहीं है। आखिर इंडस्‍ट्री में रेवेन्‍यू मॉडल तो होना ही चाहिए। इस बारे में आपका क्‍या कहना है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यदि बुलबुले फूट जाएंगे तो फूट जाएं, इसमें आखिर मुश्किल क्‍या है। दरअसल, टेक्‍नोलॉजी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इस बारे में बहुत ज्‍यादा अनुमान लगाना मुश्किल है कि कल क्‍या होगा।  

कहने का मतलब है कि आपने प्रिंट, टीवी और रेडियो इंडस्‍ट्री देखी है। वहां एक रेवेन्‍यू मॉडल है। वहां पैसे का टर्नओवर होता है और पैसा आता भी है। आपका इस बारे में क्‍या कहना है कि क्‍या डिजिटल ऐसा हो पाएगा ? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे इसकी ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि इंफॉर्मेशन के लिए जबरदस्‍त भूख है और इसे तैयार करने की ग्रोथ हजारों गुना हुई है। जब इंफॉर्मेशन तैयार हो रही है तो उसके लिए नेटवर्क भी होगा और सप्‍लायर्स भी होंगे यानी सब चीजें होंगी। पत्रकारिता के लिए यह महत्वपूर्ण है कि लोगों में जानने की इच्‍छा है या नहीं है। वो इंफॉर्मेशन चाहते हैं अथवा नहीं। अब कौन आएगा, कौन जाएगा और कितना कमाएगा, यह सब बहुत कारणों पर निर्भर करता है।    

बतौर शिक्षक आप 'केएमआई' में पढ़ाते थे, अब केंद्रीय हिंदी संस्‍थान में पढ़ाते हैं। ऐसे में एक शिक्षक के तौर पर आप पत्रकारिता के उन नए छात्रों के बारे में क्‍या देखते हैं कि वे क्‍यों आ रहे हैं, किस पृष्‍ठभूमि से आ रहे हैं। हमें लगता है कि इसमें तमाम लोग वे भी आ जाते हैं जिन्‍हें पत्रकार नहीं भी बनना होता है, बस उन्हें डिग्री चाहिए होती है। दूसरा सवाल ये है कि जब वे पढ़ाई पूरी कर जाते हैं तो उनकी नियुक्ति किस प्रकार होती है। इसमें कितना प्रतिशत होता है और तीसरा ये कि जब आपके पुराने शिष्‍य आपको मिलते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं ? 

ब्रज खंडेलवाल : पहली बात तो यह है कि हम जो डिप्‍लोमा आदि करा रहे हैं, उसका सीमि‍त उद्देश्‍य नहीं है कि वह सिर्फ मीडिया में जाएं। वे अच्‍छे इंसान बनें, उनके कम्‍युनिकेशन स्किल्‍स अच्‍छे हों। आजकल बहुत सारे लोग आ रहे हैं, जो पहले से ही कहीं काम कर रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ अपने कम्‍युनिकेशन में धार देने के लिए जर्नलिज्‍म का डिप्‍लोमा कर रहे हैं। पब्लिक रिलेशन में उनके लिए काफी संभावनाएं हैं और वे लोग हो भी रहे हैं। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो कंप्‍टीशन की तैयारी में लगे हुए हैं। उन्‍होंने बताया है कि यह डिप्‍लोमा करने के बाद उनकी लेखन शैली बहुत अच्‍छी हुई है। इंटरव्‍यू का सामना करने में भी आसानी हुई है। तो इसे सिर्फ मीडिया में रोजगार से ही जोड़कर नहीं देख सकते हैं। ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद है कि जब मैंने अपनी एक छात्रा से पूछा कि तुम्‍हारी तो शादी हो जाएगी तुम इस डिप्‍लोमा का क्‍या करोगी तो उसका खुलकर कहना था कि हम तो इसे फ्रेम करके लगाएंगे, सास इससे ही बहुत डर जाएगी। एक और लड़की का कहना है कि हमारे ससुराल वाले तो बहुत डरे रहते हैं कि उनकी बहू पत्रकार बनकर आ रही है, पता नहीं क्‍या करेगी। यह पुराने जमाने में होता था जब मैं केएमआई में था कि हर किसी को मीडिया में ही जाना है लेकिन अब यह फोकस बिल्‍कुल बदल गया है। केंद्रीय हिंदी संस्‍थान का तो बिल्‍कुल ही बदला हुआ है। वहां कई सारे शिक्षक हैं, शिक्षामित्र हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले भी हैं। हर तरह के छात्र-छात्राएं हैं। कई तो शुरू में ही बता देते हैं कि हमें मीडिया में नहीं जाना है। सिर्फ दो-चार ही होते हैं जो कैमरा लेकर इधर-उधर घूमने के लिए तैयार हैं। नौकरी न लगे तो कुछ दिन करने के बाद वे भी खिसक जाते हैं। कहने का मतलब है कि यह अब सामान्‍य तौर पर वैल्‍यू एडिशन वाला कोर्स बन चुका है। किसी और कोर्स जैसे एमबीए आदि के साथ यह कोर्स कर लिया तो आपको आगे तरक्‍की में काफी संभावनाएं हो जाती हैं।    

आजकल एक नया कॉन्‍सेप्‍ट ईवेंट जर्नलिज्‍म का चल रहा है। इसमें तमाम पत्रकार पब्लिक रिलेशन कर रहे हैं। ईवेंट कर रहे हैं। उस पर तीखे कमेंट भी होते हैं। आपको क्‍या लगता है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म ठीक नहीं है या पत्रकार अगर नौकरी छोड़कर पीआर बन रहा है तो आपको क्‍या आपत्ति है। क्‍या आपका मानना है कि ईवेंट जर्नलिज्‍म की वजह से जर्नलिज्‍म को खास नुकसान नहीं हो रहा है ? 

ब्रज खंडेलवाल : यह तो उसकी स्‍वतंत्रता है कि वह जो मन में आए, करे। ईवेंट्स अब मीडिया का हिस्‍सा बन चुके हैं। ऐसे में यदि वह नहीं करेगा तो कोई और करेगा। यह पीआर, प्रमोशन और बिजनेस स्‍ट्रेटजी का हिस्‍सा है। इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती है। अगर यह सार्वजनिक रूप से हो रहा है तो कोई दिक्‍कत नहीं है। यह पारदर्शी होना चाहिए, इसमें कुछ छिपा नहीं होना चाहिए। सभी लोग कोई भी काम करने के लिए स्‍वतंत्र हैं।  

इसमें एक समस्‍या यह होती है कि तमाम ईवेंट्स में जो मंचासीन लोग होते हैं, इनमें से कर्इ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं पर भी मंच पर बैठने लायक नहीं होते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह मीडिया का प्रॉब्‍लम नहीं है, यह तो समाज का प्रॉब्लम है। समाज में घटिया लोग भी होते हैं।  

हमारा मानना है कि मीडिया बहुत स्‍ट्रॉंग है, वह इन सब चीजों को चेक करेगा। मीडिया छापता भी है और मीडिया के लोग पीआर बनकर वह ईवेंट भी करते हैं। इस बारे में कुछ बताएं? 

ब्रज खंडेलवाल : चूंकि इस तरह के लोग फाइनेंस करते हैं तो एक तरह से वह उस मीडिया में स्‍पेस खरीद लेते हैं। आखिर पीआर क्‍या होता है, अनपेड पब्लिसिटी। आमतौर पर होता यही है कि यदि सीधे विज्ञापन के पैसे नहीं दे रहे हो तो घुमाकर दे दो इस तरह प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करके।

पिछले दो दशक से आप पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। क्‍या आपके छात्र किसी जगह पर पहुंचे हैं या आगरा से बाहर सेट हो गए हैं। आज जब आपको अपने पुराने छात्र मिलते हैं तो आपको कैसा लगता है कि आपने शिक्षक के तौर पर जो यह शुरुआत की है, उसमें भी आपने कामयाबी पाई है? 

ब्रज खंडेलवाल : मुझे ऐसे बहुत सारे लोग मिलते रहते हैं। इनमें जो पत्रकार बन गए, वे अच्‍छा कर रहे हैं। जो पत्रकार नहीं बन पाए, वे जिस फील्‍ड में भी हैं अच्‍छा कर रहे हैं। इनमें से कई डॉक्‍टर्स भी हैं, जिन्‍होंने पत्रकारिता भी की है और अब अच्‍छे डॉक्‍टर के रूप में काम कर रहे हैं। इनमें एक पुलकित है, दूसरा राजकुमार है। ये दोनों नाम तो मुझे याद हैं। एक लेखपाल बन गया है जौनपुर में कहीं पर। कहने का मतलब है कि हम सिर्फ मीडिया टेक्‍निक ही नहीं सिखाते हैं, बल्कि छात्र के सर्वांगीण विकास पर ध्‍यान देते हैं। 

सुना है कि आपके एक पुराने स्‍टूडेंट पत्रकारिता के बाद रेलवे में चले गए लेकिन सरकारी नौकरी छोड़कर फिर वे पत्रकारिता में आ गए। जबकि आजकल ज्‍यादातर पत्रकार पीआरओ बनना चाहते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है? 

ब्रज खंडेलवाल : यह बात सही है। दरअसल, उसे लगा कि रेलवे की नौकरी में उसे वह संतुष्टि नहीं मिलेगी। हालांकि मैंने उसे समझाया भी था कि यहां तनाव और अनिश्चितता रहेगी लेकिन उसका कहना था कि मैं ये सब झेल लूंगा। इसके बाद फिर मैंने कहा कि यदि तुम यही चाहते हो तो ठीक है, आ जाओ। 

 

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BIG FM के अधिग्रहण से 'जागरण प्रकाशन' को क्या होगा फायदा, जानें यहां

‘बिग एफएम’ का संचालन करने वाले ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ को ‘जागरण प्रकाशन’ के रूप में खरीदार मिल गया है

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Apurva-Purohit

देश के बड़े एफएम रेडियो चैनलों में शुमार ‘बिग एफएम’ (Big FM) का संचालन करने वाले ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ (RBNL) को ‘जागरण प्रकाशन’ के रूप में खरीदार मिल गया है। इस डील के तहत ‘रिलायंस समूह’, ‘बिग एफएम’ रेडियो में अपनी पूरी हिस्सेदारी 1,200 करोड़ रुपये में ‘जागरण प्रकाशन’ की कंपनी ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (MBL) को बेचेगा। ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ के तहत ‘रेडियो सिटी’ का संचालन किया जाता है। इस बारे में ‘जागरण प्रकाशन लिमिटेड’ (JPL) की प्रेजिडेंट अपूर्वा पुरोहित ने इन दोनों नेटवर्क के मिलने के बाद रेडियो स्टेशनों के टार्गेट ग्रुप, मार्केटिंग प्लान और एडवर्टाइजिंग समेत तमाम मुद्दों पर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

इस अधिग्रहण के बाद मार्केट शेयर कितना हो जाएगा?, क्या यह लीडरशिप पोजीशन पर आ जाएगा?

‘रेडियो सिटी’ ब्रैंड के तहत ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (Music Broadcast Ltd) वर्तमान में 39 स्टेशनों का संचालन करती है। ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ (RBNL) के एफएम रेडियो चैनल ‘बिग एफएम’ (Big FM) के खरीदने के बाद 69 शहरों में 79 स्टेशनों के साथ हमारी पहुंच काफी बढ़ जाएगी। इसके बाद यह देश का सबसे बड़ा प्राइवेट एफएम प्लेयर बन जाएगा और इसकी पहुंच भी बहुत ज्यादा हो जाएगी। इसके अलावा इस संयुक्त नेटवर्क के प्रति विज्ञापनदाता भी और ज्यादा आकर्षित होंगे। मुझे लगता है कि इससे हमें लीडरशिप पोजीशन के साथ सबसे ज्यादा मार्केट शेयर बनाने में मदद मिलेगी।‘बिग एफएम’ का टार्गेट ग्रुप 45 साल से ऊपर के लोगों का है और ‘रेडियो सिटी’ का फोकस 25 से 44 साल के लोगों पर है। ये दोनों ग्रुप एडवर्टाइजर्स को अपना कंज्यूमर बेस बढ़ाने में मदद करेंगे।

आपकी नजर में इस अधिग्रहण के क्या मायने हैं?

इस सौदे के तहत अब तक ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (MBL) की ओर से ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क’ में 24 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली गई है। इस बारे में सभी जगह से अप्रूवल मिलने के बाद ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ की ओर से सभी शेयर खरीद लिए जाएंगे। वित्तीय वर्ष 2021 (FY2021) की पहली तिमाही में लॉक-इन पीरियड समाप्त होने के बाद इसकी उम्मीद है। इसके बाद 79 स्टेशनों के साथ यह देश का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क बन जाएगा और ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ फिर ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ की सहायक कंपनी बन जाएगी।

इस अधिग्रहण के साथ हमारी पहुंच और ज्यादा होने से एडवर्टाइजर्स को लोकल मार्केट में अपना विस्तार करने में मदद मिलेगी। ‘बिग एफएम’ के जिन 40 स्टेशनों का हम अधिग्रहण करने जा रहे हैं, उनमें से 30 ऐसे शहरों में हैं, जहां पर रेडियो सिटी की मौजूदगी नहीं है।

इसके लिए आप किस तरह का मार्केटिंग प्लान बना रहे हैं?

‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ ने एफएम रेडियो की प्रोग्रामिंग को विस्तार देने की दिशा में काफी काम किया है और इसका कंटेंट भी काफी अलग है। बब्बर शेर और लव गुरु जैसे रेडियो प्रोग्राम भी इसने शुरू किए हैं। इसने रेडियो सिटी फ्रीडम अवॉर्ड्स भी शुरू किए हैं और रेडियो सिटी सुपर सिंगर के द्वारा नवोदित गायकों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म उपलव्ध कराया है। यह देश में अपनी तरह का पहला रेडियो टैलेंट शो है। ‘रग-रग में दौड़े सिटी’ के तहत नेटवर्क ने स्थानीय श्रोताओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कवायद की है।

वहीं, बिग एफएम देश के सबसे ज्यादा सम्मानित रेडियो नेटवर्क्स में से एक है और यह नीलेश मिश्रा के साथ ‘यादों का इडियट बॉक्स’ और अनु कपूर के साथ ‘सुहाना सफर’ जैसे कई नए फॉर्मेट शुरू कर अपनी खास पहचान बना चुका है। अब दोनों नेटवर्क के मिलने से इसमें 79 स्टेशन हो जाएंगे, जिससे हमारे ऑडियंस की रेंज में काफी विविधता हो जाएगी और इससे श्रोताओं की संख्या में भी काफी इजाफा हो जाएगा।

इस सौदेबाजी के बाद आपकी पहुंच वाले शहरों की लिस्ट में और कौन से शहर शामिल हो जाएंगे?

इस अधिग्रहण के बाद 30 नए शहरों में हमारी मौजूदगी हो जाएगी। जिन नए शहरों में हमारी पहुंच होगी, उनमें इलाहाबाद, भोपाल, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, गुवाहाटी, इंदौर, जम्मू, कोलकाता, पणजी, शिमला, अलीगढ़, आइजोल, औरंगाबाद, अगरतला, अमृतसर, आसनसोल, ग्वालियर, ईटानगर, झांसी, जोधपुर, मंगलौर, मुजफ्फरपुर, मैसूर, पुडुचेरी, राजकोट, राउरकेला, शिलॉंग, श्रीनगर, तिरुपति और त्रिवेंद्रम शामिल हैं। इनके द्वारा हमारी पहुंच ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हो जाएगी और हम देश का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क हो जाएंगे।

इस सौदेबाजी के बाद आपको श्रोताओं के रूप में किस तरह की ग्रोथ की उम्मीद है?

बिग एफएम ने 45 साल से ऊपर के श्रोताओं को अपना टार्गेट ऑडियंस बना रखा है, जबकि रेडियो सिटी का टार्गेट ऑडियंस 25 से 44 साल की उम्र वाले लोग हैं। दोनों ही टार्गेट ग्रुप अलग हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।

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इस वजह से अपने शो पर दे पाती हूं पॉलिटिकल ‘ज्ञान’, बोलीं वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार

टाइम्स नाउ चैनल की शुरुआत से ही इसके साथ जुड़ीं नविका कुमार वर्तमान में मैनेजिंग एडिटर की निभा रही हैं जिम्मेदारी

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Navika Kumar

वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार टाइम्स नेटवर्क के अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘टाइम्‍स नाउ’ (Times Now) की शुरुआत के समय से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं। इन दिनों चैनल में मैनेजिंग एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहीं नविका कुमार उन पत्रकारों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में अपनी अलग पहचान बनाने के साथ-साथ बिजनेस रिपोर्टिंग में भी अलग धाक बनाई हुई है।

उन्हें कई बड़ी स्टोरी ब्रेक करने और इंवेस्टिगेट करने का श्रेय दिया जाता है, जिनमें सोनिया गांधी का इस्तीफा, कॉमनवेल्थ घोटाले में फंसे सुरेश कलमाड़ी का इस्तीफा, अगस्ता हेलीकॉप्टर घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस डील जैसी कई खबरें शामिल हैं।

चैनल और उनकी भूमिका से जुड़े सवालों को लेकर हमारी सहयोगी मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) की संवाददाता नीता नायर ने नविका कुमार से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

वर्ष 2005 में ‘टाइम्स नाउ’ की शुरुआत के साथ ही आप इस चैनल से जुड़ी हुई हैं। आपकी नजर में इस दौरान चैनल के लिए टर्निंग पॉइंट कौन सा रहा?

मुझे अभी भी वह समय याद है, जब हमें पहली बार खुद को इंट्रोड्यूज करना था और लोगों को बताना था कि टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप टेलिविजन की दुनिया में प्रवेश करने जा रहा है। समय के साथ ‘टाइम्स नाउ’ एक इंस्टीट्यूशन बन चुका है। सबसे पहली बड़ी स्टोरी हमने ‘Matter of Propriety’ की थी। इसको लेकर संसद का कामकाज ठप हो गया था और आधे संसद सदस्यों के हस्ताक्षर से युक्त यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया था। लोगों का कहना था कि अरे, जनवरी में तो यह चैनल लॉन्च हुआ था और फरवरी में इसने इतनी बड़ी स्टोरी कर दी।

इसके बाद हमने ‘Office of Profit’ यानी लाभ के पद पर स्टोरी की थी, जिसकी वजह से सोनिया गांधी और जया बच्चन को लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था। कहने का मतलब है कि लॉन्चिंग की पहली तिमाही के भीतर ही चैनल को एक नई पहचान मिल गई थी। उसके बाद से चैनल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। 26 नवंबर 2008 की कवरेज भी हमारे लिए एक टर्निंग पॉइंट थी। हमने हमेशा से काफी एक्सक्लूसिव और इंवेस्टिगेटिव स्टोरी की हैं।

आपने अरनब गोस्वामी के साथ काम करने के अलावा उनके बाद में रात नौ बजे वाले स्लॉट की कमान संभाली। ऐसे में एक सहकर्मी से लेकर एक प्रतियोगी के बारे में जिनका शो टीआरपी रेटिंग्स में टॉप पर रहा है, आप क्या कहेंगी और इसे किस तरह देखती हैं?

सच बताऊं तो मैंने कभी प्रोफाइल पर ध्यान नहीं दिया है। मेरी कुछ स्टोरीज ने टाइम्स नाउ की ब्रैंड वैल्यू तैयार करने में मदद की है। हां, अरनब गोस्वामी जब यहां थे तो उन्होंने वाकई में अपने काम को भरपूर एंज्वॉय किया, लेकिन पत्रकारिता में चेहरे बदलते रहते हैं। मैं कंटेंट पर फोकस करती हूं।

मुझे आज भी खबरों की एक तरह से भूख रहती है। इसलिए रात को नौ बजे अपने प्राइम टाइम शो में मैं पॉलिटिकल ‘ज्ञान’ इसलिए दे पाती हूं, क्योंकि मैं फील्ड रिपोर्टिंग करती हूं और मैंने जो अनुभव हासिल किया है, वह एयरकंडीशंड स्टूडियो में बैठकर नहीं आया है।

तमाम लोग ‘टाइम्स नाउ’, ‘रिपब्लिक’ और ‘Zee’ को मोदी का चीयरलीडिंग स्कवॉयड कहते हैं। आप इस तरह की धारणा से किस तरह निजात पा रही हैं?

इस तरह की सोच उन लोगों ने बना रखी है जो न्यूज नहीं देखते हैं। इसलिए वे न्यूज चैनल्स के बारे में इस तरह की खबरें बना रहे हैं। हम सिर्फ वही दिखाते हैं जो धरातल पर हो रहा है। देश में मोदी को लेकर एक अलग तरह का माहौल है। विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर उन्हें लेकर तमाम चर्चाएं होती हैं और यही चर्चाएं हमारे चैनल पर भी दिखाई देती हैं। ऐसे में कैसे हम चीयर लीडर हुए। हम तो सिर्फ जनता का मूड दिखाते हैं। जब जनता का मूड बदलता है तो हम उसे दिखाते हैं, क्योंकि हमारा चैनल रिपोर्टर केंद्रित है।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

 

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इसलिए नहीं संभाली NEWSHOUR की कमान, बोले Times Now के संपादक राहुल शिवशंकर

वरिष्ठ पत्रकार अरनब गोस्वामी के Times Now से अलग होने के बाद राहुल शिवशंकर को दी गई थी एडिटर-इन-चीफ की जिम्मेदारी

Last Modified:
Tuesday, 04 June, 2019
Rahul Shivshankar

करीब दो दशक पहले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में बतौर बीट रिपोर्टर अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राहुल शिवशंकर अब टाइम्स नेटवर्क के अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘टाइम्‍स नाउ’ (Times Now) के एडिटर-इन-चीफ के तौर पर चैनल को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में जुटे हुए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी ने करीब ढाई साल पहले जब ‘टाइम्‍स नाउ’ को अलविदा कहा था, तब चैनल ने राहुल शिवशंकर को इसका एडिटर-इन-चीफ बनाया था। शिवशंकर की इस नेटवर्क में यह दूसरी पारी है। इससे पहले वह ‘टाइम्‍स नाउ’ में सीनियर एंकर के तौर पर काम कर चुके हैं।

राहुल शिवशंकर की नई भूमिका और पिछले कार्यकाल के अनुभव के अलावा तमाम मुद्दों पर हमारी सहयोगी मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) की संवाददाता नीता नायर ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

‘टाइम्स नाउ’ के साथ आपकी यह दूसरी पारी है। पहले आप इसमें सीनियर एंकर थे और अब एडिटर-इन-चीफ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस दौरान आप चैनल में क्या बदलाव लाए हैं?

सबसे पहले तो मैं एक बात बता दूं कि ‘टाइम्स नाउ’ की पहचान अब सिर्फ एक शो की वजह से नहीं है। अब यह विविध प्राइम टाइम वाला चैनल है, जिसमें एंकर्स की अपनी अलग स्टाइल है। हमने सेलेब्रिटी एंकर के नुकसान की भरपाई अच्छे कंटेंट से कर दी है। इससे पहले, खासकर मेरे आने से पहले रिपोर्टर्स को लेकर इस तरह की तमाम चर्चाएं थीं कि उन्हें अपनी रिपोर्ट्स उस हिसाब से फिट करनी होती थी कि एडिटर शाम को किस तरह की बातें करने वाले हैं। लेकिन हमने इस स्थिति को बदल दिया है। ‘टाइम्स नाउ’ अब रिपोर्टर और स्टोरी वाला चैनल हो गया है। सबसे बड़ा बदलाव जो मैं लाया हूं, वो यह है कि यहां सभी को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।

क्या आपके कहने का मतलब है कि आपके आने से पहले ‘टाइम्स नाउ’ में एक तरह की तानाशाही चलती थी, जो आपके आने के बाद लोकतंत्र में बदल गई है?

मैं इस तरह के कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करता हूं। लेकिन आप देखेंगे कि टाइम्स नाउ में पहले सिर्फ एक ही व्यक्ति को पूरी तरह पता होता था कि क्या ऑनएयर होने वाला है। उस समय सिर्फ एक ही व्यक्ति का बोलबाला हुआ करता था, जो सभी चीजें तय करता था, लेकिन हमने इन चीजों को बदला है और अब सभी लोगों को यहां अपनी बात रखने का अधिकार है।

जब आपने एडिटर-इन-चीफ की कुर्सी संभाली तो आपने नौ बजे वाला प्रमुख स्लॉट क्यों नहीं लिया?

मैं एक एडिटर हूं न कि एंटरटेनर। मैं एक विचारशील व्यक्ति हूं। न्यूजऑवर (Newshour) की एंकरिंग में भले ही लोगों को बेवजह यह कहने के लिए मजबूर किया होगा कि फलां इस तरह था और फलां इस तरह का है, लेकिन मेरी अपनी पहचान है। मैं अपनी तुलना किसी और से नहीं करना चाहता हूं। इसलिए मैं रात आठ बजे बिल्कुल अलग अप्रोच के साथ आया। इसके अलावा, मैं इस तरह के शो को करने में काफी असहज महसूस करता था, जिसमें वाक चातुर्य ज्यादा था। इसलिए रात आठ बजे का जो शो मैंने चुना, वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था और उसमें बेवजह का शोरशराबा और ‘शब्दों का जाल’ नहीं था। इसलिए मैंने न्यूजऑवर की जगह रात आठ बजे वाला स्लॉट चुना।

‘टाइम्स नाउ’ में मैंने जिन पत्रकारों से बात की, उनमें से कुछ का कहना था कि आपके और नविका कुमार के बीच बहुत ज्यादा तालमेल नहीं है। ऐसे में दो अलग-अलग सोच के लोगों को रिपोर्ट करने में मुश्किल होती है?

आपने जो सुना है, वह कोरी गपबाजी है। लोग तो कहीं भी बात का बतंगड़ बनाना चाहते हैं। लेकिन हमारे बीच इस तरह की कोई बात नहीं है। नविका और मैं अपना-अपना काम अच्छी तरह से करते हैं। हम दोनों मिलकर काम करते हैं, इसलिए इस तरह की बातें सिर्फ कुछ लोगों की शरारत है।

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पढ़ें: दैनिक भास्कर के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

एडवर्टाइजिंग के नजरिये से बहुत बेहतर नहीं रहे हैं पिछले तीन साल

Last Modified:
Tuesday, 21 May, 2019
Girish Agarwal

पिछले दिनों जारी हुए ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही’ (IRS Q1 2019) के डाटा आजकल काफी चर्चा में बने हुए हैं। हों भी क्यों न, आखिर ये दो साल के लंबे इंतजार के बाद जो जारी हुए हैं। यदि हम ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही के इन डाटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि ‘एवरेज इश्यू रीडरशिप’ (AIR)  के आधार पर ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘आईआरएस 2017’ में जहां इस अखबार की रीडरशिप 1,38,72,000  थी, वह ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही में बढ़कर 1,53,95,000  है। लेकिन ‘डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (DB Corp Ltd) ने पिछले दिनों मार्च 2018 में समाप्त वित्तीय वर्ष के जो डाटा पेश किए हैं, उनमें ‘प्रॉफिट आफ्टर टैक्स’ (PAT) में 15.4 प्रतिशत की कमी के साथ यह 273.8  करोड़ रुपए हो गया है, जबकि इसके एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

इस बारे में हमारी सहयोगी कंपनी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ के प्रमोटर और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल से बात कर जानना चाहा कि कंपनी इस बैलेंस शीट और आईआरएस के डाटा के बारे में क्या सोचती है, तो उन्होंने बताया कि आईआरएस के डाटा से स्पष्ट है कि प्रिंट को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, यह काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘मुझे लगता है कि देश में प्रिंट के बुनियादी ढांचे में सुधार हो रहा है। यदि हम पिछले दिनों जारी हुई आईआरएस रिपोर्ट की बात करें तो प्रिंट के पाठकों की संख्या में 1.8 करोड़ की वृद्धि हुई है, यानी विभिन्न भाषाओं में इतने नए पाठक प्रिंट के साथ जुड़े हैं। इनमें हिंदी में जुड़ने वाले पाठकों की संख्या 95 लाख है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इनमें युवा वर्ग के पाठक भी काफी संख्या में शामिल हैं। यदि मैं सर्कुलेशन की बात करूं तो उसमें भी काफी ग्रोथ देखने को मिली है। ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ (ABC) के अनुसार पिछले दस वर्षों में सर्टिफाइड पब्लिकेशंस की संख्या में करीब पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान पत्रकारिता की क्वालिटी और कंटेंट भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। यदि ऐसा नहीं होगा तो लोग क्यों प्रिंट खरीदेंगे और पढ़ेंगे। इंडियर रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार 16 से 19 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में पांच प्रतिशत और 20 से 29 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’

गिरीश अग्रवाल ने बताया कि इन डाटा को लेकर सभी पब्लिशर्स काफी उत्साहित हैं और वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में भी निवेश कर रहे हैं। गिरीश अग्रवाल के अनुसार, ‘जैसा कि पश्चिमी देशों में हुआ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पेड मीडियम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय पब्लिशर्स भी उम्मीद जता रहे हैं कि जैसे वे प्रिंट के लिए पैसे लेते हैं तो आगे जाकर वे अपने डिजिटल पब्लिकेशन के लिए भी पैसे ले पाएंगे। लेकिन इस मीडियम में पैसा मिलने में अभी भी कुछ बाधाएं हैं। क्योंकि आप कंटेंट के लिए तभी भुगतान करते हैं, जब आपको उसमें कुछ खास दिखता है। मान लीजिए कि यदि आप किसी अखबार की वेबसाइट पढ़ रहे हैं और आपको उस वेबसाइट में किसी खास टॉपिक पर बहुत ही अच्छी जानकारी मिलती है, तभी तो आप उसके लिए पैसा देने को तैयार होंगे। पब्लिशर्स इसके लिए तैयार हैं और उनके पास कंटेंट भी है। आपका कंटेंट ऐसा होना चाहिए जो काफी बेहतरीन और एक्सक्लूसिव हो, ताकि कंज्यूमर को उसके लिए भुगतान करने में किसी तरह की दिक्कत न हो।’

गिरीश अग्रवाल ने यह भी बताया कि विज्ञापन के नजरिये से चीजें इतनी धीमी क्यों हैं और वह रफ्तार क्यों नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा, ‘यदि हम एडवर्टाइजिंग के नजरिये से देखें तो मुझे लगता है कि पिछले तीन साल काफी अच्छे नहीं रहे हैं। कई कैटेगरी में विज्ञापनों में कमी रही है, जैसे- सरकारी विज्ञापनों को ही ले, सरकार प्रिंट में बहुत ज्यादा विज्ञापन देती हैं, उनमें कमी आई है। हालांकि, पिछले साल डीएवीपी (DVP) रेट में इजाफा हुआ है और अधिकांश पब्लिशर्स ने इस कैटेगरी में काफी अच्छी ग्रोथ दिखाई है। अन्य कैटेगरी की बात करें तो चूंकि जीडीपी (GDP) नहीं बढ़ रही है, इसलिए ‘एफएमसीजी सेक्टर’(FMCG sector) के सिवाय विज्ञापन में भी कमी हो रही है।’

यह पूछे जाने पर कि प्रिंट के मुकाबले टीवी पर विज्ञापन ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, अग्रवाल ने कहा, ‘ऐसा इसलिए हो रहा है कि टीवी पर 50-60 प्रतिशत विज्ञापन एफएमसीजी ब्रैंड्स से आता है, इसलिए इस कैटेगरी के द्वारा ही टीवी पर विज्ञापन में ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन 6-7 प्रतिशत की ग्रोथ के बावजूद प्रिंट मजबूती से टिका हुआ है। इसके बावजूद इसमें सरकारी, ऑटो, बैंकिंग और फाइनेंस और रियल एस्टेट कैटेगरी बाजी मार रही हैं। आने वाले समय में इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।’ गिरीश अग्रवाल ने यह भी उल्लेख किया कि अखबार की कीमत में 20 से 50 पैसा बढ़ाने की गुंजाइश है।

ग्रुप जिन मार्केट्स में छाया है, उनके अलावा नए मार्केट में अपनी मौजूदगी नहीं बढ़ा रहा है। यह इन्हीं मार्केट्स में अपनी मौजूदगी को और बढ़ाने की योजना बनाता है और जरूरत पड़ने पर इसमें वह बड़ा निवेश करने में भी नहीं हिचकता है। इस बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘हमारे पास पहले से ही बहुत बड़ा आधार है। हम इन क्षेत्रों में और गहराई में जाना और विस्तार करना चाहते हैं। इसमें ज्यादा से ज्यादा प्रिंटिंग सेंटर खोलना भी शामिल है। राजस्थान में हमारे पास 16 प्रिंटिंग सेंटर हैं। हम चाहते हैं कि हमारा अखबार सुबह चार बजे डिलीवर हो जाए, क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर को अखबार उठाने और लोगों के घरों तक पहुंचाने में करीब दो घंटे लगते हैं। हमारा टार्गेट है कि लोगों के घरों पर सुबह छह बजे से पहले अखबार पहुंच जाना चाहिए। इसके लिए हमें रास्ते में लगने वाले समय को और कम करना होगा।’

यह पूछे जाने पर कि इसके लिए किस तरह के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी, अग्रवाल ने कहा, ‘यदि किसी निश्चित समय अवधि के दौरान 100 करोड़ रुपए इंवेस्ट करने की जरूरत होती है, जैसे बिहार मार्केट में हमने 200 करोड़ रुपए का इंवेस्ट किया था, तो हमें आगे बढ़ने के लिए दोबारा से ऐसा करने में खुशी होगी।’ पिछले साल जरूरत न होने पर भी उन्होंने 30-34 करोड़ रुपए का इंवेस्टमेंट किया था। इस बारे में गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमतों के बावजूद इस साल हमने कंपनी की बैलेंस शीट को ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और बढ़ी कीमत के साथ 521 करोड़ रुपए पर क्लोज किया है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम इसे करीब 700 करोड़ रुपए पर क्लोज करते।’

उनका कहना था, ‘प्रॉफिट में 15.4 प्रतिशत की जो कमी हुई है, वह वास्तव में न्यूजप्रिंट की बढ़ी कीमतों के कारण हुई है। इस साल सभी पब्लिकेशंस के प्रॉफिट में कमी आई है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमतें 40 प्रतिशत तक बढ़ गई थीं। हालांकि अब न्यूजप्रिंट की कीमतें घट रही हैं और इससे हमें काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा पब्लिशर्स को एडवर्टाइजर्स के साथ ज्यादा से ज्यादा संवाद बढ़ाने की जरूरत है। आजकल आ रहे नए-नए मीडियम के बीच हमें लोगों को प्रिंट के बदलते बुनियादी ढांचे के बारे में भी बताने की जरूरत है।‘

दैनिक भास्कर ग्रुप की रेडियो डिविजन ‘MY FM की ग्रोथ के बारे में अग्रवाल ने कहा, ‘हम 30 स्टेशनों को फिलहाल ऑपरेट कर रहे हैं और इनके प्रदर्शन से काफी खुश हैं। हमारा ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और प्रॉफिट इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा की लिस्ट में शामिल है। यूपी के मार्केट पर हमारी ज्यादा नजर है। पिछले तीन सालों में ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) 30-40 प्रतिशत से ज्यादा रहा है और यह इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा है। हालांकि मेट्रो शहरों में एंट्री करने का हमारा फिलहाल कोई प्लान नहीं है, लेकिन अगले फेज की नीलामी में बोली लगाना चाहते हैं।’

अगले साल के लिए डीबी ग्रुप को एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में दोहरे अंकों (डबल डिजिट) की ग्रोथ की उम्मीद है। इस बारे में गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘पिछले दो सालों के दौरान हमारा सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों में 10 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। हम साल दर साल (Y-O-Y) सर्कुलेशन ग्रोथ में पांच प्रतिशत की वृद्धि जारी रखना चाहते हैं। इस पांच प्रतिशत सर्कुलेशन ग्रोथ से हमें 7.2 प्रतिशत एडवर्टाइजिंग ग्रोथ मिली है। इसलिए मार्केट की स्थिति सुधरने पर हमें डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। अब न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ रही है और ऐसे में प्रॉफिट को 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ना चाहिए।’

‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ के बीच के अंतर को दूर करने के बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘सच कहूं तो मैं दैनिक जागरण को प्रतियोगिता में नहीं मानता हूं। उनका कोर मार्केट यूपी है, जहां पर हम नहीं हैं। यदि आप ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट देखें तो हमारी 43 लाख कॉपियां हैं, जबकि दैनिक जागरण की 34 लाख कॉपियां हैं। इसका मतलब कि हमारी कॉपियां दैनिक जागरण से नौ लाख ज्यादा हैं। यूपी और बिहार में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा होने से अखबारों की रीडरशिप वहां बहुत ज्यादा है, जबकि गुजरात और मध्य प्रदेश में यह कम है। इसलिए रीडरशिप का यह आंकड़ा दैनिक जागरण के पक्ष में जाता है।’

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अरुण पुरी ने खोला India Today की सफलता का ‘राज’, बताई भविष्य की प्लानिंग

आईआरएस डाटा के अनुसार आज के डिजिटल दौर में भी बढ़ रही है प्रिट के पाठकों की संख्या

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
Aroon Purie

'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा ने यह साबित कर दिया है कि आज के डिजिटल युग में प्रिंट के पाठकों की भी कोई कमी नहीं है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 (IRS 2017) के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि मैगजींस के पाठकों की संख्या में इस बार 0.9 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यदि रीडरशिप की बात करें तो इस लिस्ट में इंडिया टुडे (India Today) सबसे टॉप पर बनी हुई है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा के अनुसार इंडिया टुडे (अंग्रेजी) की रीडरशिप में 15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वर्ष 2017 में जहां इस मैगजीन के पाठकों की संख्या 7.9 मिलियन थी, वह इस बार बढ़कर 9.1 मिलियन हो गई है। मैगजीन की इस ग्रोथ और आगे की प्लानिंग के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश-

आईआरएस 2019 की पहली तिमाही के अनुसार पिछली बार की तुलना में इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन की रीडरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। आखिर इस मैगजीन की रीडरशिप में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी का क्या राज है?

दरअसल, पहले के मुकाबले आज के दौर का रीडर चीजों को ज्यादा पारदर्शिता से देखता है। वह स्टोरी में ज्यादा से ज्यादा फैक्ट के साथ ही उसे अच्छी तरह की गई रिसर्च के नजरिये से भी देखता है। पाठकों के बीच में इंडिया टुडे की सफलता का यही राज है कि यह बेहतर कंटेंट देती है। इस कंटेंट को तमाम रिसर्च के बाद तैयार किया जाता है और इसमें तथ्यों के साथ गहराई से विश्लेषण भी शामिल होता है। यही कारण है कि पाठक इस मैगजीन को काफी पसंद करते हैं और इससे मैगजीन की रीडरशिप बढ़ती है।

क्या इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ भी इसी तरह की हुई है?

इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ में भी निश्चित दर से इजाफा हुआ है और यह नंबर वन हिंदी अखबार से डेढ़ गुना ज्यादा है।

भविष्य में हिंदी और अंग्रेजी दोनों कैटेगरी में रीडरशिप बढ़ाने के लिए आपने किस तरह की प्लानिंग की है?

हम हमेशा अपनी बात को स्पष्टता, गंभीरता और विश्वसनीयता के साथ रखते हैं। आज के डिजिटल दौर के युग में पाठक हमारी मैगजीन को सूचना के भरोसेमेंद स्रोत के रूप में पाएंगे। सिर्फ पाठक ही नहीं, आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े नेता भी इस चुनाव में इंडिया टुडे की स्टोरी का हवाला दे रहे हैं। ये सब इस बात का संकेत हैं कि यह ब्रैंड दूसरे किसी भी ब्रैंड के मुकाबले देश के लोगों से ज्यादा कनेक्ट कर रहा है और इसी वजह से इसकी यह ग्रोथ हो रही है।   

क्या आप हमें बता सकते हैं कि आज के डिजिटल युग में मैगजींस को कैसे अपने आपको और पाठक संख्या को बनाए रखना चाहिए, जहां पर सभी मैगजींस का अपना सबस्क्रिप्शन मॉडल भी है। डिजिटल सबस्क्रिप्शन के मामले में इंडिया टुडे कैसा प्रदर्शन कर रही है? क्या आगे भी यह स्थिति रहेगी?

डिजटल को चुनौती और अवसर दोनों रूप में देखा जा सकता है। जहां तक इंडिया टुडे ग्रुप की बात है, तो हम इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

क्या आईआरएस के डाटा में डिजिटल के पाठकों की संख्या भी शामिल है?

डिजिटल पर मैगजीन की रीडरशिप को आईआरएस में पब्लिकेशन के स्तर पर शामिल नहीं किया गया है। आईआरएस की ओर से कहा गया है कि इसमें डिजिटल रीडरशिप शामिल नहीं है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि डिजिटल ने प्रिंट को आगे बढ़ाने में मदद नहीं की है। दोनों एक-दूसरे के सहायक रहे हैं।

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पीएम बोले-जब तक मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, उन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा

न्यूजएक्स के साथ इंटरव्यू में पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर प्रधानमंत्री से पूछा गया था सवाल

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2019
PM MODI

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस सवाल का हर कोई अपने-अपने हिसाब से ज़वाब दे रहा है। ममता समर्थक इसे भाजपा की देन कहते हैं और भाजपा समर्थक इसे टीएमसी की गुंडागर्दी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में कुछ और ही सोचना है। पीएम को लगता है कि इसके लिए मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है। ‘न्यूज़एक्स’ को दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीतिक सवाल-जवाबों के बीच मीडिया पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ में तब्दील करने वाले मीडिया के एक वर्ग जो जहां यह स्पष्ट कर दिया कि ‘आएगा तो मोदी ही’, वहीं पश्चिम बंगाल के हाल के लिए भी मीडिया को कुसूरवार ठहराया।

‘न्यूज़एक्स’ के पत्रकार ने जब पूछा कि ‘वेस्ट बंगाल में स्थिति काफी गंभीर है। नेताओं, मंत्रियों के साथ-साथ मीडिया को भी निशाना बनाया जा रहा है। हमारी गाड़ियाँ तोड़ी गईं, थीं, रिपोर्टर-कैमरामैन पर भी हमला किया गया था। आप प्रधानमंत्री के रूप में इस स्थिति को कैसे देखते हैं’? इस पर पीएम मोदी ने कहा, ‘देर आये, दुरुस्त आये. आप सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।’

पीएम का यह जवाब चौंकाने वाला था, लिहाजा पत्रकार ने उन्हें रोकते हुए पूछा ‘यह कैसे’? इस बार मोदी ने और भी गंभीर होते हुए जवाब दिया, ‘वही मैं बताता हूं, लेकिन यह सुनकर आपको बुरा लगेगा। आप लोग ज़िम्मेदार हैं, जब तक आपके मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं लगा।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ये देश और खुद प्रधानमंत्री एक साल से कह रहा था कि वहां पंचायत चुनाव में हिंसा हुई है, ये लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस देश का मीडिया इन बातों पर चुप रहा। अगर आप इन बातों को उस समय उजागर करते और एक दबाव पैदा करते तो लोकतंत्र के रास्ते पर आने के लिए वहां की सरकार को विवश होना पड़ता। लेकिन आपने वह नहीं किया। लोकसभा चुनाव के पहले अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री जनसभा के लिए जब बंगाल जा रहे थे, तो उनके हेलीकॉप्टरों को लैंड नहीं करने दिया गया। मैं चार महीने पहले की बात कर रहा हूँ। बंगाल के लोग दिल्ली में आकर यह कहते रहे, पर आप लोगों ने बैकआउट किया।’

पीएम इस मुद्दे को लेकर मीडिया के रुख से इस कदर नाराज़ हैं कि उन्होंने इसे केंद्र और राज्य का झगड़ा बताने के लिए भी न्यूज़एक्स के पत्रकार को हिदायत तक दे डाली। उन्होंने कहा ‘ये केंद्र और राज्य का झगड़ा नहीं है, मेहरबानी करके यह कहकर देश के संविधान का अपमान न करें।’ इस संक्षिप्त इंटरव्यू में पीएम अधिकांश मीडिया के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे। जब उनसे पूछा गया कि आपको कितनी सीटें जीतने की आस है, तो उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ कहने वाले पत्रकारों को जमकर सुनाई। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि ‘अंडर करेंट’ के रचयिता कौन हैं, सब जानते हैं।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो

महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Rajiv Khandekar

देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?

देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में  सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।

इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha Che। एक शो Namo Vs Raga किया है। पूरे महाराष्ट्र में घूमकर जिसके जरिये स्टूडेंट्स से देश की राजनीति पर बात की। युवाओं ने इस शो को जरिये देश के लोकतंत्र और उसे चलाने वालों पर बेबाक राय रखी। कई ओपनियन पोल्स भी किए, जिन पर काफी अच्छा फीडबैक आया है। इस चुनावी दौर में एक डिबेट शो-Khadakhadi कर रहे हैं। साथ ही एक नए तरह का शो ‘वोटर नंबर 1’ भी है। इसके तहत हमारी टीम कई लोकसभा क्षेत्रों के सबसे उम्रदराज वोटर से मिली और उनके साथ चुनाव के उस दौर से लेकर इस दौर तक की चर्चा की । दिल्ली से लेकर हिमाचल या फिर दूसरे प्रदेशों में हम सौ साल की उम्र पार वाले वोटर से मिले। उन्होंने जिस तरह देश की राजनीति पर बात की, वो बहुत ही रोचक रही। 104 साल के एक वोटर से भी हमने बात की, जो काफी इंटरेस्टिंग रही।

क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?

हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।

चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?

चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है। 

चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?

हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।

क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?

महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है,  पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।

न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।

फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?

आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है।  लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं।  लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।

आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?

मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।

मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?

क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी।  आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और  कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।

हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है।  हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।

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क्या आपने सुनी है पीएम मोदी की ये नई कविता, सुनें यहां

तीखे और हल्के सवालों के बीच बेहद निराले अंदाज में हुआ इंटरव्यू का समापन

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
PM- Deepak

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक जितने भी इंटरव्यू आये हैं, उनमें यदि ‘न्यूज़ नेशन’ को दिए इंटरव्यू को सबसे जुदा कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। इस इंटरव्यू में सामान्य इंटरव्यू की तरह सवाल-जवाब थे, जिसमें कुछ तीखे और कुछ हल्के थे, लेकिन इसका अंत बेहद निराला था। कहते ही हैं कि अंत भला तो सब भला।‘ न्यूज़ नेशन’ की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया और उनकी सहयोगी पिनाज त्यागी ने पीएम मोदी पर सवाल दागे, जिसका उन्होंने न केवल खूबसूरती से जवाब दिया, बल्कि बीच-बीच में कई ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जो उनके काम और विपक्ष के आरोपों में भेद करने के लिए काफी थे। मसलन...उनका टेपरिकॉर्ड...हमारा ट्रैक रिकॉर्ड। दीपक चौरसिया ने एक ऐसा भी सवाल किया, जो संभवतः पहले भी पूछा जा चुका है, मगर इस बार का जवाब बिल्कुल अलग था। ‘मोदी हैं तो लोकतंत्र खतरे में है?’ इस पर पीएम मोदी ने गुजरात से जुड़े दो किस्से सुनाकर उन सभी को खामोश कर दिया, जो यह सवाल दागते नहीं थकते।

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री रहते वक़्त महीने के अंत में मेरे पास ऐसी भी फाइलें आती थीं, जिनमें रिटायर होने वाले अधिकारियों को पुराने मामलों के संबंध में नोटिस देने का जिक्र होता था। मैंने यह प्रथा बंद कराई,  मैंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी के इतने साल सेवा में दिए, उसे घर जाते वक़्त आप नोटिस देंगे? देना ही है  तो 6 महीने पहले दीजिये, ताकि उसे जवाब देने का वक़्त मिले, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला विचार है?’

दूसरे किस्से में उन्होंने गुजरात स्थापना दिवस का उल्लेख करते हुए कहा, ‘मैंने उस मौके पर सभी दलों के पूर्व विधायकों, नेताओं को आमंत्रित किया। हम सभी ने साथ बैठकर यह ख़ुशी बांटी, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला काम है?’ सवाल जवाब के सिलसिले को मुकाम तक पहुंचाने और इंटरव्यू के अंत को अनोखा रूप देने से पहले मोदी ने कुछ विषयों को लेकर मीडिया को कठघरे में भी खड़ा किया।

जब चौरसिया ने विपक्ष के 30 हजार करोड़ इधर से उधर करने के आरोप पर सवाल पूछा तो उन्होंने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, ‘यदि ये सवाल कोई पत्रकार उनसे पूछेगा तो मैं उसे घर जाकर सम्मानित करूँगा कि चलो भाई तुमने सवाल पूछा तो...जवाब मिले न मिले। अभी तक जो खुद को निष्पक्ष और महान पत्रकार मानते हैं, उन्होंने कभी उनसे यह सवाल नहीं पूछा।’ इसी तरह बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर पीएम बोले, ‘उस गंभीर विषय को तू-तू मैं-मैं में हल्का करने की ज़रूरत नहीं है।’

जब बात हिमाचल की निकली तो पीएम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई और अगले ही पल उन्होंने इस मुस्कान की वजह भी स्पष्ट कर दी। उन्होंने बताया कि इंटरव्यू वाले दिन ही हिमाचल की चुनावी रैली से लौटते समय उन्होंने एक कविता तैयार की है। दीपक चौरसिया ने पीएम से कविता सुनाने को कहा तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि पता नहीं आपके दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं। हालांकि, पत्रकारों के आग्रह को पीएम अस्वीकार नहीं कर सके और उन्होंने अपनी लिखी कविता सुनाई।

‘आसमान में सिर उठाकर

घने बादलों को चीरकर

रोशनी का संकल्प लें

अभी तो सूरज उगा है।।

दृढ़ निश्चय के साथ चलकर

हर मुश्किल को पारकर

घोर अंधेरे को मिटाने

अभी तो सूरज उगा है।।

विश्वास की लौ जलाकर

विकास का दीपक लेकर

सपनों को साकार करने

अभी तो सूरज उगा है।।

न अपना न पराया

न मेरा न तेरा

सबका तेज बनकर

अभी तो सूरज उगा है।।

आग को समेटते

प्रकाश को बिखेरता

चलता और चलाता

अभी तो सूरज उगा है।।

विकृति ने प्रकृति को दबोचा

अपनों से ध्वस्त होती आज है

कल बचाने और बनाने

अभी तो सूरज उगा है।।

पीएम द्वारा सवालों के बीच अपने अंदर के कवि को इस तरह सबसे सामने लाने का संभवतः यह पहला मौका था और इसीलिए ‘न्यूज़ नेशन’ का यह इंटरव्यू सबसे ख़ास हो गया। चलते-चलते दीपक चौरसिया और पिनाज त्यागी ने मोदी से दो सवाल पूछे और ‘अंत भला, तो सब भला’ वाली कहावत के साथ ये मैराथन इंटरव्यू समाप्त हो गया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं- पीएम की कविता सुनने के लिए 1.7 मिनट पर क्लिक कीजिए

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'आजतक' को पछाड़ने के लिए अरनब गोस्वामी का ये है 'मेगा प्लान'

हिंदी न्यूज कैटेगरी में जल्द ही नंबर वन होने का किया दावा

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Arbab Goswami

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एमडी और एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी इन दिनों अपने नेटवर्क के विस्तार की दिशा में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। वह विभिन्न जगहों पर जाकर डिस्ट्रीब्यूशन और कॉमर्शियल पार्टनर्स के साथ बातचीत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह इस नेटवर्क को और आगे ले जाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी मजबूत एडिटोरियल टीम और मैनेजमेंट टीम भी लगातार काम कर रही है। उनका चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) न सिर्फ देश में लगातार 100 हफ्ते तक नंबर वन रहने वाला अंग्रेजी न्यूज चैनल बन गया है बल्कि कुछ दिनों पूर्व ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV)  की लॉन्चिंग की दूसरी वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर उन्होंने इसकी निवेशक कंपनी ‘एशियानेट न्यूज मीडिया’ (Asianet News Media) से शेयर खरीद लिए हैं। इसके बाद अब यह कंपनी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) में तब्दील हो गई है।

अपनी स्ट्रैटेजी और फ्यूचर प्लानिंग को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने अरनब गोस्वामी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं अरनब गोस्वामी के साथ बातचीत के प्रमुख अंश:

ऐसी कौन सी खास बातें हैं, जिनकी वजह से आप बार्क रेटिंग्स में लगातार छाये हुए हैं। इसके लिए आपने किस तरह की स्ट्रैटेजी तैयार की है?

इस साल बार्क के 17वें हफ्ते तक की बात करें तो हम पिछले 104 हफ्तों से इंग्लिश न्यूज जॉनर में नंबर एक रहे हैं और इस दौरान हमारा मार्केट शेयर लगभग 40 प्रतिशत बना हुआ है। वास्तव में हमने पूरे इंग्लिश न्यूज जॉनर में 61 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। यह काफी बड़ी संख्या है। इसके लिए हमने कई तरह की डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी पर काम किया है। यही कारण है कि हम लगभग 90 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं, जबकि अन्य चैनल इस तरह के 50 प्रतिशत प्लेटफॉर्म्स पर ही उपलब्ध हैं। चूंकि हमारी उपलब्धता ज्यादा है, इसलिए इस जॉनर में हम ज्यादा लोगों तक पहुंच पा रहे हैं। खास बात है कि हम अकेले फ्री टू एयर अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं। यही सब बहुत सारे कारण हैं कि हम इस क्षेत्र में नंबर वन की पोजीशन पर बने हुए हैं।

ऐसी कौन सी न्यूज हैं जो आप पिछले दो वर्षों में ‘रिपब्लिक’ के लिए बड़ी स्टोरी मान सकते हैं?

यदि बड़ी एक्सक्लूसिव स्टोरी की बात करें तो पॉलिटिकल इंवेस्टीगेशन टीम का गठन काफी बड़ी न्यूज थी। हमने ‘कर्ज माफी’ पर ऑपरेशन किया था। इससे दो महीने पहले हमने ‘ऑपरेशन वोट का ठेका’ किया था, जहां पर ऐसे नेताओं के बारे में खुलासा किया था जो पैसे के बदले वोट का सौदा करते हैं। ‘रिपब्लिक भारत’ की लॉन्चिंग के बाद हमें करीब 18-19 करोड़ व्यूअर्स मिले हैं। शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री ने अपने पहले इलेक्शन इंटरव्यू के लिए हमें चुना।

चुनावी सीजन में अपने सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ बताएं?

हमारे सामने किसी तरह की चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि मैं तो इसे एक अवसर के रूप में देखता हूं। अब हमारे पास ‘रिपब्लिक भारत’ भी है, जिसकी वजह से ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने 7000 शहरों और 4000 डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक अपनी पहुंच और बना ली है। हिंदी न्यूज में यह एक धमाकेदार नई एंट्री है और इस बात में कोई शक नहीं कि हम ‘आजतक’ को चुनौती देते हुए यहां पर जल्द ही नंबर वन होंगे। इस समय मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी और हिंदी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की क्वालिटी को सुनिश्चित करना है। हम दोनों प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह का कंटेंट नहीं देते हैं, क्योंकि दोनों की ऑडियंस अलग है, हम इस बात का ध्यान रखते हैं और दोनों जगह अलग-अलग तरह का कंटेंट देते हैं।

हिंदी न्यूज जॉनर में ‘आजतक’ करीब एक दशक से नंबर वन बना हुआ है। क्या इसे पछाड़ना इतना आसान होगा?

हम इसे दो-तीन महीनों में ही पीछे छोड़ देंगे। इस बारे में हमें कोई शक नहीं है। पिछले 12 हफ्तों की बात करें तो बार्क डाटा के अनुसार, ‘रिपब्लिक भारत’ के 264 मिलियन यूनिक ऑडिंयस थे, जबकि ‘आजतक’ के 278 मिलियन यूनिक ऑडियंस थे। कहने का मतलब है कि अभी भी दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है और हम जल्द ही आगे होंगे।

हिंदी न्यूज की व्युअरशिप ज्यादा होने के बावजूद अंग्रेजी न्यूज के मुकाबले इसे ज्यादा एडवर्टाइजिंग रेट नहीं मिलते हैं। अब जबकि आप दोनों जॉनर में चैनल चला रहे हैं, तो इस असमानता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
मुझे लगता है कि एडवर्टाइजिंग रेट में इजाफा होगा, क्योंकि नए टैरिफ आर्डर लागू होने के बाद देश में हिंदी न्यूज सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन जाएगा। फ्री टू एयर प्लेटफॉर्म्स पर हमने अपनी काफी अच्छी पहुंच बना रखी है। मुझे लगता है कि नीलामी के पहले दिन बोली लगाने वालों में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ तीसरे नंबर पर था। जब लोग ‘फ्रीडिश’ से दूर होकर पेड कैटेगरी की ओर मुड़ रहे हैं, हम फ्री टू एयर में आगे बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि हमें इसका काफी फायदा मिलेगा, क्योंकि हमारी पहुंच ज्यादा होगी और इस वजह से एडवर्टाइजर्स हमारे साथ आएंगे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने न्यूज उपभोग के बारे में कुछ बताएं, यह कैसा है?

यदि सिर्फ डिजिटल की बात करें तो इस पर भी रिपब्लिक टीवी देखने वालों की संख्या ज्यादा है। हमने कई नए प्रयोग भी किए हैं। हमारे पास अपनी लाइव स्ट्रीम के लिए सिंगल सोर्स डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी है। हम कई डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे- जस्ट डायल, ओला प्ले, पेटीएम, जी5 और हॉटस्टार पर उपलब्ध हैं। हमने बेंगलुरु में काफी बड़ी टेक्नोलॉजी टीम तैयार की है और डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाने के लिए तमाम कवायद कर रहे हैं। हमारे विडियो में बफरिंग नहीं होती है। मेरा फोकस प्रॉडक्ट के पीछे टेक्नोलॉजी के निर्माण पर है और लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मैं डिजिटल को और मजबूती देने की दिशा में काम करूंगा।

यदि आप अपना मूल्यांकन खुद करें तो एक से दस नंबर के बीच आप खुद को कितने नंबर देंगे?

मैं हिंदी और इंग्लिश दोनों में खुद को 10 में से 8 नंबर दूंगा, क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी में तमाम बड़े प्लेयर्स की मौजूदगी के बीच हमारी काफी धमाकेदार एंट्री हुई है। एक बार ‘आजतक’ से आगे निकलने के बाद मैं खुद को 10 में से 10 नंबर दूंगा और इसमें सिर्फ कुछ महीने और लगेंगे। अंग्रेजी की बात करें तो मैं खुद को 10 में से 8 नंबर इसलिए दूंगा क्योंकि हमने नंबर वन की पोजीशन पर 100 हफ्ते पूरे कर लिए हैं और मुझे लगता है कि यह काफी बड़ी बात है। रही बात डिजिटल की तो मैं खुद को सिर्फ इसलिए कोई नंबर नहीं देना चाहता, क्योंकि मैं अभी इस पर काम कर रहा हूं औऱ ‘रिपब्लिक’ की तरफ से इसमें कुछ नया होगा। इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में निवेश करने वाले हम पहले न्यूज प्लेयर्स हैं। इसके लिए बेंगलुरु में टेक्नोलॉजी सेटअप तैयार किया गया है। दो एमबीपीएस कनेक्शन पर हमारी वेबसाइट का लोड 700-800 मिलीसेंकेंड्स है और खास बात यह है कि इस टेक्नोलॉजी को इन हाउस तैयार किया गया है। हमने अपने पूरे हिंदी चैनल को इन हाउस तैयार किया है और यह पूरी तरह से स्वदेशी है। हमारे एंकर्स की टीम भी काफी खास है और इसमें हमने विभिन्न चैनलों से एंकर्स को शामिल किया है।

तरक्की के मामले में अगले साल आप कंपनी को कहां देखते हैं?

इन दिनों मैं जहां भी जाता हूं, मुझे देखकर लोग ‘पूछता है भारत’ के बारे में बात करते हैं। लोग बड़ी संख्या में हमारे साथ जुड़ रहे हैं और जल्द ही ‘रिपब्लिक भारत’ नंबर वन हिंदी न्यूज चैनल होगा। ‘रिपब्लिक टीवी’ भी नंबर वन अंग्रेजी न्यूज चैनल बना रहेगा। रिपब्लिक विभिन्न भारतीय भाषाओं में काम करेगा और मैं इसे लोगों के दिलों तक ले जाऊंगा। अंग्रेजी के अलावा मैं 10-12 भाषाओं में और काम करना चाहता हूं, जिससे हम ऐसे न्यूज ऑर्गनाइजेशन बन जाएंगे, जिसमें काफी विविधता होगी। यदि सब कुछ ठीकठाक चलता रहा तो इस साल के आखिरी तक अथवा अगले साल की शुरुआत में हम इसे ग्लोबल बनाने की दिशा में काम करेंगे। मैं अभी अवसरों का मूल्यांकन कर रहा हूं। यूएसए मेरे लिए काफी अच्छे मीडिया मार्केट में शामिल है और मैं वहां पर अपने नेटवर्क की मौजूदगी चाहता हूं। इसके बाद वहां वेस्टर्न यूरोप और आस्ट्रेलिया है। हम न्यूयॉर्क और लंदन में लोगों और निवेशकों के साथ ही कंटेंट के सहयोगियों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या कंटेंट को लेकर हम पूरी तरह अपने आप पर निर्भर होंगे अथवा किसी से सहयोग लेंगे, तो इस बारे में हम इस साल निर्णय करेंगे। हम 12 महीनों के अंदर ग्लोबल बनने जा रहे हैं और धीरे-धीरे अपनी इस महत्वाकांक्षा के मैं काफी नजदीक पहुंच रहा हूं। ग्लोबली हम कैसे आगे बढ़ेंगे, इसके लिए मैंने एक टीम भी तैयार की है, जो इस बात के विश्लेषण में जुटी हुई है। जल्द ही हमारे पास देश की सबसे बड़ी ग्लोबल न्यूज कंपनी होगी।

इंटरनेशनल मार्केट में अभी आप किस तरह काम कर रहे हैं?

हम इस दिशा में काफी अच्छा कर रहे हैं। हमने कुछ समय पूर्व न्यूजीलैंड में शुरुआत की थी, जिसमें वहां के प्रधानमंत्री भी शरीक हुए थे, हालांकि मैं वहां नहीं गया था, लेकिन पीएम ने मेरे विडियो मैसेज देखे थे और उन पर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। यूनाइटेड स्टेट की मार्केट में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री ओवर द टॉप (OTT) के क्षेत्र की ओर काफी तेजी से बढ़ रही है, इसलिए हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए हम सिर्फ नॉर्मल केबल और सैटेलाइट के द्वारा ही वहां के मार्केट में दाखिल होने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसके लिए हमने इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन टीम बनाई है। हमारा अगला टार्गेट अफ्रीका है, इसलिए हम इस साल साउथ अफ्रीका में अपनी मौजूदगी चाहते हैं। यूके में भी मौजूदगी की दिशा में हमारी कवायद जारी है और तीन महीनों में हम यूएस, यूके समेत तमाम मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे।

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