मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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अखबारों को अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा: शशि शेखर

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं।

Last Modified:
Monday, 19 April, 2021
Shashi Shekhar

मीडिया के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर का काफी नाम है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में शशि शेखर ने अपने जीवन और कार्य से जुड़ी तमाम बातें साझा की हैं। इसके साथ ही उन्होंने आने वाले समय में प्रिंट मीडिया की चुनौती और अखबारों के भविष्य पर भी चर्चा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

पिताजी बनारस में सरकारी अधिकारी थे, मैं वहीं पैदा हुआ। पिताजी का ट्रांसफर देवरिया होने के कारण मेरी स्कूलिंग वहां हुई, फिर पिताजी मिर्जापुर आ गए और वहां भी मेरी स्कूल की कुछ यादें हैं। इसके बाद इलाहबाद, आगरा और मैनपुरी भी शिक्षा अर्जित की। बाद में उन्होंने बीएचयू जॉइन किया तो मैंने वहीं से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया।

आपने भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एमए किया तो मीडिया में आपका कैसे आना हुआ?

जी बिल्कुल, मैंने इस बारे में सोचा नहीं था और हमारे घर में मीडिया को लेकर भी कोई अच्छी बात नहीं होती थी लेकिन मैं छोटी उम्र से ही लिखने लगा था। मेरे कुछ लेख नवभारत टाइम्स में भी प्रकाशित हुए और उसके बाद आज अखबार के प्रॉपराइटर श्री शार्दुल विक्रम गुप्त ने मेरे लेख पढ़कर सोचा कि ये कोई अनुभवी आदमी हैं, जो बनारस से लिख रहे हैं। उन्होंने हमारे संपादक राममनोहर पाठक जी से बात की तो उन्होंने बताया कि ये तो 20 साल का लड़का है और एमए में पढ़ता है। मैं उनसे मिलने गया और उन्होंने मुझसे कहा कि आप अखबार में काम कर लीजिए। उस समय मैंने मना कर दिया लेकिन नियति अपना काम करती है। इसके बाद उन्होंने वापस मुझे बुलाया और उसके बाद मैंने हां कर दी और आप देखिए कि अगले बीस साल तक मैं उस अखबार के लिए काम करता रहा।

समय कभी एक सा नहीं रहता है और बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो समय के साथ चले, आप अपने समय में और आज के समय में कितना अंतर पाते हैं?

आपने सही कहा कि समय कभी एक सा नहीं रहता है लेकिन मेरा यह मत है कि अगर आदमी ईमानदार और समझदार है और परख रखता है तो उसे कभी कोई कठिनाई नहीं होगी। जीवन में हंसी और गम तो एक चक्र में की तरह हैं और बाद में कहानियां बनती हैं लोगों की, लेकिन कहानियों में मेरा यकीं नहीं है। एक यात्रा है 40 वर्ष की जो मैं करता रहा और आज इस मुकाम तक आ गया हूं।

एक समय ऐसा था, जब नौकरी जरूरी लगती थी क्योंकि बच्चे छोटे थे लेकिन अब वो बड़े हो गए हैं और अपना काम करने लगे हैं तो अब लगता है कि किसी के काम आ सकूं, कुछ लोगों के जीवन में बदलाव ला सकूं। आज मेरे साथी कोरोना की वजह से बहुत तनाव में थे और मैंने उन्हें दफ्तर बुलाया और उनसे बात की। मुझे ऐसा लगा कि आज मैंने जीवन का एक सार्थक दिन जीया, जब मैंने किसी की पीड़ा और दुःख को अनुभव किया और उसे दूर करने की कोशिश की। बस इससे अधिक मैं कुछ नहीं सोचता।

वहीं, मैं तब और आज के माहौल में कोई अंतर नहीं पाता, बस तकनीक बदल जाती है। उस समय के प्रिंट मीडिया में और आज के प्रिंट मीडिया में तकनीक का बड़ा अंतर आ गया है लेकिन अखबार के डिजाइन में बैलेंस होना चाहिए, अगर उसको जरा भी इधर-उधर करोगे तो बैलगाड़ी की भांति वो उल्टी टंग जाएगी। आज हम दुनिया के सबसे बड़े डिजाइनर के साथ बैठकर अखबार को रीडिजाइन कर रहे हैं। इससे पहले भी आज से 11 साल पहले मैंने अखबार को डिजाइन करवाया था। गुण और ज्ञान किसी डिग्री से नहीं आते हैं।

पत्रकारिता का मूल तत्व है सच बोलना, आज कौन कह रहा है कि उसमे घालमेल करो?, दरअसल पत्रकार बदल गए हैं। पत्रकारिता वही है और कुछ खास लोगों के बदल जाने से एक अजीब सी मंडी हो गई है। हर आदमी चिल्ला रहा है।

पिछले कुछ सालों से प्रिंट मीडिया के सामने डिजिटल से चुनौती उभरकर आ रही है। इस दिशा में आपका अखबार क्या काम कर रहा है?

साल 1995 की मैं आपको बात बताता हूं, जब फटाफट न्यूज चैनल्स का दौर नहीं था और उस समय मोबाइल भी उतने प्रचलन में नहीं थे। उस समय एक बहुत बड़े व्यक्ति ने मुझसे कहा कि शशि जी, आप खुद को अखबार से अलग कर लीजिए, आने वाले समय में इसका कोई भविष्य नहीं है। उन्होंने पर्यावरण का तर्क देते हुए मुझसे ये बात कही थी। उसके बाद साल 2000 आया और मेरे पास एक 24 घंटे के न्यूज चैनल का ऑफर था।

मैंने वहां काम करना शुरू किया और वहां भी यही सोच थी कि अखबार खत्म हो जाएंगे लेकिन उसके ठीक डेढ़ साल बाद ही मैं एक अखबार में काम करने चला गया और वो भी आधी सैलरी पर, क्योंकि जैसी पत्रकारिता में करना चाह रहा था वो मैं कर नहीं पा रहा था। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि टीवी में ये काम ठीक से नहीं किया जाता है। वो अखबार आठवें नंबर पर था और उसके मालिक भी मुझसे यही कहते थे की अखबार का कोई भरोसा नहीं है भविष्य नहीं है।

हमने कोशिश की और वो देश के तीसरे नंबर का अखबार बन गया। फिर मैं इस अखबार में आया और मुझे बहुत बढ़िया टीम मिली और इतना समय बीत जाने के बाद भी अखबार है। हां, समय बदलता है। मैं कश्मीर में था और वहां मैंने किसी के हाथ में अखबार नहीं देखा। डिजिटल माध्यम बढ़ रहा है। आने वाले समय में विज्ञापन का माध्यम भी बदल जाएगा। अखबारों की मृत्यु मीडियम की मृत्यु नहीं होगी बल्कि सिस्टम की मृत्यु होगी। तकनीक के परिवर्तन के साथ मीडियम बदल जाएगा लेकिन मीडिया वही रहेगा।

तेजी से बढ़ते डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज एक बहुत बड़ी समस्या है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

इस देश में नारेबाज बहुत हो गए हैं और उनका यह धंधा बन गया है। पत्रकारिता में उन्होंने कोई काम किया है या नहीं इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है लेकिन दूसरों के बारे में उन्हें बहुत ज्ञान है। अगर फेक न्यूज है तो ऐसे में सही न्यूज बोलने वाले की कद्र बढ़ती है। बाजार का दस्तूर है कि असली सिक्कों की आड़ में खोटे सिक्के चल जाते हैं। अगर सिर्फ खोटे सिक्के चलेंगे तो बाजार बंद हो जाएगा। आज जो योग्य है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं रह गई है, कमी उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी कोई पहचान नहीं बनाई है।

कुछ सालों में मीडिया में निगेटिव चीजे हुई हैं, गोदी मीडिया जैसी शब्दावली इस्तेमाल की जा रही है, इस पर आपके क्या विचार हैं?

मेरा मानना है कि ये यात्रा है और यात्रा में इससे भी पहले कठिन समय आया है। यात्रा में कई मोड़ आते हैं और अगर किसी को तकलीफ है तो उसे हक है अपनी तकलीफ बयान करने का, कुछ लोगों का तो काम ही है तकलीफ को बोलना जैसा कि मैं आपसे पहले कह चुका हूं। मेरा ये मत है कि इस यात्रा में ये जो पड़ाव है वो भी गुजर जाएगा और जिस तरह कोरोना के बाद लोगों ने अपने जीने का रास्ता ढूंढा और अपने जीवन में बदलाव किए, ठीक उसी तरह से मीडिया भी अपना रास्ता बना लेगा।

हमने कोरोना का एक भयावह दौर देखा और उसके बाद प्रिंट मीडिया में चीजें किस तरह से बदली हैं?

कोरोना का प्रिंट मीडिया पर बड़ा असर हुआ और कई साथियों को उसकी वजह से तकलीफ भी उठानी पड़ी। लेकिन आज के समय की बात करें तो अखबारों का वो बुरा दौर बीत गया है। विज्ञापन भी वापस आ रहे है। लेकिन ये बुरे दिन वापस भी आ सकते हैं इसलिए उनको अपनी कीमतों पर एक बार फिर गौर करना पड़ेगा। रीडर से सीधे संवाद करना होगा और उसे यह समझाना होगा कि हम क्यों अखबार की कीमत बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा डिजिटल कंटेंट जो फ्री है उससे भी बड़ी परेशानी है।

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने न्यूज पब्लिशर्स के हक में जो निर्णय लिया है क्या ऐसा कार्य भारत सरकार को भी करना चाहिए?

बिल्कुल करना चाहिए। अगर आज कोई इतना समय लगा रहा है और वही कंटेंट कोई अगर फ्री उठाकर डाल दे तो ये गलत है। उसके बाद फेक न्यूज वाले अपने हिसाब से उसे गलत तरीके से वायरल अगर कर दें तो नुकसान है। इसलिए गूगल को भारत में भी कंटेंट पब्लिशर्स को पैसे देने चाहिए। 

आपने मीडिया में एक लंबा सफर तय किया है और कई बड़े इंटरव्यू भी किए है। कोई ऐसा किस्सा जो आपको आज भी याद आता है?

श्रीमती इंदिरा गांधी अचानक से इलाहबाद में 1983 में आईं और उस वक्त मैं रिपोर्टर था। उस समय सिर्फ 4 या 5 रिपोर्टर ही होते थे। मुझे पता चला कि वो प्रोग्राम अचानक से ही बन गया था और किसी को खबर नहीं थी। उस समय पीएम इंदिरा के साथ सिर्फ दो ही लोग थे। गेट पर पुलिस वालों ने हमको रोक दिया। हम कुछ चार पांच थे और हमने कहा कि अरे मिश्रा जी, जरा इंदिरा जी से मिलवाइए। बाद में वो अंदर चले गए और हम सब बाहर खड़े रहे। कुछ देर बाद इंदिरा जी बाहर निकलीं और गाड़ी में बैठने लगी। लेकिन हमारी ओर उन्होंने देखा और इशारे से हमको बुलाया। मैं सबसे आगे था और मैंने चार सवाल सोचे हुए थे जो उनसे पूछे। उसके बाद उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा कि तुम ब्यूरो चीफ हो? अच्छा, दिखने में तो  कॉलेज के लगते हो, क्या उम्र है? उसके बाद मैंने जवाब दिया कि 23 साल। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि अरे 23 साल की उम्र में ब्यूरो चीफ! अच्छा बताओ तुमने पंडित जी की किताबें पढ़ी हैं? मैंने कहा कि जी, मैंने पढ़ी हैं। उन्होंने फिर मुझसे कहा कि ये मैं तुमसे इसलिए नहीं कह रही कि वो मेरे पिता थे बल्कि इसलिए कह रही हूं क्योंकि वह पत्रकार थे। उसके बाद मुझसे कहा कि खूब पढ़ा लिखा करो और मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझसे कहा कि थोड़ा कसरत किया करो, बहुत पतले हो। मैं उस स्तर का पत्रकार नहीं था और सिर्फ दिल्ली वाले उनसे मिलते थे, लेकिन ये मेरा अनुभव यादगार है।

इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

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ABP के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं: दीपांकर दास पुरकायस्थ

एबीपी के पूर्व सीईओ और एमडी ने नेटवर्क के साथ अपनी लंबी पारी और भविष्य की योजनाओं समेत कई मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Thursday, 25 March, 2021
Dipankar Das Purkayastha

‘एबीपी प्राइवेट लिमिटेड’ (ABP Pvt Ltd)  में अपनी चार दशक से ज्यादा पुरानी पारी को विराम देते हुए दीपांकर दास पुरकायस्थ (Dipankar Das Purkayastha) ने हाल ही में सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया है। इस नेटवर्क में अपनी इतनी लंबी पारी, पुरानी यादों और भविष्य की योजनाओं को लेकर डीडी पुरकायस्थ ने ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

: एबीपी नेटवर्क के साथ आप चार दशक से ज्यादा समय से जुड़े रहे हैं। इतनी लंबी पारी की अपनी कुछ बेहतरीन यादों के बारे में कुछ बताएं? 

एबीपी के साथ मेरी कभी न खत्म होने वाली यादें हैं। चार दशक पुरानी बात करें तो पूर्व में हमारे पास तकनीकी कम थी। ज्यादातर लोगों का झुकाव अखबार पढ़ने पर था। विज्ञापनों को लेकर ज्यादा स्थिरता नहीं थी और टेलिविजन बहुत ज्यादा आम नहीं था। समय गुजरने के साथ सभी चीजें बदल गईं। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, मीडिया के तमाम माध्यम विकसित हो गए, डिजिटल और मोबाइल टेक्नोलॉजी की शुरुआत हो गई और मैंने इन चार दशकों में अपने सामने इन सब परिवर्तनों को होते हुए देखा है। इस दौरान कंपनी एक छोटे क्षेत्रीय समाचार पत्र से बड़े राष्ट्रीय समूह में विकसित हुई है और टेलिविजन, मैगजींस, न्यूजपेपर्स और डिजिटल क्षेत्र में बहुत मजबूती से अपनी जगह बनाई है। मैं खुश हूं कि मेरे इस्तीफे के समय तक एबीपी देश का एक प्रमुख न्यूज मीडिया ग्रुप बन चुका है।

: बीस-तीस साल पहले राजनीतिक घटनाक्रमों की कवरेज बिल्कुल अलग तरीके से होती थी। आपकी नजर में इस दिशा में क्या बदलाव आया है?

लोग अब सभी चीजें जल्दी से जल्दी जान लेना चाहते हैं। मीडिया का काम समाज में घट रही अच्छी-बुरी घटनाओं को सामने लाना है, लेकिन लोग अच्छे पक्ष को देखना चाहते हैं। इन हालातों में सही तथ्यों को सामने रखना काफी दुविधाजनक होता है। लेकिन एबीपी ने हमेशा से एक साहसिक दृष्टिकोण अपनाया है और समाज के लिए जो सही है, वही पब्लिश करता है।

: जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि कैसे एबीपी न्यूज नेटवर्क अब एबीपी ब्रैंड बन गया है, तो आपको कैसा लगता है?

एबीपी न्यूज को पहले स्टार न्यूज के नाम से जाना जाता था। इससे पहले कि हम इसे पूरी तरह से खरीद लें, यह सीखने का एक अच्छा अनुभव रहा। स्टार न्यूज रातों रात एबीपी न्यूज बन गया, लेकिन इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया, क्योंकि लोगों के दिमाग में किसी की छवि को बदलना इतना आसान नहीं है और बहुत लंबे समय तक इसे स्टार न्यूज कहा जाता था। स्टार ग्रुप से सीखी गईं तकनीकी की बारीकियां और कंटेंट को लेकर एबीपी की तैयारियां ही इसे खास बनाती हैं। यह सहयोग सफल रहा। शुरू से ही हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि हम एक प्रमुख स्थान चाहते थे। हम जानते थे कि हमें क्या ब्रॉडकास्ट करना है। हम अपने रीडर्स और व्युअर्स को गंभीर न्यूज और गंभीर पत्रकारिता देना चाहते थे। एबीपी न्यूज ने बंगाली भाषा में अपना चैनल शुरू किया, जो काफी सफल रहा। इसके बाद मराठी और गुजराती भाषा में चैनल शुरू किए गए। महाराष्ट्र में एबीपी माझा नंबर वन न्यूज चैनल बन गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड पर आधारित हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) की शुरुआत की गई। इसे अभी एक साल ही हुआ है। एबीपी पूरे देश का नंबर वन रीजनल न्यूज मीडिया बनना चाहता है। हम पूरे देश में अपनी मौजूदगी की तैयारी कर रहे हैं और जल्द ही दक्षिणी क्षेत्रों में अपने कदम बढ़ाएंगे और देश का नंबर वन न्यूजपेपर प्लेयर बनने का प्रयास करेंगे।

: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं। चुनौतियों का सामना करने और भविष्य की तैयारी के लिए एबीपी ने क्या किया?

पिछले 12 महीनों की बात करें तो यह काफी अनिश्चितता भरा दौर रहा। हर कोई भोजन और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं था। अखबारों का डिस्ट्रीब्यूशन जीरो हो गया था, विज्ञापन बंद हो गए थे और एक मीडिया कंपनी के रूप में हमारे लिए काफी मुश्किल हो गई। इन चुनौतियों से निपटने और स्ट्रैटेजी के निर्माण के लिए हमने लोगों की एक टीम बनाई। सीमित रेवेन्यू के कारण कंपनी सभी को भुगतान करने में सक्षम नहीं थी, इसलिए छंटनी की गई। लागत को कम करना पड़ा। कुछ बड़े मीडिया संस्थानों ने मुझे फोन कर सुझाव दिया कि रेवेन्यू गिरने के कारण न्यूजपेपर्स की प्रिंटिंग बंद कर देनी चाहिए, लेकिन मैंने इससे यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इससे लोग हमें पूरी तरह भूल सकते हैं। 

इससे बाद एक जागरूकता कैंपेन शुरू किया गया कि अखबार सुरक्षित हैं और इससे कोरोना का संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है, क्यों प्रॉडक्शन के सभी स्तरों पर तमाम जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं। धीरे-धीरे सेल्स और रेवेन्यू में सुधार आना शुरू हुआ। विज्ञापन रेवेन्यू बढ़ गया। मुझे खुशी है कि मैं ऐसे समय पर इस्तीफा दे रहा हूं और मैंने कंपनी की ग्रोथ में खासकर इस मुश्किल समय में बहुत योगदान दिया है।

: अवीक सरकार और अरुप सरकार के साथ काम करने का आपका कैसा अनुभव रहा है और उनके पेशेवर दृष्टिकोण क्या हैं? 

दोनों बिल्कुल अलग हैं। कई मायनों में वे एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन व्यक्तित्व में वे थोड़े अलग हैं। अवीक सरकार बहिर्मुखी हैं और लोगों से मिलना-जुलना पसंद करते हैं, दूसरी ओर अरुप सरकार थोड़े अंतर्मुखी हैं, लेकिन दोनों ही बहुत बौद्धिक हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। वे एम्प्लॉयीज को काम करने की पूरी आजादी देते हैं। उनके साथ काफी अच्छा सफर रहा है।

: अतिदेब सरकार एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। कंपनी के भीतर से लीडर्स तैयार करने के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

संस्थान में काफी सक्षम व्यक्ति हैं और एबीपी उन्हें अपने कौशल का प्रदर्शन करने का अवसर देने में विश्वास करता है। अतिदेब को सीईओ के पद पर प्रमोट किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि परिवार के सदस्य को उस भूमिका में नहीं आना चाहिए। चुने हुए सीईओ अतिदेब को रिपोर्ट करेंगे, जो सभी कार्यों की देखरेख करेंगे क्योंकि वह खुद एक बहुत ही सक्षम पत्रकार हैं। परिवार एक शेयरधारक के रूप में मौजूद हो सकता है लेकिन सीईओ को एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए, जिसका परिवार के साथ कोई सीधा संबंध नहीं हो।

: ऑस्ट्रेलिया में, हाल ही में लिए गए एक फैसले से वहां सोशल मीडिया दिग्गज अब न्यूज दिखाने के बदले अखबारों को भुगतान करेंगे और यदि भारत में भी ऐसा कुछ होता है तो यह अखबार मालिकों को कैसे प्रभावित करेगा?

ऑस्ट्रेलिया में इसे कानूनी मान्यता दे दी गई है और मेरा मानना है कि अन्य देशों की मीडिया इंडस्ट्री में भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे और उम्मीद है कि भारत और ब्राजील भी इसे फॉलो करेंगे। गूगल और फेसबुक भी इस आर्थिक कदम को नजरंदाज नहीं करेंगे। गूगल ने गूगल शोकेस बनाया है, जो अखबार कंपनियों को प्रति वर्ष एकमुश्त राशि का भुगतान करता है। इस तरह के फैसले से प्रकाशकों को उनकी मेहनत का उचित हिस्सा मिलेगा, जो अभी तक उन्हें नहीं मिलता है।

: एक कंटेंट कंपनी के तौर पर एबीपी ने डिजिटल बेस का विस्तार देखा है। लिहाजा यह अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर कैसे काम कर रहा है और इसमें क्या सफलताएं मिल रही हैं?

डिजिटल भविष्य है और विशेष रूप से महामारी के बाद तो चीजें काफी बदल गई हैं। एबीपी में हमारी दो डिवीजन (divisions) हैं, पहली एबीपी लाइव (ABP Live) है, जो वास्तव में बहुत अच्छा कर रही है। दूसरी- एबीपी डिजिटल (ABP Digital), जो आने वाली कई थीम्स के साथ बेहतर कर रही है। टेक्नोलॉजी एक बेहतरीन सुविधा (facilitator) है और इसे समय के साथ हमें स्वीकार करना है, क्योंकि आने वाला समय इसी का है।

: आपको क्या लगता है कि भारतीय मीडिया मालिकों और अखबार मालिकों को प्रासंगिक बने रहने के लिए क्या करना चाहिए?

विश्वसनीयता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। संपादकीय (एडिटोरियल) वास्तविक ताकत है और सही लोगों के लिए गेम-चेंजर है। इसके अलावा, हजारों सालों की तरह यह नई पीढ़ी भी और अधिक जानना चाहती है। सोशल मीडिया के भंवर में बहुत सारे ऐसे तथ्य हैं, जिनकी सच्चाई छिप जाती है। ऐसे कई ब्रैंड से जुड़े अखबार हैं, जो विश्वसनीय जानकारी प्रकाशित करने की हिम्मत रखते हैं। प्रासंगिक और व्यक्तिगत अनुभव केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ही संभव है। डिजिटल और प्रिंट मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं और मुझे लगता है कि इन्हे अलग से नहीं देखा जाना चाहिए। प्रासंगिक रहने के लिए, नए विषयों (themes) के साथ आना जरूरी है। न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times) ने अपने एक पत्रकार को पर्वतारोहियों के साथ रहने के लिए भेजा, जिसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना पड़ा, ताकि वह उनकी दैनिक दिनचर्या और चोटी पर चढ़ने वाले प्रेरक कारकों के बारे में उनके विचार जान सके। इस खबर ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत के मीडिया घरानों को भी इसी तरह की परिपाटी को अपनाना चाहिए।

: इतनी दूर आने के बाद, क्या आपको अभी भी लगता है कि कुछ ऐसे काम बाकी रह गए हों, जिन्हें आप पूरा करना चाहते हैं?

बिल्कुल, दुनियाभर में यात्रा करना मेरी तीव्र इच्छा है। महामारी के दौरान, मैंने स्पैनिश सीखी और वेलेंसिया विश्वविद्यालय (University of Valencia) से सीखने के कई लेवल्स को पूरा किया। मैं अब हल्की-फुल्की स्पैनिश बोल सकता हूं और इसे समझ भी सकता हूं। लैटिन अमेरिका की यात्रा करना मेरी दिली इच्छा है और अगले दो सालों में जब सब चीजें थोड़ी सामान्य हो जाएंगी, तो मैं बहुत सी यात्राएं करना चाहूंगा। मैं अलग-अलग व्यंजनों का लुत्फ उठाना चाहता हूं। मैं निकट भविष्य में एक किताब भी लिखना पसंद करूंगा।

इंटरव्यू का पूरा वीडियो फॉर्मेट यहां देखें:

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मीडिया पॉलिसी को लेकर उठे विवाद में बेवजह उछाला जा रहा है मेरा नाम: आलोक मेहता

समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने तमाम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।

Last Modified:
Friday, 12 March, 2021
Alok Mehta

डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के लिए केंद्र सरकार ने पिछले दिनों कुछ गाइडलाइंस जारी की हैं। मीडिया के एक वर्ग द्वारा इन गाइडलाइंस को मीडिया को नियंत्रित करने वाला कहकर इनकी आलोचना की जा रही है। कहा जा रहा है कि डिजिटल मीडिया पर सरकार की ताजा गाइडलाइंस आने से बहुत पहले ही मंत्रियों का समूह इस पर लगातार काम कर रहा था और इस पर रिपोर्ट तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट्स को ही धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। जिन मंत्रियों के समूह के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है, उनमें पांच कैबिनेट मंत्री थे और चार राज्य मंत्री।

मीडिया जगत में इस रिपोर्ट को लेकर भी चर्चा छिड़ी हुई है। इस रिपोर्ट के बारे में कुछ मीडिया प्रतिष्ठानों का कहना है कि मंत्रियों व तमाम पत्रकारों की भी कुछ मीटिंग हुई थी। ऐसी एक मीटिंग में सरकार के पक्ष में या सकारात्मक खबरें प्रोत्साहित करने के लिए और छवि खराब करने वाली खबरों को रोकने के लिए हुई चर्चा के आधार पर  रणनीति तैयार की गई। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष आलोक मेहता (पदमश्री) ने इस पूरे मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

आपको क्यों लगता है कि इस मीटिंग को गलत तरीके से पेश किया गया?

देखिए, भारत सरकार की एक रिपोर्ट सामने आई है, जो अखबारों में है और वेबसाइट्स पर भी उपलब्ध है। अब यह सरकार ने डाला है यह नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसे पहले कारवां मैगजीन ने छापा। कारवां में जब यह रिपोर्ट जारी हुई, तभी मेरे संज्ञान में आया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसमें मेरा नाम पहले है। कई पत्रकारों और मित्रों ने भी मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) एक सही फोरम है, जहां मैं अपनी बात रख सकता हूं। देखिए, जिस समय यह हुआ उसकी तारीख 26 जून 2020 है और उस समय चीन और पैंगोंग झील वाला मुद्दा बहुत गरमाया हुआ था। युद्ध जैसी  स्थिति भी थी। वैसे यहां बता दूं कि यह परंपरा रही है कि विदेश मंत्री, विदेश सचिव या सरकार के मंत्री यहां तक कि ज्यादा आवश्यक हो तो प्रधानमंत्री की ओर से भी ऐसे संवाद के लिए संपादकों या वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाया जाता था। इनमें से कई मीटिंग्स प्रधानमंत्रियों और विदेश मंत्रियों की ओर से होती थी, जो एक जानकारी के लिए होती थीं कि भारत के हित में क्या हो सकता है?

मुझे मुख्तार अब्बास नकवी जी का फोन आया। पहले उन्होंने मुझसे मेरा हालचाल पूछा, क्योंकि कोरोना पीरियड भी था। फिर उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाते हुए कहा कि आइए, आप भी होंगे... विदेश मंत्री एस जयशंकर जी रहेंगे, किरण रिजिजू जी रहेंगे, शायद प्रकाश जावड़ेकर जी भी होंगे... या तीन चार लोग रहेंगे... तो आप आइए... लेकिन मेरे यहां नहीं, इस बार किरण रिजिजू जी के यहां आपको आना है। मैंने कहा, ठीक है इसके बाद में मैंने उनका पता देखा और मैं चला गया। फिर वहां बातचीत शुरू हुई, जहां पर एक-दो संपादक थे और कुछ ऐसे लोग थे, जिन्हें हम वरिष्ठ मानते हैं और उनकी अखबारों में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, तो उन्होंने कहा कि एस जयशंकर जी कहीं फंस गए हैं। उनको प्रधानमंत्री जी ने कुछ जरूरी मीटिंग के लिए बुलाया है, तो वे वहां चले गए हैं। इसके बाद मुझे लगा कि कोई और मंत्री भी आएगा, लेकिन कोई नहीं आया, सिर्फ दो ही मंत्री वहां थे, किरण रिजिजू जी और मुख्तार अब्बास नकवी जी।

हमारा यह अनुभव था कि विदेश मंत्री नटवर सिंह रहे या प्रणव मुखर्जी अथवा जसवंत सिंह या विदेश सचिव श्याम शरण, शशांक, शिवशंकर जो एडिटर्स  और वरिष्ठ डिप्लोमेटिक सीनियर जर्नलिस्ट्स को साउथ ब्लॉक ऑफिस में बुलाया करते थे या फिर कहीं और मिलने के लिए बुला लिया करते थे। इसलिए हम यह मानकर चल रहे थे कि ऐसी कोई ब्रीफिंग है, जिसे हमें रिकॉर्ड नहीं करना है।

किरण रिजिजू जी अरुणाचल के हैं और अरुणाचल को मैं  दुनिया का एक सुन्दर और महत्वपूर्ण  क्षेत्र मानता हूं। हिमालय की दृष्टि से भी और वहां के लोगों के बारे में भी, क्योंकि मैं वहां जा चुका हूं। किरण रिजिजू जी को भी मैं एक अच्छा नेता मानता हूं, लेकिन उनसे मेरा परिचय तो है, पर व्यक्तिगत संबंध इतने नहीं हैं। मुख्तार अब्बास जी से मेरा थोड़ा पुराना परिचय है। मुझे यही प्रलोभन था, वरना मैं कोरोना पीरियड में थोड़ा डर से कहीं भी जाने से बचता रहा हूं। लेकिन गया तो पहले तो अनौपचारिक बात होती रही कि कैसा है, क्या है? मेरा भी था कि इस बीच कम्युनिकेशन भी बहुत कम हो गया है और कोई जानकारी भी नहीं मिल पाती... बशर्ते इसलिए गया। अच्छा वहां ऐसे भी लोग थे, जिन्हें रेगुलर रिपोर्टिंग करनी है, इनमें टीवी के लोग भी थे और कुछ और थे। जयंत  घोषाल जी थे, जिन्हें मैं काफी पहले से जानता हूं। वे आनंद बाजार में रहे हैं। वे हाल में ममता बनर्जी के विशेष  सलाहकार भी रह चुके हैं। वहां प्रफुल्ल केतकर जी भी थे, जो संघ पत्रिका ऑर्गेनाइजर के संपादक हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे पत्रकार अलग-अलग भाषा व एजेंसी से थे। हालांकि वहां यह बात की गई, जिसे शिकायतें भी कह सकते हैं कि कवरेज में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं। सरकार की ओर से जो कम्युनिकेशन गैप है, उस बात को भी रखा गया। इसके बाद किरण रिजिजू जी ने अरुणाचल प्रदेश को लेकर बातें भी की। लेकिन इन सबके बीच मेरी रुचि चीन के विषय पर सबसे ज्यादा थी, पर इस पर ज्यादा बात नहीं हुई। हालांकि वहां जो संवाददाता थे, उन्हें भी लगा कि ये ऑफ द रिकॉर्ड है और यहां कोई बाइट देने वाले नहीं है, लेकिन बाहर निकलने के बाद शायद रिजिजू जी ने किसी टीवी चैनल को कोई एक-आध बाइट दी थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि वह किस चैनल से थे।

पिछले साल जून की थी ये बैठक और अब मार्च चल रहा है। अब एक रिपोर्ट आती है जिसमें कहा जाता है कि जिस मीटिंग में आप थे, उसको आधार बनाया गया है। इस रिपोर्ट में पहला नाम मेरा लिखा गया है कि जो मेरे लिए बहुत ही ज्यादा शॉकिंग है। मतलब वो रिपोर्ट, जिसमें मुझे ये तक बताया नहीं गया कि ऐसा कोई कम्युनिकेशन, जो सरकार की पॉलिसी पर बात करने के लिए है, या किस उद्देश्य के लिए बुलाया गया है। मुझे तो बस यही बताया गया था कि आपसे मिलना है। यदि सरकार की ओर से इसे रिकॉर्ड भी किया गया है, तो उसमें देखा जा सकता है कि मैंने तो वहां सलाह देने के बजाय बस शिकायत ही की है वह भी सरकार के कम्युनिकेशन गैप की। और यदि ऐसा कहा तो यह बात तो वैसे ही सरकार के हित में ही होगी, क्योंकि कम्युनिकेशन गैप से नुकसान तो सरकार को ही हो रहा है, मेरा नहीं।

हालांकि इस तरह की बातों को रिपोर्ट किया गया है कि ये मीटिंग सलाह के लिए की गई थी। यह रिपोर्ट 97 पेजों की है, जिसे पूरा तो मैंने भी अभी तक नहीं पढ़ा है, लेकिन जितना पढ़ा है कि उसमें कई और लोगों के नाम भी दिए गए है, जो दूसरे नेता-मंत्री मिले हैं उन्होंने क्या बोला वो सब दिया गया है, लेकिन सिवाय मेरी बात के... क्योंकि शायद उन्हें लगा होगा कि मेरे विचार कमजोर हैं और उसका कोई मतलब नहीं है। इसमें कुछ ऐसे नाम दिए गए हैं, जो मुझसे करीब बीस साल बाद आए होंगे, जो एडिटर्स भी नहीं है, शायद वे किसी और क्षेत्र के हो सकते हैं। उन्होंने क्या बोला, इस रिपोर्ट में उनकी राय दी गई है। लेकिन मैंने क्या अच्छा या बुरा बोला, वो नहीं है।

रिपोर्ट में किरण रिजिजू जी के यहां जो 26 जून 2020 को पहली मीटिंग का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया है कि लगभग 75 प्रतिशत मीडियाकर्मी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व से प्रभावित हैं और बीजेपी के साथ वैचारिक रूप से जुड़े हुए हैं। अब इस रिपोर्ट में वे 75 प्रतिशत वे किसे मानते हैं, ये मैं नहीं जानता। मैं अच्छा-खराब जैसा भी हूं, लेकिन  अब तक किसी पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं हूँ |  इसलिए रिपोर्ट में वे ये तो मानते ही हैं कि वहां 25 प्रतिशत लोग उनकी राय से अलग थे। मंत्रिमंडल समूह की रिपोर्ट में  कुछ अन्य बैठकों में शामिल सम्पादकों या पत्रकारों के नाम के साथ उनके विचार या सुझाव लिखे गए हैं | जबकि रिज्जूजी के निवास पर हुई चर्चा में किसने क्या कहा , लिखा ही नहीं गया | मतलब साफ़ है कि वह बातचीत मीडिया नीति के लिए नहीं थी |

हां, इस बात को मैं कहता हूं कि मेरे सत्ताधारी या विपक्ष के कई नेताओं  मंत्रियों से पहले भी अच्छे संबंध थे और आज भी हैं। संबंध अच्छे हो सकते हैं। मानवीय ढंग से संबंध तो मेरे बीजेपी में भी हैं, कांग्रेस में भी हैं, और जनता दल , समाजवादी पार्टी जैसे अन्य दलों से रहे हैं  है। वह अलग बात है, लेकिन यह प्रचार पूरी तरह गलत है कि मंत्रिमंडल समूह ने मुझसे नीति निर्धारण के लिए किसी औपचारिक सरकारी बैठक में कोई सलाह ली |  मैंने अपनी आपत्ति ‘कारवां’ मैगजीन, जिसने सबसे पहले ये रिपोर्ट प्रकाशित की, उनके एडिटर अनंत नाथ जी को भी दर्ज कराई कि मेरा नाम प्रकाशित करने  से पहले मुझसे पूछा जाना चाहिए था |  तो उन्होंने कहा कि शायद मेरे रिपोर्टर ने आपसे बात की होगी। तब मैंने उनसे कहा कि  नहीं मुझसे किसी ने बात नहीं की , आप मुझसे सीधे पूछते कि क्या आप इस सलाह वाली मीटिंग में गए थे, तो मैं साफ-साफ आपको बता देता कि मुझसे कोई सलाह नहीं ली गई, लेकिन मैं मीटिंग में गया था।  आप सबकी सलाह से कोई कम्युनिकेशन पॉलिसी बनने वाली है, इसलिए राय ली जा रही है ऐसा कुछ नहीं बताया गया था। हां, और लोगों को बताई गई तो मुझे पता नहीं | इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार रवीश तिवारी जी ने भी अपनी रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट लिखी छापी है |

आखिर सरकार की चिंता क्या हो सकती  है और इन बैठकों और रिपोर्ट का क्या उद्देश्य हो सकता है ?

इस बात पर सरकार में चिंता होना स्वाभाविक है। हर सरकार में ये होता है कि मीडिया हमारा विरोध करता है, मीडिया हमारी आलोचना करता है। यहां, इमरजेंसी की ही बात नहीं कह रहा हूं, इमरजेंसी से पहले भी सरकार चिंतित रहती थी। इंदिरा गांधी के समय में भी यह था कि मीडिया क्यों नाराज है, क्यों खिलाफ आ रहा है, क्या कारण हैं? पहले भी कुछ ऐसे संपादक होते थे, जो सरकार के अनुकूल रहते थे। कभी कोई पत्रकार रहा, कभी कोई सलाहकार रहा, तो कुछ ऐसे भी रहे, जो राजनीति में चले गए। उनसे भी पूछा जाता था कि क्यों नाराज हैं मीडिया के लोग।

आज तो हर कोई अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म खोल लेता है, सोशल मीडिया पर चैनल खोल लेता है, अखबार निकाल लेता है। हालांकि मुझे तो किसी ने नहीं बताया, लेकिन अब जो मैं समझ पा रहा हूं, उससे तो ये लगता है कि कुछ ऐसे लोगों ने राय दी होगी कि कोई ऐसी पॉलिसी बनाइए, जिससे जो गड़बड़ हो रहा है, अनियंत्रित हो रहा है उस पर कुछ विचार करना चाहिए। शायद इसलिए मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई होगी। हां, सरकार का आशय मैं मानता हूं कि ठीक होना चाहिए। सरकार उसको किस ढंग से रखती है, वो उसका अपना एक तरीका है। इसलिए शायद इस रिपोर्ट को लाया गया हो। रिपोर्ट में यही है कि ऐसा हो सकता है, ऐसा किया जाना चाहिए। यही बताया गया है।

कुछ मीडिया संस्थानों का कहना है कि यह मीटिंग सरकार की छवि को चमकाने के लिए की गई थी, इस बारे में आपका क्या कहना है?

देखिए, जो अलग-अलग मंत्रियों ने बात की, उस मीटिंग में भी उसका डायरेक्ट हवाला नहीं था। वो तो लोग पूछते हैं न कि सरकार की किन चीजों में आपको कमी दिखती है। कई और बातें भी आती है। कई बार नाराजगी वाली बातें भी आती हैं, जैसा कि अनौपचारिक बातचीत में होता है। मैंने चीन का उदाहरण दिया। हो सकता है कि इस सरकार में भी कुछ लोगों को बुलाते होंगे, लेकिन जैसा होना, चाहिए वैसा नहीं हो रहा है। लेकिन ये चमकाने वाली बात तो निगेटिव से ही आती है। जब निगेटिव बातें बताई जाएंगी, तभी तो सरकार जागेगी। मेरा आज भी ये कहना है कि मीडिया में 80-90 प्रतिशत लोग बहुत अच्छे ढंग से काम करते हैं। लेकिन जब 10-20 प्रतिशत गड़बड़ होता है, तो लोग उसे ही ज्यादा देखना पसंद करते हैं। लेकिन जो अच्छा काम कर रहे हैं, लोग उसे भी देखना चाहते हैं। पहले अखबारों में पार्लियामेंट के सवालों पर पूरा पेज छपता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। इसलिए सरकार की चिंता स्वाभाविक  है। उनके जो मंत्री होते हैं, उनकी ये जिम्मेदारी है कि वे जो अच्छा काम करें, वो बताएं। इसके लिए पारदर्शिता होना चाहिए |

इस पूरे मामले पर रिपोर्ट के आलोचकों को लेकर आप क्या कहना चाहते हैं? 

मैं नहीं जानता सरकार ने इस रिपोर्ट को जारी करके पब्लिक किया या नहीं किया। यदि किया तो ये भी अपने आप में एक गलती है कि सरकार ने सही ढंग से उसको पेश कर दिया होता, तो ये सवाल नहीं उठ रहा होता। इसलिए आलोचकों का आलोचना करना लाजिमी है। मेरा मानना हर सरकार छवि चमकाने क लिए या फिर बिगड़ी हुई छवि को सुधारने के लिए प्रयास करती है। सोचती है कि क्या करना चाहिए। मनमोहन सिंह जी भी करते थे। मेरे संबंध उनसे भी अच्छे थे और इससे पहले जो भी प्रधानमंत्री रहे हैं, उनसे भी अच्छे थे। मेरा ज्यादातर प्रधानंत्रियों से संपर्क रहा है, इसलिए मैं मानता हूं कि बुराई करने वाले लोग भी होते थे। सरकार को पहले भी ये चिंता होती थी कि उनकी आलोचना क्यों हो रही है? इसलिए इस सरकार ने यदि इसे जारी किया, तो इस पर आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि उसमें ऐसी सिफारिशों का उल्लेख है, जिसके कुछ नियम कानून ऐसे बता दिए गए, जिसे मैं भी उचित नहीं मानता और इसकी आलोचना भी करता हूं। सिफारिश  में  कहा गया कि पत्रकारों की तीन श्रेणी बांट दी जाएं। साथ ही यह भी कहा गया कि यह प्रक्रिया कलर कोडिंग के जरिए शुरू की जानी चाहिए। हरा: फेंस सिटर (जो किसी का पक्ष नहीं लेते), काला: जो हमारे खिलाफ हैं और सफेद: जो हमारा समर्थन करते हैं और यह भी कहा गया कि हमें अपने पक्षधर पत्रकारों का समर्थन करना और उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए।

मैं आलोचकों की बात से सहमत हूं। लेकिन कहना चाहूंगा कि सरकार को आचार संहिता बनानी चाहिए और उसे सही ढंग से लागू करना चाहिए। ये नहीं कि उसे जबरन लागू करे और सजा दे। आलोचकों को भी ये सोचना चाहिए कि आचार संहिता को पारदर्शी ढंग से किस तरीके से लागू किया जा सके। जो गलत है, वो गलत है, लेकिन पूरी रिपोर्ट को गलत कह देना भी गलत है। अब यह कह दो कि सरकार ताला लगाना चाहती है, सरकार गला घोटना चाहती है, सरकार बंद करना चाहती है, ये कह देने से हमारी खुद की भी कमजोरी साबित होती है कि हम कुछ गलत कर रहे हैं। हम यदि कुछ गलत नहीं कर रहे हैं तो कानून लागू करने दीजिए। ऐसे भी डरने से क्या होगा, जो सच है उसकी रिपोर्ट तो लिखना बंद नहीं कर देंगे हम।

क्या संपादक या पत्रकार सरकारों को सलाह देते रहे हैं और अब भी देते हैं?

अभी का तो मुझे कोई मालूम नहीं कि कौन सलाह देते हैं। लेकिन हां, कई ऐसे पत्रकार रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के साथ कभी संपर्क में रहे हों या पार्टी से प्रभावित रहे हों। उदाहरण के तौर पर श्रीकांत वर्मा, जो पहले इंदिरा गांधी के भाषण लिखते थे, बाद में राजीव गांधी के लिखते थे और वे पत्रकार भी रहे। उस समय भी पत्रकारिता करते थे। ऐसे ही एक और उदाहरण चंद्रूलाल चंद्राकर का है, जो पहले संपादक थे, बाद में कांग्रेस नेता हुए। बीजेपी में अरुण शौरी जैसे नाम हैं। कुलदीप नायर जी लाल बहादुर शास्त्री के साथ रहे, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से पत्रकारिता में आ गए। बीजी वर्गीज जी इंदिरा गांधी के साथ रहे। एचके दुआ जी भी एक उदाहरण हैं, जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के भी प्रेस सलाहकार थे और देवेगौड़ा जी के प्रेस सलाहाकार थे। मैं उनका सम्मान करता हूं वे जब इनके साथ थे, तो उन्होंने पत्रकारिता से इस्तीफा दे दिया था। एमजे अकबर भी जब चुनाव लड़ने गए थे तो उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया था। कई लोग ऐसे भी थे जो संपादक रहते हुए सलाह भी देते थे। राजेंद्र माथुर जी, जिनके घर कई बड़े मंत्री भी आते थे, लेकिन फिर वे ये नहीं कहते थे कि इनके खिलाफ नहीं लिखना या उनके खिलाफ नहीं लिखना। मनोहर श्याम जोशी जी के अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काफी अच्छे संबंध थे, वो फिर पूछा करते थे कि क्या चल रहा है, तो वे यही कहते थे कि आप रिपोर्ट पढ़ लीजिए, आपकी पार्टी सही नहीं कर रही है या ये गड़बड़ हो रहा है। हर बात को सलाह तो नहीं कहा जा सकता, कुछ व्यक्तिगत राय भी होती है।अटलजी से मेरा परिचय 1972 से था | 1977 में विदेश मंत्री और बाद में प्रधान मंत्री बनने तक कई बार इंटरव्यू किये , ऑफ़ द रिकार्ड बात की | लेकिन उनके मुखौटा होने वाली गोविंदाचार्य की डायरी के अंश या सरकार की कमियों पर मैंने बराबर लिखा |

आपने तो कई सरकारों के समय काम किया है? क्या आज की तरह उनके भी नजदीक नहीं माने जाते थे?

बिल्कुल, मैं तो कह ही रहा हूं। जब मैं संपादक था, तो मेरा कई मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से व्यक्तिगत परिचय रहा है। मैं उनको कार्यक्रमों में बुलाता भी था। मेरा परिचय नरसिंह राव से लेकर के अटल बिहारी वाजपेयी तक से रहा है। राजीव गांधी  के प्रधान मंत्री बनने से पहले भी परिचय था , उनके साथ बातचीत यात्रा के अवसर भी मिले | उनको मुझ पर भरोसा था, छापने को लेकर भी और न छापने को लेकर भी। मनमोहन सिंह के समय भी कई ऐसी मीटिंग्स हुई, जिसके वीडियो बार-बार चलाए जाते रहे हैं कि पांच संपादकों को बुलाया गया, जिनमें से  आलोक मेहता भी एक थे। बाहर जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती थीं, वे बातें बताने वालों में मैं भी एक था। मैं सलाहकार तब भी मनमोहन जी का नहीं था। उन्हीं की सरकार के समय जब मैं नईदुनिया अखबार का प्रधान संपादक था, तब मैंने 2जी पर सीरीज चलाई थी और बताया कि कैसे हर रोज बुधवार को 11 बजे अनिल अंबानी प्रधानमंत्री कार्यालय में आते हैं और 2जी की लंबी-2 रिपोर्ट विनोद अग्निहोत्री जी लिखते थे। जिम्मेदारी एक संपादक की होती है, लिहाजा मेरे खिलाफ नोटिस भी आए थे।

जब 1990 में सबसे पहले हमने चारा कांड को लेकर खबरें छापीं, तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव के समर्थकों ने टाइम्स ऑफ इंडिया प्रेस तक में आग लगा दी थी, लेकिन जब वह मेरे दफ्तर में आए तो मैंने उनका स्वागत किया और चाय-नाश्ते की व्यवस्था कराई। एडिटर्स गिल्ड की ओर से भी उस समय कोई स्टेटमेंट जारी नहीं हुआ था। कहने का मतलब है कि संबंध अपनी जगह हैं और काम अपनी जगह। लालू यादव जी के परिवार में शादी समारोह में मैं गया हूं, या आलोचना लिखने के बावजूद आडवाणी जी मेरे यहां शादी समारोहों में आए हैं। मुलायम सिंह और सोनिया गांधी के बारे में भी मैंने काफी कुछ लिखा है, लेकिन मेरे व्यक्तिगत संबंध भी उनसे अच्छे रहे हैं। आज की सरकार की बात करें तो मुझे लगता है कि स्थायित्व की सरकार है और उनकी कई नीतियों को मैं उचित मानता हूं। हालांकि, कई मामलों में मै उनकी आलोचना भी करता हूं। जब लोग मुझसे पूछते हैं कि आपको मनमोहन सरकार में पदमश्री मिला, फिर आप उस सरकार की आलोचना क्यों करते हैं तो मेरा कहना होता है कि मैं तो अपना काम करता हूं, उसका पुरस्कार से कोई लेना-देना नहीं है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के निवास पर एक समारोह में निखिल चक्रवर्ती , कमलेश्वर जैसे वरिष्ठ सम्पादकों के साथ मुझे पुरस्कार के साथ सम्मान दिया गया था | लेकिन बाद  मैंने पूरी किताब लिख दी कि ‘राव के बाद कौन?’ इसमें मैंने बताया कि राव के बाद कौन प्रधानमंत्री हो सकते हैं। मनमोहन सिंह के खिलाफ भी मैंने कई आलोचनात्मक टिप्पणी लिखीं, इसके अलावा उस समय कई मंत्री भी मेरे दफ्तर आते थे, इसका मतलब यह कतई नहीं था कि मैं उनके खिलाफ नहीं लिखूंगा। जब मैंने दिल्ली में नई दुनिया की लॉन्चिंग का कार्यक्रम किया था, उस समय मैंने किसी भी मंत्री, गृहमंत्री को मंच पर जगह नहीं दी, गुलजार, शुभा मुद्गल और जावेद अख्तर आदि ने अखबार को जारी कराया। उस समय मैंने कहा भी कि कल को इस अखबार में अतिथियों की गड़बड़ी को लेकर भी खबर छपी दिख सकती है। मेरा मानना है कि व्यक्तिगत संबंध अलग हैं और जरूरी होने पर आलोचना भी होगी, यह एक संपादक का दायित्व है। आजादी के पहले गांधी जी, तिलक जी समेत अनेक  लोगों ने काफी काम किया, उस समय उनका लक्ष्य देश को आजाद कराना था, उस समय की पत्रकारिता दूसरी तरह की थी। आज आजादी को अक्षुण्य रखना, उसे बनाए रखना और लोकतंत्र को बचाए रखना, यही लक्ष्य होना चाहिए। एक समय तहलका कांड के बाद तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को इस्तीफा देना पड़ा था, हालांकि बाद में वह फिर सत्ता में आ गए थे। ऐस में यह गलतफहमी रखना कि आलोक मेहता या किसी और की वजह से सरकार गिर जाएगी अथवा कोई बड़ा चैनल अथवा अखबार सरकार को बदल देगा, निरर्थक है।

अब वह जमाना नहीं है। डिजिटल में भी जिसके बहुत ज्यादा सबस्काइबर्स हों, वह भी ऐसा नहीं कर पाएगा। एक उदाहरण बताता हूं। आपातकाल के दौरान बीबीसी ऐसा प्रसारणकर्ता था, जिसके बारे में लोग मानते थे कि यह ज्यादा सही जानकारी देगा, क्योंकि यहां मीडिया नियंत्रित है, उसके हिंदी के एडिटर थे रत्नाकर  भारती, जो मूल रूप से मध्य प्रदेश के निवासी थे। उस समय बीजेपी व संघ के काफी नेता उनके संपर्क में थे। इसके बाद देश में जनता पार्टी की सरकार आ गई। 1977 में रत्नाकर  भारती से कहा गया कि आप भारत आकर राजनीति में शामिल हो जाइए। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के बड़नगर से विधान सभा का  चुनाव लड़ा, हालांकि जनता पार्टी की लहर में भी उनती जमानत जब्त हो गई थी। कहने का मतलब यह है कि ये सोचना कि सोशल मीडिया पर इतने फॉलोअर्स होने के कारण आप किसी चुनाव में जीत ही जाएंगे, गलत है। किसी पत्रकार को राजनीति में जाना है तो बेशक जाए और चुनाव लड़े लेकिन एक पत्रकार के रूप में यह गलतफहमी पालना कि सरकार गिरा देंगे अथवा बना देंगे, यह हम लोगों का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। 

अब सरकार ने डिजिटल मीडिया के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं? साथ में प्रेस काउंसिल का उल्लेख भी किया है। आप प्रेस काउंसिल के सदस्य और एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष रहे हैं। उनके कोड यानी नियमों का कितना पालन हो रहा है? 

मैं एडिटर्स गिल्ड का अध्यक्ष और महासचिव भी रहा हूं, इसलिए सबसे पहले मैं इसका जिक्र करूंगा। एडिटर्स गिल्ड में रहने के दौरान एक बार मुझे ब्रिटेन जाने का मौका मिला। वहां ब्रिटेन की सोसाइटी ऑफ एडिटर्स के प्रेजिडेंट के साथ मेरी मीटिंग हुई। वहां मेरी उनसे ब्रिटेन के कोड ऑफ कंडक्ट को लेकर चर्चा हुई और उसकी एक प्रति लेकर आया |आने के बाद मैंने अपने यहां एडिटर्स गिल्ड में प्रस्ताव रखा कि हमें भी इस दिशा में काम करना चाहिए और बीजी वर्गीज जी को इसका प्रमुख बनाना चाहिए, जो काफी अनुभवी और वरिष्ठ थे। स्टेट्समेन  केसंपादक  एस सहाय और नव भारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर पहले भी इस मुद्दे पर मुझसे चर्चा करते थे | हमने मामन मैथ्यू , एस निहाल सिंह , कुलदीप नायर जैसे प्रमुख  सदस्य  संपादकों के सुझाव मांगे और एडिटर्स गिल्ड की ओर से इस बारे में पूरी रिपोर्ट तैयार की गई और कोड ऑफ कंडक्ट तैयार किया गया। एडिटर्स गिल्ड के आग्रह पर उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद इस कोड ऑफ कंडक्ट को जारी किया। उस समय इस कोड ऑफ कंडक्ट को अपने संपादक मित्रों और तमाम अखबारों को भिजवाया गया, बाद में इसे वेबसाइट पर भी डलवाया गया। हालांकि, सभी अखबार एडिटर्स गिल्ड के मेंबर भी नहीं थे। मेरा मानना है कि इस कोड ऑफ कंडक्ट का पालन नहीं हो रहा है। पहले प्रेस काउंसिल के फैसले कुछ अखबारों में छपते भी थे, लेकिन अब प्रेस काउंसिल की कोई परवाह नहीं करता है और उसकी गाइडलाइंस का पालन नहीं होता है। मुझे तो आश्चर्य है कि वर्तमान सूचना प्रसारण मंत्री जावड़ेकर जी कहते हैं कि प्रेस परिषद् के नियमों का सब पालन कर रहे हैं | मेरा मानना है कि सरकार की तरफ से ये जो गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उन्हें कुछ हद तक माना जा सकता है और कुछ चीजों पर असहमति भी हो सकती है, तो उसके लिए अदालत हैं। मैंने अभी इस रिपोर्ट को नहीं पढ़ा है। डिजिटल मीडिया में तमाम अच्छे लोग भी हैं, लेकिन जो लोग इसे उच्छृंखल बना रहे हैं, उन पर लगाम लगनी चाहिए।

अभी आपने पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा का जिक्र किया है। आपकी राय में किस तरह स्वतंत्र मीडिया की लक्ष्मण रेखा लागू होनी चाहिए?

मेरा मानना है कि इसके लिए एक मिला-जुला प्रयास होना चाहिए। फिर चाहे उसमें जुर्माने का प्रावधान ही क्यों न हो। जिस तरह से ब्रिटेन और अमेरिका में कोड ऑफ कंडक्ट है। जैसे- यदि यह सामने आता है कि पुलित्जर अवॉर्ड गलत मिल गया है तो उसे लौटाने के साथ जुर्माना भी देना होता है। मेरा मानना है कि आचार संहिता होनी चाहिए, उसे लागू किया जाए, लेकिन सरकार उसमें इमरजेंसी की तरह सेंसरशिप न लगाए। मेरा मानना है कि जब हम अधिकार मानते हैं तो हमें उत्तरदायित्व भी मानना चाहिए। जहां तक स्वतंत्र मीडिया की लक्ष्मण रेखा की बात है तो इसके लिए पहले की तरह मीडिया आयोग और  मीडिया काउंसिल (जिसमें पूरी मीडिया को शामिल किया जाए) बनाई जाए,  जिसे  वैधानिक मान्यता हो और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हो। इसमें न्यायाधीश, मीडिया के अनुभवी वरिष्ठ व्यक्ति हों। उनके आदेश का पालन अनिवार्य हो | इससे आचार संहिता लागू करना आसान होगा।

यहां मैं आपको बता दूं कि अगले महीने मेरी एक नई पुस्तक ‘पावर प्रेस एंड पॉलिटिक्स’ आ रही है। जैसा कि मैंने बताया कि उस पुस्तक में मैंने उन सभी उथल-पुथल का जिक्र किया है, जो मैंने अब तक के अपने  50 वर्षों के पत्रकारिता करियर में देखी व महसूस की हैं। यानी इंदिरागांधी के समय से नरेंद्र मोदी के समय तक किस तरह पत्रकारिता हुई है। उस पुस्तक में मैंने एडिटर्स गिल्ड और प्रेस काउंसिल की भूमिका के बारे में भी प्रमाणों और उदाहरणों के साथ बताया है। यहां स्पष्ट कर दूं कि इस पुस्तक में मैंने अपने बारे में कम और अन्य संपादकों के बारे में ज्यादा लिखा है कि कैसे उन्हें तमाम तरह के दबावों का सामना करना पड़ा। एडिटर्स गिल्ड की एक-दो महत्वपूर्ण व चर्चित रिपोर्ट्स को भी इस पुस्तक में शामिल किया गया है।

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टेक्नोलॉजी बिजनेस में पूंजी के दम पर आप दूसरों से आगे नहीं निकल सकते: नवीन तिवारी

‘इनमोबी और ग्लांस’ (InMobi & Glance) के फाउंडर और सीईओ नवीन तिवारी को ‘एक्सचेंज4मीडिया इन्फ्लुएन्सर ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड 2020 से सम्मानित किया गया है।

Last Modified:
Monday, 08 March, 2021
NaveenTiwri5

‘इनमोबी और ग्लांस’ (InMobi & Glance) के फाउंडर और सीईओ नवीन तिवारी को ‘एक्सचेंज4मीडिया इन्फ्लुएन्सर ऑफ द ईयर’ (exchange4media Influencer of the Year Award) अवॉर्ड 2020 से सम्मानित किया गया है। शुक्रवार को आयोजित एक कार्यक्रम में नवीन तिवारी को यह अवॉर्ड दिया गया।

इस कार्यक्रम के दौरान नवीन तिवारी और ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के बीच सवाल-जवाब का दौर भी चला। इस दौरान, इनमोबी (InMobi) के लिए पिछले 12 महीने किस तरह से बीते, पिछले पांच वर्षों में क्या चुनौतियां रहीं और इंडस्ट्री को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, समेत तमाम बिंदुओं पर चर्चा हुई।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश

सवाल: निजी और प्रोफेशनल तौर पर पिछले 12 महीने आपके लिए कैसे रहे हैं?

जवाब: पिछले 12 महीनों में जो हुआ है, उससे दुनिया में सभी चीजें काफी प्रभावित हुई हैं। इस दौरान लोगों को तमाम तरह की शारीरिक व मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा है, लेकिन बतौर इंसान अब हम सभी इस मुसीबत से बाहर आ गए हैं। इस दौरान हम सभी अलग-अलग तरह से आगे बढ़े  हैं। अपने बिजनेस की बात करूं तो डिजिटल में इस दौरान काफी विकास हुआ है। मानव समाज और व्यक्ति के रूप में हमारा विकास उससे भी कहीं अधिक तेजी से हुआ है, जिसे यहां तक आने में एक या दो दशक लगे होंगे। चाहे पर्यावरण, परिवार और स्वास्थ्य का महत्व समझने की बात हो या उनमें संतुलन बिठाने की बात हो, काफी हद तक हम सभी लोगों की समझ में आई है और उम्मीद है कि लंबे समय तक हम लोग इस बात को समझेंगे। ऐसा लगता है कि प्रकृति के पास सिस्टम को सही करने के अपने तरीके हैं और यह इस दिशा में प्रकृति का काफी बड़ा कदम है। व्यक्तिगत रूप से अपनी बात करूं तो इन महीनों में मेरी सोच में काफी महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं और जीवन जीने के तरीकों में काफी बदलाव आया है। उम्मीद है कि आगे काफी अच्छा होगा।

बेशक, पिछले 12 महीने काफी मुश्किल थे। हमने सोचना शुरू कर दिया था कि निजी तौर पर और प्रोफेशनल तौर पर आगे क्या होगा। तमाम लोगों का कहना था कि यदि आपको बिजनेस चलाना है तो स्टाफ कम करना होगा और खर्चे घटाने होंगे। लेकिन हमने तय कर लिया कि हम अपने किसी भी एम्प्लॉयी को नहीं हटाएंगे। लोगों को परेशानी में डालने के बजाय हमने उन्हें पेमेंट करने का फैसला किया। कंपनी में सभी स्वेच्छा से वेतन कटौती पर सहमत थे। व्यावसायिक रूप से कोई भी उद्धम नहीं चल सकता, यदि उसे सही से न चलाया जाए। मुझे इस बात पर काफी गर्व हुआ कि लोग अपने लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे के लिए मिलकर साथ खड़े थे। तमाम मुश्किलों के बावजूद पिछले 12 महीनों के मुकाबले आज हम काफी अच्छी स्थिति में हैं।

सवाल: प्रॉडक्ट्स को तैयार करने और नए बाजार तैयार करने में पिछले पांच वर्षों में आपको किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

जवाब: वास्तविकता में हर उद्धम यात्रा सफल नहीं होती है। कुछ ही सफल होती हैं और तमाम असफलताओं के बाद होती हैं। पिछले पांच वर्षों में एक कंपनी के रूप में हम काफी विकसित हुए हैं। शुरुआत में हमारा बिजनेस डिजिटल एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में था। उस समय बिल्कुल साफ था कि गूगल और फेसबुक जिस तरह से मार्केट में काम कर हे हैं, वे इसे टेकओवर कर लेंगे। निवेशकों ने अपने कदम वापस खींच लिए और हमारे लिए इन बड़ी कंपनियों से मुकाबला मुश्किल था। वहां से हमने अपने लिए एक अलग ही रास्ता निकाला, जो दूसरे स्टार्टअप्स से अलग था। हमने कहा कि एक स्टार्टअप होने के बावजूद हमें यह अधिकार नहीं है कि हम लगातार पैसा फूंकते रहें। हमें सबसे पहले एक टिकाऊ बिजनेस शुरू करना होगा। इसके बाद एक साल में हम लाभकारी कंपनी बन गए और तब से बने हुए हैं। इससे हमें काफी आजादी और खुशी मिली है। हम तमाम मीडिया से दूर चले गए। हमें मीडिया से ज्यादा चर्चा नहीं मिली, लेकिन कंपनी के अंदर हमें काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला और इस दौरान हमने कई कड़े फैसले लिए। बिजनेस न्यूज में बने रहने के लिए नहीं बल्कि कस्टमर को सर्विस देने के लिए हम हैं। भारत में एक उद्यमी के रूप में, बहुत तेजी से आगे बढ़ने की अपनी चुनौतियां हैं और तमाम नए उद्यमियों को इससे बहुत सावधान रहना चाहिए।

दूसरी बड़ी बात कि हमने इनोवेशन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। सच्चाई यह है कि टेक्नोलॉजी बिजनेस में पूंजी के दम पर आप दूसरों से आगे नहीं निकल पाएंगे, बल्कि आगे बढ़ने और दूसरों से अलग दिखने के लिए इनोवेशन पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। हमने तीन बड़े इनोवेशन किए। इनमें पहला एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में था। वर्ष 2015 में अमेरिका में हमारा बिजनेस पांच से 10 प्रतिशत था, जो अब 60 प्रतिशत तक बढ़ गया है। हमने अपने कोर बिजनेस पर इनोवेशन किया इसके बाद हमने कंज्यूमर बिजनेस पर इनोवेशन शुरू कर दिया। हमने इसे अपनी आय से फंड दिया, जो काफी मुश्किल था। इसके बाद हमने ‘ग्लांस’ (Glance) नाम से एक कंज्यूमर प्लेटफॉर्म तैयार किया। इसे 10 से भी कम लोगों के साथ पूरी तरह इनहाउस तैयार किया गया था। हमने फिर से परिभाषित किया कि लॉक स्क्रीन क्या करने में सक्षम है और आज यह इस दिशा में सबसे बड़ा कंटेंट प्लेटफॉर्म है, जिसका हम सभी इस्तेमाल करते हैं।

सवाल: क्या स्टार्टअप के गुणों को अब भी बरकरार रखते हुए इनमोबी (InMobi) आगे बढ़ रही है?

जवाब: हम नक्शे पर देश को बहुत ही महत्वपूर्ण तरीके से पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। तमाम लोग बहुत जल्दी आत्मसंतुष्ट हो जाते हैं। मेरे लिए, स्टार्टअप का मलतब सीखना, जिज्ञासु बने रहना और काम को तेजी से करते हुए आगे बढ़ना है। मुझे उम्मीद है कि हम इसी मानसिकता के साथ स्टार्ट-अप के रूप में बने रहेंगे और तेजी से आगे बढ़ते रहेंगे।

सवाल: ऐसी कौन सी चीजें हैं जो इनमोबी और ग्लांस को बाधित कर रही हैं?

जवाब: पिछले साल, हमने पांच सेक्टर्स पर दांव लगाया था। विज्ञापन के नजरिये से हमने इन पर कभी फोकस नहीं किया। हमने गेमिंग, प्रॉडक्टिविटी, फिन-टेक जैसे नए सेक्टर्स को देखना शुरू किया। हमने ऐसे सेक्टर्स को चुना जो हमारे रेवेन्यू में 5 प्रतिशत योगदान दे रहे थे, लेकिन आज वे हमारे बिजनेस में लगभग 60-70 प्रतिशत का योगदान देते हैं। तीन महीनों के दौरान, हमने थोड़े-बहुत ऐसे बदलाव देखे हैं, जिससे कारोबार में बदलाव हुआ है। जब जुलाई, 2020 में कारोबार फिर से शुरू हुआ, तो हमने इसका फायदा उठाया।

सवाल: क्या आपको लगता है कि देश में एडवर्टाइजिंग अथवा अन्य व्यवसायों में ज्यादा प्रॉडक्ट आधारित कंपनियां आएंगी? एक एंटरप्रिन्योर के रूप में आपकी वैश्विक तौर पर क्या महत्वाकांक्षाएं हैं?

जवाब: आने वाले समय में हमें देश में ज्यादा प्रॉडक्ट कंपनियां देखने को मिलेंगी, खासकर सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में। सॉफ्टवेयर क्षेत्र में तमाम कंपनियां तैयार हो रही हैं, क्योंकि देश यह जान चुका है कि कैसे हाई क्वालिटी की ‘बाजार केंद्रित रणनीति’ (go-to-market) तैयार कर सकते हैं। इस रणनीति को दूर से ही किया जा सकता है।

यदि आप भारत में कोई कंज्यूमर कंपनी तैयार कर सकते हैं तो आप उस बिजनेस को साउथ ईस्ट एशिया अथवा मिडिल ईस्ट में पांच गुना तक बड़े रूप में देख सकते हैं। अचानक आपके बिजनेस का स्कोप बदल सकता है। सच्चाई यह है कि भारत में लोग बहुत हैं, लेकिन मार्केट छोटा है। यहां पर सिर्फ 27 प्रतिशत लोगों के पास ही भुगतान करने की क्षमता है। यदि कंज्यूमर बिजनेस साउथ ईस्ट एशिया और मिडल ईस्ट की तरफ देखते हैं तो वे भारत में लंबा गेम खेल सकते हैं। हम चीन और अमेरिका की तरह नहीं हैं जो काफी भुगतान करेंगे और आप एक स्थायी बिजनेस तैयार कर लेंगे। बिजनेस में स्थिरता तभी आती है, जब आप कुछ दूसरे बिजनेस भी करते हैं।

सवाल: एक इंडस्ट्री के तौर पर हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

जवाब: डिजिटल अब प्राइम टाइम हो गया है और एक साल में काफी बढ़ गया है। लगभग हर कोई ओटीटी की ओर शिफ्ट हो गया है। यह बदलाव तेजी से हुआ है और डिजिटल की यह छलांग असाधारण है। दूसरी छलांग जो अभी हुई है और हो रही है वह AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। हर कोई इस शब्द का उपयोग तो करता है, लेकिन कई इसे समझ ही नहीं पाते हैं। अगर भारतीय व्यवसायों को सफल होना है, तो उन्हें अपने कस्टमर्स की हर जरूरत को पूरा करने के लिए एआई को गले लगाना होगा। यदि डिजिटाइजेशन के साथ एआई को मिला दिया जाए, तो इसके बाद आप दो साल में ही सफलता के खेल को जीत जाएंगे।

सवाल:आप किन लोगों से सलाह लेते हैं?

जवाब: मेरा मानना है कि आपको सभी लोगों के साथ बातचीत कर उनसे सीखना चाहिए। मेरी पूरी मैनेजमेंट टीम इस बारे में काफी खुले विचारो की है जो लोगों से सलाह लेती है। हमारे देश में टाटा-बिड़ला, इंफोसिस, महिन्द्रा और अंबाने से लेकर तमाम सफल एंटरप्रिन्योर्स हैं। उन्होंने इतने वर्षों में काफी असाधारण बिजनेस तैयार किया है। बेशक, इनमें से तमाम लोग एक ही बिजनेस में नहीं हो सकते हैं, लेकिन बिजनेस के मूल सिद्धांत तो वही होते हैं। इन लोगों से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मैं तमाम इंटरनेशनल कंपनियों से बात करता हूं, जो बिल्कुल अलग तरीके से सोचती हूं। जैसे-हम माइक्रोसॉफ्ट और गूगल के काफी करीब हैं। हम उनके साथ ज्यादा समय गुजारने का प्रयास करते हैं, ताकि हम उनसे कुछ सीख सकें।

एक ऑर्गनाइजेशन के रूप में इनमोबी महिलाओं के लिए क्या कर रही है, खासकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में?

महिलाओं के डेडिकेशन और प्रतिबद्धता की किसी से तुलना नहीं की जा सकती है। मुझे लगता है कि हमने इस दिशा में कम काम किया है, लेकिन अभी भी हमारे कार्यबल में 38 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। एक समय ऐसा था जब हमारी कंपनी का प्रत्येक वैश्विक क्षेत्र (global region) महिलाओं द्वारा चलाया जाता था। आज भी चीन में हमारे कुछ प्रमुख बिजनेस पिछले नौ वर्षों से महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। हमारा एशिया बिजनेस भी महिलाएं चलाती हैं। हमारी कंपनी में तमाम महिलाएं शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं और हम उन पर गर्व महसूस करते हैं।

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योगी आदित्यनाथ ने मीडिया की भूमिका को बताया अहम, गिनाईं सरकार की उपलब्धियां

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा  ने पिछले दिनों लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तमाम पहलुओं पर चर्चा की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 30 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 30 December, 2020
Yogi

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने पिछले दिनों लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान डॉ. अनुराग बत्रा ने योगी आदित्यनाथ से निवेश को आकर्षित करने, नई नौकरियों के अवसर पैदा करने और भ्रष्टाचार को खत्म करने जैसे तमाम बिंदुओं पर बातचीत की। इस बातचीत के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री से यह भी जानना चाहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की क्या उपलब्धियां रही हैं और देश के इस सबसे बड़े प्रदेश के लोगों के भविष्य के लिए राज्य सरकार के पास क्या योजनाएं हैं?  प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश: 

आपकी सरकार की क्या उपलब्धियां रही हैं, इस बारे में कुछ बताएं?

-हम पिछले नौ महीनों के दौरान और अपनी सरकार के लगभग 45 महीनों के कार्यकाल में प्रदेश के लोगों के जीवन और उनकी आजीविका की देखभाल में व्यस्त रहे हैं।  

- सबसे पहले राज्य में शिक्षा व्यवस्था की बात करते हैं। ऑपरेशन ‘कायाकल्प’ के तहत एक लाख से अधिक बेसिक स्कूलों को संसाधन योग्य बनाया गया है। स्कूल और यहां पढ़ने वाले बच्चे डिजिटल रूप से पढ़ाई का लाभ उठा रहे हैं। स्मार्ट क्लासेज, रिपोर्ट कार्ड्स जैसी तमाम नई पहल सरकारी पोर्टल ‘URISE’ (Unified Re-imagined Innovation for Students Empowerment) द्वारा की जा रही हैं। 

-स्कूलों में नामांकन कराने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। स्कूली बच्चों को मुफ्त में यूनिफॉर्म्स, स्कूल बैग्स, स्वेटर्स, जूते और मोजे दिए जाते हैं।

-सरकारी पद खाली पड़े हुए थे, अब सभी नियुक्तियां की जा रही हैं। लगभग चार लाख सरकारी पदों पर चयन पूरा हो गया है। स्कूलों में 1.5 लाख से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। पुलिस, बेसिक शिक्षा और उच्च शिक्षा जैसे संवर्गों में मेरिट के आधार पर भर्तियां की जा रही हैं। 

-कोविड महामारी के दौरान लोगों की जिंदगी और उनके रोजगार की रक्षा की गई है और राज्य में बड़े पैमाने पर नौकरियों का सृजन हुआ है।  

कृपया कुछ उदाहरण देकर समझाएं?

-हमने बंद मिलों को फिर से खोलकर इंडस्ट्री को पुनर्जीवित किया है और कुछ नई भी खोली हैं। हमने बिना देरी किए सभी भुगतान किए हैं।

-ODOP (One District, One Product) जैसे अभिनव प्रयासों ने स्थानीय शिल्प को प्रोत्साहित किया और केंद्र सरकार ने भी इसकी सराहना की है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) को बढ़ावा और समर्थन दिया जा रहा है।

-बड़े पैमाने पर लोन भी दिए गए हैं। अगले चार से पांच वर्षों में कम से कम 25 लाख अतिरिक्त नौकरियां पैदा होनी हैं।

-इन्वेस्टर समिट का भी सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। बिजनेस करना आसान बनाने वाले राज्यों की लिस्ट में उत्तर प्रदेश को दूसरा स्थान मिला। हमने अपनी निवेश नीतियों में संशोधन किया और निवेशकों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम (एकल खिड़की प्रणाली) तैयार की है। निवेश के बारे में संपूर्ण जानकारी और सहायता के लिए संपर्क केंद्र के रूप में Invest Up को तैयार किया गया। 

-नए मार्गों के द्वारा पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गोरखपुर को आपस में जोड़ा गया। गंगा एक्सप्रेस-वे उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार को बढ़ावा देगा। यहां इंफ्रॉस्ट्रक्चर और विकास कार्यों पर पूरा जोर है और उत्तर प्रदेश को निवेश के लिए पसंदीदा स्थान बनाने पर फोकस किया जा रहा है। बुंदेलखंड में डिफेंस एक्सपो से यहां की तस्वीर बदलेगी। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत जल्द ही आत्मनिर्भर बनेगा। इसके अलावा नोएडा में उत्तर प्रदेश का पहला डाटा सेंटर बनाए जाने की संभावना है। फिल्म सिटी यहां आ रही है। ‘नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड’ (NIAL) के तहत जेवर में एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट बनाया जाएगा।

-उत्तर प्रदेश में हमने कोविड-19 की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला है। ‘Direct Benefit Transfer’ (DBT) से लोगों को सीधा लाभ हुआ है।

प्रदेश सरकार की स्टोरी को लोगों को बताने में मीडिया की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?

मीडिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। मैं अपने काम को करने में विश्वास रखता हूं। हमें हमारा काम सकारात्मक भाव से करने दें। जो लोग नकारात्मकता फैलाते हैं, जनता उनकी असलियत से वाकिफ है। ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’।

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ABP नेटवर्क के CEO अविनाश पाण्डेय ने बताया, चैनल्स में किए गए बदलाव से क्या होगा फायदा

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय ने ब्रैंड्स के दर्शकों की पसंद को और बेहतर बनाने, वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में खबरों में बदलाव के साथ कई अन्य पहलुओं पर बात की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 16 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 16 December, 2020
AvinashPandey54

एबीपी नेटवर्क (ABP Network) इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है,  फिर चाहे वह सैफरन ब्रैंड कन्सलटेन्ट्स द्वारा डिजाइन किए गए उसके सभी चैनल्स के लोगो हों, नोएडा के फिल्म सिटी में उसका कॉरपोरेट ऑफिस और स्टूडियो का शिफ्ट हो जाना हो या फिर प्रोग्रामिंग में बदलाव हो... यहां बहुत कुछ बदल रहा है। दरअसल, हाल के दिनों में मीडिया इंडस्ट्री में तमाम तरह के बदलाव देखने मिले हैं, लिहाजा इस बीच कंजप्शन मॉडल भी परिवर्तन के दौर में है, जिसे देखते हुए और खुद कम्प्टीशन से अलग रखते हुए एबीपी नेटवर्क ने अपने सभी चैनल्स की रीब्रैंडिंग की घोषणा की है।

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय के मुताबिक, तमाम चैनल्स में किए जा रहे बदलाव नेटवर्क के सौंदर्यशास्त्र को बदल देगा। उन्होंने कहा कि हम डिजिटल में निवेश कर रहे हैं, फिर चाहे वह पॉडकास्ट हो, वीडियो कंटेंट हो, डिजिटल मीडिया हो, या फिर कुछ और। हम मानते हैं कि यह बदलाव एबीपी नेटवर्क में और अधिक निवेश लाने में मदद कर सकता है।’

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ से एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पाण्डेय ने ब्रैंड्स के नए फोकस एरिया, दर्शकों की पसंद को और बेहतर बनाने, वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में खबरों में बदलाव के साथ कई अन्य पहलुओं पर बात की। इस बातचीत के मुख्य अंश आप नीचे पढ़ सकते हैं-

समग्र ब्रैंड बदलाव के बारे में थोड़ा बताएं, आपने अभी इसे करने का फैसला क्यों किया और रीब्रैंडिंग के दौरान मुख्य बदलाव क्या होंगे?

एक ब्रैंड के तौर पर एबीपी नेटवर्क हमेशा भीड़ से अलग रहा है। एबीपी नेटवर्क की एक नई यात्रा शुरू करने का हमारे लिए यह एक रोमांचक समय है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि COVID-19 संकट ने गिरावट और अवसर दोनों की ही तस्वीरें पेश की हैं, लेकिन अब विपरीत परिस्थितियों में अवसर खोजने की इन चुनौतियों से एबीपी नेटवर्क ऊपर उठ चुका है। हमारा जुनून ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इसी वजह से हम हर चीज जी-जान से करते हैं। यह हमारी विरासत का हिस्सा है और हम इसको हमेशा बनाए रखेंगे।

उन्होंने कहा कि भारत विरोधाभास के अनूठे मोड़ पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के साथ भारत के पास अपार क्षमताएं हैं, लेकिन इसके विपरीत, यहां अवसरों की असमानता और सुलभता के चलते सीमाएं भी हैं। इसीलिए ही हमने इस बदलाव का हिस्सा बनने का फैसला किया है। हम इस महामारी को बदलाव की एक शुरुआत के तौर पर याद करना चाहते हैं, न कि इसे नकारात्मकता के साथ जोड़कर देखना चाहते हैं।

हमारी नई पहचान एबीपी नेटवर्क पर हमारे उद्देश्य को बताती है, जिसका मकसद एक खुला और जानकारीपूर्ण समाज बनाना है, क्योंकि हमारा मानना है कि केवल  एक खुला और जानकारीपूर्ण समाज ही असीमित भारत का निर्माण कर सकता है। हमारी नई पहचान हमारी निडर न्यूज रिपोर्टिंग और असीमित क्षमता का प्रतीक है।

ऊंची उड़ान भरने के लिए हमने खुद को एक दायरे से बाहर निकाला है और असीम आकांक्षाओं के तहत आगे बढ़ने के लिए दर्शको को प्रेरित किया है। हमारी नई पहचान भारत में असीम क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है। हमारे नए लोगो में पेश किया गया तीर का निशान एक स्थायी बुनियादी ढांचे का प्रतीक है, जो तेजी से बदलते मीडिया परिवेश के लिए एकदम अनुकूल है और यह हमारे दर्शकों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। पुराना एबीपी एरो हमारे डिजाइन की कुंजी है और यह बदलाव की राह पर है।

क्या आपको लगता है कि रीब्रैंडिंग का असर विज्ञापन बिलों पर भी होगा? आपके साथ बिजनेस करने वाले ऐडवर्टाइजर्स को देने के लिए और आप क्या कुछ और करेंगे?

विभिन्न माध्यमों और नई पीढ़ियों के लिए एक नई पहचान बनाना 'भविष्य का प्रमाण' है। हाल के दिनों में इंडस्ट्री में हुए बदलाव और बदलते कंजप्शन मॉडल के लिए आवश्यकताओं का ध्यान रखना जरूरी है। तमाम चैनल्स में किए जा रहे बदलाव नेटवर्क के सौंदर्यशास्त्र को बदल देगा। हम डिजिटल में निवेश कर रहे हैं, फिर चाहे वह पॉडकास्ट हो, वीडियो कंटेंट हो, डिजिटल मीडिया हो, या फिर कुछ और। हम मानते हैं कि यह बदलाव एबीपी नेटवर्क में और अधिक निवेश लाने में मदद कर सकता है।’

नए एबीपी नेटवर्क का प्राथमिक फोकस क्षेत्र क्या होगा?

नए ABP नेटवर्क की कोई सीमा नहीं होगी। अपने दर्शकों को खबरें देने के लिए और उन्हें सबसे आगे रखने के लिए हम किसी भी दायरे को पार कर जाएंगे। हमारा फोकस असीमित होने के साथ-साथ बदलाव के इस दौर में और आगे बढ़ने पर होगा। हमारी नई पहचान हमारी असीम आकांक्षाओं के उद्देश्य को दर्शाती है और भारतीय नागरिकों को खुली मानसिकता का एक ऐसा मंच देती है, जहां जीवन जीने के लिए कोई भी व्यक्ति खुद को सशक्त बना सके। भारत में असीम क्षमता को बढ़ावा देने के लिए यह हम निरंतर प्रतिबद्ध हैं।

नेटवर्क की रीब्रैंडिंग बहुत ही दिलचस्प समय पर हुआ है, लिहाजा हमें वैश्विक स्वास्थ्य संकट के इस दौर में की जा रही पत्रकारिता और खबरों के बारे में बताएं?

चल रहे इस महामारी के दौर में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में कई तरह के बदलाव देखने को मिले हैं। इस अभूतपूर्व समय ने टेलीविजन मीडिया के लिए ऐतिहासिक व्युअरशिप निर्मित की है। टेक्नोलॉजी के प्रति बदलाव के कारण दर्शकों के कंजप्शन पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। विश्व स्तर पर यह देखा गया कि हर तरह की जानकारी के लिए दर्शक सीधे टेलीविजन मीडिया पर निर्भर थे। लॉकडाउन के दौरान जब लोग अपने घरों में बंद थे तब हमारे संवाददाताओं ने बाहरी दुनिया की स्थिति के बारे में मिनट-टू-मिनट अपडेट देकर दर्शकों के लिए जानकारी के प्राथमिक स्रोत के रूप में कार्य किया। खबरें पढ़ने-देखने के लिए ज्यादा संख्या में लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर भी रुख किया, जिससे ब्रॉडकास्टर्स ने तेजी से बढ़ते इस नए ट्रेंड्स को भी अपनाया है।

हमने एबीपी नेटवर्क में घर से काम करने वाले एंकर्स के लिए स्पेशल प्रोग्राम्स भी तैयार किए थे। मुझे ऐसी इंडस्ट्री के साथ जुड़ने पर गर्व है, जिसने लोगों के लाभ के लिए दिन-रात काम किया है।

क्या एडिटोरियल पॉलिसी और कंटेंट में किसी तरह का कोई बदलाव होगा?

ABP नेटवर्क पर, हम एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने के लिए खुद को अपनी ही सीमाओं से आगे निकलना चाहते हैं और अपने कंटेंट के जरिए सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। जहां तक नैतिकता, सत्य और समर्पण के मूलभूत आधार स्तंभों और मूल्यों का सवाल है, उन में कोई बदलाव नहीं होगा। लेकिन हां, हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए डिजिटल और अन्य पोर्टफोलियो में भारी निवेश करके सोच और माध्यम दोनों को बदल रहे हैं।

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टीवी चैनल्स की व्युअरशिप को लेकर BARC India के सीईओ सुनील लुल्ला ने कही ये बात

‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला ने लॉकडाउन में टीवी व्युअरशिप और मीटर टेंपरिंग समेत तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बेबाक राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 08 December, 2020
Last Modified:
Tuesday, 08 December, 2020
Sunil Lulla

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) इंडिया के सीईओ सुनील लुल्ला का कहना है कि देश में लोगों तक पहुंच के मामले में टीवी सबसे ज्यादा प्रभावशाली माध्यम बना रहेगा। उनका कहना है कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान टीवी व्युअरशिप ने स्पष्ट कर दिया है कि व्युअरशिप के मामले में आईपीएल के लिए यह काफी अच्छा सीजन रहा है। लुल्ला का यह भी कहना था कि हाल में मीटरों के छेड़छाड़ से जुड़ी घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस मीजरमेंट प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को और मजबूत किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में लुल्ला ने तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

टीवी व्युअरशिप की बात करें तो शुरुआती छमाही की तुलना में इस साल की दूसरी छमाही कैसी रही है?

देशभर के लोगों तक पहुंचने के लिए टेलिविजन सबसे प्रभावी माध्यम बना हुआ है। कोविड-19 और लॉकडाउन के दौरान साल की पहली छमाही जैसी रही, वह पहले कभी नहीं रही। इस दौरान लोगों ने टीवी देखने में ज्यादा समय बिताया। इससे व्युअरशिप रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो पहले इस तरह कभी नहीं रही।  

मार्च के आखिरी से लेकर जून की शुरुआत तक जब स्कूल-बाजार, दुकान वगैराह सब बंद थे, ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT) में टीवी पर बिताया जाने वाला समय छह सौ घंटों से बढ़कर 1800 घंटे हो गया। वर्ष 2019 की पहली छमाही की तुलना में इस साल पहले हफ्ते से 26वें हफ्ते के दौरान ‘नॉन प्राइम टाइम’ (NPT)  व्युअरशिप में 13.7 की वृद्धि देखने को मिली। पिछले साल की पहली छमाही की तुलना में इस साल की पहली छमाही में प्राइम टाइम व्युअरशिप में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस साल की पहली छमाही मे मूवीज, न्यूज और किड्स जैसे जॉनर्स को फायदा हुआ। फिर अनलॉक की शुरुआत हुई और जुलाई से लेकर सितंबर तक ट्रांसपोर्ट, कार्यस्थल आदि खुलने शुरू हुए। ऐसे में दर्शकों ने अपनी अन्य गतिविधियों के लिए फिर से कमर कसनी शुरू कर दी और टेलिविजन पर बिताए जाने वाले समय में कमी हो गई।

इस साल की दूसरी छमाही (H2 2020) में 27 से 43वें हफ्ते के दौरान पिछले साल इसी अवधि की तुलना में प्राइम टाइम की व्युअरशिप 16.2 प्रतिशत और नॉन प्राइम टाइम की व्युअरशिप 24.3 प्रतिशत बढ़ गई। 46वें हफ्ते तक व्युअरशिप में मूवीज जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले की तरह 23 प्रतिशत हो गया, जबकि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर का शेयर कोविड-19 से पहले 52 प्रतिशत था, जो बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया।  

लॉकडाउन के दौरान हमने देखा कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के मुकाबले न्यूज जॉनर में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। अब क्या स्थिति है। किन जॉनर्स की व्युअरशिप में बढ़ोतरी हो रही है?

सबसे पहले न्यूज जॉनर की बात करते हैं। 13-14 हफ्ते में न्यूज की व्युअरशिप बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई और जून-जुलाई में यह घटकर 14-15 प्रतिशत पर आ गई और अब यह कम है। यह बढ़ोतरी नॉन प्राइम टाइम देखने के कारण हुई थी। न्यूज व्युइंग अब आठ-नौ प्रतिशत पर वापस लौट आई है। लॉकडाउन के दौरान ऑरिजनल प्रोग्रामिंग में कमी को देखते हुए ब्रॉडकास्टर्स ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे क्लासिक शो को वापस ले आए।

महामारी के दौरान जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के साथ न्यूज का उपभोग भी बढ़ गया, क्योंकि स्थिति जानने के लिए व्युअर्स न्यूज चैनल्स से जुड़े रहते थे। लॉकडाउन के दौरान यह जॉनर सात से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गया और अब अनलॉक होने के साथ यह वापस सात प्रतिशत पर लौट आया है। ऑरिजनल प्रोग्रामिंग लौटने के बाद प्राइमटाइम व्युअरशिप भी बढ़ी है। इसके अलावा किड्स जॉनर की व्युअरशिप में भी वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर टीवी पर बिताए जाने वाले औसत समय और यूनिक व्युअर्स की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

आईपीएल को लेकर जारी बार्क डाटा से स्पष्ट पता चलता है कि पिछले सीजन की तुलना में व्युअरशिप के मामले में यह सीजन काफी अच्छा रहा है। क्या आप इस साल आईपीएल के कुछ डाटा को शेयर कर सकते हैं? अथवा व्युअरशिप/ऐड वॉल्यूम ट्रेंड इस साल कैसे अलग रहा है?

व्युअरशिप के मामले में आईपीएल का यह सीजन (आईपीएल-13) पिछले सीजन (आईपीएल-12) के मुकाबले 23 प्रतिशत बढ़ा है। पिछले सीजन में यह 326 बिलियन व्युइंग मिनट्स से बढ़कर यह 400 बिलियन व्युइंग मिनट्स हो गया। प्रति मैच औसत व्युअरशिप भी 23 प्रतिशत बढ़ गई। इस सीरीज को कुळ 405 मिलियन व्युअर्स ने देखा। आईपीएल को ओपनिंग मैच ने 11.2 बिलियन व्युइंग मिनट्स दर्ज किए, जो पिछले सीजन के मुकाबले 65 प्रतिशत ज्यादा थे। पिछले सीजन में औसत इंप्रेशंस 40.3 मिलियन थे जो 29 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ इस सीजन में 52 मिलियन हो गए। पिछले साल की तुलना में इस साल ओपनिंग मैच की पहुंच में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई।  

विज्ञापन की बात करें तो चैनल्स के ऐड वॉल्यूम में वर्ष 2019 और 2020 में समान रूप से चार प्रतिशत की वृद्धि हुई। टॉप पांच सेक्टर्स भी लगभग समान थे। ऐडवर्टाइजिंग में इस साल नए सेक्टर्स देखे गए। मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुआ ओपनिंग मैच आईपीएल-12 और आईपीएल-11 की तुलना में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला ओपनिंग मैच रहा।  

आपको क्या लगता है कि डाटा ब्लैकआउट का समय न्यूज चैनल्स और पूरी इंडस्ट्री के बिजनेस पर प्रभाव डालेगा? क्या आप हमें इस अवधि के दौरान उठाए जा रहे कदमों के बारे में कुछ बता सकते हैं?

हाल के घटनाक्रमों के मद्देनजर बार्क बोर्ड ने प्रस्ताव दिया था कि उसकी टेक्निकल कमेटी डाटा को और बेहतर करने के लिए मीजरमेंट के वर्तमान मानकों की समीक्षा और उन्हें बढ़ाने का काम करेगी और प्रमुख जॉनर्स के डाटा की रिपोर्टिंग करेगी। न्यूज समेत प्रमुख जॉनर्स के लिए क्वालिटी डाटा रिपोर्टिंग मानकों के साथ-साथ यह टेक्निकल कमेटी इंडस्ट्री और एक्सपर्ट्स के साथ मिलकर सक्रिय रूप से सहयोग कर रही है।  

साल के शुरुआत में बार-ओ-मीटर (Bar-o-meters) की संख्या बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई थी। आपके अनुसार बार्क के मीटरों से छेड़छाड़ रोकने का दीर्घकालिक समाधान क्या है?

लॉकडाउन और COVID-19 के कारण, पैनल का विस्तार अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। हमने विस्तार शुरू किया है और मार्केट्स में प्रगति कर रहे हैं। बार्क सेल्फ रेगुलेशन को बढ़ावा देता है।

पूरी इंडस्ट्री के लिए बार्क काफी महत्वपूर्ण संस्था है। पिछले दिनों हुए मामले पर स्टेकहोल्डर्स की प्रतिक्रिया कैसी रही है?

बार्क डाटा उलपब्ध करता है, जिसके आधार पर विज्ञापनदाता चैनल्स को विज्ञापन देते हैं। हमें स्टेकहोल्डर्स से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है। इस तरह की घटनाओं ने स्टेकहोल्डर्स को साथ में आगे आने और इस प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को मजबूत किया है।

इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालें कि क्या बार्क इस प्रतिबंधित अवधि के डाटा को 12हफ्ते के बाद जारी करेगा या यह पूरी तरह से ब्लैकआउट रहेगा?

टेक्निकल कमेटी डाटा क्वालिटी रिपोर्टिंग के सभी पहलुओं को ध्यान में रख रही है और उसी के आधार पर तय किया जाएगा।

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रूबिका लियाकत ने बताया, किस तरह मिली न्यूज एंकर बनने की प्रेरणा

ABP News की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 04 December, 2020
Last Modified:
Friday, 04 December, 2020
rubika

L&T Mutual Fund The Winner’s Circle  के वर्चुअल कॉन्क्लेव 2020 के सातवें एडिशन के तहत पत्रकारिता विषय पर ‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने L&T Mutual Fund के सीईओ कैलाश कुलकर्णी के साथ एक बातचीत में तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे। 

‘CUT THROUGH THE NOISE’  विषय के तहत एक दिसंबर की दोपहर चार बजे से हुए इस आयोजन के दौरान रूबिका ने मीडिया इंडस्ट्री में अब तक के उनके सफर, इस मुकाम तक पहुंचने में उन्हें किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे कई प्रमुख बिंदुओं पर भी बात की।

इस बातचीत के दौरान रूबिका का कहना था, ‘मेरे माता-पिता दोनों उदयपुर में हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में काम करते थे। मेरे पिता एक खिलाड़ी थे और वह हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में स्पोर्ट्स कोटा के तहत गए थे। ग्रेजुएशन करने के बाद ही उनकी नौकरी लग गई थी। मेरी मां ने उस समय एमएससी तक की पढ़ाई की थी और वह भी वहीं नौकरी करती थीं। पिताजी मेरी मां की प्रतिभा को पहचानते थे और उन्होंने ही दबाव बनाया कि यदि मेरी मां और पढ़ाई करें तो उन्हें हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में प्रमोशन मिल सकता है और जीवन पहले से बेहतर हो सकता है। उस समय मेरा और मेरी बहन का जन्म हो चुका था।’

रूबिका के अनुसार, ‘पिताजी ने मां को समझाया कि आपने एमएससी कर ली है और यदि पीएचडी कर ली तो प्रमोशन आसान हो जाएगा। यह सुनकर मेरी मां ने यह कहते हुए कि दो बेटियां हो चुकी हैं। परिवार की और ऑफिस की जिम्मेदारी के चलते आगे पढ़ाई करना मुश्किल होगा, इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में मेरे पिता ने कहा कि आप अपने पिता के यहां जाकर पीएचडी कर सकती हैं। लेकिन मेरी मां ने इससे इनकार कर दिया और अपने घर पर रहकर ही पीएचडी का निर्णय लिया। इसके बाद पिताजी ने ऑफिस के साथ-साथ हमारे ब्रेकफास्ट से लेकर स्कूल जाने तक की जिम्मेदारी संभाली और तब मेरी मां ने पीएचडी पूरी की। ऐसे में मैंने बचपन में ही मां की पीएचडी के लिए अपने पिता को जिस तरह कड़ी मेहनत करते हुए देखा और जिस तरह पिता ने हमें पढ़ाया, उसने बचपन से ही मेरे मन से लड़का-लड़की का अंतर खत्म कर दिया। मैंने कभी ये नहीं सोचा कि मैं लड़की हूं तो यह नहीं कर सकती। खास बात यह रही कि मेरी मां ने अपनी पीएचडी पूरी की और वहां उन्हें प्रमोशन मिला। करीब 200 लोग उनके मातहत काम करते थे।’

रूबिका के अनुसार, माता-पिता ने हमें बचपन से यही सिखाया कि ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे आप नहीं कर सकते हैं। उनका कहना था कि आप महिला हैं या पुरुष इससे फर्क नहीं पड़ता, सफलता के लिए जुनून और पैशन होना चाहिए।

कैलाश कुलकर्णी द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपने जर्नलिज्म को ही क्यों चुना, क्या इसकी प्रेरणा आपको अपने माता-पिता से मिली? रूबिका लियाकत ने बताया, ‘जैसा कि मैने बताया कि मेरे पिताजी रणजी प्लेयर्स सलेक्टर थे, मेरी मां साइंटिस्ट, मेरी दादी काफी धार्मिक महिला थीं, मेरे चाचाजी उस समय मॉडलिंग की दुनिया में काम की तलाश में थे। ये चारों अलग विचारधारा के थे, लेकिन रात को टीवी देखते समय सभी साथ होते थे। उस समय मैं सात-आठ साल की रही होंगी, जब मैंने देखा कि ये चारों लोग टीवी काफी ध्यान से देखते हैं। उस समय मैंने तय कर लिया था कि इन चारों में से मुझे कुछ नहीं बनना, मैं सलमा सुल्तान एंकर की तरह बनना चाहती थी, जिसे हमारे परिवार के चारों सदस्य एक साथ बैठकर गंभीरता से सुना करते थे। हालांकि, मुझे ये नहीं पता था कि जिसे हमारे परिवार के सभी लोग इतनी गंभीरता से सुनते हैं, उसे पत्रकार कहते हैं या न्यूज एंकर कहते हैं, लेकिन मैं उसी तरह बनना चाहती थी, जिसे पूरी दुनिया इतनी गंभीरता से सुनती है। कहते हैं कि जिस चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने में लग जाती है, लगता है कि मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।’ रूबिका का कहना था कि मेरी सलमा सुल्तान से कभी मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन कोविड का दौर गुजरने के बाद मैं उनसे जरूर मिलूंगी।

मीडिया के क्षेत्र में खासकर पिछले दस वर्षों (2010 से 2020) तक आए बड़े बदलावों के बारे में रूबिका का कहना था कि पहले के जो एंकर होते थे उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि खबर कितनी खुशी वाली अथवा दुख वाली है, उन्हें अपने इमोशन न दिखाते हुए खबर पढ़ते समय सिर्फ अपनी बॉडी लैंग्वेज को मेंटेन करना होता था। मैंने पिछले दस सालों में खुद में जो बदलाव देखा है वह यह है कि यदि मैं किसी से नाराज होती हूं या किसी खबर से बहुत ज्यादा दुखी होती हूं तो मैं अपने इमोशन दिखा सकती हूं। यह बहुत महीन रेखा है, जिस पर मंथन हो रहा है। हमारे देश में लोगों के तमाम तरह के विचार हैं, आज के दौर में तमाम लोग अपने-अपने विचार रख रहे हैं। कुछ एक तरफ होते हैं, तो अन्य दूसरी तरफ। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में हम एकमत होंगे।

वहीं जब उनसे बायस्ड होने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जब लोग आपसे प्यार और आप पर विश्वास करने लग जाते हैं, तो ये आपके के लिए सबसे बड़ा हथियार बन जाता है और कोई भी आपको छू नहीं पाता है। आज पत्रकारिता बदल गई है और समय भी बहुत ज्यादा बदल गया है। हर कोई क्रेडिबिलिटी इश्यू पर सवाल उठाता है। एक समय था जब आतंकवादी घटना होती थी, जिसमें कुछ लोग मारे जाते थे, तो खबर दे दी जाती थी कि आतंकवादी घटना हुई है...  इतने लोग मारे गए हैं... उच्च स्तरीय बैठक बुलाई जा रही है... एसआईटी बैठा दी गई है... लेकिन अब चीजें बदल गई हैं। अब जब लोग कहते हैं कि आपको अनबायस्ड रहना होगा, तो मैं उनसे माफी मांगकर ये पूछना चाहती हूं कि मैं किसके लिए बायस्ड हूं। वैसे बायस्ड शब्द को मैं सही मानती हूं। मैं एक ही प्लेटफॉर्म पर बुरे और सही को कैसे रख सकती हूं। मैं चौथा स्तम्भ हूं लेकिन चौथे स्तम्भ की ये जिम्मेदारी है कि जो सही है उसको रखें और उसकी तारीफ करें। लेकिन जो गलत है उसे क्यों रखें। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की लड़ाई और हिन्दुस्तान की लड़ाई को क्या एक प्लेटफॉर्म पर रखा था। महात्मा गांधी की जब पत्राकारिता शुरू हुई थी और जिस अंदाज से वे आगे बढ़े थे उसके पीछे एक मिशन था। इसलिए मेरा मिशन है कि मेरा हिन्दुस्तान उनका हिन्दुस्तान बने और ऐसा बने जिसका सपना हम सभी देखते हैं। वैसे यह किन लोगों के विचार हैं जो मुझे अनबायस्ड रहने की नसीहत देते हैं। मैं अपने देश का चौथा स्तम्भ हूं और अपने देश के प्रति वो तमाम चीजें रखूंगी। फिर चाहे वह बायस्ड तरीका ही क्यों न हो। मेरे हिन्दुस्तान के लिए जो बढ़िया है वो रखूंगी। मैं पत्रकार हूं और मानवता के लिए काम करती हूं। मानवता के लिए यदि कोई सबसे मजबूत स्तम्भ है, तो वह हमारा हिन्दुस्तान है और मैं हिन्दुस्तान की ओर से एक पत्रकार हूं और इससे पहले एक भारतीय हूं। इसलिए जिन्हें लेफ्ट या राइट विचारधारा में पड़ना हैं, वे पड़ें। मेरी विचारधारा साफतौर पर ये कहती है कि मुझे उस ट्रैक पर चलना है जो हमारे देश के लिए बेहतर हो। फिर चाहे लेफ्ट का कोई चंक हो, यदि वह मेरे हिन्दुस्तान के लिए बेहतर है तो मैं उनका स्वागत करती हूं।                 

‘एबीपी न्यूज’ (ABP News) की जानी-मानी सीनियर न्यूज एंकर रूबिका लियाकत ने पत्रकारिता की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अपने बेबाक शैली से रूबिका ने दर्शकों के दिलों पर अपनी खास छाप छोड़ी है। उदयपुर (राजस्थान) में जन्मीं रूबिका ने मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। रूबिका ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत उदयपुर में ‘चैनल24’ (Channel 24) के साथ की थी। पूर्व में वह ‘न्यूज24’ (News 24) और ‘जी न्यूज’ (Zee News) में भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। रूबिका लियाकत उन गिने-चुने पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है। उनके कार्यक्रम ‘मास्टरस्ट्रोक’ को काफी देखा जाता है। सोशल मीडिया पर भी उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्या है।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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BBC के अधिकारियों ने बताया, लोग क्यों देते हैं उनके कार्यक्रमों को तवज्जो

‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ की हेड रूपा झा ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ से तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 02 December, 2020
Last Modified:
Wednesday, 02 December, 2020
BBC

प्रादेशिक भाषाओं पर फोकस करने और स्पीड से पहले तथ्यों को रखने की एडिटोरियल पॉलिसी के कारण भारत जैसे मार्केट में ‘बीबीसी इंडिया’ (BBC India) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘बीबीसी ग्लोबल न्यूज’ (BBC Global News) के मैनेजिंग डायरेक्टर (India and South Asia) राहुल सूद और ‘बीबीसी वर्ल्ड सर्विस’ (BBC World Service) की हेड (Indian Languages) रूपा झा ने हाल ही में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से इन मुद्दों के साथ तमाम पहलुओं पर बातचीत की।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

कंटेंट के उपभोग की बात करें तो बीबीसी न्यूज के लिए भारत फिर एक प्रमुख बाजार के रूप में उभरा है। आपकी नजर में इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण है?

रूपा: पिछले कुछ वर्षों में भारतीय भाषाओं में किए गए विस्तार का इसमें काफी योगदान है। बीबीसी की कोर वैल्यू यानी मूल्य और निष्पक्षीय ढांचा भारतीय ऑडियंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरा है। ऑडियंस में हुई ग्रोथ बताती है कि वे मार्केट में फैल रहीं तमाम फेक न्यूज और ओपिनियन के बीच न्यूज और अपडेट्स किसी विश्वसनीय मीडिया सोर्स से लेना चाहते हैं। 

रियलिटी चेक और फैक्ट चेक को लेकर बीसीसी के कार्यक्रमों ने दिखा दिया है कि लोग उन खबरों को ज्यादा तवज्जो देते हैं, जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं। जमीनी स्तर और स्थानीय राजनीति भारतीय समाचारों पर हावी है। हालांकि, दुनियाभर की न्यूज आजकल प्रासंगिक हो रही हैं, क्योंकि इससे दुनियाभर से ‘समाधान’ भी मिलता है। कोरोनावायरस को लेकर की गई स्पेशल प्रोग्रामिंग इसका सबूत है।

राहुल: असल में भरोसा और विश्वसनीयता दो मुख्य बाते हैं। इस वैश्विक महामारी में लोग भरोसेमंद और विश्वसनीय न्यूज प्लेटफॉर्म्स तलाश रहे हैं। मोबाइल डिवाइस पर बीबीसी हिंदी भारत में न्यूज कंटेंट को इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के बीच टॉप-5 में शामिल है।

आप रीजनल यानी प्रादेशिक कंटेंट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। क्या सिर्फ हिंदी ही ऑडियंस को आकर्षित कर रही है। अन्य भाषाओं के बारे में आपका क्या कहना है?

रूपा: हम बड़े शहरों से आगे निकलकर युवाओं और महिलाओं पर फोकस कर रहे हैं। बीबीसी भारत में नौ भाषाओं पर काम करती है। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा  हम मराठी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, बंगाली और उर्दू को कवर करते हैं। न्यू लैंग्वेज सर्विसेज, नया स्टाफ, नई प्रोग्रामिंग और नए स्टूडियो के साथ बीबीसी ने भारत में बड़ा निवेश किया है। भारत के प्रति इस प्रतिबद्धता ने क्षेत्र में 250 से अधिक नए रोजगार सृजित किए हैं और यह केवल नई भाषाओं को शामिल करने के बारे में नहीं है,बल्कि हमारे ऑपरेशंस में बदलाव के बारे में है, इसलिए हम डिजिटल रूप से और मोबाइल फर्स्ट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

हम साउथ एशिया के लिए दिल्ली को एक डिजिटल पावर हाउस और डिजिटल हब बना रहे हैं। बीबीसी के पूर्व महानिदेशक ने घोषणा की है कि वर्ष 2022 तक इसकी ग्लोबल सर्विस के लिए ऑडियंस की संख्या 500 मिलियन तक पहुंच सकती है।

राहुल: हम जानते हैं कि भारत जैसे मार्केट में काफी संभावना हैं। यहां 1.2 बिलियन की जनसंख्या में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 462 मिलियन है। इस पूल में 300 मिलियन से ज्यादा स्थानीय भाषा के यूजर्स हैं। वर्ष 2021 तक इनकी संख्या 300 मिलियन से बढ़कर 500 मिलियन से ज्यादा होने की उम्मीद है। ऐसे में वर्ष 2021 तक यहां करीब 735 मिलियन इंटरनेट यूजर्स हो सकते हैं।

भारत भी एक काफी प्रतिस्पर्धी मार्केट है। ऐसे में जब एडिटोरियल कंटेंट की बात आती है तो आप कैसे इसे दूसरों से अलग कहेंगे?

रूपा: जब तक हमें विश्वास नहीं होता, तब तक हम लोगों में खबरों को ब्रेक करने की जल्दबाजी नहीं रहती है। हम हो-हल्ला नहीं करते हैं। हम अपने दर्शकों को बहुत ज्यादा समझा सके और तथ्यपूर्ण जानकारी दे सके, इसके लिए ही पत्रकारिता में निवेश करते हैं। हम भारत में न्यूज प्लेटफार्म्स पर विश्वास दोबारा ला सकें, इस पर लगातार काम करते रहेंगे। हम किसी सैन्य ऑपरेशन के दौरान ज्यादा से ज्यादा खबरें देते हैं। हम ग्राउंड रिपोर्ट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

राहुल: रेस में फर्स्ट आने की बात करें तो, 'सही बनना' (Being right) फर्स्ट बनने से ज्यादा जरूरी है।

भारत जैसे बाजार को ऑपरेट करने में बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

रूपा: भारत में खबरें बहुत ही ज्यादा ध्रुवीकृत (पोलराइज्ड) होती हैं और यह बहुत ही ज्यादा भीड़-भाड़ वाला मार्केट है, जो हमें अपने दर्शकों की सही जरूरतों को पूरा करने का मौका देता है जो तेजी से डिजिटल की ओर बढ़ रहे हैं।

कोविड की वजह से डिजिटल पब्लिकेशंस के पाठकों की संख्या बढ़ी है। बीबीसी ग्लोबल न्यूज की रणनीति क्या है, जब भारत में बढ़ते मार्केट शेयर की बात होती है?

राहुल: बीबीसी जो भी करता है दिल से करता है और उसके दिल में डिजिटल है। हम विश्व स्तर पर और भारत में रिकॉर्ड ग्रोथ नंबर्स देख रहे हैं। बीबीसी की भरोसेमंद वैल्यू और निष्पक्षता ऐसी है, कि वह ऐसे समय पर जब गलत सूचनाओं और भड़काउ खबरों का अंबार लगा हुआ है, सही रिपोर्टिंग के जरिए तथ्यपरक खबरों के साथ एडवर्टाइजर्स के लिए ब्रैंड सेफ एनवॉयरमेंट सुनिश्चित करता है।

उद्योग अनुसंधान निकाय Ipsos ने नवंबर 2020 की शुरुआत में ये घोषणआ की कि टीवी और ऑनलाइन दोनों पर ही बीबीसी भारत में अंग्रेजी भाषा में नंबर एक अंतरराष्ट्रीय न्यूज ब्रैंड है। बीबीसी का 24 घंटे का अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल पिछले एक साल में अपने किसी भी इंटरनेशनल कॉम्पटीटर्स से सबसे ज्यादा देखा गया। और यह पिछले वर्ष का सबसे तेजी से बढ़ने वाला सामान्य अंग्रेजी भाषा का न्यूज चैनल है। इस बात का भी खुलासा हुआ कि बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स के साप्ताहिक आंकड़ों में भी नंबर-1 अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन न्यूज प्लेटफॉर्म है। कॉमस्कोर डेटा के अनुसार सितंबर, 2020 में बीबीसी पोर्टल ने ट्रैफिक में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की (लगभग 40 मिलियन यूनीक विजिजर्स)। भारत में सभी जनरल न्यूज प्लेटफॉर्म्स की तुलना में यूनिक बीबीसी प्लेटफॉर्म पर  विजिटर्स की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और यह बढ़त सितंबर, 20 में हुई ग्रोथ और साल दर साल हुई ग्रोथ की वजह से हुई है।

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TRP-सोशल मीडिया को लेकर उठ रहे सवालों का सूचना प्रसारण मंत्री ने यूं दिया जवाब

‘न्यूज18 इंडिया’ पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार अमिश देवगन से बातचीत में सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कई अहम मुद्दों पर रखी अपनी राय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 27 November, 2020
Last Modified:
Friday, 27 November, 2020
Amish Devgan

डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है।’ यह बात केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार और न्यूज18 (हिंदी) के मैनेजिंग एडिटर अमिश देवगन द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही। इस दौरान सूचना-प्रसारण मंत्री ने अमिश देवगन के कार्यक्रम ‘आरपार’ और उनके एंकरिंग की तरीफ भी की। उन्होंने अमिश देवगन से कहा कि वे जिस जोशीले अंदाज से एंकरिंग करते हैं, उससे एक अच्छी डिबेट होती है। इसके लिए उन्होंने अमिश देवगन को बधाई भी दी।

इसके बाद सवाल-जवाबों का सिलसिला शुरू हुआ और अमिश देवगन ने सूचना-प्रसारण मंत्री से एक-एक कर कई ऐसे सवाल पूछे, जो हाल ही में चर्चा का विषय बने हुए हैं। अपने इंटरव्यू के दौरान अमिश देवगन ने टीआरपी के मुद्दे पर भी उनसे सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि टीआरपी का विवाद बहुत बड़ा है, इस मामले पर सरकार की सोच क्या है? इस सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री ने कहा कि ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दो लोग होते हैं, जिन्हें विज्ञापन लेना और देना है। लिहाजा वे जानना चाहते हैं कि कौन सा कार्यक्रम और चैनल लोकप्रिय है। इसके लिए ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स ने ही साथ आकर टीआरपी की रचना की है। सरकार ने दोनों को सिर्फ समर्थन दिया है, पर ये सरकार की मान्यता से ही यह चल रहा है। लिहाजा अब सरकार ने इसके लिए कमेटी भी बनायी है, ताकि सही रास्ता बताया जा सके। इसका मैनिपुलेशन की आशंका को खत्म किया जा सके, जोकि मुख्य काम है। उन्होंने कहा कि अभी नई टेक्नोलॉजी तैयार है, जिससे ज्यादा लोगों की पसंद को देखा जा सकेगा, ताकि सही नतीजे आएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

जब अमिश देवगन ने उनसे पूछा किया क्या वर्तमान में चल रहे सिस्टम को पूरी तरह से रिप्लेस कर दिया जाएगा, इस पर केंद्रीय मंत्री ने जवाब दिया कि ये हम नहीं तय करते हैं बल्कि एसोसिशन तय करती हैं, हम ब्रॉकास्टर्स के नाते जाते हैं। सरकार की एक भूमिका है। कमेटी जो रिकमेंड करेगी, उसके बाद हम करेंगे। रिकमेन्डेशन के आधार पर ही काम करेंगे। हमारी कमेटी टेक्नोलॉजी और टेक्नीशियंस की बनी है और उसके द्वारा ही हम टेक्नोलॉजिकल प्रिंसिपल सॉल्यूशन देंगे, जिसके आधार पर काम होगा। इस तरीके से सबको सुकून मिलेगा कि अब सही तरीके से मापन हो रहा है। इसकी रिपोर्ट एक महीने में आ जाएगी।

वहीं अमिश देवगन ने पूछा कि ये मुद्दा विवादास्पद है, क्योंकि मुंबई पुलिस ने भी एक एफआईआर रजिस्टर कर रखी है। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने भी केस दर्ज कर रखा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह एफआईआर का मुद्दा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गाइडेंस दिया है कि किसी एक चैनल या एक व्यक्ति को टारगेट करके एफआईआर नहीं होनी चाहिए। एफआईआर एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है, इस पर हम क्या कहेंगे, लेकिन न्याय कैसे होगा ये मुद्दा है और इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोर्टों का मार्गदर्शन किया है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर भी अमिश देवगन ने केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री से सवाल किया  कि अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स आपके मंत्रालय की निगरानी में आ गए हैं, क्या हम ये मान सकते हैं?  इस पर उन्होंने कहा कि हां, डिजिटल पर जो भी कंटेंट जनरेट होता है उसकी देखभाल करना भी अब जरूरी हो गया है, फिर चाहे न्यूज पोर्टल्स ही क्यों न हो और इसके लिए हमारी तैयारी चल रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर हमारे पास सैकड़ों शिकायत आती हैं, क्योंकि ओटीटी पर कोई सेंसर बोर्ड नही है। जैसाकि अन्य फिल्मों को लेकर होता है कि भारत में फिल्में रिलीज करनी है तो सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट लेना होता है, लेकिन ओटीटी के लिए ऐसा नहीं है। इसलिए इसके लिए अब सेंसर बोर्ड लाना है या सेल्फ रेगुलेशन लाना है ये चॉइस है, लेकिन कुछ न कुछ तो व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। मै भी ओटीटी पर सीरियल देखता हूं, यहां हर कैटगरी के सीरियल्स और फिल्में होती हैं। लेकिन ये जो बहुत बुरी वाली कैटेगरी है, इसको लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि कुछ न कुछ व्यवस्था तैयार करनी चाहिए और हम करेंगे।

इसके बाद अमिश देवगन ने उनसे अगला सवाल किया कि नेटफ्लिक्स के ऊपर हाल ही में एक एफआईआर दर्ज की गई है, जिस पर बवाल मचा हुआ है। इस पर एक वर्ग सरकार पर आरोप लगा रही है कि सरकार सब कुछ कंट्रोल करना चाहती है, इस पर आपकी क्या राय है? इसका जवाब देते हुए जावड़ेकर ने कहा कि देखिए, ये वर्ग सेंसर बोर्ड के खिलाफ कुछ नही बोलता है। हमारे यहां आजादी का गला नही घोंटा जा रहा है। कोई भी व्यवस्था करना, आजादी का गला घोंटना नही है। 

अमिश देवगन के यह पूछे जाने पर कि केरल सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला एक अध्यादेश जारी किया, जिसे विरोध के बाद वापस भी ले लिया गया। इसके बाद केरल सरकार की सोच पर काफी सवाल उठे, क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी जरूरी है, इस पर आपकी क्या राय है, प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मैं सोशल मीडिया पर पाबंदी की जरूरत नहीं मानता, लेकिन सोशल मीडिया या कोई भी मीडिया जिम्मेदारी से चलने चाहिए, क्योंकि आजादी जिम्मेदारी से ही और जिम्मेदार पत्रकार से ही सार्थक होती है। सोशल मीडिया पर तो कोई भी कुछ लिख सकता है, यहां हर व्यक्ति पत्रकार होता है, इसलिए एक झूठ पल भर में इतना प्रचारित हो जाता है कि वही सच लगने लगता है, जिसके बाद सभी जगह से वही मैसेज आने शुरू हो जाते हैं, जोकि गलत है। इसलिए सच दिखाना चाहिए, गलत नहीं। इसलिए जो कंटेंट जनरेट करता है, ये उसकी जिम्मेदारी है कि उसे सच को समझना चाहिए। 

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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