मीडिया की वर्तमान दशा व दिशा क्या है, टीवी व डिजिटल के तेजी से बढ़ते कदमों के बीच प्रिंट मीडिया का भविष्य कैसा है और आखिर मीडिया की विश्वसनीयता पर क्यों सवाल उठ रहे हैं? मीडिया से जुड़े ऐसे ही तमाम अहम सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार और ‘दैनिक जागरण’ (Dainik Jagran) समूह में एग्जिक्यूटिव एडिटर विष्णु त्रिपाठी ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
सबसे पहले अपने बारे में बताएं। आपने किस तरह और कहां से पत्रकारिता की शुरुआत की। इस मुकाम तक पहुंचने का आपका सफर कैसा रहा?
वर्ष 1982 में मैंने कानपुर से मीडिया में कदम रखा था। जैसा कि आम परिवारों में होता है। ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने नौकरी की तलाश शुरू कर दी। उस समय मैं संपादक के नाम पत्र (Letter to Editor) लिखता था। तमाम अखबारों में आर्टिकल लिखता था। उन दिनों कानपुर से एक सांध्य दैनिक ‘लोक जनसमाचार’ निकलता था। मैं उससे जुड़ गया। वहां काफी काम किया और मुझे काफी सीखने को मिला। इसके बाद दिसंबर 1985 से अखबार की वास्तविक नौकरी में आया। सबसे पहले हिंदी दैनिक ‘आज’ को कानपुर में जॉइन किया। इसके बाद आगरा में ‘दैनिक जागरण’ और फिर ‘आज’ दोनों की लॉन्चिंग टीम में शामिल रहा। आगरा से जून 1988 में दैनिक जागरण, लखनऊ जॉइन किया और तब से इस अखबार में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं।
मीडिया में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान आपने पत्रकारिता को काफी बारीकी से देखा है। आपकी नजर में पहले के मुकाबले वर्तमान दौर की पत्रकारिता में क्या बदलाव आया है। क्या यह सकारात्मक है अथवा नकारात्मक। इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?
मेरा मानना है कि पहले के मुकाबले पत्रकारिता की दुनिया में काफी बेहतरी आई है। समय के अनुकूल काफी चीजें बदली हैं। तकनीकी रूप से भी काफी समृद्धि हुई है। हमने जब अखबार की दुनिया में शुरुआत की थी, उस समय हैंड कंपोजिंग होती थी। सिलेंडर पर छपाई होती थी। उसके बाद कंप्यूटर का दौर आया। कहने का मतलब है कि समय के साथ तकनीकी तौर पर मजबूती अधिक आई है।
कंटेंट की क्वालिटी को लेकर एकबारगी चर्चा और बहस हो सकती है, लेकिन तकनीकी और प्रस्तुतिकरण के स्तर पर काफी समृद्धि आई है। लेआउट और डिजाइन की समझ भी काफी बेहतर हुई है। जहां तक कंटेंट क्रिएशन की बात है, तो इसमें प्रोफेशनलिज्म और फॉर्मेलिटी बहुत आई है। हालांकि, इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हैं, लेकिन औपचारिकता आने से प्रोसेस और लेखन, दोनों में परिपक्वता आई है।
आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। या यूं कहें कि डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। आजकल तमाम माध्यमों से लोगों को जरूरी सूचनाएं तुरंत ही मिल जाती है, जबकि अखबार अगले दिन आता है। ऐसे में प्रिंट मीडिया खासकर अखबारों के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?
इंटरनेट मीडिया और वेबसाइट्स आने के बाद से मैं वर्ष 1999-2000 से इस बात को सुन रहा हूं कि अखबारों का भविष्य अंधकारमय है। अब अखबार कम छपेंगे। अखबार कम पढ़े जाएंगे और लोग वेबसाइट्स पर तुरंत खबर पढ़ लेंगे, जैसी तमाम बातें होती थी। ‘दूरदर्शन’ के बाद जब निजी न्यूज चैनल्स आए तो उस समय इस तरह की काफी बहस छिड़ी थी। उस समय पूरे दैनिक जागरण समूह की एक वर्कशॉप भी इसे लेकर हुई थी।
उस समय यह बहस शुरू हुई थी कि अब टीवी के आने के बाद जब लोग अपने घरों में बैठकर रात को सारी खबरें देख लेंगे तो सुबह अखबार कौन पढ़ेगा? लेकिन, उसके बाद भी न सिर्फ अखबारों की संख्या बढ़ी है, बल्कि रीडरशिप भी बढ़ी है। इसके बाद तमाम वेबसाइट्स के आने से भी इस तरह की बहस आए दिन छिड़ती रहती है। मेरा मानना है कि जो तत्काल मिलती है, वह सूचना होती है। वह समाचार नहीं होता है। सूचना के बाद समाचार का नंबर आता है। सूचना और समाचार दोनों में अंतर होता है। यानी जो ब्रेकिंग के तौर पर तुरंत मिली, उसे हम सिर्फ सूचना यानी इंफॉर्मेशन कह सकते हैं। उसकी डिटेलिंग समाचार कहलाती है। न्यूज के बाद की जो डिटेलिंग होती है, उसे स्टोरी कहते हैं। स्टोरी के बाद फिर लगातार उसके फॉलोअप्स होते हैं।
यानी, समाचार की जो प्रक्रिया होती है, उसमें हमें ये चार चरण (इंफॉर्मेशन, न्यूज, स्टोरी और फॉलोअप्स) सिखाए गए हैं। इसमें अखबार का कोई सानी नहीं है। छपे हुए को पढ़ने का जो अभ्यास, संतुष्टि और आनंद है, वह अलग ही होता है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि कुछ समय पहले जब दिल्ली में ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आयोजन हुआ था, उसमें इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे कि पांव रखने तक की जगह नहीं थी। आप ये देखिए कि यदि लोगों में पढ़ने का अभ्यास कम हो रहा है अथवा नई पीढ़ी यदि पढ़ने के अभ्यास से विमुख हो रही है तो तमाम बड़े-बड़े लेखक जो एडवांस में रॉयल्टी लेकर लिखते हैं या विदेश जाकर बड़े-बड़े होटलों में कमरे लेकर लेखन कर रहे हैं तो वो ऐसा कैसे कर पा रहे हैं, अंततः यह सब पाठकों के बढ़ते समूह के सौजन्य से ही हो पा रहा है। यानी लोगों में पढ़ने का क्रेज या अभ्यास बढ़ रहा है।
इसलिए मेरा मानना है कि अखबारों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। हां, अखबारों का भविष्य समाचार माध्यमों की किसी दूसरी विधा के हाथों में सुरक्षित अथवा असुरक्षित नहीं है। चाहे वह टीवी मीडिया हो, डिजिटल मीडिया हो अथवा इंटरनेट मीडिया हो। अखबार यदि सुरक्षित हैं तो वह अखबारों में काम करने वाले गंभीर और कुशल लोगों के हाथों में सुरक्षित हैं। कल को यदि प्रिंट मीडिया को किसी तरह का कोई क्षरण अथवा नुकसान होता है तो वह अखबारों में काम करने वाले लोगों की गंभीरता में अथवा कुशलता में कमी की वजह से होगा, अन्य किसी बाहरी माध्यमों से नहीं।
अब बात करते हैं फेक न्यूज की, जिसकी आजकल काफी चर्चा हो रही है। फेक न्यूज को लेकर आपका क्या कहना है, आखिर यह क्यों इतनी बढ़ रही है?
देखिए, फेक न्यूज दो प्रकार की होती है। फेक न्यूज यानी गलत खबरें हमेशा से छपती रही हैं। यदि किसी दुर्घटना की वजह, किसी गलतफहमी की वजह से, कम सतर्कता की वजह से अथवा असावधानी की वजह से अगर कोई गलत खबर अथवा गलत सूचना प्रकाशित होती है तो उसका शुद्धिकरण/परिमार्जन किया जाना चाहिए। लेकिन, यदि योजनाबद्ध तरीके से अथवा नियोजित तरीके से किसी गलत, अनुचित या निराधार सूचना/समाचार का प्रकाशन होता है तो उसे संगीन अपराध की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। उसे संज्ञेय अपराध माना जाना चाहिए और ऐसा करने वालों को समाजद्रोही और राष्ट्रद्रोही के तौर पर दर्ज किया जाना चाहिए।
क्या आपको लगता है कि फेक न्यूज पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में उठाए जा रहे कदम कारगर हैं। जैसे-पीआईबी समेत तमाम संस्थानों ने अपनी फैक्ट चेक टीम बना रखी है। आपकी नजर में इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?
यहां सवाल सिर्फ नैतिकता का है। तमाम ऐसी संस्थाएं हैं, जो अपने स्तर पर फैक्ट चेक करती हैं। वे लोगों को जागरूक कर रही हैं, सतर्क कर रही हैं। हम इसका स्वागत करते हैं। बस देखने वाली बात यह है कि जो लोग योजनाबद्ध तरीके से और अपने हिसाब से चीजों को सही साबित करने के लिए गलत सूचना प्रसारित/प्रकाशित करते हैं, उन पर इन एजेंसियों की सक्रियता का कितना असर पड़ रहा है?
उनके लिए तो इन एजेंसियों की सक्रियता ठीक है जो कभी असावधानी अथवा प्रक्रिया में किसी कमी या किसी का वर्जन न लेने के चक्कर में गलत सूचना को प्रसारित कर बैठते है, क्योंकि वे इससे सबक लेते हैं। लेकिन, जो लोग अपने हित के लिए और अपनी वैचारिकता के आधार पर गलत चीजों को फैलाने अथवा किसी को आक्षेपित करने के लिए, किसी की छवि बिगाड़ने के लिए जानते-बूझते हुए योजनाबद्ध तरीके से गलत तथ्यों और गलत विजुअल्स का प्रकाशन/प्रसारण करते हैं, वह खतरनाक है। ऐसे लोग इन एजेंसियों की सक्रियता से कितना सबक लेते होंगे और कितना सीखते होंगे, यह सोचने का विषय है।
अब कोविड लगभग खत्म हो चुका है। हालांकि, कुछ केस अभी भी आ रहे हैं, लेकिन अब पहले वाली स्थिति नहीं है। ऐसे में अखबारों के नजरिये से वर्तमान दौर को आप किस रूप में देखते हैं। क्या अखबार कोविड से पहले के दौर की तरह अपनी पहुंच फिर बनाने में कामयाब हो रहे हैं?
बिलकुल, कई अखबार काफी तेजी से कोविड से पहले वाली स्थिति की तरफ लौट रहे हैं। यहां विशेषकर मैं अपने अखबार की और दिल्ली-एनसीआर की बात करूं तो रिकवरी काफी अच्छी हो रही है। कोविड के दौरान जब तमाम अखबारों का सर्कुलेशन थोड़ा प्रभावित हुआ था, तो दो तरह की बातें थीं। कुछ लोगों ने संक्रामकता के संदेह में अखबार न पढ़ने का फैसला कर लिया था। हालांकि, तमाम ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अपने स्तर पर इस धारणा को गलत माना था।
ऐसे लोगों का मानना था कि अखबार से किसी तरह का वायरस नहीं फैलता है और उन्होंने तभी से अखबार पढ़ना शुरू कर दिया था। कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने अपने जीवन में अखबार की कमी महसूस की। जब तमाम अन्य माध्यमों से इन लोगों की समाचार की और बौद्धिकता की भूख शांत नहीं हुई तो उन्होंने दोबारा से अखबार मंगाना शुरू कर दिया। ऐसे में मैं अपने अखबार के आधार पर कह सकता हूं कि प्रिंट इंडस्ट्री फिर से आगे बढ़ रही है।
तमाम अखबारों ने अब सबस्क्रिप्शन मॉडल अपनाया हुआ है, यानी बिना सबस्क्राइब किए पाठक अब उन अखबारों को इंटरनेट पर नहीं पढ़ सकते हैं। इस मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आपको नहीं लगता कि इससे रीडरशिप प्रभावित होती है। क्योंकि डिजिटल रूप से समृद्ध पाठकों के पास आज सूचना प्राप्त करने के तमाम स्रोत हैं। ऐसे में वे पैसा देकर ऑनलाइन अखबार क्यों पढ़ना चाहेंगे? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
ऐसा नहीं है। इस बारे में मैं कहूंगा कि यह क्वालिटी की बात है। जो व्यक्ति किसी भी प्रॉडक्ट को खरीदना, पढ़ना या सुनना यानी किसी भी तरह से इस्तेमाल करना चाहता है, अंतत: उस व्यक्ति की ख्वाहिश उस प्रॉडक्ट की क्वालिटी को लेकर ही होती है। मैं आपको इसे कुछ उदाहरणों से समझाता है कि जैसे पहले एक साबुन आया था, उसके बारे में विज्ञापन किया गया कि यदि आप इस साबुन को इस्तेमाल करेंगे तो इसके अंदर से सोने का सिक्का निकल सकता है, लेकिन वह साबुन मार्केट से गायब हो गया। इसका कारण यही रहा कि पहले तो उसमें से सोने का सिक्का निकलने की गारंटी नहीं थी, दूसरा यदि कोई व्यक्ति साबुन खरीदता है तो वह साफ-सफाई के लिए खरीदता है न कि सोने के सिक्के के लिए।
ऐसे ही एक ब्लेड का विज्ञापन था कि आपको चार ब्लेड के पैक में पांच ब्लेड मिलेंगे। लेकिन, यदि कोई भी व्यक्ति यदि ब्लेड खरीदेगा तो उसकी क्वालिटी पहले देखेगा और जरा भी खराब होने पर वह उसे पसंद नहीं करेगा, फिर चाहे उसे कितने ही ब्लेड और फ्री में क्यों न दिए जाएं। यही बात खबर और मीडिया माध्यमों पर लागू होती है। अब लोगों की क्रय शक्ति बढ़ रही है, ऐसे में यदि लोगों को अच्छी खबर पढ़ने की चाहत होगी और मीडिया इंडस्ट्री यदि अच्छा कंटेंट देगी तो उसका पैसा भी लेगी और लोग देंगे भी। यह बाजार का सिद्धांत है।
तमाम अखबारों में एडिटोरियल पर मार्केटिंग व विज्ञापन का काफी दबाव रहता है। आपकी नजर में एक संपादक इस तरह के दबावों से किस तरह मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से संपादकीय कार्यों का निर्वहन कर सकता है?
हमारे अखबार में एडिटोरियल पर इस तरह का कोई दबाव नहीं है। मार्केटिंग या विज्ञापन विभाग के लोग अपना काम कर रहे हैं, उन्हें अपना काम करने देना चाहिए, लेकिन यह संपादक की अपनी इच्छाशक्ति, उसकी दृढ़ता और वैचारिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है कि वह कितना दबाव महसूस करता है। मेरा मानना है कि न्यूज के लिहाज से जितनी जरूरत होगी, उतना ही कंटेंट छपेगा। फिर चाहे वह कम हो अथवा ज्यादा। मैंने न तो इस तरह का कोई दबाव महसूस किया है और न ही करूंगा।
आज के दौर में मीडिया दो खेमों में बंट गई लगती है। आपकी नजर में यह पत्रकारिता का कौन सा दौर है, जहां पर खेमों में बंटकर पत्रकारिता होती है?
देखिए, पत्रकारिता हमेशा से दो खेमों में बंटी रही है। मैंने जब से होश संभाला है और अखबार पढ़ रहा हूं, तब से मैंने यही देखा है कि भारत की पत्रकारिता में हमेशा से एक वामपंथी और एक दक्षिणपंथी विचारधारा रही है। मेरी नजर में यह कोई गलत बात नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की बहुत बड़ी विशेषता है और मैं इसे बहुत अच्छा मानता हूं कि पत्रकार अपने बारे में कहें कि वह वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी। जो पत्रकार यह बात छिपाते हैं, वह अपने साथ भी अपराध करते हैं और समाज के साथ भी।
पहले भी इस तरह की बातें हम सुनते थे कि फलां पत्रकार वामपंथी और फलां पत्रकार दक्षिणपंथी है। उस समय जो सेंट्रलिस्ट यानी जो वामपंथी या दक्षिणपंथी दोनों में से कोई नहीं होते थे, उनके बारे में कहा जाता था कि वे तो सुविधाभोगी हैं। मेरा मानना है कि पत्रकार कभी निष्पक्ष हो ही नहीं सकता। पत्रकार यदि वैचारिक रूप से दृढ़ है और वैचारिकता के आधार पर संपन्न है तो वह कभी निष्पक्ष हो ही नहीं सकता है। वह सपक्ष ही होगा। वह तटस्थ कैसे हो सकता है। यदि आप उद्देश्यपूर्ण तरीके से काम कर रहे हैं तो निष्पक्ष अथवा तटस्थ कैसे हो सकते हैं? आपको सपक्ष होना ही पड़ेगा। निष्पक्ष तो वे लोग होते हैं, जिनका विवेक नहीं होता है। जो लोग कहते हैं कि हमने निष्पक्ष रूप से पत्रकारिता की अथवा कर रहे हैं तो मेरा मानना है कि वे वैचारिक रूप से शून्य हैं।
मीडिया में इन दिनों क्रेडिबिलिटी की चर्चा है। सभी चाहते हैं कि उन्हें भरोसेमंद सूचनाएं अथवा जानकारी मिले, लेकिन आज के दौर में वे असमंजस में रहते हैं कि किस माध्यम पर वह सबसे ज्यादा भरोसा करें, क्योंकि एक मीडिया संस्थान कुछ कह रहा होता है, जबकि उसी बारे में दूसरा मीडिया संस्थान कुछ और कह रहा होता है?
देखिए, किसी भी अखबार पर ‘हॉलमार्क’ नहीं लगाया जा सकता है। अखबार कोई पदार्थ नहीं है। यह तो पाठक के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसी भी सूचना को किस तरह से लेता है। जो भी आपके लिए ग्रहणीय है, उसमें निश्चित तौर पर आप एक उपभोक्ता, ग्राहक अथवा पाठक होने के नाते आप अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं। इसे हम एक सामान्य से उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे-जब आप चाय पीते हैं और उसका एक घूंट (सिप) लेने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल कर यह अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं कि वह कितनी गर्म होगी। उसके बाद उस हिसाब से आप यह तय करते हैं कितना सिप लेना है।
पहले के मुकाबले अब पाठक बहुत सजग हो गया है। पाठक प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा है। मेरा मानना है कि आज के दौर में तमाम समाचार माध्यमों के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है। मैं फिर यही कहूंगा कि यदि किसी समाचार माध्यम या ब्रैंड विशेष अथवा प्रॉडक्ट विशेष के प्रति कोई विश्वास घटा है तो उसकी वजह कोई दूसरा कारण नहीं है, बल्कि वहां पर बैठे जो जिम्मेदार अथवा कर्तव्यशील लोग हैं, उनके आचरण में कहीं न कहीं कोई कमी आई है।
इस फील्ड में कार्यरत अथवा नवागत पत्रकारों के लिए आप क्या संदेश या यूं कहें कि सफलता का क्या ‘मूलमंत्र’ देना चाहेंगे?
जैसा कि मैंने अभी कहा कि अब इस पेशे में प्रोफेशलिज्म आया है। पत्रकार फॉर्मेट में काम करने के अभ्यस्त हो रहे हैं। जीवनशैली के प्रति अनुशासन बढ़ा है। नई पीढ़ी से मैं सिर्फ गुजारिश कर सकता हूं कि पढ़ने का अभ्यास डालिए। पढ़ने का अभ्यास न होने से शब्द संपदा संकुचित हो रही है। शब्द कम हो रहे हैं। आप जितना पढ़ते हैं, उतना आपका शब्द सामर्थ्य बढ़ता है। आपकी शब्द संपदा बढ़ती है। यह पढ़ने का अभ्यास न होने का कारण ही है कि तमाम जो कॉपियां लिखी जाती हैं, उनमें वैसा अलंकरण नहीं दिखता है, जो पहले की कॉपियों में अपेक्षाकृत दिखता था। मेरे कहने का आशय यही है कि आप ज्यादा से ज्यादा पढ़िए। जितना ज्यादा से ज्यादा पढ़ेंगे, शब्द संपदा उतनी बढ़ेगी और वह आपकी लेखनशैली में भी परिलक्षित होगी।