पत्रकार को सबसे पहले बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए: हितेश शंकर
वरिष्ठ पत्रकार और जानी-मानी साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्रिका ‘पांचजन्य’ के संपादक हितेश शंकर ने मीडिया से जुड़े तमाम अहम पहलुओं को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।
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पंकज शर्मा
Published -
Monday, 16 January, 2023
Last Modified: Monday, 16 January, 2023
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वरिष्ठ पत्रकार और जानी-मानी साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्रिका ‘पांचजन्य’ (PANCHJANYA) के संपादक हितेश शंकर ने मीडिया में हो रहे बदलाव, नई टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल, मीडिया की चुनौतियां और फेक न्यूज के बढ़ते खतरे समेत तमाम अहम पहलुओं को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश:
सबसे पहले आप अपने बारे में बताएं। यानी आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा, पढ़ाई-लिखाई कहां से हुई और मीडिया में कैसे आए?
मेरा जन्म दिल्ली में एक सामान्य परिवार में हुआ। मेरे पिताजी शिक्षक और माताजी होम्योपैथिक डॉक्टर थीं। दोनों ने अपना पूरी जीवन समाजसेवा को समर्पित कर रखा था और नि:शुल्क सेवा करते थे। वहीं के एक सरकारी विद्यालय में मेरी प्रारंभिक पढ़ाई हुई। हालांकि, पत्रकारिता में मेरी कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं रही, लेकिन पढ़ने-लिखने का शौक हमारे परिवार में सभी को रहा। पिताजी के पास एक पुस्तकालय की भी जिम्मेदारी थी। हमें शुरू से ही पढ़ाई का माहौल मिला, ऐसे में हम काफी किताबें पढ़ते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स करने के बाद लगा कि मुझे कुछ और नहीं, सिर्फ लिखने-पढ़ने का काम ही करना है। इसके बाद इस दिशा में गति मिलती गई और धीरे-धीरे मैं पत्रकारिता में आ गया।
मीडिया में अपने अपने अब तक के सफर के बारे में बताएं।
मैंने कम उम्र में ही लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया था। कॉलेज के दिनों में ही मैं स्वदेशी आंदोलन की एक पत्रिका के संपादक मंडल में शामिल हो गया था। हमारी छोटी सी टीम थी, जिसमें सभी लोग मिलकर काम करते थे। उस समय औपचारिक तौर पर तो मेरे पास डिग्री नहीं थी, लेकिन कला में मेरा रुझान था। मैं पोट्रेट और पेटिंग बनाता था, फिर मैं उसमें कार्टून्स बनाने लगा। इसके अलावा भी मैगजीन से जुड़े सभी काम जैसे-ट्रांसलेशन, रिपोर्टिंग आदि हम सब मिलकर करते थे। कह सकते हैं कि पत्रकारिता वहां से शुरू हुई, फिर ‘दैनिक जागरण’, ‘इंडिया टुडे’ और ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़ गया। छोटे समय में मुझे बड़े-बड़े संपादकों के साथ काम करने का मौका मिला और अब मैं ‘पांचजन्य’ में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं।
पहली नौकरी हमेशा खास होती है। पहली नौकरी के कुछ अनुभव जो आप हमसे शेयर करना चाहें?
देखिए, अपनी पहली नौकरी को मैं नौकरी नहीं मानता और पत्रकारिता को मैं इसलिए भी नौकरी नहीं मानता, क्योंकि यह मेरे मन का काम था। मैंने कम्युनिकेशंस में मास्टर्स करने के अलावा एमबीए (एडवर्टाइजिंग) किया है। ऐसे में एडवर्टाइजिंग की दुनिया के भी कुछ अनुभव रहे। नि:संदेह, वहां पैसा, चमक और ग्लैमर था, लेकिन मैं वहां से छोड़कर पत्रकारिता में आ गया और ‘दैनिक जागरण’ जॉइन कर लिया। हालांकि, मेरे उस निर्णय पर घर-परिवार समेत कई लोगों ने तमाम तरह की बातें कीं, लेकिन मैंने पत्रकारिता में काम करने का ही मन बना लिया था। सवारी वाहनों की बात करें तो उस समय नोएडा आना-जाना आज की तरह इतना आसान नहीं होता था। रात को कई बार सवारी वाहन नहीं मिलता था तो ऐसे में हम वहीं रुक जाते थे और तड़के अखबार ले जाने वाली गाड़ी से घर निकलते थे। तमाम बार तो ऐसा होता था कि हम सुबह चार-पांच बजे घर पहुंचते थे और फिर दोपहर में तैयार होकर अखबार के दफ्तर के लिए निकल जाते थे। खबरों पर हमारी पूरी नजर रहती थी। ऐसे में न्यूज रूम के भी तमाम अनुभव हैं।
पत्रकारिता की दुनिया में हम रोजाना तमाम तरह की घटनाओं से रूबरू होते हैं। इनमें कई घटनाएं ऐसी होती हैं, जो हमारे मन-मस्तिष्क में अंकित हो जाती हैं और जीवन भर याद रहती हैं, क्या इस तरह की कोई घटना आपको याद है?
ऐसी एक नहीं, कई घटनाएं हैं। जैसे-मुंबई में जब आतंकी हमला हुआ था, तब हमने और हमारी टीम ने दिन-रात लगातार कवरेज की थी। वह घटना बहुत बड़ी थी, जिसमें हमारी टीम ने काफी काम किया और लोगों तक लगातार उस घटना से जुड़ी खबरें पहुंचाईं। इसी तरह कल्पना चावला के साथ जब हादसा हुआ, उस रात को भी हम नहीं भूल सकते हैं। इसके अलावा पांचजन्य में भी हमारे कुछ ऐसे अनुभव रहे कि जब इसे पत्रिका के स्वरूप में लेकर आए तो यह काफी बड़ी चुनौती थी। एक साप्ताहिक को जब हम पत्रिका के स्वरूप में लाते हैं तो उसकी डमी, स्टाइल और इनपुट फ्लो यानी बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। यह पूरी टीम के लिए एक नया अनुभव था। फिर जब हमने बाबा साहेब पर अंक निकाला तो उस दौरान पांच दिन तक हमारी टीम कार्यालय में ही रही। उस अंक ने कीर्तिमान बनाया। गोवा में हुए इवेंट में भी हमारी टीम ने करीब 82 घंटे तक जिस तरह से काम किया, वह वाकई में काबिले तारीफ है।
जब आपने पत्रकारिता शुरू की थी और आज के दौर की पत्रकारिता की यदि तुलना करें तो आपकी नजर में इसमें कितना बदलाव आया है?
यदि हम बदलाव की बात करें तो एक पंक्ति का कथन है कि परिवर्तन अपरिवर्तनीय नियम है और आप इसे टाल नहीं सकते हैं। नहीं तो समय आपको रौंदते हुए निकल जाएगा। इसलिए पत्रकार को तो सबसे पहले बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि वह समय के साथ कदमताल करते हुए चलता है। दूसरों को सजग करते हुए और बताते हुए चलता है। पांचजन्य की ही बात करें तो इस पत्रिका के लिए तमाम बदलावों को आत्मसात करना और उनके साथ चलाना एक ज्यादा बड़ी चुनौती थी। हमने अपनी टीम को नए सॉफ्टवेयर के लिए तैयार किया और उन्हें नए सॉफ्टवेयर पर काम करने का प्रशिक्षण दिलाया। इसके अलावा भी तमाम तरह की चुनौतियां थीं, लेकिन अब काफी चीजें व्यवस्थित हो गई हैं। आजकल टेक्नोलॉजी का काफी विकास हो गया है, उसने भी पत्रकारिता को बहुत गति दी है।
आजकल फेक न्यूज काफी तेजी से आगे बढ़ रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फेक न्यूज के प्रति गंभीर चिंता जताते हुए फैक्ट चेकिंग पर जोर दिया था, इस बारे में आपका क्या कहना है?
मुझे लगता है कि यह मीडिया का सबसे बड़ा प्रश्न है। मैं इसमें तीन तरह के वर्गीकरण देखता हूं। एक मिसइंफॉर्मेशन (Misinformation), दूसरा डिसइंफॉर्मेशन (Disinformation) और तीसरा मैलइंफॉर्मेशन (Malinformation) है। मिसइंफॉर्मेशन में आपकी सूचना गलत हो सकती है, लेकिन मंशा गलत नहीं हो सकती। डिसइंफॉर्मेशन में सूचना को तोड़-मरोड़ दिया जाता है, क्योंकि इसमें मंशा गलत रहती है। मैलइंफॉर्मेशन में ये है कि संदर्भ से अलग किसी चीज को रखा जाता है, क्योंकि इसमें मंशा गलत होती है। खबर सही होती है, लेकिन मंशा गलत होती है। मुझे जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगती है, वह यह है कि एक तो तकनीक बढ़ने से तमाम तरह के तथाकथित पत्रकार भी सामने आ गए हैं। ऐसे में पत्रकार कौन होगा, मीडिया संस्थान किसे कहेंगे, इसे आज के दौर में परिभाषित करने की बड़ी चुनौती है। मैं ये नहीं कह रहा कि खराब काम हो रहा है अथवा अच्छा काम हो रहा है, लेकिन पत्रकार और पत्रकारिता को प्रमाणित करना बड़ी चुनौती है।
आपकी नजर में फेक न्यूज की रोकथाम के लिए क्या कोई ठोस ‘फॉर्मूला’ है?
मेरा मानना है कि किसी भी खबर पर आगे बढ़ने से पहले एक फैक्ट चेक शीट बनानी चाहिए। इसके आधार पर आप रेडियो की कॉपी भी लिख सकते हैं, डिजिटल के लिए भी कर सकते हैं। प्रिंट के लिए भी फाइल कर सकते हैं और इंटरव्यू की भी तैयारी कर सकते हैं। कहने का मतलब है कि सबसे पहले तथ्य दुरुस्त रखने चाहिए।
आज के दौर में मीडिया की क्रेडिबिलिटी भी सवालों के घेरे में है। क्या आपको लगता है कि मीडिया की क्रेडिबिलिटी कम हुई है? यदि हां, तो इसके पीछे क्या कारण है और इस क्रेडिबिलिटी को फिर से बनाने अथवा बरकरार रखने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए?
देखिए, मैं मानता हूं कि मीडिया और शिक्षा दोनों की क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में है। मेरा मानना है कि यदि मीडिया आत्मचिंतन नहीं करता और खुद को तैयार नहीं करता तो साख का ये संकट गहराएगा। आने वाली पीढ़ी को तथ्य के लिए आग्रह, सत्य के लिए आग्रह और देश के लिए आग्रह करना पड़ेगा और इस दिशा में कदम उठाने पड़ेंगे।
तमाम अखबारों-मैगजींस में एडिटोरियल पर मार्केटिंग व विज्ञापन का काफी दबाव रहता है। चूंकि आप भी एक जानी-मानी मैगजीन के संपादक हैं, ऐसे में आपकी नजर में एक संपादक इस तरह के दबावों से किस तरह मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से संपादकीय कार्यों का निर्वहन कर सकता है?
इस प्रश्न को हमेशा अधूरे तरीके से देखा जाता है। जैसा मैंने बताया कि मैंने पत्रकारिता के साथ-साथ विज्ञापन और मार्केटिंग की पढ़ाई भी की है। आपकी खबर यदि रोचक होगी, रुचिपूर्ण होगी और उसे पढ़ने-देखने वाले होंगे तो सबके लिए एक रेवेन्यू मॉडल बनता है। पत्रकारिता यदि सभी रेवेन्यू मॉडल को ध्वस्त करके कहे कि आपको हमारा खर्चा चलाना है तो ऐसे पत्रकारिता नहीं चलती है। समाज की अपेक्षाओं के साथ उसकी रुचि की पत्रकारिता करते हुए भी मुनाफे के साथ चल सकते हैं। यह समय का आग्रह है। मैं समझता हूं कि ये विज्ञापन का दबाव नहीं है, यदि जनअभिरुचियों का दबाव संपादकीय विभाग समझता है और उसके साथ चलता है तो समाज का जो प्रतिसाद है, वह पत्रकारिता को जीवित रखता है और उसे ठीक रखता है।
तमाम पत्रकारों पर आजकल एजेंडा चलाने के आरोप लगते हैं। क्या कभी आपको भय, लालच अथवा अन्य किसी भी प्रकार द्वारा एजेंडा चलाने के लिए दबाव का सामना करना पड़ा है?
अभी मैं पांचजन्य में हूं और इससे पहले भी संस्थानों में रहा हूं और सभी मुख्यधारा के संस्थान रहे हैं। मैं ये मानता हूं कि आज भी कुछ पोर्टल्स और एकाध मीडिया घरानों को छोड़ दें, जिनका वित्तपोषण इस दृष्टि से ही किया गया है, उन्हें छोड़ दें तो बाकी सभी जगह न्यूजरूम्स अभी भी दबावों से मुक्त हैं। वहां पर वो पत्रकार है जो अपनी बात कहता है। यदि प्राइम टाइम में नहीं कहेगा तो सोशल मीडिया अथवा किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर कह देगा। मैं ये मानता हूं कि अपनी समझ, रुचि, प्रेरणा और अपनी क्षमता के हिसाब से लोग स्टैंड लेते हैं। जैसे ट्विटर पर ट्रेंडिंग आती है और थोड़ी देर में ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है कि कौन गलत जगह पर खड़ा हुआ है। अब ऐसा नहीं है कि आप कुछ भी बोलेंगे और निकल जाएंगे, समाज आईना दिखा देता है। इसलिए एजेंडा किसी का चलता नहीं है।
कोरोनाकाल में तमाम प्रिंट पब्लिकेशंस को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सर्कुलेशन काफी प्रभावित हुआ, लोगों ने घरों पर मैगजींस/अखबार मंगाने बंद कर दिए थे। अब जबकि कोविड लगभग खत्म हो चुका है। ऐसे में अखबारों/मैगजींस के नजरिये से वर्तमान दौर को आप किस रूप में देखते हैं। क्या प्रिंट पब्लिकेशंस कोविड से पहले के दौर की तरह अपनी पहुंच फिर बनाने में और टीवी व डिजिटल को टक्कर देने में कामयाब रहेंगे?
पत्रकारिता की अपनी पूरी यात्रा और साथ में तकनीक को बढ़ते हुए देखकर मेरा मानना था कि भारत में प्रिंट की यात्रा कम से कम 2040 तक रहनी चाहिए। उसमें भी भाषाई पत्रकारिता या वैचारिक पत्रकारिता, उसकी भी जड़ें गहरी हैं या जो वांशिक सदस्यता के मॉडल पर चलते हैं, उनके लिए संभावनाएं अच्छी हैं क्योंकि उनका एक रेवेन्यू मॉडल रहता है। लेकिन, कोविड के बाद में यह समय शायद थोड़ा और पांच-सात साल घट गया होगा। ऐसा नहीं है कि तकनीक के इस दौर में प्रिंट उसी तरह से लहलहाएगा। एक चीज और है कि बाकी दुनिया में मीडिया की जो स्थिति है, भारत की उससे अलग है। ऐसा इसलिए भी कि दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत में साक्षरता की दिशा में बड़े कदम काफी देरी से उठाए गए, इसलिए यहां मीडिया भी देरी से पनपा और फैला। खबरों के लेकर तकनीक ने चीजें काफी बदल दी हैं। अब आप खबर को सिर्फ पढ़ नहीं सकते, उसे देख सकते हैं, सुन सकते हैं और उस पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। यह प्रिंट के लिए बड़ी चुनौती है। भारत में प्रिंट के ज्यादा बढ़ने की संभावनाएं तो अभी मैं नहीं देखता हूं। मगर, उसकी सिनर्जी अवश्य आगे बढ़ेगी। क्योंकि प्रिंट के जो बड़े पत्रकार हैं, जिनकी भाषा अच्छी है, जिनके तथ्य ठीक हैं, जिन्हें खबर की समझ है, वो भविष्य की पत्रकारिता के लिए रीढ़ साबित होने वाले हैं।
आपको ‘पांचजन्य’ को आधुनिक बनाने, पृष्ठ सज्जा व कंटेंट के मामले में दूसरे मीडिया संस्थानों को टक्कर देने और आज के पाठकों के लिए प्रासंगिक बनाए रखने के लिए तमाम प्रयोग करने का श्रेय दिया जाता है। जैसे-आपने इसकी डिजिटल मौजूदगी को आगे बढ़ाया है, मैगजीन को भी नया रूप दिया है। अभी और किस तरह के बदलाव हमें इसमें देखने को मिलेंगे?
मैं सभी तकनीकी बदलावों का खुलासा नहीं करूंगा, लेकिन बता दूं कि इसके लिए सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि मेरी पूरी टीम मेहनत करती है। हम डिजाइनिंग और कलर सलेक्शन समेत तमाम अन्य पहलुओं पर अपनी टीम के साथ बैठकर चीजें फाइनल करते हैं। हमारी टीम के सभी सदस्य परिवार की तरह मिलकर काम करते हैं और आप कह सकते हैं कि यह परिवार की प्रगति है, विचार की प्रगति है।
‘पांचजन्य’ पर तमाम लोग इस तरह के आरोप लगाते हैं कि ‘आरएसएस’ की विचारधारा से प्रेरित होने के कारण यह हिंदुत्ववादी सोच को ही प्रमुखता देती है औऱ सिर्फ उसी को विचारों को आगे बढ़ाती है। इन आरोपों के बारे में आपका क्या कहना है?
आपको बता दूं कि संघ की विचारधारा को इस देश की विचारधारा मैं इसलिए कहता हूं कि संघ की प्रार्थना में आपको हिंदू शब्द भी मिलता है, भारत शब्द भी मिलता है और भारत माता की जय करते हुए वह प्रार्थना पूरी होती है। तो मैं नहीं मानता कि संघ का विचार भारत विरोधी विचार है और भारत विरोधी विचार की पत्रकारिता करनी है, ऐसा भी मैं बिल्कुल नहीं मानता। दूसरी बात कि यह संघ की पत्रिका है, ऐसा आप तकनीकी तौर पर नहीं कह सकते हैं। ‘भारत प्रकाशन दिल्ली लिमिटेड’ एक कंपनी है और अपने हिसाब से चलती है। यहां पर ये नहीं है कि संघ चयन करता हो या किसी चीज का भुगतान करता हो। ऐसा भी नहीं है कि वेतन भुगतान अथवा नियुक्तियां संघ से होती हैं। एक राष्ट्रीय विचार है, जिसकी पत्रकारिता हम करते हैं। यह सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता है, इसमें मुझे नहीं लगता कि आरोप जैसी कोई बात है।
खुले विचारों वाले निष्पक्ष पत्रकार के रूप में आपकी गिनती होती है। ऐसे में मीडिया में करियर बनाने के इच्छुक अथवा इसमें आने वाले नवोदित पत्रकारों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे, सफलता का कोई ‘मूलमंत्र’ जो आप उन्हें देना चाहें।
आपका यह प्रश्न आने वाली पीढ़ी के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि मैं कई जगह रहा हूं और अभी पांचजन्य में हूं। यह वैचारिक पत्रकारिता है। आप जिसे मुख्यधारा कहते हैं, यह मुख्यधारा में होते हुए भी वैचारिक पत्रकारिता है। मीडिया में आने वाले युवाओं को मैं यही कहूंगा कि वैचारिक पत्रकारिता की ओर बढ़ने से पहले अपना वैचारिक आधार मजबूत कर लें। आपका वैचारिक आधार कुछ भी हो सकता है। अगर आपको अपने वैचारिक आधार की समझ है और उसके लिए अगर आप बढ़ सकते हैं, लड़ सकते हैं, न्यूजरूम में झगड़ सकते हैं तो आप उस विचार का भला करेंगे अन्यथा किसी पक्ष में कहीं पर भी खड़े रहेंगे तो मेरा कहना है कि पत्रकारिता पर बोझ मत बनो। क्योंकि, विचार को समझिए, उसके प्रति आपकी निष्ठा है और समर्पण है तो आपकी पत्रकारिता में वह दिखाई देगा। अन्यथा, पत्रकारिता की आपकी यात्रा के बीच में तमाम चुनौतियां आएंगी और वह यात्रा बीच में ठिठक सकती है।
सुना है कि आपने कई फिल्में भी डायरेक्ट की हैं। उनके बारे में कुछ बताएं। क्या निकट भविष्य में भी किसी फिल्म के डायरेक्शन की योजना है?
आपने सही सुना है। आप कह सकते हैं कि यह मेरी रुचि का विषय रहा है। मीडिया में आने पर हम उसके अलग-अलग माध्यमों में काम करते रहे हैं। वर्ष 2003 में हम लोगों ने ‘Ropes In Their Hand’ नाम से एक फिल्म तैयार की थी। इस फिल्म में दिखाया गया था कि बाल मजदूरों के साथ तमाम सर्कस में किस तरह का शोषण होता है। मैं इस फिल्म का क्रिएटिव डायरेक्टर था। यह फिल्म न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत भी हुई थी।
इसके बाद वन्यजीवों पर काम करने वाले प्रतिष्ठित नाम नरेश बेदी जी और राजेश बेदी जी के साथ मिलकर 13 भागों की एक सीरीज ‘Wild Adventures Ballooning With Bedi Brothers’ की स्क्रिप्टिंग और क्रिएटिव्स का काम भी मैंने किया है। कुछ दूरदर्शन के शो भी किए हैं। करीब चार साल से पांचजन्य की टीम एक विषय पर काम कर रही थी कि विभाजन के समय जो लोग यहां आए, उनकी आपबीती उन्हीं से सुनना और समाज के सामने रखना। पिछले साल हम इस काम में तेजी लाए और इस शोध के बाद हमने एक पुस्तक तैयार की और फिर उसके आधार पर एक फिल्म का निर्माण भी किया।
हमने तो इसे यूट्यूब के लिए बनाया था, लेकिन जब एंट्री भेजी तो यह इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए भी चुनी गई। इसके बाद हमने गोवा को मुक्ति संग्राम पर एक फिल्म है, उसका शोध किया है। इस फिल्म का पहला कट अभी हमने रिलीज किया था। पांचजन्य इस देश के लिए काम करने की प्रेरणा है और हम कभी डिजिटल में तो कभी फिल्मों में तरह-तरह के काम करते रहते हैं। जैसा कि मैंने अभी कहा कि कंटेंट में अगर सच है तो लोग उसे देखते हैं।
समाचार4मीडिया के साथ हितेश शंकर की इस पूरी बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।
देश के AI सफर का अगला अध्याय तय करेगा ‘AIAI’: डॉ. संदीप गोयल
‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ खास बातचीत में ‘रेडिफ्यूजन’ के चेयरमैन डॉ. संदीप गोयल ने ‘एआई एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की अहम भूमिका, ‘एथिकल एआई’ पर अपने विचार समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार शेयर किए।
भारत की ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ एआई क्रांति उसकी तैयारी से कहीं आगे निकल चुकी है। देश के रचनात्मक, सांस्कृतिक और नीतिगत इकोसिस्टम पर इसका गहरा प्रभाव महसूस किया जा रहा है। इसी के तहत देश के कुछ सबसे प्रभावशाली इंडस्ट्री लीडर्स ने मिलकर ‘एआई एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (AIAI) की शुरुआत की है। यह अपनी तरह का पहला ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नैतिक, सांस्कृतिक और विनियामक मानकों को परिभाषित करना है।
‘रेडिफ्यूजन’ (Rediffusion) के चेयरमैन और देश में मीडिया व टेक सेक्टर की सबसे अनुभवी शख्सियतों में से एक डॉ. संदीप गोयल के नेतृत्व में AIAI खुद को एक वॉचडॉग नहीं, बल्कि एक आर्किटेक्ट के रूप में स्थापित कर रहा है। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ खास बातचीत में ‘रेडिफ्यूजन’ के चेयरमैन डॉ. संदीप गोयल ने ‘एआई एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (AIAI) की अहम भूमिका, ‘एथिकल एआई’ पर अपने विचार समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार शेयर किए। इस दौरान उन्होंने ‘AIAI’ के गठन के पीछे की सोच के बारे में भी विस्तार से बताया है।
प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
देश का एआई इकोसिस्टम उसकी रेग्युलेटरी तैयारियों से कहीं तेजी से आगे बढ़ रहा है। वह कौन-सा मुख्य गैप या खतरा था, जिसे आपने और अन्य इंडस्ट्री लीडर्स ने पहचाना और जिसकी वजह से AIAI का गठन जरूरी हो गया?
हमें आने वाले समय की तस्वीर साफ दिखाई दे रही थी। देश तेजी से जेनरेटिव एआई अपना रहा है। चाहे कोर्टरूम में बॉट द्वारा लिखे जा रहे तर्क हों या बॉलीवुड की स्क्रिप्ट्स, जिन्हें मशीन लर्निंग से तैयार किया जा रहा है, लेकिन इस तेज रफ्तार को निर्देशित, सुरक्षित या नियंत्रित करने के लिए जरूरी ढांचे लगभग नदारद हैं। असल कमी इनोवेशन में नहीं, बल्कि संस्थागत भरोसे और नैतिक ढांचे में थी।
‘AIAI’ की शुरुआत एक बहुत स्पष्ट खतरे के कारण हुई कि भारत—जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है—अनजाने में विदेशी एआई टूल्स का केवल एक निष्क्रिय उपभोक्ता बनकर रह जाए और अपने सांस्कृतिक, नैतिक और कानूनी मानक खुद परिभाषित न कर पाए।
हमें डर है डीपफेक्स के हथियार बन जाने का, कलाकारों की क्रेडिट लाइन खत्म होने का और बिना किसी जवाबदेही के ब्लैक-बॉक्स एआई टूल्स की बाढ़ से बाजार भर जाने का। इसीलिए हम अलार्मिस्ट नहीं, बल्कि आर्किटेक्ट के रूप में सामने आए हैं। AIAI हमारा जवाब है उस तत्काल जरूरत का, जिसमें एक ऐसा राष्ट्रीय जड़ों से जुड़ा, इंडस्ट्री-नेतृत्व वाला निकाय चाहिए, जो नवाचार यानी इनोवेशन को संप्रभुता (sovereignty) के साथ जोड़ सके।
AIAI का गठन इनोवेशन और नैतिकता के सवाल पर किया गया है। आज देश के संदर्भ में ‘एथिकल एआई’ का वास्तविक अर्थ क्या है? और यह प्लेटफ़ॉर्म इसे लागू करने योग्य या अपनाने योग्य मानकों में कैसे बदलेगा?
आज भारत में ‘एथिकल एआई’ का मतलब तीन प्रमुख बातें हैं:
1: सांस्कृतिक संरेखण (Cultural alignment): यह सुनिश्चित करना कि एआई सिस्टम भारत की विविधता को मिटाए या उसका गलत प्रतिनिधित्व न करें।
2: पारदर्शिता और क्रेडिट (Transparency & Attribution): खासकर रचनात्मक क्षेत्रों में—जहां मौलिकता, सहमति और लेखकीय अधिकार बेहद महत्वपूर्ण हैं।
3: डिजाइन में समावेशन (Inclusion by design): ताकि हमारे एआई टूल्स सिर्फ डिजिटल रूप से सक्षम अभिजात वर्ग नहीं, बल्कि हर भारतीय की सेवा करें।
AIAI एक ऐसा मानक ढांचा (standards framework) तैयार कर रहा है, जो यह करेगा:
मीडिया, डिज़ाइन, विज्ञापन और संगीत जैसे क्षेत्रों में एआई टूल्स का एथिकल कम्प्लायंस सर्टिफिकेशन।
ऐसे ओपन डेटासेट्स विकसित करना, जो भारत की भाषाई, क्षेत्रीय और कलात्मक विविधताओं को सही रूप में दर्शाएं।
बायस, स्रोत-प्रामाणिकता (provenance) और बौद्धिक संपदा (IP) की शुचिता के लिए ऑडिट गाइडलाइंस तैयार करना।
सबसे महत्वपूर्ण बात—हम यह काम अलग-थलग नहीं कर रहे हैं। हम इसे स्टार्टअप्स, विधि विशेषज्ञों, सांस्कृतिक संस्थाओं और सरकारी निकायों के साथ मिलकर तैयार कर रहे हैं, ताकि इन मानकों को सिर्फ सराहा ही न जाए, बल्कि वास्तव में अपनाया भी जा सके।
नेशनल संयोजक के रूप में, आप कैसे देखते हैं कि AIAI एक विश्वसनीय नीति-निर्माण वाला प्लेटफॉर्म बने? सिर्फ एक और इंडस्ट्री एसोसिएशन नहीं, बल्कि ऐसा निकाय जिसे सरकार एआई विनियमन पर गंभीरता से सलाहकार के रूप में माने?
AIAI का जो गवर्निंग बोर्ड जल्द घोषित होने वाला है, उसमें देश के शीर्ष उद्योगपति, सांस्कृतिक विशेषज्ञ, टेक्नोलॉजी लीडर्स और कई अन्य प्रख्यात नाम शामिल होंगे। विश्वसनीयता दावा करने से नहीं मिलती, यह उस कार्य से हासिल होती है, जो नियम बनने से पहले किया जाता है। हमारा लक्ष्य सिर्फ इंडस्ट्री की जार्गन-भरी गूंज बनना नहीं है। इसके बजाय AIAI खुद को भारत के ‘फर्स्ट-मूवर फोरम’ के रूप में स्थापित कर रहा है—यानी ऐसा मंच जो सरकार की जरूरत से पहले ही व्यवहारिक policy briefs जारी करेगा, ड्राफ्ट गाइडलाइंस तैयार करेगा और ethics charters का पायलट परीक्षण करेगा। हम पहले ही MeitY, नीति आयोग और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ बातचीत की शुरुआत कर चुके हैं। हम जानते हैं कि एआई भारत के 50 लाख रचनात्मक पेशेवरों—लेखकों, निर्देशकों, डिजाइनरों, इन्फ्लुएंसर्स—पर कैसे असर डालता है, सिर्फ कोडर्स और CTOs पर नहीं।
भारत डेटा संप्रभुता, सांस्कृतिक पक्षपात, आईपी संरक्षण और वर्कफोर्स डिसरप्शन जैसी अनोखी एआई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें से AIAI सबसे पहले किस मुद्दे को प्राथमिकता देगा और क्यों?
हमने अपनी पहली रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में रचनात्मक कार्यों में आईपी संरक्षण (IP protection) को चुना है। क्योंकि यही सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा है। जेनरेटिव एआई का इस्तेमाल पहले से ही विज्ञापन अभियानों, स्क्रीनप्ले, सोशल मीडिया फ़िल्टर्स और फैशन प्रोटोटाइप्स में हो रहा है। अक्सर बिना श्रेय (attribution), सहमति (consent) या किसी ट्रेसबिलिटी के। यदि हमने इसे अभी संबोधित नहीं किया, तो जोखिम सिर्फ नौकरियों का नहीं, बल्कि पहचान (identity) के खोने का भी है।
हम सक्रिय रूप से इन बिंदुओं पर काम कर रहे हैं:
Creative AI Attribution Protocol स्थापित करना
एआई-जनित कंटेंट की ओनरशिप के लिए कानूनी ढाँचे का समर्थन
क्रिएटर्स को यह गाइड करना कि वे अपने काम को कैसे लाइसेंस, वॉटरमार्क या सुरक्षित कर सकते हैं
जब यह आधार मजबूत हो जाएगा, तब हम डेटा संप्रभुता (data sovereignty) और समावेशन (inclusion) पर विस्तार करेंगे—क्योंकि यदि हमारे डेटासेट पर नियंत्रण नहीं रहा, तो हमारी नैतिकता भी बाहरी स्रोतों पर निर्भर हो जाएगी।
स्टार्टअप्स, बड़ी कंपनियां, क्रिएटर्स और नीति-निर्माता, ये सभी एआई को अलग-अलग उम्मीदों और चिंताओं के साथ देखते हैं। AIAI इन समूहों के बीच भरोसा कैसे बनाएगा?
AIAI में भरोसा कोई उप-उत्पाद नहीं, बल्कि एक डिजाइन लक्ष्य है। हम एसोसिएशन को एक सहयोगी ढांचे (collaborative architecture) के रूप में संरचित कर रहे हैं, न कि ऊपर-से-नीचे चलने वाली किसी नौकरशाही की तरह।
हर वर्किंग ग्रुप—चाहे वह नीति, रिसर्च, स्किलिंग या एथिक्स पर काम करे—में कम से कम ये लोग शामिल होंगे:
एक स्टार्टअप फाउंडर
एक बिग-टेक प्रतिनिधि
एक क्रिएटिव प्रोफेशनल
एक विधि/नीति विशेषज्ञ
यह मल्टी-स्टेकहोल्डर मॉडल सुनिश्चित करता है कि कोई भी एकल दृष्टिकोण पूरे नैरेटिव पर हावी न हो। इसके अलावा, हम AIAI Trust Index लॉन्च करने की योजना बना रहे हैं, यह अपनी तरह का पहला ढांचा होगा, जो भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए एआई टूल्स की पारदर्शिता, निष्पक्षता और अनुपालन के आधार पर रेटिंग करेगा। समय के साथ, यह ट्रस्ट इंडेक्स एक ऐसी प्रतिष्ठात्मक मुद्रा (reputational currency) बन जाएगा, जिसे कंपनियां और क्रिएटर्स महत्व देंगे।
एआई के तेजी से विकास को देखते हुए, पारंपरिक नियामक चक्र शायद पहले ही धीमे पड़ गए हैं। AIAI अपनी मार्गदर्शन को वास्तविक समय में प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कौन से गतिशील और अनुकूलनीय (adaptive) तंत्र पेश करने की योजना बना रहा है?
आप बिल्कुल सही हैं, पुराने नियमों की रफ्तार एआई युग में टिक नहीं पाएगी। इसी कारण, AIAI ‘लिविंग फ्रेमवर्क्स’ बना रहा है। इसमें मॉड्यूलर, संपादन योग्य और संस्करण-नियंत्रित नीति ब्लूप्रिंट्स, जिन्हें तिमाही आधार पर विशेषज्ञों की सलाह से अपडेट किया जाएगा।
मुख्य तंत्र इस प्रकार हैं:
रीयल-टाइम एथिक्स सैंडबॉक्स (Real-Time Ethics Sandbox): जहां स्टार्टअप्स एआई टूल्स का परीक्षण कर सकते हैं और AIAI से नैतिक, सांस्कृतिक और कानूनी कमजोरियों पर प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं।
एआई इनसिडेंट रजिस्ट्री (AI Incident Registry): भारत में सार्वजनिक रचनात्मक एआई टूल्स में दुरुपयोग या पक्षपात (bias) को ट्रैक और संबोधित करने के लिए।
फ्लैश पैनल्स (Flash Panels): तेज, 48 घंटे के विशेषज्ञ समूह जो उभरते खतरे—जैसे चुनावों में डीपफेक्स या सिंथेटिक इन्फ्लुएंसर्स—पर मार्गदर्शन तैयार करेंगे।
इस तरह, AIAI सिर्फ खबरों के पीछे नहीं भागेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत अपने एआई सफर का अगला अध्याय कैसे लिखे।
महिला पत्रकारों के प्रमुख संगठन 'Indian women's Press Corps' (IWPC) ने हाल ही में अपनी 31वीं वर्षगांठ मनाई। इस मौके पर दिल्ली स्थित जवाहर भवन में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। देश के मुख्य न्यायाधीश (नामित) न्यायमूर्ति सूर्यकांत के मुख्य आतिथ्य में हुए इस कार्यक्रम में नियाजी निजामी ब्रदर्स ने शानदार प्रस्तुति देकर समां बांध दिया।
इस मौके पर 'Indian women's Press Corps' (IWPC) की प्रेजिडेंट सुजाता राघवन से समाचार4मीडिया ने विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
सबसे पहले तो आप हमारे पाठकों को अपने बारे में बताएं?
मैं सुजाता राघवन हूं। मैं मूल रूप से डेवलपमेंट कम्युनिकेशन से जुड़ी हूं। मैंने चरखा नाम के एक संगठन के तहत चलने वाली त्रिभाषीय (हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू) फ़ीचर सेवा की संपादक के रूप में काम किया। मैं एक सोशल डेवलपमेंट राइटर हूं। मैं वर्ष 2011 में IWPC की सदस्य बनी। वर्ष 2023 में मैं मैनेजिंग कमेटी में शामिल हुई और पिछले वर्ष मैं जॉइंट सेक्रेटरी के रूप में चुनी गई। इसके बाद अब मैं बतौर प्रेजिडेंट इस संस्था में अपनी भूमिका निभा रही हूं।
बतौर IWPC प्रेजिडेंट आपके अब तक के कार्यकाल में कोई विशेष उपलब्धि जो आप साझा करना चाहें?
यह केवल मेरी नहीं, बल्कि पूरी टीम की उपलब्धि है। अगर आज के कार्यक्रम को देखें तो इसके पीछे एक जिम्मेदारी और विश्वसनीय संस्था के तौर पर हमारी छवि झलकती है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (Designate) ने भी समय देकर एक शानदार भाषण दिया। इसके साथ ही नियाजी निजामी ब्रदर्स, जो विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं, उन्होंने हमारे छोटे से संस्थान के लिए समय निकाला। ऑडियंस में भी ऐसे लोग आए जो समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मुझे लगता है कि ये हमारी उपलब्धि का प्रतीक हैं। IWPC कई दशकों से निरंतर काम कर रहा है और यह उसी सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
IWPC के प्रेजिडेंट के रूप में आपके समक्ष कुछ चुनौतियां भी आती होंगी, उन्हें आप कैसे संभालती हैं?
हमारा काम संस्थान को जीवित और सक्रिय रखना है, ताकि सदस्य यहाँ सीख सकें और एक सुरक्षित, प्रेरक वातावरण पा सकें। हम विभिन्न वर्कशॉप्स और ट्रेनिंग सेशन्स आयोजित करते हैं, ताकि पत्रकारिता कौशल और ज्ञान में सुधार हो। सरकारी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, पार्टी प्रवक्ताओं, राजनेताओं या विदेशी मामलों के विशेषज्ञों के साथ संवाद भी करते हैं।
महिलाओं को, खासकर मीडिया में, अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्टिंग में या अपनी राय खुलकर रखने में, अक्सर उन्हें ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है। यह वही संघर्ष है जो हर पेशेवर महिला को किसी न किसी रूप में झेलना पड़ता है।
इस संस्था के गठन को तीन दशक पूरे हो गए हैं। क्या आपको लगता है कि संस्था अपने उद्देश्यों पर खरी उतर रही है?
हां, बिल्कुल। यह तथ्य कि संस्था 30 से अधिक वर्षों से निरंतर कार्यरत है, अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। हम किसी बड़े फंड से नहीं चलते। सदस्यता शुल्क और एक रसोई से ही संस्था चलती है। हमारा वार्षिकोत्सव कार्यक्रम एक ‘फंड रेजर’ भी होता है। हम इस अवसर पर एक पुस्तिका (स्मारिका) प्रकाशित करते हैं, जो मीडिया और विशेष रूप से महिलाओं से जुड़े विषयों पर आधारित होती है। इसमें हमारी ही सदस्याएं हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अपने लेख लिखती हैं। विज्ञापनों के माध्यम से हम फंड एकत्र करते हैं, जो संस्था के संचालन के लिए पूंजी का कार्य करता है। ऐसे कार्यक्रम हम वर्षों से आयोजित करते आ रहे हैं। यह संस्था महिला पत्रकारों के लिए एक स्पेस (स्थान) प्रदान करती है। जहां वे सीख सकें, संवाद कर सकें और आगे बढ़ सकें।
आज भारतीय मीडिया में महिला नेतृत्व का भविष्य आप किस तरह देखती हैं?
महिलाएं अब हर बीट में जा रही हैं — राजनीति, अपराध, अर्थशास्त्र, विदेश मामलों में भी। पहले के जमाने में महिलाएं सिर्फ फ्लॉवर शो या बेबी शो कार्यक्रमों आदि की रिपोर्टिंग करती थीं। अब समय बदल गया है। जरूरी है कि मीडिया संस्थानों में ऐसा माहौल बने, जो महिलाओं को अवसर दे, उन्हें ग्रूम करे और ऐसा माहौल बनाए कि उन्हें आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।
IWPC ने अपनी 31वीं वर्षगांठ मनाई। इस संस्था के प्रेजिडेंट के तौर पर इस अनुभव के बारे में कुछ बताएं?
बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। हमारी टीम में 20-25 साल का अनुभव रखने वाले सदस्य हैं, जिन्होंने मीडिया और समाज में हुए बड़े बदलावों को देखा है। उनका मार्गदर्शन अमूल्य है। साथ ही नए लोगों में नई ऊर्जा है। यह सहयोग ही हमारी असली ताकत है।
आपको क्या लगता है, आज के दौर में महिला पत्रकारों की चुनौतियां पहले से बढ़ी हैं या घटी हैं?
डिजिटल मीडिया ने पहुंच यानी रीच बढ़ाई है, लेकिन खतरे भी बढ़े हैं। अब कोई भी अपने चैनल या प्लेटफॉर्म से रिपोर्ट कर सकता है, लेकिन प्रतिक्रिया (response) तुरंत और कई बार कठोर आती है। पहले मीडिया हाउस में काम करने से एक सुरक्षा होती थी, अब स्वतंत्र पत्रकार उस सुरक्षा से वंचित हैं। इसलिए जोखिम बढ़े हैं, पर साथ ही प्रभाव और हौसला भी बढ़ा है। अगर हम इन चुनौतियों को अवसर की तरह लें, तो समाज में कुछ न कुछ बदलाव जरूर होता है।
आपकी नजर में महिलाओं के लिए मीडिया में क्या सुधार किए जाने चाहिए?
न्यूजरूम्स को अधिक इंक्लूसिव बनाया जाए। स्टोरी या बीट्स के आवंटन में महिलाओं की राय भी शामिल हो। महिलाओं के दृष्टिकोण अलग होते हैं, उन्हें जगह मिलनी चाहिए। साथ ही, जब उन्हें फील्ड असाइनमेंट पर भेजा जाए, तो सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाए, ख़ासकर संवेदनशील या संघर्ष वाले क्षेत्रों में।
महिला पत्रकारों के लिए IWPC क्या कार्य कर रहा है?
हम नियमित रूप से हेल्थ से जुड़ी बातचीत और अन्य व्यावसायिक चर्चाएं करते हैं। पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है। अब नौकरी या आय की स्थिरता नहीं रही। इसलिए हम बीमा, स्वास्थ्य, और जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान देते हैं। हम कैंसर और डेंटल (दंत) चेकअप कैंप भी आयोजित करते हैं। इसके लिए हम सरकारी अस्पतालों से जुड़ते हैं। इन कैंपों में भाग लेने वालों के बाकायदा कार्ड बनाए जाते हैं, ताकि हमारे सदस्य कैंप समाप्त होने के बाद भी इन सेवाओं से जुड़े रह सकें।
इसके अलावा, हम रेड क्रॉस के सहयोग से रक्तदान शिविर भी आयोजित करते हैं, जिनमें हमारे सदस्यों के परिवारजन भी हिस्सा लेते हैं। रक्तदान करने वालों को डोनर कार्ड दिया जाता है, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर उन्हें रक्त की सुविधा आसानी से मिल सके। हम स्पोर्ट्स मीट और प्रतियोगिताएं भी आयोजित करते हैं। इसी वर्ष हमने टेबल टेनिस (TT) टूर्नामेंट का आयोजन किया। इसमें केवल सदस्यों ही नहीं, बल्कि अन्य पत्रकारों ने भी भाग लिया। पुरस्कार वितरण समारोह में केंद्रीय खेल राज्यमंत्री सुश्री रक्षा एन. खडसे को आमंत्रित किया गया। यह कार्यक्रम अत्यंत ऊर्जा से भरपूर रहा। रक्षा जी ने इस वर्ष प्रकाशित हमारी स्मारिका के लिए एक विशेष संदेश भी लिखा है।
‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) पर आपकी क्या राय है?
‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ को समझना और उसकी सीमाएं जानना बहुत जरूरी है। हमें यह सीखना होगा कि एआई को कितना अपनाया जाए और कहां सतर्क रहना चाहिए। पत्रकारिता के सिद्धांतों और नैतिकता से टकराने वाले कंटेंट को पहचानना जरूरी है।
आजकल फेक वीडियो और डीपफेक्स काफी बढ़ रहे हैं। इस पर क्या कहना चाहेंगी?
सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है, पर हमें खुद भी जागरूक रहना होगा। फैक्ट-चेकिंग, क्रॉस-वेरिफिकेशन और रिपोर्टिंग में निष्पक्षता बनाए रखना, यही सबसे बड़े सेफगार्ड हैं। इन बातों को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत सिस्टम की आवश्यकता है।
विज्ञापन प्रणाली की जटिलता को नहीं समझता CCI: श्रीनिवासन के. स्वामी
'एक्सचेंज4मीडिया' से एक्सक्लूसिव बातचीत में आर. के. स्वामी लिमिटेड के एग्जिक्यूटिव ग्रुप चेयरमैन श्रीनिवासन के. स्वामी ने अपना विजन साझा किया और कड़े सवालों का जवाब दिया
आर. के. स्वामी लिमिटेड के एग्जिक्यूटिव ग्रुप चेयरमैन श्रीनिवासन के. स्वामी ने हाल ही में 2025-26 के लिए ऐडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) के अध्यक्ष का पदभार संभाला। भारतीय ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री की सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक माने जाने वाले स्वामी एक ऐसे इकोसिस्टम की बागडोर संभाल रहे हैं जो नियामक जांच, रुके हुए दर्शक माप सर्वेक्षणों और नए प्रतिभाओं को आकर्षित करने की तात्कालिक आवश्यकता से जूझ रहा है।
'एक्सचेंज4मीडिया' से एक्सक्लूसिव बातचीत में स्वामी ने अपना विजन साझा किया और कड़े सवालों का जवाब दिया, जिनमें शामिल थे CCI की जांच, BARC की विश्वसनीयता और इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) की स्थिति। साथ ही यह भी रेखांकित किया कि इंडस्ट्री की असली चुनौती मानव संसाधन (human capital) है।
अध्यक्ष के रूप में प्राथमिकताएं
स्वामी उन लीडर्स की तरह नहीं हैं जो शीर्ष पद पर चुने जाने के बाद बड़े बदलावों का ऐलान करते हैं। वे इस स्थिर जहाज को हिलाने में सावधानी बरतना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “यह जहाज पहले से ही अच्छी तरह चल रहा है। मेरा काम यह सुनिश्चित करना है कि हम कोई भी अनावश्यक या बाधक काम न करें। साथ ही यह मानना भी जरूरी है कि जैसे-जैसे तकनीक विकसित हो रही है, इंडस्ट्री जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमें लोगों को इन जटिलताओं को समझने और समझदारी से उन्हें पार करने में मदद करनी होगी।”
सबसे बड़ी चुनौती
स्वामी के अनुसार विज्ञापन इंडस्ट्री की सबसे बड़ी समस्या है- लोग। उन्होंने साफ तौर पर कहा, “प्रतिभा को आकर्षित करना और बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। किसी कारणवश, नई पीढ़ी अब विज्ञापन को पसंदीदा करियर नहीं मानती। हमें मास कम्युनिकेशन संस्थानों और उससे आगे तक आउटरीच अभियान चलाकर प्रतिभा की मजबूत पाइपलाइन तैयार करनी होगी।”
उन्होंने एजेंसियों की जिम्मेदारी भी साफ की और कहा, “यदि हमें उच्च-स्तरीय प्रतिभाशाली लोग चाहिए, तो हमें उन्हें उचित पारिश्रमिक देने और जोड़े रखने के लिए तैयार रहना होगा। अक्सर इंडस्ट्री के लीडर इस सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन भविष्य स्मार्ट निवेशों पर निर्भर है और ये निवेश प्रतिभा में होने चाहिए।”
CCI जांच: ‘कीमत मुख्य मुद्दा नहीं है’
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा शीर्ष मीडिया एजेंसियों के खिलाफ कथित गठजोड़ की चल रही जांच पर स्वामी ने दो टूक कहा, “एजेंसी रेट्स एक बेहद जटिल प्रक्रिया से तय होते हैं- रणनीति, टीमें, तकनीक। लेकिन कीमत का महत्व बहुत ज्यादा नहीं है। कीमत में 0.2% या 0.5% का फर्क बड़ी तस्वीर में मायने नहीं रखता।”
उन्होंने यह भी जोड़ा, “दुर्भाग्यवश, CCI विज्ञापन प्रणाली की जटिलता को पूरी तरह नहीं समझता। अब तक जो हुआ है, वह सिर्फ प्रारंभिक जांच है। अब एक विस्तृत जांच चल रही है और मुझे उम्मीद है कि यह स्पष्टता लाएगी।”
बताया जाता है कि यह केस व्हिसलब्लोअर्स के आरोपों से शुरू हुआ, जिनका कहना था कि बड़ी एजेंसियों ने विज्ञापनदाताओं को टीवी विज्ञापन इन्वेंटरी सस्ती दरों पर देने का वादा करके बड़े खातों का एकीकरण किया, जबकि प्रसारकों से अधिक निवेश के लिए सौदे किए। इस बीच, वॉचडॉग इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स (ISA) के मॉडल एजेंसी एग्रीमेंट की भी जांच कर रहा है, जिसे अगस्त 2023 में लॉन्च किया गया था। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इससे विज्ञापनदाता-एजेंसी की बातचीत सीमित हुई और एजेंसियों की आय पर असर पड़ा।
एक TRP सिस्टम या कई?
मीजरमेंट सिस्टम पर उठ रहे सवालों के बीच, स्वामी ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) का बचाव किया, जो देश की एकमात्र टेलीविजन रेटिंग प्रणाली है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि BARC अच्छा काम कर रहा है। AAAI, ISA और IBDF सभी BARC में साझेदार हैं। वैश्विक स्तर पर ज्यादातर बाजारों में एक ही सिस्टम होता है और वह ठीक काम करता है। मुझे दूसरा सिस्टम शुरू करने का कोई औचित्य नहीं दिखता। हमें मौजूदा सिस्टम को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए, न कि कई सिस्टम्स पर पैसा खर्च करने पर।”
जब उनसे BARC पर आलोचनाओं के बारे में पूछा गया, जिसमें बेसलाइन सर्वे और कनेक्टेड टीवी स्टडी जैसी पहलों में देरी शामिल है, तो उन्होंने भरोसा दिलाया कि हां, मैं उन चिंताओं को समझता हूं। लेकिन मैं आश्वस्त करना चाहता हूं कि BARC बोर्ड का सदस्य होने के नाते, ये मुद्दे पूरी तरह हमारे एजेंडे में हैं। नीयत साफ है और सभी लंबित पहलें आगे की योजना का हिस्सा हैं।
IRS को पुनर्जीवित करना
लंबे समय से रुका हुआ इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) भी स्वामी की प्राथमिकताओं में है। उन्होंने कहा, “IRS को पुनर्जीवित करना जरूरी है। फंडिंग अब तक की सबसे बड़ी रुकावट रही है। मुझे बताया गया है कि अब एक प्रस्ताव है जिसके तहत छोटे सैंपल साइज के साथ सर्वे किया जाएगा ताकि लागत कम की जा सके और इसके लिए जल्द ही एक RFP जारी होना चाहिए।”
प्रकाशक पद्धति को लेकर विभाजित हैं। कई लोगों को लगता है कि कोविड के बाद हाउसिंग सोसाइटियों में भौतिक सर्वे करना अब संभव नहीं होगा, गोपनीयता और प्रतिबंधों की वजह से। लेकिन स्वामी ने आगे बढ़ने की तात्कालिकता पर जोर दिया।
तकनीक और विश्वसनीयता की विरासत
भविष्य की ओर देखते हुए, स्वामी ने अपने लक्ष्य को सरल शब्दों में बताया, “मेरे लिए यह सुनिश्चित करना अहम है कि इंडस्ट्री पूरी तरह तकनीक को अपनाए और उसे हमारे हित में इस्तेमाल करे। अगर हम यह बदलाव कर सके और साथ ही विश्वसनीयता व रचनात्मकता के मूलभूत तत्वों को कायम रख सके, तो मैं अपने कार्यकाल को सार्थक मानूंगा।”
ऑफलाइन रिटेल व ई-कॉमर्स की तरह ही टीवी और डिजिटल भी बढ़ेंगे साथ: आलोक जैन, जियोस्टार
जियोस्टार के एंटरटेनमेंट बिजनेस के क्लस्टर हेड्स में से एक आलोक जैन का मानना है कि टेलीविजन न सिर्फ अपनी पकड़ बनाए हुए है, बल्कि नए माध्यमों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है।
एंटरटेनमेंट की दुनिया पहले से कहीं तेजी से बदल रही है, लेकिन जियोस्टार के एंटरटेनमेंट बिजनेस के क्लस्टर हेड्स में से एक आलोक जैन का मानना है कि टेलीविजन न सिर्फ अपनी पकड़ बनाए हुए है, बल्कि नए माध्यमों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है।
जैन के पोर्टफोलियो में कलर्स, डिजिटल हिंदी ओरिजिनल्स, यूथ, म्यूजिक व इंग्लिश, किड्स व इंफोटेनमेंट, हिंदी मूवीज और स्टूडियो बिजनेस शामिल हैं। उनका कहना है, “भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में टीवी आज भी बेहद प्रासंगिक है और निकट भविष्य में भी रहेगा।”
उन्होंने कहा, “आज भारत में 90 करोड़ लोग टीवी देखते हैं और रोजाना लगभग तीन घंटे का कंटेंट देखते हैं। डिजिटल निश्चित रूप से बढ़ेगा, लेकिन टीवी की पहुंच और जुड़ाव मजबूत है। हम खुद को प्लेटफॉर्म-एग्नॉस्टिक मानते हैं- टीवी, मोबाइल, ओटीटी और सीटीवी सभी पर दर्शकों को सहज अनुभव देना हमारा लक्ष्य है। भारत की खपत की कहानी बहुत बड़ी है और जैसे ऑफलाइन रिटेल ई-कॉमर्स के साथ मौजूद है, वैसे ही टीवी, डिजिटल और मोबाइल जैसे सभी माध्यम साथ-साथ रहेंगे और बढ़ेंगे।”
इंडस्ट्री रिपोर्ट्स भी इस बात की पुष्टि करती हैं। FICCI-EY रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में टीवी अब भी 90 करोड़ से अधिक दर्शकों तक पहुंचता है, जो इसे बेमिसाल पैमाने और गहराई वाला सबसे बड़ा मीडिया प्लेटफॉर्म बनाता है।
जैन का कहना है, “दुनिया के नैरेटिव के उलट, भारत में टीवी गिरावट में नहीं है, बल्कि विकसित हो रहा है और फल-फूल रहा है।”
टीवी का सुकून और विशाल पहुंच कायम
जैन के अनुसार, ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जो यह दिखाता हो कि टीवी की अहमियत घट रही है। वे आगे कहते हैं, “मैदान पर का अनुभव भी इसे साबित करता है,” “टीवी में ऐसे फायदे हैं—परिवार के साथ देखना, आराम और ‘एस्केपिज्म मोड’, जिन्हें डिजिटल हमेशा दोहरा नहीं सकता। भारत में इंडस्ट्रीज आसानी से खत्म नहीं होतीं; वे खुद को ढाल लेती हैं।”
जैन के मुताबिक, ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जो यह दिखाए कि टीवी की अहमियत घट रही है। वे कहते हैं, “ग्राउंड एक्सपीरियंस भी इसे साबित करते हैं। टीवी में कुछ ऐसे फायदे हैं- परिवार के साथ देखना, आराम और ‘एस्केपिज़्म मोड’—जिन्हें डिजिटल हमेशा नहीं दोहरा सकता। भारत में इंडस्ट्री आसानी से खत्म नहीं होती, बल्कि समय के साथ खुद को ढाल लेतीं हैं।”
कलर्स और जियोस्टार के एंटरटेनमेंट बिजनेस के लिए उनकी रणनीति साफ है- ऐसे आईपी में निवेश करना जो पीढ़ियों, प्लेटफॉर्म्स और फॉर्मैट्स से परे जाएं, पारिवारिक दर्शकों को वापस लाना और ये संदेश मजबूती से देना कि भारत में टीवी अपनी ताकत फिर से खोज रहा है।
नॉस्टेल्जिया और नए फॉर्मैट्स का संतुलन
बीते दिनों के लोकप्रिय शो फिर से दर्शकों के बीच आ रहे हैं और प्रोग्रामिंग ट्रेंड में नॉस्टेल्जिया अहम भूमिका निभा रहा है। जैन इसे अपनाते हैं, लेकिन सतर्कता के साथ। “मामला संतुलन का है। भविष्य अतीत के बराबर नहीं होता, इसलिए हम जहां सफल पुराने फॉर्मैट्स का लाभ उठाते हैं, वहीं नए प्रयोगों का जोखिम भी लेते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त में हम बिग बॉस के साथ-साथ ‘पति पत्नी और पंगा’ चला रहे हैं, जहां स्थापित फैनबेस और नए फॉर्मैट्स का मेल है। नॉस्टेल्जिया मूल्यवान है, लेकिन इनोवेशन जरूरी है।”
यह पुराने और नए का मेल हर जॉनर में दिखता है। कलर्स ने नॉन-फिक्शन में अपनी मजबूत पहचान बनाई है, लेकिन फिक्शन भी इसका मुख्य आधार है।
जैन आगे कहते हैं, “नॉन-फिक्शन ज्यादातर वीकेंड पर होता है, सिवाय बिग बॉस के समय के। हमारी नॉन-फिक्शन में अलग पहचान है क्योंकि टीवी और डिजिटल दोनों में इतने मजबूत फ्रैंचाइजी बहुत कम हैं। लेकिन फिक्शन अब भी बड़ा फोकस है- सालाना 8 से 10 गुना ज्यादा घंटे फिक्शन को मिलते हैं।”
विज्ञापन परिदृश्य और त्योहारी रफ्तार
विज्ञापन खर्च अब टीवी और ओटीटी में बंट रहा है, फिर भी जैन आशावादी हैं। उन्होंने कहा, “टीवी अब भी मजबूत है और सबसे बड़ा ब्रैंड-बिल्डिंग माध्यम है, इसलिए हम विज्ञापनदाताओं को डिजिटल के साथ इसका इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। पहली तिमाही में टीवी विज्ञापन राजस्व में थोड़ी नरमी थी, लेकिन त्योहारी सीजन में टीवी और डिजिटल दोनों पर तेजी दिख रही है। निविया और लोरियल जैसे एफएमसीजी ब्रैंंड वापस आ रहे हैं। नए दौर के ब्रैंंड भी मेट्रो शहरों के शुरुआती उपभोक्ताओं से आगे पहुंचने के लिए टीवी जैसे व्यापक माध्यमों की जरूरत महसूस करेंगे।”
मापदंड की चुनौती
जब दर्शक स्क्रीन-एग्नॉस्टिक हो रहे हैं, तो मापने की व्यवस्था को भी बदलना होगा। जैन कहते हैं, “मापन बेहद जरूरी है और इसे उपभोक्ता के व्यवहार के साथ विकसित होना चाहिए। एक बड़ा अवसर इस बात में है कि एक ही व्यक्ति द्वारा टीवी और डिजिटल पर देखे गए एक ही शो की संयुक्त व्यूअरशिप को मापा जाए।”
‘पति पत्नी और पंगा’ का विचार
कलर्स का नया फॉर्मैट ‘पति पत्नी और पंगा’ इस चैनल के घरेलू, रिश्तों से जुड़े और दर्शकों के करीब के आइडियाज पर फोकस को दर्शाता है। जैन कहते हैं, “हम लगातार नए आइडियाज की तलाश करते हैं। ‘पति पत्नी और पंगा’ की प्रेरणा शादीशुदा जोड़ों के रोजमर्रा के मजाक और अनोखेपन से मिली, जो हर किसी से जुड़ता है। हम एक पारिवारिक, मनोरंजक शो बनाना चाहते थे, जो अब तक अनछुए स्पेस में हो।”
इस शो में सिर्फ शादीशुदा जोड़े हिस्सा लेते हैं- सिवाय अविका गोर के, जो सगाईशुदा हैं और इसके होस्ट अलग-अलग रंगत लाते हैं: सोनाली बेंद्रे अपने गरिमामय अंदाज और नॉस्टेल्जिया के साथ, तो मुनव्वर फारूकी अपने हास्य और धार के साथ।
शो पहले ही 11 स्पॉन्सर्स जुटा चुका है, जो इसकी अपील पर भरोसा दर्शाता है।
जैन कहते हैं, “यह एक घरेलू फॉर्मैट है, देसी ड्रामा में रचा-बसा, भारतीय घरों की संवेदनाओं से प्रेरित और आज के दर्शकों के साथ जुड़ने के लिए तैयार किया गया। इसका मकसद है कि ‘पति पत्नी और पंगा’ टीवी और डिजिटल दोनों पर चमके, और सोशल मीडिया एक्सटेंशन्स, छोटे रील्स और शॉर्ट-फॉर्म स्पिन-ऑफ के लिए भी बड़ा स्कोप है।”
कलर्स का 17 साल का सफर
जैन कहते हैं, '2008 में लॉन्च होने के बाद से कलर्स सिर्फ एक ब्रॉडकास्टर नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आईना रहा है। ‘बालिका वधू’, ‘उतरन’ और ‘ना आना इस देस लाडो’ जैसे शो ने प्राइमटाइम में सामाजिक मुद्दों- बाल विवाह से लेकर लैंगिक असमानता तक को कहानी का केंद्र बनाया।
जैन याद करते हैं, “बालिका वधू के साथ, कलर्स ने बाल विवाह के मुद्दे को प्राइमटाइम में सिर्फ पृष्ठभूमि के तौर पर नहीं, बल्कि मुख्य कथा के रूप में पेश किया, जिससे मनोरंजन सामाजिक चेतना में बदल गया। आज कलर्स सामाजिक बदलाव को छूती फिक्शन कहानियों (जैसे ‘धाकड़ बीरा’, ‘मनपसंद की शादी’) और दमदार नॉन-फिक्शन शो, दोनों का मेल प्रस्तुत करता है।”
जैन गर्व से कहते हैं, “‘लाफ्टर शेफ्स’ ने कॉमेडी-आधारित रियलिटी टीवी की परिभाषा बदल दी। कॉमेडी और कुकिंग का इसका अनोखा संगम दर्शकों को ‘डिनरटेनमेंट’ का मजा दे रहा है।”
जैन को भविष्य को लेकर पूरा भरोसा है। वे कहते हैं, “हमारी कंटेंट रणनीति के केंद्र में दर्शक हैं। हर कहानी उन्हीं से शुरू होती है- उनकी पसंद, संस्कृति और बदलती जिंदगियों से। हमारा वादा है कि हम दिल और ईमानदारी के साथ कहानियां सुनाते रहेंगे।”
उनके लिए टीवी, ओटीटी और सीटीवी का साथ रहना सिर्फ निश्चित ही नहीं, बल्कि यह पहले से ही हकीकत है। जैन दोहराते हैं, “भारत की खपत की कहानी बहुत बड़ी है। सभी माध्यम साथ रहेंगे और साथ बढ़ेंगे।”
SEBI का काम खुद चमकना नहीं, सिस्टम में विश्वास जगाना है: तुहिन कांत पांडे
यह SEBI के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे का पहला बड़ा इंटरव्यू है। उन्होंने BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा व मैनेजिंग एडिटर पलक शाह से प्रमुख चिंताओं पर खुलकर बात की।
जेन स्ट्रीट प्रकरण और उसके बाद भारत के वित्तीय बाजारों में मचे हलचल के बीच यह SEBI के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे का पहला बड़ा इंटरव्यू है। उन्होंने BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा और मैनेजिंग एडिटर पलक शाह से प्रमुख चिंताओं पर खुलकर बात की। एक नियामक के रूप में अपनी सोच साझा करते हुए उन्होंने बाजार में हेरफेर, पारदर्शिता और निवेशकों की सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया। ईमानदारी के लिए चर्चित और कई ऐतिहासिक वित्तीय सुधारों के मार्गदर्शक रहे तुहिन कांत पांडे ने इस तेजी से बदलते परिदृश्य में SEBI की भूमिका, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) से निपटने की चुनौती और भारतीय पूंजी बाजार में निवेशकों का भरोसा वापस लाने की अपनी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की।
मिस्टर पांडे, SEBI के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी संभालने पर आपको बधाई। जेन स्ट्रीट प्रकरण के बाद आपसे कई उम्मीदें जुड़ी हैं। SEBI ने इस मामले में महज दस दिनों के भीतर 600 मिलियन डॉलर की रकम सुरक्षित करते हुए एक असाधारण अंतरिम आदेश जारी किया। लेकिन आपने गंभीर बाजार हेरफेर की आशंकाओं के बावजूद जेन स्ट्रीट को दोबारा ट्रेडिंग की इजाजत क्यों दी? कृपया इस फैसले के पीछे की सोच समझाइए।
SEBI एक संस्थागत संरचना पर आधारित संगठन है और मैं सामूहिक निर्णय और वैधानिक प्रक्रिया में विश्वास करता हूं। जेन स्ट्रीट मामला अभी एक अंतरिम आदेश है, अंतिम निर्णय नहीं। हमारी न्याय व्यवस्था ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांत पर टिकी है, जो यह कहती है कि स्थायी कार्रवाई से पहले नोटिस देना और पक्ष सुनना जरूरी है। सामने आए उल्लंघन इतने गंभीर थे कि पूरी जांच पूरी होने तक इंतजार करना संभव नहीं था, इसलिए हमने तुरंत कार्रवाई करते हुए 597 मिलियन डॉलर की रकम सुरक्षित की और कई प्रतिबंध लगाए, जिनमें मैनिपुलेटिव ट्रेडिंग पर रोक भी शामिल है। तब से जेन स्ट्रीट ने F&O बाजार में कोई ट्रेडिंग नहीं की है और SEBI तथा एक्सचेंज दोनों ही उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। यह किसी तरह की ढील नहीं है, बल्कि एक संतुलित दृष्टिकोण है, जिसमें बाजार की सुरक्षा और निष्पक्षता दोनों का ध्यान रखा गया है।
लेकिन क्या यह मिसाल अपने आप में असामान्य नहीं है? SEBI के 35 साल के इतिहास में ऐसा कोई आदेश नहीं आया जिसमें जांच के दायरे में होने के बावजूद किसी इकाई को फंड जमा करने के बाद फिर से ट्रेडिंग की अनुमति दी गई हो। क्या यह एक खतरनाक उदाहरण नहीं बनाता?
मैं इस चिंता को समझता हूं, लेकिन जरूरी है कि हम इस स्थिति की गलत व्याख्या न करें। अंतरिम आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जेन स्ट्रीट किसी भी तरह की मैनिपुलेटिव ट्रेडिंग से दूर रहेगी, और हमने सख्त निगरानी के जरिये इस अनुपालन को सुनिश्चित किया है। बिना कारण बताओ नोटिस या अंतिम आदेश के स्थायी रूप से प्रतिबंध लगाना मनमाना होता और कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं। निर्धारित शर्तों के तहत ट्रेडिंग की अनुमति देना ‘नरमी’ नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन है। हमारे न्यायशास्त्र में बिना उचित प्रक्रिया के किसी को दोषी ठहराने की अनुमति नहीं है। 597 मिलियन डॉलर की जमा रकम खुद एक मजबूत संकेत है कि SEBI इस पर कितना गंभीर है। हमारा उद्देश्य ‘हीरो’ बनना नहीं है, बल्कि न्यायपूर्ण और निरंतर नियमन के जरिये भरोसा कायम करना है।
जेन स्ट्रीट मामला मैनहट्टन कोर्ट में दायर एक फाइलिंग से सामने आया, न कि SEBI की अपनी निगरानी प्रणाली से। क्या यह आपके निगरानी तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है? और आप इसे दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं?
मैनहट्टन में की गई फाइलिंग ने हमें सतर्क किया, लेकिन हमारी अपनी जांच में भी डेटा एनालिसिस के जरिए हेरफेर के पैटर्न सामने आए। हमने जेन स्ट्रीट की विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वित ट्रेडिंग की पहचान की, जो न तो हेजिंग का हिस्सा थीं और न ही लिक्विडिटी-संबंधी, बल्कि शुद्ध रूप से हेरफेर थीं। टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है, और कोई भी नियामक यह दावा नहीं कर सकता कि वह सर्वज्ञ है। इस केस ने हमारी निगरानी प्रणालियों को और बेहतर बनाने की जरूरत को रेखांकित किया। हम नए पैरामीटर अपना रहे हैं, AI आधारित टूल्स की संभावनाएं देख रहे हैं, जैसे कि असामान्य डेल्टा एक्सपोजर या अचानक हुए ऑप्शन ट्रेडिंग स्पाइक्स। हम विशेषज्ञता को अपनाने और मैनिपुलेटिव रणनीतियों से आगे रहने के लिए तैयार हैं। हमने F&O ट्रेडिंग की विसंगतियों पर निगरानी कड़ी की है, डेल्टा आधारित विश्लेषण शुरू किया है, और पोजीशन लिमिट्स को सख्त किया है। हमारे सुपटेक प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है- मलेशिया और स्विट्जरलैंड जैसे देश SEBI से सीख रहे हैं। लेकिन मैं साफ कहूं तो: HFT के साथ मुकाबला एक निरंतर बिल्ली और चूहे का खेल है, और हम इस चुनौती से उभरते रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
जब हम अंतरराष्ट्रीय नियामकों की बात करते हैं, तो SEBI ने अडानी मामले में विदेशी एजेंसियों से अंतिम लाभकारी मालिकों (UBOs) की जानकारी मांगी थी। क्या जेन स्ट्रीट के लिए भी ऐसा ही किया गया है? क्योंकि उनकी ओनरशिप संरचना काफी जटिल मानी जाती है।
जेन स्ट्रीट मामला मुख्यतः बाजार आचरण से संबंधित है, स्वामित्व से नहीं। FPI नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, जिसमें UBO डिस्क्लोजर भी शामिल है, और जेन स्ट्रीट इसके अपवाद नहीं हैं। हम किसी साजिश की तलाश में नहीं हैं, बल्कि हमारा पूरा ध्यान उन ट्रेड्स पर है जिन्हें अंतरिम आदेश में मैनिपुलेटिव पाया गया। इसे UBO से जोड़ना अलग मुद्दा है। हमारे लिए प्राथमिकता यह है कि ऐसा व्यवहार दोबारा न दोहराया जाए- चाहे फंड के पीछे कोई भी हो। UBO प्रकटीकरण की आवश्यकता 10% या उससे अधिक हिस्सेदारी पर होती है, और जेन स्ट्रीट भी अन्य FPI की तरह इसका पालन करता है। उनके F&O ट्रेड्स में इक्विटी स्वामित्व शामिल नहीं था।
BSE की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। जानकारी है कि BSE ने जेन स्ट्रीट की ट्रेड्स से जुड़े अहम डेटा SEBI के अनुरोध पर लगभग डेढ़ साल तक साझा नहीं किए। फिर भी आपके आदेश में इसका उल्लेख क्यों नहीं है?
मुझे BSE द्वारा डेटा साझा करने में किसी विशिष्ट देरी की जानकारी नहीं है, लेकिन मैं इसे जरूर जांचूंगा। हमारा अंतरिम आदेश उन हेरफेर गतिविधियों पर केंद्रित था जिनके लिए हमारे पास पर्याप्त सबूत पहले से मौजूद थे- मुख्यतः SEBI की अपनी निगरानी प्रणाली और NSE के डेटा के आधार पर, जो अंतरिम कार्रवाई के लिए पर्याप्त था।
बीते कुछ वर्षों में कई रिटेल निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, खासकर हाई PE वाले IPOs में निवेश के चलते, जो लिस्टिंग के तुरंत बाद गिर जाते हैं- Paytm इसका उदाहरण है। क्या SEBI यह देखता है कि म्यूचुअल फंड्स इन IPOs में कैसे निवेश करते हैं, जो अक्सर प्राइवेट इक्विटी निवेशकों को निकासी का मौका देते हैं?
एकल मामले (जैसे Paytm) के आधार पर सामान्यीकरण करना उचित नहीं होगा। IPOs भविष्य की संभावनाओं पर आधारित होते हैं, केवल मौजूदा परिसंपत्तियों पर नहीं। उदाहरण के लिए Nvidia को देखिए, 25 साल पहले वह एक स्टार्टअप थी, आज वह ट्रिलियन-डॉलर कंपनी है। प्राइवेट इक्विटी से निकासी पूंजी निर्माण का एक वैध तरीका है, जो भारत की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है। SEBI की भूमिका मूल्य निर्धारण करना नहीं है, बल्कि पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करना है। हम डिस्क्लोजर और निगरानी को मजबूत कर रहे हैं ताकि खुदरा निवेशकों की सुरक्षा हो सके, लेकिन बाजार की स्वाभाविक गति को बाधित नहीं कर सकते। निवेशकों को खुद जोखिम का मूल्यांकन करना चाहिए, और हम उन्हें बेहतर जानकारी देकर सशक्त बना रहे हैं।
NSE के IPO में हो रही देरी और SEBI के अंदर गुटबाजी की खबरें भी सामने आई हैं। इस प्रक्रिया में क्या अड़चनें हैं और कोई समयसीमा तय की गई है?
सबसे पहले तो मैं SEBI के भीतर “गुटबाजी” जैसी किसी बात से इनकार करता हूं- ऐसी कोई बात नहीं है। यह एक सख्त प्रक्रिया है जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि अनुपालन, गवर्नेंस और जोखिम प्रबंधन के सभी मानक पूरे हों। मुझे भरोसा है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। NOC प्रक्रिया जल्द ही अंतिम रूप ले सकती है, संभवतः अगले कुछ महीनों में।
पारदर्शिता के संदर्भ में बात करें तो, SEBI के हालिया परिपत्र में ट्रेडमार्क से जुड़ी रॉयल्टी भुगतानों के लिए डिस्क्लोजर अनिवार्य कर दिए गए हैं। कई सूचीबद्ध कंपनियाँ ब्रैंड निर्माण का खर्च उठाती हैं, जबकि प्रमोटर की निजी इकाइयां ट्रेडमार्क का स्वामित्व रखती हैं और भारी रॉयल्टी वसूलती हैं। क्या SEBI यह सुनिश्चित करेगा कि रॉयल्टी केवल कानूनी स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक योगदान के संदर्भ में भी न्यायसंगत हो?
इस चुनौती से निपटने के लिए हमने 1 सितंबर से एक मानकीकृत डिस्क्लोजर व्यवस्था लागू की है। अब शेयरधारकों और स्वतंत्र निदेशकों को संबंधित पक्षों के बीच लेन-देन (जिसमें रॉयल्टी भुगतान भी शामिल हैं) की स्पष्ट जानकारी प्राप्त होगी। इससे वे किसी भी असमान शुल्क पर प्रश्न उठा सकते हैं। प्रॉक्सी सलाहकार और शेयरधारक ऐसे प्रस्तावों को स्वीकृति या अस्वीकृति दे सकते हैं, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित होती है। हमारा उद्देश्य है ऐसा नियमन तैयार करना जो अल्पसंख्यक निवेशकों की रक्षा करे, लेकिन व्यवसायों पर अनावश्यक बोझ न डाले।
होल्डिंग कंपनियां अक्सर अपनी सहायक इकाइयों की गवर्नेंस में पारदर्शिता की कमी के चलते वैल्यूएशन डिस्काउंट का सामना करती हैं। KK मिस्त्री समिति के डिमर्जर्स पर काम कर रहे होने के मद्देनजर, क्या SEBI ऐसी संरचना पर विचार कर रहा है जो होल्डिंग कंपनियों को बेहतर दृश्यता और नकदी प्रवाह की पहुंच दे सके?
इस विषय को मुझे और गहराई से देखना होगा, लेकिन मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि पारदर्शिता और गवर्नेंस को लेकर हमारी प्रतिबद्धता अडिग है। KK मिस्त्री समिति डिमर्जर के मानदंडों पर विचार कर रही है और हम उन संरचनाओं पर ध्यान देंगे जो दृश्यता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा दें, बगैर कारोबारी दक्षता पर असर डाले। इस दिशा में हम सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, बने रहिए।
आपके पूर्ववर्ती कार्यकाल में SEBI के कर्मचारियों के मनोबल में गिरावट और विरोध प्रदर्शन जैसी खबरें सामने आई थीं। आप वर्तमान में मनोबल बढ़ाने और SEBI को एक स्मार्ट रेगुलेटर बनाने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं?
जवाब: मैं अतीत की घटनाओं पर टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा, लेकिन आज की स्थिति यह है कि हमारी टीम का मनोबल उच्च स्तर पर है। SEBI की सबसे बड़ी ताकत उसकी मानव पूंजी है, यही हमारी असली “फैक्ट्री” है। हम क्षमता निर्माण में निवेश कर रहे हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों को नियमन में एकीकृत कर रहे हैं और एक पेशेवर कार्य संस्कृति को प्रोत्साहित कर रहे हैं। भारत के पूंजी बाजारों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का बेहतरीन अवसर मिला है, और इसके लिए प्रेरित SEBI सबसे बड़ी कुंजी है।
अंततः, खुदरा निवेशकों का विश्वास दोबारा कायम करने और जेन स्ट्रीट जैसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए SEBI की व्यापक रणनीति क्या है?
मेरी दृष्टि चार मुख्य स्तंभों पर आधारित है: विश्वास, पारदर्शिता, सहयोग और तकनीक। हम नियमों को सरल बना रहे हैं ताकि अनुपालन की प्रक्रिया अधिक सहज हो, निगरानी प्रणालियों को सशक्त बना रहे हैं ताकि अनियमितताओं का त्वरित पता चल सके, और डिस्क्लोजर की गुणवत्ता को इस प्रकार सुधार रहे हैं कि निवेशक अधिक जागरूक और सशक्त बनें। जेन स्ट्रीट प्रकरण में 597 मिलियन डॉलर की राशि सुरक्षित करना और संदिग्ध ट्रेड्स पर रोक लगाना हमारी संकल्पबद्धता का प्रमाण है। हमारा उद्देश्य अति-नियमन करना नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक निवेशकों की रक्षा करना, पूंजी निर्माण को बढ़ावा देना और भारतीय बाजारों को वैश्विक मानकों तक पहुंचाना है। SEBI एक उत्तरदायी, सक्रिय और संतुलित नियामक के रूप में बना रहेगा- विकास और निवेशक सुरक्षा के बीच उपयुक्त संतुलन के साथ।
SEBI किस तरह सूचीबद्ध कंपनियों और अपनी स्वयं की प्रक्रिया में अनुपालन का बोझ घटाते हुए प्रभावी नियमन सुनिश्चित करता है?
हम नियमों की प्रासंगिकता की लगातार समीक्षा कर रहे हैं और उन्हें सरल बना रहे हैं, विशेषकर वहां जहां प्रौद्योगिकी मैनुअल रिपोर्टिंग की जगह ले सकती है, जैसे कि API के जरिए। हम supervisory technology (SupTech) का उपयोग कर रहे हैं और कंपनियों को regulatory technology (RegTech) को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, ताकि प्रक्रियाएं अधिक सुव्यवस्थित हों और हम उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। उदाहरण के तौर पर, हमने कंपनियों को अलग-अलग संस्थाओं में विभाजित करने की पूर्व अनिवार्यता को निलंबित किया है, इससे साझा संसाधनों का पारदर्शी उपयोग संभव हो पाया है, जटिलताएँ घटी हैं और नियामकीय स्पष्टता बनी है।
SEBI अनुपालन के सरलीकरण, निवेशक संरक्षण और बाजार विकास के बीच संतुलन किस तरह बनाए रखता है?
हम जोखिम-आधारित नियमन के सिद्धांत को अपनाते हैं, इससे अनुपालक संस्थाओं पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता और दोषियों पर कठोर प्रवर्तन कार्रवाई की जाती है। निगरानी के लिए हम AI और SupTech जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग करते हैं, जैसे कि IPO दस्तावेजों की स्वतः जांच, जिससे हमारी दक्षता बढ़ती है और हम गंभीर जोखिमों पर फोकस कर सकते हैं। यह दृष्टिकोण न केवल अनुपालन के बोझ को घटाता है, बल्कि पूंजी निर्माण को बढ़ावा देता है और यह सुनिश्चित करता है कि व्यवसाय नियामकीय जटिलताओं से मुक्त होकर सुचारू रूप से कार्य कर सकें- SEBI के निवेशक-अनुकूल और गतिशील बाजार के लक्ष्य के अनुरूप।
बदलते हिंदुस्तान की कहानी है ‘डैला बैला’, हमने बस उसे पर्दे पर उतारा है: नीलेश कुमार जैन
यह पहली ऐसी फिल्म है, जिसका प्रीमियर WAVES OTT पर हुआ। इस फिल्म का डायरेक्शन नीलेश कुमार जैन ने किया है। उन्होंने ही इस फिल्म के डायलॉग्स और गीत लिखे हैं।
नई दिल्ली स्थित आकाशवाणी भवन के रंग भवन ऑडिटोरियम में हाल ही में प्रसार भारती के OTT प्लेटफॉर्म WAVES OTT पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध फीचर फिल्म Della Bella: Badlegi Kahaani का प्रीमियर हुआ। यह पहली ऐसी फिल्म है, जिसका प्रीमियर WAVES OTT पर हुआ। इस फिल्म का डायरेक्शन नीलेश कुमार जैन ने किया है। उन्होंने ही इस फिल्म के डायलॉग्स और गीत लिखे हैं। इस प्रीमियर के दौरान समाचार4मीडिया ने नीलेश जैन से इस फिल्म से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
सबसे पहले तो आप अपने बारे में बताएं कि आपका अब तक का सफर क्या व कैसा रहा है?
बहुत छोटी सी मेरी कहानी है, बदल जाती है जब तक आती रवानी है। लखीमपुर खीरी में जन्मा मैनपुरी, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में पला-बढ़ा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शताब्दी वर्ष में सचिव रहा, अंग्रेजी पत्रकारिता को… ये कहकर छोड़ दिया कि ‘मेरा लिखा बिका नहीं क्योंकि मैं बिका नहीं’ फिर अचानक सिविल सेवा का अध्यापक बन गया, फिर पीयूष पाण्डे जी और अभिजित अवस्थी जी की प्रेरणा से एडमेकर बना और फिर निर्देशक महेश भट्ट जी के प्रोत्साहन से फिल्म मेकर।
इस तरह के सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने की प्रेरणा कहां से मिली और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
प्रेरणा अपने समाज में घटित हो रही घटनाओं से ही मिली। आसपास जो बदलाव समाज से सोच तक में देखा जा रहा है, बस उसी को कहानी में पिरोया है। हम तो बस समेटकर दिखा रहे हैं, कहानी तो समाज की ही है।
इस फिल्म को बनने में कितना समय लगा, इसकी शूटिंग किन लोकेशंस पर हुई?
पूरा प्रोसेस तो कई महीनों का था। अधिकांश शूटिंग उप्र के बाराबंकी व लखनऊ में ही हुई। थोड़ा शूट मुंबई के पास पनवेल में भी किया।
‘डैला बैला : बदलेगी कहानी’ ये शीर्षक काफी रोचक है। इसका ख्याल कैसे आया, इस बारे में बताएं?
शीर्षक का सबसे बड़ा गुण ध्यान खींचना होता है और उत्सुकता पैदा करना भी। बॉलीवुड के एक दिग्गज आशीष सिंह ने जब इस शीर्षक को पहली बार सुना तो उन्होंने इसके पीछे की सोच को सराहा। इंटरनेट पर फिल्म का नाम अनाउंस होते ही ‘डैला बैला’ का सर्च शुरू हो गया था और लोग समझ गए थे कि इस साधारण-सरल कहानी में कुछ न कुछ ज़रूर बदलेगा, उत्सुकता की उसी डोर को पकड़कर दर्शक बैठा रहा और हंसी के आंसुओं ने आखिरकार अपना रूप बदल ही लिया। वैसे ‘डैला बैला’ का समेकित अर्थ एक ऐसी लड़की से है जिसका व्यक्तित्व आकर्षक होता है, जो अपने फैसले खुद लेने की ताक़त रखती है। वो समझदार भी होती है और रचनात्मक होने के साथ-साथ एक अच्छी दोस्त भी।
फिल्म में आप 'कहानी बदलने' की बात करते हैं। आप किस सामाजिक या मानसिक बदलाव को दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं?
दरअसल, ये आज के बदलते हिंदुस्तान की कहानी है। ये समाज में आ रहे भौतिक परिवर्तनों से लेकर भाविक परिवर्तनों तक की कहानी है। इसे मैंने जीएसटी की कहानी कहा है, वो जीएसटी नहीं बल्कि ‘ग्रेट सोशल ट्रांसफॉर्मेशन’ की कहानी कहा है।
फिल्म की कहानी क्या किसी सच्ची घटना से प्रेरित है या यह पूर्ण रूप से काल्पनिक है?
एक बड़े मकसद को सामने रखकर युवा लेखिका सान्या ने इस कहानी का खांचा खींचा है। इसलिए कल्पना तो है ही लेकिन कहीं न कहीं सच्ची घटना भी पीछे से दरवाजा खटखटा रही है। उसके साथ वरिष्ठ लेखक रूप जी व नीरज ने भी स्क्रीनप्ले को सहज गति का रखा है। पटकथा में कोई भगदड़ नहीं है। न कैमरा वर्क या एडिटिंग में।
फिल्म की शूटिंग के दौरान कलाकारों और निर्देशक को किन सबसे बड़े चैलेंजों का सामना करना पड़ा?
यूपी की ठंड का और उस भोलेपन को बनाए रखने का चैलेंज था जो आज भी छोटे शहरों में अपना घोंसला बनाकर रहता है। वैसे उप्र की जनता और फिल्म बंधु के सहयोग ने हर चैलेंज को आसान बना दिया।
फिल्म की शूटिंग या स्क्रिप्टिंग के दौरान कोई ऐसा लम्हा या अनुभव रहा जो टीम के लिए हमेशा यादगार रहेगा?
टाइटल गीत की शूटिंग के दौरान फिल्म की लीड आशिमा वर्द्धन जैन के पैरों में छाले पड़ गए थे क्योंकि बेलीज पहनकर डांस करना था और कोरियोग्राफ़र मुदस्सर खान के लिए ये पहला मौका था जब किसी डायरेक्टर ने उनसे कहा था कि परफेक्शन नहीं चाहिए क्योंकि कहानी के हिसाब से डैला-बैला के पैर में चोट लगने के बाद का डांस है। इसीलिए सहज बनाने के लिए जरूरत से ज्यादा टेक लेने पड़े और आशिमा के पैरों में छाले पड़ गए।
क्या यह फिल्म स्कूल, कॉलेज या सरकारी संस्थानों में भी दिखाई जाएगी ताकि इसका सामाजिक संदेश अधिक लोगों तक पहुंचे?
बिजनौर के एक कॉलेज में ये रिलीज के दूसरे दिन ही दिखाई गई। मुंबई के एक बड़े स्कूल के मुख्य संचालक ने दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रीमियर में इस फिल्म को देखकर मुझसे इस फ़िल्म को अपने सभी स्कूलों कॉलेजों में स्मार्ट टीवी पर दिखाने की बात कही है। बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूं, ये स्वस्थ मनोरंजन और ‘सिंपल सिनेमा’ की मेरी अवधारणा की जीत है।
इस फिल्म से समाज में लड़कियों के प्रति सोच बदलने की कितनी उम्मीद है?
समाज तो बाद में आता है पहले लड़कियों को ख़ुद इस बदलाव की मशाल उठानी होगी और इसका ये संदेश समझना होगा कि ‘ख़ुद की तलाश किसी और के साथ नहीं हो सकती’, ‘ज़िंदगी के छोटे दायरों से बाहर आना ही होता है’ और ये भी कि ‘कुछ सफ़र अकेले ही तय करने होते हैं, अपना स्ट्रगल खुद ही करना होता है।
आज की तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया में जब व्यावसायिक कंटेंट हावी है, ऐसे में सामाजिक और संवेदनशील विषयों पर आधारित फिल्मों के लिए दर्शक कितने तैयार हैं, इस बारे में आपका क्या मानना है?
दर्शक पूरी तरह तैयार हैं पूरी दुनिया में ये फ़िल्म देखी जा रही है। सबसे ज़्यादा आश्चर्य तो तब हुआ जब ये पता चला कि विदेशों में लोग एक-दूसरे को इस फिल्म को दिखा रहे हैं। खुद वेव्स ओटीटी डाउनलोड कर रहे हैं। अगर अमेरिका में इसे सराहा जा रहा है तो आस्ट्रेलिया में भी। ओमान, बहरीन, दुबई, सिंगापुर, जर्मनी, इंग्लैंड, साउथ अफ़्रीका व अन्य जगहों पर भी लोग इंग्लिश सबटाइटल के साथ इसे देख रहे हैं। फ़िल्म के गाने भी मिलियन व्यूज क्रास कर गये हैं। राज आशू के गीत-संगीत का ये एक नया दौर है और शान, हंसिका अय्यर, स्वाती शर्मा और सीपी झा की आवाज का भी। ये फिल्म वर्ड ऑफ माउथ से पूरी दुनिया में फैलती जा रही है। आप ख़ुद एआई के माध्यम से टाइप करें ‘ग्लोबल रिस्पांस ऑफ़ डैला बैला बदलेगी कहानी’ और स्वयं पढ़ लें कि दर्शकों की प्रतिक्रिया क्या है और वो ऐसी फिल्मों के लिए कितना तैयार हैं?
क्या भविष्य में इसी तरह के किसी अन्य सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने की योजना है?
मैं हमेशा ही मनोरंजन की ऊपरी परत के नीचे किसी न किसी सामाजिक संदेश की परत लेकर ही फ़िल्में बनाऊंगा, क्योंकि मैं मानता हूं मनोरंजन फ़िल्म के साथ खत्म नहीं होना चाहिए, उसे अपने अनकहे संदेश से हमेशा मन-मानस का रंजन करना चाहिए। आगे आनेवाली फिल्म में भी एक बेहद गंभीर मुद्दा है पर वो फिल्म भी गुदगुदाते हुए ही अपनी बात कहेगी।
यह फिल्म दर्शकों को कहां देखने को मिलेगी?
सबसे अच्छी बात ये है कि ये फ़िल्म WAVES OTT पर उपलब्ध है जिसे कोई भी अपने मोबाइल फोन, स्मार्ट टीवी, लैपटॉप या कम्प्यूटर पर फ़्री डाउनलोड कर सकता है और फ़्री में देख भी सकता है। WAVES OTT को प्ले स्टोर या ऐप स्टोर से बहुत आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। वहां WAVES OTT या WAVES PB लिखने से ऑप्शन दिखने लगेगा। उसको डाउनलोड करके अपनी भाषा चुनिए और फिर फोन नंबर भरकर ओटीपी डालकर फ़िल्म का नाम सर्च करके मुफ़्त में इस फ़िल्म का आनंद लीजिए। यह फिल्म दूरदर्शन पर भी दिखाई जाएगी।
'यही विविधता हमें जटिल मुद्दों को समझदारी व संवेदनशीलता के साथ दिखाने में मदद करती है'
‘i24NEWS’ के चेयरमैन फ्रैंक मेलौल ने ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन के साथ बातचीत में फेक न्यूज की चुनौती, मीडिया में भरोसे की बहाली और टीवी पत्रकारिता के भविष्य पर बेबाक राय साझा की है।
‘i24NEWS’ के चेयरमैन फ्रैंक मेलौल (Frank Melloul) ने इस इजरायली अंतरराष्ट्रीय न्यूज नेटवर्क को वैश्विक मीडिया में एक अलग पहचान दी है। उनका उद्देश्य था-मध्य पूर्व की स्टोरीज को दुनिया के सामने एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक दृष्टिकोण से रखना, जो सिर्फ संघर्षों तक सीमित न हों, बल्कि टेक्नोलॉजी, संस्कृति और मानवीय प्रयासों को भी दर्शाएं।
डिप्लोमेसी, मीडिया स्ट्रैटेजी और इंटरनेशनल ब्रॉडकास्टिंग के तीनों क्षेत्रों में उनके अनुभव ने उन्हें इस बात की गहरी समझ दी है कि पत्रकारिता किस तरह वैश्विक छवि और भू-राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करती है। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के सीनियर एडिटर रुहैल अमीन के साथ एक विस्तृत बातचीत में फ्रैंक मेलौल ने संघर्ष क्षेत्रों में पत्रकारिता की भूमिका, फेक न्यूज़ की चुनौती, न्यूज मीडिया में भरोसे की बहाली और टीवी पत्रकारिता के भविष्य पर अपनी बेबाक राय साझा की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
वैश्विक मीडिया परिदृश्य में आपने क्या कमी देखी जिसके कारण आपने इजराइल से i24NEWS की शुरुआत की?
जब मैंने i24NEWS की शुरुआत की, तब ये साफ था कि इजराइल के पास ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं था जो इसकी कहानी दुनिया तक निष्पक्षता के साथ पहुंचा सके। इजराइल एक जीवंत लोकतंत्र और इनोवेशन हब है, लेकिन इसकी छवि अकसर अधूरी या पक्षपाती रूप में सामने आती थी। मैंने ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना चाहा जो अंग्रेजी, हिब्रू, फ्रेंच और अरबी में बात कर सके और सिर्फ टकराव नहीं, बल्कि इनोवेशन, संस्कृति और मानवीय जिजीविषा की कहानियों को भी सामने लाए।
जब मैंने मीडिया की वैश्विक तस्वीर देखी, तो मुझे यह महसूस हुआ कि इजराइल या पूरे मध्य पूर्व को लेकर एकतरफा नैरेटिव चलाया जाता है। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए हमने i24NEWS की शुरुआत की, ताकि यहां से पूरी दुनिया को तथ्यपरक, संतुलित और विविध दृष्टिकोणों से खबरें मिल सकें। यह चैनल अंग्रेज़ी, फ्रेंच और अरबी तीन भाषाओं में काम करता है ताकि अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचा जा सके।
अन्य ग्लोबल मीडिया आउटलेट्स से i24NEWS किस तरह अलग है?
हम सिर्फ इजराइल पर रिपोर्टिंग नहीं करते,बल्कि यहीं से प्रसारण भी करते हैं। इस क्षेत्र को हम अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए हमारी नजरिया भी अलग होता है। हमारी टीमों में 35 देशों के लोग शामिल हैं, जो हमारे न्यूजरूम को विविधता और संतुलन देते हैं। यही विविधता हमें जटिल मुद्दों को समझदारी और संवेदनशीलता के साथ दिखाने में मदद करती है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि हम तथ्यों पर भरोसा करते हैं, न कि किसी राय पर। हम अपनी तरफ से स्टोरी को मोड़ते नहीं, बल्कि जैसी घटना होती है, वैसी ही रिपोर्ट करते हैं—ताकि दर्शक अपनी राय खुद बना सकें।
आप अक्सर यह कहते हैं कि पत्रकारिता में लोगों का भरोसा लौटाना बहुत जरूरी है। i24NEWS इस भरोसे के संकट को कैसे दूर करता है?
आज मीडिया पर लोगों का भरोसा कम हो गया है। क्योंकि कई बार खबरों में पक्षपात, भ्रामक बातें और सनसनी होती है। लेकिन i24NEWS में हम खबर दिखाने से पहले हर तथ्य की पूरी जांच करते हैं, राय और खबर को अलग रखते हैं। मैं मानता हूं कि भरोसा एक दिन में नहीं बनता। हर दिन, हर खबर के साथ उसे कमाना पड़ता है।
आप कहते हैं कि मीडिया इजराइल के साथ पक्षपाती व्यवहार करता है। क्या आप इसकी वजह बता सकते हैं?
हां। मेरा मानना है कि इजराइल एक खुला लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद कई बार दोहरे मापदंडों का शिकार होता है। दुनिया भर में इजराइल से जुड़ी खबरों को जिस तरह दिखाया जाता है, उसमें अक्सर संतुलन की कमी होती है। हमें आलोचना से परेशानी नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि रिपोर्टिंग निष्पक्ष हो। जब भी इजराइल की खबरें दिखाई जाती हैं, तो उस समय का पूरा संदर्भ समझना जरूरी होता है और अक्सर वही संदर्भ नहीं दिखाया जाता। इसलिए मैं मानता हूँ कि मीडिया की रिपोर्टिंग में इजराइल के साथ भेदभाव हुआ है, सिर्फ खबरें दिखाने के तरीके से नहीं, बल्कि उस एकतरफा नजरिए और चुनिंदा जांच के कारण जो बार-बार सामने आता है।
युद्ध और अशांति के समय, मीडिया को क्या भूमिका निभानी चाहिए, विशेषकर इजरायल-गाजा संघर्ष जैसी घटनाओं के दौरान?
मीडिया का काम जानकारी देना है, लोगों की भावनाएं भड़काना नहीं। संघर्ष के समय सच्चाई सबसे पहले शिकार बनती है। ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम शांत रहें, हर तथ्य की पुष्टि करें और हर पक्ष की बात सामने लाएं, चाहे वह हमारे लिए असहज ही क्यों न हो। i24NEWS ने इज़राइल-गाजा जैसे संघर्षों के दौरान भी बिना सनसनी फैलाए रिपोर्टिंग की। यह सिर्फ हेडलाइन की बात नहीं है, यह मानव जीवन, भू‑राजनीति और दीर्घकालिक परिणामों की बात है।
तकनीकी में तेजी से हो रहे बदलावों के दौर में न्यूजरूम खुद को कैसे अपडेट रखें ताकि पीछे न छूटें?
यह बहुत जरूरी है, क्योंकि आज का दर्शक डिजिटल, मोबाइल और दुनियाभर से जुड़ा है। हमने नए स्टूडियो, आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया से जुड़ाव पर ध्यान दिया है। लेकिन बदलाव सिर्फ मशीनों से नहीं होता, सोच से होता है। इसका मतलब है नए तरीके अपनाना, दर्शकों से जुड़ना और ऐसी स्टोरीज कहना जो उन्हें गहराई से छू सकें।
क्या आपका नेटवर्क इजराइल से संचालित होने से आपकी पत्रकारिता पर किसी तरह का दबाव या निगरानी बढ़ जाती है?
बिल्कुल, इजराइल में रहते हुए हमारी पत्रकारिता पर हर वक्त नजर रखी जाती है, खासकर जब हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ कहते हैं। लेकिन यही बात हमें और मजबूत बनाती है। हम हर खबर को पूरी सटीकता, पारदर्शिता और जिम्मेदारी से बताते हैं। इस दबाव ने हमें बेहतर काम करना सिखाया है, क्योंकि यहां गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती।
आपके मुताबिक, एआई जैसी नई तकनीकें पत्रकारिता को कैसे बदल रही हैं, खासकर फेक न्यूज से लड़ने में?
एआई एक ताकतवर टूल है, लेकिन यह फायदे के साथ-साथ नुकसान भी पहुंचा सकता है। इससे न्यूज़रूम तेजी से काम कर सकते हैं और ज़्यादा असरदार बन सकते हैं, लेकिन अगर ठीक से इस्तेमाल न हो तो यह गलत जानकारी भी बहुत फैला सकता है। पत्रकारिता का भविष्य सच की जांच, इंसानी समझ और नैतिक मूल्यों पर टिका है। हम i24NEWS में एआई का इस्तेमाल करने के तरीके ढूंढ रहे हैं, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि संपादकीय नैतिकता बनी रहे।
i24NEWS की अब संयुक्त अरब अमीरात और उसके बाहर भी मौजूदगी बढ़ रही है। आप इस विस्तार को कैसे देखते हैं?
यह दिखाता है कि मध्य पूर्व अब कैसे बदल रहा है। दुबई में हमारा दफ्तर सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है। अब्राहम समझौते ने कई नए मौके पैदा किए हैं, और हम उस बातचीत का अहम हिस्सा बनना चाहते हैं। हमारा मकसद लोगों को जोड़ना है, दूर करना नहीं।
लोगों को आप i24NEWS के बारे में सबसे ज़्यादा क्या बात समझाना चाहते हैं?
हम यहां पूरी बात तथ्यात्मक रूप से बताने के लिए हैं। चाहे वह राजनीति से जुड़ी हो, तकनीक से या किसी लोगों के अनुभव से। हमारा मकसद लोगों के सामने सच्ची बातें लाना है। हम इजराइल का प्रचार नहीं करते। हम सच्चाई के साथ हैं, बातचीत के पक्ष में हैं और सच्ची पत्रकारिता का समर्थन करते हैं।
‘कम्युनिकेटर ऑफ द ईयर’ बनीं Stryker India की गीतिका बांगिया, साझा की अपनी जर्नी
गीतिका बांगिया ने ‘कम्युनिकेटर ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड जीतने के अनुभव, अपने करियर की यात्रा, इससे मिली अहम सीखों और कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में अब तक सामने आई चुनौतियों के बारे में बात की।
कम्युनिकेशन इंडस्ट्री के निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, भले ही उनकी कहानियां हमेशा सुर्खियों में न रही हों। इस क्षेत्र में कई ऐसी असाधारण महिलाएं हैं जिनकी प्रतिभा हमारी दुनिया को आकार देती है, वे सहानुभूति और नवाचार को ऐसे जोड़ती हैं जिससे संवाद अधिक मानवीय, समावेशी और प्रभावशाली बनता है।
आज की यह प्रस्तुति गीतिका बांगिया, हेड – कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस, स्ट्राइकर इंडिया की उपलब्धियों को समर्पित है। गीतिका को हाल ही में e4m PR & Corp Comm Women Achievers Awards 2024 में ‘कम्युनिकेटर ऑफ द ईयर (कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन प्रोफेशनल)’ का सम्मान मिला है। यहां पढ़िए उनकी सफलता की खूबियां-
कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में आपकी यात्रा कैसी रही? एक महिला लीडर के रूप में अपने अनुभव और चुनौतियां साझा करें।
मेरा कम्युनिकेशन करियर करीब दो दशकों से अधिक का है। यह उस दौर से शुरू हुआ जब प्रेस रिलीज फिजिकली भेजी जाती थी और अब डिजिटल युग और व्यापक स्टेकहोल्डर एंगेजमेंट के जमाने तक पहुंच गया है।
एक महिला लीडर के तौर पर कई बार ऐसे अनुभव हुए जब मेरी बातें तब तक अनसुनी रहीं जब तक वही बातें किसी पुरुष सहयोगी ने नहीं दोहराईं। इन अनुभवों ने मुझे नेतृत्व के तौर-तरीके सिखाए और यह भी कि महिलाओं के लिए और खुद अपने लिए, मजबूती से खड़ा होना कितना जरूरी है।
महामारी के दौर ने यह साफ कर दिया कि इमोशनल इंटेलिजेंस एक अहम बिजनेस एसेट है। संकट प्रबंधन और ब्रैंड स्टोरीटेलिंग में सहानुभूति की रणनीतिक भूमिका को पहली बार इतने व्यापक रूप में पहचाना गया। आज की सबसे बड़ी चुनौती है, हमेशा जुड़े रहने वाले इस दौर में प्रोफेशनल जिम्मेदारियों और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना। मैंने पाया है कि प्रामाणिक नेतृत्व हमारे हाइब्रिड कार्य वातावरण में टीमों के बीच मजबूत जुड़ाव पैदा करता है और काम की प्रभावशीलता बढ़ाता है।
PR और कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में सफलता पाने के लिए महिला लीडर्स में कौन-कौन सी स्किल्स और खूबियां होनी चाहिए?
किसी भी प्रभावशाली लीडर में तकनीकी जानकारी के साथ कुछ मूल क्षमताओं का संतुलन होना जरूरी है। सबसे पहले – स्टोरीटेलिंग की कला। यानी ऐसे नैरेटिव्स रचना जो सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में ब्रैंड की प्रासंगिकता को दर्शाएं। दूसरा – रणनीतिक लचीलापन। यानी फुर्तीले जवाबों और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन। सफल लीडर्स आने वाले बदलावों की पहले से आहट लेते हैं और जब योजनाएं बदलती हैं तब भी शांत रहते हैं। और तीसरा – इमोशनल इंटेलिजेंस। यानी स्टेकहोल्डर्स के दृष्टिकोण को समझना और प्रामाणिक संबंध बनाना। आज के माहौल में, जब दर्शक नेतृत्व से सच्चे जुड़ाव की अपेक्षा रखते हैं, यह स्किल बेहद मूल्यवान बन गई है।
इन सभी क्षमताओं को एक साथ साधना ही उन कम्युनिकेशन लीडर्स को अलग करता है जो संबंध-निर्माण और प्रामाणिकता को प्राथमिकता देते हैं।
कम्युनिकेशन इंडस्ट्री में करियर की शुरुआत कर रही युवतियों को आप क्या सलाह देंगी?
मेरी सलाह है:
दूसरों की तरह बनने की कोशिश मत करो, अपनी बात कहने का खुद का तरीका अपनाओ। तुम्हारी सोच अलग है और वही तुम्हें खास बनाती है।
पारंपरिक लेखन कौशल के साथ-साथ नए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी समझें। आज के कामयाब कम्युनिकेटर वही हैं जो तकनीक और मूल कौशल का मेल जानते हैं।
ऐसे प्रोफेशनल रिश्ते बनाएं जो आपसी मूल्य पर आधारित हों। विविध अनुभवों वाले मेंटर्स से जुड़ें।
रचनात्मकता और विश्लेषणात्मकता दोनों को विकसित करें। आधुनिक कम्युनिकेशन में कहानी सुनाने की कला के साथ-साथ डाटा को समझने की क्षमता भी जरूरी है।
सीखने, पुराना छोड़ने और फिर से सीखने से कभी पीछे न हटें। इससे आप लगातार बेहतर बनते हैं।
e4m PR & Corp Comm Women Achievers Awards 2024 जीतने पर आपको कैसा लग रहा है?
यह अवॉर्ड मेरे लिए प्रोफेशनल मान्यता और व्यक्तिगत विनम्रता दोनों लेकर आया है। यह सिर्फ मेरे काम का नहीं, बल्कि इस इंडस्ट्री में महिलाओं के नेतृत्व की बढ़ती स्वीकार्यता का सम्मान है।
अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद करती हूं तो महिलाओं की नेतृत्व भूमिकाएं बेहद कम थीं। ऐसे में आज यह सम्मान मेरी टीम के साथ साझा करना और युवा प्रोफेशनल्स के लिए प्रेरणा बनना मेरे लिए बहुत मायने रखता है। एक युवा सहयोगी ने मुझसे कहा कि इस तरह की पहचान देखकर उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसका करियर भी असीमित संभावनाओं से भरा हो सकता है।
यह सम्मान उपलब्धि भी है और जिम्मेदारी भी। अगली पीढ़ी की महिलाओं के लिए और ज्यादा अवसरों का मार्ग प्रशस्त करने की प्रेरणा।
'एक्सचेंज4मीडिया' टीम का धन्यवाद, जिन्होंने इस तरह के मंचों की रचना की।
जिस दिन इन्वेस्टर ने ये बात समझ ली, उस दिन उसे पैसा बनाना आ जाएगा: अनिल सिंघवी
‘जी बिजनेस’ के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी ने समाचार4मीडिया से बातचीत में स्टॉक मार्केट, निवेश और मीडिया से जुड़े अहम मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचार साझा किए।
बिजनेस न्यूज चैनल ‘जी बिजनेस’ (Zee Business) और फाइनेंशियल ऐप ‘धन’ (Dhan) द्वारा संयुक्त रूप से 5 जुलाई 2025 को दिल्ली स्थित भारत मंडपम में विशेष कार्यक्रम ‘एक कदम Dhan की ओर’ (Ek Kadam Dhan Ki Ore) का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘जी बिजनेस’ के मैनेजिंग एडिटर और देश के प्रमुख शेयर बाजार विश्लेषकों में से एक अनिल सिंघवी से समाचार4मीडिया ने खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने स्टॉक मार्केट, निवेश और मीडिया से जुड़े अहम मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचार साझा किए। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
‘एक कदम Dhan की ओर’ जैसे आयोजन आज के निवेशकों के लिए कितने जरूरी हैं? आप इस मंच की सबसे अहम बात क्या मानते हैं?
निवेशकों को दो ही वक्त सलाहकार की जरूरत होती है—जब बाजार तेज होता है और जब मंदी आती है। तेजी में अक्सर लोग खुद को एक्सपर्ट समझ बैठते हैं और बिना सोचे-समझे निवेश कर बैठते हैं। वहीं मंदी में डर सताता है। ऐसे में ‘एक कदम Dhan की ओर’ जैसे कार्यक्रमों का मकसद यह है कि लोगों को सही समय, सही जगह, और सही तरीके से निवेश करने के बारे में बताया जाए। यही वजह है कि हम देशभर में ये आयोजन कर रहे हैं।
इस कार्यक्रम में देशभर से फंड CEOs और मार्केट प्रोफेशनल्स जुटे हैं। आपको क्या लगता है, ऐसे संवादों से आम निवेशकों को क्या व्यावहारिक लाभ होता है?
टीवी पर लोग हमें देखते-सुनते हैं, लेकिन आमने-सामने सवाल पूछने का मौका कम ही मिलता है। ऐसे आयोजनों में पैनल डिस्कशन के अलावा हम जनता के लिए मंच खोल देते हैं, जहां वे पोर्टफोलियो से लेकर किसी खास स्टॉक तक के सवाल पूछ सकते हैं। इससे उनका भरोसा बढ़ता है और उन्हें सही मार्गदर्शन मिलता है।
आप वर्षों से निवेशकों के व्यवहार को समझते आए हैं। क्या आपको लगता है कि आज का निवेशक पहले की तुलना में ज्यादा सजग और शिक्षित हो गया है?
बिल्कुल! आज के निवेशकों में जितनी मैच्योरिटी है, उतनी शायद पहले नहीं थी। SIP के जरिये निवेश लगातार बढ़ रहा है। यंग इन्वेस्टर्स भी अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा समझदार हैं। डिजिटल क्रांति, मीडिया, ऐप्स और इन्फ्लुएंसर्स ने मिलकर एक ऐसा ईकोसिस्टम बनाया है जिससे लोग अब सोच-समझकर निवेश कर रहे हैं।
छोटे निवेशकों को आज सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखती है – जानकारी की कमी, डर, या लालच?
सबसे बड़ी चुनौती है जानकारी की कमी और गलत धारणा कि शेयर बाजार से बिना मेहनत के बहुत जल्दी पैसा बनाया जा सकता है। निवेश को एक गंभीर प्रक्रिया के रूप में समझना जरूरी है। लालच और डर तभी नियंत्रित होंगे जब सही जानकारी होगी।
आज के बाजार को आप किस स्टेज में मानते हैं – अवसर का समय है या सतर्कता का?
ये समय अवसरों से भरा हुआ है। अगर आपका नजरिया 3-5 साल का है, तो मौजूदा स्तरों पर निवेश करना बिलकुल सही है। सतर्कता जरूरी है कि पैसा कहां लगाया जा रहा है, लेकिन पैसा लगाना चाहिए या नहीं—इस पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
आप अक्सर कहते हैं कि ‘धैर्य सबसे बड़ा हथियार है’। क्या नए निवेशकों को यह बात समझ आती है? कोई उदाहरण देना चाहेंगे?
निवेशक नए हों या पुराने—धैर्य उम्र और अनुभव से आता है। मैं मानता हूं कि नए निवेशकों को शुरुआत में ही बाजार का झटका लगना चाहिए ताकि उन्हें समझ आए कि पैसा कैसे बनता है और कैसे जाता है। यही समझ उन्हें सच्चा निवेशक बनाएगी। मैं तो चाहता हूं जैसे ही कोई इन्वेस्टर बाजार में आए उसको तुरंत ही झटका लग जाना चाहिए। जिस दिन किसी इन्वेस्टर ने ये समझ लिया कि पैसा कैसे जाता है उस दिन उसको पैसा बनाना आ जाएगा।
आपके अनुभव में, फाइनेंशियल लिटरेसी को बढ़ाने में मीडिया की भूमिका कितनी निर्णायक रही है, खासकर पिछले कुछ वर्षों में?
बहुत बड़ी भूमिका रही है। सिर्फ खबर देना ही नहीं, लोगों को सिखाना और समझाना भी हमारा दायित्व है। सेविंग से लेकर वेल्थ क्रिएशन तक की यात्रा को सरल भाषा में समझाना जरूरी है। अगर कोई निवेशक बिजनेस चैनल की जरूरत महसूस न करे, तो समझिए कि हमने अपना काम सही किया।
क्या आपको लगता है कि हिंदी भाषा में फाइनेंशियल कंटेंट की मांग और पहुंच दोनों तेजी से बढ़ी है?
बिलकुल! अंग्रेजी मजबूरी थी, हिंदी पसंद है। हमने साबित किया कि बिजनेस की भाषा भी हिंदी हो सकती है और हम बाजार को सरलतम भाषा में समझा सकते हैं। जितना दोस्त बनकर सिखाएंगे, लोग उतना ही सीखेंगे।
आप खुद भी एक गाइड की तरह लाखों निवेशकों से जुड़े हैं। क्या अब भी कोई बात या प्रतिक्रिया है जो आपको व्यक्तिगत रूप से छू जाती है?
ऐसे कई किस्से हैं। मुंबई की एक 85 वर्षीय नेत्रहीन महिला जो मेरी आवाज से मुझे पहचानती थीं और अपने अंतिम समय तक अपने शेयर मेरे कहे बिना नहीं बेचना चाहती थीं। ऐसे अनुभव बताते हैं कि लोग मुझ पर कितना विश्वास करते हैं। मैं खुद को केवल एक माध्यम मानता हूं, भाग्य तो सबका ऊपरवाला लिखता है।
आपने लाखों निवेशकों से संवाद किया है—ऐसी एक सलाह जो हर निवेशक को जीवन भर याद रखनी चाहिए, वो क्या होगी?
इस बारे में मैं सिर्फ एक ही बात कहूंगा। ‘देयर इज़ नो सब्स्टीट्यूट टू हार्ड वर्क।‘ यानी कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। सफलता आसान नहीं होती। जितना ऊंचा जाना चाहते हैं, उतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी। सफलता एक स्थायी जगह नहीं है, वहां टिके रहना असली चुनौती है।
मीडिया में डॉ. अनुराग बत्रा के पूरे हुए 25 साल, इंडस्ट्री में बदलावों को लेकर कही ये बात
BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने ‘द गुड लाइफ पॉडकास्ट’ में बातचीत के दौरान अपने मीडिया सफर के 25 वर्षों पर विस्तार से चर्चा की।
BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने ‘द गुड लाइफ पॉडकास्ट’ में एक प्रेरणादायक बातचीत के दौरान अपने मीडिया सफर के 25 वर्षों पर विस्तार से चर्चा की।
बातचीत की शुरुआत में उन्होंने ब्रायन क्लास की किताब Fluke से एक गहरी बात साझा की, “हम अपनी कामयाबी का सारा श्रेय खुद को देते हैं, जबकि उसका बहुत हिस्सा संयोग या ईश्वर की देन होता है।” डॉ. बत्रा ने बताया कि एक्सचेंज4मीडिया की स्थापना कोई सोचा-समझा बिजनेस प्लान नहीं था, बल्कि यह एक संयोग और समय की कृपा से हुआ।
एक बी2बी मार्केटप्लेस के तौर पर शुरू हुआ एक्सचेंज4मीडिया आज एक व्यापक मीडिया इकोसिस्टम बन चुका है। पिच, इम्पैक्ट, रिएल्टी+, समाचार4मीडिया जैसी ब्रैंड्स इस नेटवर्क के हिस्से हैं, जो मीडिया, रियल एस्टेट और मार्केटिंग इंडस्ट्री की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। वहीं 45 साल पुराना बिजनेसवर्ल्ड स्वतंत्र रूप से संचालित होता है। दोनों का उद्देश्य—विश्वसनीयता, विशेषज्ञता और सार्थक कहानी कहना।
मीडिया, मार्केटिंग और तकनीक का विलय
बीते दो दशकों में मीडिया और विज्ञापन इंडस्ट्री में आए बदलावों पर चर्चा करते हुए डॉ. बत्रा कहते हैं, “आज कंटेंट, कम्युनिटी और कॉमर्स—इन तीन शक्तिशाली ताकतों का संगम हो रहा है। मैडिसन एवेन्यू (विज्ञापन), हॉलीवुड (मनोरंजन), और सिलिकॉन वैली (टेक्नोलॉजी) अब अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक हो चुके हैं।”
वो बताते हैं कि दुनिया की $1 ट्रिलियन की विज्ञापन इंडस्ट्री में से $650 बिलियन डिजिटल पर खर्च हो रहा है, जिसमें से $460 बिलियन सिर्फ दो कंपनियों—गूगल और मेटा के पास है।
“YouTube ने भारतीय क्रिएटर्स को 21,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया है”
यह आंकड़ा दर्शाता है कि क्रिएटर इकोनॉमी अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रभावशाली कमाई और ब्रैंड निर्माण का जरिया बन गई है। “क्रिएटर्स अब केवल इंफ्लुएंसर नहीं रहे, वे खुद में एक क्रिएटिव ब्रैंड बन चुके हैं,” डॉ. बत्रा कहते हैं।
AI से डरने की नहीं, उसे अपनाने की जरूरत
AI की बात करते हुए डॉ. बत्रा कहते हैं, “AI टेक्स्ट को वीडियो में बदल सकता है, ऑडियो बना सकता है, यहां तक कि AI एंकर भी तैयार कर सकता है। लेकिन पत्रकारों को यह समझना होगा कि AI उन्हें रिप्लेस नहीं करेगा—जब तक वे खुद इसका उपयोग करना न छोड़ दें।”
उनके अनुसार, पत्रकारों और न्यूजरूम को AI के साथ प्रयोग करने और उसे अपनाने की जरूरत है, ताकि उनकी प्रासंगिकता बनी रहे।
फेक न्यूज और ट्रस्ट का संकट
“हम आज नैरेटिव वॉरफेयर के युग में हैं। हम नहीं जानते कि कौन सी जानकारी सही है और कौन सी झूठ,” डॉ. बत्रा कहते हैं। उनका सुझाव है कि लोग WhatsApp और सोशल मीडिया पर दिख रही हर चीज पर यकीन न करें, बल्कि रक्षा मंत्रालय जैसी विश्वसनीय संस्थागत स्रोतों से जानकारी लें।
ग्राहक अब अनुभव चाहते हैं—और वे इसके लिए भुगतान करने को तैयार हैं
वो बताते हैं कि आज की पीढ़ी अनुभवों पर खर्च कर रही है। कॉन्सर्ट्स, समिट्स और लिटरेचर फेस्टिवल्स शहरों को हिला देते हैं। “अगर आप अच्छा, अलग और इमर्सिव कंटेंट देंगे तो लोग उसके लिए पैसे भी देंगे।” The Ken, Mint, Morning Context जैसी सब्सक्रिप्शन साइट्स इसका उदाहरण हैं।
डिजिटल का दौर, लेकिन परंपरागत मीडिया भी जिंदा है
“लोग कई सालों से कह रहे हैं कि अख़बार खत्म हो जाएंगे, लेकिन आज भी वे विश्वसनीयता के लिए सबसे ऊपर हैं,” डॉ. बत्रा कहते हैं। New York Times और Washington Post जैसे ब्रैंड्स ने यह साबित कर दिया है कि डिजिटल में भी गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखी जा सकती है।
इंफ्लुएंसर fatigue और डिजिटल विज्ञापन में धोखाधड़ी
डॉ. बत्रा मानते हैं कि कुछ इंफ्लुएंसर बहुत महंगे हो गए हैं और उनके रिटर्न भी घटते जा रहे हैं। इसके अलावा, डिजिटल विज्ञापन में धोखाधड़ी—जैसे बॉट्स और क्लिक फ्रॉड—भी बढ़ रही है। “20-30%, कभी-कभी 40% तक डिजिटल खर्च बेकार चला जाता है,” वे चेताते हैं।
AI पत्रकारों को नहीं हटाएगा—लेकिन पत्रकारों को खुद को अपग्रेड करना होगा
“लोग आज भी इंसानों को फॉलो करते हैं। एक एंकर की सोच, उसका अंदाज, उसकी राय—ये चीजें AI नहीं बना सकता,” डॉ. बत्रा स्पष्ट करते हैं।
‘YOLO’ युग में अनुभव की भूख
डॉ. बत्रा मानते हैं कि महामारी के बाद लोग असली अनुभवों के लिए तरस गए हैं। “एक कॉन्सर्ट ने अहमदाबाद जैसे शहर को हिला दिया,” वे उदाहरण देते हैं। उनका मानना है कि ईवेंट्स अब कंटेंट, कम्युनिटी और कॉमर्स का विस्तार बन चुके हैं।
मीडिया का राष्ट्रीय संकट में रोल
हाल की भारत-पाकिस्तान घटनाओं का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, “जब प्रधानमंत्री ने बयान दिया, उन्होंने स्पष्टता और आश्वासन दोनों दिए। यह बताया कि सीजफायर भारत की शर्तों पर हुआ।” उनका मानना है कि ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, गलत जानकारी पर आधारित राय जनता को भटका सकती है।
AI और Deepfakes के युग में जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत
वे आश्वस्त करते हैं, “Deepfake बनाने के 10 तरीके हैं, लेकिन पकड़ने के 20 टूल्स भी हैं।” उनका मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल इकोसिस्टम बढ़ेगा, फेक न्यूज को रोकने के उपाय भी मजबूत होंगे।
मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी
“फिल्टर किया हुआ ज्ञान ही उपयोगी होता है, जैसे आप सड़क का गंदा पानी नहीं पीते, वैसे ही अनफ़िल्टर्ड जानकारी भी नहीं पढ़नी चाहिए।” वे कहते हैं कि परंपरागत मीडिया संस्थानों को इस क्यूरेशन की भूमिका निभानी चाहिए।
‘गुड लाइफ’ क्या है?
डॉ. बत्रा के लिए अच्छी जिंदगी का मतलब है- रिश्तों की गहराई, सेहत और अपने काम में खुशी पाना। वे कहते हैं, “अगर आप वही काम कर रहे हैं जिससे आपको खुशी मिलती है और वह आपका व्यवसाय भी है तो आपने जीत हासिल कर ली है।”
और अंत में, वे अपने पसंदीदा लेखक रैंडी पॉश के शब्दों के साथ बातचीत खत्म करते हैं और कहते हैं, “अनुभव वही होता है, जो तब मिलता है जब हम वो नहीं पाते जो हम चाहते हैं।”