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तरक्की के लिए अपनाएं ये मूलमंत्र : डॉ. सत्यपाल सिंह, HRD मंत्री

डॉ. सत्यकाम भारद्वाज वैदिक रिसर्च फाउंडेशन ने शुक्रवार को अपनी कॉफी टेबल बुक, ‘वेदाज़- ए न्यू पर्सेप्शन’ की...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

डॉ. सत्यकाम भारद्वाज वैदिक रिसर्च फाउंडेशन ने शुक्रवार को अपनी कॉफी टेबल बुक,‘वेदाज़- ए न्यू पर्सेप्शन’ (Vedas-A New Perception) की लॉन्चिंग की। दिल्ली के ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ में आयोजित कार्यक्रम में मानव संसाधन विकास, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में राज्यमंत्री,  डॉ. सत्यपाल सिंह ने इस बुक की लॉन्चिंग की।

इस मौके पर डॉ. सत्यपाल सिंह ने वेदों का महत्व भी बताया। डॉ. सत्यपाल सिंह का कहना था, ‘आज वेदों के बारे में तमाम तरह की बातें होती हैं, कई बार लोग कहते हैं कि हमारा वैदिक सिस्टम काफी प्राचीन है, लेकिन मुझे इस तरह की बातें कई बार ठीक नहीं लगती हैं। सूर्य और धरती के बारे में कोई बोलता नहीं है कि ये काफी प्राचीन हैं। जिस तरह से सूर्य अपार ऊर्जा का भंडार है और समूचे जगत को ऊर्जा देता है। ऐसे में सूर्य के बिना ऊर्जा नहीं मिल सकती है। बिना धरती के फल-फूल, अन्न नहीं मिल सकते हैं। समंदर के बिना पानी की कल्पना नहीं की जा सकती है। बिना हवा के जीवन असंभव है। आकाश के बिना हमारा अस्तित्व नहीं है। जब हम इनकी उत्पत्ति के बारे में विचार करते हैं तो पता चलता है कि ये ईश्वरीय उत्पत्ति हैं, भगवान ने बहुत अच्छी दुनिया बनाई है, इसे हम मानें या न मानें।  


उनका कहना था, ‘कोई माने या न माने, पृथ्वी के अंदर बहुत शक्ति है और ईश्वर भी मौजूद है। ज्यादातर साइंटिस्टों की तरह मेरा भी यही मानना है कि दुनिया काफी साइंटिफिक है और इस दुनिया में कोई भी चीज बेकार यानी अनुपयोगी नहीं है। भगवान ने इन सब चीजों के साथ जो ज्ञान दिया है, वही वेद है। वेद बताते हैं कि दुनिया में कैसे रहना है और किस तरह से व्यवहार करते हुए जीवन जीना है।’

डॉ. सत्यपाल का कहना था कि वेदों की तीन विशेषताएं है। इनमें सबसे पहली ‘स्वतः प्रमाण’ है। यानी इन्हें सिद्ध करने के लिए किसी विद्वान या साइंटिस्ट की जरूरत नहीं है। यदि हम इन्हें नहीं समझ सकें तो यह हमारी अज्ञानता है।  


उनका कहना था कि वेदों की दूसरी विशेषता है कि ये ‘असाधारण’ हैं। यानी दुनिया की किसी भी किताब से इनकी तुलना नहीं की जा सकती है। इनमें जीवन से लेकर मौत तक का पूरा वर्णन है। सबसे खास बात यह है कि यह किसी एक देश, जाति या धर्म के बारे में नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के बारे में हैं। इनकी तीसरी विशेषता की बात करें तो ये ‘अपरिमेय’ हैं। यानी वेदों की सभी बातों को समझना संभव नहीं है।

एक कहावत- ‘जहां पेड़ नहीं होते, वहां अरंडी के पौधे को भी पेड़ कहते हैं’, का जिक्र करते हुए डॉ. सत्यपाल का कहना था, ‘ये हमारे देश के साथ ही दुनिया का दुर्भाग्य है कि कई लोग खुद को वेदों का विद्वान बताते है. जबकि उन्हें इसकी संपूर्ण जानकारी नहीं होती है।’


उनका कहना था, ‘छह वेदांग होते हैं और इन्हें समझना बहुत जरूरी है। बहुत कम लोग वेदों को समझते हैं। हमारी जितनी भी समस्याएं है, चाहे वो व्यक्तिगत हों अथवा सामाजिक, जिसे जीवन कहते हैं, वह चार चीजों- शरीर, बुद्धि, मन और आत्मा का मिश्रण है। इनकी तरक्की के लिए वेद जरूर पढ़ने चाहिए। यह हमें तय करना है कि हम खुश रहना चाहते हैं या नहीं रहना चाहते हैं। हम समाज को अच्छा बनाना चाहते हैं या नहीं। हम राष्ट्र का उत्कर्ष चाहते हैं या नहीं। हम विश्व में शांति चाहते हैं या नहीं। यदि हम देश, परिवार व समाज की सुख-शांति चाहते हैं तो वेद जरूर पढ़ने चाहिए। पुराने जमाने में जब तक वेदों का प्रचार-प्रसार चलता रहा, तब तक यह देश दुनिया का सिरमौर रहा, फिर चाहे बात वीरता की हो, विद्वता की हो या वैभव की। उस समय देश बहुत खुशहाल था और इसका कोई सानी नहीं था। धीरे-धीरे हम वेदों को भूलते चले गए।’


डॉ. सत्यपाल का कहना था, ‘अभी हमें अपने मंत्रालय में 68 वर्ष पहले का वर्ष 1950 का एक लेटर मिला। उस समय हमारे सबसे पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम के सेक्रेटरी प्रो. हुमायूं ने वह पत्र देश के सभी राज्यों के मुख्य सचिव को लिखा था। इस पत्र में कहा गया था कि देश की शिक्षा में सुधार की जरूरत है। शिक्षा में नैतिक मूल्यों का अभाव है और यदि स्कूलों में धर्म पढ़ाया जाएगा, तो जीवन मूल्य अपने आप आ जाएंगे। कहने का मतलब ये है कि उस जमाने में यह पत्र लिखने वाले सेक्रेटरी और शिक्षामंत्री मुस्लिम थे, लेकिन उनका कहना था कि यदि धर्म शिक्षा में आएगा तो हम जीवन मूल्य सीख जाएंगे और शिक्षा व्यवस्था ठीक हो जाएगी। हालांकि ऐसा हो नहीं पाया।’

उन्होंने कहा, ‘इसी धरती पर स्वर्ग है और इसी धरती पर ही नर्क है। सुख, शांति और समृद्धि जिसके पास है, वही उसके लिए स्वर्ग है। जैसे सूर्य लाखों-करोड़ों साल पहले की तरह आज भी जरूरी है, उसी तरह वेदों का महत्व पहले भी था और आज भी है। ये हमें तय करना है कि हमें करना क्या है?’ आखिर मे उन्होने, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...’ शेर की पंक्तियों के साथ कहा कि हमारे पास वेद हैं और हमें इस बात पर गर्व है।

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