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आज पत्रकार कॉकरोच से तितली बन गए हैं: राजदीप सरदेसाई
राजदीप सरदेसाई, एक ऐसा नाम जिसने बदलते भारत के तीन दशकों को न सिर्फ देखा है...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
अभिषेक मेहरोत्रा ।।
राजदीप सरदेसाई, एक ऐसा नाम जिसने बदलते भारत के तीन दशकों को न सिर्फ देखा है बल्कि उस पर लगातार अपनी कलम और कीबोर्ड के जरिए खूब टिप्पणियां भी की हैं। आज इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि आज ही के दिन 1988 में राजदीप ने देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के अखबार 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के साथ अपनी पत्रकारिता की पारी की शुरुआत की थी।
30 साल के इस बड़े और अहम सफर पर बात करते हुए राजदीप कहते हैं कि आज थोड़ा नॉस्टैल्जिक हूं, पुरानी यादें याद आ रही है। आज भी याद है कि कैसे टाइपराइटर पर खबर लिखता था, और किस तरह उस वक्त पेज सेटिंग होती थी और आज हम हर काम टेक्नॉलजी के जरिए झट से निपटा देते हैं। पर वो समय था जब सुकून, ठहराव और कभी-कभी सन्नाटा आपके साथ होता था, पिछले दस साल में जर्नलिज्म आधुनिक हुआ है, विकास के दौर का रंग इस पर चढ़ा है, पर ब्रेकिंग न्यूज और डिबेट कल्चर ने इसकी क्रेडिबिलिटी और ग्रेसफुलनेस पर सवाल भी खड़े किए हैं।
वे आगे कहते हैं कि राजीव गांधी से मोदी राज, कांग्रेस राज से बीजेपी राज, बर्लिन की मजूबत दीवार से ट्रंप राज, सचिन की पहली सेंचुरी से लेकर विराट का विराट रूप, इस सबका प्रत्यक्षदर्शी हूं मैं। बड़ी घटनाओं का जिक्र करते हुए राजदीप बताते हैं कि मुंबई दंगों को किस तरह उनके साथ आठ लोगों की टीम ने कवर किया था, तब इंटीग्रेट न्यूजरूम जैसा टर्म नहीं था, पर आपसी समझ और सामंजस्य ऐसा था कि आपके साथी आपके साथ मिलकर सिर्फ पत्रकारिता करते थे, एक-दूसरे को नीचा दिखाने जैसी प्रवृत्ति कोसों दूर थी।
तीस साल में किस तरह पत्रकारिता में बदलाव आया है, इस पर राजदीप कहते हैं कि यूं समझिए कि पहले पत्रकार कॉकरोच होता था, अब बटरफ्लाई बन गया है। इसके पीछे का लॉजिक वे कुछ इस तरह से समझाते हैं, पहले एक बाइलाइन मिल जाती थी तो हम कई हफ्तों तक खुश रहते थे। कॉकरेज इसलिए बोल रहा हूं कि क्योंकि हम न्यूक्लियर ब्लास्ट होता है तो सब कुछ तबाह हो जाता है, सिर्फ कॉकरोच रह जाते हैं। हम लोग भी दूसरे दिन खबर देने के लिए होते हैं कि कहां क्या हुआ है, उस दौर में पत्रकार की कोई पहचान नहीं होती थी, पर आज पत्रकार सिलेब्रिटी है। आज लोग हमारे साथ सेल्फी रहने को आतुर दिखते हैं। ये सब अच्छा भी लगता है, पर इस सबके बीच कहीं न कहीं हम पत्रकारिता के सिद्धांतों को गंवा भी रहे हैं।
मैं एक बात का जिक्र जरूर करूंगा कि चाहे दिलीप पड़गांवकर हो या डॉ. प्रणॉय रॉय, राघव बहल हो या अरुण पुरी, राधिका रॉय हो या कली पुरी मुझे सबने जो अवसर दिया है, उसी की वजह से मैं कुछ हासिल कर पाया हूं। ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे अच्छे मौके मिलते रहे।
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