होम / इंडस्ट्री ब्रीफिंग / हैप्पी बर्थडे अजय शुक्ल: इससे बढ़िया बर्थडे गिफ्ट कुछ नहीं हो सकता
हैप्पी बर्थडे अजय शुक्ल: इससे बढ़िया बर्थडे गिफ्ट कुछ नहीं हो सकता
‘सच कहता हूं भाभी कि मैं जिस दिन अपने दुश्मन का भी बुरा सोचूं, वही दिन...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
डॉ. उपेंद्र अयोध्या
चीफ न्यूज को-आर्डिनेटर/नेशनल ब्यूरो चीफ,
दैनिक ट्रिब्यून ।।
‘सच कहता हूं भाभी कि मैं जिस दिन अपने दुश्मन का भी बुरा सोचूं, वही दिन मेरे जीवन का आखिरी दिन हो’, मैं चुपचाप देख रहा था 'दैनिक जागरण' लखनऊ के क्राइम रिपोर्टर-उपसंपादक अजय शुक्ल से लेकर ‘इंडिया न्यूज’ चैनल और ‘आज समाज’ के चीफ एडिटर अजय शुक्ल के व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों को। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और चंडीगढ़ की महामहिम हस्तियों में शुमार अजय शुक्ल भले ही यह कहते हैं कि मैं परमपिता परमेश्वर से यही कामना करता हूं कि मेरे हाथों कभी किसी का बुरा न हो। लेकिन, सच तो यह है कि ‘इंडिया न्यूज’ की खबरों, उनके डायरेक्ट एक्शन सरीखे टीवी प्रोग्राम ‘सामना सवालों का’ का निशाना बनने वाली राजनीतिक-सामाजिक हस्तियों, बीते दो साल पहले तक बतौर दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ आगरा-अलीगढ़ के संपादक अजय की न्यूज ड्रिल्स और ड्राइव्स का शिकार होने वाले लोगों को तो अजय शुक्ल नामक यह प्राणी किसी मूडी और जुनूनी शहंशाह से कम नहीं लगता। मित्र और परिचितों को भी यह कहने में कोई गुरेज नहीं होगा कि अजय शुक्ल में जबर्दस्त जुनून भी है और जिस खबर या मामले के पीछे वह पड़ जाएं, उसे पूरा करने के लिए हद तक चले जाने की जिद भी।
1994 की 16 मार्च को मेरा बर्थडे मनाने ‘दैनिक जागरण’ लखनऊ के साथी पत्रकारों की जो मंडली जुटी, उसमें सबसे यंग और बच्चों जैसे तन-बदन और मन वाले ट्रेनी अजय शुक्ल ने मेरी श्रीमती जी पर न जाने कौन सा जादू कर दिया कि उस दिन से आज तक बीते 28 बरसों के दौरान अजय अपनी भाभी के सर्वाधिक प्रिय देवर बने हुए हैं। इतने अनौपचारिक कि आज लंच टाइम के ठीक पहले घर आ धमके और कहा कि भाभी जरा चाय पिलाइए और आशीर्वाद दीजिए। चाय की चुस्कियों के बीच किसी का फोन आया तो सहसा अजय शुक्ल का संपादकत्व जाग उठा और वह जोर-जोर से किसी सज्जन को सज्जनता का पाठ पढ़ाने लगे। श्रीमती जी ने टोका, ‘जाने भी दो, भैया, इतना गुस्सा क्यूं करते हो किसी पर? गले में पड़ी मोतियों की माला का कुछ असर नहीं पड़ रहा क्या?’ शर्माते हुए अजय का चेहरा बालमुकुंद की किरणों सा अरुणाभ हो उठा और कुर्सी से आधा उठकर मेरी श्रीमती जी से मुखातिब हुए और उत्तेजना में सुर्खलाल चेहरे के साथ बोल पड़े कि प्रोफेशनली वह ना काहू से दोस्ती और ना काहू से बैर की अवधारणा पर चलते हैं, किंतु बुरा किसी बुरे का भी नहीं चाहते।
दरअसल, नरम-गरम अजय शुक्ल पर भोले शंकर की कृपा भी है और छाया भी। प्रसन्न हो गए तो अवघट दानी, कुपित हो गए तो तांडव। श्रीमती जी याद करती हैं कि शादी के बाद दुनिया पत्नी के साथ हनीमून पर रोमांटिक पर्यटन स्थलों का रुख करती है, लेकिन अजय अमिता को शादी के बाद लेकर पहुंच गए काशी विश्वनाथ के दर्शन करने और दशाश्वमेध घाट पर गंगाचमन कर अपनी भाभी के हाथों की ठंडी लस्सी के गिलास पर जमती पिघलती बर्फ को ही मान लिया स्नोफॉल।
अजय से मेरा सीधा संपादकीय रिश्ता तब कायम हुआ जब मैं ‘दैनिक जागरण’ फैजाबाद का ब्यूरो चीफ हुआ करता था। यह बात है 1994 की, तब मोबाइल का जमाना नहीं था और जागरण समूह में उस दौरान दो टेलिफोन हॉटलाइन हुआ करती थीं। एक हॉटलाइन जागरण मुख्यालय कानपुर से राजधानी स्थित लखनऊ कार्यालय के बीच और दूसरी लखनऊ से फैजाबाद ब्यूरो के बीच। अजय लखनऊ मुख्यालय में फैजाबाद एडिशन की डेस्क देख रहे थे और मैं था फैजाबाद ब्यूरो चीफ। हम दोनों के बीच अक्सर हॉटलाइन पर लंबी नोकझोंक होती रहती थी। मेरी प्राथमिकता थी लेटेस्ट खबरें लगवा लेने की, अजय की जिम्मेदारी थी समय पर एडिशन छोड़ने की। इसी दायित्व निर्वहन के द्वंद्व में कई बार गरमागरमी भी हुई। अजय यहां तक कह दिया करते कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं कल से ड्यूटी पर ही नहीं आऊंगा। आप लोग संभालिए अखबार। हालांकि यह बात दूसरी है कि अजय तो जागरण में ही बने रहे और मैं 1996 में अखबार की दुनिया छोड़कर निकल लिया राकफेलर फाउंडेशन की फेलोशिप के तहत रिसर्च करने। यह बात और है कि विदाई की घड़ी में सबसे रुंधा गला दो ही लोगों का रहा। एक अजय शुक्ल और दूसरे रमाशरण अवस्थी, जो आज भी जागरण के फैजाबाद ब्यूरी चीफ हैं।
‘कुबेर टाइम्स’ को ताला लगा तो अजय हमारे पीछे ‘अमर उजाला’ चंडीगढ भी पहुंच गए। साल था 1999 का, किंतु क्राइम शिरोमणि अजय को धर्मनगरी अमृतसर बहुत दिन बांध नहीं पाई और उन्हें मोटर साइकिल पर अमृतसर से लखनऊ व लखनऊ से रांची ‘हिन्दुस्तान’ क्रास कंट्री दौड़ लगाते भी हमने देखा। फिर अजय का नया रूप देखने को मिला 2004 में, जब मैं ‘हिन्दुस्तान’ वाराणसी पहुंच गया था और अजय आधी रात को बरसते पानी में अपनी मारुति वैन लेकर केवल भोले शंकर का दर्शन करने वाराणसी पहुंच जाते और दर्शन करके फौरन लौट जाते।
अजय शुक्ल के कदम बढ़ते गए, शहर बदलते गए, किंतु विधि को हम दो भाइयों की दूरी ज्यादा बर्दाश्त नहीं होती, या यूं कह लें कि अजय के फक्कड़पन और फकीरी को ब्रेक लगाने को 'गणपति बप्पा' मुझे उनके आसपास ही रखते रहे, वह गणपति बप्पा जिसका दरबार हर साल अजय शुक्ल के घर में सजता है और वह अजय शुक्ल जो जब भी मूड आ जाए, साल-साल भर तक बगैर अन्न खाए दुग्धाहार पर तपस्या करते हुए अपना पत्रकारीय जुनून को जीवंत बनाए रखते हैं। ऐसा है इंडिया न्यूज समूह का संपादकीय चेहरा अजय शुक्ल।
टैग्स बर्थडे जन्मदिन अजय शु्क्ल