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हैप्पी बर्थडे अजय अग्रवाल: कर्मठता और संजीदगी का पर्याय हैं आप

DLA के प्रधान संपादक अजय अग्रवाल उर्फ ‘भइयूजी’ किसी भी परिचय के...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

सुभाष ढल

DLA के प्रधान संपादक अजय अग्रवाल उर्फ ‘भइयूजी’ किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पत्रकारिता जगत में 35 वर्षों से भी अधिक उनका योगदान उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को चमत्कृत करता है। इस दौरान उन्होंने जीवन में कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे, सामना किया और निडरता से उन्हें बढ़ते हुए मैंने उन्हें करीब से देखा है। सादगी में विशिष्टता और विशिष्टता में सादगी उनके कृतित्व का प्रमुख अंग है।  

वाक्या सन् 1975 का है। एम.डी. जैन इंटर कॉलेज, हरीपर्वत में एक छात्र इंटर (बोर्ड) का फॉर्म भर रहा था। पिता के नाम के आगे जब उसने श्री डोरी लाल अग्रवाल लिखा तो मैं समझ गया कि यह अमर उजाला परिवार से है। मैंने अत्यंत विनम्रता के साथ अपना परिचय यह सोचकर दिया कि कभी अखबार में नाम छपवाना होगा तो यह बहुत काम आएगा। अजय जी से मेरी यह पहली मुलाकात थी, जो मुझे याद है।

समय की धारा बहती चली गई। अमर उजाला के प्रधान संपादक डोरी लाल अग्रवाल जी थे, फिर अनिल कुमार अग्रवाल जी हो गए। अमर उजाला कार्यालय धूलियागंज से गुरु का ताल के पास स्थानांतरित हो गया। तब तक अजय जी भी अमर उजाला के स्थानीय संपादक के तौर पर प्रतिस्थापित हो चुके थे।

मेरी अनिल जी से गहरी निकटता थी। अजय जी मुझे मित्र मानने लगे तो मुझे गहरी सुखद अनुभूति हुई। अमर उजाला मिशन अनिल जी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था और वह समय था जब अमर उजाला को विस्तार के लिए एक सशक्त नींव का निर्माण हो चुका था।

पिता के संस्कार और अनिल जी के निर्देशन के समन्वय में अजय जी की पत्रकारिता में धाक जम चुकी थी। असमय अनिल जी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु ने सभी को झकझोर दिया, जिसमें अजय जी ने अपने भाई को ही नहीं, वरन एक मार्गदर्शक को भी खो दिया।

अनिल जी का अचानक प्रस्थान हो चुका था। अशोक अग्रवाल जी अमर उजाला के नए प्रधान संपादक के रुप में कार्यरत हुए। अब अमर उजाला में न डोरी लाल जी थे और न ही मुरारी लाल महेश्वरी जी। अनिल जी भी अवसान से पहले एक अच्छी आधारशिला का सृजन कर चुके थे। कर्णधारों की शक्ति में युवा रक्त का प्रवहन था। अमर उजाला का तेजी से विस्तार का यही कार्यकाल था। सोकर उठते थे तो पता चलता था एक और अमर उजाला की कड़ी का प्रकाशन प्रारंभ हो चुका है। देखते ही देखते अमर उजाला एक वट वृक्ष बन गया। इस विस्तार में अजय जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। यह बात अलग है कि आज अमर उजाला में अग्रवाल बंधुओं का अस्तित्व नहीं है, पर जड़ में इनकी कड़ी तपस्या हमेशा कायम रहेगी। अजय जी इस आंदोलन के एक महत्वपूर्ण योद्धा थे, इसमें कोई संदेह नहीं।

 विनम्रता, व्यवहारकुशलता, संजीदगी और कर्मठता के पथ से अजय जी कभी विचलित नहीं हुए। युवा अजय जी को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि प्रधानमंत्री जी के विदेश दौरों में वे भारतीय पत्रकार दल के सदस्य थे। उनका मौलिक चिंतन तथा निष्पक्ष पत्रकारिता की छाप समय-समय पर कई बड़े विषयों पर दिखती रहती है।

अपनी हमउम्र के व्यक्ति के लिए जब कुछ लिख रहा हूं तो उसमें कुछ ऐसा तो अवश्य होगा जो सबसे अलग है। अज य जी की जीवन यात्रा यदि कहा जाए कि एक खुली किताब है तो अनुचित नहीं होगा। एक समय ऐसा भी आया कि उनके मित्र, शुभचिंतक ही नहीं तथा जो उनकी दया पर निर्भर थे, उनका साथ छोड़ गए थे। मैंने उन्हें बिल्कुल अकेला आत्मचिंतन करते हुए तथा उस काम में सक्रियता के साथ देखा। मैं समझता था कि अजय जी टूट रहे हैं। यही सोचते हुए उनके राजामंडी आगरा स्थित आवास पर पहुंचा तो मैंने देखा कि उनकी आंखों में चमक थी। हताशा और निराशा उनसे कोसों दूर थी। तब मुझे उन पर गर्व महसूस हुआ। लगभग बहिष्कृत व्यक्ति अपने जीवन के एकाकीपन में सुख का अनुभव करने वाले अजय जी के साथ पूरा शहर सहानुभूति रखता था किन्तु खुलकर कुछ ही लोग सामने आए, ऐसा विषम परिस्थिति भी मैंने अजय जी के जीवनकाल में देखी।

अमर उजाला से हटने के बाद डी.एल.ए समाचार पत्र की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही थी। नए कार्यालय महात्मा गांधी मार्ग (शाह मार्केट के पास) पर निर्माण कार्य चल रहा था। अपनी आदत के अनुसार मैं वहां शोर मचाता हुआ पहुंचा तो अजय जी मुझे देखकर छिप गए। मैंने उन्हें खोज लिया तब उन्होंने मुझे पहली बार गुस्से में कहा, ‘ढल मैं एक मिशन में लगा हुआ हूं, इस समय मेरे पास हंसी-मजाक के लिए बिल्कुल भी समय नहीं है। पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है और मुझे स्वयं को सफल सिद्ध करना है।’

मुझे तत्काल अपनी गलती का अहसास हुआ, मैंने कहा, ‘भइयूजी अब यहां नहीं आउंगा। उस दिन आउंगा, जिस दिन डी.एल.ए समाचार पत्र मार्केट में आएगा।

अपने यशस्वी पिता को समर्पित डी.एल.ए समाचार पत्र मार्केट में आ चुका था। पहले दिन पत्र की प्रतियां फ्री में वितरित की गई थीं। 100 प्रतियां मैं भी लाया था, जो मैंने बाजार में वितरित कीं। रात्रि को अजय जी का फोन आया, ‘प्यारे आज तो तुम भी डी.एल.ए बांट रहे थे।’

‘अजय जी, यह मेरा सौभाग्य है कि आपके मिशन में यदि मैं आपका सक्रिय सहयोगी न सही किन्तु अपनी सहभावनाएं व्यक्त करने में अखबार की प्रतियां तो वितरित कर सकता हूं।’ मैंने उत्तर में कहा।

कुल मिलाकर यदि अजय जी के जीवन का अवलोकन किया जाए तो मैं उन्हें एक आदर्श पुरुष की संज्ञा देने में संकोच नहीं करूंगा। वो चिरायु तथा उत्तरोत्तर अपने मिशन में आगे बढ़ें, जन्मदिन पर मेरी यही कामना है।

 


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