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भास्कर समूह ने अपने दिवगंत संपादक कल्पेश याग्निक को दी ऐसे श्रद्धांजलि...
दैनिक भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक नहीं रहे...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
दैनिक भास्कर ने अपने संपादकीय में अपने समूह संपादक कल्पेश याग्निक के निधन पर एक कॉलम प्रकाशित कर उनके बीते दिनों को याद किया और श्रद्धांजलि दी है। दैनिक भास्कर ने बताया कि उन्होंने समय की कभी परवाह नहीं की। खबर में डूबते तो डूबे ही रहते। डूबते ही चले जाते। एक जुनून हमेशा सिर पर सवार रहता। न रुकता, न थकता कभी। लगातार। अनवरत। पढ़िए कल्पेशजी पर लिखा पूरा कॉलम-
पत्रकारिता के जोश, जुनून और जिद थे कल्पेशजी...
दैनिक भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक नहीं रहे। गुरुवार देर रात उनका निधन हो गया। इंदौर में शुक्रवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया। कल्पेशजी 30 साल से अधिक समय से पत्रकारिता में थे। इनमें से 21 साल दैनिक भास्कर में ही रहे। वे प्रखर वक्ता थे। देश-दुनिया में चल रहे संवेदनशील मुद्दों पर बेबाक और निष्पक्ष लिखते थे। हर शनिवार दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने वाला उनका कॉलम ‘असंभव के विरुद्ध’ बेहद चर्चित था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्र लिखकर कहा है कि ‘देश और समाज हित के विभिन्न मुद्दों पर कल्पेशजी की कलम अनोखा नजरिया देती थी।’ उनके परिवार में मां प्रतिभा याग्निक, पत्नी भारती, बेटी शेरना और शौर्या, भाई नीरज और अनुराग हैं।
दरअसल, कल्पेशजी पत्रकारिता में जोश, जुनून और जिद के पर्याय थे। चौबीसों घंटे सिर्फ खबर, खबर और खबर। खबर के मायने भी काली स्याही के कुछ अक्षर, शब्द या पंक्तियां भर नहीं। सत्य की खोज। ...और इस खोज से जो कुछ, और जैसा कुछ भी निपजे या उपजे वही उनकी पत्रकारिता। घंटों काम करने के बाद भी वही जोश। ब्रह्म रंध्र से पाताल लोक तक खड्ग की तरह चीर जाने वाली आवाज। न्यूजरूम में कभी न खत्म होने वाले किस्से और वर्षों पढ़ी या सुनी हुई कहानियों का पुलिंदा उनकी रोज की जीवन शैली थी। घर, दफ्तर या बाजार या किसी समारोह में ही सही, जहां भी मिलते, खबर के अलावा कोई बात नहीं करते। हालांकि इस 'अलावा' में भी कुछ होता तो वह खबर ही होती। कभी न्यूयॉर्क टाइम्स, कभी लंदन टाइम्स की। ...और साथ में होते इनके बड़े-बड़े संपादकों के यादगार किस्से। लगता, उनकी बातें सुनते जाओ। सुनते ही जाओ, रात के तीन बजे तक। कभी सुबह के पांच बजे तक भी। पेट भर जाता, पर मन नहीं भरता। ...और यह सिलसिला किसी एक दिन, सप्ताह या महीने का नहीं, पूरे 365 दिन का था। जितना ऑनलाइन अपडेट रहते, उतने ही पौराणिक किताबों के अध्ययन में भी लीन रहते। जो कुछ भी पढ़ते, साथियों को बताते, सुनाते और अर्थाते। जैसे बाढ़ के दौरान नदी का पानी वेग से बहता, लेकिन तमाम कचरा किनारे पर छोड़ जाता है, वैसी ही उनकी एडिटिंग थी। खबर है तो उसमें तथ्य ही रहेंगे। बाकी जो कुछ भी रिपोर्टर के अपने विचार होते, सब काट-पीट कर एक जगह डाल देते थे। कहते-विचारों के लिए खबर में कोई जगह नहीं होती। उसके लिए अलग स्पेस है। वहां लिखिए। पाठक को खबर उसके शुद्ध रूप में ही मिलनी चाहिए। खबर में जितने लोगों के नाम या संकेत आएं, उन सबसे बात कीजिए। समझिए। फिर लिखिए। जब भी कोई रिपोर्टर यह कहे कि खबर से संबंधित व्यक्ति नहीं मिला, तो उनका एक ही जवाब होता- नहीं ही मिलेगा और खोजना ही है। वर्जन आपकी जरूरत है। उस व्यक्ति की नहीं।
समय की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। खबर में डूबते तो डूबे ही रहते। डूबते ही चले जाते। एक जुनून हमेशा सिर पर सवार रहता। न रुकता, न थकता कभी। लगातार। अनवरत। वही समय जिसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की, आज उनके पास बहुत पहले पहुंच गया। ले गया हमसे छीनकर अपने पास। समय के अनंत की ओर...
(साभार: दैनिक भास्कर)
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