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इतिहास का उत्सव मनाने का नाम है ‘लक्ष्मीनामा’

इतिहास में कई अनकही कहानियां और किस्से संजोये होते हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

इतिहास में कई अनकही कहानियां और किस्से संजोये होते हैं। ये कहानियां और किस्से जब शब्दों के रूप में हमारे सामने आते हैं, तो हम कुछ देर के लिए वर्तमान छोड़कर भूतकाल में चले जाते हैं। हाल ही में लॉन्च हुई ‘लक्ष्मीनामा’ भी हमें कुछ ऐसा ही अहसास कराती है। ‘इंडिया टुडे’ के संपादक अंशुमन तिवारी और अनिन्द्य सेनगुप्ता की इस किताब को हाथोंहाथ लिया जा रहा है।


2 नवंबर को दिल्ली में एक भव्य आयोजन में ‘लक्ष्मीनामा’ का लोकार्पण किया गया, तब से अब तक इसकी कई प्रतियां स्टोर से निकलकर पाठकों के घर जा पहुंची हैं। अंशुमान तिवारी ने जहां अपने प्रभावी लेखन और अर्थशास्त्र को सरलता से समझाने के कौशल से ‘लक्ष्मीनामा’ को आम पाठकों के लिए भी रुचिकर बनाया है, वहीं ऐतिहासिक कहानियों के वर्णन में महारत प्राप्त अनिन्द्य सेनगुप्ता ने भारत के मठों, मन्दिरों, राजा-महाराजाओं और व्यापारियों का सटीक आंकलन पेश किया है।

'लक्ष्मीनामा' को मोटे तौर पर पांच हिस्सों में विभाजित किया गया है। मसलन, समय, विचार, कारवां, भूगोल और स्पर्धा। इसमें कुल 15 अध्याय हैं, जो विचार, घटनाओं और कहानियों को हमारे सामने रखते हैं। आखिरी अध्याय स्पर्धा अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है, यहां आपको अंबानी परिवार का विवाद और उसमें धर्म-उद्योग के आधुनिक संबंधों के बारे में जानने को मिलेगा। 


'लक्ष्मीनामा' को एक तरह से धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की महागाथा कहा जा सकता है। यहां कई ऐसे उदाहरण हैं, जिससे यह पता चलता है कि किस तरह धर्म ने व्यापार को संरक्षण दिया और बदले में उसे व्यापार से आधार मिला। मोटे तौर पर कहा जाए तो किताब में धर्म और संतों के सहारे भारत के विकास की गाथा को रेखांकित किया गया है। लेखकों ने 'लक्ष्मीनामा' को सीमाओं के बंधन से मुक्त रखा है। यह आपको चीन, सुमेरु, वैदिक, मिस्त्र सहित तमाम सभ्यताओं से रुबरु कराती है। किताब में बताया गया है कि प्राचीनकाल से ही भारत वैश्विक व्यापार का केंद्र रहा है और किस तरह यहां के  समकालीन राजाओं, धार्मिक गुरुओं और व्यापारियों ने वैश्विक व्यापार को प्रोत्साहित किया है। ब्लूम्सबेरी पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 'लक्ष्मीनामा' में दान की ऐतिहासिक परंपरा को बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ से बयां किया गया है।


सेंटर फार इकोनॉमिक पॉलिसी रिसर्च में प्रोग्राम डायरेक्टर मुनि शंकर 'लक्ष्मीनामा' के बारे में कहते हैं 'लक्ष्मीनामा', बहुत ही अनोखी किताब है, यह अफ्रीका के गोबकेली से प्राप्त साक्ष्यों के आधार यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि धर्म का प्रादुर्भाव सभ्यता के आरम्भ से हो गया था। किताब आपको विश्व की कई सभ्यताओं से रुबरु कराते हुए भारत के भौगोलिक विशेषताओं से भी अवगत कराएगी, जो कि 'लक्ष्मीनामा' को सामान्य श्रेणी की किताबों से अलग करती है। 'लक्ष्मीनामा' यह प्रमाणित करने का प्रयास करती है कि वर्तमान अर्थव्यवस्था की जड़ें प्राचीन व्यवस्था में उसी रूप में विद्यमान थीं’।

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने भी 'लक्ष्मीनामा' की सराहना की है। उन्होंने अपनी समीक्षा में लिखा है ‘ऐसी रोचक पुस्तक 2018 में ही आ सकती है। इससे पहले इसकी कल्पना करना भी किसी लेखक के लिए कठिन होता। 'लक्ष्मीनामा' धर्म और व्यापार के संबंध में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। जो काल्पनिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। इसे पढ़ने वाले जानेंगे कि भारत में व्यापार ने धर्म की शीतल छाया में अपनी यात्रा आगे बढ़ाई है। आज यह आम धारण बन गई है कि जहां व्यापार है, वहां घोटाला है। 'लक्ष्मीनामा' इस धारणा पर पुनर्विचार करने को मजबूत करती है’।


'लक्ष्मीनामा' सोशल मीडिया पर भी खूब तारीफ बंटोर रही है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने लिखा है, ‘इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमन तिवारी ने इतिहास के अनूठे विषय पर अद्भुत किताब लिखी है - 'लक्ष्मीनामा' धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की महागाथा ..ये किताब हज़ारों साल के भारतीय समाज के ऐसे आयामों को रेखांकित करती है, जिन्हें शायद इतिहासकारों की नज़रों ने अहमियत नहीं दी’।

इसी तरह, साध्वी जया भारती ने लिखा है, ‘अंशुमान जी आपकी पुस्तक 'लक्ष्मीनामा' की मेरी प्रति आज मुझे मिल गई। इस पुस्तक की अत्यधिक प्रशंसा और सिफारिश सुनी है। भारतीय सभ्यता, धर्म और व्यापार के इतिहास पर इस रचना को पढ़ने की रुचि अलग ही है’।

पत्रकार राहुल देव ने पुस्तक की तारीफ में लिखा है, ‘एक बार फिर से अशेष बधाईयां और साधुवाद अंशुमान। अत्यन्त दूरगामी महत्व का, अभिनव शोधपूर्ण किन्तु उतना ही रोचक व पठनीय काम’।

वहीं, पत्रकार अंकित दुबे लिखते हैं ‘साम्राज्य,धर्म और व्यापार का इतिहास कहां से शुरू होता है और भारत में किस तरह हवा की तरह बहता है। लक्ष्मीनामा के हर अध्याय के प्रत्येक अनुच्छेद में कुछ ऐसी ही अनंत कहानियां मौजूद हैं’।


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